श्री राम जानकी मंदिर, कुटी पर हॅसराजपुर, एकमा

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पद्मपुराण में १६ अध्यायों में भगवान् श्रीराम के प्रति भगवान् शंकर ने जो उपदेश किया है ;  वह 'शिव-गीता' के नाम से प्रसिद्...
16/06/2026

पद्मपुराण में १६ अध्यायों में भगवान् श्रीराम के प्रति भगवान् शंकर ने जो उपदेश किया है ; वह 'शिव-गीता' के नाम से प्रसिद्ध है ।

आज से अवसर मिलने पर 'शिवगीता' की ही व्याख्या क्रमशः पोस्ट करेंगे ।

जिस समय पिता की आज्ञा प्राप्त कर भगवान् श्रीराम वन में पहुँचे , वहां पंचवटी में यति-वेष धारण कर रावण ने सीता का अपहरण किया ।

उस समय सीता के वियोग में अत्यन्त दुःखी श्रीराम जी लक्ष्मण के प्रति अपना दुःख प्रकट करके प्राण त्यागने के लिए तत्पर हुये ।

उसी समय अगस्त्य जी वहां पहुँचे , उन्होंने श्रीराम जी से कहा ==

"हे राम ! तुम क्षत्रिय-कुल-भूषण हो , आपका अवतार तो दुष्टों का दमन करने के लिए हुआ है , शत्रुओं को दुष्टता का दण्ड देकर तुम्हें सीताजी को प्राप्त करना चाहिए ।

सीता को प्राप्त करने के लिए आप शिवाराधना करें ।

राम ! अनेकों जन्मों के शुभ-कर्मों से शिव-भक्ति प्राप्त होती है , तब निष्काम-भाव से नित्त्य-नैमित्तिक-कर्मों का अनुष्ठान होता है , उससे चित्त शुद्ध होता है , तब नित्यानित्य का विवेक और दोनों लोकों के भोगों से वैराग्य , पुनः षट्-सम्पत्ति , पुनः मुक्ति की तीव्र कामना , तब संन्यास , फिर श्रोत्रिय-ब्रह्मनिष्ठ गुरु की शरणागति , तब श्रवण-मनन-निदिध्यासन निर्विघ्न होने पर तब आत्मसाक्षात्कार , तब भी ज्ञानी का जबतक प्रारब्ध कर्म है ; तबतक शरीर रहता है , पुनः जीवनमुक्ति की प्राप्ति होती है ।

प्रारब्ध-भोग के अनन्तर तीनों शरीरों को ज्ञानी यहीं छोड़कर कैवल्य मुक्ति पाता है ।

अतः चारों पुरुषार्थों की सिद्धि के लिए श्री शंकर जी की आराधना करो , इस आराधना से प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष श्री शंकर जी के दर्शन और आशीर्वाद से रावण पर विजय प्राप्त करोगे ।

भगवान् शिव आशुतोष हैं , शीघ्र ही प्रसन्न होकर पर्वत के समान महापापों को भस्म कर देते हैं , अतः तुम मुझसे पार्थिव-तत्त्व की दीक्षा लेकर शिवाराधना करो ।

वे भक्तिपूर्वक दिये हुये पत्र- पुष्प- फल- जल आदि वस्तुओं को ग्रहण करते हैं , यदि जल भी न मिले तो केवल प्रणाम मात्र से ही प्रसन्न होते हैं ।

वैसे तो भक्तिपूर्वक दिये हुए जल मात्र को भगवान् प्रेम से ग्रहण करते हैं , किन्तु श्रद्धा - भक्ति - विश्वास से रहित वे तीनों लोकों को भी स्वीकार नहीं करते ।"

तब श्रीराम ने कहा == "आप मुझे शिव-मन्त्र की दीक्षा दें ।"

तब अगस्त्य जी ने श्रीराम जी को विधि-विधान से दीक्षित किया तथा सभी पापों को भस्म करने वाला विरजा होम किया ।

उनकी आज्ञा से रामजी ने सारे शरीर में भस्म लगाई , रुद्राक्ष धारण करके शिवजी का ध्यान करते हुये स्तुति करने लगे ।

अनुष्ठान की पूर्ति पर भगवान् शशांकशेखर पार्वती तथा गणों सहित प्रकट हुये ।

शिवजी ने भगवान् राम को विश्वरूप दिखाया , तब श्रीराम उनकी स्तुति करने लगे ।

स्तुति के अंत में रामजी कहते हैं ==

"हे महाप्रभु ! यदि आप प्रसन्न होकर अपने भक्तों को इस लोक या परलोक की विभूति दे देते हैं अथवा पूरा लोक ही दे देते हैं तो यह आपकी विशेषता नहीं है, क्योंकि ये सब पदार्थ जड़ , दुःखरूप एवं नाशवान है , परिणाम में जन्म-मृत्यु का महादुःख देते हैं , अतः हे प्रभु ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो अपनी अनपायिनी अभेद भक्ति को ज्ञान सहित प्रदान कीजिये ।"

स्तुति से प्रसन्न हुये श्री शंकर जी रामजी से बोले ==

"मैं सम्पूर्ण विद्याओं का स्वामी हूँ , इसीलिए ईशान हूँ , मैं ही सर्व रूप हूँ , सर्वतोमुख , नेत्र , बाहु , चरणों वाला मैं अपनी भुजाओं से पृथ्वी-आकाश को व्याप्त करके स्थित हूँ ।

अपने हृदय में जो मेरा दर्शन करते हैं , उन्हीं को शान्ति प्राप्त होती है , बहिर्मुखी को नहीं ।

मैं ही कारणों का महाकारण हूँ , तुम मन की वृत्तियों को रोककर मुझमें लगाओ ।

जिसको प्राप्त न करके मन सहित वाणी लौट जाती है , वह आनन्दस्वरूप मैं ही हूँ ।

मुझको जानकर जीव भयभीत नहीं होता , मेरे वचनों में विश्वास करके मेरे ज्ञानी भक्त मेरा ध्यान करते हुए ज्ञान द्वारा मुक्ति प्राप्त करते हैं ।

मैं अचिन्त्य शक्ति हूँ , बिना पैर के चलता हूँ , बिना हाथ के ही जगत् को रचता हूँ , बिना आंखों के देखता हूँ , बिना कानों के सुनता हूँ ।

मैं सबको जानता हूँ , कोई मुझे नहीं जानता ।

वेद के द्वारा जानने योग्य मैं ही हूँ , वेदान्त का कर्ता मैं ही हूँ ।

मुझमें पुण्य- पाप- जन्म- मृत्यु- दस इन्द्रियां- अन्तःकरण चतुष्टय- पंच महाभूत नहीं है ।

मैं निष्कल हूँ , बुद्धि रूपी गुफा में स्थित हूँ ------ ऐसा जानकर सत्-असत् से विलक्षण अनिर्वचनीय भक्त मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है ।

राम ! इस प्रकार जो मुझे तत्त्व से जानता है , वह कैवल्य-मुक्ति प्राप्त करता है ।"

हिन्दू कालगणना के अनुसार कोई ढाई हजार वर्ष पहले  #आदि_शंकराचार्य ने  #जगन्नाथ_मंदिर को दो व्यवस्थाएं दीं।■ प्रथम, नित्य ...
04/06/2026

हिन्दू कालगणना के अनुसार कोई ढाई हजार वर्ष पहले #आदि_शंकराचार्य ने #जगन्नाथ_मंदिर को दो व्यवस्थाएं दीं।

■ प्रथम, नित्य महाप्रभु का प्रसाद #मिट्टी_के_पात्र में बनेगा, और हर दिन नया पात्र बनेगा।

■ दूसरे हर वर्ष महाप्रभु की यात्रा के लिए #रथ का निर्माण होगा। #हर वर्ष #नया_रथ बनेगा। और रथ निर्माण के लिए विशेष किस्म के उतने ही वृक्ष रोपे, बड़े किए जाएंगे, जितनों का प्रयोग रथ निर्माण में हुआ। इसके लिए फ़ासी, धौरा, आसन और सिमल वृक्ष हर वर्ष लगाए जाते हैं, जतन किया जाता है। यह भी #धर्मप्रदत_दायित्व है।

आदि शंकराचार्य श्री की यह व्यवस्था ढाई हजार वर्षों से बिना विराम चल रही है। लाखों करोड़ों #कुम्हार और #काष्ठ_शिल्पी की #जीविका बिना किसी #अवरोध के गतिमान है। संरक्षित है।

सवाल है, क्या संसार में कोई भी मानव निर्मित व्यवस्था ऐसी #दीर्घजीवी हुई है? कोई कॉरपोरेट या कंपनी की आयु 100-200 साल से अधिक रही है? वह बिना #विवाद या #बंटवारे के?

यही कारण है, हमेशा कहता हूं, धर्म, मजहब, रिलीजन, वामपंथ, लोकतंत्र #व्यवस्थाएं हैं। इसलिए, जब भी विमर्श करो तो #एकांगी नहीं, #तुलनात्मक करो।

कृपया वामपंथी इतिहासकारों के स्थापित #आदि_शंकर के काल-समय पर निर्रथक बहस ना करें। कम से कम मुझसे तो एकदम ना करें।

जगन्नाथ पुरी में रथ निर्माण का कार्य गति पर है।

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मस्जिद में क्यों सोते थे तुलसीदास ?दयानंद पांडेय हैं कुछ मूर्खाधिपति जो तुलसी का यह लिखा हरदम कोट करते हुए अपनी सेक्यूलर...
15/12/2025

मस्जिद में क्यों सोते थे तुलसीदास ?

दयानंद पांडेय

हैं कुछ मूर्खाधिपति जो तुलसी का यह लिखा हरदम कोट करते हुए अपनी सेक्यूलरिज़्म की भांग घोंटते रहते हैं "माँग के खाइबो मसीत में सोइबो।" साथ ही पूछते रहते हैं कि , तुलसी ने राम चरित मानस लिख डाली। राम मंदिर के टूटने का और बाबरी मस्जिद बनने का क्या तुलसी को जरा भी अफसोस नहीं रहा होगा? कहीं लिखा क्यों नहीं? इन नितंब नरेशों को "माँग के खाइबो मसीत में सोइबो।" में तुलसी की विवशता नहीं समझ में नहीं आती। बाबर के समय मंदिर तोड़ कर मस्जिद बनाई जा चुकी थी। अकबर का शासन था और तुलसी उसी मंदिर में सो रहे थे जो , मस्जिद बन चुकी थी। नहीं मस्जिद में सोने की और क्या लाचारी थी भला तुलसीदास को ?

भिक्षा ही से उन का पेट पलता था। राम के भक्त थे सो मस्जिद बन चुके राम मंदिर में सोते थे। लिख कर लोगों को बताते थे , "माँग के खाइबो मसीत में सोइबो।" एक शांति प्रिय और राम को गाने वाला व्यक्ति इस से ज़्यादा और कैसे लिख कर बता सकता था ? सिर तन से जुदा करने के रास्ते पर तो नहीं जा सकता था ? गो कि उस समय भी सिर तन से जुदा करने की तजवीज आम थी। औरंगज़ेब के समय तो उफान पर थी।

कुछ मुस्लिम राजाओं द्वारा मंदिर बनाने के लिए ज़मीन , ईंटें , धन आदि देने के विवरण भी यह नितंब नरेश लोग जब-तब परोसते रहते हैं। मुस्लिम राजा लोग यह ज़मीन , ईंटें , धन लाए कहां से थे ? यह नहीं बताते यह लोग। लूटा हुआ धन तो सुनता हूं , सुल्ताना डाकू भी कुछ मुट्ठी भर लोगों में बांटता था। तो क्या वह डाकू नहीं , धर्मात्मा था ? यह नहीं बताते यह नितंब नरेश लोग कि "माँग के खाइबो मसीत में सोइबो।" लिखने वाले तुलसी ने अकबर की क़ैद में रहने के बावजूद नवरत्न बनने का प्रस्ताव ठुकरा दिया था।

मत्स्यावतार चार वेदों के साथ।।नेपाल संग्रहालय के संग्रह में, विष्णु को मत्स्य रूप में दर्शाया गया है, जो चार वेदों को चा...
15/12/2025

मत्स्यावतार चार वेदों के साथ।।

नेपाल संग्रहालय के संग्रह में, विष्णु को मत्स्य रूप में दर्शाया गया है, जो चार वेदों को चार बच्चों के रूप में धारण किए हुए हैं, जो अपने रक्षक से लिपटे हुए हैं - नेपाली शैली में मत्स्यावतार का एक दुर्लभ कलात्मक चित्रण।

महाभारत के वन पर्व में, वैवस्वत मनु के पास एक सुनहरी मछली आती है और उनकी रक्षा का अनुरोध करती है और वादा करती है कि जब प्रलयकारी बाढ़ आएगी, तो वह राजा की रक्षा करेगी।
मनु मछली को विभिन्न पात्रों में रखते हैं, लेकिन वह पात्रों के आकार से बड़ी होती जाती है और अंततः पवित्र गंगा नदी के माध्यम से समुद्र में चली जाती है।
दिव्य मछली मनु को एक जहाज बनाने, प्रत्येक प्रजाति के सदस्यों को लेने और बाढ़ की तैयारी करने का निर्देश देती है।
जब प्रलय का समय आता है, तो मछली जहाज को जलमार्ग से ले जाती है। मनु को सुरक्षित रूप से भूमि पर उतारने के बाद, मछली ब्रह्मा के रूप में प्रकट होती है और मनु को सृष्टि का कार्य सौंपती है।

जामवन्त जी आज भी जिंदा हैं, जानिए उनके जीवन का रहस्य!!!जामवन्त जी को ऋक्षपति कहा जाता है। यह ऋक्ष बिगड़कर रीछ हो गया जिस...
23/11/2025

जामवन्त जी आज भी जिंदा हैं, जानिए उनके जीवन का रहस्य!!!

जामवन्त जी को ऋक्षपति कहा जाता है। यह ऋक्ष बिगड़कर रीछ हो गया जिसका अर्थ होता है भालू अर्थात भालू के राजा। लेकिन क्या वे सचमुच भालू मानव थे? रामायण आदि ग्रंथों में तो उनका चित्रण ऐसा ही किया गया है। ऋक्ष शब्द संस्कृत के अंतरिक्ष शब्द से निकला है।

दरअसल दुनियाभर की पौराणिक कथाओं में इस तरामंडल को अलग-अलग नाम से पुकारा जाता है, लेकिन सप्तऋषि तारामंडल मंडल को यूनान में बड़ा भालू (larger bear) कहा जाता है। इस तरामंडल के संबंध में प्राचीन भारत और यूनान में कई दंतकथाएं प्राचलित हैं।

पुराणों के अध्ययन से पता चलता है कि वशिष्ठ, अत्रि, विश्वामित्र, दुर्वासा, अश्वत्थामा, राजा बलि, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम, मार्कण्डेय ऋषि, वेद व्यास और जामवन्त आदि कई ऋषि, मुनि और देवता सशरीर आज भी जीवित हैं। कहते हैं कि जामवन्तजी बहुत ही विद्वान् हैं।

वेद उपनिषद् उन्हें कण्ठस्थ हैं। वह निरन्तर पढ़ा ही करते थे और इस स्वाध्यायशीलता के कारण ही उन्होंने लम्बा जीवन प्राप्त किया था। परशुराम और हनुमान के बाद जामवन्त ही एक ऐसे व्यक्ति थे जिनके तीनों युग में होने का वर्णन मिलता है और कहा जाता है कि वे आज भी जिंदा हैं।

लेकिन परशुराम और हनुमान से भी लंबी उम्र है जामवन्तजी कि क्योंकि उनका जन्म सतयुग में राजा बलि के काल में हुआ था। परशुराम से बड़े हैं जामवन्त और जामवन्त से बड़े हैं राजा बलि।

रामायण काल में हमारे देश में तीन प्रकार की संस्कृतियों का अस्तित्व था। उत्तर भारत में आर्य संस्कृति जिसके प्रमुख राजा दशरथ थे, दक्षिण भारत में अनार्य संस्कृति जिसका प्रमुख रावण था और तीसरी संस्कृति देश के मध्य भारत में आरण्यक संस्कृति (जनजातीय और आदिवासी) के रूप में अस्तित्व में थी जिसके संरक्षक महर्षि अगस्त्य मुनि थे। अगस्त मुनि, वनवासियों के गुरु व मार्ग-दर्शक थे। ऋक्ष और वानर, बाली, सुग्रीव, जामवन्त, हनुमान, नल, नील आदि अस्त्य मुनि के शिष्य थे।

कहा जाता है कि जामवन्त सतयुग और त्रेतायुग में भी थे और द्वापर में भी उनके होने का वर्णन मिलता है। जामवन्त एक रीछ थे या किसी देवता की संतान? आखिर जामवन्तजी इतने लंबे काल तक कैसे जिंदा रहे? यह सब हम जाएंगे अगले पन्ने पर..

पहला रहस्य,अग्नि पुत्र जामवन्त : - प्राचीन काल में इंद्र पुत्र, सूर्य पुत्र, चंद्र पुत्र, पवन पुत्र, वरुण पुत्र, ‍अग्नि पुत्र आदि देवताओं के पुत्रों का अधिक वर्णन मिलता है। उक्त देवताओं को स्वर्ग का निवासी कहा गया है। एक ओर जहां हनुमानजी और भीम को पवन पुत्र माना गया है, वहीं जामवन्तजी को अग्नि पुत्र कहा गया है। जामवन्त की माता एक गंधर्व कन्या थी। जब पिता देव और माता गंधर्व थीं तो वे कैसे रीछमानव हो सकते हैं?

एक दूसरी मान्यता अनुसार भगवान ब्रह्मा ने एक ऐसा रीछ मानव बनाया था जो दो पैरों से चल सकता था और जो मानवों से संवाद कर सकता था। पुराणों अनुसार वानर और मानवों की तुलना में अधिक विकसित रीछ जनजाति का उल्लेख मिलता है। वानर और किंपुरुष के बीच की यह जनजाति अधिक विकसित थी। हालांक‍ि इस संबंध में अधिक शोध किए जाने की आवश्यकता है।

दूसरा रहस्य,जामवन्त का जन्म : - माना जाता है कि देवासुर संग्राम में देवताओं की सहायता के लिए जामवन्त का जन्म ‍अग्नि के पुत्र के रूप में हुआ था। उनकी माता एक गंधर्व कन्या थीं।

सृष्टि के आदि में प्रथम कल्प के सतयुग में जामवन्तजी उत्पन्न हुए थे। जामवन्त ने अपने सामने ही वामन अवतार को देखा था। वे राजा बलि के काल में भी थे। राजा बलि से तीन पग धरती मांग कर भगवान वामन ने बलि को चिरंजीवी होने का वरदान देकर पाताल लोक का राजा बना दिया था। वामन अवतार के समय जामवन्तजी अपनी युववस्था में थे। जामवन्त को चिरं‍जीवियों में शामिल किया गया है जो कलियुग के अंत तक रहेंगे।

तीसरा रहस्य,राम युग में जामवन्त : - त्रेतायुग में भी जामवन्त बूढ़े हो चले थे। राम के काल में उन्होंने भगवान राम की सहायता की थी। कहते हैं कि जामवन्तजी समुद्र को लांघने में सक्षम थे लेकिन त्रेतायुग में वह बूढ़े हो चले थे। इसीलिए उन्होंने हनुमानजी से इसके लिए विनती थी कि आप ही समुद्र लांघिये। वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड में जामवन्त का नाम विशेष उल्लेखनीय है। जब हनुमानजी अपनी शक्ति को भूल जाते हैं तो जामवन्तजी ही उनको याद दिलाते हैं।

जामवन्त के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई॥1॥

रामायण अनुसार वानर सेना में अंगद, सुग्रीव, परपंजद पनस, सुषेण (तारा के पिता), कुमुद, गवाक्ष, केसरी, शतबली, द्विविद, मैंद, हनुमान, नील, नल, शरभ, गवय लोग शामिल थे।

माना जाता है कि जामवन्तजी आकार-प्रकार में कुंभकर्ण से तनीक ही छोटे थे। जामवन्त को परम ज्ञानी और अनुभवी माना जाता था। उन्होंने ही हनुमानजी से हिमालय में प्राप्त होने वाली चार दुर्लभ औषधियों का वर्णन किया था जिसमें से एक संजीविनी थी।

मृत संजीवनी चैव विशल्यकरणीमपि।
सुवर्णकरणीं चैव सन्धानी च महौषधीम्‌॥- युद्धकाण्ड 74-33

विशल्यकरणी (शरीर में घुसे अस्त्र निकालने वाली), सन्धानी (घाव भरने वाली), सुवर्णकरणी (त्वचा का रंग ठीक रखने वाली) और मृतसंजीवनी (पुनर्जीवन देने वाली)।

चौथा रहस्य जामवन्त का अहंकार : - राम-रावण के युद्ध में जामवन्तजी रामसेना के सेनापति थे। युद्ध की समाप्त‌ि के बाद जब भगवान राम विदा होकर अयोध्या लौटने लगे तो जामवन्तजी ने उनसे कहा कि प्रभु इतना बड़ा युद्ध हुआ मगर मुझे पसीने की एक बूंद तक नहीं गिरी, तो उस समय प्रभु श्रीराम मुस्कुरा दिए और चुप रह गए। श्रीराम समझ गए कि जामवन्तजी के भीतर अहंकार प्रवेश कर गया है।

जामवन्त ने कहा, प्रभु युद्ध में सबको लड़ने का अवसर मिला परंतु मुझे अपनी वीरता दिखाने का कोई अवसर नहीं मिला। मैं युद्ध में भाग नहीं ले सका और युद्ध करने की मेरी इच्छा मेरे मन में ही रह गई। उस समय भगवान ने जामवन्तजी से कहा, तुम्हारी ये इच्छा अवश्य पूर्ण होगी जब मैं अगला अवतार धारण करूंगा। तब तक तुम इसी स्‍थान पर रहकर तपस्या करो।

पांचवां रहस्य,द्वापर युग में जामवन्त : स्यमंतक मणि को इंद्रदेव धारण करते हैं। कहते हैं कि प्राचीनकाल में कोहिनूर को ही स्यमंतक मणि कहा जाता था। कई स्रोतों के अनुसार कोहिनूर हीरा लगभग 5,000 वर्ष पहले मिला था और यह प्राचीन संस्कृत इतिहास में लिखे अनुसार स्यमंतक मणि नाम से प्रसिद्ध रहा था। दुनिया के सभी हीरों का राजा है कोहिनूर हीरा।

यह बहुत काल तक भारत के क्षत्रिय शासकों के पास रहा फिर यह मुगलों के हाथ लगा। इसके बाद अंग्रेजों ने इसे हासिल किया और अब यह हीरा ब्रिटेन के म्यूजियम में रखा है। हालांकि इसमें कितनी सच्चाई है कि कोहिनूर हीरा ही स्यमंतक मणि है? यह शोध का विषय हो सकता है। यह एक चमत्कारिक मणि है।

भगवान श्रीकृष्ण को इस मणि के लिए युद्ध करना पड़ा था। उन्होंने मणि के लिए नहीं बल्कि खुद पर लगे मणि चोरी के आरोप को असिद्ध करने के लिए जाम्बवंत से युद्ध करना पड़ा था। दरअसल, यह मणि भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी सत्यभामा के पिता सत्राजित के पास थी और उन्हें यह मणि भगवान सूर्य ने दी थी।

सत्राजित ने यह मणि अपने देवघर में रखी थी। वहां से वह मणि पहनकर उनका भाई प्रसेनजित आखेट के लिए चला गया। जंगल में उसे और उसके घोड़े को एक सिंह ने मार दिया और मणि अपने पास रखी ली। सिंह के पास मणि देखकर जाम्बवंतजी ने सिंह को मारकर मणि उससे ले ली और उस मणि को लेकर वे अपनी गुफा में चले गए, जहां उन्होंने इसको खिलौने के रूप में अपने पुत्र को दे दी। इधर सत्राजित ने श्रीकृष्ण पर आरोप लगा दिया कि यह मणि उन्होंने चुराई है।

तब श्रीकृष्ण को यह मणि हासिल करने के लिए जाम्बवंतजी से युद्ध करना पड़ा। बाद में जाम्बवंत जब युद्ध में हारने लगे तब उन्होंने अपने प्रभु श्रीराम को पुकारा और उनकी पुकार सुनकर श्रीकृष्ण को अपने रामस्वरूप में आना पड़ा। तब जाम्बवंत ने समर्पण कर अपनी भूल स्वीकारी और उन्होंने मणि भी दी और श्रीकृष्ण से निवेदन किया कि आप मेरी पुत्री जाम्बवती से विवाह करें।

जाम्बवती-कृष्ण के संयोग से महाप्रतापी पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम साम्ब रखा गया। इस साम्ब के कारण ही कृष्ण कुल का नाश हो गया था। श्रीकृष्ण ने कहा कि कोई ब्रह्मचारी और संयमी व्यक्ति ही इस मणि को धरोहर के रूप में रखने का अधिकारी है अत: श्रीकृष्ण ने वह मणि अक्रूरजी को दे दी। उन्होंने कहा कि अक्रूर, इसे तुम ही अपने पास रखो। तुम जैसे पूर्ण संयमी के पास रहने में ही इस दिव्य मणि की शोभा है। श्रीकृष्ण की विनम्रता देखकर अक्रूर नतमस्तक हो उठे।

छठा रहस्य,यहां युद्ध हुआ था श्रीकृष्ण से : - गुजरात के पोरबंदर से 17 किलोमीटर दूर राजकोट-पोरबंदर मार्ग पर एक गुफा पाई गई है जिसे जामवन्त की गुफा कहा जाता है। माना जाता है कि यह वही स्थान है जहां भगवान कृष्ण और जामवन्त के बीच युद्ध हुआ था। माना जाता है कि इस गुफा में दो सुरंग हैं। पहली सुरंग जानाघर जो जाती है और दूसरी द्वारिका के लिए।

सातवां रहस्य,जामथुन नगरी : - माना जाता है कि जामथुन नामक नगरी जामवन्त ने बसाई थी। यह प्राचीन नगरी मध्यप्रदेश के रतलाम जिले में उत्तर-पूर्व में स्थित है। यहां एक गुफा मिली है जो जामवन्त का निवास स्थान माना जाता है।

बरेली की गुफा : - उत्तर प्रदेश के बरेली के पास जामगढ़ में भी एक प्राचीन गुफा है। माना जाता है कि जामवन्तजी यहां हजारों वर्ष रहे थे। बरेली से लगभग सोलह किलोमीटर दूर विंध्याचल की पहाड़ी पर पुराकाल से ही गणेश-जामवन्त की प्रतिमा स्थापित हैं, जिनके बारे में मान्यता है कि जामवन्तजी द्वारा स्थापित यह प्रतिमा प्रतिवर्ष एक तिल के बराबर बढ़ती जा रही है।

आठवां रहस्य : - जामवन्त तपोगुफा : जम्मू और कश्मीर के जम्मू नगर के पूर्वी छोर पर एक गुफा मंदिर बना हुआ है जिसे जामवन्त की तपोस्थली माना जाता है। इस गुफा में कई पीर-फकीरों और ऋषियों ने तपस्या की है इसलिए इसका नाम 'पीर खोह्' भी कहा जाता है। डोगरी भाषा में खोह् का अर्थ गुफा होता है।

पीर खोह् तक पहुंचने के लिए श्रद्धालु मुहल्ला पीर मिट्ठा के रास्ते गुफा तक जाते हैं। मंद‌िर की दीवारों पर देवी-देवताओं के मनमोहक चित्र उकेरे गए हैं। आंगन में श‌िव मंद‌िर के सामने पीर पूर्णनाथ और पीर स‌िंध‌िया की समाधिंया हैं। जामवन्त गुफा के साथ एक साधना कक्ष का निर्माण किया है जो तवी नदी के तट पर स्थित है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है।

मित्रों आइए जानते हैं प्राचीन द्वीप के लोक-नाम और  वर्तमान द्वीप के लोक-नामों को प्राचीन द्वीप  नाम              वर्तमान...
22/05/2025

मित्रों आइए जानते हैं प्राचीन द्वीप के लोक-नाम और वर्तमान द्वीप के लोक-नामों को

प्राचीन द्वीप नाम वर्तमान द्वीप नाम

(1) जम्बू द्वीप एशिया
(2) पलक्ष द्वीप योरोप
(3) सालमली द्वीप उ०म० अमेरिका
(४) कुश द्वीप अफ्रीका
(5) कौच द्वीप ऑस्ट्रेलिया
(6) शाक द्वीप दक्षिण अमेरिका
(7) पुष्कर द्वीप ग्रीन लैंड

प्राचीन सागर नाम वर्तमान सागर नाम

(1) क्षीर सागर प्रशांन्त महासागर
(2) क्षीरोद सागर कैस्पियन सागर
(3) यतोद सागर आर्कटिक सागर
(4) उदधि सागर हिन्द महासागर
(5) इक्षु सागर अटलांटिक सागर
(6) सरोद सागर भूमध्य सागर
(7) दयोद सागर एन्टार्कटिक सागर

आदि काल में जहाँ सबसे पहले मनुष्य-जाति उत्त्पन्न हुई उसको विविष्टय या तिब्बत कहते हैं। यह संसार में सबसे ऊँचा स्थान है। यहाँ पर मनुष्य-जाति आर्य कहलाई और वहां से चलकर उत्तरी भारत में उसने सब से पहले ब्रह्मवर्त यानि ऋषि देश बसाया। उसके पश्च्यात वह हिमालय व समुद्र के बिच समस्त स्थान में फ़ैल गई और इस स्थान का नाम आर्यावर्त कहलाया। इसी को वर्तमान में भारतवर्ष कहते हैं। यहीं से आर्य चारो ओर दूर-दूर देशो में फैले। समस्त भू-मण्डल में जितनी भी जातियां हैं वह सब इन्ही आर्यों की संतान हैं। जल, वायु और भौगोलिक कारणों से लोगों के रहन-सहन, बोल-चाल, आचार-विचार व शारीरिक बनावट व रंग-रूप में अंतर पड़ गया है। भिन्न-भिन्न देशों में पृथ्वी की खुदाई से जो अवशेष मिल रहे हैं उनसे प्रकट होता है कि समस्त विश्व में आर्य यानी भारतीय संस्कृति ही भूतकाल में फैली हुई थी । शास्त्रों व पुराणों में जिन लोकों व सागरों का वर्णन आया है वर्तमान में वह उपरोक्त नामो से पुकारे जाते है।

आप केवल इतना भर जानते हैं कि  #चक्रव्यूह में  #अभिमन्यु मारा गया था या फिर  #कौरव महाबलियों ने उसे घेर कर मार दिया था?तो...
18/04/2025

आप केवल इतना भर जानते हैं कि #चक्रव्यूह में #अभिमन्यु मारा गया था या फिर #कौरव महाबलियों ने उसे घेर कर मार दिया था?

तो फिर आप रुकिये ..

#श्रीकृष्ण जिसके #गुरु हों और जो स्वंय #केशव ही का #भांजा भी हो। उसके शौर्य को फिर आधा ही जानते हैं आप तब। कुछ तथ्यों से आप वंचित हैं। क्योंकि उस लड़ाई में #अभिमन्यु ने जिन वीरपुत्र योद्धाओं को मार कर वीरगति पाई थी उनको भी जान लीजिये ..

● #दुर्योधन का पुत्र #लक्ष्मण
●कर्ण का छोटा पुत्र.
●अश्मका का बेटा
●शल्या का छोटा भाई
●शल्या के पुत्र रुक्मरथ
● दृघलोचन Drighalochana
● कुंडवेधी Kundavedhi
● सुषेण Sushena
● वसत्य Vasatiya
● क्रथा और कई योद्धा ...

और ये तब था जब ... उस चक्रव्यूह को जिसे अभिमन्यु को भेदना था ..उसके प्रत्येक द्वार - पहले से लेकर सातवें पर योद्धाओं को देखिये -

१) #अश्वथामा
२) #दुर्योधन
३) #द्रोणाचार्य
4) #कर्ण
५) #कृपाचार्य
६) #दुशासन
7) #शाल्व (दुशासन के पुत्र)

अभिमन्यु के प्रवेश के बाद ही #जयद्रथ ने प्रथम प्रवेशद्वार पर #पांडवों के प्रवेश को रोक दिया था।

चक्रव्यूह जो कि #कुरुक्षेत्र के सबसे खतरनाक युद्ध तंत्र में से एक था। वह चक्रव्यू जिसको भेदना असंभव था..

#द्वापरयुग में केवल 7 लोग ही जानते थे:

●कृष्णा
●अर्जुन
●भीष्म
●द्रोणाचार्य
●कर्ण
●अश्वत्थामा
●प्रद्युम्न

#अभिमन्यु केवल उसमें प्रवेश करना जानता था
चक्रव्यूह को #घूर्णन_मृत्यु_चक्र (rotating death wheel) भी कहा जाता था ..

यह पृथ्वी की तरह घूमता था, साथ ही हर परत के चारों ओर घूमता था। इस कारण से, निकास द्वार हर समय एक अलग दिशा में मुड़ता था, जो दुश्मन को भ्रमित करता था।

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि #संगीत या #शंख ध्वनि के अनुसार, चक्रव्यूह के सैनिक अपनी स्थिति बदल सकते थे। कोई भी #कमांडर या #सिपाही स्वेच्छा में अपनी स्थिति नहीं बदल सकता था...द्रोण रचित चक्रव्यूह एक घूमते हुए चक्र #कुंडली की तरह था, अगर कोई योद्धा इस व्यूह के खुले हुए हिस्से में घुसता था तो मारे गए सैनिक की जगह तुरंत ही दूसरा अधिक शक्तिशाली सैनिक आ जाता था, सैनिकों की पंक्ति लगातार घूमती रहती थी और बाहरी सभी चक्र शक्तिशाली होते रहते थे।

इसलिए चक्रव्यूह में प्रवेश आसान था पर बाहर निकलने के लिए #योद्धा को व्यूह की किसी भी समय तात्कालिक स्थिति की जानकारी होना आवश्यक था और इसके लिए व्यूह के हर चक्र के एक योद्धा की स्थिति उसे याद रखनी पड़ती थी।

माना जाता है कि चक्रव्यूह का गठन दुश्मन को #मनोवैज्ञानिक और मानसिक रूप से इतना तोड़ देता था कि दुश्मन के हजारों सैनिक एक पल में मर जाते थे।

यह अकल्पनीय है कि यह रणनीति सदियों पहले "वैज्ञानिक रूप से" गठित की गई थी।

17/02/2025

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