Shri Krishna Sandesh Yatra

Shri Krishna Sandesh Yatra Our Aims to strengthen the moral fabric of the society through various spiritual initiatives।

27/02/2024

*राम मंदिर तो झांकी है, काशी और मथुरा अभी बाकी है।*

*श्रीकृष्ण संदेश यात्रा*

दोस्तो हम सभी जानते हैं हिंदू धर्म की स्थापना सिर्फ और सिर्फ शांति और न्याय पर हुई है, परंतु हम सब यह भी जानते है ।कि बदलते परिवेश में धर्म एवम् मान्यताओं में भी बदलाव निश्चित है, परंतु एक चीज नही बदल सकती वो है धर्म के प्रति हमारी आस्था और भावनाएं।

सदियों से अनेक आक्रांताओं ने, उसके बाद सरकारों ने और उनकी संस्थाओ ने यह साबित करने का प्रयास कि कैसे हिंदुओ की आस्थाओ और मान्यताओं को झुठलाकर कमजोर किया जा सके , परंतु राममंदिर के निर्माण ने ऐसे सभी दलों और संगठनों के प्रयासों को विफल करते हुए हिंदू धर्म के लोगो की आस्थाओं और भावनाओं ने एक अलग ही ऊंचाइयों को प्राप्त करते हुए यह साबित किया कि जब जब समय आएगा हिंदू एक होंगे और ऐसे किसी भी प्रयास को विफल करेंगे जिस से उन्हें कमजोर और लाचार बनाया जायेगा।

दोस्तो सदियों से हिंदू धर्म ने अनेक प्रकार के युद्ध लड़े और जीते, और हर युद्ध में त्याग और बलिदान ने अहम योगदान दिया है जिसका वर्तमान में अद्भुत उदाहरण राम मंदिर के रूप में लोगो के सामने आया है, जहां 1990 में आयोजित रथयात्रा ने लोगो को एक करने का काम किया और भगवान राम के मंदिर की स्थापना के लिए बलिदान देने के लिए प्रेरित किया, और जिस प्रेरणा और भावनाओं के साथ हिंदुओ ने बलिदान दिया वो अविस्मरणीय है, लाखो लाख हिंदू यात्रा का हिस्सा बने और कई हिंदू शेरो ने अपने प्राणों की आहुति दी मेरा सादर नमन है ऐसी विभूतियों और आहुतियों को.
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बलिदान के बाद जब योगदान की जरूरत पड़ी तब भी यही हिंदू अभूतपूर्व तरीके से आगे आए, और *भगवान राम का मंदिर के स्थापना में 3500 करोड़ का दान देकर ना सिर्फ दुनिया को चौकाने का काम बल्कि यह भी बता दिया कि जब भी धर्म की जरूरत पड़ेगी, हर हिंदू एक है और अपने धर्म की रक्षा और स्थापना के लिए अपना सर्वस्व बलिदान और त्याग करने के लिए तैयार है।*

दोस्तो आज फिर वही भावनाओं की जरूरत है, हमारे आराध्य भगवान श्रीकृष्ण के लिए।

परमपिता परमेश्वर की कृपा से और आप सभी की मजबूत इच्छाशक्ति से आज हमारे साथ एक ऐसी सरकार है जिसमें बलिदान की जरूरत नहीं रह गई है, मोदीजी और योगीजी के रूप में हमारे पास ऐसी विभूतियां हैं जो ना सिर्फ हिंदू धर्म की स्थापना कर रहे है अपितु हिंदुओ की रक्षा भी कर रहे है, ऐसी विभूतियों मेरा बारम्बार प्रणाम है।

दोस्तो आज आपकी (श्रीकृष्ण संदेश यात्रा) एक रथयात्रा का संकल्प लिया गया है । जोकि भगवान श्रीकृष्ण की नगरी भेट द्वारका से भगवान श्री कृष्ण की जन्मभूमि मथुरा उत्तर प्रदेश तक होगी, जिसका उद्देश्य ना सिर्फ हिंदूओ को धर्म के प्रति जागरूक करना है अपितु श्री कृष्ण जन्मभूमि के लिए लड़ रहे *सनातन योद्धाओ को भी मजबूत करना है।*

दोस्तो आप सभी जानते हो कि आज के परिवेश में किसी भी आंदोलन लड़ाई के लिए योगदान की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, क्योंकि बिना योगदान के किसी भी आंदोलन को सफल नहीं बनाया जा सकता, आज *श्री कृष्ण संदेश यात्रा* भी आप से योगदान की अपेक्षा करते हुए आपको आमंत्रित करती है ।और आपके रथयात्रा के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से योगदान की आशा कर रही है।

तो आइए दोस्तो श्रीकृष्ण संदेश यात्रा (रथयात्रा )को अपना समर्थन देते हुए प्रत्यक्ष रूप से इसमें सम्मिलित होने का प्रण करे और अप्रत्यक्ष रूप से अपना योगदान चंदे के रूप में दें।

आप सभी से लिया गया (चंदा) सहयोग सिर्फ और सिर्फ मानवकल्याण में और रथयात्रा में प्रयोग किया जाएगा।

*हम सब एक धर्मयुद्ध लड़ने जा रहे है, सफल होंगे या असफल होंगे यह तो परमपिता परमेश्वर जानता है, परंतु हम सब आज प्रण करे कि पुनः धर्म स्थापना के लिए अपना सर्वत्र न्योछावर कर देंगे ।*

यात्रा से जुड़ने के लिए सभी जानकारी नीचे दी गई है। इस यात्रा का संचालन श्री कृष्ण जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र द्वारा संचालित किया जा रहा है आपका सहयोग अमूल है भगवान श्री कृष्णा आप पर कृपा बनाएं और आपको धन-धान्य से पूर्ण करें।

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26/02/2024

भक्ति

भक्ति का अधिकारी श्री कृष्ण सभी को बताते हैं। गीता में, दुराचारी, पाप- योनि, स्त्री अथवा शूद्र कोई भी हो सभी को भक्ति का अधिकार है और भक्ति से परम गति को प्राप्त कर सकते हैं-- गीता9।32 । देखा जाए तो भागवत में ज्ञान और कर्मयोग भक्ति प्राप्ति के लिए ही बताए गए, यह स्वयं श्रीकृष्ण ने उद्धव को समझाया है। “प्यारे उद्धव ! तुम ध्यान से अपने स्वरूप को जानो और फिर ध्यान से संपन्न होकर भक्ति भाव से मेरा भजन करो।’’कृष्ण ने यह भी कहा है कि निष्काम कर्म करने से तत्व ज्ञान प्राप्त होता है या कृष्ण की भक्ति प्राप्त होती है-। ज्ञान और कर्म का लक्ष्य कृष्ण भक्ति ही है। ज्ञान और वैराग दोनों ही भक्ति से अपने आप प्राप्त हो जाते हैं। नारद जी को आत्मज्ञान भक्ति ही से प्राप्त हुआ था।

“भक्ति अपने आप नहीं होती, यह की भी नहीं जा सकती, यह तो दान में दी जाती है भगवान द्वारा महापुरुष के माध्यम से।’’ ऐसा मत है जगतगुरुत्तम श्री कृपालुजी महाराज का। राजा निमि को समझाते हुए चौथे योगीश्वर प्रबुद्ध जी बोलते हैं, “राजन श्रीकृष्ण पापों का एक क्षण में नाश कर देते हैं। सब उन्हीं का स्मरण करें और एक दूसरे से भी स्मरण करवाएँ। इस प्रकार साधन भक्ति का अनुष्ठान करते करते प्रेम- भक्ति का उदय हो जाता है।अतः साधन भक्ति किस प्रकार की जाए और भागवत इस संबंध में क्या कहती है, इन्हीं बातों पर अब गौर करना है। नारदजी आदि भक्ति के आचार्यों का यह मत है कि भक्ति मन द्वारा की जाती है। जहाँ मन जाता है वहीं मन के साथ हम भी चले जाते हैं, जैसे सुई के साथ डोरा। इसलिए, मन को भगवान में लगाना है, चाहे जिस भाव से -द्वेष से, भय से, प्रेम से, कामना से, नातेदारी से।“गोपियों ने तीव्र काम भाव से अर्थात प्रेम से, कंस ने भय से, शिशुपाल आदि राजाओं ने द्वेष से, यदुवंशियों ने संबंध से यानी नातेदारी से, पांडवों ने स्नेह से और हम लोगों (भक्तों ) ने भक्ति से अपने मन को भगवान में लगाया है। "। नारद जी और अवधूत दत्तात्रेयजी, जो भगवान के अवतार हैं, कीड़े का दृष्टांत देते हुए समझाते हैं कि भृंगी द्वारा दीवार पर मिट्टी के घोंसले में बंद किया कीड़ा निरंतर भृंगी का भय से ध्यान करता है और इसी प्रकार ध्यान करते-करते उसका रूप भृंगी का रूप हो जाता है। यहाँ तक भी कहा गया है कि भगवान की भावना करते-करते भक्त स्वयं ही भगवान हो जाता है । पतंजलि ऋषि ने भी अपने योग सूत्र (विभूति पाद 23 व 24 में) बताया है कि जिस वस्तु या व्यक्ति का ध्यान किया जाता है तो स्वयं संयम (ध्यान) करने वाला उस व्यक्ति या वस्तु जैसा हो जाता है और उस व्यक्ति या वस्तु के गुण संयम करने वाले में भी आ जाते हैं, जैसे हाथी के बल में संयम करने से हाथी का बल प्राप्त होता है। इसलिए मन को भगवान में लगाना है। जो बातें ऊपर कही गई हैं भगवान से बैर करना और भगवान से डरने की, वह व्यावहारिक नहीं है, अवतार काल के अलावा। भगवान या किसी अन्य से बैर या भय की भावना रखना आसान नहीं है। इससे शरीर में बहुत विकार पैदा हो जाते हैं। फिर, जिनका दृष्टांत आया है वे विष्णु पार्षद थे-- जय और विजय। साधारण व्यक्ति के लिए ऐसा करना संभव नहीं। अवतारकाल के अलावा ऐसा करना तो असंभव ही है। डर पर भी यही बात लागू होती है। प्रथम, तो भगवान के गुण और लीला ही ऐसी है कि अनायास मन उनकी ओर आकर्षित होता है, प्रेम से श्रद्धा से। भगवान से बैर क्यों करें, डरे क्यों? हम सब उन्हीं के अंश तो हैं। शेष बचे, प्रेम और कामना से भगवान में मन लगाना -यह सब के लिए संभव है। इसलिए आज यदि हम भक्ति करना चाहते हैं तो हमें भक्ति प्रेम से करनी होगी। भक्ति हेतु भाव कोई-सा भी रखा जा सकता है। महापुरुषों द्वारा शांत भाव, दास भाव, सख्य भाव, वात्सल्य भाव और माधुर्य भाव निश्चित किए गए हैं। पहला भाव प्रजा और राजा के बीच जैसा, दूसरा स्वामी-सेवक का भाव, तीसरा मित्रों का और सखाओं का भाव, चौथा माता-पिता का संतान के प्रति प्रेम,पाँचवाँ प्रेमी- प्रेमिका के बीच का भाव है । सभी भावों से भगवत प्राप्ति होती है। कुछ संतों का मानना है कि यह भाव उत्तरोतर बढ़ते जाते हैं, उत्कृष्टता में। अर्थात, दूसरा भाव पहले से श्रेष्ठ है, तीसरा दूसरे से, चौथा तीसरे से और पांचवा चौथे से। इस प्रकार माधुर्य रस श्रेष्ठत्तम भाव बताया गया है। अन्य भक्त मानते हैं कि सभी भाव बराबर हैं।

भक्ति मन से हो भाव से हो, परंतु किसकी की जाए? भक्ति सर्वशक्तिमान की ही करना उचित है। सर्वशक्तिमान की भक्ति से ही आवागमन से छुटकारा मिल सकता है। इसी से दुख निवृत्ति और सुख प्राप्ति हो सकती है। अन्य, देवताओं, पितरों, यक्षों, भूत, प्रेतों आदि की सेवा करने से फल अनित्य मिलता है। देवता ज्यादा से ज्यादा अपना लोक दे सकते हैं, उससे ज्यादा कुछ नहीं। ब्रह्मा के लोक तक सारे अनित्य हैं; वहाँ जाकर दुबारा आवागमन के चक्कर में पड़ना पड़ता है। यह बात श्री कृष्ण ने गीता में स्पष्ट की है कि उनका भक्त उनको ही प्राप्त करता है। भक्ति निष्काम हो। अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष तक की कोई कामना न की जाए। नारदजी ने बताया है कि कामना से भी भगवान में मन लगाया जाए तो भगवान की ही प्राप्ति होती है। परंतु इस पर गहनता से विचार करना आवश्यक है। इस जन्म में हमें जो भी कुछ पदार्थ, व्यक्ति, परिस्थिति आदि मिले हैं वह सब प्रारब्ध के कारण हैं। भगवान से कुछ माँगा और हमें मिल गया तो वह प्रारब्ध की वजह से ही है। अगर नहीं मिला तो भी कारण हमारे ही पूर्व कर्म है। भगवान से माँगी गई वस्तु या परिस्थिति नहीं मिलने से भगवान में विश्वास कम होने का भय रहता है। दूसरे, कामनाएँ कभी पूरी ही नहीं हो सकती, एक कामना पूरी होती है तो दूसरी आकर के उसकी जगह ले लेती हैं। कामना पूर्ति से लोभ बढ़ता है, नई-नई कामनाएँ पैदा होती हैं। काम को श्रीकृष्ण ने गीता में बहुत खानेवाला महापापी और शत्रु बताया है और अर्जुन को आज्ञा दी है कि वह इस शत्रु को मार डालें। प्रहलादजी का कहना है कि कामना के आते ही धर्म, धैर्य, बुद्धि, लज्जा, श्री, तेज, स्मृति और सत्य -इन सब का नाश हो जाता है। जो मनुष्य कामनाओं को छोड़ देता है वह एक तरह से भगवान ही बन जाता है--। वैसे भी, भगवान ने कहा है कि मुझे यूं तो सारे ही भक्त प्रिय हैं। सभी को उन्होंने उदार बताया है। परंतु ज्ञानी को अपना स्वरूप ही कहा है-। भागवत में भी कामना रहित भक्ति को ही सर्वश्रेष्ठ धर्म बताया है-। प्रहलाद जी ने समझाया है कि भगवान केवल निष्काम प्रेम भक्ति से ही प्रसन्न होते हैं।

ऐसी भक्ति नित्य-निरंतर करनी चाहिए और साकार की भक्ति को अपने मत में श्रीकृष्ण ने श्रेष्ठ बताया है(गीता12।2) । भक्ति को कृष्ण ने कहा है कि समर्पण योग से, अभ्यास योग से, कृष्ण के लिए कर्म करके, कर्म द्वारा कृष्ण की पूजा करके और कर्मफल का त्याग करके करनी चाहिए । मन-बुद्धि को भगवान में रख कर कर्म करना( गीता8।7), कर्म भगवान को अर्पण करके करना), सब कर्मों द्वारा भगवान की पूजा करना।- इन सबसे मनुष्य कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाता है अर्थात आवागमन के चक्र से छूट जाता है और भगवान की प्राप्ति कर लेता है ।

सगुण साकार की भक्ति सरल बताई गई है। परन्तु इसमें एक प्रकार की कठिनाई है जो निर्गुण की भक्ति में नहीं। अवतार काल में भगवान साधारण मनुष्यों सी लीला करते हैं, जैसे कृष्ण का रण छोड़ के भागना, राम का सीता के वियोग में रोना। इससे उन्हें मनुष्य माननेवाले अपनी हानि कर लेते हैं क्योंकि ऐसों के समक्ष वे अपना असली रूप छिपा लेते हैं योगमाया का परदा डाल कर। अस्तु पूर्ण विश्वास हो तो ही सगुण की भक्ति करें। निर्गुण को मनुष्य मानने का भय नहीं रहता।

भक्ति में एक अन्य शर्त यह भी है कि अनन्यता हो। दूसरा और कोई नहीं हो। आश्रय केवल भक्ति का ही हो। ज्ञान और कर्म की सहायता भी नहीं ली जाए। यह दोनों अनुगत रह सकते हैं। भक्ति अव्यभिचारिणी हो। इष्ट केवल एक ही हो । प्रहलादजी ने मानव शरीर में जीव का सबसे बड़ा स्वार्थ भगवान की अनन्य भक्ति प्राप्त करने को बताया है-। भगवान कपिल ने अपनी माता देवहूति को भक्ति तत्व समझाते हुए कहा है कि भगवान के अलावा अन्य का आश्रय लेने से मृत्यु रूपी महाभय से छुटकारा नहीं हो सकता।जैसे भोजन करने से भूख की निवृत्ति, तुष्टि और पुष्टि मिलती है, इसी प्रकार भक्ति से भगवान के दर्शन भगवान के तत्व का ज्ञान और संसार से विरक्ति प्राप्त होती हैlभक्ति स्वर्गादि लोक , भगवान का धाम या जो कोई भी वस्तु चाहे वह दिला सकतीहै l

बहुत से आचार्यों का मत है कि भक्ति में गुरु की विशेष आवश्यकता नहीं है। श्री कृष्ण ने ज्ञान के लिए और प्राणायाम के लिए गीता और भागवत में गुरु की परम आवश्यकता बताई है। भक्ति के संदर्भ में ऐसा स्पष्ट नहीं कहा है;परंतु जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु जी महाराज का मत है कि गुरु की आवश्यकता है भक्ति में भी। उनका विचार है कि जैसे किसी भौतिक विद्या के लिए गुरु की आवश्यकता है ऐसे ही भक्ति में भी है। गुरु जिस कक्षा का होता है शिष्य भी वहाँ तक ही पहुँच सकता है। दास्य भाव का गुरू इसी भाव की शिक्षा दे सकता है। माधुर्य भाव का गुरु माधुर्य भाव की शिक्षा दे सकता है। भक्ति में गुरु मार्गदर्शक का काम करता है। वह इस पथ पर चला हुआ है तो हमें भी मार्गदर्शन दे सकता है, चलने में सुगमता रहती है। प्रगति तीव्र गति से होती है। गुरु अंतःकरण की सफाई करता है। इसलिए उसे भगवान से भी ज्यादा महत्वपूर्ण बताया गया है। भागवत में चौथे योगेश्वर प्रबुद्ध जी [भगवान ऋषभदेव के सौ पुत्रों में से नौ पुत्र योगेश्वर बने थे] राजा निमि को बताते हैं कि भक्ति के लिए गुरु की शरण आवश्यक है। गुरु ऐसा होना चाहिए जो वेदों का ज्ञान भी रखता है और जिसने भगवान का अनुभव भी किया हो अर्थात भगवान से जुड़ा हुआ हो और संसार के प्रपंचों से दूर हो, शांत हो। शिष्य गुरु को अपना इष्ट देव और आत्मा समझे यानी भगवान के बराबर गुरु को माने। यही बात बहुत से उपनिषदों में भी मिलती है, यथा श्वेताश्वतर उपनिषद(6.23)।नारद जी ने भी गुरु की आवश्यकता बताई है l उनके अनुसार गुरु साक्षात भगवान हैंl जो इन्हें साधारण मनुष्य समझता है उसका शास्त्र श्रवण हाथी-स्नान के समान है l भगवान ही गुरु के रुप में प्रकट होते हैं। अस्तु गुरु की आवश्यकता है, भक्ति में भी। यदि गुरु ना मिले तो क्या करें?ऐसे में साधक भगवान नाम का जप आरंभ कर दे l ऐसा करने से भगवान स्वयं ही गुरु रुपसे उपदेश देंगें और अपना दर्शन देंगे। संत तुकाराम जी कहते हैं, “मेरे भगवान विठोबा का कैसा प्रेमभाव है कि वे स्वयं ही गुरु बन कर आए हैं… ’’

भागवत में भक्ति को सुंदर नवयुवती बताया गया है, ज्ञान और वैराग्य इसके पुत्र हैं तथा मुक्ति दासी है। सत्य, त्रेता और द्वापर युगों में ज्ञान और वैराग्य मुक्ति के साधन थे; कलियुग में केवल भक्ति ही है। प्रभु प्राप्ति के लिए एक मात्र साधन भक्ति में अनुराग हजारों जन्मों के पुण्य से होता है और भगवान भक्ति से ही वश में होते हैं। सनकादिक कुमारो ने भक्ति को, उसके [भक्ति] द्वारा पूछने पर, विष्णु भक्तों के हृदय में रहने के आदेश दिए। जहाँ भक्ति रहती है भगवान भी रहते हैं क्योंकि भगवान भक्ति की डोरी से बँधे हुए हैं। कपिल भगवान ने अपनी माँ देवहूती को भक्ति के बारे में बताया कि यह हरि प्राप्ति का मंगलमय मार्ग है। संसार की आसक्ति से बंधन, संतो के प्रति आसक्ति मोक्ष का खुला द्वार है। भक्ति से, जिसमें संसार के प्रति वैराग्य हो, मनुष्य अंतर्यामी भगवान को इस जन्म में ही प्राप्त कर लेता है। भक्त सत्य आदि लोकों के भोग, अणिमा आदि सिद्धियां, मोक्ष और वैकुंठ का ऐश्वर्य भी नहीं चाहता। भक्ति, कपिल भगवान अपनी माता को बतलाते हैं, कर्म -संस्कारों को ऐसे भस्म कर देती है जैसे जठराग्नि भोजन को पचाती है। भक्त मोक्ष तक को ठुकरा देता है। कल्याण प्राप्ति इसमें है कि मनुष्य भक्तियोग के द्वारा भगवान में चित्त लगाकर भगवान में स्थिर हो जाए। स्वभाव और गुणों के भेद के कारण भक्तों के भाव में भिन्नता होती है। हृदय में हिंसा और दम्भ रखने वाले भक्त, तामस भक्त हैं; विषय, यश और ऐश्वर्य की कामना रखने वाला राजस भक्त है; पूजा को अपना कर्त्तव्य समझनेवाला और परमात्मा को अर्पण करने के लिए पूजा करने वाला सात्विक भक्त है; निष्काम और अनन्य भाव से भक्ति करने वाला भगवान कपिल की दृष्टि में निर्गुण भक्त है। निर्गुण भक्त पाँचों प्रकार की मुक्तियों को भक्ति के आगे कुछ नहीं समझता। भक्त भक्तियोग से तीनों गुणों को लाँघकर भगवान के भाव को प्राप्त हो जाता है (3.29.7-14)। कपिल भगवान ने केवल प्रतिमा में ही भगवान की पूजा करने वाले के पूजन को स्वांग मात्र बताया है। भगवान सब प्राणियों में है इसलिए जो सब भूत स्थित परमात्मा का अनादर करते हैं केवल मूर्ति में भगवान को मानकर और पूजा करके, वह केवल स्वाँग रचते हैं। दूसरे जीवों का निरादर करने वाले से भी भगवान खुश नहीं होते। भगवान कपिल का कहना है कि जो लोग अपने संपूर्ण कर्म उनके फल तथा अपने शरीर को भी भगवान को अर्पण करके भेदभाव रहित होकर भगवान की उपासना करते हैं वे श्रेष्ठ हैं। अकर्ता और समदर्शी से बढ़कर भगवान कपिल अन्य किसी को नहीं मानते। कपिल भगवान और कृष्ण भगवान दोनों ही ने समता का बड़ा महत्व बताया है। कपिल भगवान सभी जीवों से प्रेम का पाठ अपनी माता को पढ़ाते हैं। अन्य जीवों से बैर रखने वाला वास्तव में उनके शरीर में रहने वाले भगवान से ही बैर रखता है। आत्मा और परमात्मा में भेद रखने वाला आवागमन से नहीं छूटता। हर प्राणी में भगवान को मानकर पूजन करना चाहिए l जब तक हर प्राणी में परमात्मा का भाव नहीं आ जाए तब तक मूर्ति पूजन किया जा सकता है। अंत में भगवान ने अपनी माँ को स्पष्ट बताया कि निर्गुण ब्रह्म विषयक ज्ञानयोग और स्वयं उनके [कपिल भगवान] प्रति किया हुआ भक्तियोग का फल एक ही होता है और शास्त्र के विभिन्न मार्गों द्वारा एक ही परमात्मा की अलग-अलग तरह से अनुभूति होती है। इस प्रकार भक्ति निराकार निर्गुण ब्रह्म की व सगुण साकार ब्रह्म की, दोनों की होती है। पहले बताया जा चुका है कि श्री कृष्ण के अनुसार शरीरधारियों के लिए सगुण ब्रह्म की भक्ति करना सरल है।

राजा पृथु को सनंत कुमारजी ने भक्ति के संबंध में कहा कि भक्ति से संसार से वैराग्य हो जाता है और आत्म-स्वरूप निर्गुण परब्रह्म से मनुष्य की प्रीति हो जाती है फिर वह गुरु की शरण लेकर गुरु द्वारा बताए गए मार्ग से साधना करता है और लिंग शरीर को इस तरह जला देता है जैसे कि आग लकड़ी को; इस प्रकार मनुष्य सब गुणों से मुक्त हो जाता है। यह सनकादिक कुमारगण राजा पृथु को भगवान वासुदेव की भक्ति का उपदेश देते हैं और भगवान के चरणों को नौका बनाकर भवसागर पार करने की सलाह देते है।

बालक ध्रुव को नारद जी ने मानस पूजा की शिक्षा दी “ध्यान प्रभु का किया जाए। ऐसी भावना की जाए कि वह अनुराग भरी दृष्टि से मुझे निहार रहे हैं और मंद मंद मुस्कुरा रहे हैं।’’ शिलादि मूर्ति में, पृथ्वी में, जलादि में भी भगवान की पूजा का रहस्य नारदजी द्वारा बताया गया। जब अपने हृदय में रहने वाले भगवान का मन वाणी और शरीर से भक्ति पूर्वक भक्त द्वारा पूजन किया जाता है तब भगवान अपने भक्तों के भाव को बढ़ा देते हैं और भक्त की इच्छा के अनुसार धर्म, अर्थ, काम अथवा मोक्ष रूप कल्याण देते हैं। मानस पूजा करने वालों के अंतःकरण में भगवान विराजते हैं। क्रिया योग पर चर्चा करते समय श्रीकृष्ण ने उद्धवजी को बताया कि अपनी भावना से भगवान की पूजा करनी चाहिए अपने हृदय में.(.11.27.15)। और नारद जी ने द्वादश अक्षर मंत्र से भी भगवान की पूजा समझाई। नारद जी ने अधिक महत्त्व भगवान के ध्यान को दिया। साकार के ध्यान में मन डूब कर तल्लीन हो जाता है। इससे भगवत- प्राप्ति शीघ्र होती है। नारद जी के निर्देशानुसार ध्रुव ने साधना की। ध्रुव ने अनन्य बुद्धि से हरि का ध्यान किया जिससे ध्रुव की समष्टि प्राण से अभिन्नता हो गई। ध्रुव के प्राण रोकने के कारण सभी जीवो का साँस का आना-जाना भी रुक गया। घबराकर देवता श्री भगवान के पास गए। उन्होंने समझाया कि ध्रुव ने अपने चित्त को मुझ में, जो कि विश्व की आत्मा है, में लीन कर दिया है, उसमें और मेरे में अभिन्नता हो गई है जिससे तुम सब का प्राण भी रुक गया है। इस प्रकार भक्ति से अभिन्नता आती है, भक्त और भगवान एक हो जाते हैं।

भगवान ऋषभदेव का उपदेश: “मेरे प्रति भक्ति भाव से, मेरे परायण होने से, मेरे लिए कर्म करने से, मेरी कथाओं का नित्य-प्रति श्रवण करने से मेरे भक्तों के संग करने से, मेरे गुणों का कीर्तन करने से----- अहंकार रूप लिंग शरीर को लीन कर दो।"। उन्होंने यह भी बताया है कि सब में भगवान समझ कर सब की सेवा करें, वही भगवान की पूजा [भक्ति] है। भगवतप्राप्ति के संबंध में जड़ भरत जी ने राजा रहूगण को जतलाया: “पूर्व जन्म में मैं भरत नाम का राजा था….. मृग में आसक्ति हो जाने के कारण अगले जन्म में मृग बनना पड़ा…’’ उन्होंने बताया है कि आसक्ति को छोड़ा जाए और मोह के बंधनों को काट दिया जाए फिर श्री हरि की लीलाओं के कथन और श्रवण से भगवत स्मृति बनी रहने के कारण जीव आसानी से भवसागर को पार करके भगवान को प्राप्त कर सकता है।

भक्तिसंबंधी भक्त प्रहलाद के उद्गार हैं कि मनुष्य शरीर में भगवत-प्राप्ति संभव है।भगवान को प्रसन्न करने में अधिक श्रम नहीं लगता। मोक्ष को भगवान नाम कीर्तन से भक्तों ने तुच्छ माना है। कर्म कांड, तर्क शास्त्र, दंड नीति आदि सभी कोई अर्थ नहीं रखते यदि भगवान की ओर नहीं ले जा सकते। जिस उपाय से भगवान में स्वभाविक निष्काम प्रेम हो जाए वहीं साधन सर्वश्रेष्ठ है। भगवान की भावना करने से भक्त भी भगवानमय हो जाता है। भगवान निष्काम प्रेमाभक्ति से ही खुश होते हैं। भगवान की अनन्य भक्ति प्राप्त करना ही मनुष्य जीवन का एक मात्र परमार्थ है। यदि कोई ब्राह्मण बारह गुणों से संपन्न है; परंतु भक्तिविहीन है तो उससे वह चाण्डाल उत्तम है जो मन, कर्म, वचन, धन और प्राण से भगवान के चरणों की भक्ति करता है। भक्त जो जो सम्मान भगवान को देता है वह उसे स्वयं को ही प्राप्त होता है, जैसे सुंदर मुख शीशे में दिखने वाले प्रतिबिम्ब को भी सुंदर बना देता है(. 7.9.11)।वरदान माँगना प्रेमभक्ति का अपमान है, विघ्न है। प्रह्लाद जी ने भक्ति के सात अंग बताए हैं--- नमस्कार, स्तुति, समस्त कर्मों का भगवान को समर्पण, सेवा पूजा, चरण कमलों का चिंतन और लीला का श्रवण।

भागवत में भगवान के कीर्तन की महिमा जगह-जगह गाई गई है, जिसका उल्लेख हमने यथास्थान किया हैl जगत गुरुत्तम श्री कृपालु जी महाराज भगवत- प्राप्ति का सबसे आसान साधन नाम-जप बताते हैंl उनके अनुसार रूप ध्यान सहित भगवान के नाम का जप किया जाए l तुकाराम जी भी कहते हैं, ‘ नाम उच्चारण करते समय यही भावना और अनुभव भी रहना चाहिए कि भगवान मेरे सामने खड़े हैं, इसी प्रकार ध्यान करना चाहिए और मन ही मन चिंतन करना चाहिए।’’ और ज्ञानेश्वर जी समझाते हैं कि विट्ठल को स्मरण करते समय नाम के साथ रूप का भी चिंतन करो l भक्ति के प्राचीन संत जैसे परमहंस शुकदेव, नारदजी आदि और अर्वाचीन संत जैसे रामकृष्ण परमहंस, नामदेव आदि के अनुसार नाम जप भगवान की प्राप्ति का सबसे आसान तरीका हैl जैसे सूर्य को अंध्कार नष्ट करने के लिए किसी और की आवश्यकता नहीं होती, इसी प्रकार भगवान के नाम को भगवान की प्राप्ति कराने में किसी अन्य की आवश्यकता नहीं होती। इस साधन में देश और काल की कोई अड़चन नहीं। हर स्थान और समय पर भगवान का नाम लिया जा सकता है, कोई दोष नहीं।कृपालु जी कहते हैं कि अच्छी से अच्छी और गंदी से गंदी जगह भगवान का नाम लिया जा सकता है l गंदी जगह में भगवान गंदे नहीं हो सकते। भगवान तो खुद ही पतित को पावन करने वाले हैं l उनके नाम से ही अशुद्ध शुद्ध हो जाता है l भगवान के नाम का जप करने से अंतःकरण की शुद्धि कैसे होती है,यह बहुत ही सुंदर ढंग से प्रोफेसर श्री शंकरराव वी दांडेकर ने अपने लेख नाम महिमा,(कल्याण के ईश्वर अंक) में समझाया है l सूने मकान में जिस प्रकार कीड़े ,मकोड़े ,मकड़ी ,बिल्ली आदि घुस जाते हैं और मालिक के आने पर भाग जाते हैं,ठीक उसी प्रकार जब नाम-जप से भगवान अंतरण में आना शुरु हो जाते हैं तब उनके प्रभाव से काम क्रोध लोभ आदि विकार भाग जाते हैं l और फल स्वरुप अंतःकरण शुद्ध हो जाता है l ऊपर हमने भृंगी कीड़े का दृष्टांत देकर बताया है कि जिस के संबंध में सोचा जाता है सोचने वाला उस जैसा ही हो जाता हैl यही बात भगवान नाम के जप पर लागू होती हैl भगवान के नाम का जप करते करते भक्त अपने भगवान जैसा ही हो जाता हैlएकनाथ जी का कहना है, “जिसे परमार्थ की अभिलाषा हो, वह सब झमेलों को छोड़कर नित्य नियम से आदरपूर्वक भगवान का भजन आरंभ कर दे. आदर पूर्वक नाम स्मरण करने से अनायास ही मुक्ति की प्राप्ति होती है.’’

गजेंद्र ने भगवान की शरणागति के संबंध में कहा है: “जो भयभीत होकर भगवान की शरण में जाते हैं उसे भगवान अवश्य बचाते हैं, अर्थात भक्त की पुकार सुनते हैं” [गजेंद्र में निर्विशेष रूप से भगवान की स्तुति की थी, मगर द्वारा पकडे जाने पर। इसलिए, भिन्न-भिन्न नाम और रूप को अपना स्वरूप मानने वाले ब्रह्मादि देवता उसकी रक्षा के लिए नहीं आए। स्वयं भगवान को सर्वात्मा होने के कारण आना पड़ा, प्रकट होना पड़ा]।

भक्तों की रक्षा भगवान करते हैं यह अमरीश चरित्र से प्रकट होता है । राजा अमरीश ने एक बार द्वादशी प्रधान एकादशी व्रत किया। घड़ी समाप्त हो रही थी परायण की, इसलिए दुर्वासा ऋषि, जो अभी तक लौट कर नहीं आए थे और जिन्हें पहले भोजन कराने का राजा का संकल्प था, के आए बिना आचार्यों की राय पर राजा ने पानी ग्रहण कर लिया जिससे व्रत की मर्यादा भी रह जाए और ऋषि दुर्वासा को खिलाए बिना भोजन ना करने की प्रतिज्ञा भी बनी रहे। जब दुर्वासा आए और उन्हें इस बात का पता चला तो वह क्रोधित हो गए और राजा अमरीश को समाप्त करने के लिए कृतिका का आह्वान किया। सुदर्शन चक्र ने, जो हरि के आदेश से राजा की रक्षा के लिए नियुक्त था, कृतिका को मार डाला और दुर्वासा के पीछे पड़ गया। दुर्वासा जान बचाकर त्रिलोकी में भागते फिरे, परंतु रक्षा देने के लिए कोई भी तैयार नहीं हुआ। अंत में भगवान द्वारा कहने पर दुर्वासा भक्त अमरीश की शरण में जाना पड़ा तब वह बच पाए। इस प्रसंग से पता चलता है कि जो भक्त भगवान की शरण में होते हैं उनका ब्रह्मशाप तक कुछ नहीं बिगाड़ सकता। अपने भक्त की भगवान हमेशा रक्षा करते हैं। भगवान ने कहा है कि वह भक्त के अधीन है बिल्कुल भी स्वतंत्र नहीं है। जो भक्त संसार और संसार के सारे नातों को छोड़कर अनन्य रूप से उन की शरण में आते है उन्हें भगवान त्याग नहीं सकते और भगवान भक्त के प्रति किया गया अपराध क्षमा भी नहीं कर सकते।भक्त से ही क्षमा माँगनी पड़ती है। यह है भक्ति का महत्व! कलि युग में जो जीव भक्ति से युक्त होते हैं वह पापी होने पर भी भगवान के धाम को प्राप्त कर लेते हैं, भगवान भक्ति के ही वशीभूत होते हैं (माहात्म्य 2 /15 ,18) l

ऊपर हम देख चुके हैं कि भक्ति में अनन्यता, निष्कामता ,शरणागति और निरन्तरता परम आवश्यक है।मन और बुद्धि यहाँ तक कि अपने सर्वस्व को भगवान में लगाना है। इसके लिए संसार से विरक्ति और भगवान में आसक्ति होना पहली शर्त है। इस हेतु भगवान ने सत्संग और भगवान के नाम के कीर्तन को महत्व दिया है। भगवान ने कहा है कि संत पुरुष भगवान को अपना आश्रय मानते हैं और भगवान सदा संत पुरुषों के पास रहते हैं। प्रभु का कहना है कि वे सत्संग से भक्त के वश में हो जाते हैं। सत्संग के प्रभाव से दैत्य, राक्षस, पशु-पक्षी, गंधर्व-अप्सरा, नाग-सिद्ध, विद्याधर, स्त्री, शूद्र आदि सबने ही भगवान को प्राप्त किया है। प्रेमपूर्ण भाव से भगवान की प्राप्ति आसानी से हो जाती है। इन सब से भी ऊपर भगवान ने शरणागति को बताया है। शरणागति के संबंध में प्रभु बताते हैं, उधव को कि सब कुछ-- श्रुति स्मृति, विधि-निषेध, प्रकृति प्रकृति---छोड़कर केवल उनकी भावना समस्त प्राणियों में करके उनकी ही शरण समस्त रूप से ग्रहण करें, ऐसा करने से, भगवान उद्धवजी को समझाते हैं कि, वह सर्वत्र निर्भय हो जाएँगे। शरणागति के संबंध में ऐसी ही बात अर्जुन को श्री कृष्ण ने गीता में समझाई है। शरणागति में भगवान हर हाल में मेरी रक्षा करेंगे, ऐसा विश्वास होता है; भगवान भक्त के एक मात्र आश्रय हैं, ऐसा भक्तों को मन से स्वीकार करना होता है; भगवत प्राप्ति के लिए केवल भगवत कृपा ही एकमात्र साधन है ऐसा भाव भक्त में होना आवश्यक है; अपनी रक्षा का भार भक्त भगवान के चरणों में समर्पित कर देता है; भक्त संकल्प लेता है कि वह किसी भी प्राणी के प्रतिकूल नहीं चलेगा, वह समस्त प्राणियों के अनुकूल चलने का भी संकल्प लेता है। शरणागति के उपरोक्त छह अंग स्वामी अनिरुद्ध आचार्य वेंकटाचार्य ने माने हैं जो कि ख्याति-प्राप्त तत्वचिंतक हुए हैं। उद्धव का संदेह दूर करते हुए शरणागति के संबंध में आगे भगवान बताते हैं कि जगत में जो भिन्नता दिख रही है वह माया के कारण है, वास्तव में केवल भगवान ही है। उनके सिवाय कुछ नहीं है। वे उद्धव से कहते हैं कि ऊद्धव अपना जीव-भाव काट दें और अपने स्वरुप में स्थित हो जाएँ । फिर आगे भगवान समझाते हैं कि उन्हें प्राप्त करने का सर्वोत्तम साधन उनसे प्रेम करना और उनकी भक्ति है। योग-साधन, ज्ञान-विज्ञान, धर्म-अनुष्ठान, जप-पाठ और तप-त्याग से वह इतनी आसानी से प्राप्त नहीं होते जितने की भक्ति से। जो भगवान का स्मरण करता है भगवान उसके दिल में बैठ जाते हैं और उसका चित्त भगवान में तल्लीन हो जाता है। सारांश है कि वर्णाश्रम धर्म, ध्यान योग, यज्ञ आदि भी भगवान को प्राप्त करने के साधन है क्योंकि भगवान द्वारा ही बताए गए हैं, परंतु भगवान की शरणागति के आगे यह सब नगण्य है। वास्तव में तो यह सब भगवत्प्राप्ति के लिए ही विभिन्न मार्ग है। जब खुद भगवान की शरण में जीव हो जाए तब इन सब साधनों की आवश्यकता नहीं। ना हीं जीव को डरने की आवश्यकता है। भगवान स्वयं उसके लिए धर्म-कर्म सब कुछ बन जाते हैं अर्थात भगवान ही उसे बताते हैं कि उसे क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए। हम देख चुके हैं कि अर्जुन को उन्होंने करण को ऐसे समय मारने की सलाह दी जबकि वह अपने रथ से नीचे उतरा हुआ था और निहत्था था। इसे साधारणतः धर्म अनुकूल नहीं कहा जा सकता। परंतु आततायी को मारने में कोई अधर्म नहीं होता। यह देखते हुए अर्जुन का निहत्थे करण को कृष्ण की राय अनुसार मारना धर्म अनुकूल था। यदि अर्जुन धर्म की शरण में रहता तो ऐसा नहीं कर सकता था। निष्कर्ष निकलता है कि कृष्ण की शरण में रहना अधिक उचित है अधिक धर्म संगत है, केवल धर्ममार्ग पर ही चलने की अपेक्षा।भगवान को प्राप्त कराने में योग यज्ञ आदि साधन उतने समर्थ नहीं जितनी भगवान की भक्ति; भक्ति भक्त के चित् को सुगमता से पवित्र कर देती और पाप को जलाकर राख कर देती है । भक्ति से संसार की आसक्ति छूटती है l आसक्ति छूटने से भगवान का अनुभव होता है, जिससे हृदय की ग्रंथि टूट जाती है कर्मबन्धन क्षीण होता है और आत्मप्रसाद प्राप्त होता हैं। ज्ञानी भी भक्ति कर सकते हैं।(1/7/10) l भक्त का कभी पतन नहीं होता। भगवत्प्राप्ति का इससे सुगम उपाय नहीं l

क्या देवताओं की भक्ति से भगवान मिलते हैं? गीता में कृष्ण के अनुसार देवों की भक्ति हद से ज़्यादा देवता और उनके लोक की प्राप्ति करा सकती है। परन्तु ब्रहमवैवर्त पुराण देवाराधना से अंत में भगवान को प्राप्त होना कहता है(ब्रह्म खंड)। भक्त पहले देवता को प्राप्त होता है और फिर समयानुसार देवता के साथ भगवान को। यहाँ देवता का अर्थ वे जीव नहीं जो पुण्य के बल पर थोड़े समय स्वर्ग में रहते हैं और पुण्य क्षीण होने पर नीचे गिराए जाते हैं, वे इन्द्रादि भी नहीं जो एक मन्वन्तर तक रहते हैं और वे भी नहीं जो पूरे कल्प तक रहते हैं ; परन्तु ब्रह्मा ,शिव जैसे अधिकारीगण हैं। प्रचेताओं को शिवजी ने यह आध्यात्मिक सिद्धांत भागवत में स्पष्ट किया है। अस्तु देवभक्ति सोच समझ कर ही करें।

नारदजी ने भक्ति को योगादि साधनों से श्रेष्ट बताया है ,ज़्यादा शांति देने वाला l भक्ति से तमो-रजो गुणों का नाश होता है l भगवान की प्रसन्नता के लिये कर्म करने से पराभक्ति युक्त ज्ञान प्राप्त होता है lऔर भक्त का पतन नहीं होता,अन्य साधन करने वालों की तरह ।

आध्यात्मिक सिद्धांत:-

गीता 7/17, 12/2, 9/25, 7/23,

भागवत 11/19/5, 11/20/9, 1/2/7,4/29/36-37, 7/1 समस्त अध्याय, 7/7/52, 7/10/80, 7/7/55, 3/25/44, 11/12/48, 1/2/20, 1/7/10, 1/5/17, 1/6/76, 5/510, 26, 4/42समस्त अध्याय, 4/24/29-31,

ब्रहमवैवर्त पुराण ब्रहमखंड अध्याय 14।

इतिश्री

https://www.skjbtkshetra.org/*भुवनो का ज्ञान क्या है?*        ॐ श्री सदगुरुदेव भगवान की जय।       ----------------------...
13/02/2024

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*भुवनो का ज्ञान क्या है?*

ॐ श्री सदगुरुदेव भगवान की जय।
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महर्षि पतंजली पिछले प्रश्न मे कहते है कि कर्म दो प्रकार के है- *'सोपक्रमम्' उपक्रम सहित और 'निरुपक्रमम्' उपक्रम रहित। गीता मे इन्ही को पुण्य कर्म और पाप कर्म कहा गया है। उपक्रम सहित अर्थात उपाय से होने वाले, पुण्य कर्म जो पूर्णता प्रदान करते है, उपाय जन्य है। उपक्रम रहित अर्थात बिना उपाय के होने वाले पाप कर्म, अधोगति की ओर ले जाते है। इन दोनो की स्थिति मे संयम की पहुच हो जाने पर, दोनो संस्कारो की स्थिति समझ लेने पर योगी को मृत्यु का ज्ञान हो जाता है। ये संस्कार कब तक चलेगे, कब ये शान्त होगे?- इसका ज्ञान हो जाता है और अरिष्टो से भी साधक को ज्ञात हो जाता है कि विपदाओ का प्रवाह कैसा है? कितना है? उनके उतार- चढाव और उनकी गति से भी ज्ञात हो जाता है कि अंतिम संस्कार के विलय मे अभी कितना शेष है? शरीर का निधन तो वस्त्र- परिवर्तन मात्र है, यह मृत्यु नही है। मृत्यु वही सराहनीय है जिसके पिछे जन्म न हो। संसार मे शत्रु कौन है? अपनी इन्द्रिया! यही इन्द्रिया यदि जीत ली जाती है तो वही मित्र बन कर मित्रता मे बरतती है, परम कल्याण करने वाली हो जाती है। अतः मैत्री इन्द्रिय संयम की है। इन्द्रिय- संयम सध जाने पर सर्वोपरि बल आत्म कल्याण वाला बल मिल जाता है। विविध बलो मे संयम जैसे- जैसे उत्तरोत्तर सधता जाता है, हर प्रकार के सामर्थ्य का बल मिल जाता है। ज्यो- ज्यो संयम सधता जाता है, त्यो- त्यो हर प्रकार के क्रमोन्नत सामर्थ्य का बोध होता जाता है। उसे हरि- कृपा का बल प्राप्त हो जाता है। संयम सध जोने से बुद्धि अलौकिक प्रकाश धारण करने वाली हो जाती है। प्रवृत्ति भी अलौकिक ज्योति से संयुक्त हो जाती है। इस आलोक का न्यास करने से सूक्ष्म, व्यवधान युक्त और दूर देश मे कही भी स्थित वस्तु का ज्ञान हो जाता है। वह योगी एकान्त शान्त स्थल मे रहते हुए भी कही का भी कोई कृत देख लेता है।

*अब प्रश्न है कि- भुवनो का ज्ञान क्या है?*

उत्तर= स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर यह भी तीन भुवन है इनमे भी भगवान का निवास है। चतुष्टय अन्तः करण (मन, बुद्धि, चित्त, और अहंकार), पाँच ज्ञानेन्द्रिय (कान, आँख, नाक, जिह्वा और त्वचा), पाँच कर्मेन्द्रिय (मुख, हाथ, पैर, गुदा और उपस्थ) यह चौदह भुवन है। इनमे भी भगवान का निवास है। इनकी अनन्त प्रवृत्तियाँ ही अनन्त भुवन है। इनमे भी भगवान का निवास है। अब भुवनो पर महर्षि विभूतिपाद के सूत्र 26 मे कहते है-

*भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात्।*
(योगदर्शन, 3/26)

सूर्य मे संयम करने से समस्त लोको का ज्ञान हो जाता है।

'भुवन' यौगिक शब्द है। श्रीरामचरित- मानस मे तीन भुवन (त्रिभुवन), चौदह भुवन और अगणित भुवनो का उल्लेख है। वस्तुतः दस इन्द्रिया और अन्तः करण चतुष्टय (मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार) जीव की वृत्तियो के टिकने के ये चौदह स्थल ही चौदह भुवन है। इनकी अगणित प्रवृत्तिया ही अगणित भुवन है। इन चतुर्दश स्थलियो मे भूत- प्राणियो की जब शरण स्थलि रहती है तो यही चौदह अधिभूत है, भूतो के जन्म- मृत्यु के कारण है। साधना के फल स्वरूप इन चौदहो मे दैवी सम्पद प्रवाहित हो जाती है तो यही चौदह अधिदैव अर्थात् दैव का अधिष्ठान बन जाते है। स्तर उन्नत होने पर यही अध्यात्म, आत्मा का प्रसारण केन्द्र बन जाते है। दर्शन, स्पर्श और स्थिति मिलने के पश्चात भुवन समाप्त हो जाते है, प्रकृति पुरुषत्व मे विलिन हो जाती है।

सूर्य मे संयम करने से समस्त भुवनो का ज्ञान हो जाता है। सूर्य ज्योतिर्मय परमात्मा का प्रतीक है। भगवान श्रीकृृष्ण गीता मे कहते है कि सूर्य के मार्ग से गये हुए लोग पुनरावर्तन को नही प्राप्त होते। यही महर्षि पतंजलि भी कहना चाहते है कि, चिन्तन जब परमात्मोन्मुखी हो जाता है तो 'भुवनज्ञानम्'- भुवनो का ज्ञान हो जाता है। किस भुवन मे हमारा कहा लगाव है? भूत कितना, दैव कितना, आत्मा का आधिपत्य कितना है? इन सबका ज्ञान हो जाता है। और कदाचित् वह सूर्य स्तर का संयम नही है तब?

इस पर महर्षि विभूतिपाद के सूत्र 27 मे कहते है-

*चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानम्।*
(योगदर्शन, 3/27)

चन्द्रमा मे संयम करने से तारो की संरचना का ज्ञान हो जाता है।

यह जगत् ही एक रात्रि है।

*'या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।'*
(गीता, 2/69)

जगत रूपी रात्रि मे सब सोये है। इसमे संयमी पुरुष जाग जाता है। इस जगत् रूपी रात्रि मे जब उन्हे परमात्मा का क्षीण प्रकाश मिलने लगता है तो 'ताराव्यूहज्ञानम्'- तारो की स्थिति का ज्ञान हो जाता है कि चित्त वृत्ति के तार, सूत्र, इनकी गति कहा- कहा है? ग्रन्थि कहा- कहा पडी हुई है? इसके व्यूह का ज्ञान हो जाता है।
अब विभूतिपाद के सूत्र 28 मे देखे साधना मे स्थिर ठहरने का परिणाम-

*ध्रुवे तद्गतिज्ञानम्।*
(योगदर्शन, 3/28)

ध्रुवतारे मे संयम स्थिर करने से तारो की गति ज्ञान हो जाता है।
स्तम्भ वृत्ति की परिपक्व अवस्था मे जब सुरत अचल स्थिर ठहर गयी 'तद्गति ज्ञानम्'- उन तारो की गति का ज्ञान हो जाता है कि चित्त वृत्ति का वेग कैसा है। कभी चित्त अचल ठहरने लगता है, कभी उद्वेग आता है। कब कैसा चिन्तन उभरने वाला है, उभरने से पूर्व ही उसका ज्ञान हो जाता है इसलिए उद्वेग आने से पूर्व ही शान्त हो जाता है। यह सब चिदाकाश मे ही होता है। महर्षि आगे विभूतिपाद के सूत्र 29 मे कहते है-

*नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम्।*
(योगदर्शन, 3/29)

संयम से नाभिचक्र की पकड़ आ जाती है तो 'कायव्यूहज्ञानम्'- शरीर की स्थिति का पूरा- पूरा ज्ञान हो जाता है।

नाभि केन्द्र का प्रतीक है। वृत्ति सिमट कर जब अपने उद्गम मे स्थित हो जाती है तो 'कायव्यूहज्ञानम्'- पुनः- पुनः काया- निर्माण के क्या कारण है, कितने शरीर और पाने है?- इसका ज्ञान हो जाता है। बुद्ध को पिछले कई सौ जन्मो का ज्ञान हो गया था। गुरु महाराज को दिखायी पड़ा कि वे गत सात जन्मो से साधु थे। जड़भरत को मृग- योनि मे भी ज्ञान था। काकभुशुण्डि को हजारो जन्मो का ज्ञान था। संयम इस स्तर पर पहुचते ही ज्ञान हो जाता है कि शरीरो का क्रम (तारतम्य) कहा तक है, कैसा है? महर्षि विभूतिपाद के सूत्र 30 मे कहते है-

*कण्ठकूपे क्षुत्पिपासानिवृत्तिः।*
(योगदर्शन, 3/30)

कंठकूप मे संयम करने से भूख और प्यास की निवृत्ति हो जाती है।
जब कण्ठ पर केवल परमात्मा का ही नाम रह जाता है, परमात्मा की स्मृति सदैव कण्ठ पर रहती है तो समस्त आशा, तृष्णा और वासनाओ की भूख- प्यास तिरोहित हो जाती है। श्रीराम चरित मानस में प्रकरण आता है कि भगवान राम विश्वामित्र आश्रम पहुचे तो महर्षि ने उन्हें अधिकारी के रूप में पहचाना और उन्हें विद्या प्रदान की। *'जाते लाग न छुधा पिपासा। अतुलित बल तनु तेज प्रकासा।।'* (1/208/8)- मंत्र तो इतना प्रभावशाली जानते थें किन्तु इसी मंत्र- ग्रहण के अनन्तर जब वे जनकपुर पहुँचे, वहाँ राम जी तो मुख्य अतिथि ही ठहरे, वहाँ तो छप्पनो प्रकार के व्यंजन चल रहे थें। रहें गुरुदेव विश्वामित्र जी! वह भी
*करिभोजनु मुनिबर बिज्ञानी।*
*लगे कहन कछु कथा पुरानी।।'* (1/236/5)-

पहले विधिवत भोजन किया तत्पश्चात पुरातन कथा कहने लगें। मन्त्र का प्रभाव दिखायी नहीं देता, जहाँ भूख- प्यास न लगें।
वस्तुतः यह है रामचरितमानस। राम के वे चरित्र, जो मन में प्रवाहित हैं। इसमें है विज्ञान रूपी राम और विश्वास रूपी विश्वामित्र। विज्ञान, बिना तार का ज्ञान अर्थात अनुभव। विश्वास जब अनुभव से संयुक्त हो जाता है तो विद्या ब्रह्मतत्व को विदित कराने वाली हो जाता है। अतुलनीय शक्ति है परमात्मा, साधक उससे संयुक्त हो जाता है फिर उसे किसी प्रकार की आकांक्षा- पिपासा नहीं रहती, वह सदा- सदा के लिए तृप्त हो जाता है।
परमात्मा मे सुरत लगते ही भूख- प्यास का भान समाप्त हो जाता है। यही कारण था कि महाराज जी के साधन काल मे दो- तीन दिनो का उपवास एक सामान्य घटना थी। सात उपवास, चौदह उपवास करने पर भी महाराज जी के चेहरे पर थकान के लक्षण नही होते थे। चौदह उपवास के पश्चात शरीर में गर्मी की अधिकता से लघुशंका के साथ रक्त- जैसा कुछ देख कर पूज्यश्री ने भगवान को भी कुछ खरी- खोटी सुना दिया कि इष्टदेव बने बैठे हो! घोर जंगल में लाकर बिठा दिया, जहाँ न कुछ खाने को है न पीने को! अभी तो रक्त ही निकल रहा है, दो- चार दिन में शरीर भी छूट जायेगा। जब शरीर ही नहीं रहेगा तो भजन कौन करेगा! उस दिन भगवान ने कहा, "ठीक है, खाना ही चाहते हो तो कल से खाओ।" दूसरे दिन से भोजन की अयाचित व्यवस्था चल निकली किन्तु महाराज जी विचार करने लगे कि भगवान ने रुखे शब्दों में ऐसा क्यों कहा कि खाना ही चाहते हो तो कल से खाओ। भगवान चाहते क्या थे? भगवान से उत्तर मिला, "यदि इक्कीस दिनों तक अन्न ग्रहण न करते तो जीवन पर्यन्त भोजन करने की आवश्यकता ही न रहती। इसी प्रकार बैठे रहते, चेहरे पर शिकन तक न आती।" तात्पर्य यह है कि जब संयम कण्ठकूप मे पहुच जाती है तब साधक मे भूख- प्यास सहन करने की क्षमता आ जाती है।

निष्कर्सः- पतंजली कहते है कि सूर्य मे संयम करने से समस्त भुवनो का ज्ञान हो जाता है। सूर्य ज्योतिर्मय परमात्मा का प्रतीक है। चिन्तन जब परमात्मोन्मुखी हो जाता है, तो भुवनो का ज्ञान हो जाता है। किस भुवन मे हमारा कहा लगाव है? भूत कितना, दैव कितना, आत्मा का आधिपत्य कितना है? इन सबका ज्ञान हो जाता है। चन्द्रमा मे संयम करने से तारो की संरचना का ज्ञान हो जाता है अर्थात परमात्मा का क्षीण प्रकाश मिलने लगता है, तो तारो की स्थिति का ज्ञान हो जाता है, कि चित्त वृत्ति के तार, सूत्र, इनकी गति कहा- कहा है? ग्रन्थि कहा- कहा पडी हुई है? इसके व्यूह का ज्ञान हो जाता है। ध्रुवतारे मे अर्थात स्तम्भ वृत्ति की परिपक्व अवस्था मे जब सुरत अचल स्थिर ठहर गयी, तो उन तारो की गति का ज्ञान हो जाता है, कि चित्त वृत्ति का वेग कैसा है। कभी चित्त अचल ठहरने लगता है, कभी उद्वेग आता है। कब कैसा चिन्तन उभरने वाला है, उभरने से पूर्व ही उसका ज्ञान हो जाता है। इसलिए उद्वेग आने से पूर्व ही शान्त हो जाता है, यह सब चिदाकाश मे ही होता है। संयम से वृत्ति सिमट कर जब नाभिचक्र (उद्गम) केंद्र मे स्थित हो जाती है, तो पुनः- पुनः काया- निर्माण के क्या कारण है, कितने शरीर और पाने है?- इसका ज्ञान हो जाता है। कंठकूप मे संयम करने से परमात्मा का ही नाम रह जाता है, परमात्मा की स्मृति सदैव कण्ठ पर रहती है तो समस्त आशा, तृष्णा और वासनाओ की भूख- प्यास तिरोहित हो जाती है। प्रश्न पूरा हुआ।
पूर्ण जानकारी के लिये पढ़ें परम् पूज्य, भक्ति वेदांत स्वामी श्री आदिदेव सरस्वती जी महाराज द्वारा महर्षि पतञ्जलिकृत योगदर्शन की प्रत्यक्षानुभूत व्याख्या।
ॐ श्री सदगुरुदेव भगवान की जय।

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