19/07/2025
अविदूरेनिदानकथा : बुद्धवंसपालि
बोधिसत्त्व के तुषित लोक में वास करते समय ही बुद्धकोलाहल (लोक में बुद्धोत्पाद की
जनश्रुति) उत्पन्न हुआ।
लोक में समय समय पर तीन कोलाहल उत्पन्न होते हैं; जैसे-
१. कल्पयकोलाहल,
२.बुद्धकोलाहल, एवं
३. चक्रवर्तिकोलाहल
वहाँ-
१."आज से एक लाख वर्ष व्यतीत होने पर कल्प -उत्थान (प्रलय) होगा -यह सोच कर कामधातु के लोकव्यूह नामक देवता खुले शिर, बिखरे बाल, रुदनमुख, आँखों से निकले औँसू
हाथों से पोंछते हुए, रक्त वर्त्र धारण कर, अतिशय कुरूप वेश में मनुष्यलोक में इधर उधर घूमते हुए
इस प्रकार चिल्लाते हैं"मित्रो! आज से एक लाख वर्ष बीतने पर कल्प-उत्थान होगा, उस समय वह सम्पूर्ण लोक विनष्ट हो जायगा। यह महासमुद्र सूख जायगा। यह महापृथ्वी तथा पर्वतराज सुमेरु नष्ट भ्रष्ट हो जायँगे। ब्रह्मलोक तक सभी प्राणियों का विनाश हो जायगा। अतः मित्रो! अभी से
मैत्रीभावना, करुणा, मुदिता एवं उपेक्षा भावना की साधना करो। माता पिता की सेवा करो। कृल में ज्येष्ठ पुरुषों की पूजा (सम्मान) करो!" इसे कहते हैं--कल्पकोलाहल (प्रलय होने की घोषणा)।
२."एक हजार वर्ष व्यतीत होने के बाद लोक में सर्वज्ञ बुद्ध का अवतार होगा'-यह सोचकर, लोकपालदेवता-"मित्रो! आज से एक हजार वर्ष के बाद लोक में बुद्ध का अवतरण
होगा'-ऐसी घोषणा करते हुए इधर उधर घूमते हैं। यह हुआ-बुद्धकोलाहल।
३. इसी प्रकार "'आज से सौ वर्ष बाद कोई चक्रवर्ती राजा होगा'-यह सोचकर, कृुछ देवता लोग (जनकल्याण हेतु)"आज से सौ वर्ष बाद कोई चक्रवती राजा होगा'-यह घोषणा
करते हुए इधर उधर घूमते हैं। यह हुआ- चक्रवर्तिकोलाहल।
इस प्रकार, ये तीन महान् कोलाहल समय समय पर इस लोक में होते रहते हैं।