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अविदूरेनिदानकथा : बुद्धवंसपालिबोधिसत्त्व के तुषित लोक में वास करते समय ही बुद्धकोलाहल (लोक में बुद्धोत्पाद कीजनश्रुति) उ...
19/07/2025

अविदूरेनिदानकथा : बुद्धवंसपालि
बोधिसत्त्व के तुषित लोक में वास करते समय ही बुद्धकोलाहल (लोक में बुद्धोत्पाद की
जनश्रुति) उत्पन्न हुआ।
लोक में समय समय पर तीन कोलाहल उत्पन्न होते हैं; जैसे-
१. कल्पयकोलाहल,
२.बुद्धकोलाहल, एवं
३. चक्रवर्तिकोलाहल

वहाँ-
१."आज से एक लाख वर्ष व्यतीत होने पर कल्प -उत्थान (प्रलय) होगा -यह सोच कर कामधातु के लोकव्यूह नामक देवता खुले शिर, बिखरे बाल, रुदनमुख, आँखों से निकले औँसू
हाथों से पोंछते हुए, रक्त वर्त्र धारण कर, अतिशय कुरूप वेश में मनुष्यलोक में इधर उधर घूमते हुए
इस प्रकार चिल्लाते हैं"मित्रो! आज से एक लाख वर्ष बीतने पर कल्प-उत्थान होगा, उस समय वह सम्पूर्ण लोक विनष्ट हो जायगा। यह महासमुद्र सूख जायगा। यह महापृथ्वी तथा पर्वतराज सुमेरु नष्ट भ्रष्ट हो जायँगे। ब्रह्मलोक तक सभी प्राणियों का विनाश हो जायगा। अतः मित्रो! अभी से
मैत्रीभावना, करुणा, मुदिता एवं उपेक्षा भावना की साधना करो। माता पिता की सेवा करो। कृल में ज्येष्ठ पुरुषों की पूजा (सम्मान) करो!" इसे कहते हैं--कल्पकोलाहल (प्रलय होने की घोषणा)।

२."एक हजार वर्ष व्यतीत होने के बाद लोक में सर्वज्ञ बुद्ध का अवतार होगा'-यह सोचकर, लोकपालदेवता-"मित्रो! आज से एक हजार वर्ष के बाद लोक में बुद्ध का अवतरण
होगा'-ऐसी घोषणा करते हुए इधर उधर घूमते हैं। यह हुआ-बुद्धकोलाहल।

३. इसी प्रकार "'आज से सौ वर्ष बाद कोई चक्रवर्ती राजा होगा'-यह सोचकर, कृुछ देवता लोग (जनकल्याण हेतु)"आज से सौ वर्ष बाद कोई चक्रवती राजा होगा'-यह घोषणा
करते हुए इधर उधर घूमते हैं। यह हुआ- चक्रवर्तिकोलाहल।
इस प्रकार, ये तीन महान् कोलाहल समय समय पर इस लोक में होते रहते हैं।

सुमेध बोधिसत्त्व को बुद्धत्वप्राप्ति-दूरनिदानकथा :सुमेध बोधिसत्त्व दीपंकर आदि चौबीस बद्धों से बुद्धत्वप्राप्ति का आशीर्व...
19/07/2025

सुमेध बोधिसत्त्व को बुद्धत्वप्राप्ति-
दूरनिदानकथा :
सुमेध बोधिसत्त्व दीपंकर आदि चौबीस बद्धों से बुद्धत्वप्राप्ति का आशीर्वचन प्राप्त कर, एक
लाख चार असंख्य कल्पों तक एतदर्थ साधना करते हुए भद्रकल्प तक आये। वर्तमान समय (भद्रकल्प
युग) में भगवान् काश्यप बुद्ध के बाद, इन सम्यक-सम्बुद्ध के अतिरिक्त अन्य कोई बुद्ध नहीं हुए।
इस प्रकार, दीपंकर आदि चौबीस बुद्धों ने, जिसके लिये बुद्धत्व की भविष्यवाणी की थी, उन
बोधिसत्त्व के विषय में कहा है-
"मनुष्यत्व जाति, (पुरुष-) लिङ्, (उत्तम) हेतु (पूर्वकर्म का फल ), शास्ता (बुद्ध) के
दर्शन, प्रवज्या, गुणों की प्राप्ति, अधिकार, सदिच्छा-इन आठ धर्मों से युक्त होने पर, बोधिसत्त्व का
सड्कुल्प (=अभिनीहार) पूर्ण होता है।"
इन आठ बातों पर सम्यक रूप से विचार कर इस सुमेध बोधिसत्त्व ने दीपंकर बुद्ध के
श्रीचरणों में यह अभिनीहार (संकल्प) किया-"भन्ते ! मैं इन उपर्यक्त बुद्धत्वकारक धर्मों की प्राप्ति
में सहायक गुणों की जहाँ तहाँ से खोज करूँगा।" तदनन्तर, उत्साहपूर्वक इन गुणों की खोंज करते
हुए उनका सर्वप्रथम दानपारमिता आदि की ओर ध्यान गया। तब, उनने इस दानपारमिता आदि
बुद्धकारक धर्मों की पूर्ण साधना की। ऐसा करते हुए वे अपने वेस्सन्तर राजा के जन्म तक पहुँचे।
ऐसे कृतसंकल्प बोधिसत्त्वों के विषय में कहा है-
"ये उप्युक्त गु्णों से सम्पत्न महापुरुष, जिनका बुद्ध होना सुनिश्चित है, एक अरब कल्प तक
न तो किसी अवीचि नरक में, न लोकान्तर (तीन चक्रवालों के मध्य अत्यन्त शीत) नरक में, न सदैव
भूखे प्यासे रहने वाले प्रेतों की योनि में, न असुरों की योनि में, न पशुयोनि में ही उत्पन्न होते हैं । यदि
कदाचित् वे पशु - पक्षियों में उत्पन्न हो भी जायँ, तो वहाँ भी वे क्षुद्रक प्राणियों के रूप में कभी उत्प्न
नहीं होते। मनुष्य योनि में आकर भी वे कभी जन्मान्ध, गुँगे-बहरे नहीं होते। न वे कभी नारी रूप में
उत्पन्न होते हैं और न कभी हिंजड़े या नपुंसक ही बनते हैं । ऐसे पुरुष, जिनका बुद्ध होना निश्चित है,
उपर्यक्त योनियों में कभी उत्पन्न नहीं होते; अपितु सर्वत्र शुद्ध रूप में और सभी प्रकार के आनन्तर्य
(विघ्न) कारक धर्मों से मुक्त रहकर जन्म लेते हैं। ऐसे कर्म-क्रियादर्शी महापुरुष मिथ्या दुृष्टि
(=धारणा) ग्रहण नहीं करते। यदि कभी वे किसी सत्कर्म के परिणामस्वरूप स्वर्ग में उत्पन्न होने लगें
तो वहाँ वे असंज्ञी (रूपयोनियों में एक) योनि में उत्पन्न नहीं होते। उनके लिये शुद्धावास देवलोक
में उत्पत्न होने का कोई कारण नहीं होता; क्योंकि वे अनागामी हो चुके होते हैं। नैष्काम्य भावना में
सतत रत रहने वाले ये महापुरुष भव एवं अभव से मुक्त होकर, सभी पारमिताओं को पूर्ण करते हुए,
लोकोपकार हेतु ही लोक में विचरण करते हैं। ' "
१. बद्धत्व में विघ्नकारक पाँच धर्म ये होते हैं- १. मातृहत्या, २. पितृहत्या, ३. किसी अर्हत् की हत्या.
४. बुद्ध के शरीर को क्षत विक्षत करने की चेष्टा एवं ५. संघ में भेद (परस्पर अतिश्वास) उत्पन्न करना।

इस प्रकार, वे बोधिसत्त्व इन उपर्युक्त विशेषताओं को अधिक से अधिक आत्मसात् करते हुए, महान् पुण्य अधिगत कर अपने अन्तिम जन्म के रूप में वेस्सन्तर राजा बनकर इस लोक में
आये। वहाँ भी वे दान आदि महापुण्य कर्म करते हुए अन्त में तुषित नामक देवलोक में उत्पन्न हुए।

08/07/2025

"चुन्द ! जो स्वयं गिरा हुआ है, वह दुूसरे गिरे हुए को उठायेगा, यह सम्भव नहीं है; कितु,
जो चुंद! अपने (स्वयं) गिरा हुआ नहीं है, वह दूसरे गिरे हए को उठायेगा, यह सम्भव है।
चुद! जो स्वयं अदान्त मन के संयम से रहित), अ-विनीत, अनिर्वृत (=निर्वाण को न प्राप्त) है,
वह दूसरे की दान्त, विनीत, निर्वृत करेगा, यह सम्भव नहीं; किंतु, जो चुंद ! स्वयं दान्त, विनीत,निर्वृत है, वह दूसरे को दान्त, विनीत, निर्वृत करेगा, यह सस्भव है।
ऐसे ही ुद ! (1) हिसक पुरुष के लिए अहिंसा निर्वाण के लिए होती है । (44) सांदृष्टिपरामर्षी आधानग्राही
दुष्प्रति-निस्सगी पुरुष-पुद्गल को असांट्रष्टिता-अपरामर्षिता अनाधान-ग्राहिता सुप्रतिनिस्सर्गिता
निर्वाण (=दुख विनाश) के लिए होती है।

सल्लेख सूत्त!
मज़्झिम निकाय

28/06/2025

उस समय सुन्दरिक भारद्वाज ब्राह्मण भगवान के पास बैठा था। तब सुन्दरिक भारद्वाज
ब्राह्मण ने भगवान से यह कह
"क्या आप गोतम! स्नान के लिए बाहुकानदी चलेंगे?"

"ब्राद्मण! बाहकानदी से क्या (लेना) है? बाहकानदी क्या करेगी?"
"हे गोतम ! बाहकानदी लोकमान्य लोक-सम्मत) है, बाहकानदी बहुत जनों द्वारा पवित्र
(=पुण्य) मानी जाती है। बहुत से लोग बाहुकानदी में (अपने) किए पापों को बहाते हैं ।"
तब भगवान ने सुन्दरिक भारद्वाज ब्राह्मण से गाथाओं में कहा-
"बाहुका, अधिकक, गया, और सुन्दरिका में ।
सरस्वती, और प्रयाग तथा बाहुमती नदी में ।
काले कर्मों वाला मूढ़ चाहे नित्य नहाये, (किंतु) शुद्ध नहीं होगा।
क्या करेगी सुन्दरिका, क्या प्रयाग, और क्या बाहलिका नदी ?
(वह) पापकर्मी = कृतकिल्विष दुष्ट नर को नहीं शद्ध कर सकते।
शुद्ध (नर) के लिए सदा ही फल्यू है, शुद्ध के लिए सदा ही उपोसथ' है।
शुद्ध और शुचिकर्मा के व्रत सदा ही पूरे होते रहते हैं।
ब्राह्मण! यहीं नहा, सारे प्राणियों का क्षेम कर ।
यदि तू झूठ नहीं बोलता, यदि प्राण नहीं मारता।
यदि बिना दिए नहीं लेता, (और) श्रद्धावान् मत्सर-रहित है।
(तो) गया जाकर क्या करेगा, क्षुद्र जलाशय (=उदपान) भी तेरे लिए गया है।"
ऐसा कहने पर सुन्दरिक भारद्वाज ब्राह्मण ने भगवान से यह कहा-
"आश्चर्य! हे गोतम!! आश्चर्य! हे गोतम!! हे गोतम जैसे कि उल्टे को सीधा कर दे या
ढंके को उघाड़ दे, भूले को मार्ग बतला दे या अन्धकार में तेल का दीपक धारण कर ले जिससे
कि आंख वाले रूपों को देख लें, ऐसे ही आप गोतम द्वारा अनेक प्रकार से धर्म प्रकाशित किया
गया। सो मैं आप गोतम की शरण जाता हूं, धर्म और भिक्खुसंघ की भी। आप गोतम के पास
मैं प्रव्रज्या (=संन्यास) पाऊं, उपसम्पदा पाऊ ।
सुन्दरिक भारद्वाज ब्रह्यण ने भगवान के पास प्रव्रज्या, उपसम्पदा पाई। उपसम्पदा पाने
के बाद, आयुष्मान् भारद्वाज एकान्त में प्रमादरहित, उद्योगयुक्त, आत्मनिग्रही हो विहरते, थोडे ही
समय में जिसके लिए कलपुत्र घर से बेघर हो प्रव्रजित होते हैं, उस अनुपम ब्रह्मचर्य के अंत
(-निर्वाण) को, इसी जन्म में स्वयं जानकर, साक्षात्कर, प्राप्तकर विहरने लगे। 'जन्म क्षीण हो
गया, ब्रह्मचर्य पूर्ण कर लिया, करने योग्य को कर लिया, यहां के लिए कुछ और करना (शेष)
नहीं रहा-ऐसा जान लिया। आयुष्मान् भारद्वाज अहतों में से एक हुए।

28/06/2025

विपश्यना किसे कहते है?

अनिच्च, दुःख, अनत्त आदि को नाना प्रकार से देखने की विधि को विपश्यना कहते है।

28/06/2025

"ब्राह्मण! शायद तेरे (मन में) ऐसा हो-'आज भी श्रमण गोतम अ-वीतराग, अ-वीत द्वेष,
अ-वीतमोह है, इसीलिए अरण्य में वन-खंड तथा सूनी कुटियों का सेवन करता हैं । ब्राह्मण! इसे
इस प्रकार नहीं देखना चाहिए। ब्राह्मण दो बातों के लिए मैं अरण्य में वन-खंड और सूनी कुटियों
का सेवन करता हूं- (1) इसी शरीर में अपने सुख विहार के ख्याल से; और (2) आने वाली
जनता पर अनुकम्पा के लिए (जिसमें) मेरा अनुगमन कर वह भी सुफल-भागी हो।"

भयभैरव सूत्त – मज़्झिम निकाय ( त्रिपिटक)

28/06/2025

स्मृति – संप्रजन्य= होश और अनुभव

27/06/2025

तथागत=

तथा ( जैसे अन्य बुद्ध संसार में आए, आते है, या आयेंगे)

वैसे ही जो

आगत ( आया)

12/06/2025

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491001

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