27/12/2025
कथा - अमावस्या की कथा ( कल अमावस्या है )
उद्देश्य - भगवान श्रीविष्णु की प्रसन्नता
कर्म - पितरो के तर्पण के माध्यम से
कथा का स्रोत - वराह पुराण एवं अन्य पुराणों भी
कथा के वक्ता है - महातपा मुनि
श्रोता है - राजा प्रजापाल
पाठक - हम सब
अमावास्या तिथि की महिमा के प्रसङ्ग में पितरों की
उत्पत्ति का कथन
महातपाजी कहते हैं - राजन् ! अब मैं पितरों की उत्पत्ति का प्रसङ्ग कहता हूँ, तुम उसे सुनो। पूर्व समय की बात है- प्रजापति ब्रह्माजी अनेक प्रकार की प्रजाओं का सृजन करने के विचार से मन को एकाग्र करके बैठ गये। फिर उनके मन से तन्मात्राएँ बाहर निकलीं।
पञ्चज्ञानेन्द्रियों के विषय शब्द-स्पर्शादि ही तन्मात्राएँ हैं। (इनका प्रयोग संस्कृतमें क्लीब एवं पुंलिङ्ग में दृष्ट है।)
उन्होंने उन सबको प्रधानता दी और 'इनको किन रूपों से सुशोभित करें'- यों विचारने लगे। कारण, वे सभी ब्रह्माजी के शरीर में पहले से ही थीं और वहींसे पुनः ये धूम्रवर्ण वाली तन्मात्राएँ प्रकट हुई थीं। फिर वे चमककर देवताओं से कहने लगीं - 'हम सोमरस पीना चाहती हैं।'
साथ ही उनके मन में ऊपर के लोक में जानेकी इच्छा हुई। उन सबोंने सोचा- 'हम आकाश में आसन जमाकर वहीं तपस्या करें।'
ऊपर जाने के लिये वे मुख उठाकर तिरछे मार्ग का अवलम्बन करना ही चाहती थीं, इतने में उन्हें देखकर ब्रह्माजी ने कहा- 'समस्त गृहाश्रमियों का कल्याण करने के लिये आपलोग पितर होकर रहें।'
ये जो ऊपर मुख करके जाना चाहते हैं, इनका नाम 'नान्दीमुख' होगा। इस प्रकार कहकर ब्रह्माजी ने उनके मार्ग का भी निरूपण कर दिया। राजन् ! उस समय ब्रह्माजी ने उन पितरों के लिये मार्ग सूर्य का दक्षिणायनकाल बता दिया।
इस प्रकार प्रजा की सृष्टि कर वे जब मौन हो गये, तब पितरों ने उनसे कहा- 'भगवन्! हमें जीविका देने की कृपा कीजिये, जिससे सुख प्राप्त कर सकें।'
ब्रह्माजी बोले - तुम्हारे लिये अमावास्याकी तिथि ही दिन हो। उस तिथि में मनुष्य जल, तिल और कुश से तुम्हारा तर्पण करेंगे। इससे तुम परम तृप्त हो जाओगे। इसमें कुछ भी संदेह नहीं है। उस अमावास्या तिथि में तिल देने का विधान है। पितरों के प्रति श्रद्धा रखनेवाला जो पुरुष तुम्हारी उपासना करेगा, उसपर अत्यन्त संतुष्ट होकर यथाशीघ्र वर देना तुम्हारा परम कर्तव्य है।
कथा समाप्त
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अब समझें कि पितरो का तर्पण क्यो आवश्यक है, और पितरो के निमित कुछ आप कैसे कर सकते है ...
कलियुग जैसे-जैसे अग्रसर हो रहा है, शास्त्रीय मर्यादाएँ धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं, और इसका प्रत्यक्ष प्रभाव हमारे समाज पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है।
आयु क्षीण हो रही है, अकाल मृत्यु का भय बढ़ रहा है, शरीर का बल घट रहा है। स्त्री-पुरुषों के समय पर विवाह नही होते , वर्ण मर्यादा को छोड़कर विवाह की अव्यवस्थित प्रवृत्ति बढ़ रही है, पुत्र–संतान की प्राप्ति में बाधाएँ आ रही हैं, और बीमारियों पर अत्यधिक खर्च सामान्य बात हो गई है।
इस सम्पूर्ण अव्यवस्था का एक अत्यंत महत्वपूर्ण कारण हैं — पितरों का अप्रसन्न होना।
शास्त्रवचन है—
“आयुः कीर्ति बलं तेजो धनं पुत्रं पशुं स्त्रियः।
ददन्ति पितरो यस्य तस्यारोग्यं नात्र संशयः॥”
अर्थात —
पितरों की प्रसन्नता से मनुष्य को आयु, आरोग्य, बल, तेज, धन, पुत्र, पशुधन और विवाह-सुख सहित सभी सांसारिक सुख सहज प्राप्त होते हैं। और यदि पितर अप्रसन्न हो जाएँ, तो इन समस्त सुखों में कमी आना निश्चित है।
अतः—
जो मनुष्य अपने जीवन में स्थिरता, शांति और समृद्धि चाहता है, उसे पितरों की प्रसन्नता के प्रति सदैव जागरूक रहना चाहिए। पितृ–सेवा, श्राद्ध, तर्पण और सदाचार वही दिव्य सेतु हैं जो हमारे और हमारे पितरों के आशिर्वाद को जोड़ते हैं। पितरों की कृपा हो जाए, तो जीवन के सभी मार्ग स्वयं प्रकाशित होने लगते हैं।
प्रत्येक अमावस्या यह उपचार करें ...
●यदि आपके पास पर्याप्त धन है, तो किसी ब्राह्मण को रत्न, वस्त्र, वाहन और सम्पूर्ण भोग सामग्री दान कर सकते है।
●यदि बहुत धन नही है, किंतु इतना है की ब्राह्मण को , भोजन करवा सकें, और भोजन करवाकर गीताजी का एक श्लोक सुनाएं ।। उसी से पितर प्रसन्न हो जाएंगे ।
●यदि अन्न की व्यवस्था नही है, तो जनेऊधारी ब्राह्मण को फल सब्जी का ही दान देकर अपने पितरों को तृप्त करें ।
●इसमे भी यदि असमर्थ हो, तो किसी जनेऊधारी ब्राह्मण को प्रणाम कर एक मुट्ठी काला तिल ही दान करें।
●उसमे भी यदि समर्थ नही हो, तो 7-8 तिल के दाने लेकर जलांजलि देकर ही पितरो को तृप्त करें ।
●यह भी नही हो सकता, तो फिर कहीं से चारा लाकर प्रीति और श्रद्धा से गौ को खिलाएं ।
●यह भी नही हो सकता, तो किसी वन या एकांत स्थान में जाकर अपने दोनो हाथ उपर करके पितरो से कहें, मेरे पास श्राद्ध के लिए न तो धन है, न योग्य सामग्री। अतः में अपने पितरों को प्रणाम करता हूं। आप मेरी भक्ति से ही तृप्ति प्राप्त करें। मेने अपनी दोनो बाहें आकाश में उठा रखी है...। इस तरह प्रत्येक अमावस्या को अपने पितरों को तृप्त अवश्य करें।
पितृदोष निवारण हेतु नियमित किये जाने वाले उपचार
●प्रतिदिन भोजन का पहला निवाला गौ, दूसरा कुत्ते, तीसरा कौए और चौथा किसी निर्धन सदाचारी ब्राह्मण को देना।। ब्राह्मण भोज आज के समय मे नित्य संभव नही, इसलिए एक ग्रास अग्नि में डाल दी जाती है, क्यो की अग्नि का वर्ण भी ब्राह्मण ही माना गया है ।।
●परिवार में ब्राह्मणों, गौ और साधु-संतों का सम्मान करना। वंशजों को संयमी और धर्मशील जीवन जीने की शिक्षा देना।
●प्रतिदिन घर मे जो भी अन्न बने, उसका एक ग्रास गृहपति भगवान अग्नि को अर्पित कर उनसे सुख शांति सम्रद्धि या बाकी जो भी मनोकामना है, वह पूरी करने को कहे । साथ मे पानी के छींटे भी लगाएं ।
इस तरह पितरो को आप तृप्त करें । अमावस्या पितरो की है, और पूर्णिमा देवताओं की ।। आप इन दोनों दिनों में , कुछ न कुछ अन्नदान अवश्य ही करें ।। अन्नदान आदि न हो सकें, तो किसी एक ही गाय को भरपेट भोजन अवश्य ही करवावे।। आपकी जन्मपत्री में जो राहु दोष है, वह वास्तव में पितरो का ही दोष है ।। आपको एक बार राहु की शांति करवा लेनी चाहिए ।। इससे बहुत राहत आएगी ।। और पितरो के विषय मे बहुत जागरूक रहें ।।