ચેહર ધામ ચગવાડા

ચેહર ધામ ચગવાડા હિન્દુ ધર્મ પ્રચારક

27/12/2025

*दान की शास्त्रीय मर्यादा*

शास्त्रों में दान को अत्यन्त पवित्र कर्म कहा गया है, किन्तु हर दिया गया द्रव्य दान नहीं होता।
दान तभी दान कहलाता है जब वह विधि, पात्र, देश, काल और भाव—इन पाँचों की मर्यादा में किया गया हो।

*बिना पूछे, बिना निवेदन किये, बिना पात्र की स्वीकृति के दिया गया दान शास्त्रीय दृष्टि से अनुचित माना गया है। क्योंकि दान देने से पूर्व दाता का कर्तव्य है कि वह ब्राह्मण से निवेदन करें ।

“महाराज, यह मेरी सामर्थ्य का अंश है,
भगवान् श्रीहरि की प्रसन्नता के लिए
आप स्वीकार कर, मुझे कृतार्थ करें।”

यदि ब्राह्मण स्वीकार न करे, तो वह दान नहीं बनता। कोई दूसरा ब्राह्मण ढूंढो । किंतु श्रीहरि का नाम आते ही ब्राह्मण दान स्वीकार कर लेगा । श्रीहरि की प्रसन्नता वह कैसे टालेगा ? या फिर उस पैसे का कहीं ओर लगाने का आदेश करेगा ।

दान का भाव — गीता का सिद्धान्त

श्रीमद्भगवद्गीता (17.20–22) में दान को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है—

सात्त्विक दान —
जो श्रद्धा, कर्तव्य-बुद्धि और करुणा से दिया जाए
और जिसमें कोई प्रतिफल, प्रदर्शन या अहंकार न हो। इसका फल शुभ है । यह ऊत्तम गति देता है । इहलोक परलोक दोनो में सुख देता है ।

राजस दान —
जो बदले की अपेक्षा, नाम, प्रसिद्धि या स्वार्थ से दिया जाए। इसका फल धरती पर ही मिल जाता है । मरने के बाद इसका फल नही है ।

तामस दान —
जो अविधिपूर्वक,
अपात्र को,
बिना सम्मान,
या केवल अहंकार, मोह अथवा दिखावे के लिए दिया जाए। इसका फल केवल दुःख है ।

आज के समय में बिना पूछे, केवल UPI के माध्यम से
कहीं भी, किसी को भी,
दान के नाम पर धन भेज देना—
यदि उसमें श्रद्धा, विधि और पात्रता न हो—
तो वह तामस दान की श्रेणी में आ सकता है
और शास्त्रों के अनुसार
वह पुण्य के स्थान पर दुःख का कारण भी बन सकता है।

दान का वास्तविक प्रयोजन

दान का उद्देश्य यह नहीं कि
दाता स्वयं को दानी सिद्ध करे,
बल्कि यह है कि—

“किसी का दुःख कम हो,
किसी के जीवन में थोड़ी शान्ति आए,
और वह भी सुख का मुख देखे।”

इसीलिए शास्त्र कहते हैं—

यथाशक्ति दानं श्रेष्ठम्।
सामर्थ्य से अधिक किया गया दान
भी मर्यादा से गिरा हुआ माना गया है।

यदि सामर्थ्य केवल एक रुपये की है,
तो वही महादान है।

और यदि एक रुपया भी सम्भव न हो,
तो—

किसी को प्रणाम करना,

उसे सम्मान देना,

मीठे वचन से उसका मन प्रसन्न करना—

यह भी दान से कम नहीं।

तो हमारी तो यही विनती है, की सोशल मीडिया में अपने रुपयों में आग लगाने की बजाए, आसपास के निर्धन ब्राह्मण ढूंढे । ब्राह्मणों से श्रद्धा नही है, तो गौ के प्रति ही प्रीति रखकर एक ही गौ का डेली या किसी पर्व पर पेट भर दीजिये ।

किंतु जो भी हो , उसमे श्रीहरि की प्रसन्नता की कामना हो । इसके सिवा कुछ नही । तब दान का आनंद देखिए फिर ...

27/12/2025

*तिथि पूजन का उद्देश्य — कामना से भक्ति की ओर*

भगवान वेदव्यास जी ने कहा है —

> “जो मनुष्य भगवान के अतिरिक्त किसी और वस्तु की कामना करता है, वह अपने ही मुख को कलुषित करता है; क्योंकि परमात्मा से बढ़कर कोई वस्तु नहीं।”

यह वचन हमने संत-महात्माओं के सत्संग में सुना था।
परंतु हम जो कथाएँ सुनाते हैं — उनमें बार-बार कहा जाता है कि “यह व्रत करो, यह तिथि मनाओ, यह कामना पूर्ण होगी।”
इससे अनेक जन यह समझते हैं कि हम उन्हें भौतिक लाभों की ओर प्रेरित कर रहे हैं।
परंतु सत्य इसके विपरीत है।

हम किसी देवता, यक्ष या प्रेत की पूजा नहीं करवा रहे —
हम केवल भगवान श्रीविष्णु (श्रीकृष्ण) की उपासना करवा रहे हैं,
जो 15 तिथियों में विराट रूप से विभाजित हैं।

*१५ तिथियाँ — एक ही परमात्मा के १५ रूप*

भगवान इतने विराट, अनंत और सर्वव्यापक हैं
कि एक जीवन तो क्या — अनंत जन्म भी उनकी पूर्ण पूजा के लिए पर्याप्त नहीं।
इसलिए शास्त्रों में वराहपुराणादि के अनुसार, हमने उनके विराट स्वरूप को १५ तिथियों में विभाजित किया है।
प्रत्येक तिथि उस परम पुरुष के एक विशेष भाव का प्रतीक है —
कहीं सृष्टि, कहीं पालन, कहीं संहार, कहीं भक्ति, कहीं समर्पण।

इस प्रकार हम किसी अन्य देवता की नहीं,
एक ही परमात्मा — श्रीकृष्ण के विराट स्वरूप की क्रमशः पूजा कर रहे हैं।

*कामना का रहस्य*

अब चाहे कोई व्यक्ति इन तिथियों का पूजन कामना से करे या न करे,
यदि वह श्रद्धा और विश्वास से कथा सुन लेता है,
तो उसकी कामनाएँ स्वतः पूर्ण होती हैं।

परंतु यहाँ एक सूक्ष्म परिवर्तन आवश्यक है —
हर कथा के अंत में हमें यह भाव रखना चाहिए :

> “हे प्रभु! मेरी यह कामना इस प्रकार पूर्ण हो,
कि यह मुझे आपकी भक्ति में लगा दे।
जो मेरे लिए कल्याणकारी हो, वही कीजिए।”

यही कामना का शुद्धिकरण है।
यही भक्ति में प्रवेश का आरंभ है।

---

*भौतिक से आध्यात्मिक उन्नति तक*

हमारा उद्देश्य केवल जीवन की भौतिक उन्नति नहीं है।
वह तो तिथिपूजन का सहज फल है।
परंतु उससे भी बड़ा उद्देश्य है —
आध्यात्मिक उन्नति,
जिससे मनुष्य भगवान की इच्छा में रमता जाए,
और उसकी प्रत्येक इच्छा स्वयं भगवत्पथ का साधन बन जाए।

> जब कामना हमें भगवान से दूर करे — वह बंधन है।
और जब कामना हमें भगवान की ओर ले जाए — वही मुक्ति है।

इसीलिए हमने तिथिपूजन को इस रूप में गूंथा है —
कि जो भी व्यक्ति इन कथाओं को सुनता है,
वह चाहे भौतिक लाभ चाहे या न चाहे,
अंततः श्रीकृष्ण की भक्ति में प्रवेश करता है।

---

27/12/2025

आज अमावस्या है । आज के दिन पितरो को तृप्त अवश्य करें ।

पुराणों का मत है की

"आयुः कीर्ति बलं तेजो, धनं पुत्रं पशुं स्त्रियः ददन्ति पितरस्यतस्य, आरोग्यं नात्र संशय ।।

अर्थात पितरो की कृपा से हमे आयु, आरोग्य, बल, तेज, धन, पुत्र, पशु , स्त्री/ विवाह आदि सभी सुख प्राप्त होते है ।। पितर यदि प्रसन्न न हो, तो इन सुखों में कमी आ जाती है ।। अतः पितरो की प्रसन्नता हेतु जागरूक रहना चाहिए ।।

आज ही नही, अपने जीवनकाल में प्रत्येक अमावस्या यह उपचार करें ...

●यदि आपके पास पर्याप्त धन है, तो किसी जनेऊधारी ब्राह्मण को रत्न, वस्त्र, वाहन और सम्पूर्ण भोग सामग्री दान कर सकते है।

●यदि बहुत धन नही है, किंतु इतना है की ब्राह्मण को , भोजन करवा सकें, और भोजन करवाकर गीताजी का एक श्लोक सुनाएं ।। उसी से पितर प्रसन्न हो जाएंगे ।

●यदि अन्न की व्यवस्था नही है, तो ब्राह्मण को फल सब्जी का ही दान देकर अपने पितरों को तृप्त करें ।

●इसमे भी यदि असमर्थ हो, तो किसी ब्राह्मण को प्रणाम कर एक मुट्ठी काला तिल ही दान करें।

●उसमे भी यदि समर्थ नही हो, तो 7-8 तिल के दाने लेकर जलांजलि देकर ही पितरो को तृप्त करें ।

●यह भी नही हो सकता, तो फिर कहीं से चारा लाकर प्रीति और श्रद्धा से गौ को खिलाएं ।

●यह भी नही हो सकता, तो किसी वन या एकांत स्थान में जाकर अपने दोनो हाथ उपर करके पितरो से कहें, मेरे पास श्राद्ध के लिए न तो धन है, न योग्य सामग्री। अतः में अपने पितरों को प्रणाम करता हूं। आप मेरी भक्ति से ही तृप्ति प्राप्त करें। मेने अपनी दोनो बाहें आकाश में उठा रखी है...। इस तरह प्रत्येक अमावस्या को अपने पितरों को तृप्त अवश्य करें।

जीवन मे उन्नति के लिए पितरो की कृपा आवश्यक है । पितरो की प्रसन्नता से भगवान श्रीहरि प्रसन्न होते है । जब भगवान श्रीहरि प्रसन्न है, तो जीवन मे फिर किस बात की कमी ....

27/12/2025

*कल अमावस्या है*
*सुख शांति पाने का बहुत महत्वपूर्ण दिन है ।*

कलियुग जैसे-जैसे अग्रसर हो रहा है, शास्त्रीय मर्यादाएँ धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं, और इसका प्रत्यक्ष प्रभाव हमारे समाज पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है।

आयु क्षीण हो रही है, अकाल मृत्यु का भय बढ़ रहा है, शरीर का बल घट रहा है। स्त्री-पुरुषों के समय पर विवाह नही होते , वर्ण मर्यादा को छोड़कर विवाह की अव्यवस्थित प्रवृत्ति बढ़ रही है, पुत्र–संतान की प्राप्ति में बाधाएँ आ रही हैं, और बीमारियों पर अत्यधिक खर्च सामान्य बात हो गई है।

इस सम्पूर्ण अव्यवस्था का एक अत्यंत महत्वपूर्ण कारण हैं — पितरों का अप्रसन्न होना।
शास्त्रवचन है—

*“आयुः कीर्ति बलं तेजो धनं पुत्रं पशुं स्त्रियः।*
*ददन्ति पितरो यस्य तस्यारोग्यं नात्र संशयः॥”*

अर्थात —

*पितरों की प्रसन्नता से मनुष्य को आयु, आरोग्य, बल, तेज, धन, पुत्र, पशुधन और विवाह-सुख सहित सभी सांसारिक सुख सहज प्राप्त होते हैं। और यदि पितर अप्रसन्न हो जाएँ, तो इन समस्त सुखों में कमी आना निश्चित है।*

अतः—
जो मनुष्य अपने जीवन में स्थिरता, शांति और समृद्धि चाहता है, उसे पितरों की प्रसन्नता के प्रति सदैव जागरूक रहना चाहिए। पितृ–सेवा, श्राद्ध, तर्पण और सदाचार वही दिव्य सेतु हैं जो हमारे और हमारे पितरों के आशिर्वाद को जोड़ते हैं। पितरों की कृपा हो जाए, तो जीवन के सभी मार्ग स्वयं प्रकाशित होने लगते हैं।

प्रत्येक अमावस्या यह उपचार करें ...

●यदि आपके पास पर्याप्त धन है, तो किसी ब्राह्मण को रत्न, वस्त्र, वाहन और सम्पूर्ण भोग सामग्री दान कर सकते है।

●यदि बहुत धन नही है, किंतु इतना है की ब्राह्मण को , भोजन करवा सकें, और भोजन करवाकर गीताजी का एक श्लोक सुनाएं ।। उसी से पितर प्रसन्न हो जाएंगे ।

●यदि अन्न की व्यवस्था नही है, तो जनेऊधारी ब्राह्मण को फल सब्जी का ही दान देकर अपने पितरों को तृप्त करें ।

●इसमे भी यदि असमर्थ हो, तो किसी जनेऊधारी ब्राह्मण को प्रणाम कर एक मुट्ठी काला तिल ही दान करें।

●उसमे भी यदि समर्थ नही हो, तो 7-8 तिल के दाने लेकर जलांजलि देकर ही पितरो को तृप्त करें ।

●यह भी नही हो सकता, तो फिर कहीं से चारा लाकर प्रीति और श्रद्धा से गौ को खिलाएं ।

●यह भी नही हो सकता, तो किसी वन या एकांत स्थान में जाकर अपने दोनो हाथ उपर करके पितरो से कहें, मेरे पास श्राद्ध के लिए न तो धन है, न योग्य सामग्री। अतः में अपने पितरों को प्रणाम करता हूं। आप मेरी भक्ति से ही तृप्ति प्राप्त करें। मेने अपनी दोनो बाहें आकाश में उठा रखी है...। इस तरह प्रत्येक अमावस्या को अपने पितरों को तृप्त अवश्य करें ।

जिनकी कुण्डली में पितृदोष है, वह यह उपाय अवश्य ही करें ।

अमावस्या की कथा भी मैं आज ही भेज दुँगा । आशा है हम सब कल अपने पितरो को अवश्य तृप्त करेंगे । प्रत्येक अमावस्या पर तृप्त करेंगे ।

राधे राधे 👏

27/12/2025

कथा - अमावस्या की कथा ( कल अमावस्या है )
उद्देश्य - भगवान श्रीविष्णु की प्रसन्नता
कर्म - पितरो के तर्पण के माध्यम से
कथा का स्रोत - वराह पुराण एवं अन्य पुराणों भी
कथा के वक्ता है - महातपा मुनि
श्रोता है - राजा प्रजापाल
पाठक - हम सब

अमावास्या तिथि की महिमा के प्रसङ्ग में पितरों की
उत्पत्ति का कथन

महातपाजी कहते हैं - राजन् ! अब मैं पितरों की उत्पत्ति का प्रसङ्ग कहता हूँ, तुम उसे सुनो। पूर्व समय की बात है- प्रजापति ब्रह्माजी अनेक प्रकार की प्रजाओं का सृजन करने के विचार से मन को एकाग्र करके बैठ गये। फिर उनके मन से तन्मात्राएँ बाहर निकलीं।

पञ्चज्ञानेन्द्रियों के विषय शब्द-स्पर्शादि ही तन्मात्राएँ हैं। (इनका प्रयोग संस्कृतमें क्लीब एवं पुंलिङ्ग में दृष्ट है।)

उन्होंने उन सबको प्रधानता दी और 'इनको किन रूपों से सुशोभित करें'- यों विचारने लगे। कारण, वे सभी ब्रह्माजी के शरीर में पहले से ही थीं और वहींसे पुनः ये धूम्रवर्ण वाली तन्मात्राएँ प्रकट हुई थीं। फिर वे चमककर देवताओं से कहने लगीं - 'हम सोमरस पीना चाहती हैं।'

साथ ही उनके मन में ऊपर के लोक में जानेकी इच्छा हुई। उन सबोंने सोचा- 'हम आकाश में आसन जमाकर वहीं तपस्या करें।'

ऊपर जाने के लिये वे मुख उठाकर तिरछे मार्ग का अवलम्बन करना ही चाहती थीं, इतने में उन्हें देखकर ब्रह्माजी ने कहा- 'समस्त गृहाश्रमियों का कल्याण करने के लिये आपलोग पितर होकर रहें।'

ये जो ऊपर मुख करके जाना चाहते हैं, इनका नाम 'नान्दीमुख' होगा। इस प्रकार कहकर ब्रह्माजी ने उनके मार्ग का भी निरूपण कर दिया। राजन् ! उस समय ब्रह्माजी ने उन पितरों के लिये मार्ग सूर्य का दक्षिणायनकाल बता दिया।

इस प्रकार प्रजा की सृष्टि कर वे जब मौन हो गये, तब पितरों ने उनसे कहा- 'भगवन्! हमें जीविका देने की कृपा कीजिये, जिससे सुख प्राप्त कर सकें।'

ब्रह्माजी बोले - तुम्हारे लिये अमावास्याकी तिथि ही दिन हो। उस तिथि में मनुष्य जल, तिल और कुश से तुम्हारा तर्पण करेंगे। इससे तुम परम तृप्त हो जाओगे। इसमें कुछ भी संदेह नहीं है। उस अमावास्या तिथि में तिल देने का विधान है। पितरों के प्रति श्रद्धा रखनेवाला जो पुरुष तुम्हारी उपासना करेगा, उसपर अत्यन्त संतुष्ट होकर यथाशीघ्र वर देना तुम्हारा परम कर्तव्य है।

कथा समाप्त
________________________________________

अब समझें कि पितरो का तर्पण क्यो आवश्यक है, और पितरो के निमित कुछ आप कैसे कर सकते है ...

कलियुग जैसे-जैसे अग्रसर हो रहा है, शास्त्रीय मर्यादाएँ धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं, और इसका प्रत्यक्ष प्रभाव हमारे समाज पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है।

आयु क्षीण हो रही है, अकाल मृत्यु का भय बढ़ रहा है, शरीर का बल घट रहा है। स्त्री-पुरुषों के समय पर विवाह नही होते , वर्ण मर्यादा को छोड़कर विवाह की अव्यवस्थित प्रवृत्ति बढ़ रही है, पुत्र–संतान की प्राप्ति में बाधाएँ आ रही हैं, और बीमारियों पर अत्यधिक खर्च सामान्य बात हो गई है।

इस सम्पूर्ण अव्यवस्था का एक अत्यंत महत्वपूर्ण कारण हैं — पितरों का अप्रसन्न होना।
शास्त्रवचन है—

“आयुः कीर्ति बलं तेजो धनं पुत्रं पशुं स्त्रियः।
ददन्ति पितरो यस्य तस्यारोग्यं नात्र संशयः॥”

अर्थात —

पितरों की प्रसन्नता से मनुष्य को आयु, आरोग्य, बल, तेज, धन, पुत्र, पशुधन और विवाह-सुख सहित सभी सांसारिक सुख सहज प्राप्त होते हैं। और यदि पितर अप्रसन्न हो जाएँ, तो इन समस्त सुखों में कमी आना निश्चित है।

अतः—
जो मनुष्य अपने जीवन में स्थिरता, शांति और समृद्धि चाहता है, उसे पितरों की प्रसन्नता के प्रति सदैव जागरूक रहना चाहिए। पितृ–सेवा, श्राद्ध, तर्पण और सदाचार वही दिव्य सेतु हैं जो हमारे और हमारे पितरों के आशिर्वाद को जोड़ते हैं। पितरों की कृपा हो जाए, तो जीवन के सभी मार्ग स्वयं प्रकाशित होने लगते हैं।


प्रत्येक अमावस्या यह उपचार करें ...

●यदि आपके पास पर्याप्त धन है, तो किसी ब्राह्मण को रत्न, वस्त्र, वाहन और सम्पूर्ण भोग सामग्री दान कर सकते है।

●यदि बहुत धन नही है, किंतु इतना है की ब्राह्मण को , भोजन करवा सकें, और भोजन करवाकर गीताजी का एक श्लोक सुनाएं ।। उसी से पितर प्रसन्न हो जाएंगे ।

●यदि अन्न की व्यवस्था नही है, तो जनेऊधारी ब्राह्मण को फल सब्जी का ही दान देकर अपने पितरों को तृप्त करें ।

●इसमे भी यदि असमर्थ हो, तो किसी जनेऊधारी ब्राह्मण को प्रणाम कर एक मुट्ठी काला तिल ही दान करें।

●उसमे भी यदि समर्थ नही हो, तो 7-8 तिल के दाने लेकर जलांजलि देकर ही पितरो को तृप्त करें ।

●यह भी नही हो सकता, तो फिर कहीं से चारा लाकर प्रीति और श्रद्धा से गौ को खिलाएं ।

●यह भी नही हो सकता, तो किसी वन या एकांत स्थान में जाकर अपने दोनो हाथ उपर करके पितरो से कहें, मेरे पास श्राद्ध के लिए न तो धन है, न योग्य सामग्री। अतः में अपने पितरों को प्रणाम करता हूं। आप मेरी भक्ति से ही तृप्ति प्राप्त करें। मेने अपनी दोनो बाहें आकाश में उठा रखी है...। इस तरह प्रत्येक अमावस्या को अपने पितरों को तृप्त अवश्य करें।

पितृदोष निवारण हेतु नियमित किये जाने वाले उपचार

●प्रतिदिन भोजन का पहला निवाला गौ, दूसरा कुत्ते, तीसरा कौए और चौथा किसी निर्धन सदाचारी ब्राह्मण को देना।। ब्राह्मण भोज आज के समय मे नित्य संभव नही, इसलिए एक ग्रास अग्नि में डाल दी जाती है, क्यो की अग्नि का वर्ण भी ब्राह्मण ही माना गया है ।।

●परिवार में ब्राह्मणों, गौ और साधु-संतों का सम्मान करना। वंशजों को संयमी और धर्मशील जीवन जीने की शिक्षा देना।

●प्रतिदिन घर मे जो भी अन्न बने, उसका एक ग्रास गृहपति भगवान अग्नि को अर्पित कर उनसे सुख शांति सम्रद्धि या बाकी जो भी मनोकामना है, वह पूरी करने को कहे । साथ मे पानी के छींटे भी लगाएं ।

इस तरह पितरो को आप तृप्त करें । अमावस्या पितरो की है, और पूर्णिमा देवताओं की ।। आप इन दोनों दिनों में , कुछ न कुछ अन्नदान अवश्य ही करें ।। अन्नदान आदि न हो सकें, तो किसी एक ही गाय को भरपेट भोजन अवश्य ही करवावे।। आपकी जन्मपत्री में जो राहु दोष है, वह वास्तव में पितरो का ही दोष है ।। आपको एक बार राहु की शांति करवा लेनी चाहिए ।। इससे बहुत राहत आएगी ।। और पितरो के विषय मे बहुत जागरूक रहें ।।

27/12/2025

*आज की चतुर्दशी तिथि की कथा*

कथा का विषय :-
चतुर्दशी तिथिके माहात्म्य के प्रसङ्ग में रुद्रकी उत्पत्ति का वर्णन

भगवान श्रीकृष्ण को प्रणाम कर मैं कथा को प्रारम्भ करता हूं :--

यह कथा भगवान का एक रूप " महातपा " मुनि राजा प्रजापाल को सुना रहे है । महातपा मुनि राजा से कहते हैं - राजन् ! सृष्टि केआरम्भ में रुद्रके उत्पन्न होने की एक कथा है। वह प्रसङ्ग कहता हूँ, यत्नपूर्वक सुनो -

जब तपोरूप धर्ममय वृक्ष नष्टप्राय हो गया था, उस समय प्रचण्ड तेजस्वी ब्रह्माजी क्षमारूपी अस्त्र धारण किये प्रकट हुए।

उन परम प्रतापी प्रभु के आने का प्रयोजन था परम ज्ञान और तत्त्व को जानकर प्रजाओं की रक्षा करना। सृष्टि करने की इच्छा वाले उन महाप्रभु ने चाहा - ' प्रजाएँ उत्पन्न हों और इच्छानुसार जगत की वृद्धि हो।'

किंतु इसमें प्रतिबन्ध पड़ गया। अतः क्रोध से उनका मन क्षुब्ध हो उठा। फिर वे समाधिस्थ हो गये। अब उनके सामने एक ऐसा श्रेष्ठ पुरुष प्रकट हुआ, जिसका अन्तःकरण अत्यन्त पवित्र था। उसके रजोगुण और तमोगुण सर्वथा नष्ट हो चुके थे। उसकी कीर्ति अचल थी। उस पुरुष में वर देने की पूर्ण शक्ति थी एवं अपार बल था। उसके शरीर की कान्ति काले और लाल रंगसे सम्पन्न थी तथा नेत्र पीले रंग के थे। वह उत्पन्न होते ही रोने लगा।

तब ब्रह्माजी ने कहा- 'त्वं मा रुद' - तुम रोओ मत। इस कारण उस पुराणपुरुष का नाम रुद्र हो गया। पुनः ब्रह्माजी बोले- 'तुम एक महान् पुरुष हो ! तुममें सब कुछ करने की शक्ति है। तुम मेरी ऐसी सृष्टि का विस्तार करो, जिसका रूप तुम्हारे ही अनुरूप हो।'

ब्रह्माजीबके इतना कहते ही वे तप करने के विचार से जल के भीतर चले गये। फिर उन देवेश्वर रुद्र के जल में चले जानेपर ब्रह्माजी ने दक्षप्रजापति की सृष्टि की। ब्रह्माजी के अन्य मानस पुत्रों ने भी प्रजाओं का सृजन किया। सृष्टि पर्याप्त रूप से फैल गयी। फिर देवेश्वर की अध्यक्षता में दक्षप्रजापति का ब्रह्मयज्ञ आरम्भ हो गया।राजन् ! इतने में रुद्रदेव, जो तप करनेके लिये जल के भीतर गये थे, संसार और सुरगण की सृष्टि करने के विचारसे जल से बाहर निकले।

उन्होंने सुना- 'यज्ञ हो रहा है और उसमें देवता, सिद्ध एवं यक्ष आये हुए हैं।' फिर तो उन्हें क्रोध हो आया। अतः सोचा और कहा-'अरे, तेजस्विनी अपनी कन्या तथा मेरा तिरस्कार करके मूर्खता-वश इसने किस प्रकार जगत्की सृष्टि कर ली ?

हा, हा- इसे ऐसा नहीं करना चाहिये'

यों कहते-कहते रोष से उनका शरीर चतुर्दिक् उद्दीप्त हो उठा। साथ ही उनके मुँह से ज्वालाएँ निकलने लगीं। वे ही अनेक भूत, पिशाच, वेताल एवं योगियों के झुंड बनकर विचरने लगीं। जब समस्त आकाश, पृथ्वी, सारी दिशाएँ तथा लोक आदि उन भूतोंसे भर गये तो उन रुद्रने सर्वज्ञता के प्रभाव से चौबीस हाथ लम्बा एक धनुष बनाया।

तेहरी बटी रस्सी से उसकी प्रत्यञ्चा बनायी और क्रोध के कारण दो दिव्य तरकस तथा बाणों को ले लिया और उससे उन्होंने पूषा के दाँत तोड़ डाले, भग नामक मुनि की आँखें निकाल लीं और क्रतु देवता के अण्डकोष काटकर गिरा दिये। बाणविद्ध होकर क्रतु देवता यज्ञवाट् से (यज्ञशालासे) भाग चले। वायु ने उनका मार्ग रोक दिया। यज्ञ नष्ट-भ्रष्ट हो गया। देवता यज्ञ के पशु से बन गये। तब सबने भगवान् रुद्र की शरण ली। ब्रह्माजी ने वहाँ पहुँचकर रुद्र को गले से लगाया। वहाँ वे देवता भी उन्हें दिखायी पड़े, जिनका रुद्र ने अपकार किया था और जो भक्ति के साथ उनकी शरण में पहुँचे थे।

बातें विदित हो जाने पर देवाधिदेव ब्रह्माजी रुद्र की ओर देखते हुए बोले- 'तात ! अब क्रोध करना ठीक नहीं है; क्योंकि क्रतु-यज्ञ देवता तो यहाँ से भाग गये हैं।'

ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर रुद्र क्रोध से भर गये और कहने लगे - 'देवेश्वर ! आपने सर्वप्रथम मुझे बनाया है; किंतु ये लोग इस यज्ञ में मुझे भाग नहीं दे रहे हैं; इसीलिये मैंने इन्हें विकृत कर दिया तथा इनका ज्ञान हर लिया है।'

ब्रह्माजी ने कहा- 'देवताओ ! तुमलोग तथा समस्त असुर ज्ञान
प्राप्त करने के लिये उच्च स्वर से स्तोत्रों को पढ़कर इन महाभाग शम्भु की ऐसी आराधना करो, जिसके फलस्वरूप भगवान् रुद्र प्रसन्न हो जायँ। इनकी प्रसन्नता-मात्र से सर्वज्ञता सुलभ हो जाती है।'

ब्रह्माजी के ऐसा कहने पर वे देवता भगवान् रुद्र की स्तुति करने लगे। देवगण बोले - महात्मन् ! आप देवताओं के अधिष्ठाता, तीन नेत्रवाले, जटा-मुकु टसे सुशोभित तथा महान् सर्पका यज्ञोपवीत पहनते हैं। आपके नेत्रों का रंग कुछ पीला और लाल है। भूत और वेताल सदा आपकी सेवा में संलग्न रहते हैं। ऐसे आप प्रभु को हमारा नमस्कार है। भग के नेत्र को बींधनेवाले भगवन् ! आपके मुख से भयंकर अट्टहास होता है। कपर्दी और स्थाणु आपके नाम हैं। पूषा के दाँत तोड़ने वाले भगवन् ! आपको हमारा नमस्कार है।

महाभूतोंके संरक्षक प्रभो! आपको हम नमस्कार करते हैं। प्रभो ! भविष्य में वृषभ या धर्म आपकी ध्वजा का चिह्न होगा और त्रिपुर का आप विनाश करेंगे। साथ ही आप अन्धकासुर का भी हनन करेंगे। भगवन् ! आपका कैलास पर सुन्दर निवास-स्थान है। आप हाथी का चर्म वस्त्ररूप से धारण करते हैं। आपके सिरबका ऊपर उठा हुआ केश सबको भयभीत कर देता है अतः आपका 'भैरव' नाम है। प्रभो! आपको हमारा बारंबार नमस्कार है। देवेश्वर ! आपके तीसरे नेत्र से आग की भयंकर ज्वाला निकलती रहती है। आपने चन्द्रमा को मुकुट बना रखा है। आगे आप कपाल धारण करनेका नियम पालन करेंगे। ऐसे आप सर्वसमर्थ प्रभु को हमारा नमस्कार है।

प्रभो! आपके द्वारा 'दारुवन' का विध्वंस होगा। नीले कण्ठ एवं तीखे त्रिशूल से शोभा पानेवाले भगवन् ! आपने महान् सर्प को कङ्कण बना रखा है, ऐसे तिग्म त्रिशूली (तेज त्रिशूलवाले) आप देवेश्वर को नमस्कार है। यज्ञमूर्ते ! आप हाथ में प्रचण्ड दण्ड धारण करते हैं। आपके मुख में वडवानल का निवास है।

वेदान्त के द्वारा आपका रहस्य जाना जा सकता है। ऐसे आप प्रभु को बारंबार नमस्कार है। शम्भो ! आपने दक्ष के यज्ञ का विध्वंस किया है। शिव! जगत् आपसे भय मानता है। भगवन् ! आप विश्वके शासक हैं। विश्व के उत्पादक तथा कपर्दी नाम के जटाजूट को धारण करने वाले महादेव ! आपको नमस्कार है।

इस प्रकार देवताओं द्वारा स्तुति किये जाने पर प्रचण्ड धनुषधारी सनातन शम्भु बोले- 'सुरगणो ! मैं देवताओं का अधिष्ठाता हूँ। मेरे लिये जो भी काम हो, वह बताओ।'

देवताओं ने कहा - प्रभो! आप यदि प्रसन्न हैं तो हमें वेदों एवं
शास्त्रों का सम्यक् प्रकार से ज्ञान यथाशीघ्र प्रदान करने की कृपा करें। साथ ही रहस्यसहित यज्ञों की विधि भी हमें ज्ञात हो जाय।

महादेव जी बोले - देवताओ ! आप सब-के-सब एक ही साथ
पशु का रूप धारण कर लें और मैं सबका स्वामी बन जाता हूँ, तब आप सभी अज्ञान से मुक्ति पा जायँगे।

फिर देवताओं ने भगवान् शम्भुसे कहा- 'बहुत ठीक, ऐसा ही होगा। अब आप सर्वथा पशुपति हो गये।' उस समय ब्रह्माजी का अन्तःकरण प्रसन्नता से भर गया। अतः उन्होंने उन पशुपतिसे कहा- 'देवेश! आपके लिये चतुर्दशी तिथि निश्चित है-इसमें कोई संशय नहीं। जो द्विज उस चतुर्दशी तिथि के दिन श्रद्धापूर्वक आपकी उपासना करें, गेहूँ से तैयार किये पक्वान्न द्वारा अन्य ब्राह्मणोंको भोजन करायें, उन पर आप परम संतुष्ट हों और उन्हें उत्तम स्थान का अधिकारी बना दें।'

इस प्रकार अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजीके कहने पर भगवान् रुद्र ने पूषा के दाँत तथा भग के नेत्र पूर्ववत् कर दिये। फिर सभी को यज्ञ की समाप्ति का फल भी प्रदान किया तथा देवताओं के अन्तःकरण में परम विशुद्ध सम्पूर्ण ज्ञान भर दिया। इस प्रकार परब्रह्म परमात्माने पूर्वकालमें रुद्र को प्रकट किया था। इसी कार्य का सम्पादन करने से वे देवताओं के अधिष्ठाता कहलाते हैं।

जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर प्रतिदिन इस कथा का श्रवण करता है, वह सम्पूर्ण पापों से छूटकर भगवान् रुद्र के लोक को प्राप्त करता है।

27/12/2025

*त्रयोदशी तिथि कथा*

कथा का स्रोत- वराह पुराण
इस कथा के वक्ता- महातपा मुनि
श्रोता- राजा प्रजापाल
पाठक - हमसब

इस कथा के अनुष्ठान का लाभ है ;-

*पाप का क्षय, सुख की प्राप्ति, मन की शांति, और मृत्युपरांत स्वर्गलोक में देवताओं के साथ वास ।*

यह कथा महातपा मुनि राजा प्रजापाल को सुना रहे है । महातपा भगवान शिव के 1008 नामों में एक नाम भी है ।

महातपाजी कहते हैं - राजन् ! धर्म बड़े आदर के पात्र हैं। नरेन्द्र ! उनकी उत्पत्ति, महिमा और तिथि का प्रसङ्ग कहता हूँ, सुनो। जिन्हें परब्रह्म परमात्मा कहते हैं तथा जिन शुद्धस्वरूप प्रभु की सत्ता सदा बनी रहती है, पहले केवल वे ही थे। उनके मन में प्रजाओं की रचना करने का विचार उत्पन्न हुआ।
फिर उन प्रजाओं की रक्षा का उपाय सोचने लगे। वे इस चिन्ता में लगे ही थे कि इतने में उनके दक्षिण अङ्ग से एक पुरुष प्रकट हो गया।

उसके कानों में श्वेत कुण्डल, गले में श्वेत माला थी और वह सफेद रङ्ग का अनुलेपन लगाये हुए था। उसके चार पैर थे तथा उसकी आकृति बैल की थी। फिर उस पुरुष को देखकर परम प्रभु ने कहा- 'साधो ! तुम इन प्रजाओं की रक्षा करो। मेरे द्वारा तुम जगत् में प्रधान बना दिये जाते हो।' भगवान् नारायण की आज्ञा से वह पुरुष वैसा ही हो गया। सत्ययुग में उसके सत्य, शौच, तप और दान - ये चार पैर थे, त्रेता में तीन तथा द्वापर में दो। कलियुग में वह दानरूपी एक पैर से ही प्रजाओं का पालन करने लगा।

●ब्राह्मणों के लिये उसने अध्ययन अध्यापन एवं यजन-याजनादि छः रूप बनाये।

●क्षत्रियों के लिये दान, यजन एवं अध्ययन इन तीन रूपों से,

●वैश्यों के लिये दो रूपों से तथा शूद्रों के लिये केवल एक सेवारूप से ही सम्पन्न होकर वह सर्वत्र विराजने लगा।

यह शक्तिशाली पुरुष सम्पूर्ण द्वीपों तथा तलातलों में व्याप्त हो गया। प्रकारान्तर से द्रव्य, गुण, क्रिया और जाति- ये चार इसके पैर कहे गये हैं। वेद में कहा गया है- संहिता, पद और क्रम - ये तीन उसके सींग हैं। आदि और अन्त में स्थान पाये हुए दो सिरों से वह शोभा पाता है। उसके सात हाथ हैं। उदात्त, अनुदात्त और स्वरित-इन तीन स्वरोंसे वह सदा बद्ध रहता है। इस प्रकार से वह धर्म व्यवस्थित हुआ।

राजन् ! कुछ समय के बाद उस धर्म को विचित्र कर्म करने वाले चन्द्रमा के कारण महान् दुःख हुआ। बृहस्पति चन्द्रमा के भाई हैं। चन्द्रमा के मन में बृहस्पति की स्त्री तारा को ग्रहण करने की इच्छा जग उठी। इस निन्दित कर्म से धर्म का मन उद्विग्न हो गया। अतः वह वहाँ से चला और एक गहन वन में पहुँचकर वहीं रहने लगा। धर्म के वन में चले जाने पर सम्पूर्ण देवता तथा दानवों के सैनिक धर्महीन हो गये।

फिर देवता दानवों को मारने के लिये घूमने लगे तथा वैसे ही दानवों का भी देवताओं के घर पर चक्कर लगाना आरम्भ हो गया। राजन् ! उस समय धर्म के न रहने से सभी मर्यादाएँ छिन्न-भिन्न हो गयीं। महाभाग ! चन्द्रमा के दोष से देवता और दानव सभी परस्पर द्वेष के भाजन बन गये। उन्होंने अनेक प्रकार के आयुधों को हाथ में ले लिया और वे परस्पर युद्ध करने लगे। उस संग्राम का कारण केवल स्त्री थी।

नारदजी बड़े विनोदी हैं। दानवों के साथ लड़ते हुए क्रोधी देवताओं को देखकर वे तुरंत अपने पिता ब्रह्माजी के पास गये और इसकी सूचना दी। ब्रह्माजी सम्पूर्ण प्राणियों के पितामह हैं। अतः हंसपर आरूढ़ हो युद्धस्थल में जाकर उन्होंने सबको मना किया। फिर उन्होंने उनसे पूछा - 'इस समय तुमलोगों का यह युद्ध किसलिये हो रहा है?'

तब उन सबने उत्तर दिया- 'भगवन् ! यह चन्द्रमा ही सभी अनर्थों का कारण है। यह अपनी बुद्धि से इस लड़के को अपना बताता है। इस दूषित कर्म से दुःखी होने के कारण धर्म गहन वन में जाकर निवास कर रहे हैं।'

तब ब्रह्माजी ने उसी क्षण देवताओं और दानवों को साथ लिया तथा वन की ओर चल पड़े। वहाँ जाकर देखा कि धर्म वृषभ का वेष बनाकर चार पैरों से विराजमान हैं। चन्द्रमा के समान सफेद उनके सींग हैं और वे इधर-उधर विचर रहे हैं।

फिर ब्रह्माजी ने उपस्थित देवताओंसे कहा- ब्रह्माजी बोले- 'देवताओ! यह मेरा प्रथम पुत्र है। इस महामुनि को लोग धर्म कहते हैं। भाई की भार्या से अवैध राग करने वाले चन्द्रमा के व्यवहार से इसे अत्यन्त व्यथा हो रही है। अतः तुम सभी देवता और दानव अब इसे संतुष्ट करने का प्रयत्न करो, जिसके फलस्वरूप पुनः सम्पूर्ण सुरों एवं असुरों की सम स्थिति हो जाय।' राजन् ! उस समय ब्रह्माजी के वचन से देवताओं और दानवों को धर्म की बातें विदित हो गयीं। उन्हें बड़ा हर्ष हुआ। अतएव सबलोग चन्द्रमा के समान स्वच्छ वर्णवाले धर्म की स्तुति करने में तत्पर हो गये।

देवताओं ने कहा- जगत् की रक्षा करनेवाले महाभाग ! तुम्हारा वर्ण चन्द्रमा के समान उज्ज्वल है। तुम्हें बार बार नमस्कार है। देवरूप धारण करनेवाले प्रभो! तुम्हारी कृपा से स्वर्ग का मार्ग दीख जाता है। तुम कर्ममार्ग के स्वरूप हो तथा सब जगह विराजते हो। तुम्हें बार-बार नमस्कार है। पृथ्वी के पालक तथा तीनों लोकों के रक्षक एकमात्र तुम्हीं हो। जनलोक, तपोलोक तथा सत्यलोक सभी तुमसे सुरक्षित रहते हैं। स्थावर एवं जङ्गम-कोई भी प्राणी ऐसा नहीं है, जो तुम्हारे बिना स्थित रह सके। तुम्हारे अभाव में तो यह जगत् तुरंत ही नष्ट हो सकता है। तुम सम्पूर्ण प्राणियों की आत्मा हो। सज्जन पुरुषोंके हृदय में सत्त्वस्वरूप धारणकर तुम शोभा पाते हो। राजस पुरुषों में राजस और तामस पुरुषों में तामसरूप तुम्हारा ही है। तुम्हारे चार चरण हैं। चारों वेद तुम्हारे सींग हैं। तीन नेत्र तुम्हारी शोभा बढ़ाते हैं। हाथों की संख्या सात है। तुम तीन बन्धवाले हो। ऐसे वृषभरूपी प्रभो ! तुम्हें नमस्कार है।

'चत्वारि शृङ्गा त्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य। त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महो देवो मर्त्यान् आ विवेश।' (ऋग्वेद ४। ५८ । ३) इस वेदमन्त्रमें भी यही भाव व्यक्त हुआ है।

देव ! तुम्हारी अनुपस्थिति में हम विपथगामी एवं मूर्ख बन गये हैं। तुम हमारे परम आश्रय हो। अतः हमें सन्मार्ग बताने की कृपा करो। जब इस प्रकार देवताओं ने स्तुति की तो प्रजापालक धर्म, जो वृषभके रूप से पधारे थे, संतुष्ट हो गये। उनका मन प्रसन्न हो गया।

फिर तो उनके शान्तस्वरूप नेत्र ने ही उन्हें सन्मार्ग बता दिया। उनकी केवल दृष्टि पड़ने से ही वे देवता धार्मिक नेत्र से देखने लगे। एक क्षण में ही उनका अज्ञान नष्ट हो गया। वे सम्यक् प्रकार से सद्धर्म-सम्पन्न हो गये। असुरों की स्थिति भी वैसी ही हो गयी। तब ब्रह्माजी ने धर्मसे कहा - 'धर्म ! आज से तुम्हारे लिये त्रयोदशी तिथि निश्चित कर देता हूँ। जो पुरुष इस तिथि के दिन उपवास करके तुम्हारी पूजा करेगा, वह पापी हो नेपर भी पापमुक्त हो जायगा।

धर्म ! तुममें प्रभूत सामर्थ्य है। तुम इस अरण्यमें बहुत समयतक निवास कर चुके हो, इसलिये यह वन 'धर्मारण्य' नाम से विख्यात होगा। प्रभो! चार, तीन, दो और एक चरण से युक्त होकर तुम कृत, त्रेता आदि युग में जिस प्रकार लक्षित होते हो, उसी प्रकार पृथ्वी और आकाश में रहकर विश्व को अपना घर मानते हुए उसकी रक्षा करो।'

राजन् ! इतनी बातें कहकर लोकपितामह ब्रह्माजी देवताओं और दानवों के देखते-देखते अन्तर्धान हो गये। देवताओं का शोक दूर हो गया। वे वृषभ का वेष धारण करनेवाले धर्म के साथ अपने लोक को चले गये। जो पुरुष त्रयोदशी के दिन श्राद्ध करते समय धर्म की उत्पत्ति का यह प्रसङ्ग पितरों को सुनायेगा एवं भक्ति के साथ दूध से तर्पण करेगा, वह स्वर्ग में जाकर देवताओं के साथ सुखपूर्वक निवास करने का अधिकारी होगा।

27/12/2025

*द्वादशी तिथि कथा*

कथा के वक्ता है - महातपा मुनि
श्रोता है - राजा प्रजापाल
पाठक है - हम सब

मुनिवर महातपा कहते हैं - राजन् ! यह जो मनु का नाम और मनुत्व (मन्त्र) पढ़ा जाता है तथा उसमें जो मन्त्र-शक्ति है (वह चाहे वैदिक या तान्त्रिक कुछ भी हो) प्रयोजनवश स्वरूपतः मूर्तिमान् विष्णु ही है। राजन् !

भगवान् नारायण सर्वश्रेष्ठ परम पुरुष हैं। उन परम प्रभु के मन में सृष्टि विषयक संकल्प उत्पन्न हुआ। उन्होंने सोचा- 'मैंने जगत की रचना तो कर दी, फिर पालन भी तो मुझे ही करना है। यह सारा कर्म प्रपञ्च है। सम्यक्-रूप से स्वरूप धारण किये बिना यह कार्य सम्पन्न नहीं हो सकता है। अतः एक ऐसी सगुण मूर्ति का निर्माण करूँ, जिससे इस जगत् की रक्षा हो सके।'

राजन् ! परब्रह्म परमात्मा का संकल्प सत्य होकर रहता है। वे प्रभु इस प्रकार विचार कर ही रहे थे, इतने में एक प्राक्तनी विशिष्ट स्वरूप-धारिणी सृष्टि उनके सामने प्रकट हो गयी। इसमें स्वयं पुराणपुरुष भगवान् नारायण ही प्रकट हो गये और उन्होंने लोकत्रय को अपने वैष्णव शरीर में प्रविष्ट होते देखा। फिर वह प्रभु के शरीर से बाहर आया। उस अवसर पर उन्हें अपने प्राचीन वरदान की बात याद आयी, जो भगवान ने संतुष्ट होकर वाणी आदि को दिया था।

यह बहुत पुराना प्रसङ्ग है। भगवान् नारायण ने वर देते हुए कहा था- 'तुम्हें सभी वस्तुएँ विदित होंगी। तुम सबके कर्ता होओगे। सम्पूर्ण प्राणिवर्ग तुम्हें नमस्कार करेगा। तुम्हारे द्वारा तीनों लोकों की रक्षा होगी। अतः तुम 'विष्णु' नाम धारण करो। तुम सनातन पुरुष हो। देवताओं और ब्राह्मणों की सम्यक् प्रकार से सदा रक्षा करना तुम्हारा कर्तव्य है। देव ! तुम्हें सर्वज्ञता प्राप्त हो जाय इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं है।

इस प्रकार वर देकर भगवान् नारायण अपने प्राकृत रूप में स्थित हो गये। फिर अब विष्णु को भी पहले की बात ध्यान में आ गयी। सोचा- 'अरे! मैं तो वही शक्तिसम्पन्न पुरुष हूँ।' तब उन महान् तपस्वी प्रभुने ऐश्वर्य के प्रभाव से योगनिद्रा का स्मरण किया। वे देवी आ गयीं। स्त्री-पुरुषके संयोग से उत्पन्न होने वाली प्रजाओं का भार उनपर सौंप दिया।

'मैं उन परम प्रभु भगवान् नारायण का ही तो रूप हूँ' - ऐसा विचारकर वे फिर सो गये। सो जाने पर उनकी नाभि से एक बड़ा-सा कमल निकला। सात द्वीपोंवाली पृथ्वी, समुद्र और वन-ये सब-के-सब उस कमल पर विराजमान थे। उस कमल के रूप का विस्तार आकाश से पाताल तक फैला था। उसकी कर्णिकापर सुमेरु पर्वत सुशोभित हो रहा था। सबके बीच में ब्रह्माजी थे। अपने ऐसे वैराज रूप को प्रत्यक्ष देखकर परम पुरुष परमात्मा को बड़ा हर्ष हुआ। फिर उनके भीतर जो पवनदेव थे, उन्होंने व्यवहार के लिये वायुका सृजन किया।

साथ ही कहा- 'तुम अज्ञान पर विजय करने वाले ज्ञान स्वरूप इस शङ्ख का रूप धारण करो।'

फिर श्रीहरिसे कहा-'अज्ञान का नाश करने के लिये तुम्हारे हाथ में यह तलवार सदा शोभा पाती रहे। अच्युत ! भयंकर काल-चक्र को काटने के लिये यह चक्र धारण कर लो। केशव ! पापराशि नष्ट हो जाय, एतदर्थ यह गदा धारण करना आवश्यक है। समस्त भूतों को उत्पन्न करने वाली यह वैजयन्ती माला तुम्हारे कण्ठ में सदा सुशोभित होती रहे। चन्द्रमा और सूर्य - ये दोनों श्रीवत्स और कौस्तुभ के स्थान पर शोभा पायें। पवन चलने में सबसे पराक्रमी कहा गया है। वह तुम्हारे लिये गरुड बन जाय। तीनों लोकों में विचरने वाली देवी लक्ष्मी सदा आपकी आश्रिता रहें। आपकी तिथि द्वादशी हो और आप अपने अभीष्ट रूप से विराजें। इस द्वादशी तिथिके दिन स्त्री अथवा पुरुष- जो कोई भी आपके प्रति श्रद्धा रखते हुए घृतके आहार पर रहे, वह स्वर्ग में स्थान पानेका अधिकारी हो जाय।'

(मुनिवर महातपा कहते हैं- राजन् !) वही परम पुरुष
भगवान् नारायण 'विष्णु' इस नाम से विख्यात हुए। देवता और दानव- ये सब उन्हीं की मूर्तियाँ हैं। स्वयं वे ही अपने-आप विभिन्न रूप धारण करते हैं। उनके द्वारा किसी का संहार होता है तो किसी की रक्षा होती है। उन्हें 'वेदान्तपुरुष' कहा जाता है। वे ही प्रभु प्रत्येक युग में सब जगह विचरते हैं। जो उन्हें मनुष्य मानता है, उसे बुद्धिहीन समझना चाहिये। पापों का नाश करने वाला यह प्रसङ्ग वैष्णव-सर्ग कहलाता है। जो इसका पठन करता है, वह स्वर्गलोक में जाकर परम पूज्य बन जाता है।

27/12/2025

*एकादशी तिथि कथा*

कथा का विषय है -
एकादशी तिथि के माहात्म्य के प्रसङ्ग में कुबेर की उत्पत्ति कथा

यह कथा संवाद है महातपा नाम के एक मुनि और प्रजापाल नाम के राजा का । महातपा भगवान शिव का 1008 नामो में एक नाम है ।

मुनिवर महातपा राजा प्रजापाल से कहते हैं -

राजन् ! अब एक कथा कहता हूँ। इसमें धन के स्वामी कुबेर की उत्पत्ति का वर्णन है। यह प्रसङ्ग पाप का नाश करने वाला है। पहले कुबेरजी वायु के रूप में अमूर्त ही थे। पश्चात् वे मूर्तिमान् बनकर उपस्थित हुए। परब्रह्म परमात्मा का जो शरीर है, उसी के अन्तर्गत वह वायु विराजता था। आवश्यकता के अनुसार वह क्षेत्र देवता बनकर बाहर निकला।

एक समय की बात है - ब्रह्माजी के मन में सृष्टि रचने की इच्छा हुई। तब उनके मुख से वायु निकला। वह बड़े वेग से स्थूल बनकर बह चला और उससे धूल की प्रचण्ड वर्षा होने लगी। फिर ब्रह्माजी ने उसे रोका और साथ ही कहा- 'वायो ! तुम शरीर धारण करो और शान्त हो जाओ।'

उनके ऐसा कहने पर वायु मूर्तिमान् बनकर कुबेर के रूप में उनके सामने उपस्थित हुए। तब ब्रह्माजी ने कहा- 'सम्पूर्ण देवताओं के पास जो धन है, वह केवल फलमात्र है। उन सबकी रक्षा का भार तुम्हारे ऊपर है। इस रक्षा कार्य के कारण जगत्में 'धनपति' नाम से तुम्हारी प्रसिद्धि होगी।' फिर अत्यन्त संतुष्ट होकर ब्रह्माजी ने उन्हें एकादशी का अधिष्ठाता बना दिया।

राजन् ! उस तिथि के अवसर पर जो व्यक्ति बिना अग्नि में पकाये स्वयं पके हुए फल आदि के आहार पर रहकर नियम के साथ व्रत करता रहता है, उसपर कुबेर अत्यन्त प्रसन्न होते हैं और वे उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण कर देते हैं।

धनाध्यक्ष कुबेर के मूर्तिमान् बनने की यह कथा सम्पूर्ण पापों का नाश करनेवाली है। जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक इसका श्रवण अथवा पठन करता है, उसके सारे मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। अन्त में वह स्वर्गलोक को प्राप्त करता है।

हमारी तरफ से नोट :-

कुबेर देवता को यक्ष का स्वरूप माना गया है । आपने श्रीखाटूश्याम जी, या अन्य कई मंदिरों में देखा होगा, की एकादशी के दिन मंदिरों में भारी भीड़ रहती है । श्रीखाटूश्याम जी यक्षस्वरूप ही माने गए है । शंकराचार्य जी ने तो भगवान शंकर के स्रोत में उन्हें " यक्षस्वरूपाय जटाधराय " कहा है । और शिवजी भी सबकी कामना पूर्ति करते है । एकादशी का दिन का अनुष्ठान यक्ष देवता को बल देता है । और उसके बदले में यक्ष देवता कुबेर हमे प्रसन्न कर देते है ,हम प्रसन्न होते है धन से, सो वह धन कुबेर देव हमे दे देते है ।

Address

Diyodar
385330

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when ચેહર ધામ ચગવાડા posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share

Category