बाबा गनेश्वर नाथ महादेव स्थान

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बाबा गनेश्वर नाथ महादेव।
26/03/2021

बाबा गनेश्वर नाथ महादेव।

बाबा गनेश्वर नाथ महादेव स्थान दर्शन 🙏
08/03/2021

बाबा गनेश्वर नाथ महादेव स्थान दर्शन 🙏

06/09/2020

20-25 साल बाद आपको रेफ़्यूजी कैंप में ना रहना पड़े इसलिए अपने धर्म, संस्कृति और राष्ट्र की रक्षा कीजिए।
जय श्री राम

माँ वैष्णो देवी का भोग जिसको चाहिए व बोले!!जय माता दी!!
28/05/2020

माँ वैष्णो देवी का भोग जिसको चाहिए व बोले
!!जय माता दी!!

ये है सोनु सुद जो भूखे को लौकडउन मे खाना खिलाने का पुन्य काम कर रहे है।ये फिल्मो मे विलन का रोल्स करते थे परंतु ये है रि...
28/05/2020

ये है सोनु सुद जो भूखे को लौकडउन मे खाना खिलाने का पुन्य काम कर रहे है।ये फिल्मो मे विलन का रोल्स करते थे परंतु ये है रियल हिरो। 😯😮👌👌👏👏

मधुबनी स्टेशन पर बनी फिल्म ‘मधुबनी- द स्टेशन ऑफ कलर’ को मिला राष्ट्रीय फिल्म अवॉर्डबिहार में एक मशहूर कहावत है कि घर की ...
24/02/2020

मधुबनी स्टेशन पर बनी फिल्म ‘मधुबनी- द स्टेशन ऑफ कलर’ को मिला राष्ट्रीय फिल्म अवॉर्ड

बिहार में एक मशहूर कहावत है कि घर की मुर्गी दाल बराबर| यह कहावत बिहार के मधुबनी पेंटिंग पर सटीक बैठता है| पूरी दुनिया मधुबनी पेंटिंग की कायल है मगर अपने राज्य और देश में यह वर्षों से उपेक्षित थी| हाल ही में मधुबनी रेलवे स्टेशन को मधुबनी पेंटिंग से सजाया गया तो देश और दुनिया में उसकी तारीफ की गयी|
भारतीय रेलवे ने उत्साहित होते हुए अपने ट्रेन के कोचों को भी मधुबनी पेंटिंग से सजाने लगी| पेंटिंग ने मीडिया का ध्यान अपनी आकर्षित किया|
हाल ही में इस वर्ष के राष्ट्रीय फिल्म पुरष्कारों का घोषणा किया गया है| राष्ट्रीय पुरष्कार विजेता फिल्म में एक फिल्म बिहार के मधुबनी पेंटिंग से सजाया गया मधुबनी रेलवे स्टेशन पर बनी फिल्म भी है| राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार बेस्ट नरेशन केटेगरी में मधुबनी- द स्टेशन ऑफ कलर को चुना गया है|

ज्ञात हो कि मधुबनी रेलवे स्टेशन पर विश्व का सबसे बड़ी पेंटिंग बनाई गई है| 7005 वर्ग फीट में बनी मधुबनी पेंटिंग ने मधुबनी रेलवे स्टेशन को एक अलग पहचान दी है| स्टेशन की खूबसूरती देखते ही बनती है|
बिहार के कई स्टेशनों की दीवारों को सजाने के बाद मधुबनी (मिथिला) पेंटिंग अब राज्य से चलनेवाली राजधानी और संपर्क क्रांति एक्सप्रेस की बोगियों पर भी उकेरी गई है। एक अक्टूबर 2018 को राजेंद्र नगर से नई दिल्ली जाने वाली राजधानी एक्सप्रेस (अप-डाउन) के सभी 22 बोगियों को मिथिला पेंटिंग से सजाया गया। ट्रेन के बाहरी दीवारों पर ज्यामितीय पैटर्न का उपयोग कर महीन रेखाओं वाली रंगीन चित्रकारी की गई है।

ज्ञात हो कि जानकारों के अनुसार मिथिला में सैकड़ों वर्षों से महिलाओं द्वारा घर की दीवारों पर मिथिला पेंटिंग बनाने का इतिहास रहा है। मैथिल महिलाएं घरों में त्योहार, पूजा या अन्य विशेष अवसरों पर ‘अड़िपन’ या अल्पना बनाती रही हैं। इन्हें ही बाद में चलकर मिथिला पेंटिंग की संज्ञा दी गई।

भारत नहीं बल्कि यहां हैं दुनिया की 5 सबसे बड़ी सोने की खान, जानिए इनके बारे में सबकुछ।उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के जन...
22/02/2020

भारत नहीं बल्कि यहां हैं दुनिया की 5 सबसे बड़ी सोने की खान, जानिए इनके बारे में सबकुछ।
उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के जनपद सोनभद्र (Sonbhadra) की सोन पहाड़ी में और हरदी क्षेत्र में बड़ी मात्रा में सोने का भंडार (Gold Mines) मिला है. जानिए दुनिया की पांच सबसे बड़ी सोने की खदान कहां मौजूद है

दुनिया की टॉप पांच सबसे बड़ी खदानों में पांचवें स्थान पर चिली में मौजूद नॉर्ट एबेरेटो खदान है. वहां कुल 2.32 करोड़ औंस सोना मौजूद है.

इस लिस्ट में चौथे स्थान पर लिहिर गोल्ड माइन है. जो आयरलैंड में मौजूद है. वहां 2.40 करोड़ औंस सोना मौजूद है.

दुनिया की टॉप तीसरी सबसे बड़ी खदान रूस के सर्बिया में मौजूद ओलंपियाड गोल्ड माइन है. वहां 3.20 करोड़ औंस सोना मौजूद है.

इस लिस्ट में दूसरे स्थान पर इंडोनेशिया में मौजूद ग्रासबर्ग गोल्ड माइन का नाम आता है. रिपोर्ट्स के मुताबिक यहां 2.60 करोड़ औंस सोना मौजूद है.

दुनिया में सबसे बड़ी खदान दक्षिण अफ्रीका में मौजूद है. साउथ डीप गोल्ड नाम की इस खदान में अनुमानित रूप से 3.28 करोड़ औंस सोना मौजूद है.

उगना महादेव मंदिर विस्फी मधुबनी।
22/02/2020

उगना महादेव मंदिर विस्फी मधुबनी।

बिहार के इस देवी मंदिर में होते हैं एक से बढ़कर एक चमत्कार, जानकर रह जाएंगे दंग!  बिहार प्राचीन काल से समृद्ध संस्कृति व...
18/02/2020

बिहार के इस देवी मंदिर में होते हैं एक से बढ़कर एक चमत्कार, जानकर रह जाएंगे दंग!


बिहार प्राचीन काल से समृद्ध संस्कृति वाला राज्य रहा है। रामायण काल से लेकर महाभारत तक में बिहार का जिक्र आया है। कई धर्मों का जन्म भी इस राज्य से हुआ है। इसी राज्य में एक प्राचीन मंदिर कैमूर जिले में स्थित है। इस मंदिर का संबंध मार्केण्डेय पुराण से भी है जिसमें शुंभ-निशुंभ के सेनापति चण्ड और मुण्ड के वध की कथा मिलती है। देवी के इस मंदिर में प्राचीन शिवलिंग का चमत्कार भक्तों को दिखता है तो माता की अद्भुत शक्ति की झलक भी यहां दिख जाती है। तो आइए हम देखें यहां माता का कौन का चमत्कार दिखता है…

माता के मंदिर में होता है चमत्कार!

हम जिस मंदिर के बारे में चर्चा कर रहे हैं वह बिहार का मुंडेश्वरी मंदिर है। इस मंदिर में केवल हिंदू ही नहीं अन्य धर्मों के लोग भी बलि देने आते हैं और आंखों के सामने चमत्कार होते देखते हैं। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि मां मुंडेश्वरी सच्चे मन से मांगी हर मनोकामना को पूरी करती हैं।
यहां बलि की प्रकिया है थोड़ी अलग

भारत के प्राचीन मंदिरों मे शुमार यह मंदिर कैमूर पर्वत की पवरा पहाड़ी पर 608 फीट ऊंचाई पर स्थित है। इस मंदिर में बलि की प्रकिया थोड़ी अलग है। मुंडेश्वरी मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां पशु बलि की सात्विक परंपरा है। यहां बलि में बकरा चढ़ाया जाता है, लेकिन उसका जीवन नहीं लिया जाता।

आंखों के सामने होता है चमत्कार

जब बकरे को माता के सामने लाया जाता है तो पुजारी मूर्ति को स्पर्श कराकर चावल बकरे पर फेंकता है। बकरा उसी क्षण अचेत, मृतप्राय सा हो जाता है। थोड़ी देर के बाद अक्षत फेंकने की प्रक्रिया फिर होती है तो बकरा उठ खड़ा होता है और इसके बाद ही उसे मुक्त कर दिया जाता है। यह चमत्कार आंखों के सामने जब होता है, तब आप यकीन नहीं कर पाते हैं कि आप 21वीं शताब्दी में हैं।

बिहार: ऐसा अनोखा गांव, जहां हर जाति के लिए है अलग-अलग मंदिरबिहार के नवादा जिले के मेसकौर प्रखंड का सीतामढ़ी गांव यूं तो ज...
17/02/2020

बिहार: ऐसा अनोखा गांव, जहां हर जाति के लिए है अलग-अलग मंदिर

बिहार के नवादा जिले के मेसकौर प्रखंड का सीतामढ़ी गांव यूं तो जगत जननी माता सीता की निर्वासन स्थली और लव-कुश की जन्मस्थली के रूप में विख्यात है, लेकिन यह गांव एक अलग मायने में अनोखा है। संभवत: यह देश का पहला गांव होगा, जहां अलग-अलग जातियों के एक दर्जन से अधिक मंदिर एक ही स्थान पर मौजूद हैं। सबसे खास बात यह है कि मंदिर में किसी के प्रवेश पर कोई प्रतिबंध नहीं है और आज तक कभी किसी जाति के लोगों में यहां तकरार जैसी नौबत नहीं आयी है। जातिगत मंदिरों के साथ एक अच्छा पहलू यह जुड़ा है कि यहां उसी जाति के पुजारी होते हैं। मंदिर सिर्फ पूजन के ही काम नहीं आता बल्कि यहां से सामाजिकता का भी बखूबी निर्वाह किया जाता है। सामाजिक सम्मेलन आपसी पहचान को मजबूती देने के काम आता है तो सीतामढ़ी मेले में आने वाले जातिगत लोग वैवाहिक बातों को तय कर रिश्ताबंदी को भी सुदृढ़ करते हैं।
अलग तरह का धार्मिक स्थल है सीतामढ़ी
सीतामढ़ी में माता सीता का मंदिर एकलौता ऐसी मंदिर है जहां सभी जाति के लोग पूजने को आते हैं। इसके अलावा अन्य सभी मंदिरों में उसी जाति के लोग पूजा-अर्चना करते हैं। वैसे किसी जाति का कोई भी व्यक्ति किसी अन्य जाति के मंदिर में बेहिचक आ-जा सकता है। इस पर कोई रोक नहीं है। सीता मंदिर के मुख्य पुजारी सीताराम पाठक बताते हैं कि भगवान राम ने लंका विजय के बाद अयोध्या वापसी के क्रम में धोबी के ताना मारने पर जब माता सीता को निर्वासित किया था तब उन्होंने यहीं पनाह पाया था। माता सीता यहां 11 वर्षों तक रही थीं। किवंदति है कि 11 बाय 16 फीट के एक चट्टान पर माता सीता के आग्रह पर भगवान विश्वकर्मा ने मंदिर का निर्माण किया था। यहीं पर बने एक गुफा में लव और कुश का जन्म हुआ था। ग्रामीण बताते हैं कि आजादी से पूर्व भी कुछ मंदिरों का निर्माण कराया गया था। कबीर मठ मंदिर सबसे पुराना मंदिर है। यह रवि दास का मंदिर है। इसके पुजारी सुरेश राम हैं। राजवंशी ठाकुरबाड़ी में भगवान बजरंगबली की मूर्ति है लेकिन इसके भक्त और पुजारी राजवंशी समाज के हैं। इसी प्रकार चंद्रवंशी कहार समाज का भी अपना मंदिर है और उसमें उनके कुल देवता मगधेश जरासंध के अलावा भगवान राम लक्ष्मण और हनुमान की भी प्रतिमा स्थापित हैं। इसी प्रकार से चौहान समाज का चौहान ठाकुरबाड़ी, कोयरी समाज का बाल्मीकि मंदिर, चौधरी पासी जाति के लिए शिव मंदिर, सोनार जाति के भगवान नरहरि विश्वकर्मा मंदिर, यादवों के लिए राधा कृष्णा मंदिर यहां मौजूद है। ब्रह्मर्षि मुसहर समाज का शबरी मंदिर अपने आप में अनोखा है जो भगवान के भक्त की स्मृति में है। यहां माउंटेन कटर बाबा दशरथ मांझी की स्मृतियां भी सहेजी गयी हैं। ठाकुर नाई जाति का मंदिर समेत तमाम मंदिर यहां अपनी खूबियों के कारण प्रसिद्ध हैं। फिलहाल भूमिहार जाति का मंदिर निर्माणाधीन है।
सामाजिक सद्भाव का देता है संदेश
ग्रामीण कहते हैं कि आये दिन छोटे-मोटे कारणों को लेकर अक्सर लोग आपस में लड़ जाते हैं। मगर यह गांव सामाजिक सद्भाव की मिसाल है। अलग-अलग जातियों के मंदिर होते हुए भी इस गांव के लोग सामाजिक सद्भाव की परम्परा के वाहक बने हैं। आजतक जात-पात को लेकर इस गांव में किसी का किसी से विवाद नहीं हुआ। यह गांव अनेकता में एकता का सन्देश देता है।

ऐतिहासिक धरोहर बख्तियार खॉ का किला बदहालकैमूर : जिले के चैनपुर प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत स्थापित ऐतिहासिक धरोहर बख्तियार खा...
17/02/2020

ऐतिहासिक धरोहर बख्तियार खॉ का किला बदहाल

कैमूर : जिले के चैनपुर प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत स्थापित ऐतिहासिक धरोहर बख्तियार खान का किला घोर प्रशासनिक उदासीनता के कारण बदहाल है । बता दें कि इंतजामिया कमेटी की बेवसी का आलम यह है कि इस किले का शुद्धि लेने वाला कोई नहीं है ।

नतीजतन बख्तियार खान का किला दिन-प्रतिदिन कंटीली झाड़ियों से घिरते जा रहा है । अब यह धरोहर जंगल की शक्ल में बदलता जा रहा है। इतना ही नहीं इन झाड़ियों की वजह से बरसात के दिनों में क़िले के अंदर सांप-बिच्छू अौर किडे- मकोड़े अपना बसेरा बना लेते हैं ।

इस किले छज्जा मरम्मति के अभाव में टूट रहा है ।

इसके अलावा प्रशासनिक बेरूखी की वजह से इस किले का सैकड़ों एकड़ भूमि भू माफियाओं के कब्जे में चला गया है । फिर भी इस महान शासक के द्वारा निर्मित ऐतिहासिक किले का संरक्षण के प्रति शासन या प्रशासन कोई गंभीर नहीं है । जानकार बताते हैं कि बख्तियार खान शेरशाह सूरी के भाई नेजा़म खान के पूत्र थे और साथ ही रिश्ता में बख्तियार खान शेरशाह सूरी के दामाद भी थे । इतिहासकारों का मानना है कि बख्तियार खान का कैमूर आने के दो कारण थे ।

पहला यह कि मुस्लिम शासक बादशाह हूंमायू जब शेरशाह सूरी पर चढ़ाई की तो उस समय चैनपुर का राजा शालीवाहन ने शेरशाह सूरी की मूखबिरी की थी । दूसरा कारण यह था कि राजा शालीवाहन के जूल्म से इलाके की जनता त्रस्त थी, तो शेरशाह सूरी ने अपने संरक्षक के रूप में बख्तियार खान को चैनपुर भेजा। इसके बाद चैनपुर प्रखंड स्थित ईसापुर के मैदान में बख्तियार खान और राजा शालीवाहन के बीच जमकर लड़ाई हूई ।

उस लड़ाई में राजा शालीवाहन को किसी तरह का कोई भी मदद नहीं मिल सका, जिससे डर कर राजा शालीवाहन चैनपुर में स्थित अपने किला में ही खुद को नज़र बन्द कर लिया । अन्तत: उस किला में ही राजा शालीवाहन की मौत हो गई। उस समय पूरे चैनपुर का इलाका हर्रे पेड़- पौधों से घिरा हुआ था और क्षेत्र की अति मनोरम दृश्य काफी मनमोहक थी । बताते है कि उस समय चैनपुर की जनसंख्या बहुत कम थी । जिस वजह से बख्तियार खान को यह इलाका काफी पसंद आया और यही पर उन्होंने अपना रहाइश गाह बना लिया। बख्तियार खान का यह किला चैनपुर स्थित कोहिरा नदी और मदूरना पहाड़ी के बीच में स्थित है ।

इस के किले के ठीक पश्चिमी छोर पर हज़रत सूफी उस्मान शाह का मकबरा है । इस संबंध में रजिउल्लाह खान ने बताया कि बृहस्पतिवार और शुक्रवार के दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं और पूरे किला सहित परिसर भ्रमण करने के बाद पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करने की वकालत करते हैं । बावजूद इसके यह किला शासन और प्रशासन की उपेक्षा का दंश झेल रहा है । अगर समय रहते इस किले की संरक्षण के लिए उचित कदम नहीं उठाया गया, तो इसका अस्तित्व मिट जाएगा ।
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