13/09/2026
हज़रत मुजद्दिद अल्फ़-ए-सानी रहमतुल्लाहि अलैहि ने यह शेर अपने मकतूब नम्बर 170 में बतौर-ए-इस्तिशहाद नक़्ल फ़रमाया है____________________ 👇
ہر کہ عاشق شد اگرچہ نازنینِ عالم است
ناز کی راست آید بار می باید کشید
"हर कि आशिक़ शुद अगरचे नाज़नीन-ए-आलम अस्त
नाज़ की रास्त आयद, बार मी बायद कशीद,,
यानी,
जो शख़्स आशिक़ हो गया, अगरचे वह दुनिया का नाज़नीन और नाज़-ओ-नेमत में पला हुआ ही क्यों न हो, इश्क़ की राह में नाज़ और आराम कहाँ चल सकता है; उसे इश्क़ का बोझ उठाना और उसकी मशक़्क़त बर्दाश्त करनी पड़ेगी_____