Shreedham

Shreedham श्रीराधाकृष्ण की भावभक्ती एवं दिव्यप्रेम का जीवन मे उदय हो और हम
आनंद को प्राप्त करे।।

एक ऐसे कथावाचक जिनके पास पत्नी के अस्थि विसर्जन तक के लिए पैसे नहीं थे ... तब मंगलसूत्र बेचने की बात की थी।यह जानकर सुखद...
14/08/2026

एक ऐसे कथावाचक जिनके पास पत्नी के अस्थि

विसर्जन तक के लिए पैसे नहीं थे ... तब मंगलसूत्र बेचने की बात की थी।

यह जानकर सुखद आश्चर्य होता है कि पूज्यनीय रामचंद्र डोंगरे जी महाराज जैसे भागवताचार्य भी हुए हैं जो कथा के लिए एक रुपया भी नहीं लेते थे 🙏 मात्र तुलसी पत्र लेते थे। जहाँ भी वे भागवत कथा कहते थे, उसमें जो भी दान दक्षिणा चढ़ावा आता था, उसे उसी शहर या गाँव में गरीबों के कल्याणार्थ दान कर देते थे। कोई ट्रस्ट बनाया नहीं और किसी को शिष्य भी बनाया नहीं।

अपना भोजन स्वयं बना कर ठाकुरजी को भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण करते थे। डोंगरे जी महाराज कलयुग के दानवीर कर्ण थे।

उनके अंतिम प्रवचन में चौपाटी में एक करोड़ रुपए जमा हुए थे, जो गोरखपुर के कैंसर अस्पताल के लिए दान किए गए थे। स्वंय कुछ नहीं लिया|

डोंगरे जी महाराज की शादी हुई थी। प्रथम रात के समय उन्होंने अपनी धर्मपत्नी से कहा था, "देवी मैं चाहता हूं कि आप मेरे साथ १०८ भागवत कथा का पारायण करें, उसके बाद यदि आपकी इच्छा होगी तो हम गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करेंगे'।

इसके बाद जहाँ जहाँ डोंगरे जी महाराज भागवत कथा करने जाते, उनकी पत्नी भी साथ जाती।१०८ भागवत कथा पूर्ण होने में करीब सात वर्ष बीत गए। तब डोंगरे जी महाराज पत्नी से बोले, *अब अगर आपकी आज्ञा हो तो हम गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर संतान उत्पन्न करें'।
इस पर उनकी पत्नी ने कहा, 'आपके श्रीमुख से १०८ भागवत कथा श्रवण करने के पश्चात मैंने गोपाल को ही अपना पुत्र मान लिया है, इसलिए अब हमें संतान उत्पन्न करने की कोई आवश्यकता नहीं है"। धन्य हैं ऐसे पति-पत्नी, धन्य है उनकी भक्ति और उनका कृष्ण प्रेम।

डोंगरे जी महाराज की पत्नी आबू में रहती थीं और डोंगरे जी महाराज देश दुनिया में भागवत कथा रस बरसाते थे।
पत्नी की मृत्यु के पांच दिन पश्चात उन्हें इसका पता चला। वे अस्थि विसर्जन करने गए, उनके साथ मुंबई के बहुत बड़े सेठ थे "रतिभाई पटेल जी" |
उन्होंने बाद में बताया कि डोंगरे जी महाराज ने उनसे कहा था ‘कि रति भाई मेरे पास तो कुछ है नहीं और अस्थि विसर्जन में कुछ तो लगेगा। क्या करें’ ? फिर महाराज आगे बोले थे, ‘ऐसा करो, पत्नी का मंगलसूत्र और कर्णफूल पड़ा होगा उसे बेचकर जो मिलेगा उसे अस्थि विसर्जन क्रिया में लगा देते हैं’।

सेठ रतिभाई पटेल ने रोते हुए बताया था....
जिन महाराजश्री के इशारे पर लोग कुछ भी करने को तैयार रहते थे, वह महापुरुष कह रहा था कि पत्नी के अस्थि विसर्जन के लिए पैसे नहीं हैं।

हम उसी समय मर क्यों न गए l
फूट फूट कर रोने के अलावा मेरे मुँह से एक शब्द नहीं निकल रहा था।

सनातन धर्म ही सर्वोपरि है । ऐसे संत और महात्मा आप को केवल सनातन संस्कृति में ही मिलते है। हमारे देश में बहुत सी बातें हैं जो हम सभी तक पहुंच नहीं पायी । हमारे देश की संस्कृति को हम सभी जाने यही प्रयास होना चाहिए।।
जय श्री राम
जय श्री हनुमान जी महाराज 🚩🙏

*ऐसे महान विरक्त महात्मा संत के चरणों में कोटी कोटी नमन भी कम है ।।जय श्री राम।।🙏

🌹 श्री ठाकुर जी की मनमोहक लीला 🌹आप सभी रसिक जन इस मधुर लीला का स्मरण करें—एक बार निकुंज में स्वामिनी जी के मन में एक मधु...
06/08/2026

🌹 श्री ठाकुर जी की मनमोहक लीला 🌹

आप सभी रसिक जन इस मधुर लीला का स्मरण करें—

एक बार निकुंज में स्वामिनी जी के मन में एक मधुर इच्छा जागी—
“प्रियतम! आज हम लुका-छिपी खेलेंगे।”

चारों ओर खुला मैदान था—
न कोई वृक्ष, न कोई लता, न कहीं छिपने का स्थान।
परन्तु स्वामिनी जी की आज्ञा थी,
तो प्रियतम ने मुस्कराकर कहा—
“जैसी आज्ञा, प्रिया जू।”

अब आधी सखियाँ प्रियाजी के पक्ष में हो गईं,
और आधी सखियाँ लाल जी के पक्ष में।

प्रियाजी ने कहा—
“प्यारे! पहले आप छिप जाइए।”

यह कहकर उन्होंने और उनकी सखियों ने आँखें बंद कर लीं।
जब आँखें खोलीं, तो अद्भुत दृश्य था—
जहाँ भी दृष्टि जाती, वहाँ केवल लाल जी ही दिखाई देते!
लाल जी और उनकी सभी सखियाँ—
सबका स्वरूप लाल जी जैसा ही हो गया था।

प्रियाजी ने कुछ क्षण ध्यान किया,
फिर आगे बढ़कर स्पर्श किया
और प्रियतम का हाथ पकड़कर बोलीं—
“प्रियतम! अब बाहर आ जाइए।”

लाल जी आश्चर्य में पड़ गए—
“प्रियाजी! आपने मुझे कैसे पहचान लिया?”

प्रियाजी मुस्कराकर बोलीं—
“यह बाद में बताऊँगी, अब हमारी बारी है।”

अब लाल जी और उनकी सखियों ने आँखें बंद कीं।
जब उन्होंने आँखें खोलीं, तो देखा—
पूरा मैदान मोगरे की कलियों के ढेर से भर गया है।

प्रियतम इधर-उधर खोजने लगे—
कभी यहाँ, कभी वहाँ…
बहुत देर तक खोजते रहे।

फिर एक स्थान पर जाकर बोले—
“प्यारी जू! अब आप बाहर आ जाइए।”

प्रियाजी बाहर आईं,
पर अब आश्चर्य उन्हें था—

उन्होंने तो स्पर्श करके प्रियतम को पहचाना था,
पर प्रियतम ने बिना स्पर्श किए ही उन्हें पहचान लिया!

उन्होंने पूछा—
“प्यारे! आपने कैसे पहचान लिया?”

लाल जी ने मधुर मुस्कान के साथ कहा—
“प्यारी जू! आपका स्वरूप, आपका प्रभाव और आपका सुभाव ही ऐसा है
कि आप कहीं छिप ही नहीं सकतीं।”

“आपकी सखियाँ जिन मोगरे की कलियों में छिपीं,
वे कलियाँ ही बनी रहीं।

पर जहाँ आप छिपीं—
वहाँ की सभी कलियाँ
आपके श्रीअंग के स्पर्श से खिलकर फूल बन गईं।”

“बस, उसी से मैंने आपको पहचान लिया।”

अब दोनों ही विजयी हुए—
तो निर्णय के लिए ललिता जी को बुलाया गया।

नियम के अनुसार तो लाल जी विजयी थे,
क्योंकि उन्होंने बिना स्पर्श के पहचान लिया था।

पर ललिता जी अत्यंत चतुर थीं।
उन्होंने कहा—
“लाल जी ने खोजने में बहुत देर कर दी,
इसलिए विजयी तो प्रियाजी ही हैं।”

सखियों ने हँसकर कहा—
“स्वामिनी जी जीत गईं,
तो हारने वाले को दंड मिलना चाहिए।”

प्रियाजी ने कहा—
“ललिता! तुम ही दंड निर्धारित करो।”

ललिता जी ने मधुर निर्णय दिया—
“लुका-छिपी खेलते-खेलते प्रियाजी थक गई हैं,
इसलिए अब लाल जी
प्रियाजी के चरणों की सेवा करेंगे।”

यह सुनकर सभी सखियाँ प्रसन्न हो उठीं।

यहाँ देखिए—
प्रियाजी जीतकर भी रस का दान करती हैं,
और लाल जी हारकर भी रस का पान करते हैं।

यही सखियों का मनोरथ है,
यही श्री राधा चरण की उपासना है।

यह रस-रीति केवल श्री वृन्दावन में ही समझ आती है—
जब हृदय में श्री वृन्दावनेश्वरी के चरण विराजमान हो जाते हैं।

🙏🏻🙏🏻
🌹 श्री ठाकुर जी की लीला का गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ 🌹

यह लीला केवल एक खेल नहीं है—
यह आत्मा और परमात्मा के अनन्त प्रेम का रहस्य है।

🔸 लुका-छिपी का खेल क्या है?
यह संसार ही वह मैदान है,
जहाँ भगवान स्वयं को छिपाते हैं
और जीव उन्हें खोजता है।

कभी भगवान छिपते हैं,
कभी भक्त…
पर खोज दोनों की चलती रहती है।

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🌿 जब श्रीकृष्ण (लाल जी) छिपते हैं…

हर दिशा में वही दिखाई देते हैं।
यह संकेत है—
परमात्मा सर्वव्यापक है।

परन्तु फिर भी,
भक्त उन्हें स्पर्श करके पहचानता है।

👉 यहाँ “स्पर्श” का अर्थ है —
अनुभव, साक्षात्कार, प्रेम का स्पंदन।

ज्ञान से नहीं,
तर्क से नहीं,
बल्कि प्रेम के स्पर्श से भगवान मिलते हैं।

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🌸 जब श्रीराधा (प्रियाजी) छिपती हैं…

सभी मोगरे की कलियाँ एक जैसी दिखाई देती हैं,
पर जहाँ श्रीराधा होती हैं—
वहाँ कलियाँ फूल बन जाती हैं।

👉 यह क्या बताता है?

जहाँ राधा हैं,
वहाँ निर्जीव भी चेतन बन जाता है।
जहाँ उनका स्पर्श है,
वहाँ सौंदर्य, माधुर्य और रस प्रकट हो जाता है।

🔹 राधा = परम शक्ति, परम प्रेम, ह्लादिनी शक्ति
🔹 उनका स्पर्श = जीवन में चेतना और आनंद का उदय

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🌼 कृष्ण ने बिना स्पर्श के कैसे पहचाना?

क्योंकि भगवान को
अपने प्रेम की पहचान के लिए
किसी बाहरी साधन की आवश्यकता नहीं।

👉 भगवान जानते हैं—
जहाँ प्रेम खिला है, वहाँ राधा हैं।

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💫 ललिता जी का निर्णय (रस का रहस्य)

नियम से कृष्ण जी जीतते,
पर ललिता जी ने राधा को जिताया।

👉 क्यों?

क्योंकि इस प्रेम में
जीत-हार का कोई अर्थ नहीं होता।

यहाँ हर स्थिति
रस को बढ़ाने के लिए होती है।

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🌺 दण्ड का रहस्य

कृष्ण को चरण सेवा का दण्ड मिला—

👉 यह दण्ड नहीं,
परम सौभाग्य है।

🔹 भगवान स्वयं भक्त के चरणों की सेवा करें—
यह भक्ति का सर्वोच्च शिखर है।

🔹 राधा जीतकर भी “रस देती हैं”
🔹 कृष्ण हारकर भी “रस पाते हैं”

👉 यही है वृन्दावन का अद्वितीय सिद्धांत —
जहाँ हार भी जीत है
और जीत भी समर्पण है।

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🌿 सहचरियों (सखियों) का भाव

सखियाँ कभी किसी को हराती नहीं—
वे केवल प्रेम को बढ़ाती हैं।

👉 उनका उद्देश्य है—
राधा-कृष्ण के मिलन में
अधिक से अधिक रस उत्पन्न करना।

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🕉️ इस लीला का सार

✨ भगवान सर्वत्र हैं—
पर प्रेम से ही पहचाने जाते हैं।

✨ राधा का स्पर्श जीवन को खिला देता है।

✨ सच्चे प्रेम में जीत-हार नहीं होती—
केवल आनंद और समर्पण होता है।

✨ भक्ति का चरम यह है—
कि भगवान भी भक्त के सामने
स्वयं को समर्पित कर देते हैं।

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🌹
जब हृदय में श्री राधा के चरण बस जाते हैं,
तब हर वस्तु, हर क्षण, हर श्वास
मोगरे की कली से फूल बन जाती है।

🙏 यही है वृन्दावन की रस-रीति 🙏

🙏 राधे राधे 🙏

शिव का मौन सत्य...।मनुष्य सोचता है कि उसकी सबसे बड़ी लड़ाई संसार से है।शिव मुस्कुराते हैं...संसार से तुम्हारी लड़ाई कभी ...
04/08/2026

शिव का मौन सत्य...।

मनुष्य सोचता है कि उसकी सबसे बड़ी लड़ाई संसार से है।

शिव मुस्कुराते हैं...

संसार से तुम्हारी लड़ाई कभी थी ही नहीं।
तुम्हारी लड़ाई तो उस "मैं" से है जो हर बात में स्वयं को सही मानता है।

जिस दिन यह "मैं" थोड़ा छोटा हुआ, उसी दिन शिव थोड़ा बड़े हो गए।

जिस दिन "मैं" पूरी तरह मिट गया,
उसी दिन केवल शिव रह गए।

याद रखो,

समय किसी को नहीं छोड़ता,यौवन नहीं टिकता,धन नहीं टिकता,संबंध भी हमेशा वैसे नहीं रहते।

यदि कुछ टिक सकता है, तो केवल तुम्हारे कर्मों की सुगंध और तुम्हारी चेतना की परिपक्वता।

इसलिए औघड़ संसार छोड़ने की बात नहीं करता, वह मोह छोड़ने की बात करता है।

क्योंकि वस्तु बाँधती नहीं,
आसक्ति बाँधती है।

जिस दिन खोने का भय समाप्त हो जाता है, उसी दिन पाने की दौड़ भी समाप्त हो जाती है, वहीं से शिव का द्वार खुलता है।

मिट्टी का सब खेल है, मिट्टी का अभिमान।
जो मिट्टी होकर जी गया, उसमें बसे भगवान॥

जय जय
🌷
🙏🏻

आप से निवेदन हैं कि आप महा भागवत सप्ताह का पाठ सात दिन में सात दिन का पाठ विस्तार पूर्वक लिखिए जी ताकि हम सभी लोग उसे सम...
04/08/2026

आप से निवेदन हैं कि आप महा भागवत सप्ताह का पाठ सात दिन में सात दिन का पाठ विस्तार पूर्वक लिखिए जी ताकि हम सभी लोग उसे समझ सके ओर अपने बच्चों को समझा सके आप से प्रार्थना है कि आप महा भागवत सप्ताह को जरूर लिखेंगे और हमारी प्रार्थना स्वीकार करेंगे।

आपकी भावना बहुत सुंदर है 🙏
पूरा श्रीमद्भागवत महापुराण सात दिन में विस्तार से लिखना बहुत बड़ा विषय है, लेकिन मैं इसे सरल, समझने योग्य और बच्चों को भी सिखाने योग्य “सप्ताह-पाठ (Day-wise)” रूप में प्रस्तुत है

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🌺 श्रीमद्भागवत सप्ताह — 7 दिन का सम्पूर्ण सार 🌺

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🌼 Day 1 — भागवत का महत्व और प्रारंभ

👉 मुख्य विषय: जीवन का उद्देश्य क्या है?

राजा परीक्षित को श्राप मिलता है — 7 दिन में मृत्यु निश्चित

वे सब कुछ छोड़कर गंगा किनारे बैठते हैं

वहाँ आते हैं शुकदेव जी

वे कहते हैं:
👉 “मनुष्य जीवन का अंतिम लक्ष्य है — भगवान की भक्ति”

📖 सीख:

समय सीमित है, इसलिए जीवन को सही दिशा दें

भक्ति ही जीवन का सार है

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🌼 Day 2 — सृष्टि रचना और भगवान के अवतार

👉 मुख्य विषय: भगवान की लीला और सृष्टि

सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन

विष्णु के विभिन्न अवतार:

मत्स्य

कूर्म

वराह

नरसिंह

📖 सीख:

जब-जब धर्म घटता है, भगवान अवतार लेते हैं

भगवान हमेशा अपने भक्तों की रक्षा करते हैं

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🌼 Day 3 — ध्रुव और प्रह्लाद की कथा

👉 मुख्य विषय: अटूट भक्ति

ध्रुव की कथा

अपमान सहकर भी भगवान की तपस्या

ध्रुव तारा बन गए

प्रह्लाद की कथा

पिता हिरण्यकशिपु के विरोध के बावजूद भक्ति

भगवान नरसिंह का प्रकट होना

📖 सीख:

सच्ची भक्ति में उम्र नहीं देखी जाती

भगवान हर परिस्थिति में भक्त की रक्षा करते हैं

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🌼 Day 4 — भगवान राम और कृष्ण जन्म

👉 मुख्य विषय: धर्म की स्थापना

भगवान राम की मर्यादा

श्रीकृष्ण का जन्म

📖 सीख:

भगवान हर युग में आते हैं

धर्म और सत्य की हमेशा विजय होती है

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🌼 Day 5 — श्रीकृष्ण की बाल लीलाएँ

👉 मुख्य विषय: प्रेम और आनंद

माखन चोरी

पूतना वध

कालिया नाग मर्दन

📖 सीख:

भगवान की लीला प्रेम से भरी होती है

बाल रूप में भी भगवान भक्तों का कल्याण करते हैं

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🌼 Day 6 — रासलीला और गोपी प्रेम

👉 मुख्य विषय: शुद्ध प्रेम

गोपियों का निष्काम प्रेम

रासलीला का दिव्य रहस्य

📖 सीख:

सच्चा प्रेम बिना स्वार्थ का होता है

भगवान को पाने का मार्ग — प्रेम और समर्पण

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🌼 Day 7 — उद्धव गीता और मोक्ष

👉 मुख्य विषय: वैराग्य और मुक्ति

उद्धव को उपदेश

संसार की नश्वरता का ज्ञान

अंत में परीक्षित को मोक्ष प्राप्त

📖 सीख:

यह संसार नश्वर है

भगवान की भक्ति ही मोक्ष का मार्ग है

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🌸 पूरे सप्ताह का सार

👉 क्या सिखाता है भागवत?

भक्ति ही जीवन का आधार है

भगवान हर जगह हैं

प्रेम, श्रद्धा और समर्पण से ही भगवान मिलते हैं

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🙏 बच्चों को कैसे समझाएँ (सरल तरीका):

कहानियों के रूप में सुनाएँ (ध्रुव, प्रह्लाद, कृष्ण)

हर दिन एक छोटी सीख दें

भक्ति को डर नहीं, प्रेम से जोड़ें

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🌺 अंत में प्रार्थना
हे भगवान, हमें ऐसा जीवन दें कि हम
👉 भक्ति करें
👉 सही मार्ग पर चलें
👉 और अपने बच्चों को भी धर्म का ज्ञान दे सकें

✨ हरि बोल | हरि बोल ✨

 #भगवानशिवपार्थिवलिंगपूजन कलियुग में पार्थिव शिवलिंग की पूजा करोड़ों यज्ञों का फल देने वाली मानी गयी है । भगवान शिव का क...
03/08/2026

#भगवानशिवपार्थिवलिंगपूजन
कलियुग में पार्थिव शिवलिंग की पूजा करोड़ों यज्ञों का फल देने वाली मानी गयी है । भगवान शिव का किसी पवित्र स्थान पर किया गया पार्थिव पूजन भोग और मोक्ष दोनों देने वाला है ।

शिवपुराण के अनुसार पार्थिव पूजन की एक वैदिक रीति है । वेदपाठी ब्राह्मणों को वैदिक रीति से शिवलिंग का पूजन करना चाहिए परन्तु सर्वसाधारण को दूसरी सामान्य रीति से पूजन करना चाहिए ।

पूजन में ध्यान रखने योग्य बातें।

▪️पार्थिव पूजन के लिए स्नान, शिखा बंधन आदि से निवृत्त होकर पहले भस्म और रुद्राक्ष की माला धारण कर लेनी चाहिए । यदि भस्म न हो तो शुद्ध मिट्टी का त्रिपुण्ड मस्तक पर लगा लेना चाहिए ।

▪️शिव पूजन सदैव उत्तर /पूर्व की ओर मुख करके ही करना चाहिए ।

▪️पूजा की सभी सामग्री पास ही रख लें ।
पूजन के बीच में उठना नहीं चाहिए ।

▪️पार्थिव पूजा के लिए शिवलिंग निर्माण के लिए मिट्टी पवित्र स्थान की होनी चाहिए । शमी या पीपल की जड़ की मिट्टी या विमौट (वल्मीक) अच्छी मानी जाती है या किसी पवित्र जगह से ऊपर के चार अंगुल मिट्टी हटाकर भीतर की मिट्टी लें या पवित्र नदियों के तटों की मिट्टी ले सकते हैं । जहां जो मिट्टी मिल जाये, उसी से शिवलिंग बनायें ।

▪️शिवपूजन में बिल्वपत्र अवश्य होने चाहिए ।

▪️पूजन में जिस सामग्री की कमी हो, उसको मानसिक भावना करके चढ़ा देनी चाहिए या उसके विकल्प के रूप में पुष्प व चावल चढ़ा दें ।

सर्वसाधारण के लिए पार्थिव शिवलिंग के पूजन की विधि।।
शिवपुराण में पार्थिव लिंग की पूजा भगवान शिव के नामों से बतायी गयी है जो सभी कामनाओं को पूरा करती है । इस प्रकार की पार्थिव पूजा भगवान शिव के आठ नामों—
हर, महेश्वर, शम्भु, शूलपाणि, पिनाकधृक्,
शिव, पशुपति और महादेव—के साथ की जाती है।

▪️सर्वप्रथम रक्षादीप जला लें । आचमन करके पवित्री धारण करें । (पवित्री न होने पर अंगूठी सीधे हाथ की अनामिका अंगुली में पहन लें ।)

▪️पूजन से पहले हाथ में पुष्प, अक्षत व जल लेकर संकल्प करें–’हे देव ! मैं आपका पार्थिव पूजन करना चाहता हूँ, आपकी कृपा से यह निर्विघ्न पूर्ण हो ।’ संकल्प सकाम या निष्काम दोनों हो सकता है ।

▪️भगवान शिव के प्रथम नाम हराय नम:’ का उच्चारण करके पार्थिव लिंग बनाने के लिए मिट्टी लें । मिट्टी को छानकर कंकड़ आदि निकाल दें । जल मिलाकर मिट्टी को गूंथ लें ।

▪️दूसरे नाम महेश्वराय नम:’ का उच्चारण करके लिंग का निर्माण करें । शिवलिंग तीन प्रकार के कहे गये हैं—जो शिवलिंग चार अंगुल ऊंचा और देखने में सुन्दर हो तथा वेदी से युक्त हो उसे ‘उत्तम’ कहा गया है । उससे आधे शिवलिंग को ‘मध्यम’ और उससे भी आधे को ‘अधम’ माना गया है ।

▪️फिर ‘ शम्भवे नम:’ बोलकर पार्थिव लिंग की प्रतिष्ठा करें—‘हे शिव इह प्रतिष्ठितो भव ।’

▪️षडक्षर-मन्त्र से अंगन्यास और करन्यास करना चाहिए—

करन्यास
अंगुष्ठाभ्यां नम: (दोनों हाथों की तर्जनी अंगुलियों से दोनों अंगुठों का स्पर्श करना चाहिए ।)
नं तर्जनीभ्यां नम: (दोनों हाथों के अंगूठों से दोनों तर्जनी अंगुलियों का स्पर्श करना चाहिए ।)
मं मध्यमाभ्यां नम: (दोनों अंगूठों से दोनों मध्यमा अंगुलियों का स्पर्श करना चाहिए ।)
शिं अनामिकाभ्यां नम: (दोनों अंगूठों से दोनों अनामिका अंगुलियों का स्पर्श करना चाहिए ।)
वां कनिष्ठिकाभ्यां नम: (दोनों अंगूठों से दोनों कनिष्ठिका अंगुलियों का स्पर्श करना चाहिए ।)
यं करतलकरपृष्ठाभ्यां नम: (हथेलियों और उनके पृष्ठभागों का परस्पर स्पर्श ।)

अंगन्यास
हृदयाय नम: (दाहिने हाथ की पांचों अंगुलियों से हृदय का स्पर्श करें ।)
नं शिरसे स्वाहा (दाहिने हाथ से सिर का स्पर्श करें ।)
मं शिखायै वषट् (दाहिने हाथ से शिखा का स्पर्श करें ।)
शिं कवचाय हुम् (दाहिने हाथ की अंगुलियों से बांये कन्धे का और बांयें हाथ की अंगुलियों से दाहिने कंधे का स्पर्श करें ।)
वां नेत्रत्रयाय वौषट् (दाहिने हाथ की अंगुलियों के अग्रभाग से दोनों नेत्रों और ललाट के मध्यभाग का स्पर्श करें ।)

यं अस्त्राय फट् (इस वाक्य को पढ़कर दाहिने हाथ को सिर के ऊपर से बायीं ओर से पीछे की ओर ले जाकर दाहिने ओर से आगे की ओर ले आएं और तर्जनीव मध्यमा अंगुलियों से बायीं हथेली पर ताली बजायें ।)।

▪️इसके बाद भगवान गणेश और माता पार्वती को नमस्कार करें–

गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम् ।
उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम् ।।
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नम: ।
नम: प्रकृत्यै भद्रायै नियता: प्रणता: स्म ताम् ।।

▪️भगवान शिव के पूजन से पहले उनका ध्यान करना चाहिए
जो कैलास पर्वत पर एक सुन्दर सिंहासन पर विराजमान हैं, जिनके वामभाग में भगवती उमा उनसे सटकर बैठी हुई हैं, सनक-सनन्दन आदि भक्तजन जिनकी पूजा कर रहे हैं तथा जो भक्तों के दु:खरूपी दावानल को नष्ट कर देने वाले शक्तिशाली ईश्वर हैं । उनके चार हाथों में क्रमश: परशु, मृगमुद्रा, वर एवं अभयमुद्रा हैं । वे वस्त्र की जगह व्याघ्रचर्म धारण किये हुए हैं, उनके पांच मुख हैं और प्रत्येक मुखमण्डल में तीन-तीन नेत्र हैं । वे विश्व के आदि हैं और सबका भय हर लेने वाले हैं ।

▪️इसके बाद शूलपाणये नम:’ कहकर उस पार्थिव लिंग में भगवान शिव का आवाहन करें ।

▪️ पिनाकधृषे नम:’ कहकर पाद्य (पैर धुलाने के लिए के लिए शिवलिंग पर जल) छोड़ें । फिर अर्घ्य (हाथ धुलाने के लिए जल) निवेदित करें । (जल में चंदन, अक्षत व पुष्प मिलाकर अर्घ्यजल बनाया जाता है । इसके बाद भगवान शंकर को आचमन के लिए जल चढ़ाएं । तत्पश्चात् शिवजी को शुद्ध जल से स्नान कराएं । दूध, दही, घी, शहद व शर्करा से शिवजी को अलग-अलग स्नान कराएं । फिर शुद्ध जल से स्नान कराकर अंत में पंचामृत से स्नान कराएं । पुन: शुद्ध जल से स्नान कराएं । थोड़े से जल में चंदन मिलाकर गन्धोदक स्नान कराएं । पुन: गंगाजल से स्नान कराकर अंत में शुद्धजल से स्नान कराएं और स्नान के बाद आचमन के लिए जल छोड़ दें ।

▪️शिवलिंग को साफ वस्त्र से पोंछकर वस्त्र चढ़ाकर आचमन कराएं ।

▪️यज्ञोपवीत समर्पित करके आचमन कराएं । शिवलिंग पर उपवस्त्र चढाकर आचमन के लिए जल छोड़ दें ।

▪️‘ शिवाय नम:’ कहकर उनकी चंदन, अक्षत और बिल्वपत्र से पूजा करें । शिवलिंग पर सुगन्धित चंदन से त्रिपुण्ड्र बनाएं, लाल चंदन से त्रिपुण्ड के बीच में बिन्दी लगाएं । भगवान पर अखण्ड चावल व काले तिल आदि चढ़ाएं । अबीर-गुलाल छिड़कें व इत्र का लेपन करें ।
भगवान शिव को पुष्पमाला, पुष्प, दूर्वा, ‘ नम: शिवाय’ या ‘राम’ लिखे बिल्वपत्र चढ़ाएं । इसके बाद बेलफल, धतूरा, शमीपत्र, आदि अर्पित करें । शिवजी पर कमल, गुलाब, चम्पा, चमेली, सफेद कनेर, बेला, अपामार्ग, उत्पल आदि पुष्प चढ़ाने चाहिए । भगवान शिव को आभूषण की जगह रुद्राक्षमाला धारण कराएं।

भगवान शिव को धूप निवेदन करें । फिर घी से बरा हुआ दीपक दिखाएं । इसके बाद भगवान शिव को नैवेद्य में मिष्ठान व ऋतुफल अर्पित करें फिर भगवान को प्रेमपूर्वक आचमन करायें । (कुछ लोग भगवान को भांग का भोग लगाते हैं।) करोद्वर्तन के लिए दोनों हाथों की अनामिका ऊंगलियों में चंदन लेकर अंगूठे की सहायता से शिवलिंग पर छिड़कें । लोंग, इलायची, सुपारी द्वारा निर्मित ताम्बूल भगवान शिव को निवेदित करें । अंत में सामर्थ्यानुसार द्रव्य दक्षिणा समर्पित करें।

▪️आरती करें, मन्त्रपुष्पांजलि अर्पित करें ।

▪️इसके बाद भगवान शिव की अष्टमूर्तियों के नाम का उच्चारण कर आठों दिशाओं में फूल व अक्षत छोड़ें—

१. पूर्व दिशा में शर्वाय क्षितिमूर्तये नम: ।
२. ईशानकोण में भवाय जलमर्तये नम: ।
३. उत्तर दिशा में रुद्राय अग्निमूर्तये नम: ।
४. वायव्यकोण में उग्राय वायुमूर्तये नम: ।
५. पश्चिम दिशा में भीमाय आकाशमूर्तये नम: ।
६. नैर्ऋत्य कोण में पशुपतये यजमानमूर्तये नम: ।
७. दक्षिण दिशा में महादेवाय सोममूर्तये नम: ।
८. अग्नि कोण में ईशानाय सूर्यमूर्तये नम: ।

▪️इसके बाद कम-से-कम ‘ॐ नम: शिवाय’ मन्त्र की एक माला का जप करें ।

▪️फिर शिव की आधी परिक्रमा करें ।
▪️तत्पश्चात् शिव को साष्टांग प्रणाम करें ।
▪️इसके बाद गाल बजाकर ‘बम बम भोले’ का उच्चारण करें ।
▪️अंजलि में अक्षत और फूल लेकर ‘ पशुपते नम:’ कहकर भगवान शंकर से इस प्रकार प्रार्थना करें—

आवाहन न जानामि न जानामि विसर्जनम् ।
पूजां नैव हि जानामि क्षमस्व परमेश्वर ।।
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सदाशिव ।
यत् पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे ।।

‘सबको सुख देने वाले कृपानिधान भूतनाथ शिव ! मैंने अनजाने में या जानबूझकर यदि कभी आपका जप या पूजन किया हो तो आपकी कृपा से वह सफल हो जाए । हे गौरीनाथ ! मैं आधुनिक युग का महान पापी हूँ लेकिन आप सदा से ही महान पतितपावन हैं; इस बात को ध्यान में रख कर आप जैसा चाहें, वैसा करें । मैं जैसा हूँ, वैसा ही आपका हूँ, आपके आश्रित हूँ, इसलिए आपसे रक्षा पाने के योग्य हूँ । परमेश्वर ! आप मुझ पर प्रसन्न होइये ।’

इस प्रकार प्रार्थना करके हाथ में लिए हुए अक्षत और पुष्प को पार्थिव लिंग पर अर्पित कर दें ।

▪️अंत में ‘ महादेवाय नम:’ कह कर भगवान शिव का विसर्जन कर दें ।

गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठ ! स्वस्थाने परमेश्वर ।
मम पूजां गृहीत्वेमां पुनरागमनाय च ।।

विष्णवे नम:, विष्णवे नम:, विष्णवे नम:,
साम्बसदाशिवाय नम:, साम्बसदाशिवाय नम:, साम्बसदाशिवाय नम:,

अंत में ‘अनेन पार्थिवलिंगपूजन कर्मणा श्रीयज्ञस्वरूप: शिव: प्रीयताम्, न मम ।’ ऐसा कहकर पृथ्वी पर जल छोड़ दें और अपने मस्तक व हृदय से लगा लें ।

भगवान शिव की पूजा भक्ति भाव से करनी चाहिए, अनावश्यक भ्रम या तर्क से नहीं । क्योंकि भक्ति से ही भगवान मनोवांछित फल देते हैं।।

*ऐसे किशोरी जू नाहीं बनो, कैसे सुधि मोरि बिसार रही हो।**हे दीनन स्वामिनि रस विस्तारिणी, का मम बार बिचार रही हो।**तोर बिल...
25/07/2026

*ऐसे किशोरी जू नाहीं बनो, कैसे सुधि मोरि बिसार रही हो।*

*हे दीनन स्वामिनि रस विस्तारिणी, का मम बार बिचार रही हो।*

*तोर बिलोकत ऐसी दशा, मोहे क्यों भवसिंधु मे डार रही हो।*

*मो सम दीन अनेकन तारे, वा श्रम सों अब हार रही हो॥*

- ब्रज के सवैया

*हे किशोरी जी! आप जैसी दयालु और करुणामयी कोई नहीं है, फिर आप मेरी सुध क्यों भूल रही हैं?*

*हे दीनों की एकमात्र स्वामिनी, हे रस-संपदा की विस्तारिणी! ऐसा क्या कारण है कि जब मुझ पर अनुकंपा की वेला आई, तब आप बार-बार विचार कर रही हैं?*

*हे राधे, आपके होते हुए भी मेरी दशा दयनीय क्यों है? मुझे इस भव-सागर से पार लगाकर अपने चरण-कमलों की शरण में क्यों नहीं ले जातीं?*

*अरे कृपामयी, श्री राधे! आपने तो असंख्य दीन जनों का उद्धार किया है, फिर मेरी बारी आने पर क्यों संकोच कर रही हैं?*
🪷🪷🪷🪷🪷🪷

महाशिवरात्रि की अंतिम रात कैलाश पर क्या होता है? वो रहस्य जो आज तक किसी ने नहीं बतायाक्या आपने कभी सोचा है - जब पूरी दुन...
25/07/2026

महाशिवरात्रि की अंतिम रात कैलाश पर क्या होता है? वो रहस्य जो आज तक किसी ने नहीं बताया

क्या आपने कभी सोचा है - जब पूरी दुनिया महाशिवरात्रि मना रही होती है, मंदिरों में भीड़ होती है, बेलपत्र चढ़ रहे होते हैं, तो उस रात कैलाश पर क्या होता है?

जहाँ शिव खुद रहते हैं, वहाँ महाशिवरात्रि कैसे मनती है?

आज वो कहानी सुनिए, जो कैलाश के एक यति ने एक साधु को सुनाई थी, और उस साधु ने मुझे सुनाई।

ये कहानी 5000 शब्दों की नहीं, 5000 जन्मों के पुण्य की है।

रात 9 बजे - जब दुनिया सोती है और कैलाश जागता है

महाशिवरात्रि की रात को दुनिया के सारे शिव मंदिरों में आरती होती है, पर कैलाश पर कोई मंदिर नहीं, वहाँ तो स्वयं महादेव का घर है।

रात 9 बजे - जब भारत में पहली प्रहर की पूजा शुरू होती है, तब कैलाश पर बर्फ पिघलनी शुरू हो जाती है। नहीं, गर्मी से नहीं, तप से।

कैलाश के चारों ओर 11 रुद्र, 12 आदित्य, 8 वसु, 64 योगिनी, 52 भैरव, और करोड़ों शिवगण गोल-गोल बैठ जाते हैं। बीच में एक विशाल शिवलिंग - जो बर्फ का नहीं, प्रकाश का बना होता है।

और फिर शुरू होता है - **तांडव से पहले का मौन**।

महादेव ध्यान में होते हैं। पार्वती जी उनके सामने बैठी होती हैं। पूरी सृष्टि शांत। हवा भी चलना बंद कर देती है। मानसरोवर का पानी शीशे जैसा स्थिर।

कहते हैं - इस मौन में अगर कोई सच्चा भक्त "ॐ नमः शिवाय" भी धीरे से बोल दे, तो उसकी आवाज सीधी कैलाश में गूंजती है।

रात 10:30 बजे - देवताओं का आगमन

धीरे-धीरे आकाश से प्रकाश उतरने लगता है।

सबसे पहले आते हैं - ब्रह्मा जी, हंस पर। फिर विष्णु जी, गरुड़ पर, लक्ष्मी जी के साथ। फिर इंद्र, वरुण, कुबेर, यमराज, अग्नि, वायु - सभी।

पर वो सिंहासन पर नहीं बैठते, वो भी नीचे, बर्फ पर, शिवगणों के साथ बैठ जाते हैं। क्योंकि उस रात महादेव राजा नहीं, दूल्हा होते हैं।

हाँ, महाशिवरात्रि - शिव और शक्ति के विवाह की रात।

पार्वती जी का श्रृंगार शुरू होता है। स्वयं लक्ष्मी जी पार्वती का काजल लगाती हैं, सरस्वती जी मेहंदी, गंगा जी बालों में फूल। और पार्वती जी लज्जा से सिर झुका लेती हैं, जैसे आज भी नई दुल्हन हो।

तब महादेव आँखें खोलते हैं। और पहली बार कहते हैं - "शिवोहम।"

और पूरी सृष्टि गूंज उठती है - "हर हर महादेव।"

रात 12 बजे - वो अंतिम प्रहर जो कोई नहीं देख सकता

अब आता है सबसे गहरा रहस्य - महाशिवरात्रि की अंतिम रात का तीसरा प्रहर - यानी रात 12 से 3 बजे तक।

इस समय क्या होता है?

शास्त्र कहते हैं - इस समय महादेव तांडव नहीं करते, इस समय महादेव रोते हैं।

हाँ, महादेव रोते हैं।

क्यों?

क्योंकि इस समय वो अपनी सृष्टि को देखते हैं। हर उस भक्त को देखते हैं जिसने साल भर में "हे भोलेनाथ मदद करो" कहा, पर उन्हें लगा - भगवान ने नहीं सुना।

महादेव उस रात अपने गणों से कहते हैं - "जाओ, उसकी लिस्ट लाओ, जिसकी प्रार्थना मैं समय पर पूरी नहीं कर पाया।"

और गण लिस्ट लाते हैं। लाखों नाम।

महादेव हर नाम को पढ़ते हैं और कहते हैं - "इसे क्षमा करो, इसे अगला जन्म मत दो, इसे मुक्ति दो।"

और पार्वती जी पूछती हैं - "स्वामी, आप तो कालों के काल हैं, आप क्यों रोते हैं?"

महादेव कहते हैं - "देवी, मैं सृष्टि बनाता हूँ, पर मैं हर एक के आँसू नहीं पोंछ पाता। आज की रात, मैं उन सबके लिए रोता हूँ, जिनके लिए कोई नहीं रोया।"

कहते हैं - महाशिवरात्रि की अंतिम रात को कैलाश पर जो बर्फ पिघलती है, वो बर्फ नहीं, महादेव के आँसू होते हैं। वही पिघलकर गंगा बनती है, वही मानसरोवर भरती है।

रात 1:11 बजे - वो दरवाजा जो साल में एक बार खुलता है

रात 1 बजकर 11 मिनट पर - कैलाश के ठीक पीछे, जहाँ आज तक कोई वैज्ञानिक, कोई पर्वतारोही नहीं जा पाया, वहाँ एक दरवाजा खुलता है।

उसे कहते हैं - **मोक्ष द्वार**।

वो दरवाजा प्रकाश का होता है, न सोने का, न चांदी का।

उस दरवाजे से उन आत्माओं को बुलाया जाता है, जिन्होंने पूरे साल में सच्चे मन से एक बार भी "ॐ नमः शिवाय" कहा हो, चाहे वो पापी ही क्यों न हो।

उस रात यमराज खुद उन आत्माओं को लेकर आते हैं और कहते हैं - "महादेव, ये आपके हैं।"

और महादेव उन्हें कैलाश में प्रवेश देते हैं। फिर वो आत्मा कभी धरती पर लौटकर नहीं आती। उसे मोक्ष मिल जाता है।

तभी तो कहते हैं - महाशिवरात्रि पर जागने वाला कभी नहीं सोता - मतलब उसे जन्म-मरण से मुक्ति मिल जाती है।

रात 2:22 बजे - पार्वती जी का नृत्य

जब मोक्ष द्वार बंद हो जाता है, तो पार्वती जी उठती हैं।

वो महादेव के लिए नृत्य करती हैं। वो नृत्य तांडव नहीं, लास्य होता है - प्रेम का नृत्य, श्रृंगार का नृत्य।

और जब पार्वती नाचती हैं, तो कैलाश के सारे फूल खिल उठते हैं, जो 12 महीने बर्फ में बंद रहते हैं। उस एक रात को कैलाश पर फूलों की बारिश होती है, जिसे देवता भी देखने आते हैं।

महादेव पार्वती को देखकर मुस्कुराते हैं, और कहते हैं - "तुम ही मेरी शक्ति हो।"

और उसी मुस्कान से पूरी सृष्टि में ऊर्जा भर जाती है। तभी तो महाशिवरात्रि के अगले दिन सुबह, हर जीव में नई ऊर्जा लगती है, पेड़ों में नए पत्ते आते हैं।

सुबह 3:33 बजे - महादेव का वरदान

अंतिम प्रहर समाप्त होने वाला होता है।

महादेव खड़े होते हैं। त्रिशूल उठाते हैं। और त्रिशूल को तीन बार जमीन पर मारते हैं।

पहली बार मारते हैं - तो कहते हैं - "जो जाग रहा है, उसका कल्याण हो।"
दूसरी बार मारते हैं - "जो सो रहा है, उसका भी कल्याण हो।"
तीसरी बार मारते हैं - "जो मुझे गाली दे रहा है, उसका भी कल्याण हो।"

यही भोलेनाथ हैं। सबका कल्याण।

फिर वो कैलाश की चोटी पर आकर खड़े होते हैं और पूरी दुनिया की तरफ देखते हैं। और जो भी उस समय - चाहे भारत में हो, अमेरिका में हो, चाहे किसी भी धर्म का हो - अगर सच्चे दिल से आँख बंद करके महादेव को याद करता है, तो महादेव उसे देखते हैं।

उसकी एक प्रार्थना जरूर सुनते हैं।

इसलिए महाशिवरात्रि पर जागना जरूरी है

अब समझे? हम मंदिर में क्यों जागते हैं?

क्योंकि जब कैलाश जाग रहा है, तो हमें भी जागना चाहिए।

उस अंतिम रात को अगर आप 12 से 3 बजे तक जागकर सिर्फ "ॐ नमः शिवाय" जप लेते हैं, बिना कुछ मांगे, तो समझिए - आपका नाम भी उस लिस्ट में चला गया, जो मोक्ष द्वार तक जाएगी।

महादेव को कुछ नहीं चाहिए - न दूध, न फूल, न बेलपत्र। उन्हें सिर्फ आपका जागना चाहिए। आपका एहसास चाहिए कि - "मैं हूँ न, आपके साथ।"

और जो जाग गया, वो तर गया।

तो इस महाशिवरात्रि, सोना मत।

रात 12 बजे, आँखें बंद करना, और कहना - "महादेव, मैं भी जाग रहा हूँ, आपके साथ, कैलाश पर।"

और फिर देखना - कैसे आपकी जिंदगी की बर्फ पिघलेगी, और फूल खिलेंगे।

हर हर महादेव

चाहे लाख हो रिश्तेदार, भरोसा मुझे तेरा है भरोसा मुझे तेरा है, भरोसा मुझे तेरा हैकहीं भूल ना, कहीं भूल नाकहीं भूल ना जाईय...
24/07/2026

चाहे लाख हो रिश्तेदार, भरोसा मुझे तेरा है
भरोसा मुझे तेरा है, भरोसा मुझे तेरा है
कहीं भूल ना, कहीं भूल ना
कहीं भूल ना जाईयो सरकार, भरोसा मुझे तेरा है
चाहे लाख हो रिश्तेदार, भरोसा मुझे तेरा है.....

इस दुनिया से नेह लगा के
देख लिया सबको आजमा के
तुमसा ना, तुमसा ना,
तुमसा ना मिला कहीं प्यार, भरोसा मुझे तेरा है
चाहे लाख हो रिश्तेदार, भरोसा मुझे तेरा है.....

नैनन बीच समाओ ऐसे
फूलन बीच सुगंधी जैसे
प्राणों के, प्राणों के
प्राणों के प्राण आधार, भरोसा मुझे तेरा है
चाहे लाख हो रिश्तेदार, भरोसा मुझे तेरा है.....

पढ़ के प्रेम के ढाई अक्षर
निकल पड़े है प्रेम डगर पर
अब जीत, अब जीत
अब जीत मिले या हार, भरोसा मुझे तेरा है
चाहे लाख हो रिश्तेदार, भरोसा मुझे तेरा है.....

अटल सत्य मृत्यु का आना
चाहे बस ये तेरा दीवाना
दर्शन, दर्शन
दर्शन दीजो सरकार, भरोसा मुझे तेरा है
चाहे लाख हो रिश्तेदार, भरोसा मुझे तेरा है.....

चाहे लाख हो रिश्तेदार, भरोसा मुझे तेरा है
भरोसा मुझे तेरा है, भरोसा मुझे तेरा है
कहीं भूल ना, कहीं भूल ना
कहीं भूल ना जाईयो सरकार, भरोसा मुझे तेरा है

यह उस समय की बात है जब सृष्टि अभी अपनी शैशवावस्था में थी। कैलाश पर बर्फ की चादर ओढ़े महादेव समाधि में लीन थे। चारों ओर ऐ...
16/07/2026

यह उस समय की बात है जब सृष्टि अभी अपनी शैशवावस्था में थी। कैलाश पर बर्फ की चादर ओढ़े महादेव समाधि में लीन थे। चारों ओर ऐसा सन्नाटा था मानो समय खुद ठहरकर साँस ले रहा हो। लेकिन उस परम एकांत के भीतर एक बेचैनी थी। वह बेचैनी किसी अभाव की नहीं, बल्कि उस पूर्णता की थी जो प्रकट होने के लिए छटपटा रही थी। ठीक उसी पल, करोड़ों ब्रह्मांड दूर, क्षीरसागर की शेषशैया पर लेटे नारायण ने अपनी कमल जैसी आँखें खोलीं।

नारायण ने मुस्कुराकर अपने हृदय पर हाथ रखा। वहाँ कैलाश की ठंडक महसूस हो रही थी। और उधर कैलाश पर, समाधि के सबसे गहरे उतर चुके शिव के कंठ से अचानक एक नाम निकला—"हरि..."

भोलेनाथ की आँखें खुलीं। उनमें कोई वासना नहीं थी, कोई चाहत नहीं थी, बस एक असीम पुकार थी। उन्होंने अपने सामने फैली नीली धुंध में देखा। उन्हें लगा कि नारायण का सांवला रूप उनकी जटाओं से बहती गंगा की धार में थिरक रहा है। शिव ने अपनी भस्म रमी उंगलियों से हवा में एक आकृति बनानी चाही, पर हवा तो निराकार थी। वह बिखर गई।

शिव उठ खड़े हुए। उनका व्याघ्रचंबर सरक गया, पर उन्हें सुध कहाँ थी? उन्होंने नंदी की ओर देखा और कहा,

"नंदी, मुझे नीचे उतरना होगा। वैकुंठ की ओर।"

नंदी ने चकित होकर पूछा, "प्रभु, आप तो स्वयं में पूर्ण हैं। फिर यह व्याकुलता कैसी?"

शिव ने मंद मुस्कान के साथ कहा, "पूर्णता जब खुद को दर्पण में देखना चाहती है, तो उसे दूसरे की आवश्यकता होती है। हरि मेरा वह दर्पण हैं, जिसमें मैं खुद को खोकर खुद को पाता हूँ।"

उधर वैकुंठ में, महालक्ष्मी चकित थीं। उन्होंने देखा कि जो नारायण हमेशा शांत, गंभीर और ब्रह्मांड के संचालन में व्यस्त रहते थे, वे आज बार-बार अपने पीतांबर के छोर को उंगलियों में लपेट रहे थे। उनके चेहरे पर वैसी ही अधीरता थी, जैसी किसी विरही प्रेमी के चेहरे पर होती है।

"नाथ! आज सृष्टि का संतुलन कुछ डगमगा रहा है क्या?" लक्ष्मी ने पूछा।

नारायण ने दूर क्षितिज पर देखते हुए कहा, "नहीं देवी, आज सृष्टि अपने केंद्र की ओर लौट रही है। कैलाश से कोई चला है। जिसके पैरों की आहट से मेरी छाती में धड़कनें बढ़ गई हैं। वह जो खुद वैरागी है, आज मेरे अनुराग में बंधकर आ रहा है।"

और तभी वैकुंठ के द्वार स्वतः खुल गए। कोई शंख नहीं बजा, कोई जयकार नहीं हुई। बस एक सौंधी सी गंध चारों ओर फैल गई—ऐसी गंध जो जलती हुई चिता की भस्म और ताजे खिले पारिजात के फूलों के मिलन से बनती है।

द्वार पर शिव खड़े थे। दिगंबर, गले में मुंडमाला, जटाओं में चंद्रमा। और उनके ठीक सामने नारायण थे—रत्नजड़ित मुकुट पहने, रेशमी वस्त्रों में लिपटे, कस्तूरी का तिलक लगाए।

दोनो एक-दूसरे को देखते रहे। युग बीत गए मानो उस एक पल में। न शिव आगे बढ़े, न हरि। प्रेम जब अपनी चरम सीमा पर होता है, तो शरीर जड़ हो जाते हैं और आत्माएं आगे बढ़कर गले मिल लेती हैं।

शिव ने धीरे से कहा, "तुमने मुझे पुकारा, अच्युत?"

नारायण की आँखों से एक आंसू ढलका। वे आगे बढ़े और उन्होंने शिव के भस्म से सने हाथों को अपने कोमल हाथों में ले लिया। बोले, "पुकारा तो आपने था, उमापति। मैंने तो बस उस पुकार की गूँज को अपने भीतर जगह दी थी।"

इस प्रेम की गहराई को समझने के लिए प्रकृति ने भी एक खेल रचा। एक बार शिव के मन में आया कि वे नारायण के उस रूप का आनंद लें जो केवल रास रचाता है, जो सम्मोहन की पराकाष्ठा है। वे नारायण का 'मोहिनी' रूप देखना चाहते थे।

नारायण ने मना किया, "रुद्र, वह रूप भटकाने वाला है। आप योगी हैं, आप उस माया में मत उलझिए।"

पर शिव कहाँ मानने वाले थे? वे तो प्रेम के उस रस को चखना चाहते थे जहाँ मर्यादाएँ पिघल जाती हैं। नारायण ने मोहिनी का रूप धरा। वह रूप ऐसा था जिसे देखकर कामदेव भी लज्जित हो जाए। हवाओं में संगीत घुल गया, दसों दिशाएं कामुक हो उठीं।

लेकिन जैसे ही शिव ने मोहिनी को देखा, वे भागे नहीं, न ही वे वासना से भरे। वे तो उस सौंदर्य के भीतर छिपे अपने 'हरि' को देख रहे थे। शिव मोहिनी के पीछे दौड़ पड़े। यह दौड़ किसी शिकारी की नहीं थी, यह एक आत्मा की दूसरी आत्मा को पकड़ने की तड़प थी। जहाँ-जहाँ शिव के पैर पड़े, वहाँ की धरती सोना बन गई। अंत में जब शिव ने मोहिनी को बाहों में भरा, तो मोहिनी गायब हो चुकी थी और उनकी छाती से नारायण चिपके हुए थे।

नारायण ने हांफते हुए शिव की छाती पर अपना सिर रख दिया और कहा, "आप जीत गए महादेव। मेरी माया आपके प्रेम के सामने हार गई। मैं दुनिया को रिझा सकता हूँ, पर आपको केवल रिझा नहीं, बल्कि आपमें विलीन हो सकता हूँ।"

शिव ने उनके बालों को सहलाते हुए कहा, "हरि, लोग कहते हैं हम अलग हैं। कोई मेरा भक्त बनकर तुमसे बैर करता है, कोई तुम्हारा भक्त बनकर मुझसे चिढ़ता है। वे मूर्ख नहीं जानते कि जब मैं ध्यान करता हूँ, तो तुम्हारा चेहरा मेरे भीतर चमकता है। और जब तुम मुस्कुराते हो, तो मेरी समाधि पूरी होती है।"

प्रेम की यह लंबी गाथा द्वापर युग में एक बार फिर अपने चरम पर पहुँची। नारायण कृष्ण बनकर आए थे। वे बांसुरी बजाते थे और पूरी प्रकृति झूम उठती थी। कैलाश पर बैठे शिव से रहा नहीं गया। वे गोपी का रूप धारण करके वृंदावन पहुँच गए।

कृष्ण ने अपनी सखियों के बीच खड़े उस लंबी-चौड़ी 'गोपी' को देखा जिसकी आँखों में वैराग्य की चमक थी और जो घूंघट के पीछे अपनी जटाओं को छुपाने की कोशिश कर रही थी। कृष्ण मुस्कुराए। उन्होंने बांसुरी बजाना बंद कर दिया और सीधे उस नई गोपी के पास गए।

उन्होंने धीरे से घूंघट उठाया। सामने शिव थे। आँखों में आंसू लिए, कांपते होठों से बोले, "कन्हैया, मुझे अपनी रास से दूर मत रखना। मैं इस जनम में तुम्हारा संगीत सुनने आया हूँ।"

कृष्ण ने शिव के पैर छूने चाहे, पर शिव ने उन्हें रोककर अपने गले से लगा लिया। उस रात यमुना के किनारे जो रास हुआ, वह इतिहास में दर्ज हो गया। वह केवल गोपी और कृष्ण का नृत्य नहीं था, वह 'हर' और 'हरि' का तादात्म्य था। शिव नाच रहे थे और कृष्ण बजा रहे थे। दोनों के बीच का अंतर पूरी तरह मिट चुका था।

मैं जब इस कहानी के आखिरी पड़ाव पर आता हूँ, तो मुझे लगता है कि 'हरि' और 'हर' का यह प्रेम हमारे अपने भीतर की दो ऊर्जाएं हैं।

हर (शिव) हमारे भीतर का वह वैराग्य है, वह शांति है, वह ठहराव है जो हमें खुद से जोड़ता है।

हरि (विष्णु) हमारे भीतर का वह अनुराग है, वह उत्सव है, वह प्रेम है जो हमें दुनिया से जोड़ता है।

बिना शिव के विष्णु अधूरे हैं, क्योंकि बिना ठहराव के प्रेम केवल भटकाव बन जाता है। और बिना विष्णु के शिव अधूरे हैं, क्योंकि बिना प्रेम के वैराग्य केवल एक सूखी हुई भस्म बनकर रह जाता है।

आज भी, जब आसमान में काले बादल छाते हैं और बिजली कड़कती है, तो मुझे लगता है कि शिव तांडव कर रहे हैं। और जब उसी बारिश के बाद धरती से सोंधी महक उठती है और मोर नाचने लगते हैं, तो लगता है हरि अपनी बांसुरी बजा रहे हैं। दोनों मिलकर इस सृष्टि की सबसे लंबी, सबसे गहरी और सबसे पवित्र प्रेम कहानी लिख रहे हैं—एक ऐसी कहानी जिसका न कोई आदि है, और न कोई अंत...❤️🌻

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