16/06/2026
पद्मपुराण में १६ अध्यायों में भगवान् श्रीराम के प्रति भगवान् शंकर ने जो उपदेश किया है ; वह 'शिव-गीता' के नाम से प्रसिद्ध है ।
आज से अवसर मिलने पर 'शिवगीता' की ही व्याख्या क्रमशः पोस्ट करेंगे ।
जिस समय पिता की आज्ञा प्राप्त कर भगवान् श्रीराम वन में पहुँचे , वहां पंचवटी में यति-वेष धारण कर रावण ने सीता का अपहरण किया ।
उस समय सीता के वियोग में अत्यन्त दुःखी श्रीराम जी लक्ष्मण के प्रति अपना दुःख प्रकट करके प्राण त्यागने के लिए तत्पर हुये ।
उसी समय अगस्त्य जी वहां पहुँचे , उन्होंने श्रीराम जी से कहा ==
"हे राम ! तुम क्षत्रिय-कुल-भूषण हो , आपका अवतार तो दुष्टों का दमन करने के लिए हुआ है , शत्रुओं को दुष्टता का दण्ड देकर तुम्हें सीताजी को प्राप्त करना चाहिए ।
सीता को प्राप्त करने के लिए आप शिवाराधना करें ।
राम ! अनेकों जन्मों के शुभ-कर्मों से शिव-भक्ति प्राप्त होती है , तब निष्काम-भाव से नित्त्य-नैमित्तिक-कर्मों का अनुष्ठान होता है , उससे चित्त शुद्ध होता है , तब नित्यानित्य का विवेक और दोनों लोकों के भोगों से वैराग्य , पुनः षट्-सम्पत्ति , पुनः मुक्ति की तीव्र कामना , तब संन्यास , फिर श्रोत्रिय-ब्रह्मनिष्ठ गुरु की शरणागति , तब श्रवण-मनन-निदिध्यासन निर्विघ्न होने पर तब आत्मसाक्षात्कार , तब भी ज्ञानी का जबतक प्रारब्ध कर्म है ; तबतक शरीर रहता है , पुनः जीवनमुक्ति की प्राप्ति होती है ।
प्रारब्ध-भोग के अनन्तर तीनों शरीरों को ज्ञानी यहीं छोड़कर कैवल्य मुक्ति पाता है ।
अतः चारों पुरुषार्थों की सिद्धि के लिए श्री शंकर जी की आराधना करो , इस आराधना से प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष श्री शंकर जी के दर्शन और आशीर्वाद से रावण पर विजय प्राप्त करोगे ।
भगवान् शिव आशुतोष हैं , शीघ्र ही प्रसन्न होकर पर्वत के समान महापापों को भस्म कर देते हैं , अतः तुम मुझसे पार्थिव-तत्त्व की दीक्षा लेकर शिवाराधना करो ।
वे भक्तिपूर्वक दिये हुये पत्र- पुष्प- फल- जल आदि वस्तुओं को ग्रहण करते हैं , यदि जल भी न मिले तो केवल प्रणाम मात्र से ही प्रसन्न होते हैं ।
वैसे तो भक्तिपूर्वक दिये हुए जल मात्र को भगवान् प्रेम से ग्रहण करते हैं , किन्तु श्रद्धा - भक्ति - विश्वास से रहित वे तीनों लोकों को भी स्वीकार नहीं करते ।"
तब श्रीराम ने कहा == "आप मुझे शिव-मन्त्र की दी