29/09/2023
रहती है पैसे की कमी और हैं बीमार तो चन्द्रमा का करें ये उपाय :ज्योतिष समाधान
चन्द्रमा के व्यापक प्रभाव से ग्रस्त है मानवजीवन .
हमलोग प्रायः सभी कुण्डली के नाम से परिचित हैं । यह बारह खण्डों ( भावों या घरों ) से विनिर्मित एक चक्र होता है, जिसके हरेक खण्ड में एक-एक राशि और कुछ खण्डों में नौ ग्रह प्रविष्ट किया जाता है । यह जातक ( जिसकी कुण्डली है वह ) के जन्म के समय की तिथि और स्थान के अनुसार उनकी स्थितियों पर निर्भर करता है ।अतः प्रत्येक जातक के लिए यह कुछ न कुछ अन्तरग्रस्त होता है।
यद्यपिकि प्रत्येक ग्रह महत्वपूर्ण हैं, किन्तु चन्द्रमा जातक के जीवन की घटनाओं के कारणों पर अपना विशिष्ट स्थान रखता है।
इन्हीं विशिष्टताओं के कारण सम्बन्धित व्यक्ति के जन्मकाल में यह जिस राशि में रहता है वही उस व्यक्ति की " राशि " या " चन्द्र-राशि " कही जाती है तथा इसको सामने रख ज्योतिषियों की गणनाओं के आधार पर ऋषियों द्वारा वर्णित फलों के साथ- साथ उनके घटित होने की कालावधि सुनिश्चित कर दी जाती है ।
प्राचीन मनीषियों ने जन्मकालीन चन्द्रमा के सुरक्षित होने पर बहुतही बल दिया है।
प्रतिदिन अपनी कलाओं को परिवर्तित करने वाला यह ग्रह शुक्लपक्ष की एकादशी से कृष्णपक्ष की पंचमी तक शुभ और शेष दिनों में अशुभ माना जाता है । यह सर्वस्वीकृत मत है कि जिस कुंडली में चन्द्रमा बली नहीं हो या/और उन षष्ठम अथवा अष्टम भाव
में विराजमान हो तो तो जातक को अनेकानेक अरिष्टों का सामना करना पड़ता ही है । फिर ऐसे चन्द्रमा को पाप ग्रहों का संग मिल जाय या उसपर
उनकी दृष्टि पड़े तो उसमें ( चन्द्रमामें )
प्रबल मारकत्व आ जाता है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं।
यही नहीं है कि चन्द्रमा सतत कष्टकारी ही है । यह शुन्दर और शुभ फलदायक भी है । शुभ चन्द्रमा यदि शुष भाव में अवस्थित हो और/या उसपर शभ ग्रह/ग्रहों की दृष्टि हो तो यह आनन्ददायक फल देता है । लग्नस्थ, द्वितीयस्थ, चतुर्थस्थ, पंचमस्थ, सप्तमस्थ, नवमस्थ,दशमस्थ और एकादशस्थ चन्द्रमा प्रायः अच्छा फल ही देता है ( कुछ अपवादों को छोड़कर ) । इतना ही नहीं, यदि चन्द्रमा और बृहस्पति एक-दूसरे से केन्द्रस्थ रहें या कजन्द्रमा और मंगल एक-दूसरे से सप्तमस्थ हों तो यह राजयोग कारक होता है । इत्यादि, इत्यादि------
यदि जातक की कुण्डली में चन्द्रमा अशुभ फलदाता हों तो माँ भगवती की अर्चना ,श्री दुर्गासप्तशती का पाठ, कुमारि-कन्याओं को निमंत्रण देकर भोजन, दक्षिणा, उचित पात्र को चावल, श्वेत कपड़ा, चाँदी, गाय का दान आदि अरिष्टनाशक होता है । " ॐ सों सोमाय नमः " मन्त्र को ग्यारह से चौबलिस बार जप करना भी कल्याणकारी होता है।
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इति शुभम