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23/05/2026

Gita Class Chapter 13 Shloka 8-12 BG Class 13.8-12
अध्याय 13 : प्रकृति, पुरुष तथा चेतना
श्लोक 13.8-12
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् |
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः || ८ ||
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च |
जन्ममृत्युजराव्याधिदु:खदोषानुदर्शनम् || ९ ||
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु |
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु || १० ||
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी |
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि || ११ ||
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् |
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोSन्यथा || १२ ||
अमानित्वम् - विनम्रता; अदाम्भित्वम् - दम्भविहीनता; अहिंसा - अहिंसा; क्षान्तिः - सहनशीलता, सहिष्णुता; आर्जवम् - सरलता; आचार्य-उपासनम् - प्रामाणिक गुरु के पास जाना; शौचम् - पवित्रता; स्थैर्यम् - दृढ़ता; आत्म-विनिग्रहः - आत्म-संयम; इन्द्रिय-अर्थेषु - इन्द्रियों के मामले में; वैराग्यम् - वैराग्य; अनहंकारः - मिथ्या अभिमान से रहित; एव - निश्चय ही; च - भी; जन्म - जन्म; मृत्यु - मृत्यु; जरा - बुढ़ापा; व्याधि - तथा रोग का; दुःख - दुख का; दोष - बुराई; अनुदर्शनम् - देखते हुए; आसक्तिः - बिना आसक्ति के; अनभिष्वङगः - बिना संगति के ; पुत्र - पुत्र; दार - स्त्री; गृह-आदिषु - घर आदि में; नित्यम् - निरन्तर; च - भी; सम-चित्तत्वम् - समभाव; इष्ट - इच्छित; अनिष्ट - अवांछित, उपपत्तिषु - प्राप्त करके; मयि - मुझ में; च - भी; अनन्य-योगेन - अनन्य भक्ति से; भक्तिः - भक्ति; अव्यभिचारिणी - बिना व्यवधान के; विविक्त - एकांत; देश - स्थानों की; सेवित्वम् - आकांक्षा करते हुए; अरतिः - अनासक्त भाव से; जन-संसदि - सामान्य लोगों को; अध्यात्म - आत्मा सम्बन्धी; ज्ञान - ज्ञान में; नित्यत्वम् - शाश्र्वतता; तत्त्वज्ञान - सत्य के ज्ञान के; अर्थ - हेतु; दर्शनम् - दर्शनशास्त्र; एतत् - यह सारा; ज्ञानम् - ज्ञान; इति - इस प्रकार; प्रोक्तम् - घोषित; अज्ञानम् - अज्ञान; यत् - जो; अतः - इससे; अन्यथा - अन्य, इतर |
भावार्थ
विनम्रता, दम्भहीनता, अहिंसा, सहिष्णुता, सरलता, प्रामाणिक गुरु के पास जाना, पवित्रता, स्थिरता, आत्मसंयम, इन्द्रियतृप्ति के विषयों का परित्याग, अहंकार का अभाव, जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा रोग के दोषों की अनुभूति, वैराग्य, सन्तान, स्त्री, घर तथा अन्य वस्तुओं की ममता से मुक्ति, अच्छी तथा बुरी घटनाओं के प्रति समभाव, मेरे प्रति निरन्तर अनन्य भक्ति, एकान्त स्थान में रहने की इच्छा, जन समूह से विलगाव, आत्म-साक्षात्कार की महत्ता को स्वीकारना, तथा परम सत्य की दार्शनिक खोज - इन सबको मैं ज्ञान घोषित करता हूँ और इनके अतिरिक्त जो भी है, वह सब अज्ञान है |

22/05/2026

Gita Class Chapter 13 Shloka 8-12 BG Class 13.8-12
अध्याय 13 : प्रकृति, पुरुष तथा चेतना
श्लोक 13.8-12
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् |
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः || ८ ||
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च |
जन्ममृत्युजराव्याधिदु:खदोषानुदर्शनम् || ९ ||
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु |
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु || १० ||
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी |
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि || ११ ||
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् |
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोSन्यथा || १२ ||
अमानित्वम् - विनम्रता; अदाम्भित्वम् - दम्भविहीनता; अहिंसा - अहिंसा; क्षान्तिः - सहनशीलता, सहिष्णुता; आर्जवम् - सरलता; आचार्य-उपासनम् - प्रामाणिक गुरु के पास जाना; शौचम् - पवित्रता; स्थैर्यम् - दृढ़ता; आत्म-विनिग्रहः - आत्म-संयम; इन्द्रिय-अर्थेषु - इन्द्रियों के मामले में; वैराग्यम् - वैराग्य; अनहंकारः - मिथ्या अभिमान से रहित; एव - निश्चय ही; च - भी; जन्म - जन्म; मृत्यु - मृत्यु; जरा - बुढ़ापा; व्याधि - तथा रोग का; दुःख - दुख का; दोष - बुराई; अनुदर्शनम् - देखते हुए; आसक्तिः - बिना आसक्ति के; अनभिष्वङगः - बिना संगति के ; पुत्र - पुत्र; दार - स्त्री; गृह-आदिषु - घर आदि में; नित्यम् - निरन्तर; च - भी; सम-चित्तत्वम् - समभाव; इष्ट - इच्छित; अनिष्ट - अवांछित, उपपत्तिषु - प्राप्त करके; मयि - मुझ में; च - भी; अनन्य-योगेन - अनन्य भक्ति से; भक्तिः - भक्ति; अव्यभिचारिणी - बिना व्यवधान के; विविक्त - एकांत; देश - स्थानों की; सेवित्वम् - आकांक्षा करते हुए; अरतिः - अनासक्त भाव से; जन-संसदि - सामान्य लोगों को; अध्यात्म - आत्मा सम्बन्धी; ज्ञान - ज्ञान में; नित्यत्वम् - शाश्र्वतता; तत्त्वज्ञान - सत्य के ज्ञान के; अर्थ - हेतु; दर्शनम् - दर्शनशास्त्र; एतत् - यह सारा; ज्ञानम् - ज्ञान; इति - इस प्रकार; प्रोक्तम् - घोषित; अज्ञानम् - अज्ञान; यत् - जो; अतः - इससे; अन्यथा - अन्य, इतर |
भावार्थ
विनम्रता, दम्भहीनता, अहिंसा, सहिष्णुता, सरलता, प्रामाणिक गुरु के पास जाना, पवित्रता, स्थिरता, आत्मसंयम, इन्द्रियतृप्ति के विषयों का परित्याग, अहंकार का अभाव, जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा रोग के दोषों की अनुभूति, वैराग्य, सन्तान, स्त्री, घर तथा अन्य वस्तुओं की ममता से मुक्ति, अच्छी तथा बुरी घटनाओं के प्रति समभाव, मेरे प्रति निरन्तर अनन्य भक्ति, एकान्त स्थान में रहने की इच्छा, जन समूह से विलगाव, आत्म-साक्षात्कार की महत्ता को स्वीकारना, तथा परम सत्य की दार्शनिक खोज - इन सबको मैं ज्ञान घोषित करता हूँ और इनके अतिरिक्त जो भी है, वह सब अज्ञान है |

21/05/2026

ŚB 4.25.62

विप्रलब्धो महिष्यैवं सर्वप्रकृतिवञ्चित: ।
नेच्छन्ननुकरोत्यज्ञ: क्लैब्यात्क्रीडामृगो यथा ॥ ६२ ॥

20/05/2026

Gita Class Chapter 13 Shloka 8-12 BG Class 13.8-12
अध्याय 13 : प्रकृति, पुरुष तथा चेतना
श्लोक 13.8-12
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् |
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः || ८ ||
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च |
जन्ममृत्युजराव्याधिदु:खदोषानुदर्शनम् || ९ ||
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु |
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु || १० ||
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी |
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि || ११ ||
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् |
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोSन्यथा || १२ ||
अमानित्वम् - विनम्रता; अदाम्भित्वम् - दम्भविहीनता; अहिंसा - अहिंसा; क्षान्तिः - सहनशीलता, सहिष्णुता; आर्जवम् - सरलता; आचार्य-उपासनम् - प्रामाणिक गुरु के पास जाना; शौचम् - पवित्रता; स्थैर्यम् - दृढ़ता; आत्म-विनिग्रहः - आत्म-संयम; इन्द्रिय-अर्थेषु - इन्द्रियों के मामले में; वैराग्यम् - वैराग्य; अनहंकारः - मिथ्या अभिमान से रहित; एव - निश्चय ही; च - भी; जन्म - जन्म; मृत्यु - मृत्यु; जरा - बुढ़ापा; व्याधि - तथा रोग का; दुःख - दुख का; दोष - बुराई; अनुदर्शनम् - देखते हुए; आसक्तिः - बिना आसक्ति के; अनभिष्वङगः - बिना संगति के ; पुत्र - पुत्र; दार - स्त्री; गृह-आदिषु - घर आदि में; नित्यम् - निरन्तर; च - भी; सम-चित्तत्वम् - समभाव; इष्ट - इच्छित; अनिष्ट - अवांछित, उपपत्तिषु - प्राप्त करके; मयि - मुझ में; च - भी; अनन्य-योगेन - अनन्य भक्ति से; भक्तिः - भक्ति; अव्यभिचारिणी - बिना व्यवधान के; विविक्त - एकांत; देश - स्थानों की; सेवित्वम् - आकांक्षा करते हुए; अरतिः - अनासक्त भाव से; जन-संसदि - सामान्य लोगों को; अध्यात्म - आत्मा सम्बन्धी; ज्ञान - ज्ञान में; नित्यत्वम् - शाश्र्वतता; तत्त्वज्ञान - सत्य के ज्ञान के; अर्थ - हेतु; दर्शनम् - दर्शनशास्त्र; एतत् - यह सारा; ज्ञानम् - ज्ञान; इति - इस प्रकार; प्रोक्तम् - घोषित; अज्ञानम् - अज्ञान; यत् - जो; अतः - इससे; अन्यथा - अन्य, इतर |
भावार्थ
विनम्रता, दम्भहीनता, अहिंसा, सहिष्णुता, सरलता, प्रामाणिक गुरु के पास जाना, पवित्रता, स्थिरता, आत्मसंयम, इन्द्रियतृप्ति के विषयों का परित्याग, अहंकार का अभाव, जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा रोग के दोषों की अनुभूति, वैराग्य, सन्तान, स्त्री, घर तथा अन्य वस्तुओं की ममता से मुक्ति, अच्छी तथा बुरी घटनाओं के प्रति समभाव, मेरे प्रति निरन्तर अनन्य भक्ति, एकान्त स्थान में रहने की इच्छा, जन समूह से विलगाव, आत्म-साक्षात्कार की महत्ता को स्वीकारना, तथा परम सत्य की दार्शनिक खोज - इन सबको मैं ज्ञान घोषित करता हूँ और इनके अतिरिक्त जो भी है, वह सब अज्ञान है |

18/05/2026

Gita Class Chapter 13 Shloka 8-12 BG Class 13.8-12
अध्याय 13 : प्रकृति, पुरुष तथा चेतना
श्लोक 13.8-12
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् |
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः || ८ ||
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च |
जन्ममृत्युजराव्याधिदु:खदोषानुदर्शनम् || ९ ||
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु |
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु || १० ||
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी |
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि || ११ ||
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् |
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोSन्यथा || १२ ||
अमानित्वम् - विनम्रता; अदाम्भित्वम् - दम्भविहीनता; अहिंसा - अहिंसा; क्षान्तिः - सहनशीलता, सहिष्णुता; आर्जवम् - सरलता; आचार्य-उपासनम् - प्रामाणिक गुरु के पास जाना; शौचम् - पवित्रता; स्थैर्यम् - दृढ़ता; आत्म-विनिग्रहः - आत्म-संयम; इन्द्रिय-अर्थेषु - इन्द्रियों के मामले में; वैराग्यम् - वैराग्य; अनहंकारः - मिथ्या अभिमान से रहित; एव - निश्चय ही; च - भी; जन्म - जन्म; मृत्यु - मृत्यु; जरा - बुढ़ापा; व्याधि - तथा रोग का; दुःख - दुख का; दोष - बुराई; अनुदर्शनम् - देखते हुए; आसक्तिः - बिना आसक्ति के; अनभिष्वङगः - बिना संगति के ; पुत्र - पुत्र; दार - स्त्री; गृह-आदिषु - घर आदि में; नित्यम् - निरन्तर; च - भी; सम-चित्तत्वम् - समभाव; इष्ट - इच्छित; अनिष्ट - अवांछित, उपपत्तिषु - प्राप्त करके; मयि - मुझ में; च - भी; अनन्य-योगेन - अनन्य भक्ति से; भक्तिः - भक्ति; अव्यभिचारिणी - बिना व्यवधान के; विविक्त - एकांत; देश - स्थानों की; सेवित्वम् - आकांक्षा करते हुए; अरतिः - अनासक्त भाव से; जन-संसदि - सामान्य लोगों को; अध्यात्म - आत्मा सम्बन्धी; ज्ञान - ज्ञान में; नित्यत्वम् - शाश्र्वतता; तत्त्वज्ञान - सत्य के ज्ञान के; अर्थ - हेतु; दर्शनम् - दर्शनशास्त्र; एतत् - यह सारा; ज्ञानम् - ज्ञान; इति - इस प्रकार; प्रोक्तम् - घोषित; अज्ञानम् - अज्ञान; यत् - जो; अतः - इससे; अन्यथा - अन्य, इतर |
भावार्थ
विनम्रता, दम्भहीनता, अहिंसा, सहिष्णुता, सरलता, प्रामाणिक गुरु के पास जाना, पवित्रता, स्थिरता, आत्मसंयम, इन्द्रियतृप्ति के विषयों का परित्याग, अहंकार का अभाव, जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा रोग के दोषों की अनुभूति, वैराग्य, सन्तान, स्त्री, घर तथा अन्य वस्तुओं की ममता से मुक्ति, अच्छी तथा बुरी घटनाओं के प्रति समभाव, मेरे प्रति निरन्तर अनन्य भक्ति, एकान्त स्थान में रहने की इच्छा, जन समूह से विलगाव, आत्म-साक्षात्कार की महत्ता को स्वीकारना, तथा परम सत्य की दार्शनिक खोज - इन सबको मैं ज्ञान घोषित करता हूँ और इनके अतिरिक्त जो भी है, वह सब अज्ञान है |

16/05/2026

उपदेशामृत श्लोक 4 #उपदेशामृत श्लोक 4
ददाति प्रतिगृह्णाति गुह्यमाख्याति पृच्छति ।
भुङ्के भोजयते चैव षड्वधं प्रीति-लक्षणम् ॥ 4॥
शब्दार्थ
ददाति-दान देता है; प्रतिगृह्वाति-बदले में स्वीकार करता है; गुह्यम्–गोपनीय विषय, आख्याति—बताता है; पृच्छति—पूछता है; भुङ्गे-खाता है; भोजयते-खिलाता है; च-भी; एव-निश्चय ही; षट्–विधम्–छह प्रकार के; प्रीति–प्रेम; लक्षणम्-लक्षण।
अनुवाद
दान में उपहार देना, दान-स्वरूप उपहार स्वीकार करना,विश्वास में आकर अपने मन की बातें प्रकट करना, गोपनीय ढंग से पूछना, प्रसाद ग्रहण करना तथा प्रसाद अर्पित करना-भत्तों के आपस में प्रेमपूर्ण व्यवहार के ये छह लक्षण हैं।

14/05/2026

Gita Class Chapter 13 Shloka 8-12 BG Class 13.8-12
अध्याय 13 : प्रकृति, पुरुष तथा चेतना
श्लोक 13.8-12
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् |
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः || ८ ||
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च |
जन्ममृत्युजराव्याधिदु:खदोषानुदर्शनम् || ९ ||
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु |
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु || १० ||
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी |
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि || ११ ||
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् |
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोSन्यथा || १२ ||
अमानित्वम् - विनम्रता; अदाम्भित्वम् - दम्भविहीनता; अहिंसा - अहिंसा; क्षान्तिः - सहनशीलता, सहिष्णुता; आर्जवम् - सरलता; आचार्य-उपासनम् - प्रामाणिक गुरु के पास जाना; शौचम् - पवित्रता; स्थैर्यम् - दृढ़ता; आत्म-विनिग्रहः - आत्म-संयम; इन्द्रिय-अर्थेषु - इन्द्रियों के मामले में; वैराग्यम् - वैराग्य; अनहंकारः - मिथ्या अभिमान से रहित; एव - निश्चय ही; च - भी; जन्म - जन्म; मृत्यु - मृत्यु; जरा - बुढ़ापा; व्याधि - तथा रोग का; दुःख - दुख का; दोष - बुराई; अनुदर्शनम् - देखते हुए; आसक्तिः - बिना आसक्ति के; अनभिष्वङगः - बिना संगति के ; पुत्र - पुत्र; दार - स्त्री; गृह-आदिषु - घर आदि में; नित्यम् - निरन्तर; च - भी; सम-चित्तत्वम् - समभाव; इष्ट - इच्छित; अनिष्ट - अवांछित, उपपत्तिषु - प्राप्त करके; मयि - मुझ में; च - भी; अनन्य-योगेन - अनन्य भक्ति से; भक्तिः - भक्ति; अव्यभिचारिणी - बिना व्यवधान के; विविक्त - एकांत; देश - स्थानों की; सेवित्वम् - आकांक्षा करते हुए; अरतिः - अनासक्त भाव से; जन-संसदि - सामान्य लोगों को; अध्यात्म - आत्मा सम्बन्धी; ज्ञान - ज्ञान में; नित्यत्वम् - शाश्र्वतता; तत्त्वज्ञान - सत्य के ज्ञान के; अर्थ - हेतु; दर्शनम् - दर्शनशास्त्र; एतत् - यह सारा; ज्ञानम् - ज्ञान; इति - इस प्रकार; प्रोक्तम् - घोषित; अज्ञानम् - अज्ञान; यत् - जो; अतः - इससे; अन्यथा - अन्य, इतर |
भावार्थ
विनम्रता, दम्भहीनता, अहिंसा, सहिष्णुता, सरलता, प्रामाणिक गुरु के पास जाना, पवित्रता, स्थिरता, आत्मसंयम, इन्द्रियतृप्ति के विषयों का परित्याग, अहंकार का अभाव, जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा रोग के दोषों की अनुभूति, वैराग्य, सन्तान, स्त्री, घर तथा अन्य वस्तुओं की ममता से मुक्ति, अच्छी तथा बुरी घटनाओं के प्रति समभाव, मेरे प्रति निरन्तर अनन्य भक्ति, एकान्त स्थान में रहने की इच्छा, जन समूह से विलगाव, आत्म-साक्षात्कार की महत्ता को स्वीकारना, तथा परम सत्य की दार्शनिक खोज - इन सबको मैं ज्ञान घोषित करता हूँ और इनके अतिरिक्त जो भी है, वह सब अज्ञान है |

13/05/2026

Gita Class Chapter 13 Shloka 6-7 BG Class 13.6-7
अध्याय 13 : प्रकृति, पुरुष तथा चेतना
श्लोक 13.6-7
महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च |
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः || ६ ||
इच्छा द्वेषः सुखं दु:खं सङ्घातश्र्चेतना धृतिः |
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् || ७ ||
महा-भूतानि - स्थूल तत्त्व; अहङकार - मिथ्या अभिमान; बुद्धिः - बुद्धि; अव्यक्तम् - अप्रकट; एव - निश्चय ही; च - भी; इन्द्रियाणि - इन्द्रियाँ; दश-एकम् - ग्यारह; च - भी; पञ्च - पाँच; च - भी; इन्द्रिय-गो-चराः - इन्द्रियों के विषय; इच्छा - इच्छा; द्वेषः - घृणा; सुखम् - सुख; दुःखम् - दुख; सङघातः - समूह; चेतना - जीवन के लक्षण; धृतिः - धैर्य; एतत् - यह सारा; क्षेत्रम् - कर्मों का क्षेत्र; समासेन - संक्षेप में; स-विकारम् - अन्तः-क्रियाओं सहित; उदाहृतम् - उदाहरणस्वरूप कहा गया |
भावार्थ
पंच महाभूत, अहंकार, बुद्धि, अव्यक्त (तीनों गुणों की अप्रकट अवस्था), दसों इन्द्रियाँ तथा मन, पाँच इन्द्रियविषय, इच्छा, द्वेष, सुख, दुख, संघात, जीवन के लक्षण तथा धैर्य - इन सब को संक्षेप में कर्म का क्षेत्र तथा उसकी अन्तः-क्रियाएँ (विकार) कहा जाता है |

10/05/2026

उपदेशामृत श्लोक 3 #उपदेशामृत
श्लोक 3
उत्साहान्निश्चयाब्द्वैर्यात् तत्तत्कर्मप्रवर्तनात् ।
सङ्गत्यागात्सतो वृत्तेः षड्भर्भक्तिः प्रसिध्यति ॥ 3॥
शब्दार्थ
उत्साहात्-उत्साह से; निश्चयात्-निश्चय से; धैर्यात्-धैर्य से; तत्-तत्-कर्म-भक्तिमय सेवा के अनुकूल विभिन्न कार्य; प्रवर्तनात् – संपन्न करने से; सङ्ग-त्यागात्-अभक्तों की संगति इने से; सप्तः-महान् पूर्ववर्ती आचार्यो का; वृत्तेः--पदचिह्नों का अनुसरण करने से; षड्भः-इन छहों से; भक्ति:-भक्ति; प्रसिध्यति-अग्रसर होती है या सफल होती है।
अनुवाद
शुद्ध भक्ति को सम्पन्न करने में छह सिद्धान्त अनुकूल होते हैं: (1) उत्साही बने रहना (2) निश्चय के साथ प्रयास करना (3) धैर्यवान होना (4) नियामक सिद्धान्तों के अनुसार कर्म करना (यथा श्रवण कीर्तनं विष्णो: स्मरणम्-कृष्ण का श्रवण, कीर्तन तथा स्मरण करना) (5) अभक्तों की संगति छोड़ देना तथा (6) पूर्ववर्ती आचार्यों के चरणचिह्नों पर चलना। ये छहों सिद्धान्त निस्सन्देह शुद्ध भक्ति की पूर्ण सफलता के प्रति आश्वस्त करते हैं।

09/05/2026

उपदेशामृत श्लोक 3 #उपदेशामृत
श्लोक 3
उत्साहान्निश्चयाब्द्वैर्यात् तत्तत्कर्मप्रवर्तनात् ।
सङ्गत्यागात्सतो वृत्तेः षड्भर्भक्तिः प्रसिध्यति ॥ 3॥
शब्दार्थ
उत्साहात्-उत्साह से; निश्चयात्-निश्चय से; धैर्यात्-धैर्य से; तत्-तत्-कर्म-भक्तिमय सेवा के अनुकूल विभिन्न कार्य; प्रवर्तनात् – संपन्न करने से; सङ्ग-त्यागात्-अभक्तों की संगति इने से; सप्तः-महान् पूर्ववर्ती आचार्यो का; वृत्तेः--पदचिह्नों का अनुसरण करने से; षड्भः-इन छहों से; भक्ति:-भक्ति; प्रसिध्यति-अग्रसर होती है या सफल होती है।
अनुवाद
शुद्ध भक्ति को सम्पन्न करने में छह सिद्धान्त अनुकूल होते हैं: (1) उत्साही बने रहना (2) निश्चय के साथ प्रयास करना (3) धैर्यवान होना (4) नियामक सिद्धान्तों के अनुसार कर्म करना (यथा श्रवण कीर्तनं विष्णो: स्मरणम्-कृष्ण का श्रवण, कीर्तन तथा स्मरण करना) (5) अभक्तों की संगति छोड़ देना तथा (6) पूर्ववर्ती आचार्यों के चरणचिह्नों पर चलना। ये छहों सिद्धान्त निस्सन्देह शुद्ध भक्ति की पूर्ण सफलता के प्रति आश्वस्त करते हैं।

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