23/05/2026
Gita Class Chapter 13 Shloka 8-12 BG Class 13.8-12
अध्याय 13 : प्रकृति, पुरुष तथा चेतना
श्लोक 13.8-12
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् |
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः || ८ ||
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च |
जन्ममृत्युजराव्याधिदु:खदोषानुदर्शनम् || ९ ||
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु |
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु || १० ||
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी |
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि || ११ ||
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् |
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोSन्यथा || १२ ||
अमानित्वम् - विनम्रता; अदाम्भित्वम् - दम्भविहीनता; अहिंसा - अहिंसा; क्षान्तिः - सहनशीलता, सहिष्णुता; आर्जवम् - सरलता; आचार्य-उपासनम् - प्रामाणिक गुरु के पास जाना; शौचम् - पवित्रता; स्थैर्यम् - दृढ़ता; आत्म-विनिग्रहः - आत्म-संयम; इन्द्रिय-अर्थेषु - इन्द्रियों के मामले में; वैराग्यम् - वैराग्य; अनहंकारः - मिथ्या अभिमान से रहित; एव - निश्चय ही; च - भी; जन्म - जन्म; मृत्यु - मृत्यु; जरा - बुढ़ापा; व्याधि - तथा रोग का; दुःख - दुख का; दोष - बुराई; अनुदर्शनम् - देखते हुए; आसक्तिः - बिना आसक्ति के; अनभिष्वङगः - बिना संगति के ; पुत्र - पुत्र; दार - स्त्री; गृह-आदिषु - घर आदि में; नित्यम् - निरन्तर; च - भी; सम-चित्तत्वम् - समभाव; इष्ट - इच्छित; अनिष्ट - अवांछित, उपपत्तिषु - प्राप्त करके; मयि - मुझ में; च - भी; अनन्य-योगेन - अनन्य भक्ति से; भक्तिः - भक्ति; अव्यभिचारिणी - बिना व्यवधान के; विविक्त - एकांत; देश - स्थानों की; सेवित्वम् - आकांक्षा करते हुए; अरतिः - अनासक्त भाव से; जन-संसदि - सामान्य लोगों को; अध्यात्म - आत्मा सम्बन्धी; ज्ञान - ज्ञान में; नित्यत्वम् - शाश्र्वतता; तत्त्वज्ञान - सत्य के ज्ञान के; अर्थ - हेतु; दर्शनम् - दर्शनशास्त्र; एतत् - यह सारा; ज्ञानम् - ज्ञान; इति - इस प्रकार; प्रोक्तम् - घोषित; अज्ञानम् - अज्ञान; यत् - जो; अतः - इससे; अन्यथा - अन्य, इतर |
भावार्थ
विनम्रता, दम्भहीनता, अहिंसा, सहिष्णुता, सरलता, प्रामाणिक गुरु के पास जाना, पवित्रता, स्थिरता, आत्मसंयम, इन्द्रियतृप्ति के विषयों का परित्याग, अहंकार का अभाव, जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा रोग के दोषों की अनुभूति, वैराग्य, सन्तान, स्त्री, घर तथा अन्य वस्तुओं की ममता से मुक्ति, अच्छी तथा बुरी घटनाओं के प्रति समभाव, मेरे प्रति निरन्तर अनन्य भक्ति, एकान्त स्थान में रहने की इच्छा, जन समूह से विलगाव, आत्म-साक्षात्कार की महत्ता को स्वीकारना, तथा परम सत्य की दार्शनिक खोज - इन सबको मैं ज्ञान घोषित करता हूँ और इनके अतिरिक्त जो भी है, वह सब अज्ञान है |