21/08/2026
Gita Class Chapter 14 all Shloka अध्याय 14 : प्रकृति के तीन गुण श्लोक 14.22 - 25 श्रीभगवानुवाच | प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव | न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति || २२ || उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते | गुणा वर्तन्त इत्येवं योSवतिष्ठति नेङ्गते || २३ || समदु:खसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः | तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः || २४ || मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयो: | सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते || २५ || श्रीभगवान् उवाच - भगवान् ने कहा; प्रकाशम् - प्रकाश; च - तथा; प्रवृत्तिम् - आसक्ति; च - तथा; मोहम् - मोह; एव च - भी; पाण्डव - हे पाण्डुपुत्र; न द्वेष्टि - घृणा नहीं करता; सम्प्रवृत्तानि - यद्यपि विकसित होने पर; न निवृत्तानि - न ही विकास रुकने पर; काङ्क्षति - चाहता है; उदासीन-वत् - निरपेक्ष की भाँति ;आसीनः - स्थित; गुणैः - गुणों के द्वारा; यः - जो; न - कभी नहीं; विचाल्यते - विचलित होता है; गुणाः - गुण; वर्तन्ते - कार्यशील होते हैं; इति एवम् - इस प्रकार जानते हुए; यः - जो; अवतिष्ठति - रहा आता है; न - कभी नहीं; ईङगते - हिलता डुलता है; सम - समान; दुःख - दुख; सुखः - तथा सुख में; स्व-स्थः - अपने में स्थित; सम - समान रूप से; लोष्ट - मिट्टी का ढेला; अश्म - पत्थर; काञ्चनः - सोना; तुल्य - समभाव; प्रिय - प्रिय; अप्रियः - तथा अप्रिय को; धीरः - धीर; तुल्य - समान; निन्दा - बुराई; आत्म-संस्तुति - तथा अपनी प्रशंसा से; मान - सम्मान; अपमानयोः - तथा अपमान में; तुल्यः - समान; मित्र - मित्र; अरि - तथा शत्रु के; पक्षयोः - पक्षों या दलों को; सर्व - सबों का; आरम्भ - प्रयत्न, उद्यम; परित्यागी - त्याग करने वाला; गुण-अतीतः - प्रकृति के गुणों से परे; सः - वह; उच्यते - कहा जाता है | भावार्थ भगवान् ने कहा - हे पाण्डुपुत्र! जो प्रकाश, आसक्ति तथा मोह के उपस्थित होने पर न तो उनसे घृणा करता है और न लुप्त हो जाने पर उनकी इच्छा करता है, जो भौतिक गुणों की इन समस्त परिक्रियाओं से निश्चल तथा अविचलित रहता है और यह जानकर कि केवल गुण की क्रियाशील हैं, उदासीन तथा दिव्य बना रहता है, जो अपने आपमें स्थित है और सुख तथा दुख को एकसमान मानता है, जो मिट्टी के ढेले, पत्थर एवं स्वर्ण के टुकड़े को समान दृष्टि से देखता है, जो अनुकूल तथा प्रतिकूल के प्रति समान बना रहता है, जो धीर है और प्रशंसा तथा बुराई, मान तथा अपमान में समान भाव से रहता है, जो शत्रु तथा मित्र के साथ सामान व्यवहार करता है और जिसने सारे भौतिक कार्यों का परित्याग कर दिया है, ऐसे व्यक्ति को प्रकृति के गुणों से अतीत कहते हैं |