Hare Krishna Center Deoghar

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24/08/2026

bhagavad gita 14.26- bg 14.26 gita class, Iskcon, rupanuga das
Gita Class Chapter 14 all Shloka
अध्याय 14 : प्रकृति के तीन गुण
श्लोक 14.26
मां च योSव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते |
स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते || २६ ||
माम् - मेरी; च - भी; यः - जो व्यक्ति; अव्यभिचारेण - बिना विचलित हुए; भक्ति-योगेन - भक्ति से; सेवते - सेवा करता है; सः - वह; गुणान् - प्रकृति के गुणों को; समतीत्य - लाँघ कर; एतान् - इन सब; ब्रह्म-भूयाय - ब्रह्म पद तक ऊपर उठा हुआ; कल्पते - हो जाता है |
भावार्थ
जो समस्त परिस्थितियों में अविचलित भाव से पूर्ण भक्ति में प्रवृत्त होता है, वह तुरन्त ही प्रकृति के गुणों को लाँघ जाता है और इस प्रकार ब्रह्म के स्तर तक पहुँच जाता है |

22/08/2026

bhagavad gita 14.22- bg 14.23 bg 14.24 Bg 14.25 gita class, Iskcon, rupanuga das
Gita Class Chapter 14 all Shloka
अध्याय 14 : प्रकृति के तीन गुण
श्लोक 14.22 - 25
श्रीभगवानुवाच |
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव |
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति || २२ ||
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते |
गुणा वर्तन्त इत्येवं योSवतिष्ठति नेङ्गते || २३ ||
समदु:खसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः |
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः || २४ ||
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयो: |
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते || २५ ||
श्रीभगवान् उवाच - भगवान् ने कहा; प्रकाशम् - प्रकाश; च - तथा; प्रवृत्तिम् - आसक्ति; च - तथा; मोहम् - मोह; एव च - भी; पाण्डव - हे पाण्डुपुत्र; न द्वेष्टि - घृणा नहीं करता; सम्प्रवृत्तानि - यद्यपि विकसित होने पर; न निवृत्तानि - न ही विकास रुकने पर; काङ्क्षति - चाहता है; उदासीन-वत् - निरपेक्ष की भाँति ;आसीनः - स्थित; गुणैः - गुणों के द्वारा; यः - जो; न - कभी नहीं; विचाल्यते - विचलित होता है; गुणाः - गुण; वर्तन्ते - कार्यशील होते हैं; इति एवम् - इस प्रकार जानते हुए; यः - जो; अवतिष्ठति - रहा आता है; न - कभी नहीं; ईङगते - हिलता डुलता है; सम - समान; दुःख - दुख; सुखः - तथा सुख में; स्व-स्थः - अपने में स्थित; सम - समान रूप से; लोष्ट - मिट्टी का ढेला; अश्म - पत्थर; काञ्चनः - सोना; तुल्य - समभाव; प्रिय - प्रिय; अप्रियः - तथा अप्रिय को; धीरः - धीर; तुल्य - समान; निन्दा - बुराई; आत्म-संस्तुति - तथा अपनी प्रशंसा से; मान - सम्मान; अपमानयोः - तथा अपमान में; तुल्यः - समान; मित्र - मित्र; अरि - तथा शत्रु के; पक्षयोः - पक्षों या दलों को; सर्व - सबों का; आरम्भ - प्रयत्न, उद्यम; परित्यागी - त्याग करने वाला; गुण-अतीतः - प्रकृति के गुणों से परे; सः - वह; उच्यते - कहा जाता है |

21/08/2026

Gita Class Chapter 14 all Shloka अध्याय 14 : प्रकृति के तीन गुण श्लोक 14.22 - 25 श्रीभगवानुवाच | प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव | न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति || २२ || उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते | गुणा वर्तन्त इत्येवं योSवतिष्ठति नेङ्गते || २३ || समदु:खसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः | तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः || २४ || मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयो: | सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते || २५ || श्रीभगवान् उवाच - भगवान् ने कहा; प्रकाशम् - प्रकाश; च - तथा; प्रवृत्तिम् - आसक्ति; च - तथा; मोहम् - मोह; एव च - भी; पाण्डव - हे पाण्डुपुत्र; न द्वेष्टि - घृणा नहीं करता; सम्प्रवृत्तानि - यद्यपि विकसित होने पर; न निवृत्तानि - न ही विकास रुकने पर; काङ्क्षति - चाहता है; उदासीन-वत् - निरपेक्ष की भाँति ;आसीनः - स्थित; गुणैः - गुणों के द्वारा; यः - जो; न - कभी नहीं; विचाल्यते - विचलित होता है; गुणाः - गुण; वर्तन्ते - कार्यशील होते हैं; इति एवम् - इस प्रकार जानते हुए; यः - जो; अवतिष्ठति - रहा आता है; न - कभी नहीं; ईङगते - हिलता डुलता है; सम - समान; दुःख - दुख; सुखः - तथा सुख में; स्व-स्थः - अपने में स्थित; सम - समान रूप से; लोष्ट - मिट्टी का ढेला; अश्म - पत्थर; काञ्चनः - सोना; तुल्य - समभाव; प्रिय - प्रिय; अप्रियः - तथा अप्रिय को; धीरः - धीर; तुल्य - समान; निन्दा - बुराई; आत्म-संस्तुति - तथा अपनी प्रशंसा से; मान - सम्मान; अपमानयोः - तथा अपमान में; तुल्यः - समान; मित्र - मित्र; अरि - तथा शत्रु के; पक्षयोः - पक्षों या दलों को; सर्व - सबों का; आरम्भ - प्रयत्न, उद्यम; परित्यागी - त्याग करने वाला; गुण-अतीतः - प्रकृति के गुणों से परे; सः - वह; उच्यते - कहा जाता है | भावार्थ भगवान् ने कहा - हे पाण्डुपुत्र! जो प्रकाश, आसक्ति तथा मोह के उपस्थित होने पर न तो उनसे घृणा करता है और न लुप्त हो जाने पर उनकी इच्छा करता है, जो भौतिक गुणों की इन समस्त परिक्रियाओं से निश्चल तथा अविचलित रहता है और यह जानकर कि केवल गुण की क्रियाशील हैं, उदासीन तथा दिव्य बना रहता है, जो अपने आपमें स्थित है और सुख तथा दुख को एकसमान मानता है, जो मिट्टी के ढेले, पत्थर एवं स्वर्ण के टुकड़े को समान दृष्टि से देखता है, जो अनुकूल तथा प्रतिकूल के प्रति समान बना रहता है, जो धीर है और प्रशंसा तथा बुराई, मान तथा अपमान में समान भाव से रहता है, जो शत्रु तथा मित्र के साथ सामान व्यवहार करता है और जिसने सारे भौतिक कार्यों का परित्याग कर दिया है, ऐसे व्यक्ति को प्रकृति के गुणों से अतीत कहते हैं |

19/08/2026

bhagavad gita 14.21-, bg 14.21, gita class, कर्म का फल Iskcon, rupanuga das
Gita Class Chapter 14 all Shloka
अध्याय 14 : प्रकृति के तीन गुण
श्लोक 14.21
अर्जुन उवाच |
कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो |
किमाचारः कथं चेतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते || २१ ||
अर्जुनःउवाच - अर्जुन ने कहा; कैः - किन; लिङगैः - लक्षणों से; त्रीन् - तीनों; गुणान् - गुणों को; एतान् - ये सब; अतीतः - लाँघा हुआ; भवति - है; प्रभो - हे प्रभु; किम् - क्या; आचारः - आचरण; कथम् - कैसे; च - भी; एतान् - ये; त्रीन् - तीनों; गुणान् - गुणों को; अतिवर्तते - लाँघता है |
भावार्थ
अर्जुन ने पूछा - हे भगवान्! जो इन तीनों गुणों से परे है, वह किन लक्षणों के द्वारा जाना जाता है ? उसका आचरण कैसा होता है ? और वह प्रकृति के गुणों को किस प्रकार लाँघता है ?

18/08/2026

bhagavad gita 14.20-, bg 14.20, gita class, कर्म का फल Iskcon, rupanuga das Gita Class Chapter 14 all Shloka अध्याय 14 : प्रकृति के तीन गुण श्लोक 14.20 गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् | जन्ममृत्युजरादु:खैर्विमुक्तोSमृतमश्र्नुते || २० || गुणान् - गुणों को; एतान् - इन सब; अतीत्य - लाँघ कर; त्रीन् - तीन; देही - देहधारी; देह - शरीर; समुद्भवान् - उत्पन्न; जन्म - जन्म; मृत्यु - मृत्यु; जरा - बुढ़ापे का; दुःखै - दुखों से; विमुक्तः - मुक्त; अमृतम् - अमृत; अश्नुते - भोगता है । भावार्थ जब देहधारी जीव भौतिक शरीर से सम्बद्ध इन तीनों गुणों को लाँघने में समर्थ होता है, तो वह जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा तथा अनेक कष्टों से मुक्त हो सकता है और इसी जीवन में अमृत का भोग कर सकता है ।

18/08/2026

bhagavad gita 14.20-, bg 14.20, gita class, कर्म का फल Iskcon, rupanuga das
Gita Class Chapter 14 all Shloka
अध्याय 14 : प्रकृति के तीन गुण
श्लोक 14.20
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् |
जन्ममृत्युजरादु:खैर्विमुक्तोSमृतमश्र्नुते || २० ||
गुणान् - गुणों को; एतान् - इन सब; अतीत्य - लाँघ कर; त्रीन् - तीन; देही - देहधारी; देह - शरीर; समुद्भवान् - उत्पन्न; जन्म - जन्म; मृत्यु - मृत्यु; जरा - बुढ़ापे का; दुःखै - दुखों से; विमुक्तः - मुक्त; अमृतम् - अमृत; अश्नुते - भोगता है ।
भावार्थ
जब देहधारी जीव भौतिक शरीर से सम्बद्ध इन तीनों गुणों को लाँघने में समर्थ होता है, तो वह जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा तथा अनेक कष्टों से मुक्त हो सकता है और इसी जीवन में अमृत का भोग कर सकता है ।

17/08/2026

bhagavad gita 14.19-, bg 14.19, gita class, कर्म का फल Iskcon, rupanuga das
Gita Class Chapter 14 all Shloka
अध्याय 14 : प्रकृति के तीन गुण
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति |
गुनेभ्यश्र्च परं वेत्ति मद्भावं सोSधिगच्छति || १९ ||
न - नहीं; अन्यम् - दूसरा; गुणेभ्यः - गुणों के अतिरिक्त; कर्तारम् - करता; यदा - जब; द्रष्टा - देखने वाला; अनुपश्यति - ठीक से देखता है; गुणेभ्यः - गुणों से; च - तथा; परम् - दिव्य; वेत्ति - जानता है; मत्-भावम् - मेरे दिव्य स्वभाव को; सः - वह; अधिगच्छति - प्राप्त होता है |
भावार्थ
जब कोई यह अच्छी तरह जान लेता है कि समस्त कार्यों में प्रकृति के तीनों गुणों के अतिरिक्त अन्य कोई करता नहीं है और जब वह परमेश्र्वर को जान लेता है, जो इन तीनों गुणों से परे है, तो वह मेरे दिव्य स्वभाव को प्राप्त होता है |

13/08/2026

bhagavad gita 14.17-, bg 14.17, gita class, कर्म का फल Iskcon, rupanuga das
Gita Class Chapter 14 all Shloka
अध्याय 14 : प्रकृति के तीन गुण
श्लोक 14.17
सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च |
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च || १७ ||
सत्त्वात् - सतोगुण से; सञ्जायते - उत्पन्न होता है; ज्ञानम् - ज्ञान; रजसः - रजोगुण से; लोभः - लालच; एव - निश्चय ही; च - भी; प्रमाद - पागलपन; मोहौ - तथा मोह; तमसः - तमोगुण से; भवतः - होता है; अज्ञानम् - अज्ञान; एव - निश्चय ही; च - भी |
भावार्थ
सतोगुण से वास्तविक ज्ञान उत्पन्न होता है, रजोगुण से लोभ उत्पन्न होता है और तमोगुण से अज्ञान, प्रमाद और मोह उत्पन्न होता हैं |

12/08/2026

bhagavad gita 14.16-, bg 14.16, gita class, कर्म का फल Iskcon, rupanuga das
Gita Class Chapter 14 all Shloka
अध्याय 14 : प्रकृति के तीन गुण
श्लोक 14.16
कर्मणः सुकृतस्याहु: सात्त्विकं निर्मलं फलम् |
रजसस्तु फलं दु:खमज्ञानं तमसः फलम् || १६ ||
कर्मणः - कर्म का; सु-कृतस्य - पुण्य; आहुः - कहा गया है; सात्त्विकम् - सात्त्विक; निर्मलम् - विशुद्ध; फलम् - फल; रजसः - रजोगुण का; तु - लेकिन; फलम् - फल; दुःखम् - दुख; अज्ञानम् - व्यर्थ; तमसः - तमोगुण का; फलम् - फल |
भावार्थ
पुण्यकर्म का फल शुद्ध होता है और सात्त्विक कहलाता है । लेकिन रजोगुण में सम्पन्न कर्म का फल दुख होता है और तमोगुण में किये गये कर्म मूर्खता में प्रतिफलित होते हैं ।

11/08/2026

bhagavad gita 14.16-, bg 14.16, gita class, कर्म का फल Iskcon, rupanuga das
Gita Class Chapter 14 all Shloka
अध्याय 14 : प्रकृति के तीन गुण
श्लोक 14.16
कर्मणः सुकृतस्याहु: सात्त्विकं निर्मलं फलम् |
रजसस्तु फलं दु:खमज्ञानं तमसः फलम् || १६ ||
कर्मणः - कर्म का; सु-कृतस्य - पुण्य; आहुः - कहा गया है; सात्त्विकम् - सात्त्विक; निर्मलम् - विशुद्ध; फलम् - फल; रजसः - रजोगुण का; तु - लेकिन; फलम् - फल; दुःखम् - दुख; अज्ञानम् - व्यर्थ; तमसः - तमोगुण का; फलम् - फल |
भावार्थ
पुण्यकर्म का फल शुद्ध होता है और सात्त्विक कहलाता है । लेकिन रजोगुण में सम्पन्न कर्म का फल दुख होता है और तमोगुण में किये गये कर्म मूर्खता में प्रतिफलित होते हैं ।

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