20/03/2026
#उपदेशामृत
श्रीउपदेशामृत
श्लोक 1
वाचो वेगं मनसः क्रोधवेगं
जिह्वावेगमुदरोपस्थ वेगम् ।
एतान्वेगान् यो विषहेत धीरः
सर्वामिपीमां पृथिवींस शिष्यात् ॥1॥
शब्दार्थ
वाच:-वाणी के; वेगम्–वेग को; मनसः-मन के; क्रोधक्रोध के; वेगम्–वेग को; जिह्वा—जीभ के; वेगम्—वेग को; उदर-उपस्थ-पेट तथा जननेन्द्रियों के; वेगम्-वेग को;एतान्-इन; वेगान्-वेगों को; यः-जो; विषहेत-सहन कर सकता है; धीर-धीर, गम्भीर, सर्वाम्-समस्त, अपि-निश्चय ही; इमाम्-इस; पृथिवीम्-संसार; सः-वह व्यक्ति; शिष्यात्-शिष्य बना सकता है।
अनुवाद
वह धीर व्यक्ति जो वाणी के वेग को, मन की माँगों को, क्रोध की क्रियाओं को तथा जीभ, उदर एवं जननेन्द्रियों के वेगों को सहन करसकता है, वह सारे संसार में शिष्य बनाने के लिए योग्य है।