Hare Krishna Center Deoghar

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20/03/2026

#उपदेशामृत
श्रीउपदेशामृत
श्लोक 1
वाचो वेगं मनसः क्रोधवेगं
जिह्वावेगमुदरोपस्थ वेगम् ।
एतान्वेगान् यो विषहेत धीरः
सर्वामिपीमां पृथिवींस शिष्यात् ॥1॥
शब्दार्थ
वाच:-वाणी के; वेगम्–वेग को; मनसः-मन के; क्रोधक्रोध के; वेगम्–वेग को; जिह्वा—जीभ के; वेगम्—वेग को; उदर-उपस्थ-पेट तथा जननेन्द्रियों के; वेगम्-वेग को;एतान्-इन; वेगान्-वेगों को; यः-जो; विषहेत-सहन कर सकता है; धीर-धीर, गम्भीर, सर्वाम्-समस्त, अपि-निश्चय ही; इमाम्-इस; पृथिवीम्-संसार; सः-वह व्यक्ति; शिष्यात्-शिष्य बना सकता है।
अनुवाद
वह धीर व्यक्ति जो वाणी के वेग को, मन की माँगों को, क्रोध की क्रियाओं को तथा जीभ, उदर एवं जननेन्द्रियों के वेगों को सहन करसकता है, वह सारे संसार में शिष्य बनाने के लिए योग्य है।

19/03/2026

Gita Class Chapter 12 Shloka 11 BG Class 12.11 अगर भगवान् के लिए कर्म भी नहीं कर सकते हैं तो फिर क्या करें ?
श्लोक 12.11
अथैतदप्यशक्तोSसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः |
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् || ११ ||
अथ - यद्यपि; एतत् - यह; अपि - भी; अशक्तः - असमर्थ; असि - हो; कर्तुम् - करने में; मत् - मेरे प्रति; योगम् - भक्ति में; आश्रितः - निर्भर; सर्व-कर्म - समस्त कर्मों के; फल - फल का; त्यागम् - त्याग; ततः - तब; कुरु - करो; यत-आत्मवान् - आत्मस्थित |
भावार्थ
किन्तु यदि तुम मेरे इस भावनामृत में कर्म करने में असमर्थ हो तो तुम अपने कर्म के समस्त फलों को त्याग कर कर्म करने का तथा आत्म-स्थित होने का प्रयत्न करो |

18/03/2026

Gita Class Chapter 12 Shloka 10 BG Class 12.10 भगवान में मन न लगे तो क्या करें ? तन लगाइए
श्लोक 12.10
अभ्यासेSप्यसमर्थोSसि मत्कर्मपरमो भव |
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि || १० ||
अभ्यासे - अभ्यास में; अपि - भी; असमर्थः - असमर्थ; असि - हो; मत्-कर्म - मेरे कर्म के प्रति; परमः - परायण; भव - बनो; मत्-अर्थम् - मेरे लिए; अपि - भी; कर्माणि - कर्म ; कुर्वन् - करते हुए; सिद्धिम् - सिद्धि को; अवाप्स्यसि - प्राप्त करोगे |
भावार्थ
यदि तुम भक्तियोग के विधि-विधानों का भी अभ्यास नहीं कर सकते, तो मेरे लिए कर्म करने का प्रयत्न करो, क्योंकि मेरे लिए कर्म करने से तुम पूर्ण अवस्था (सिद्धि) को प्राप्त होगे |

17/03/2026

Gita Class Chapter 12 Shloka 9 BG Class 12.9 भगवान में मन न लगे तो क्या करें
श्लोक 12.9
अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् |
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय || ९ ||
अथ - यदि, अतः; चित्तम् - मन को; समाधातुम् - स्थिर करने में; न - नहीं; शक्नोषि - समर्थ नहीं हो; मयि - मुझ पर; स्थिरम् - स्थिर भाव से; अभ्यास-योगेन - भक्ति के अभ्यास से; ततः - तब; माम् - मुझको; इच्छ - इच्छा करो; आप्तुम् - प्राप्त करने की; धनञ्जय - हे सम्पत्ति के विजेता, अर्जुन |
भावार्थ
हे अर्जुन, हे धनञ्जय! यदि तुम अपने चित्त को अविचल भाव से मुझ पर स्थिर नहीं कर सकते, तो तुम भक्तियोग के विधि-विधानों का पालन करो | इस प्रकार तुम मुझे करने की चाह उत्पन्न करो |

16/03/2026

Gita Class Chapter 12 Shloka 8 BG Class 12.8 निर्विशेषवादअव्यक्त की उपासना में अधिक क्लेश क्यों है ?
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेश्य |
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः || ८ ||
मयि - मुझमें; एव - निश्चय ही; मनः - मन को; आधत्स्व - स्थिर करो; मयि - मुझमें; बुद्धिम् - बुद्धि को; निवेश्य - लगाओ; निवसिष्यसि - तुम निवास करोगे; मयि - मुझमें; एव - निश्चय ही; अतः-अर्ध्वम् - तत्पश्चात्; न - कभी नहीं; संशयः - सन्देह |
भावार्थ
मुझ भगवान् में अपने चित्त को स्थिर करो और अपनी साड़ी बुद्धि मुझमें लगाओ | इस प्रकार तुम निस्सन्देह मुझमें सदैव वास करोगे |

14/03/2026

#उपदेशामृत
श्रीउपदेशामृत
श्लोक 1
वाचो वेगं मनसः क्रोधवेगं
जिह्वावेगमुदरोपस्थ वेगम् ।
एतान्वेगान् यो विषहेत धीरः
सर्वामिपीमां पृथिवींस शिष्यात् ॥1॥
शब्दार्थ
वाच:-वाणी के; वेगम्–वेग को; मनसः-मन के; क्रोधक्रोध के; वेगम्–वेग को; जिह्वा—जीभ के; वेगम्—वेग को; उदर-उपस्थ-पेट तथा जननेन्द्रियों के; वेगम्-वेग को;एतान्-इन; वेगान्-वेगों को; यः-जो; विषहेत-सहन कर सकता है; धीर-धीर, गम्भीर, सर्वाम्-समस्त, अपि-निश्चय ही; इमाम्-इस; पृथिवीम्-संसार; सः-वह व्यक्ति; शिष्यात्-शिष्य बना सकता है।

13/03/2026

Class

11/03/2026

Gita Class Chapter 12 Shloka 6-7 BG Class 12.6-7 निर्विशेषवादअव्यक्त की उपासना में अधिक क्लेश क्यों है ?
श्लोक 12.6 - 7
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्पराः |
अनन्ये नैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते || ६ ||
तेषाम हं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् |
भवामि न चिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् || ७ ||
ये - जो; तु - लेकिन; सर्वाणि - समस्त; कर्माणि - कर्मों को; मयि - मुझमें; संन्यस्य - त्याग कर; मत्-पराः - मुझमें आसक्त; अनन्येन - अनन्य; एव - निश्चय ही; योगेन - ऐसे भक्तियोग के अभ्यास से; माम् - मुझको; ध्यायन्तः - ध्यान करते हुए; उपासते - पूजा करते हैं; तेषाम् - उनका; अहम् - मैं; समुद्धर्ता - उद्धारक; मृत्यु - मृत्यु के; संसार - संसार रूपी; सागरात् - समुद्र से; भवामि - होता हूँ; न - नहीं; चिरात् - दीर्घकाल के बाद; पार्थ - हे पृथापुत्र; मयि - मुझ पर; आवेशित - स्थिर; चेतसाम् - मन वालों को |
भावार्थ
जो अपने सारे कार्यों को मुझमें अर्पित करके तथा अविचलित भाव से मेरी भक्ति करते हुए मेरी पूजा करते हैं और अपने चित्तों को मुझ पर स्थिर करके निरन्तर मेरा ध्यान करते हैं, उनके लिए हे पार्थ! मैं जन्म-मृत्यु के सागर से शीघ्र उद्धार करने वाला हूँ |

10/03/2026

Gita Class Chapter 12 Shloka 6-7 BG Class 12.6-7 निर्विशेषवादअव्यक्त की उपासना में अधिक क्लेश क्यों है ?
श्लोक 12.6 - 7
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्पराः |
अनन्ये नैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते || ६ ||
तेषाम हं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् |
भवामि न चिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् || ७ ||
ये - जो; तु - लेकिन; सर्वाणि - समस्त; कर्माणि - कर्मों को; मयि - मुझमें; संन्यस्य - त्याग कर; मत्-पराः - मुझमें आसक्त; अनन्येन - अनन्य; एव - निश्चय ही; योगेन - ऐसे भक्तियोग के अभ्यास से; माम् - मुझको; ध्यायन्तः - ध्यान करते हुए; उपासते - पूजा करते हैं; तेषाम् - उनका; अहम् - मैं; समुद्धर्ता - उद्धारक; मृत्यु - मृत्यु के; संसार - संसार रूपी; सागरात् - समुद्र से; भवामि - होता हूँ; न - नहीं; चिरात् - दीर्घकाल के बाद; पार्थ - हे पृथापुत्र; मयि - मुझ पर; आवेशित - स्थिर; चेतसाम् - मन वालों को |
भावार्थ
जो अपने सारे कार्यों को मुझमें अर्पित करके तथा अविचलित भाव से मेरी भक्ति करते हुए मेरी पूजा करते हैं और अपने चित्तों को मुझ पर स्थिर करके निरन्तर मेरा ध्यान करते हैं, उनके लिए हे पार्थ! मैं जन्म-मृत्यु के सागर से शीघ्र उद्धार करने वाला हूँ |

07/03/2026

#उपदेशामृत
श्रीउपदेशामृत
श्लोक 1
वाचो वेगं मनसः क्रोधवेगं
जिह्वावेगमुदरोपस्थ वेगम् ।
एतान्वेगान् यो विषहेत धीरः
सर्वामिपीमां पृथिवींस शिष्यात् ॥1॥
शब्दार्थ
वाच:-वाणी के; वेगम्–वेग को; मनसः-मन के; क्रोधक्रोध के; वेगम्–वेग को; जिह्वा—जीभ के; वेगम्—वेग को; उदर-उपस्थ-पेट तथा जननेन्द्रियों के; वेगम्-वेग को;एतान्-इन; वेगान्-वेगों को; यः-जो; विषहेत-सहन कर सकता है; धीर-धीर, गम्भीर, सर्वाम्-समस्त, अपि-निश्चय ही; इमाम्-इस; पृथिवीम्-संसार; सः-वह व्यक्ति; शिष्यात्-शिष्य बना सकता है।
अनुवाद
वह धीर व्यक्ति जो वाणी के वेग को, मन की माँगों को, क्रोध की क्रियाओं को तथा जीभ, उदर एवं जननेन्द्रियों के वेगों को सहन करसकता है, वह सारे संसार में शिष्य बनाने के लिए योग्य है।

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