देववृन्द

देववृन्द आदि देवनगरी देववृन्द. The ancient Metropolis of the Divinity.

शुभ दीपान्विता।
05/11/2018

शुभ दीपान्विता।

24/11/2017
दीपावली पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।
18/10/2017

दीपावली पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।

दशहरा पर शुभकामनाएं।
29/09/2017

दशहरा पर शुभकामनाएं।

20/09/2017

क्या आप जानते है कि कोई #मीडिया समूह, हिन्दू या हिन्दू संघठनो के प्रति इतना बैरभाव क्यों रखती है..?

भारत में चलने वाले न्यूज़ चैनल, अखबार वास्तव में भारत के है ही नहीं..

सन २००५ में एक फ़्रांसिसी पत्रकार भारत के दौरे पर आया उसका नाम फ़्रैन्कोईस था उसने भारत में हिंदुत्व के ऊपर हो रहे अत्याचारों के बारे में अध्ययन किया और उसने फिर बहुत हद तक इस कार्य के लिए मीडिया को जिम्मेवार ठहराया. फिर उसने पता करना शुरू किया तो वह आश्चर्य चकित रह गया कि भारत में चलने वाले न्यूज़ चैनल, अखबार वास्तव में भारत के है ही नहीं..?

विभिन्न मीडिया समूह और उनका आर्थिक श्रोत..
१- दि हिन्दू … जोशुआ सोसाईटी, बर्न, स्विट्जरलैंड, इसके संपादक एन राम, इनकी पत्नी ईसाई में बदल चुकी है.
२- एन डी टी वी… गोस्पेल ऑफ़ चैरिटी, स्पेन, यूरोप
३- सी.एन.एन, आई.बी.एन.७, सी.एन.बी.सी… १००% आर्थिक सहयोग द्वारा साउदर्न बैपिटिस्ट चर्च.
४- दि टाइम्स ऑफ़ इंडिया, नवभारत, टाइम्स नाउ… बेनेट एंड कोल्मान द्वारा संचालित, ८०% फंड वर्ल्ड क्रिस्चियन काउंसिल के द्वारा. बचा हुआ २०% एक अँगरेज़ और इटैलियन द्वारा दिया जाता है. इटैलियन व्यक्ति का नाम रोबेर्ट माइन्दो है जो यु.पी.ए. अध्यक्षा सोनिया गाँधी का निकट सम्बन्धी है.
५-हिन्दुस्तान टाइम्स, दैनिक हिन्दुस्तान… मालिक बिरला ग्रुप. लेकिन टाइम्स ग्रुप के साथ जोड़ दिया गया है...६- इंडियन एक्सप्रेस… इसे दो भागो में बांट दिया गया है, दि इंडियन एक्सप्रेस और न्यू इंडियन एक्सप्रेस (साउदर्न एडिसन) - Acts Ministries has major stake in the Indian express and later is still with the Indian कौन्तेर्पर्त
७- दैनिक जागरण ग्रुप… इसके एक प्रबंधक समाजवादी पार्टी से राज्य सभा में सांसद है. यह एक मुस्लिमवादी पार्टी है.
८- दैनिक सहारा .. इसके प्रबंधन को सहारा समूह देखती है. इसके निदेशक सुब्रोतो राय भी समाजवादी पार्टी के बहुत मुरीद है.
९- आंध्र ज्योति...हैदराबाद की एक मुस्लिम पार्टी एम् आई एम् (MIM ) ने इसे कांग्रेस के एक मंत्री के साथ कुछ साल पहले खरीद लिया.
१०- स्टार टीवी ग्रुप…सेन्ट पीटर पोंतिफिसिअल चर्च, मेलबर्न,ऑस्ट्रेलिया.
११- दि स्टेट्स मैन… कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया द्वारा संचालित.

इस तरह से एक लम्बी लिस्ट है. जिससे ये पता चलता है कि भारत की मीडिया भारतीय बिलकुल भी नहीं है. और जब इनकी फंडिंग विदेश से होती है तो भला भारत के बारे में कैसे सोच सकते है..? अपने को पाक साफ़ बताने वाली मीडिया के भ्रष्टाचार की चर्चा करना यहाँ पर पूर्णतया उचित ही होगा, बरखा दत्त जैसे लोग जिन्होंने भ्रष्टाचार का रिकार्ड कायम किया है उनके भ्रष्टाचार की चर्चा दूर दूर तक है. इसके अलावा आप लोगो को शायद न मालूम हो पर आपको बता दू कि ये १००% सही बात है कि NDTV की एंकर बरखादत्त ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया है.

प्रभु चावला जो कि खुद रिलायंस के मामले में सुप्रीम कोर्ट में फैसला फिक्स कराते हुए पकडे गए उनके सुपुत्र आलोक चावला, अमर उजाला के बरेली संस्करण में घोटाला करते हुए पकडे गए.
दैनिक जागरण ग्रुप ने अवैध तरीके से एक ही रजिस्ट्रेसन न. पर बिहार में कई जगह पर गलत ढंग से स्थानीय संस्करण प्रकाशित किया. जो कि कई साल बाद में पकड़ में आया. और इन अवैध संस्करणों से सरकार को २०० करोड़ का घटा हुआ..

दैनिक हिन्दुस्तान ने भी जागरण के नक्शेकदम पर चलते हुए यही काम किया. उसने भी २०० करोड़ रुपये का नुकशान सरकार को पहुचाया. इसके लिए हिन्दुस्तान के मुख्य संपादक शशी शेखर के ऊपर मुक़दमा भी दर्ज हुआ है. शायद यही कारण है कि भारत की मीडिया भी काले धन, लोकपाल जैसे मुद्दों पर सरकार के साथ ही भाग लेती है..

Shree Ram Krishna Dev Jie.
08/07/2017

Shree Ram Krishna Dev Jie.

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनायभस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।नित्याय शुद्धाय दिगम्बरायतस्मै नकाराय नमः शिवायमन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चि...
14/05/2017

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय
भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय
तस्मै नकाराय नमः शिवाय

मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय
नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय ।
मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय
तस्मै मकाराय नमः शिवाय

शिवाय गौरीवदनाब्जबृंदा
दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय
तस्मै शिकाराय नमः शिवाय

वशिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्यमूनीन्द्रदेवार्च¬ितशेखराय ।
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय
तस्मै वकाराय नमः शिवाय

यज्ञस्वरूपाय जटाधराय
पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय
तस्मै यकाराय नमः शिवाय

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसंनिधौ ।
शिवलोकमावाप्नोति शिवेन सह मोदते

Sanjay Dwivediक़ुतुब मीनार वास्तव में एक हिंदू प्रतिष्ठान है जिसे ध्रुव स्तंभ कहा जाता था | मुस्लिम आक्रमणकारियों ने उस प...
29/04/2017

Sanjay Dwivedi

क़ुतुब मीनार वास्तव में एक हिंदू प्रतिष्ठान है जिसे ध्रुव स्तंभ कहा जाता था | मुस्लिम आक्रमणकारियों ने उस पर जबरन कब्ज़ा कर के उसे नष्ट कर दिया व उसका स्वरुप बदल दिया | लिकिन आज भी अवशेशों में हिंदू बनावट साफ़ देखि जा सकती है |

विष्णु स्तंभ है कुतुब मीनार, जानें महत्वपूर्ण तथ्य
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कुतुब मीनार या लौह स्तम्भ एक ऐसा स्तम्भ है जिसे निजी और धार्मिक कार्यक्रम के तहत रूपांतरित किया गया, इसे अपवित्र किया गया और हेरफेर कर इसे दूसरा नाम दे दिया गया। इतिहास में ऐसे प्रमाण और लिखित दस्तावेज हैं जिनके आधार पर यह साबित किया जा सकता है कि कुतुब मीनार एक हिंदू इमारत, विष्णु स्तम्भ है। इसके बारे में एमएस भटनागर ने दो लेख लिखे हैं जिनमें इसकी उत्पत्ति, नामकरण और इसके इतिहास की समग्र जानकारी है। इनमें उस प्रचलित जानकारियों को भी आधारहीन सिद्ध किया गया है जो कि इसके बारे में इतिहास में दर्ज हैं या आमतौर पर बताई जाती हैं।

उन्होंने इतिहास में एक परास्नातक और सरकारी गाइड (मार्गदर्शक) से सवाल किए जिसके उत्तर कुछ इस तरह से दिए गए। जब गाइड से इस 'मीनार' को बनवाने का उद्देश्य पूछा गया तो उत्तर मिला कि यह एक विजय स्तम्भ है। किसने किस पर जीत हासिल की थी? मोहम्मद गोरी ने राय पिथौरा (पृथ्वीराज) पर जीत हासिल की थी। कहां जीत हासिल की थी? पानीपत के पास तराइन में। तब इस विजय स्तम्भ को दिल्ली में क्यों बनाया गया? गाइड का उत्तर था- पता नहीं। इस अवसर पर दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के एक लेक्चरर (जो कि भ्रमण के लिए आए थे) ने जवाब दिया। वि

जय स्तम्भ को गोरी ने शुरू करवाया था क्योंकि दिल्ली उसकी राजधानी थी। लेकिन गोरी ने दिल्ली में कभी अपनी राजधानी नहीं बनाई क्योंकि उसकी राजधानी तो गजनी में थी। फिर दिल्ली में विजय स्तम्भ बनाने की क्या तुक थी? कोई जवाब नहीं। अगर इमारत को गोरी ने शुरू कराया था तो इसका नाम गोरी मीनार होना चाहिए, कुतुब मीनार नहीं। इसे कुतुब मीनार क्यों कहा जाता है। इसके जवाब में कहा जाता है कि इस इमारत का निर्माण शुरू करने वाला कुतुबद्दीन एबक मोहम्मद गोरी का गुलाम था और उसने अपने मालिक के लिए इसकी नींव रखी थी। अगर यह तर्क सही है तो उसने विजय स्तम्भ के लिए दिल्ली को ही क्यों चुना? उत्तर है कि दिल्ली कुतुबुद्दीन एबक की राजधानी थी।

अब सवाल यह है कि इस मीनार का निर्माण गोरी के जीवनकाल में शुरू हो गया था, वह जीवित था तो फिर उसके गुलाम ने दिल्ली को कैसे अपनी राजधानी बना लिया था? क्या आपको पता है कि अरबी में 'कुतुब' को एक 'धुरी', 'अक्ष', 'केन्द्र बिंदु' या 'स्तम्भ या खम्भा' कहा जाता है। कुतुब को आकाशीय, खगोलीय और दिव्य गतिविधियों के लिए प्रयोग किया जाता है। यह एक खगोलीय शब्द है या फिर इसे एक आध्यात्मिक प्रतीक के तौर पर समझा जाता है। इस प्रकार कुतुब मीनार का अर्थ खगोलीय स्तम्भ या टॉवर होता है।

सुल्तानों के जमाने में इसे इसी नाम से वर्णित किया जाता था। बाद में, अदालती दस्तावेजों में भी इसका इसी नाम से उल्लेख हुआ। कालांतर में इसका नाम सुल्तान कुतुबुद्दीन एबक से जोड़ दिया गया और इसके साथ यह भी माना जाने लगा है कि इसे कुतुबुद्दीन एबक ने बनवाया था। प्रो. एमएस भटनागर, गाजियाबाद ने इस अद्वितीयी और अपूर्व इमारत के बारे में सच्चाई जाहिर की है और इससे जुड़ीं सभी भ्रामक जानकारियों, विरोधाभाषी स्पष्टीकरणों और दिल्ली के मुगल राजाओं और कुछ पुरातत्ववेताओं की गलत जानकारी को उजागर किया।

वर्ष 1961 में कॉलेज के कुछ छात्रों का दल कुतुब मीनार देखने गया। विदित हो कि गोरी की मौत के बाद कुतुबुद्दीन को लाहौर में सुल्तान बनाया गया था। उसने लाहौर से शासन किया, दिल्ली से नहीं और अंतत: उसकी मौत भी लाहौर में हुई। जब उसकी राजधानी लाहौर थी तो उसने दिल्ली में विजय स्तम्भ क्यों बनाया? भीड़ में से किसी ने ज्ञान दर्शाया कि मीनार एक विजय स्तम्भ नहीं है, वरन एक 'मजीना' है। एक मस्जिद में मु‍अज्जिन का टॉवर है जिस पर से अजान दी जाती थी और यह 'कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद' से जुड़ा था। पर भारत के समकालीन इतिहास में 'कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद' का कहीं कोई उल्लेख नहीं है। इस शब्द को उन्नीसवीं सदी में सर सैय्यद अहमद खान ने गढ़ा था। इस बात को लेकर आश्चर्यचकित ना हों कि भारतीय इतिहास में 'कुतुब मीनार' जैसा कोई शब्द नहीं है। यह हाल के समय का एक काल्पनिक तर्क है कि यह मीनार मुअज्जिन का टॉवर है। अगर ऐसा है तो मस्जिद का प्राथमिक महत्व है और टॉवर का द्वितीयक महत्व है। दुर्भाग्य की बात है कि इसके पास एक ‍मस्जिद खंडहरों में बदल चुकी है। लेकिन तब इसका मुअज्जिन का टॉवर क्यों शान से खड़ा है? इस सवाल का कोई जवाब नहीं। हकीकत तो यह है कि मस्जिद और मजीना एक पूरी तरह बकवास कहानी है। तथाकथित कुतुब मीनार और खंडहर हो चुकी जामा मस्जिद के पास मीनार को बनाने वाले एक नहीं हो सकते हैं। कुतुब मीनार एक बहुत अधिक पुराना टॉवर है। फिर मीनार पर कुरान की आयतों को क्यों अंकित किया गया है?

मीनार पर अंकित कुरान की आयतें एक जबर्दस्ती और निर्जीव डाली हुई लिखावट है जो कि पूरी तरह से हिंदू डिजाइन के सुंदर चित्रवल्लरी वाली धारियों पर ऊपर से लिखी गई हैं। कुरान की आयतों के लिहाज से इसे मुस्लिम मूल की ठहराना ठीक इसी तरह होगा जैसा कि किसी गैर-मुस्लिम का खतना कर उसे मुसलमान बना दिया जाए। यह मीनार वास्तव में ध्रुव स्तम्भ है या जिसे प्राचीन हिंदू खगोलीय वेधशाला का एक मुख्य निगरानी टॉवर या स्तम्भ है। दो सीटों वाले हवाई जहाज से देखने पर यह टॉवर 24 पंखुड़ियों वाले कमल का फूल दिखाई देता है। इसकी एक-एक पंखुड़ी एक होरा या 24 घंटों वाले डायल जैसी दिखती है। चौबीस पंखुड़ियों वाले कमल के फूल की इमारत पूरी तरह से एक‍ हिंदू विचार है। इसे पश्चिम एशिया के किसी भी सूखे हिस्से से नहीं जोड़ा जा सकता है जोकि वहां पैदा ही नहीं होता है। इस इमारत की लम्बवत प्रोजेक्शन लाइन्स जो ‍कि टॉवर की प्रत्येक स्टोरी के शीर्ष पर बनी पत्थरों पर बारीक कारीगरी के मध्य बिंदुओं से लेकर इसके आधार पर बने क्षैतिज समधरातल पर एक कमल के फूल का निर्माण करते हैं जो कि टॉवर शीर्ष के ऊपर आसमान से देखा जा सकता है। ध्रुव स्तंभ का यह कमल के रूप में उठा हुआ भाग अतीत के किसी वास्तुविद या पुरातत्ववेत्ता के द्वारा सोचा या बनाया नहीं जा सकता है। आप कह सकते हैं कि ध्रुव स्तम्भ को मोहम्मद गोरी या कुतुबुद्दीन एबक का निर्माण बताने का को‍ई प्रश्न नहीं है। जिन सुल्तानों का इस मीनार के साथ नाम जुड़ा है, उन्होंने इसके आवरण को नष्ट कर दिया, जिन पत्थरों पर मनुष्य या पशुओं के आकार बने थे, उन्हें उलटा कर दिया और इन पर अरबी में लिखावट को उत्कीर्ण कर डाला। वास्तव में, इन सुल्तानों की इस बात के लिए प्रशंसा नहीं की जा सकती है कि उन्होंने मीनार बनाई। किसी भी व्यक्ति ने इस आशय का लेख, अभिलेख या शिलालेख छोड़ा है कि उसने इस मीनार के बनवाने की शुरुआत कराई। कुतुब मीनार को लेकर ही इस बात के बहुत अधिक प्रमाण हैं कि यह एक हिंदू टॉवर था जो कि कुतुबुद्दीन से भी सैकड़ों वर्षों पहले मौजूद था। इसलिए इसका नाम कुतुबुद्दीन से जोड़ना गलत होगा। कुतुब मीनार के पास जो बस्ती है उसे महरौली कहा जाता है। यह एक संस्कृ‍त शब्द है जिसे मिहिर-अवेली कहा जाता है। इस कस्बे के बारे में कहा जा सकता है कि यहां पर विख्यात खगोलज्ञ मिहिर (जो कि विक्रमादित्य के दरबार में थे) रहा करते थे। उनके साथ उनके सहायक, गणितज्ञ और तकनीकविद भी रहते थे। वे लोग इस कथित कुतुब टॉवर का खगोलीय गणना, अध्ययन के लिए प्रयोग करते थे। इस टॉवर के चारों ओर हिंदू राशि चक्र को समर्पित 27 नक्षत्रों या तारामंडलों के लिए मंडप या गुंबजदार इमारतें थीं। कुतुबुद्दी्न के एक विवरण छोड़ा है जिसमें उसने लिखा कि उसने इन सभी मंडपों या गुंबजदार इमारतों को नष्ट कर दिया था, लेकिन उसने यह नहीं लिखा कि उसने कोई मीनार बनवाई।

जिस मंदिर को उसने नष्ट भ्रष्ट कर दिया था, उसे ही कुव्वत-अल-इस्लाम मस्जिद का नाम दिया। तथाकथित कुतुब मीनार से निकाले गए पत्थरों के एक ओर हिंदू मूर्तियां थीं जबकि इसके दूसरी ओर अरबी में अक्षर लिखे हुए हैं। इन पत्थरों को अब म्यूजियम में रख दिया गया है। इससे यह बात साबित होती है कि मुस्लिम हमलावर हिंदू इमारतों की स्टोन-ड्रेसिंग या पत्थुरों के आवरण को निकाल लेते थे और मूर्ति का चेहरा या सामने का हिस्सा बदलकर इसे अरबी में लिखा अगला हिस्सा बना देते थे। बहुत सारे परिसरों के खम्भों और दीवारों पर संस्कृत में लिखे विवरणों को अभी भी पढ़ा जा सकता है। कॉर्निस में बहुत सारी मूर्तियों को देखा जा सकता है लेकिन इन्हें तोड़फोड़ दिया गया है। यह टॉवर आसपास की इमारतों का हिस्सा है। ऐसा नहीं है कि पहले की हिंदू इमारतों के चारों ओर काफी जगह होती थी और यह जगह पर्याप्त थी कि कुतुबुद्दीन आए और इसमें एक टॉवर बना दे, लेकिन स्तम्भ की अलंकृत शैली यह सिद्ध करती है कि यह एक हिंदू इमारत है। मुस्लिम मीनारों की धरातल पूरी तरह समतल होता है। जो लोग यह तर्क करते हैं कि इस टॉवर का उपयोग मुस्लिमों की अजान के लिए होता था, तो ऐसे लोग कभी इसके ऊपर तक नहीं गए हैं और उन्होंने ऊपर से नीचे रहने वाले के लिए कभी चिल्लाकर नहीं देखा होगा।

अगर उन्होंने ऐसा किया होता तो उन्हें पता लग जाता कि इतनी ऊंचाई से बोले गए शब्दों को नीचे खड़ा आदमी सुन ही नहीं सकता है। इस तरह के बेहूदा और मूर्खतापूर्ण दावे प्राचीन हिंदू इमारतों को इस्लामी बनाने के लिए किए गए हैं। इस बारे में एक महत्वपूर्ण विचार यह भी है कि टॉवर का प्रवेश द्वार उत्तर दिशा में है, पश्चिम में नहीं, जबकि इस्लामी धर्मशास्त्र और परम्परा में पश्चिम का महत्व है। प्रवेश द्वार के एक ओर पत्थर का कमल का फूल बना है जो कि यह सिद्ध करता है कि यह एक हिंदू इमारत थी। मध्यकालीन इमारतों में पत्थ्रों के फूल बनाना एक प्रमुख हिंदू परम्परा रही है। मुस्लिम कभी भी इमारतें बनाते समय इस तरह के फूल नहीं बनाते हैं। टॉवर पर चित्र वल्लरी पर नमूनों में इनमें मिलावट नजर आती है, ये एकाएक समाप्त हो जाते हैं या बेमेल लाइनों का घालमेल नजर आता है। कमल की कलियों जैसे हिंदू रूपांकन के बीच में अरबी के अक्षरों को फैला दिया गया है। एक कट्टरर मुस्लिम और विद्वान सैयद अहमद खान स्वीकार करते हैं कि यह मीनार एक हिंदू इमारत है। अगर आप टॉवर के शीर्ष पर एक एयरोप्लेन से देखें तो आपको विभिन्न गैलरियां ऊपर से नीचे तक एक दूसरे में फिसलती नजर आती हैं और ये एक 24 पंखुड़ी वाले किसी पूरी तरह से खिले कमल की तरह दिखाई देती हैं। विदित हो कि 24 का अंक वैदिक परम्परा में पवित्र माना जाता है क्योंकि यह 8 का गुणनफल होता है। टॉवर की इंटों का लाल रंग भी हिंदुओं में पवित्र समझा जाता है। इस टॉवर का नाम विष्णु ध्वज या विष्णु स्तम्भ या ध्रुव स्तम्भ के तौर पर जाना जाता था जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह खगोलीय प्रेक्षण टॉवर था।

पास में ही जंग न लगने वाले लोहे के खम्भे पर ब्राह्मी लिपि में संस्कृत में लिखा है कि विष्णु का यह स्तम्भ विष्णुपाद गिरि नामक पहाड़ी पर बना था। इस विवरण से साफ होता है कि टॉवर के मध्य स्थित मंदिर में लेटे हुए विष्णु की मूर्ति को मोहम्मद गोरी और उसके गुलाम कुतुबुद्दीन ने नष्ट कर दिया था। खम्भे को एक हिंदू राजा की पूर्व और पश्चिम में जीतों के सम्मानस्वरूप बनाया गया था। टॉवर में सात तल थे जोकि एक सप्ताह को दर्शाते थे, लेकिन अब टॉवर में केवल पांच तल हैं। छठवें को गिरा दिया गया था और समीप के मैदान पर फिर से खड़ा कर दिया गया था। सातवें तल पर वास्तव में चार मुख वाले ब्रह्मा की मूर्ति है जो कि संसार का निर्माण करने से पहले अपने हाथों में वेदों को लिए थे। ब्रह्मा की मूर्ति के ऊपर एक सफेद संगमरमर की छतरी या छत्र था जिसमें सोने के घंटे की आकृति खुदी हुई थी। इस टॉवर के शीर्ष तीन तलों को मूर्तिभंजक मुस्लिमों ने बर्बाद कर दिया जिन्हें ब्रह्मा की मूर्ति से घृणा थी। मुस्लिम हमलावरों ने नीचे के तल पर शैय्या पर आराम करते विष्णु की मूर्ति को भी नष्ट कर दिया।

लौह स्तम्भ को गरुड़ ध्वज या गरुड़ स्तम्भ कहा जाता था। यह विष्णु के मंदिर का प्रहरी स्तम्भ समझा जाता था। एक दिशा में 27 नक्षत्रों के मंलदिरों का अंडाकार घिरा हुआ भाग था। लाल पत्थरों का एक विशाल, अलंकृत दरवाजा एक पवित्र क्षेत्र को जाता था जिसे नक्षत्रालय कहा जाता था। इसलिए परम्परागत रूप से मुख्य द्वार को आलय-द्वार के तौर पर जाना जाता है। कनिंगघम जैसे इतिहासकार इस दरवाजे को फर्जी तरीके से सुल्तान अलाउद्दीन से जोड़ते हैं हालांकि स्वयं अलाउद्दीन की ओर से ऐसा कोई दावा नहीं किया गया है। सवाल यह है कि अलाउद्दीन के समय में यह स्थाेन पूरी तरह से चूर-चूर होते खंडहरों में बदल चुका था। ऐसी हालत में अलाउद्दीन को क्यों ऐसी जगह पर एक शानदार अलंकृत दरवाजा बनाने की सूझी होगी जो कि कहीं से कहीं तक नहीं पहुंचता था? इसे मुअज्जिन का टॉवर बताना भी सफेद झूठ है। कोई भी मुअज्जिन एक दिन के लिए भी 365 संकरी और घूमती हुई अंधेरी सीढि़यों पर चढ़ने-उतरने का साहस नहीं करेगा। ऐसे आदमी के निश्चित तौर पर गिरकर मर जाने की संभावना होगी।

समीपवर्ती तथाकथित कुव्वल-अल-इस्लाम मस्जिद का भी मेहराबदार द्वार भी गुजरात में पाए जाने वाले मंदिरों में पाए जाने वाले द्वारों से अलग नहीं है। इस इमारत की चित्रवल्लरी का स्वरूप भी विकृत करने की गवाही देता है और सिद्ध करता है कि मुस्लिम आक्रमणकारियों ने मंदिरों के पत्थरों का मस्जिदों को बनाने में उपयोग किया। टॉवर का घेरा ठीक ठीक तरीके से 24 मोड़ देने से बना है और इसमें क्रमश: मोड़, वृत की आकृति और त्रिकोण की आकृतियां बारी-बारी से बदलती हैं। इससे यह पता चलता है कि 24 के अंक का सामाजिक महत्व था और परिसर में इसे प्रमुखता दी गई थी। इसमें प्रकाश आने के लिए 27 झिरी या छिद्र हैं। यदि इस बात को 27 नक्षत्र मंडपों के साथ विचार किया जाए तो इस बात में कोई संदेह नहीं रह जाता है कि टॉवर खगोलीय प्रेक्षण स्तम्भ था। टॉवर के निर्माण में बड़े-बड़े शिलाखंडों को एक साथ जोड़कर रखने के लिए इन्हें लोहे की पत्तियों से बांध दिया गया है। इसी तरह की पत्तियों को आगरे के किले को बनाने में इस्तेमाल किया गया है। मैंने (भटनागर) अपनी पुस्तक 'ताज महल एक राजपूत महल था' में किलों की उत्पत्ति के बारे में विस्तार से लिखा है और यह सिद्ध किया है कि यह मुस्लिमों के समय से पहले मौजूद था। इससे यह भी सिद्ध होता है कि बड़ी इमारतों में पत्थरों को जोड़े रखने के लिए लोहे की पत्तियों का प्रयोग करना एक हिंदू विधि थी। यही विधि तथाकथित दिल्ली की कुतुब मीनार में भी इस्तेमाल की गई है। इसके साथ यह भी सिद्ध होता है कि कुतुब मीनार एक मुस्लिमों के भारत में आने से पहले की इमारत है। अगर 24 पंखुड़ी वाले कमल को इसके केन्द्र से ऊपर की ओर खींचा जाता है तो इस तरह का एक टॉवर बन जाएगा। और कमल का स्वरूप कभी भी मुस्लिम नहीं होता है।

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशंविश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्वन्दे...
26/04/2017

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशंविश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम्।

लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।

हिन्दू धर्म को क्यों संसार का सबसे  #वैज्ञानिक_धर्म माना जाता है?  #सत्यता_के_प्रमाणहिन्दू धर्म को इस संसार का सबसे प्रा...
20/04/2017

हिन्दू धर्म को क्यों संसार का सबसे #वैज्ञानिक_धर्म माना जाता है? #सत्यता_के_प्रमाण

हिन्दू धर्म को इस संसार का सबसे प्राचीन और वैज्ञानिक धर्म माना जाता है और सिर्फ माना ही नहीं जाता बल्कि इसके प्राचीनतम होने के अनेक प्रमाण भी उपलब्ध हैं.

नमस्कार मुद्रा में आप हाथों की उँगलियाँ एक दूसरे से जुड़ती हैं. उँगलियों के टिप पर हमारी आँखें, कान और मस्तिष्क के प्रेशर पॉइंट्स होते हैं. नमस्कार मुद्रा इन प्रेशर पॉइंट्स को उत्तेजित करती है जिससे की हम अभिवादन करने वाले व्यक्ति का नाम लंबे अरसे के लिए याद रहे!
हिन्दू धर्म को क्यों वैज्ञानिक धर्म माना जाता है?

#इतिहास इस बात का #साक्षी है कि हिन्दू धर्म विश्व का प्राचीनतम धर्म है. वेदों पर आधारित होने के कारण यह वैदिक धर्म भी कहलाता है. संसार के बीस बड़े देशों में हिन्दू धर्म की जड़ें फैली हुई हैं.

हिन्दू धर्म का इतिहास:

सिंधु घाटी की खुदाई में निकली पशुपतिनाथ की मुहर
सिंधु घाटी की खुदाई में निकली पशुपतिनाथ की मुहर
हिन्दू धर्म के इतिहास पर दृष्टि डालें तो सर्वसम्मति से और विभिन्न साक्ष्यों और प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि हिन्दू धर्म का आरंभ सिंधु घाटी की सभ्यता से जुड़ा हुआ है. सिंधु घाटी सभ्यता में मिली पशुपतिनाथ की मूर्ति, जर्मनी में 1939 में मिली नरसिंह की मूर्ति इस बात के ठोस प्रमाण हैं. कुछ इतिहासकारों का मानना है कि हिन्दू धर्म का जन्म वेदों से ही हुआ है इसलिए इसे वैदिक धर्म भी कहा जाता है. वेदों की संरचना का साथ ही मंत्रों का जन्म हुआ और हिन्दू धर्म के दार्शनिक और वैज्ञानिक पक्ष का विकास हुआ. इसी समय योग, सांख्यिकी और वेदान्त और उसके बाद पुराणों की रचना हुई जिनमें धर्म, ज्ञान विज्ञान और इतिहास का वर्णन मिलता है.

#हिन्दू_धर्म_और_विज्ञान:

हिन्दू धर्म विज्ञान आधारित धर्म कहा जाता है. प्राचीन काल में शिक्षा का प्रचार प्रसार न होने के कारण, हिन्दू धर्म में ज्ञान विज्ञान की शिक्षा धर्म से जोड़कर और परम्पराओं और मान्यताओं में बांधकर सिखाने का प्रयास किया गया. कहते हैं जो वैज्ञानिक नियमों के अनुसार अपना विकास करता है वही शाश्वत होता है, इसी कारण हिन्दू धर्म को सनातन धर्म भी कहा जाता है. इस धर्म की नींव भी वैज्ञानिकता पर ही आधारित है. इसका प्रमाण सबसे पहले मिलता है प्राचीन काल के कार्यानुसार किए गए वर्ण विभाजन से, जहां व्यक्ति के कार्य के अनुसार उसके वर्ण को विभाजित किया गया था. सभी वर्णों में आपसी प्रेम और समन्वय था. इसके अलावा हमारे पूर्वजों ने अनेक धार्मिक परम्पराएँ और मान्यताएँ निर्धारित की हैं लेकिन जब उन्हें वैज्ञानिक कसौटी पर कसा जाता है तो वे खरी उतरती हैं. इससे यह पता चलता है कि हिन्दू धर्म पूरी तरह वैज्ञानिक है. आइये देखें किस तरह हर परंपरा और मान्यता विज्ञान की कसौटी पर खरी उतरती है.

#तुलसी_पूजन

तुलसी पूजन हर भारतीय घर की पहचान है. गृहणी द्वारा सुबह सवेरे तुलसी में पानी देने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है. तुलसी एक आयुर्वेदिक औषधि भी है और इसी कारण इसके पत्ते शरीर के हर छोटे बड़े रोग को दूर करने में कारगर सिद्ध होते हैं. यह बात वैज्ञानिक रूप से भी प्रमाणित है कि तुलसी का पौधा अपने आस-पास की हवा को भी शुद्ध करता है.

#सूर्य_नमस्कार

सुबह स्नान के बाद सूर्य को जल चढ़ाने का प्रावधान हिन्दू धर्म में है लेकिन इसके पीछे के वैज्ञानिक सत्य यह है कि सूर्योदय की किरणें स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभकारी होती हैं.

#उपवास_रखना

उपवास रखने का उद्देश्य चाहे धार्मिक होता है लेकिन इसके पीछे का वैज्ञानिक सत्य यह है कि उपवास प्रक्रिया से पाचन क्रिया संतुलित और तंदुरुस्त होती है.

#पूजा_की_घंटी_और_शंख_ध्वनि

पूजा की घंटी का महत्व शायद कुछ ही लोग जानते हैं. वैज्ञानिक तथ्य है कि मंदिर या किसी भी अर्चनास्थल पर पूजा की घंटी और शंख बजाने से वातावरण कीटाणु मुक्त और पवित्र होता है. शंख की ध्वनि से मलेरिया के मच्छर भी खत्म हो जाते हैं.

#गायत्री_मंत्र

गायत्री मंत्र या अन्य किसी भी मंत्र का उच्चारण जहां एक ओर पूजा को पूर्णता प्रदान करता है वहीं मन को केन्द्रित करके शारीरिक ऊर्जा का विकास करता है.

#हवन

दक्षिण भारत के एक मंदिर में हवन करते हुए ब्राह्मण
हवन करने का उद्देश्य किसी विशेष पूजा को करना तो होता ही है साथ ही हवन सामग्री वातावरण को भी शुद्ध करती है. हवन सामग्री में देसी घी, कपूर, आम की लकड़ी और दूसरी सामग्री होती है जिससे हवा में फैले कीटाणु नष्ट हो जाते हैं.

#गंगा

गंगा को पावन इसलिए माना जाता है क्योंकि इसके जल में कुछ ऐसे प्राकृतिक तत्व होते हैं, जिनके संपर्क में आने से शरीर रोगमुक्त और निर्मल हो जाता है.

#पूजा_करना

पूजा करना एक धार्मिक कर्म तो है ही साथ ही यह मन की एकाग्रता को भी बढ़ाने में सहायक होता है.

पूजा के #दिये_जलाना

पूजा में दिया जलाना, पूजन कर्म का अनिवार्य अंग है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि दिया अगर घी से जलाया जाए तो हवा में घुली कार्बन-डाई-ऑक्ससाइड नष्ट हो जाती है और तेल के दिये से भी हानिकारक कीटाणु नष्ट हो जाते हैं.

#पीपल_की_पूजा

यूं तो शनिवार के दिन पीपल के पेड़ के नीचे तेल का दिया जलाने का प्रावधान शनिदेव की पूजन-अर्चना के रूप में माना जाता है, लेकिन असल में पीपल का पेड़ प्रचुर मात्रा में ऑक्सीजन देता है.

#तिलक_लगाना

किसी भी पूजा कर्म का आरंभ माथे पर तिलक लगाने से होता है. लेकिन इस तिलक का दूसरा पहलू यह है कि हमारी दोनों आँखों के बीच में एक नर्व पॉइंट होता है जहां तिलक लगाकर हाथ के हलके दबाव से उसका संचार बढ़ाया जाता है. इससे एकाग्रता की शक्ति बढ़ती है और साथ ही मस्तिष्क में रक्त की आपूर्ति को भी यह नियंत्रण में रखता है.

#मंत्रोच्चारण

एक और जहाँ पूजा मंत्रोच्चारण के बिना संपन्न नहीं होती वहीं दूसरी ओर मंत्र हमारे मस्तिष्क को शांत करते हैं और ब्लड प्रेशर को भी नियंत्रण में रखते हैं.

#हल्दी

हल्दी के साथ ही विवाह कर्म की शुरुआत होती है और हर पूजा में हल्दी की गांठ होना अनिवार्य है. लेकिन यह एक सर्वविदित तथ्य है कि हल्दी एक अच्छी एंटी बायोटिक है और कैंसर जैसे रोगों का उपचार करने की भी शक्ति रखती है.

#जनेऊ

जनेऊ रखना केवल पांडित्य की ही निशानी नहीं है बल्कि यह एक बेहतरीन एक्यूप्रेशर का काम भी करता है.

#दाह-संस्कार

दाह-संस्कार हिन्दू धर्म का सबसे अंतिम कर्म है. वैज्ञानिक सत्य यह है कि शवदाह से प्रदूषण नहीं फैलता है.

#शिखा रखना

शिखा रखने से न केवल धर्म की पहचान होती है बल्कि आयुर्वेद के अनुसार सिर के इस भाग में संवेदनशील कोशिकाओं का समूह होता है जिसकी रक्षा शिखा के द्वारा की जाती है.

#गोमूत्र_व_गाय_का_गोबर

गाय का हर अंग स्वास्थ्य और वातावरण के लिए उपयोगी होता है. इसी कारण इसे ‘माँ’ का दर्जा दिया गया है. गाय का मूत्र जहाँ कई औषधियों के निर्माण में काम आता है वहीं गोबर के लेप से विषैले कीटाणु नष्ट होते हैं.

#योग_व_प्राणायाम

आज योग को न केवल भारत में बल्कि सम्पूर्ण विश्व में मान्यता मिल गयी है. योग शरीर को बाहर और अंदर से स्वस्थ रखने में सहायक होता है.

इन्ही सबके कारण हिन्दू धर्म को संसार का सबसे तर्कसंगत और वैज्ञानिक धर्म माना जाता है.

Prayed at the Lingaraj Temple in Bhubaneswar. The magnificence of the Temple and Temple Complex leaves a lasting impress...
16/04/2017

Prayed at the Lingaraj Temple in Bhubaneswar. The magnificence of the Temple and Temple Complex leaves a lasting impression on the mind.

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