24/08/2026
*प्रतिकूलता में अनुकूलता* -२६९
*भेद हमार लेन सठ आवा*।
*राखिअ बाँधि मोहि अस भावा* ॥
*सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी*।
*मम पन सरनागत भयहारी* ॥
(सुंदरकांड/४३/७-८ )
सुग्रीव बोले-[जान पड़ता है] यह मूर्ख हमारा भेद लेने आया है, इसलिये मुझे तो यही अच्छा लगता है कि इसे बाँध रखा जाय।
[ श्रीरामजीने कहा- हे मित्र! तुमने नीति तो अच्छी विचारी ! परन्तु मेरा प्रण तो है शरणागतके भयको हर लेना !
विभीषण के आगमन पर राम जी ने सबसे राय व्यक्त करने को कहा -
तब अंगद ने कहा शत्रु पक्ष से आया हुआ शत्रु का ही भाई है साधारण स्थिति में विश्वास का पात्र नहीं होता
गुनी है तो अपनाना चाहिए और दोषी है तो दूर रखना चाहिए।
*"गुणतः संग्रहं कुर्यात् दोषतस्तु विसर्जयेत्"*
- अंगद का यह वचन नीतिशास्त्र का सुंदर सिद्धांत अवश्य है, पर प्रस्तुत परिस्थिति में इससे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।
अब शरभ की बारी आती है। राजनीति-विशारद शरभ एक सुंदर सुझाव देते हैं कि विभीषण की सत्यनिष्ठा पर निगरानी रखकर उस के मन के वास्तविक स्वरूप पर निवेदन प्रस्तुत करने के लिए एक गुप्तचर को नियुक्त किया जाए। विचार अच्छा है, पर यह बात टालने का बहाना बन जाता है। तात्कालिक समस्या को सुलझाने में इससे कोई लाभ नहीं मिलने का है।
फिर जांबवान् कुछ कहने का प्रयास करते हैं। बद्धवैर और परमपापी रावण के यहाँ से आया हुआ उस का भाई है- विभीषण।
इसलिए उस पर बिल्कुल विश्वास नहीं करना चाहिए।
*भेद हमार लेन सठ आवा*-
सुग्रीवजी ने कहा- मुझे तो लगता है कि यह दुष्ट हम लोगों का भेद लेने आया है इसलिये मेरी तो इच्छा है कि इसे बाँध कर रखा जाये।
'राखिअ बाँधि' से आशय है कि मैं आपके कोमल स्वभाव के कारण मारने की राय नहीं दे रहा हूँ। प्रभु ने तो अर्द्धली के भी आधे 'सखा बुझिऐ काहा' में उत्तर दे दिया था परन्तु सुग्रीव लाइव अपनी ही बात रखना चाहते हैं अतः इतना कुछ कहा।
सीताजीकी सुधि पानेमें विभीषणजीने हनुमानजीकी बहुत सहायता की यह मानस के श्रीराम-सुग्रीवादिको मालूम है। तो भी सुग्रीवजी जो विरोध कर रहे हैं वह सकारण है। सुग्रीवको लग रहा है कि यह असली बिभीषण नहीं है; बिभीषण रूपधारी रावण हो सकता है ।
सुग्रीव यही समझते हैं कि रावण ही आया हो रूप तेज, बल, पराक्रम, आयुध, आभूषण आदिसे भी वहीं संशय दृढ़ होता है। हनुमानजीने यद्यपि देखा, तो भी वह सोचता है निशाचर मायाको वह भी कैसे पहचान सकेगा ? ऐसा लगकर कहा कि 'बाँध रखिये' इसमें कपिपतिकी नीति निपुणता, दक्षता, सावधानता आदि गुण दिखाई देते हैं। किंचित् अहंकार और उतावली ये दोष दीखते हों। तो भी वे रामकार्यके सबके हितके लिये ही हैं।
(२) 'सठ आवा' यहाँ 'शठ' बिभीषणको नहीं कहा।
उसका वेष धारण करके आए हुए राक्षसको लक्ष्य करके कहा है।
(क) 'भेद' तीन प्रकारका भेद होता है। यथा 'स्नेहरागापनयनं, संघर्षोत्पादनं तथा।
संतर्जनं च भेदज्ञैर्भेदस्तु त्रिविधः स्मृतः'
(अ. व्या. सु.)
१ राजा और मंत्री आदिके मनको एक दूसरेके विरुद्ध परस्पर संशयित, कलुषित करके। परस्पर प्रेम, ममत्व नष्ट कर देना।
२ संघर्षोत्पादन राजाके अनुयायियोंसे वैर, विरोध, आदि निर्माण करना।
३ संतर्जनं प्रजा और राजाकी सेनाके मनमें हौलदिली पैदा होगी, हिम्मत हार जायें ऐसा करना।
ये भेदके तीन प्रकार हैं।
रावण कपिसेनामें इनको उत्पन्न नहीं कर सका। परन्तु हनुमानजीने लंकामें जो प्रताप चमकाया उससे पहला और तीसरा भेद सिद्ध हुआ है। और दूसरा बिभीषण शरणागतिसे अनायास सिद्ध होता है।
(ख) 'भेद लेन' = भेद ले जानेके लिये।
किस किसमें भेद पैदा किया जा सकेगा यह जान लेनेके लिये। मर्मस्थान कौनसे, किसका डेरा कहाँ है, और उनको पहचाननेके उनके चिन्ह, नाम, पहरा कमजोर कहाँ रहता है, कितना, कब और किस तरहका रहता है, शस्त्रास्त्र किस प्रकारके हैं, अन्न, जल, गोला बारूद, अन्य युद्ध सामग्री इनके संग्रह कहाँ है, इसकी जानकारी पाकर वह राजासे कह देना यह भी भेदका एक प्रकार है। यह युद्ध करनेका निश्चय हो जानेपर उपयुक्त होता है। ऐसी अनेक बातें जान लेनेके लिये गुप्तचर भेजे जाते हैं।
*सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी*
रामजी ने कहा हे सखा! नीति तो तुमने बहुत अच्छी सुझाई है परन्तु मेरा प्रण शरणागत को भयमुक्त करना है। तात्पर्य है कि बोलो, अब इस स्थिति में क्या करें?
प्रभु ने 'मम पन' पद के द्वारा सुग्रीवजी को अपने ऐश्वर्यता का बोध कराया। यह भी उन्हें बिना बताये जता दिया कि विभीषण शरणागत हैं और भयभीत भी। साथ ही हनुमानजी की आँखों में झाँककर, उन्हें भी अनुभूति कराई कि तुम्हारी ही दीक्षा से विभीषण शरण में आया है और तुम्हारे ही कपीशा बाधक हो रहे हैं, बोलो क्या किया जाये ?
सुग्रीवजीका मत केवल राजनीतिको दृष्टिसे योग्य था यह ऊपर टीकामें दिखाया गया है। पर वह मान्य करना असंभव होनेसे प्रभुने स्पष्ट कहा कि नीतिको दृष्टिसे तुमने जो विचार कहा वह बिलकुल योग्य है; पर मुझे केवल नीतिका ही विचार और पालन नहीं करना है, मेरे प्रणका, बानेका भी पालन अवश्य करना है। मेरा प्रण और तुम्हारा विचार इनका इस समय समन्वय नहीं होता। अतः अब यह प्रश्न खड़ा हो गया है कि प्रण तोड़ना, या नीतिका अवलंब करना?
पर प्रण तोड़नेका, अर्थात् शरणागतका त्याग करनेका, परिणाम क्या होता है? आगे..... #श्रीराधामाधव * शुद्ध प्राकृतिक इत्र , तुलसी , रुद्राक्ष , शंख , श्रृंगी , रत्न उपरत्न* *तथा सभी प्रकार की पूजा सामग्री , वैजयंती, गुंजा , स्फटिक , मोती माला के लिए लिंक पर क्लिक करें*
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