Shri Giriraaj Dharn Prabhu Teri Sharn परमार्थ सेवा समिति , दिल्ली

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*प्रतिकूलता में अनुकूलता* -१८०*मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा*। *जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा* ॥ *चूड़ामनि उतारि तब दयऊ* । *हरष ...
24/05/2026

*प्रतिकूलता में अनुकूलता* -१८०

*मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा*।
*जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा* ॥
*चूड़ामनि उतारि तब दयऊ* ।
*हरष समेत पवनसुत लयऊ* ॥
(सुंदरकांड/२७/१-२)
[हनुमान् जीने कहा- हे माता! मुझे कोई चिह्न (पहचान) दीजिये, जैसे श्रीरघुनाथजीने मुझे दिया था। तब सीताजीने चूड़ामणि उतारकर दी। हनुमान् जीने उसको हर्षपूर्वक ले लिया ॥
पुनरागत हनुमान् को देखकर पतिप्राणा सीतादेवी के प्राण उनके शरीर में फिर से आ जाते हैं।
अब तक वह हनुमान् की सुरक्षा के लिए चिंतित बैठी थीं और उधर हनुमान् सीता के कुशल-मंगल की कामना लिए व्याकुल थे।
दोनों की व्याकुलता अशोकवाटिका में उनके पुनर्मिलन, पुनदर्शन और पुनः संभाषण से शांत बन जाती है।
यह मिलन केवल सीता और आंजनेय का नहीं है, बल्कि
वात्सल्य और भक्ति का है।
यह भूख और प्यास का मिलन है,
ज्ञान और जिज्ञासा का मिलन है,
दृष्टि और दिदृक्षा का मिलन है,
वाणी और विवक्षा का मिलन है
तथा प्राण और प्रणव का मिलन है।
सुंदर कांड का सबसे सुन्दर तथा मार्मिक प्रसंग यही है जहाँ पर मारुतनंदन और विदेहनंदिनी अपने मुँह से नहीं बल्कि अपने हृदय से, मन से और आत्मा से बातचीत करते हैं।

*मातु* - सीताजीसे बोलनेमें 'मातु' (माता) या 'जननी' संबोधन अबतक १३ बार प्रयुक्त है। यहाँ २७। १ में १४ वें बार है। यहाँ जैसे चौपाईके प्रारम्भमें ही 'मातु' है वैसे ही सिर्फ एक बार १४। ९ में है।
अब सीतावियोग होगा इस विचारसे हनुमानजी भावापन्न होकर चित्रलिखितसे तटस्थ, हाथ जोड़े हुए खड़े हैं। फिर धीरज धरकर बोलने लगते ही, विरह व्यथित होकर
माऽतु! मोहि दीजे । कछु। चीन्हा!! ऐसे ठिठक् ठिठककर बोले।
गद्‌गदकंठ हुए हैं। १४।९ में भी ऐसी ही दशा है। तथापि इस समयसे कम है।
(क) रघुनायक- श्रीरघुनाथजी पहचान सकें ऐसा कुछ दीजिये।
(ख) कपिने यहाँ या आगे, चल देनेके पूर्व बिदा माँगना टाल दिया है। यह दक्षता अत्यंत महत्वकी है।
विदा मांगने पर यहाँसे मत जाओ, ऐसा कहतीं तो बड़ा अनर्थ हो जाता।

*मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा* - हे माता! मुझे कुछ चिन्ह दीजिये जैसे रघुनाथजी ने मुझे अँगूठी दी थी। यहाँ 'रघुनायक' पद के द्वारा कोई ऐसी विशेष वस्तु जो रघुवंश से सम्बन्धित हो, उसे देने का आग्रह किया है।

*'चूडामणि'* चूड़ा= चोटी, वेणी। उसमें पहननेका एक अलंकार। जनकजीको इन्द्रने दिया हुआ था फिर उन्होंने सीताजीको, दिया था ऐसा वा. रा. में कहा है।
इन्द्रने दशरथजीको, उन्होंने कौसल्याजीको औ तोर कौसल्याजीने सीताजीको दिया था, ऐसी भी कथा है।
यही बात यहाँ ग्राह्य लगती है।

*चूड़ामनि उतारि तब दयऊ*
तब सीताजी ने जटा रूप बनी हुई वेणी में से शीशफूल निकाल कर दिया। इस शीशफूल से सीताजी ने रामजी को संदेश दिया कि मैं आपके श्रीचरणों में नतमस्तक हूँ। पवनसुत ने उसे अत्यन्त प्रसन्नता से ले लिया।
ध्यान रहे *'ज्ञानिनामग्रगण्यम्'* ने वस्तु (चीन्ह) ही मांगी है यदि वे सीधे विदा की आज्ञा मांगते तो सीताजी दहाड़े मार कर रो पड़ती, संदेश देने की स्थिति में ही नहीं रहती।

*हरष समेत पवनसुत लयऊ*
हनुमान जी के मन में एक ही विचार था-
सङ्कल्पितं कार्यमविघ्नमीश द्राक्सिद्धिमायातु ममाखिलेश ।
पापत्रयं मे हर सन्मतीश तापत्रयं मे जहि शान्त्यधीश ॥
:हे सर्वेश्वर! मेरा संकल्पित कार्य बिना किसी बाधा के अतिशीघ्र सिद्धि (सफलता) को प्राप्त हो। हे सद्बुद्धि के स्वामी! आप मेरे तीनों प्रकार के पापों और तापों का हरण करके मुझे असीम शांति प्रदान करें।

हनुमान जी का संकल्पित कार्य पूर्ण होने को है ।
*ठाढ़ भयउ कर जोरि* दोनों हाथों को फैला कर चूड़ामणि को ले लिया। हनुमान जी आज अति प्रसन्न है। #श्रीराधामाधव summer special
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*विदग्ध अयोध्या* - ६गतांक से आगे......अयोध्यानाथ राघवेन्द्र बहुत कोशिश कर रहे हैं कि कैसे भी नगरवासी चले जायँ। वे उन्हें...
24/05/2026

*विदग्ध अयोध्या* - ६

गतांक से आगे......

अयोध्यानाथ राघवेन्द्र बहुत कोशिश कर रहे हैं कि कैसे भी नगरवासी चले जायँ। वे उन्हें बहुत प्रकारसे उपदेश देकर समझा रहे हैं।

*किए धरम उपदेस घनेरे*।
*लोग प्रेमबस फिरहिं न फेरे" ॥
(रा० च० मा० २।८४।२)

श्रीराम बड़े ही असमंजसमें पड़ जाते हैं,

उनका स्नेह वे भूल नहीं सकते -

*सीलु सनेहु छाड़ि नहिं जाई*।
*असमंजस बस भे रघुराई* ॥
(२।८४।२३)

केवल मानव-मानवी ही वियोगसे व्यथित नहीं हैं-पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, वनकी ओषधियाँ आदि जड वस्तुतक इस वियोग-वह्निमें धू-धू करके जल रहे हैं।

रघुनन्दनके रथके घोड़े भी आज अपने अनोखे स्नेहशील मालिकको जाते देखकर हिनहिना रहे हैं-

*'रथु हाँकेउ हय राम तन हेरि हेरि हिहिनाहिं*।'
(मानस २।९९)

*तत् समाकुलसम्भ्रान्तं मत्तसंकुपितद्विपम्* । *हयशिञ्जितनिर्घोषं पुरमासीन्महास्वनम्* ॥
(वा० रा० २।४०।१९)
'उस समय सारी अयोध्यामें महान् कोलाहल मच गया।
सब लोग व्याकुल होकर घबरा उठे।
मतवाले हाथी श्रीरामके वियोगसे कुपित हो उठे और इधर-उधर भागते हुए घोड़ोंके हिनहिनाने एवं उनके आभूषणोंके खनखनानेकी आवाज सब ओर गूंजने लगी।'

*पशु-पंछी तृन-कन त्याग्यौ, अरु बालक पियौ न पयौ* । *'सूरदास' रघुपति कें बिछुरें, मिथ्या जनम भयौ* ॥
(सूर-रामचरितावली ३४।४)

विभिन्न पक्षियोंने चारा चुगना बंद कर दिया और बच्चोंने अपनी माताओंका दूध पीना बंद कर दिया।
वे बेचारे ऊँचे-ऊँचे पेड़ोंपर चढ़कर कोसलनाथसे पुकार-पुकारकर प्रार्थना कर रहे हैं कि 'आप आगे मत बढ़िये, लौट चलिये। आप तो सभी प्राणियोंपर अहैतुकी कृपा करनेवाले हैं, फिर क्यों आज हमें निराश कर रहे हैं।

अवधके उद्यानोंके पपीहे, मोर, कोयल, चकवे, तोते, मैना, सारस, हंस और चकोर -सभी व्यथित हैं। वे यत्र-तत्र मौन बैठे हैं और निर्जीवसे लग रहे हैं। जिन उद्यानोंमें कोयलोंका मधुर स्वर गूँजता था, वे ही आज श्मशान-से लग रहे हैं।

आज बेचारे उन पशुओंकी क्या हालत है, जो रघुनन्दनके साथ खेलते थे ? हजारों हाथी, घोड़े, मृग, गायें, बैल एवं बकरियोंके नेत्रोंसे झर-झर अश्रुपात हो रहे हैं-
'हे कोसलेश! आज तुम इतने निष्ठुर क्यों हो गये हो ?'

*राम बियोग बिकल सब ठाढ़े*।
*जहँ तहँ मनहुँ चित्र लिखि काढ़े* ॥
(रा० च० मा० २।८३।१)

कोशलके वृक्ष, पेड़, पौधे, वनौषधियाँ, लताएँ, फूल, अङ्कुर, कलियाँ-सभीकी दशा दयनीय हो रही है। राघवेन्द्रकी विरहाग्नि इन्हें भी भस्म कर रही है-

*अनुगन्तुमशक्तास्त्वां मूलैरुद्धतवेगिनः* ।
*उन्नता वायुवेगेन विक्रोशन्तीव पादपाः* ॥
(वा० रा० २।४५।३०)

'वृक्ष अपनी जड़ोंके कारण अत्यन्त वेगहीन हैं, इसीसे तुम्हारे पीछे नहीं चल सकते; परंतु वायुके वेगसे इनमें जो सनसनाहट पैदा होती है, उनके द्वारा ये ऊँचे वृक्ष मानो तुम्हें पुकार रहे हैं- तुमसे लौट चलनेकी प्रार्थना कर रहे हैं।'

सुन्दर उद्यान शोभाविहीन हो रहे हैं। फूलोंकी कलियाँ मुरझा रही हैं। पुष्पोंमें सुगन्ध नहीं है। इस विरह-दावानलका प्रभाव जड वस्तुओंपर भी कम नहीं है-

*लीनपुष्करपत्राश्च नद्यश्च कलुषोदकाः* ।
*संतप्तपद्माः पद्मिन्यो लीनमीनविहंगमाः* ॥
(वा० रा० २।५९।७)
नदियोंके जल मलिन हो गये हैं। उनमें फैले हुए कमलोंके पत्ते गल गये हैं। सरोवरोंके कमल भी सूख गये हैं। उनमें रहनेवाले मत्स्य और पक्षी भी नष्टप्राय हो गये हैं।'

नदियों, छोटे जलाशयों तथा बड़े सरोवरोंके जल गरम हो गये हैं। वनों और उपवनोंके पत्ते सूख गये हैं।

चले गये, वे सबको छोड़कर चले गये।
हाय! आशाकी एक झलक थी कि शायद सुमन्त्रके साथ लौट आयँ।
उस सुमन्त्रकी प्रतीक्षा है।
'प्यारे रघुवीर लौट आयें', उल्लासकी क्षीण रेखा वही एक बची है।
*विदग्ध अयोध्या* -५

गतांक से आगे.........

नगरनिवासियोंकी अवस्था विचित्र हो रही है।
महाकरुण स्वर सबकी वेदनाको बढ़ा रहा है। सभी करुण-विलाप कर रहे हैं-
'हाय ! उस विधुवदनको जी भरकर निरख लेने दो।' अश्रुओंके स्रोतमें सभी अवगाहन कर रहे हैं।
जहाँ उनके प्यारे, प्राणप्यारे रघुनन्दन हैं,
वहीं उनकी अयोध्या है,
वहीं उनका सुख है,
वहीं उनको शान्ति है।
सभीके सुखका, शान्तिका, उल्लासका आज सूर्यास्त होने जा रहा है ।
सभीके जीवनके रसका समुद्र आज सूख रहा है।
सूर्यके बिना प्रकाश कैसा?
सभी नगरनिवासी मूर्छित हो-होकर गिर रहे हैं, पुनः कुछ होश आनेपर आगे बढ़ रहे हैं।
हृदयमें एक ही लालसा है-हाय ! उस नीलसुन्दरका एक बार मुखचन्द्र देख लें।
आह ! आज उनके राघवेन्द्र जा रहे हैं, पर प्राण नहीं निकल रहे हैं।
अब जीवनमें और काम ही क्या है ?

समस्त दिशाएँ व्याकुल हो उठीं।
आज अवधकी बड़ी ही भयावनी स्थिति हो रही है।
चारों ओर अन्धकार-ही-अन्धकार व्याप्त हो रहा है।

कोई दशरथको कोस रहे हैं,
कोई कैकेयीको गाली दे रहे हैं,
कुछ अपने भाग्यकी भर्त्सना कर रहे हैं।
सभी अपनी सुध-बुध खो बैठे हैं-

*पुम्भिः कदाचिद् दृष्टा वा जानकी लोकसुन्दरी*।
*सापि पादेन गच्छन्ती जनसंघेष्वनावृता* ॥
*रामोऽपि पादचारेण गजाश्वादिविवर्जितः* ।
*गच्छति द्रक्ष्यथ विभुं सर्वलोकैकसुन्दरम्* ॥
(अध्या० रा० २।५।६-७)

हाय! जिस त्रिलोकसुन्दरी जानकीको पहले कभी किसी पुरुषने शायद ही देखा हो, वही आज बिना किसी पालकी के जनसमूहमें पैदल चल रही है।
अरे ! इन सर्वलोकसुन्दर भगवान् श्रीरामकी ओर भी देखो, ये भी आज बिना हाथी-घोड़ेके पैदल ही जा रहे हैं।'

*बाष्पपर्याकुलमुखो राजमार्गगतो जनः* ।
*न हृष्टो लभ्यते कश्चित् सर्वः शोकपरायणः* ॥
*न वाति पवनः शीतो न शशी सौम्यदर्शनः* ।
*न सूर्यस्तपते लोकं सर्वं पर्याकुलं जगत्* ॥
(वा० रा० २।४१ । १७-१८)

मार्ग पर निकला हुआ कोई भी मनुष्य प्रसन्न नहीं दिखायी देता था। सबके मुख आँसुओंसे भीगे हुए थे और सभी शोकमग्न हो रहे थे।
शीतल वायु नहीं चलती थी।
चन्द्रमा सौम्य नहीं दिखायी देता था।
सूर्य भी जगत् को उचित मात्रामें ताप या प्रकाश नहीं दे रहा था।
सारा संसार ही अस्तव्यस्त हो उठा था।'

पुरवासियोंको देह-गेहका कुछ भी ज्ञान नहीं रहा। भूख-प्यासका कुछ भी भान नहीं है।
नयनोंकी नींद तो कभीकी समाप्त हो गयी है।
प्राणोंमें एक ही स्पन्दन, हृदयकी एक ही पुकार-हाय !
रघुनन्दन कोसलनाथ प्राणनाथ किसी तरह रुक जायें।

'हे सखि !
चल, कैकेयीके पास चलें, शायद वह मानकर हम मछलियोंको जल दे दे।
शायद वहाँ हम चातकियोंको स्वातिकी बूँद मिल जाय ?
नहीं-नहीं,
वह क्रूर कैकेयी कभी भी यह स्वीकार नहीं करेगी।
उस हृदयहीनाके पास जल कहाँ ?'

'सखि ! उस कैकेयीका हृदय फट कैसे नहीं गया।
उस मन्दभागिनीसे उन नवकिशोर, सौन्दर्य-राघवेन्द्रके लिये सिन्धु, छबीले, कमलनयन यह वर कैसे माँगा गया।
सखी! क्या उपाय करें कि वे हमारे प्राणवल्लभ वन न जायँ।'

बालकोंमें भी यही चर्चा है-
'भैया ! दशरथजीकी इस बुढ़ापेमें बुद्धि जाती रही।
वे तो अपनी रानीके गुलाम बन गये !
इस नारी-मोहने किसका नाश नहीं किया ?
उनसे ये वर कैसे दिये गये ?
भैया ! वे हमारे रघुनाथ क्या इस योग्य हैं ?
अब हमारा जीवन व्यर्थ है।
भैया ! अब हमें जीवित रहकर क्या करना है।
भैया ! हम अब किसके साथ बैठकर खायँगे, अब हमें कौन पूछेगा।
हाय! वे स्नेही जा रहे हैं।
भैया ! उन्हें रोक लो, हमारे रामको रोक लो।
कह दो.... आज... केवल आज हमारे साथ और खेल लें।'

'मैया मेरी, केवल एक दिनके लिये ही उन्हें रोक लो।
अब हमारे हृदयके टुकड़े होनेवाले हैं।
देखो, मैया ! अब पृथ्वी फटनेवाली ही है।
अरे, क्या भूकम्प आ गया ?
मैया ! कह दे न कोसलेशसे कि हमें भी साथ ले लें।'

'अरे दादा ! अब हमारा पिताकी तरह कौन सम्मान करेगा। वह हमारा वत्सल आज जा रहा है।
वह अपने पिता दशरथसे हमें कम सम्मान नहीं देते थे ...'- यह वृद्धोंकी वाणी है।

क्रमशः.........
क्रमशः............ #श्रीराधामाधव * शुद्ध प्राकृतिक इत्र , तुलसी , रुद्राक्ष , शंख , श्रृंगी , रत्न उपरत्न* *तथा सभी प्रकार की पूजा सामग्री , वैजयंती, गुंजा , स्फटिक , मोती माला के लिए लिंक पर क्लिक करें*

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*┈┉❀꧁  विनय पत्रिका - १०७ ꧂❀┉┈*                  *है नीको मेरो देवता कोसल पति राम ।**सुभग सरोरूह-लोचन, सुठि सुन्दर स्याम...
24/05/2026

*┈┉❀꧁ विनय पत्रिका - १०७ ꧂❀┉┈*

*है नीको मेरो देवता कोसल पति राम ।*
*सुभग सरोरूह-लोचन, सुठि सुन्दर स्याम ।।१।।*
*सिय-समेत सोहत सदा छबि अमित अनंग ।*
*भुज बिसाल सर धनु धरे, कटि चारू निषंग ।।२।।*
*बलि - पूजा चाहत नहीं, चाहत इक प्रीति ।*
*सुमिरत ही मानै भलो, पावन सब रीति ।।३।।*
*देहि सकल सुख, दुख दहै, आरत-जन-बंधु ।*
*गुन गहि, अघ-औगुन हरै, असकरूनासिंधु ।।४।।*
*देस - काल - पूरन सदा, बद बेद-पुरान ।*
*सबको प्रभु, सबमें बसै, सबकी गति जान ।।५।।*
*को करि कोटिक कामना, पूजै बहु देव ।*
*तुलसीदास तेहि सेइये, संकर जेहि सेव ।।६।।*

*भावार्थ—* कोशलपति श्रीरामचन्द्रजी मेरे बड़े ही अच्छे देवता हैं। उनके नेत्र कमल के समान सुन्दर और श्याम शरीर अत्यन्त लावण्यमय है *।।१।।*
श्रीजानकीजी के साथ से सदा सुशोभित रहते हैं। सौंदर्य उनका अनेक कामदेवों के जैसा है। बड़े-बड़े बाहुओं में धनुष और बाण लिये हुए हैं, तथा कमर पर तरकस कसा हुआ है *।।२।।*
न तो वे कोई बलि चाहते हैं, न पूजा। चाहते हैं केवल एक प्रेम । नाम लेते ही वे प्रसन्न हो जाते हैं, और सभी को पवित्र कर देते हैं *।।३।।*
जितने भी सुख हैं, सब दे देते हैं और दुःखों को नष्ट कर देते हैं। दीन-दुखियों के तो वे बन्धु ही हैं। ऐसे करूणा-सागर हैं कि गुणों को तो ग्रहण कर लेते हैं तथा पापों और दोषों का नाश कर देते हैं *।।४।।*
सब देशों और सभी कालों में वे सदा परिपूर्ण रहते हैं, ऐसा वेद-पुराण सदा से कहते आये हैं। वे सबके स्वामी हैं, सबमें रमते हैं और सबके अन्तर की बात जानते हैं *।।५।।*
करोड़ो प्रकार की इच्छाएँ कर-करके कौन अनेक देवताओं को पूजता फिरे ? हे तुलसीदास, जिसकी सेवा देवाधिदेव शिवजी करते हैं, उसी की सेवा करनी चाहिए *।।६।।*

*┈┉❀꧁ जय जय सियाराम *┈┉❀꧁ विनय पत्रिका - १०८ ꧂❀┉┈*


*वीर महा अवराधिये; साघे सिधि होय ।*
*सकल काम पूरन करै, जानै सब कोय ।।१।।*
*बेगि, बिलंब न कीजिए, लीजै उपदेस ।*
*बीज, मंत्र जपिये सोई, जो जपत महेस ।।२।।*
*प्रेम - बारि तर्पन भलो, घृत सहज सनेहु ।*
*संसय-समिघ, अगिन-क्षमा, ममता बलि देहु ।।३।।*
*अघ- उचाट, मन बस करे, मारै मद मार ।*
*आकरषै सुख - संपदा संतोष - विचार ।।४।।*
*जिन्ह यहि भाँति भजन कियो, मिले रघुपति ताहि ।*
*तुलसिदास प्रभु - चढ़यो, जौ लेहु निबाहि ।।५।।*

*भावार्थ-* वीरपुंगव श्री रघुनाथजी की आराधना करनी समीचीन है, जिन्हें साथ लेने से कुछ सिद्ध हो जाता है, सारी ही सिद्धियाँ अनायास प्राप्त हो जाती हैं। वे सब इच्छाएँ पूरी कर देते हैं, इसे सभी जानते हैं *।।१।।*
तुरन्त ही (किसी सद्गुरू से) उपदेश लेकर उसी बीजमंत्र (राम) को जपना चाहिए, जिसे शिवजी जपा करते हैं *।।२।।*
(मंत्र के जप के अनन्तर जो हवन आदि किया जाता है, उसकी विधि यह है कि) प्रेमरूपी जल से तर्पण करना चाहिए और सहज स्वाभाविक स्नेह का घी बनाना चाहिए। संदेहरूपी समिध का क्षमारूपी अग्नि में हवन करना चाहिए, तथा उसमें 'ममता' की बलि देनी चाहिए *।।३।।*
पापों का उच्चाटन, मन का वशीकरण, अहंकार और काम का मारण और संतोष तथा ज्ञानरूपी सुख-संपत्ति का आकर्षण करना चाहिए *।।४।।*
जिसने इस प्रकार भजन किया, उसे अवश्य रघुनाथजी मिले हैं। तुलसीदास भी इसी मार्ग पर आरूढ़ है। विश्वास है कि उसके स्वामी उसे अवश्य निबाह लेंगे *।।५।।*

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श्रीवृन्दावन महिमामृत - परमाभिवन्दनीय श्री गौरांग(चैतन्य) महाप्रभु के परम प्रिय कृपापात्र भगवत् प्रिय पार्षद श्रीप्रबोधा...
23/05/2026

श्रीवृन्दावन महिमामृत - परमाभिवन्दनीय श्री गौरांग(चैतन्य) महाप्रभु के परम प्रिय कृपापात्र भगवत् प्रिय पार्षद श्रीप्रबोधानंद सरस्वती पाद द्वारा रचित ग्रंथ

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🅿️🅾ST - 71

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*चतुर्थ शतकम् - 8*

*═══════⊰⧱⊱═══════*

क्रमश: आगे.....

श्रीवृन्दाविपिनेऽतिकौतुकभरात्तौ पर्यटन्तौ महा-श्चर्य श्रोत्ररसायनातिमधुरान्योऽन्य-प्रणादोदये। अन्योऽन्याधिक रम्यवस्तु-सुचमत्कारं सदा राधिका-कृष्णौ ध्यायत पश्य पश्य शृणु श्रृण्वित्यादृतोक्ती मिथः । ।66।।

*वे श्रीयुगलकिशोर अति कौतुकवश श्रीवृन्दावन में घूम रहे हैं- महाश्चर्य कर्णरसायन अति मधुर परस्पर सुन्दर वाणी बोलते हैं, एक दूसरे को अधिक रमणीय वस्तु की सुचमत्कारता दिखाते हैं एवं "देखो" ! "देखो !!" "सुनो !" "सुनो !!" इस प्रकार प्रीतिपूर्वक कहते हैं-मैं श्रीराधाकृष्ण के इस स्वरूप का ध्यान करता हूँ।।66 ।।*

कृष्णानुरागस्य परं प्रकर्षं तद्रूपशोभाद्युतिभूमसीम। श्रीराधिकायाः परमाधिक-श्रि श्रयाम वृन्दावनमेकधाम । ।67 ।।

*श्रीकृष्णानुराग की परम पराकाष्ठा प्राप्त एवं उनके रूप शोभादि से परम कान्तियुक्त तथा श्रीराधिका के परम अधिक सौन्दर्य से मण्डित मुख्यधाम श्रीवृन्दावन का ही मैंने आश्रय कर लिया है। ।67।।*

वृन्दाटवीमोहनकुञ्जपुजे कलिन्दकन्या पुलिनैकसीम्नि । श्रीराधिका-कृष्णपदारविन्ददास्यैकदास्ये बलतां ममाशा ।।68।।

*श्रीयमुना पुलिन में श्रीवृन्दावन की मोहिनी कुञ्जों में श्रीराधाकृष्ण के चरणकमलों में एकमात्र दास्य भाव में मेरी आशा वृद्धि हो।।68।।*

सहैव राधा-मुरलीमनोहरौ कन्दर्पलीलामय-दिव्यमूर्तिकौ। वृन्दाटवी मञ्जुलकुञ्जमण्डले कस्यास्ति नाशाऽतिरसा नु सेवितुम् ? । ।69।।

*श्रीवृन्दाटवी के मञ्जुल कुञ्जमण्डल में कन्दर्पलीलामय दिव्यमूर्ति श्रीराधामुरली- मनोहर की एक साथ ही सेवा करने के लिये किसकी परम रसमयी आशा नहीं होती ? । ।69 ।।*

आशापि नासाद्यत एव राधा-पादारविन्दार्चन इन्दिराद्यैः। अहं तु वृन्दावन । ते प्रभावा‌द्भावानुबन्धे स्पृहयालुरस्मि । ।70।।

*लक्ष्मी आदि देवीगण भी श्रीराधा के चरणकमलों की सेवा की आशा तक भी नहीं कर सकतीं, किन्तु हे वृन्दावन! मैं आपके प्रभाव से किसी भी भाव-योग से प्रबल इच्छुक हो रहा हूँ।।70।।*

विहाय वृन्दावनमिन्दिरादिभिः सुदुर्लभं कुत्र विमूढ़ यासि रे ।। सर्वेश्वरैश्वर्यमथामृतं परं सुदुर्लभाश्चात्र मिलन्ति भक्तयः ।।71।।

*हे विमूढ़ ! लक्ष्मी आदि के लिये भी सुदुर्लभ इस श्रीवृन्दावन को त्यागकर कहाँ जाता है? यहाँ ही तो सर्वाधीश्वर का ऐश्वर्य, परम अमृत एवं सुदुर्लभ भक्ति समूह मिलते हैं।।71।।*श्रीवृन्दावन महिमामृत - परमाभिवन्दनीय श्री गौरांग(चैतन्य) महाप्रभु के परम प्रिय कृपापात्र भगवत् प्रिय पार्षद श्रीप्रबोधानंद सरस्वती पाद द्वारा रचित ग्रंथ

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🅿️🅾ST - 72

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*चतुर्थ शतकम् - 9*

*═══════⊰⧱⊱═══════*

क्रमश: आगे.....

हरि हरि हरिराधा-भङ्‌गुरानंगरंगं मधुर मधुर-सान्द्रानन्दसिन्धूत्तरंगम् । क इह विशतु वृन्दाकानने कुञ्जपुञ्जस्फुरदुरुनिजरूपाद्यन्तरेणान्तरेऽपि?।।72।।

*हरि ! हरि !! (आश्चर्य में) श्रीहरि तथा श्रीराधा की नित्यस्थायी कामरंगमय, मधुरातिमधुर आनन्दधन उच्च तरंगों युक्त इस श्रीवृन्दावन की कुञ्जों के भीतर आपके (वृन्दावन के) बहुविध रूपादि की स्फूर्ति के बिना भी कोई प्रवेश कर सकता है?।।72।।*

राधाकृष्ण-विचित्रमन्मथकलानन्दाश्चमत्कुर्वते यस्मिन् सौख्यचमत्कृतिः परतरा यत्रत्यदीक्षादितः । तद्द्वन्द्वे ममकारतोऽद्‌भुततमाद यस्याद्‌द्भुतानुक्षणो-ल्लासाः श्रीवनराजसीम-सुमहाभावं तमेव स्तुमः । ।73 ।।

*जहाँ श्रीराधाकृष्ण का विचित्र काम-कलासमूह आनन्द-राशि की चमत्कारिता विधान करता है, जहाँ (निवास करने की निष्ठारूप) दीक्षादि लेने से परमसुख की चमत्कारिता प्राप्त होती है और वहां श्रीयुगलकिशोर में जिसको परम अ‌द्भुत ममताबुद्धिवश प्रतिक्षण ही उल्लास होता है, उस श्रीवृन्दावन सीमा में रहने वाले अति सुमहा-उदार पुरुष की मैं स्तुति करता हूँ।। 73।।*

कलिन्दतनया-तटीस्फुरदुदारवल्लीकुटी विहारि रतिलम्पटीभवदनुक्षणं धाम तत् । द्वयं कनकचम्पक कुवलयञ्च निन्दद्वचा सुचारुपरिचर्यया मनसि तोषयेत् स्वात्मभूः । ।74 ।।

*श्रीयमुना-तटवर्ती सुमनोहर लताकुटी में विहार करने वाले प्रतिक्षण ही रतिलम्पट जो श्रीयुगलकिशोर हैं, जो अपनी कान्ति से स्वर्णचम्पक एवं नीलकमल को भी तिरस्कार करते हैं-उनके मन को सुन्दर परिचर्या से कामदेव ही तुष्ट कर सकता है।।74 ।।*

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क्रमश:-............. शेष अगली पोस्ट 73 में

।।श्रीराधामाधव चरन बंदौं बारंबार।।

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क्रमश:-............. शेष अगली पोस्ट 72 में

।।श्रीराधामाधव चरन बंदौं बारंबार।।

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*┈┉❀꧁  विनय पत्रिका - १०६ ꧂❀┉┈*                  *महाराज रामादर्यो धन्य सोई ।* *गरूअ, गुनरासि, सर्वज्ञ, सुकृती, सूर, सील...
23/05/2026

*┈┉❀꧁ विनय पत्रिका - १०६ ꧂❀┉┈*

*महाराज रामादर्यो धन्य सोई ।*
*गरूअ, गुनरासि, सर्वज्ञ, सुकृती, सूर, सील-निधि, साधु तेहि-सम न कोई ।।१।।*
*उपल-केवट - कीस - भालु - निसिचर-सबरि-गीध सम-दम-दया-दान-हीने ।*
*नाम लिये राम किय परम पावन सकल, नर तरत तिनके गुनगान कीने ।।२।।*
*ब्याध अपराध की साध राखी कहा, पिंगलै कौन मति भगति-भेई ।*
*कौन धौं सोमयाजी अजामिल अधम, कौन गजराज धौं बाजपेयी ।।३।।*
*पांडु - सुत, गोपिका, बिदुर, कुबरी, सबहिं सुद्ध किये सुद्धता-लेस कैसो ।*
*प्रेम लखि कृष्ण किये आपने तिनहुँ को, सुजस संसार हरिहर को जैसो ।।४।।*
*कोल, खस, भील, जवनादि खल राम कहि, नीच है उँच पद को न पायो ।*
*दीन-दुख-दमन श्रीरमन करूना-भवन, पतित पावन विरद बेद गायो ।।५।।*
*मंदमति कुटिल खल-तिलक तुलसी सरिस, भो न तिहुँ लोक, तिहुँ काल कोऊ ।*
*नाम की कानि पहिवानि जन आपनो, ग्रसित कलि-व्याल राख्यो सरन सोऊ ।।६।।*

*भावार्थ-* महाराजा श्रीरामचन्द्रजी ने जिस किसी का आदर किया, वही धन्य है ! यही गौरवमय गुणों का भाण्डार, सर्वज्ञ, पुण्यवान्, वीर, सुशील और साथ है। उसके समान अन्य कोई भी नहीं है *।।१।।*
अहिल्या, गुहनिषाद, बन्दर, रीठ, राक्षस, शबरी, जटायु-ये सब शम, दम, दया, दान आदि सद्गुणों से सर्वया रहित थे। किन्तु नाम-स्मरण करने से भगवान् राम ने इनको ऐसा बना दिया कि इनके गुणों का कीर्तन करने से मनुष्य संसार-सागर से पार हो जाते हैं *।।२।।*
वाल्मीकि ब्याध ने पाप करने में क्या उठा रखा था ? पिंगला वेश्या ने अपनी बुद्धि का कब भक्ति-रस से सींचा था ? अजामेल ने कब सोमयज्ञ किया था ? और गजेन्द्र कहाँ का अश्वमेध करनेवाला था ? *।।३।।*
पांडवों, गोपियों, विदुर और कुबरी में पवित्रता का लेश भी नहीं था, किन्तु प्रभु ने इन सबको भी पवित्र बना लिया। इनका प्रेम देखकर श्रीकृष्ण ने इन्हें अंगीकार कर लिया। आज इनका सुन्दर सुयश संसार में ऐसा छा रहा है, जैसा विष्णु और शिव का *।।४।।*
कोल, खस, झील, यवन आदि दुष्टों में ऐसा कौन है, जिसने राम-नाम-उच्चारण करने पर ऊंचा पद न पाया हो ? दीनों के दुख दूर करनेवाले, लक्ष्मी के पति, करूणा के मंदिर, पापियों का उद्धार करनेवाले श्रीरामजी का यश वेदों ने गाया है *।।५।।*
तीनों लोकों और तीनों कालों में तुलसी-सरीखा मूर्ख, कुटिल और दुष्ट-शिरोमणि कोई नहीं हुआ, किन्तु अपने नाम की मर्यादा रखकर, और कलिकाल-रूपी साँप से डसा हुआ देखकर उसे भी श्रीराम ने अपनी शरण में ले लिया *।।६।।*

*┈┉❀꧁ जय जय सियाराम ꧂❀┉┈*

जय सियाराम 🙏🏻🙏🏻 जानकी-जीवन की बलि जैहौं🙏🏻🙏🏻         *जानकी-जीवन की बलि जैहौं !**चित कहै, रामसीय-पद परिहरि अब न कहूँ चलि ...
23/05/2026

जय सियाराम
🙏🏻🙏🏻
जानकी-जीवन की बलि जैहौं🙏🏻
🙏🏻

*जानकी-जीवन की बलि जैहौं !*
*चित कहै, रामसीय-पद परिहरि अब न कहूँ चलि जैहौं ।।१।।*
*उपजी उर प्रतीति सुपनेहुँ सुख प्रभु-पद-बिमुख न पैहौं ।*
*मन समेत या तनु के बासिन्ह, इहै सिखावन दैहौं ।।२।।*
*स्रवननि और कथा नहिं सुनिहौं, रसना और न गैहौं ।*
*रोकिहौं नैन बिलोकत औरहिं, सीस ईस ही नैहौं ।।३।।*
*नातो नेह नाथ सों करि सब नातो नेह बहैहौं ।*
*यह छर भार ताहि तुलसी जग जाको दास कहैहौं ।।४।।*

*भावार्थ-* मैं तो श्री जानकी-जीवन रघुनाथजी पर न्योछावर हो जाऊँगा। मन कर रहा है कि सीतारामजी के चरणों को छोड़कर अब मैं इधर-उधर कहीं नहीं भटकता फिरूँगा, वहीं स्थिर हो जाऊँगा *।।१।।*
हृदय में कुछ ऐसा विश्वास बैठ गया कि प्रभु रामचन्द्रजी के चरणों से विमुख होकर स्वप्न में भी कहीं सुख न पा सकूँगा। अब मैं मन को तथा इस शरीर के अन्य निवासियों को अर्थात् इन्द्रियों को यही उपदेश दूँगा, कि *।।२।।*
कानों से किसी और की चर्चा न सुनूँगा (केवल श्रीराम की ही कथा सुनूँगा), जीभ से दूसरों के गुण न गाऊँगा, (केवल श्रीराम के ही चरित्र गाऊँगा, कीर्तन करूँगा), दूसरों की ओर देखते हुए नेत्रों को उधर से हटा लूँगा (केवल श्रीराम को ही टक लगाकर देखा करूँगा), और माथा भी केवल उन्हीं को ही झुकाऊँगा *।।३।।*
अपने स्वामी के साथ प्रीति का नाता जोड़कर और सभी से नाता तोड़ दूँगा। सारांश यह कि सब प्रकार से, अनन्य भाव से, एक आपही का होकर रहूँगा, इधर-उधर न भटकता फिरूँगा। इस संसार में, मैं तुलसीदास जिसका सेवक कहाऊँगा, उसी को सारा योग-क्षेम का भार सौंप दूँगा *।।४।।*

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*प्रतिकूलता में अनुकूलता* -१७८*ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा* । *जरा न सो तेहि कारन गिरिजा* ॥ *उलटि पलटि लंका सब जारी* । *क...
23/05/2026

*प्रतिकूलता में अनुकूलता* -१७८

*ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा* ।
*जरा न सो तेहि कारन गिरिजा* ॥
*उलटि पलटि लंका सब जारी* ।
*कूदि परा पुनि सिंधु मझारी* ॥
(सुंदरकांड २६/७-८)
[शिवजी कहते हैं-] हे पार्वती! जिन्होंने अग्निको बनाया, हनुमान्जी उन्हींके दूत हैं। इसी कारण वे अग्निसे नहीं जले। हनुमान्जीने उलट-पलटकर (एक ओरसे दूसरी ओरतक) सारी लङ्का जला दी। फिर वे समुद्रमें कूद पड़े ॥

*ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा*-
हे गिरिजा! जिन्होंने अग्नि का सृजन किया है, हनुमान उन्हीं का तो दूत है इसीकारण से वह नहीं जला। भगवान शिव तो भोला भण्डारी हैं, अपने ही अवतार की प्रशंषा करते हुये उन्हें संकोच हो रहा है। किन्तु एक दिन गोस्वामीजी ने हनुमानजी से इसका रहस्य पूछ लिया। उनका उत्तर कई भ्रान्तियों को दूर करने वाला है।
कहा- तुलसी! तुम्हें तो मानस कण्ठस्थ है, याद है न, मैनें लंका प्रवेश के समय भगवान नरसिंह का ही स्मरण किया था *“लंकहि चलेउ सुमिरि 'नरहरी"*।
होलिका तो भक्त प्रहलाद को लेकर अग्नि के ढेर में बैठ गई थी तब भी उसकी रक्षा नरसिंहजी ने कर दी थी। अरे! मैं तो केवल पूँछ के सिरे में लगी अग्नि को लेकर कूद फाँद ही कर रहा था, फिर मेरी रक्षा कैसे नहीं होती? जब प्रभु की प्रेरणा त्रिजटा को सपने के रूप में मिल सकती है तो मुझे भी *'उर प्रेरक रघुवंश बिभूषन'* ने *'नरहरि* ' स्मरण करने की प्रेरणा दी। इसीलिये वह अग्नि ताप मुझे श्रीखण्ड के समान ही शीतल प्रतीत हुआ
*'शिशिरस्येव सम्पातो लांगूलाग्रे प्रतिष्ठितः'* ५/५३/३४ वा.रा.।
तुम्ही ने लिख रखा है *"सीता प्रथम अनल महुँ राखी"* सो सीता अम्बा के प्रताप से, उनकी आज्ञा आशीर्वाद से अग्नि भी मेरे लिये शीतल हो गई
*"यदि वात्वेक पत्नीत्व शीतो भव हनूमतः"* ५/५३/२७

*उलटि पलटि* एक किनारेसे दूसरे तक आग लगाते गए और वहाँसे पलटकर पहले किनारे तक इस तरह सारी लंका जला डाली। हेतु यह कि भूलसे एकाध घर रहा हो तो वह पलटते समय दीख पड़ेगा।
सागरमें कूदनेका कारण दोहेमें स्पष्ट कहा है।
(क) वा. रा. और कवितावलीमें वर्णन है कि लंका जलाते हुए कपिको पकड़ने या मारनेके लिये अनेक शस्त्रास्त्र प्रवीण महावीरोंको और मेघनादको रावणने आज्ञा दी। हनुमानजीने एक सुवर्णस्तंभ हाथमें लेकर अनेकोंको मार डाला तब रहे बचे हुए भाग गए।
फिर लंकाकी आग बुझाने, वानरको बहा ले जाकर सागरमें डुबोनेकी आज्ञा रावणने प्रलयमेघोंको दी। प्रलय-मेघोंने मूसलाधार वर्षा शुरु की; तो ही वर्षाका जल तेलके समान जलने लगा; तब प्रलयमेघ घबड़ाकर मुँह मोड़कर भागे। ऐसा कवितावलीमें वर्णन है।
*देखि ज्वालाजालु, हाहाकारु दसकंध सुनि*,
*कह्यौ, धरो, धरो, धाए बीर बलवान हैं*।
*लिएँ सूल-सेल, पास-परिघ, प्रचंड दंड*,
*भाजन सनीर, धीर धरें धनु-बान हैं*॥
*'तुलसी' समिध सौंज, लंक जग्यकुंडु लखि*,
*जातुधान पुंगीफल जव तिल धान हैं*।
*स्रुवा सो लँगूल, बलमूल प्रतिकूल हबि*,
*स्वाहा महा हाँकि हाँकि हुनैं हनुमान हैं*।
(कवितावली सुंदरकांड ७)
उस (धधकते हुए) अग्निसमूहको देख और लोगोंका हाहाकार सुन रावणने कहा-'अरे, इसे पकड़ो ! इसे पकड़ो !!' यह सुनकर बहुत-से बलवान् योद्धा त्रिशूल, बर्डी, फाँसी, परिघ, मजबूत डंडे और पानी भरे हुए बर्तन लिये दौड़े और कुछ धीर लोगोंने धनुष-बाण भी धारण कर रखे थे। श्रीगोसाईंजी कहते हैं कि लङ्काको यज्ञकुण्ड समझो और वहाँकी सामग्री लकड़ी है तथा राक्षसगण सुपारी, जौ, तिल और धान हैं। हनुमान् जीकी पूँछ सुवा है, बलवान् शत्रु हवि हैं और उच्च हाँकरूपी स्वाहामन्त्रद्वारा हनुमान् जी हवन कर रहे हैं ॥
शासन-चक्र को चलानेवाले उस रावण ने क्रोधाग्नि उगलते हुए, राक्षसों को देखकर कहा- क्या सप्त लोकों को जला देनेवाला प्रलयकाल आ गया ? या अन्य कोई उत्पात उत्पन्न हो गया है? इस भयंकर अग्नि से लंका के जलने का क्या कारण है ?

अपने बंधुजनों को एवं धन-वैभव को खोकर रोनेवाले राक्षसों ने अपने कर जोड़कर निवेदन किया-
'हे प्रभो! उस वानर ने तरंगायमान समुद्र से भी दीर्घ अपनी पूँछ में लगाई गई आग से ऐसा कर दिया।' यह सुनकर रावण उबल पड़ा।

आज एक क्षुद्र वानर के तेज से महान् लंकापुरी जलकर भस्म होकर उड़ गई, रक्तवर्ण अग्नि इस नगर को खाकर डकार ले रही है। हमारी यह दशा देखकर देवता हँसते होंगे । हमारा युद्ध-कौशल भी धन्य है! अच्छा है !! यह कहकर रावण अट्टहास कर उठा।

देवों को परास्त करनेवाले रावण ने राक्षसों से कहा लंका को जलाने-वाली अग्नि को बाँधकर ले आओ।

बड़े क्रोध से भरकर रावण ने कहा- यहाँ से बचकर भाग जाने के पहले ही उस विनाशकारी वानर को पकड़कर ले आओ।
उसके आस-पास में खड़े वीर 'जो आज्ञा' कहकर दौड़ चले।

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*विदग्ध अयोध्या* -३गतांक से आगे.........   महाराज दशरथ बार-बार मूर्छित होते हैं और फिर उन्हें होश आता है। करुणक्रन्दनसे ...
23/05/2026

*विदग्ध अयोध्या* -३

गतांक से आगे.........

महाराज दशरथ बार-बार मूर्छित होते हैं और फिर उन्हें होश आता है।
करुणक्रन्दनसे उनका गला भरा हुआ है।
अश्रुओंसे शरीर भीग गया है, गला अवरुद्ध होनेसे कुछ बोल सकते नहीं।
उनके हदयमें महान् दावानल धधक रहा है।
उनके मनमें एक ही लालसा है-
उनके प्राणस्वरूप श्रीराम किसी भी तरह रुक जायें, वनमें न जायें। वे जानते हैं कि 'मेरे प्राण, मेरे ही क्या-पूरी अयोध्याके प्राण मेरे राममें हैं।'
बिना राम अब सुख कहाँ ? क्या रामके बिना उनके प्राण रह पायेंगे ?

*रघुनाथ पियारे, आजु रहौ (हो)*।
*चारि जाम बिस्त्राम हमारें,छिन-छिन मीठे बचन कहौ (हो)* ॥
*बृथा होउ बर बचन हमारौं, कैकइ जीव कलेस सहौ (हो)*।
*आतुर है अब छाँडि अवधपुर, प्रान-जिवन ! कित चलन कहौ (हो)* ॥
*बिछुरत प्रान पयान करेंगे, रहौ आजु, पुनि पंथ गहौ (हो)*।
*अब 'सूरज' दिन दरसन दुरलभ, कलित कमल-कर कंठ गहौ (हो)* ।।
(सूर-रामचरितावली २०)

'प्यारे रघुनाथ ! आज (भर) रह जाओ ! मेरे पास (कम-से-कम) चार पहर और ठहरे रहो और क्षण-क्षणमें मधुर वचन सुनाओ (जानेकी बात मत कहो)। (कैकेयीको दिया) मेरा वररूपी वचन चाहे झूठा हो जाय और कैकेयी अपने हृदयमें क्लेश पाये।
हे प्राणोंके भी जीवनप्राण ! अब आतुर होकर-शीघ्रतामें आकर अयोध्याका त्याग करके कहाँ चलनेकी बात कहते हो ? तुम्हारा वियोग होते ही मेरे प्राण भी प्रयाण कर जायेंगे- देहसे निकल जायेंगे: अतः कम-से-कम आज तो रह जाओ फिर मार्ग पकड़ना (चले जाना)। अब आगे के दिनोंमें तो तुम्हारा दर्शन दुर्लभ है ही; (इस समय तो गोदमें बैठ जाओ) और अपनी सुन्दर कमल-नालके समान भुजाओंसे मेरा गला पकड़ लो (गलेमें भुजाएँ डालकर एक बार मिल लो)।

इधर माता कौसल्या उन्मादिनी हो रही हैं, दहाड़ मार-मारकर रो रही हैं। उन्हें लग रहा है, कहीं भूकम्प तो नहीं आ रहा है, पृथ्वी फट तो नहीं रही है। उनके प्राण हाहाकार कर रहे हैं। कभी सोचती हैं कि शरीरमें प्राण हैं या नहीं। कभी - सोचती हैं- नहीं-नहीं, उनके रघुनाथ नहीं जा रहे हैं; वे उन्हें छोड़कर जा भी नहीं सकते। उन्हें - विश्वास ही नहीं हो रहा है। परंतु जब रघुनाथ चल पड़े, तब उनका धीरज भी जाता रहा-'हा ! राघवेन्द्र ! तुम इतने निष्ठुर कैसे हो गये ? तुम्हारा हृदय तो बड़ा ही कोमल है। सदैव हमारी रुचिका इतना ध्यान रखते थे, आज तुम्हें क्या हो गया ?'
*बिहवल तन-मन, चकित भई सो, यह प्रतच्छ सुपनाए*। *गदगद-कंठ 'सूर' कोसलपुर सोर, सुनत दुख पाए* ॥
(सूर-रामचरितावली १८।४)

'उनका शरीर और मन - दोनों विह्वल हो गये। आश्चर्यमें पड़कर वे यही नहीं समझ सकीं कि यह सब प्रत्यक्षमें हो रहा है या स्वप्न है; उनका कण्ठ । गद्गद हो गया। सूरदासजी कहते हैं कि इस बातका कोलाहल अयोध्यामें हो गया और उसे सुनकर सभी दुःखी हो गये।'
कौसल्याजी कहती हैं-
*न हि तावद् गुणैर्जुष्टं सर्वशास्त्रविशारदम्* ।
*एकपुत्रा विना पुत्रमहं जीवितुमुत्सहे* ॥
*न हि मे जीविते किंचित् सामर्थ्यमिह कल्प्यते* ।
*अपश्यन्त्याः प्रियं पुत्रं लक्ष्मणं च महाबलम्* ॥
(वा० रा० २।४३।१९-२०)
'जो उत्तम गुणोंसे युक्त और सम्पूर्ण शास्त्रोंमें प्रवीण हैं, उन अपने पुत्र श्रीरामके बिना मैं इकलौते बेटेवाली माँ जीवित नहीं रह सकती। अब प्यारे पुत्र श्रीराम और महाबली लक्ष्मणको देखे बिना मुझमें जीवित रहनेकी कुछ भी शक्ति नहीं है।'

*यदि राम वनं सत्यं यासि चेन्नय मामपि*
*त्वद्विहीना क्षणार्द्ध वा जीवितं धारये कथम्* ॥
*यथा गौर्बालकं वत्सं त्यक्त्वा तिष्ठेन्न कुत्रचित्*।
*तथैव त्वां न शक्नोमि त्यक्तुं प्राणात्प्रियं सुतम्* ॥
(अध्यात्मरामायण २।४।८-९)
'राम ! यदि सचमुच ही तुम वनको जाते हो तो मुझे भी साथ ले चलो; तुम्हारे बिना मैं आधे क्षण भी कैसे जीवित रह सकती हूँ ? जिस प्रकार गौ अपने अल्पवयस्क बछड़ेको छोड़कर अन्यत्र नहीं रह सकती, उसी प्रकार मैं भी तुझ अपने प्राणप्रिय पुत्रको नहीं छोड़ सकती।' #श्रीराधामाधव summer special
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श्रीवृन्दावन महिमामृत - परमाभिवन्दनीय श्री गौरांग(चैतन्य) महाप्रभु के परम प्रिय कृपापात्र भगवत् प्रिय पार्षद श्रीप्रबोधा...
21/05/2026

श्रीवृन्दावन महिमामृत - परमाभिवन्दनीय श्री गौरांग(चैतन्य) महाप्रभु के परम प्रिय कृपापात्र भगवत् प्रिय पार्षद श्रीप्रबोधानंद सरस्वती पाद द्वारा रचित ग्रंथ

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🅿️🅾ST - 70

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*चतुर्थ शतकम् - 7*

*═══════⊰⧱⊱═══════*

क्रमश: आगे.....

वीक्षे दिव्याक्षिलक्षः स्थिरचरसुषमां सौरभं घाणलक्ष-जिंभ्राम्याकर्णये च श्रवणविततिभिस्त्वद्‌गुणानत्युदारान् । पत्कोट्या त्वस्यटेयं यदि च करशिरः कोटिभिस्त्वां नमेयं नो तृप्तिर्मे तथापि प्रियतमपरमानन्द-वृन्दावनाद्य।।53 ।।

*हे प्रियतम् परमानन्दमय श्रीवृन्दावन ! यदि आज मैं लाख दिव्य नेत्रों से तुम्हारे स्थावर-जंगमों की शोभा दर्शन करूँ, लाख नासिकाओं के द्वारा तुम्हारी सुगन्धि सेवन करूँ, अनेक कानों से यदि तुम्हारी अति उदार गुणावली श्रवण करूँ, करोड़ों चरणों से यदि तुम्हारे बीच भ्रमण कर सकूँ तथा कोटि कोटि हाथों एवं मस्तकों से तुम्हें नमस्कार करूं तो भी मेरी तृप्ति नहीं होगी।।53।।*

कर्णे शकुः प्रवेश्यः किमपि यदि शृणोत्येतदीयस्य दोषान् जिह्वा च्छेद्या प्रमादाद यदि वदत्ति समुत्पाट्यमक्षीक्षते चेत् प्राणाः संत्यागयोग्या यदि मनसि तथा निश्चयस्तछूवाद्या-श्वाण्डालीकृत्य वर्ज्याः परमतममिदं धाम वृन्दावनं यत् । ।54।।

*यदि कान इस (श्रीवृन्दावन) के दोषों को सुनें, तो उनमें कील गड़वा देना उचित है, यदि जिहा भूल कर उन (दोषों) का उच्चारण करे, तो वह काट देने योग्य है,यदि नेत्र उन (दोषों) को देखें, तो उनको निकलवा देना चाहिये, यदि मन में इन (दोषों) का विश्वास जम जाये, तो प्राण त्याग करना ही कर्तव्य है, वे समस्त कानादि (इन्द्रियगण) चण्डालीवत् अस्पृश्य एवं त्यागने योग्य है- क्योंकि यह श्रीवृन्दावन धाम तो परमतम महत्तम वस्तु है।।54।।*

न हि वृन्दावन विन्दाम्यहमिन्दावप्यमीदृशीं सुखताम्। तुच्छीकृत-सुरगणिकासुखजनिका ते यतो रजः कणिका ।।55 ।।

*हे श्रीवृन्दावन ! मैं चन्द्र में भी ऐसा सुख प्राप्त नहीं करता हूँ-क्योंकि तुम्हारा एक रजकण भी स्वर्ग की वेश्यागणों के (संग) सुख को भी अति तुच्छ बना देता है।।55।।*

वृन्दारक-नुत-वृन्दाविपिनलता-शाखि-गुल्मानाम् ।
वृन्दारक इह नन्दत मन्दा मन्दारकोटिभिः किं कः ? ।। 56।।

*हे कुबुद्धि मनुष्यो ! देवताओं के द्वारा भी वन्दनीय इन श्रीवृन्दावन के लता, वृक्ष, गुल्मादि का भली प्रकार आनन्द प्राप्त करो-कोटि-कोटि मन्दार (स्वर्ग के पाँच प्रकार के वृक्षों में से एक वृक्ष का नाम है) वृक्षों से तुम्हें क्या लाभ होगा ? ।।56 ।।*

श्रीराधामुरलीधर वरधन-वृन्दावने वरं कृमिकः।
भगवत्-पार्षदमुख्योऽप्यन्यत्राऽहं न चोत्सहे भवितुम् ।।57।।

*श्रीराधामुरलीधर के परमधन इस श्रीवृन्दावन में क्षुद्र कृमि होना अच्छा है, परन्तु अन्य स्थान पर भगवत्-पार्षद श्रेष्ठ होने का भी मैं उत्साह नहीं करता।।57।।*

वृन्दावनगुणवृन्दान्यनिशममन्दानुरागेण ।
यो वर्णयति समाकर्णयति हरि सोऽधमर्णयति। ।58।।

*जो प्रबल अनुराग से श्रीवृन्दावन के गुणों को वर्णन करता है एवं सुनता है, वह श्रीहरि को ही ऋणी करता है।।58।।*

राधापति-रतिरञ्जित निकुञ्जभवने वने परमे। श्रीवृन्दावननाम्नि प्रणयप्रणयं समस्तगुणसीम्नि ।। 59 ।।

*समस्त गुणों की खान श्रीवृन्दावन नामक इस परम (श्रेष्ठ) वन में श्रीराधापति के रतिरञ्जित निकुञ्ज भवन में प्रीति स्थापन कर।।59 ।।*

यदि वृन्दावन विन्दाम्यपि तृणतां ते वनान्तेषु । न तदा विकुण्ठलक्ष्मीमपि करमिलितां निभालये ललिताम् । ।60।।

*हे वृन्दावन ! यदि तुम्हारे वन में तृण बन कर भी रह सकूँ, तो हाथ पै रखी सुललित वैकुण्ठलक्ष्मी को भी मैं आँख उठाकर नहीं देखूँ।। 60।।*

सर्वदुःखदशा घोरा वरं वृन्दावनेऽस्तु मे। प्राकृताऽप्राकृताऽशेषविभूतिरपि नान्यतः । ।61।।

*श्रीवृन्दावन में मेरी घोरतर दुःख-दशा भले हो जाय, फिर भी अन्यत्र प्राकृत एवं अप्राकृत समस्त ऐश्वर्यों को मैं नहीं चाहता। ।।61।।*

कुर्वत्यपि महारौद्रमुपद्रवमनुक्षणम्। भक्तिर्वृन्दाटवीसत्त्वे तत्त्वेक्षातः सदाऽस्तु मे । ।62 ।।

*श्रीवृन्दावन के प्राणी यदि हर क्षण मेरे लिये महा घोर उपद्रव भी करें, तो भी तत्त्व की ओर देखते हुए मेरी उनके प्रति सदा भक्ति बनी रहे।।62।।*

समस्त पुरुषार्थाणां चिन्तामणय एव ते। श्रीशादि-मृग्यसंस्पर्शा ये वृन्दावन खर्परा । । 62 ।।

*श्रीवृन्दावन के चोर भी सर्वपुरुषार्थ-चिन्तामणि स्वरूप हैं एवं लक्ष्मी, विष्णु आदि देवतागण भी उन्हें स्पर्श करने की (पाने की) इच्छा करते हैं। ।63 ।।*

पशुरेकः खग एकस्तृणमेकं रेणुरेको वा। श्यामरसा‌द्भुत वन्ये वृन्दारण्ये भवाम्यहं धन्यः । ।64 ।।

*श्यामरसमय अद्भुत वनों युक्त श्रीवृन्दावन में एक पशु, एक पक्षी, एक तृण अथवा एक रजकण होकर भी मैं कृतार्थ हो जाऊँगा।।64 ।।*

राधा-मुरलिमनोहर-चरणविलासेन धन्यायाम्।
वृन्दावनभुवि मन्ये परमपुमर्थो मनागपि प्रणयः । ।65।।

*श्रीराधामुरलीमनोहर के चरणविलास से धन्य हुई इस श्रीवृन्दावन भूमि में यदि किञ्चिन्मात्र भी प्रीति हो तो मैं उसे ही परम पुरुषार्थ मानता हूँ।। 65 ।।*
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क्रमश:-............. शेष अगली पोस्ट 71 में

।।श्रीराधामाधव चरन बंदौं बारंबार।।

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