24/05/2026
*प्रतिकूलता में अनुकूलता* -१८०
*मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा*।
*जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा* ॥
*चूड़ामनि उतारि तब दयऊ* ।
*हरष समेत पवनसुत लयऊ* ॥
(सुंदरकांड/२७/१-२)
[हनुमान् जीने कहा- हे माता! मुझे कोई चिह्न (पहचान) दीजिये, जैसे श्रीरघुनाथजीने मुझे दिया था। तब सीताजीने चूड़ामणि उतारकर दी। हनुमान् जीने उसको हर्षपूर्वक ले लिया ॥
पुनरागत हनुमान् को देखकर पतिप्राणा सीतादेवी के प्राण उनके शरीर में फिर से आ जाते हैं।
अब तक वह हनुमान् की सुरक्षा के लिए चिंतित बैठी थीं और उधर हनुमान् सीता के कुशल-मंगल की कामना लिए व्याकुल थे।
दोनों की व्याकुलता अशोकवाटिका में उनके पुनर्मिलन, पुनदर्शन और पुनः संभाषण से शांत बन जाती है।
यह मिलन केवल सीता और आंजनेय का नहीं है, बल्कि
वात्सल्य और भक्ति का है।
यह भूख और प्यास का मिलन है,
ज्ञान और जिज्ञासा का मिलन है,
दृष्टि और दिदृक्षा का मिलन है,
वाणी और विवक्षा का मिलन है
तथा प्राण और प्रणव का मिलन है।
सुंदर कांड का सबसे सुन्दर तथा मार्मिक प्रसंग यही है जहाँ पर मारुतनंदन और विदेहनंदिनी अपने मुँह से नहीं बल्कि अपने हृदय से, मन से और आत्मा से बातचीत करते हैं।
*मातु* - सीताजीसे बोलनेमें 'मातु' (माता) या 'जननी' संबोधन अबतक १३ बार प्रयुक्त है। यहाँ २७। १ में १४ वें बार है। यहाँ जैसे चौपाईके प्रारम्भमें ही 'मातु' है वैसे ही सिर्फ एक बार १४। ९ में है।
अब सीतावियोग होगा इस विचारसे हनुमानजी भावापन्न होकर चित्रलिखितसे तटस्थ, हाथ जोड़े हुए खड़े हैं। फिर धीरज धरकर बोलने लगते ही, विरह व्यथित होकर
माऽतु! मोहि दीजे । कछु। चीन्हा!! ऐसे ठिठक् ठिठककर बोले।
गद्गदकंठ हुए हैं। १४।९ में भी ऐसी ही दशा है। तथापि इस समयसे कम है।
(क) रघुनायक- श्रीरघुनाथजी पहचान सकें ऐसा कुछ दीजिये।
(ख) कपिने यहाँ या आगे, चल देनेके पूर्व बिदा माँगना टाल दिया है। यह दक्षता अत्यंत महत्वकी है।
विदा मांगने पर यहाँसे मत जाओ, ऐसा कहतीं तो बड़ा अनर्थ हो जाता।
*मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा* - हे माता! मुझे कुछ चिन्ह दीजिये जैसे रघुनाथजी ने मुझे अँगूठी दी थी। यहाँ 'रघुनायक' पद के द्वारा कोई ऐसी विशेष वस्तु जो रघुवंश से सम्बन्धित हो, उसे देने का आग्रह किया है।
*'चूडामणि'* चूड़ा= चोटी, वेणी। उसमें पहननेका एक अलंकार। जनकजीको इन्द्रने दिया हुआ था फिर उन्होंने सीताजीको, दिया था ऐसा वा. रा. में कहा है।
इन्द्रने दशरथजीको, उन्होंने कौसल्याजीको औ तोर कौसल्याजीने सीताजीको दिया था, ऐसी भी कथा है।
यही बात यहाँ ग्राह्य लगती है।
*चूड़ामनि उतारि तब दयऊ*
तब सीताजी ने जटा रूप बनी हुई वेणी में से शीशफूल निकाल कर दिया। इस शीशफूल से सीताजी ने रामजी को संदेश दिया कि मैं आपके श्रीचरणों में नतमस्तक हूँ। पवनसुत ने उसे अत्यन्त प्रसन्नता से ले लिया।
ध्यान रहे *'ज्ञानिनामग्रगण्यम्'* ने वस्तु (चीन्ह) ही मांगी है यदि वे सीधे विदा की आज्ञा मांगते तो सीताजी दहाड़े मार कर रो पड़ती, संदेश देने की स्थिति में ही नहीं रहती।
*हरष समेत पवनसुत लयऊ*
हनुमान जी के मन में एक ही विचार था-
सङ्कल्पितं कार्यमविघ्नमीश द्राक्सिद्धिमायातु ममाखिलेश ।
पापत्रयं मे हर सन्मतीश तापत्रयं मे जहि शान्त्यधीश ॥
:हे सर्वेश्वर! मेरा संकल्पित कार्य बिना किसी बाधा के अतिशीघ्र सिद्धि (सफलता) को प्राप्त हो। हे सद्बुद्धि के स्वामी! आप मेरे तीनों प्रकार के पापों और तापों का हरण करके मुझे असीम शांति प्रदान करें।
हनुमान जी का संकल्पित कार्य पूर्ण होने को है ।
*ठाढ़ भयउ कर जोरि* दोनों हाथों को फैला कर चूड़ामणि को ले लिया। हनुमान जी आज अति प्रसन्न है। #श्रीराधामाधव summer special
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