Shri Giriraaj Dharn Prabhu Teri Sharn परमार्थ सेवा समिति , दिल्ली

  • Home
  • India
  • Delhi
  • Shri Giriraaj Dharn Prabhu Teri Sharn परमार्थ सेवा समिति , दिल्ली

Shri Giriraaj Dharn Prabhu Teri Sharn परमार्थ सेवा समिति , दिल्ली तुलसी रुद्राक्ष स्फटिक मोती माला प्राप्त करने के लिए WhatsApp करें 9873 25 1921 इस ग्रुप से जुड़ें। https://mobile.facebook.com/groups/451910754834198?refid=27

*प्रतिकूलता में अनुकूलता* -२६९*भेद हमार लेन सठ आवा*। *राखिअ बाँधि मोहि अस भावा* ॥ *सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी*। *मम पन स...
24/08/2026

*प्रतिकूलता में अनुकूलता* -२६९

*भेद हमार लेन सठ आवा*।
*राखिअ बाँधि मोहि अस भावा* ॥
*सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी*।
*मम पन सरनागत भयहारी* ॥
(सुंदरकांड/४३/७-८ )
सुग्रीव बोले-[जान पड़ता है] यह मूर्ख हमारा भेद लेने आया है, इसलिये मुझे तो यही अच्छा लगता है कि इसे बाँध रखा जाय।
[ श्रीरामजीने कहा- हे मित्र! तुमने नीति तो अच्छी विचारी ! परन्तु मेरा प्रण तो है शरणागतके भयको हर लेना !
विभीषण के आगमन पर राम जी ने सबसे राय व्यक्त करने को कहा -
तब अंगद ने कहा शत्रु पक्ष से आया हुआ शत्रु का ही भाई है साधारण स्थिति में विश्वास का पात्र नहीं होता
गुनी है तो अपनाना चाहिए और दोषी है तो दूर रखना चाहिए।
*"गुणतः संग्रहं कुर्यात् दोषतस्तु विसर्जयेत्"*
- अंगद का यह वचन नीतिशास्त्र का सुंदर सिद्धांत अवश्य है, पर प्रस्तुत परिस्थिति में इससे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।
अब शरभ की बारी आती है। राजनीति-विशारद शरभ एक सुंदर सुझाव देते हैं कि विभीषण की सत्यनिष्ठा पर निगरानी रखकर उस के मन के वास्तविक स्वरूप पर निवेदन प्रस्तुत करने के लिए एक गुप्तचर को नियुक्त किया जाए। विचार अच्छा है, पर यह बात टालने का बहाना बन जाता है। तात्कालिक समस्या को सुलझाने में इससे कोई लाभ नहीं मिलने का है।
फिर जांबवान् कुछ कहने का प्रयास करते हैं। बद्धवैर और परमपापी रावण के यहाँ से आया हुआ उस का भाई है- विभीषण।
इसलिए उस पर बिल्कुल विश्वास नहीं करना चाहिए।

*भेद हमार लेन सठ आवा*-
सुग्रीवजी ने कहा- मुझे तो लगता है कि यह दुष्ट हम लोगों का भेद लेने आया है इसलिये मेरी तो इच्छा है कि इसे बाँध कर रखा जाये।
'राखिअ बाँधि' से आशय है कि मैं आपके कोमल स्वभाव के कारण मारने की राय नहीं दे रहा हूँ। प्रभु ने तो अर्द्धली के भी आधे 'सखा बुझिऐ काहा' में उत्तर दे दिया था परन्तु सुग्रीव लाइव अपनी ही बात रखना चाहते हैं अतः इतना कुछ कहा।
सीताजीकी सुधि पानेमें विभीषणजीने हनुमानजीकी बहुत सहायता की यह मानस के श्रीराम-सुग्रीवादिको मालूम है। तो भी सुग्रीवजी जो विरोध कर रहे हैं वह सकारण है। सुग्रीवको लग रहा है कि यह असली बिभीषण नहीं है; बिभीषण रूपधारी रावण हो सकता है ।
सुग्रीव यही समझते हैं कि रावण ही आया हो रूप तेज, बल, पराक्रम, आयुध, आभूषण आदिसे भी वहीं संशय दृढ़ होता है। हनुमानजीने यद्यपि देखा, तो भी वह सोचता है निशाचर मायाको वह भी कैसे पहचान सकेगा ? ऐसा लगकर कहा कि 'बाँध रखिये' इसमें कपिपतिकी नीति निपुणता, दक्षता, सावधानता आदि गुण दिखाई देते हैं। किंचित् अहंकार और उतावली ये दोष दीखते हों। तो भी वे रामकार्यके सबके हितके लिये ही हैं।

(२) 'सठ आवा' यहाँ 'शठ' बिभीषणको नहीं कहा।
उसका वेष धारण करके आए हुए राक्षसको लक्ष्य करके कहा है।
(क) 'भेद' तीन प्रकारका भेद होता है। यथा 'स्नेहरागापनयनं, संघर्षोत्पादनं तथा।
संतर्जनं च भेदज्ञैर्भेदस्तु त्रिविधः स्मृतः'
(अ. व्या. सु.)
१ राजा और मंत्री आदिके मनको एक दूसरेके विरुद्ध परस्पर संशयित, कलुषित करके। परस्पर प्रेम, ममत्व नष्ट कर देना।
२ संघर्षोत्पादन राजाके अनुयायियोंसे वैर, विरोध, आदि निर्माण करना।
३ संतर्जनं प्रजा और राजाकी सेनाके मनमें हौलदिली पैदा होगी, हिम्मत हार जायें ऐसा करना।
ये भेदके तीन प्रकार हैं।
रावण कपिसेनामें इनको उत्पन्न नहीं कर सका। परन्तु हनुमानजीने लंकामें जो प्रताप चमकाया उससे पहला और तीसरा भेद सिद्ध हुआ है। और दूसरा बिभीषण शरणागतिसे अनायास सिद्ध होता है।
(ख) 'भेद लेन' = भेद ले जानेके लिये।
किस किसमें भेद पैदा किया जा सकेगा यह जान लेनेके लिये। मर्मस्थान कौनसे, किसका डेरा कहाँ है, और उनको पहचाननेके उनके चिन्ह, नाम, पहरा कमजोर कहाँ रहता है, कितना, कब और किस तरहका रहता है, शस्त्रास्त्र किस प्रकारके हैं, अन्न, जल, गोला बारूद, अन्य युद्ध सामग्री इनके संग्रह कहाँ है, इसकी जानकारी पाकर वह राजासे कह देना यह भी भेदका एक प्रकार है। यह युद्ध करनेका निश्चय हो जानेपर उपयुक्त होता है। ऐसी अनेक बातें जान लेनेके लिये गुप्तचर भेजे जाते हैं।

*सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी*
रामजी ने कहा हे सखा! नीति तो तुमने बहुत अच्छी सुझाई है परन्तु मेरा प्रण शरणागत को भयमुक्त करना है। तात्पर्य है कि बोलो, अब इस स्थिति में क्या करें?
प्रभु ने 'मम पन' पद के द्वारा सुग्रीवजी को अपने ऐश्वर्यता का बोध कराया। यह भी उन्हें बिना बताये जता दिया कि विभीषण शरणागत हैं और भयभीत भी। साथ ही हनुमानजी की आँखों में झाँककर, उन्हें भी अनुभूति कराई कि तुम्हारी ही दीक्षा से विभीषण शरण में आया है और तुम्हारे ही कपीशा बाधक हो रहे हैं, बोलो क्या किया जाये ?
सुग्रीवजीका मत केवल राजनीतिको दृष्टिसे योग्य था यह ऊपर टीकामें दिखाया गया है। पर वह मान्य करना असंभव होनेसे प्रभुने स्पष्ट कहा कि नीतिको दृष्टिसे तुमने जो विचार कहा वह बिलकुल योग्य है; पर मुझे केवल नीतिका ही विचार और पालन नहीं करना है, मेरे प्रणका, बानेका भी पालन अवश्य करना है। मेरा प्रण और तुम्हारा विचार इनका इस समय समन्वय नहीं होता। अतः अब यह प्रश्न खड़ा हो गया है कि प्रण तोड़ना, या नीतिका अवलंब करना?
पर प्रण तोड़नेका, अर्थात् शरणागतका त्याग करनेका, परिणाम क्या होता है? आगे..... #श्रीराधामाधव * शुद्ध प्राकृतिक इत्र , तुलसी , रुद्राक्ष , शंख , श्रृंगी , रत्न उपरत्न* *तथा सभी प्रकार की पूजा सामग्री , वैजयंती, गुंजा , स्फटिक , मोती माला के लिए लिंक पर क्लिक करें*

https://wa.me/c/919873251921

*प्रतिकूलता में अनुकूलता* -२६५दो० - *जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ*। *ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जा...
20/08/2026

*प्रतिकूलता में अनुकूलता* -२६५

दो० -
*जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ*।
*ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ* ॥ ४२ ॥
(सुंदरकांड ४२)
जिन चरणोंकी पादुकाओंमें भरतजीने अपना मन लगा रखा है, अहा! आज मैं उन्हीं चरणोंको अभी जाकर इन नेत्रोंसे देखूँगा ॥
*जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि*
जिन चरणों की पादुकाओं में ही भरतजी अपने मन को लगाये रहते हैं मेरा ऐसा अहोभाग्य है कि मैं आज उन चरणों को ही प्रत्यक्ष इन नेत्रों से निहारूँगा।
'इन नयनन्हि' से अभिप्राय है कि जिन्हें ऋषि, मुनि और शंकरजी भी केवल ध्यान में ज्ञान वैराग्य रूपी नेत्रों से ही देख पाते हैं, मैं उन्हें साक्षात् इन चर्म चक्षुओं से देखूँगा। विभीषणजी चरण दर्शनों के प्रति अत्यन्त आह्लादित हैं, इसी से बार बार 'देखिहउॅं जाइ', 'आजु बिलोकिहौं', 'देखिहीँ तेई' कहा।
विभीषणजी को पहले पहल 'चरन जलजाता' में निर्गुण ब्रह्म की प्रतीति हुई, बाद में, स्वयं के उदभ्रान्त मन को समझाने के लिये जो उन्होंने छः उदाहरण चयन किये हैं वे सगुण ब्रह्म के हैं। जिनके व्यापक अर्थ निकलते हैं। स्थूल रूप में अपनी निशाचर वंश की अपावन शैली के लिये अहिल्या का, कपट व्यवहार के लिये मायावी मारीच का चयन किया। पावन और निष्कपट भक्तों के लिये प्रभु का ध्यान ही पर्याप्त है इसलिये श्रीसीताजी व भरतजी के उदाहरणों से उन्हें सम्बल मिला। ये तो चेतन पदार्थ हैं, किन्तु जड़ भी लाभान्वित हुये है यह उन्हें दण्डकारण्य के उदाहरण से प्रतीति हुई। अन्ततः उनकी समझ में आया कि प्रभु पर स्त्री-पुरुष, पावन अपावन, जड़-चैतन्य इन सबका अधिकार है केवल शंकरजी और भरतजी के समान स्वयं में ही दृढ़ विश्वास होना चाहिये। ये चौपाइयाँ और दोहा 'शान्त रस' के हैं।
दो० (१) 'भरतु रहे' भाव कि चरणपादुकाओंके आधारपर ही भरतजी जीवित रह सके हैं। भाई होकर भी प्रत्यक्ष दर्शन और प्रत्यक्ष चरणसेवाका लाभ भरतजीको भी नहीं मिलता पर मुझे तो आज ही, अब थोड़े ही समयमें, इन चर्म-चक्षुओंसे, उन्हीं चरणोंका प्रत्यक्ष दर्शन और सेवाका प्रत्यक्ष लाभ भी होगा। मुझ सरीखा भाग्यवान् कौन है। सीताजी अर्धांगिनी होकर भी विरहसे सदा कुढ़ रही है। 'हर' महादेव, महेश्वर! पर उन्हें भी ध्यानमेंके चरणदर्शनपर ही अपनी प्यास बुझानी पड़ती है; और सेवाका प्रत्यक्ष लाभ तो कभी नहीं। मैं अधम निशाचर, तामस शरीर, रावण सरीखे विश्वद्रोही सुरशत्रुका भाई होकर भी मुझे दर्शन और सेवा दोनोंका लाभ होगा! कितना बड़ा मेरा भाग्य !
गोस्वामीजीके सामने यह तथ्य था कि लोग विभीषणको दोष दे सकते हैं कि उसने बन्धुद्रोह किया, देशद्रोह किया। गोस्वामीजीने स्पष्टतया उस परिस्थितिको रखा है, जब विवश होकर विभीषणको रावणका क त्याग करके रामके पास जाना पड़ा। वह भगवान् क रामका परम भक्त था। किंतु दाशरथि राम ही भगवान् हैं, इसका ज्ञान उसे हनुमान् से हुआ। तबसे बराबर वह रावणके कुकृत्यका विरोध हृदयसे करने लगा। उसकी कामना थी कि रावण सीताको वापस भेज दे, रामको मनुष्य न मानकर भगवान् समझने लगे तथा उनकी भक्ति हृदयमें धारण करे। समझानेपर भी रावण इस हठपर अड़ा रहा कि
'मैं रामका वैरी बना रहूँगा और सीताको न लौटाऊँगा।'
फलतः विनय-पत्रिकाका वह पद यहाँ चरितार्थ हुआ-
*जाके प्रिय न राम बैदेही* ।
*तजिये ताहि कोटि बैरी सम जद्यपि परम सनेही* ।।
*तज्यो पिता प्रहलाद, बिभीषन बंधु, भरत महतारी*।
*बलि गुरु तज्यो कंत ब्रज-बनितन्हि, भये मुद-मंगलकारी* ॥
(विनय०, १७४) #श्रीराधामाधव * शुद्ध प्राकृतिक इत्र , तुलसी , रुद्राक्ष , शंख , श्रृंगी , रत्न उपरत्न* *तथा सभी प्रकार की पूजा सामग्री , वैजयंती, गुंजा , स्फटिक , मोती माला के लिए लिंक पर क्लिक करें*

https://wa.me/c/919873251921

*┈┉❀꧁  विनय पत्रिका - १७८ ꧂❀┉┈*                  *भयेहूँ उदास राम, मेरे आस रावरी ।**आरत स्वारथी सब कहैं बात बावरी ॥१॥**ज...
20/08/2026

*┈┉❀꧁ विनय पत्रिका - १७८ ꧂❀┉┈*

*भयेहूँ उदास राम, मेरे आस रावरी ।*
*आरत स्वारथी सब कहैं बात बावरी ॥१॥*
*जीवनको दानी घन कहा ताहि चाहिये ।*
*प्रेम-नेमके निबाहे चातक सराहिये ॥२॥*
*मीनतें न लाभ-लेस पानी पुन्य पीनको ।*
*जल बिनु थल कहा मीचु बिनु मीनको ॥३॥*
*बड़े ही की ओट बलि बाँचि आये छोटे हैं ।*
*चलत खरे के संग जहाँ-तहाँ खोटे हैं ॥४॥*
*यहि दरबार भलो दाहिनेहु-बामको ।*
*मोको सुभदायक भरोसो राम-नाम को ॥५॥*
*कहत नसानी ह्वैहै हिये नाथ नीकी है ।*
*जानत कृपानिधान तुलसीके जीकी है ॥६॥*

*भावार्थ -* हे रामजी ! आप चाहे मुझसे उदासीन हो जायँ, पर मुझे तो आपकी ही आशा है । ( मेरे ऐसा कहने से आप नाराज न होइयेगा ) आर्त अथवा स्वार्थी तो पागलों की - सी ही बातें किया करते हैं । भाव यह कि आप जो नित्य अपने जनों पर कृपा - दृष्टि रखते हैं उनके लिये तो मैं कहता हूँ कि आप चाहे उदासीन हो जायँ और मेरे लिये, यह अभिमान की बात कहता हूँ कि मुझे तो आपकी ही आशा है, यह पागलों की - सी बातें ही तो हैं *॥१॥*
जो मेघ पानी का दान करता है, सारे प्राणियों की रक्षा करता है उसे किस वस्तु की कमी है ? पानी देकर जीवन की रक्षा करनेवाले मेघ को क्या चाहिये ? परन्तु प्रेम का अटल नियम निबाहने के कारण पपीहे की ही सराहना होती है । भाव यह कि मेघ पपीहे को बिना ही किसी स्वार्थके स्वाति का जल देता है , इसमें उदारता मेघ की ही है , परन्तु दूसरी ओर न ताकने के कारण सराहना चातक की हुआ करती है *॥२॥*
पवित्र और पुष्ट करनेवाले जल को मछली से लेशमात्र भी लाभ नहीं है, पर मछली के लिये जल को छोड़कर, ऐसा कौन - सा स्थान है, जहाँ वह अपने प्राण बचा सके ? भाव यह कि वह जलको छोड़कर कहीं भी जीवित नहीं रह सकती । इसी प्रकार आपको मुझसे कोई लाभ नहीं , परन्तु मैं आपको छोड़कर कहाँ जाऊँ ?आपको आपनी शरणमें रखना भी होगा और तारीफ भी मेरी ही होगी *॥३॥*
मैं आपकी बलैया लेता हूँ , देखिये बड़ों के सहारे ही छोटे ( सदा ) बचते आये हैं , जहाँ - तहाँ खरे सिक्कों के साथ खोटे भी चला करते हैं । भाव यह है कि आपके सच्चे भक्त असली सिक्के हैं, और मैं पाखण्डी, नकली सिक्का होनेपर भी आपके नाम की छाप से भवसागर से तर जाऊँगा *॥४॥*
आपके दरबार में भले - बुरे सभीका कल्याण होता है , चाहे कोई आपके अनुकूल हो या प्रतिकुल हो ( जैसे विभीषण सम्मुख था तथा रावण विमुख था पर दोनों ही मुक्त हो गये ) हे श्रीरामजी ! मुझे तो केवल आपके कल्याणकारी नाम का ही भरोसा है *॥५॥*
हे नाथ ! कह देने से सब बात बिगड़ जायगी, ( सारा भेद खुल जायगा ) इससे मन की मन ही में रखना अच्छा है ; फिर आप तो हे कृपानिधान ! तुलसी के मन की सब जानते ही हैं *।।६।।*

*┈┉❀꧁ जय जय सियाराम ꧂❀┉┈* #श्रीराधामाधव * शुद्ध प्राकृतिक इत्र , तुलसी , रुद्राक्ष , शंख , श्रृंगी , रत्न उपरत्न* *तथा सभी प्रकार की पूजा सामग्री , वैजयंती, गुंजा , स्फटिक , मोती माला के लिए लिंक पर क्लिक करें*

https://wa.me/c/919873251921

 # श्रीहरि:  # श्रीगर्ग-संहिता(माधुर्यखण्ड)चौबीसवाँ अध्याय (पोस्ट 02) अरिष्टासुर और व्योमासुर का वध तथा माधुर्यखण्ड का उ...
18/08/2026

# श्रीहरि: #



श्रीगर्ग-संहिता

(माधुर्यखण्ड)

चौबीसवाँ अध्याय (पोस्ट 02)



अरिष्टासुर और व्योमासुर का वध तथा माधुर्यखण्ड का उपसंहार



श्रीनारद उवाच -
सोऽयं भीमरथो राजा मयदैत्यसुतोऽभवत् ।
श्रीकृष्णभुजवेगेन मुक्तिं प्राप विदेहराट् ॥ १४ ॥
एकदा गोपबालेषु दैत्योऽरिष्टो महाबलः ।
आगतो नादयन् खं गां तटान् शृङ्गैर्विदारयन् ॥ १५ ॥
गोप्यो गोपा गोगणाश्च वीक्ष्य तं दुद्रुवुर्भयात् ।
भगवान् दैत्यहा देवो मा भैष्टैत्यभयं ददौ ॥ १६ ॥
गृहीत्वा तं तु शृङ्गेषु नोदयामास माधवः ।
सोऽपि तं नोदयामास श्रीकृष्णं योजनद्वयम् ॥ १७ ॥
पुच्छे गृहीत्वा तं कृष्णो भ्रामयित्वा भुजौजसा ।
भूपृष्ठे पोथयामास कमण्डलुमिवार्भकः ॥ १८ ॥
अरिष्टः पुनरुत्थाय क्रोधसंरक्तलोचनः ।
शृङ्गैश्च रोहितं शैलं समुत्पाट्य महाखलः ॥ १९ ॥
गर्जयन्घनवद्वीरः कृष्णोपरि समाक्षिपत् ।
कृष्णः शैलं संगृहित्वा तस्योपरि समाक्षिपत् ॥ २० ॥
शैलस्यापि प्रहारेण किंचिद्व्याकुलमानसः ।
भूमौ तताड शृङ्गाग्रान्निर्गतं तैर्जलं भुवः ॥ २१ ॥
श्रीकृष्णस्तं च शृङ्गेषु गृहीत्वा भ्रामयन्मुहुः ।
भूपृष्ठे पोथयामास वातः पद्ममिवोद्‌धृतम् ॥ २२ ॥
तदैव वृषरूपत्वं त्यक्त्वा विप्रवपुर्धरः ।
नत्वा श्रीकृष्णपादाब्जं प्राह गद्‌गदया गिरा ॥ २३ ॥

द्विज उवाच -
बृहस्पतेश्च शिष्योऽहं वरतंतुर्द्विजोत्तमः ।
बृहस्पतिसमीपे च पठितुं गतवानहम् ॥ २४ ॥
पादौ कृत्वा स्थितोऽभूवं पश्यतस्तस्य संमुखे ।
तदा रुषाऽऽह स मुनिः वृषवत्वं स्थितः पुरः ॥ २५ ॥
गुरुहेलनकृत्तस्मात्त्वं बृषो भव दुर्मते ।
तस्य शापाद्‌वृषोऽभूवं बंगदेशेषु माधव ॥ २६ ॥
असुराणां प्रसंगेना सुरत्वं गतवानहम् ।
त्वत्प्रसादाद्‌विमुक्तोऽहं शापतोऽसुरभावतः ॥ २७ ॥
श्रीकृष्णाय नमस्तुभ्यं वासुदेवाय ते नमः ।
प्रणतक्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः ॥ २८ ॥

श्रीनारद उवाच -
इत्युक्त्वा श्रीहरिं नत्वा साक्षाच्छिष्यो बृहस्पतेः ।
द्योतयन्भुवनं राजन् विमानेन दिवं ययौ ॥ २९ ॥
इदं मया ते कथितं खण्डं माधुर्य्यमद्‌भुतम् ।
सर्वपापहरं पुण्यं कृष्णप्राप्तिकरं परम् ॥ ३० ॥
कामदं पठतां शश्वत्किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ ३१ ॥

श्रीनारदजी कहते हैं—विदेहराज ! वही यह राजा भीमरथ मय दैत्यका पुत्र हुआ और श्रीकृष्णके बाहुबेग से मोक्ष को प्राप्त हुआ। एक दिन गोपबालकों के बीच में महाबली दैत्य अरिष्ट आया।
https://wa.me/c/919873251921

वह अपने सिंहनाद से पृथ्वी और आकाश को गुँजा रहा था और सींगों से पर्वतीय तटों को विदीर्ण कर रहा था। उसे देखते ही गोपियाँ, गोप तथा गौओंके समुदाय भयसे इधर- उधर भागने लगे। दैत्योंके नाशक भगवान् श्रीकृष्णने उन सबको अभय देते हुए कहा- 'डरो मत।' माधवने उसके सींग पकड़ लिये और उसे पीछे ढकेल दिया। उस राक्षसने भी श्रीकृष्णको ढकेलकर दो योजन पीछे कर दिया ॥ १४-१७ ॥

तब श्रीकृष्णने उसकी पूँछ पकड़ ली और बाहुवेगसे घुमाते हुए उसे उसी प्रकार पृथ्वीपर पटक दिया, जैसे छोटा बालक कमण्डलुको फेंक दे। अरिष्ट फिर उठा । क्रोधसे उसके नेत्र लाल हो रहे थे। उस महादुष्ट वीरने सींगोंसे लाल पत्थर उखाड़कर मेघकी भाँति गर्जना करते हुए श्रीकृष्णके ऊपर फेंका। श्रीकृष्णने उस प्रस्तरको पकड़कर उलटे उसीपर दे मारा ॥ १८-२० ॥

उस शिलाखण्ड के प्रहारसे वह मन-ही-मन कुछ व्याकुल हो उठा। उसने अपने सींगोंके अग्रभागको पृथ्वीपर पीटना आरम्भ किया, इससे पृथ्वीके भीतरसे पानी निकल आया। तब श्रीकृष्णने उसके सींग पकड़कर बार-बार घुमाते हुए उसे पृथ्वीपर उसी प्रकार दे मारा, जैसे हवा कमलको उठाकर फेंक देती है। उसी समय वह वृषभका रूप त्यागकर ब्राह्मणशरीर- धारी हो गया और श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंमें प्रणाम करके गद्गद वाणीमें बोला ॥। २१ - २३ ।।

ब्राह्मणने कहा - भगवन् ! मैं बृहस्पतिका शिष्य द्विजश्रेष्ठ वरतन्तु हूँ । मैं बृहस्पतिजीके समीप पढ़ने गया था। उस समय उनकी ओर पाँव फैलाकर उनके सामने बैठ गया था। इससे वे मुनि रोषपूर्वक बोले- 'तू मेरे आगे बैलकी भाँति बैठा है, इससे गुरुकी अवहेलना हुई है; अतः दुर्बुद्धे ! तू बैल हो जा।' माधव ! उस शापसे मैं वङ्गदेशमें बैल हो गया ॥ २४-२६ ॥

असुरोंके सङ्गमें रहनेसे मुझमें असुरभाव आ गया था। अब आपके प्रसादसे मैं शाप और असुरभावसे मुक्त हो गया। आप श्रीकृष्णको नमस्कार है। आप भगवान् वासुदेवको प्रणाम है। प्रणतजनोंके क्लेशका नाश करनेवाले आप गोविन्ददेवको बारंबार नमस्कार है । २७ - २८ ॥

श्रीनारदजी कहते हैं-राजन् ! यों कहकर श्रीहरिको नमस्कार करके बृहस्पतिके साक्षात् शिष्य वरतन्तु भुवनको प्रकाशित करते हुए विमानसे दिव्यलोकको चले गये। इस प्रकार मैंने अद्भुत माधुर्यखण्डका तुमसे वर्णन किया, जो सब पापोंको हर लेनेवाला, पुण्यदायक तथा श्रीकृष्णकी प्राप्ति करानेवाला उत्तम साधन है। जो सदा इसका पाठ करते हैं, उनकी समस्त कामनाओंको यह देनेवाला है और क्या सुनना चाहते हो ? ॥ २९ - ३१ ॥



इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें माधुर्यखण्डके अन्तर्गत नारद- बहुलाश्व-संवादमें 'व्योमासुर और अरिष्टासुरका वध' नामक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४ ॥



॥ माधुर्यखण्ड सम्पूर्ण ॥

पुस्तक उपलब्ध है प्राप्त करने के लिए व्हाट्सएप करें 9873251921
सेवा राशि ₹270

#श्रीराधामाधव * शुद्ध प्राकृतिक इत्र , तुलसी , रुद्राक्ष , शंख , श्रृंगी , रत्न उपरत्न* *तथा सभी प्रकार की पूजा सामग्री , वैजयंती, गुंजा , स्फटिक , मोती माला के लिए लिंक पर क्लिक करें*

https://wa.me/c/919873251921

श्री सीताराम श्री गर्गाचार्य जी द्वारा रचित गर्ग संहिता उपलब्ध है जिसमें लाल जी और श्री जी के कुछ अंतरंग लीलाओं का वर्णन...
18/08/2026

श्री सीताराम

श्री गर्गाचार्य जी द्वारा रचित गर्ग संहिता उपलब्ध है जिसमें लाल जी और श्री जी के कुछ अंतरंग लीलाओं का वर्णन है श्री जी के विवाह का भी प्रसंग गर्ग संहिता में की वर्णित है कोरियर चार्ज सहित पुस्तक की सेवा राशि 270 रुपए व्हाट्सएप करें 098732 51921

*┈┉❀꧁  विनय पत्रिका - १७७ ꧂❀┉┈*                  *जो तुम त्यागो राम हौं तौ नहिं त्यागों ।**परिहरि  पाँय  काहि  अनुरागों ...
18/08/2026

*┈┉❀꧁ विनय पत्रिका - १७७ ꧂❀┉┈*

*जो तुम त्यागो राम हौं तौ नहिं त्यागों ।*
*परिहरि पाँय काहि अनुरागों ।।१।।*
*सुखद सुप्रभु तुम सो जगमाहीं ।*
*स्रवन-नयन मन-गोचर नाहीं ।।२।।*
*हौं जड़ जीव, ईस रघुराया ।*
*तुम मायापति, हौं बस माया ।।३।।*
*हौं तो कुजाचक, स्वामी सुदाता ।*
*हौं कुपूत, तुम हितु पितु-माता ।।४।।*
*जो पै कहुँ कोउ बूछत बातो ।*
*तौ तुलसी बिनु मोल बिकातो ।।५।।*

*भावार्थ-* हे रामजी ! यदि आप मुझे त्याग भी दें तो भी मैं अपको नहीं छोड़ुँगा, क्यों कि आपके चरणों को छोड़कर मैं ओर किसके साथ प्रेम करूँ ? *।।१।।*
आपके समान सुख देने वाला सुन्दर स्वामी इस संसार में आजतक न कानों से सुना है, न आँखों से देखा है और न मन से अनुमान में ही आता है *।।२।।*
हे रघुनाथजी ! मैं जड़ जीव हूँ और आप ईश्वर हैं । आप माया के स्वामी हैं ( माया आपके वश में है ) और मैं माया के वश होकर रहता हूँ *।।३।।*
मैं तो एक कृतघ्न भिखमंगा हूँ और आप बड़े उदार स्वामी हैं , मैं आपका कुपूत हूँ और आप हित करने वाले माता-पिता हैं । भाव यह है कि लड़का कुपूत होने पर भी माँ-वाप उसका हित ही करते हैं, ऐसे ही आप सदा मेरा पालन-पोषण किया करते हैं *।।४।।*
यदि कहीं कोई भी मेरी बात पूछता, तो यह तुलसीदास बिना ही मोल ( उसके हाथ में ) बिक जाता । ( परन्तु आपके सिवा मुझ-सरीखे नीच को कौन रखता है ? अतः मैं आपको कभी नहीं छोड़ूँगा ) *।।५।।*
गीता प्रेस से प्रकाशित पुस्तकों को प्राप्त करने के लिए व्हाट्सएप करें 098732 51921
*┈┉❀꧁ जय जय सियाराम ꧂❀┉┈* #श्रीराधामाधव * शुद्ध प्राकृतिक इत्र , तुलसी , रुद्राक्ष , शंख , श्रृंगी , रत्न उपरत्न* *तथा सभी प्रकार की पूजा सामग्री , वैजयंती, गुंजा , स्फटिक , मोती माला के लिए लिंक पर क्लिक करें*

https://wa.me/c/919873251921

*प्रतिकूलता में अनुकूलता* -२५९*सचिव संग लै नभ पथ गयऊ* ।*सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ* ॥ (सुंदरकांड ४१/९)[इतना कहकर] विभीषण अपने...
17/08/2026

*प्रतिकूलता में अनुकूलता* -२५९

*सचिव संग लै नभ पथ गयऊ* ।
*सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ* ॥
(सुंदरकांड ४१/९)

[इतना कहकर] विभीषण अपने मन्त्रियोंको साथ लेकर आकाशमार्गमें गये और सबको सुनाकर वे ऐसा कहने लगे....
मैं तुम्हारे हितकी बात कहनेवाला हूँ, फिर भी तुम मुझे धिक्कारते हो ! तथापि मैं चाहता हूँ कि तुम्हारा नाश न हो, क्योंकि तुम मेरे बड़े भाई हो; अतः पिताके समान हो। तुम्हारा काल रघुनाथजीके रूपसे महाराज दशरथके घरमें प्रकट हो गया है॥ और महाशक्ति काली 'सीता' नामसे जनकजीकी पुत्री हुई हैं। ये दोनों पृथ्वीका भार उतारनेके लिये ही यहाँ आये हैं॥उन्हींकी प्रेरणासे तुम मेरा हितकर वचन नहीं सुनते। भगवान् राम सर्वदा साक्षात् प्रकृतिसे परे हैं॥ वे प्राणियोंके बाहर-भीतर सर्वत्र समानभावसे स्थित हैं और नित्य निर्मल होते हुए भी नाम-रूप आदि भेदसे विभिन्न से भासते हैं ॥ जिस प्रकार अज्ञानी पुरुषोंकी दृष्टिमें एक ही महाग्नि नाना प्रकारके वृक्षोंमें उनके आकार-भेदसे भिन्न-भिन्न प्रतीत होता है अथवा जैसे शुद्ध स्फटिकमणि नील-पीतादि रंगोंकी सन्निधिमात्रसे ही नील-पीत आदि वर्णोंवाली प्रतीत होती है, वैसे ही पंचकोश आदिके भेदसे आत्मा तद्रूप-सा भासता है ॥ वे (श्रीभगवान् ही) नित्यमुक्त होकर भी अपनी मायाके गुणोंमें प्रतिबिम्बित होकर काल, प्रधान, पुरुष और अव्यक्त इन चार प्रकारके नामोंसे कहे जाते हैं ॥
*स एव नित्यमुक्तोऽपि स्वमायागुणबिम्बितः* ।
*कालः प्रधानं पुरुषोऽव्यक्तं चेति चतुर्विधः* ॥
अध्यात्म रामायण युद्ध कांड

वे अजन्मा होकर भी प्रधान और पुरुषरूपसे सम्पूर्ण जगत्की रचना करते हैं और अविनाशी होकर भी कालरूपसे जगत् का संहार करते हैं ॥ वे ही कालरूपी भगवान् ब्रह्माकी प्रार्थनासे आपका वध करनेके लिये मायासे रामरूप होकर यहाँ आये हैं। ईश्वर सत्यसंकल्प हैं, इसलिये वे अपनी प्रतिज्ञाको अन्यथा कैसे कर सकते हैं ॥
पर ये सारी बातें रावण के कानों तक जाकर असफल बनकर वापस आ गईं। उस के मन में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं हुआ। आत्म-बोध की बात तो दूर, कम से कम उसे अपने अपराध का भी बोध नहीं हो रहा है। फिर भी भाई की भलाई चाहने वाले विभीषण अपने विनम्र स्वर में फिर एक बार हित की बात कहने का प्रयास करते हैं। धर्मात्मा राम की धर्मपत्नी सीता का अपहरण करके कालचोदित रावण ने कालसर्पिणी को ही अपने गले में बाँध रखा है जिसके दशन से समस्त लंका विषाक्त और ध्वस्त हो जाएगी। इसलिए विभीषण भावी उत्पात की आशंका का भय दिखाकर बार बार फिर अपने भाई को समझाते हैं कि असमान धनुर्धर राम के प्रखर बाणों से लंका के भस्मीभूत होने के पहले उन के पास उनकी पत्नी मैथिली को प्रेषित करने में ही सब का श्रेय है। इस प्रसंग में वह अपना चर्वित मंत्र *'प्रदीयतां दाशरथाय मैथिली'* दो बार दुहराते हैं। फिर भी यह परमंत्र-विभेदन में सफल नहीं हो पाता।

विभीषणके यहाँके वचनोंमें एवं हनुमानजीसे पूर्व जो संवाद हुआ उसमें राज्य लोभकी गंध भी नहीं मिलती।
(क) यदि उन्हें राज्यका लोभ होता तो '
*सठ मिलु जाइ'* यह आज्ञा सुनते ही चले जाते और लात प्रहार सहना न पड़ता। और निर्दोष ही रहते। I रावणको न भानेवाला उपदेश न करके, दूसरोंके समान 'मत' जनाकर लंकामें रहकर ही यहाँका सब भेद शत्रुको दे देकर अपना स्वार्थ पूरा कर लेते। II
श्रीरामजीकी शरणमें जानेपर रामजी उनसे मिले और जब अपने स्वभावका वर्णन करने लगे तब ही कहा-'
*तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें*।
*धरउँ देह नहिं आन निहोंरें* (४८।८)।
जिसको भगवानने ही 'संत' कहा उसमें क्या कभी राज्यका लोभ हो सकता है? '
*जदपि सखा तव इच्छा नाहीं*।
*मोर दरसु अमोघ जग माहीं*
बाद में उनका लंका का राज्यतिलक कर दिया दूसरे प्रमाणकी अब आवश्यकता ही नहीं। #श्रीराधामाधव * शुद्ध प्राकृतिक इत्र , तुलसी , रुद्राक्ष , शंख , श्रृंगी , रत्न उपरत्न* *तथा सभी प्रकार की पूजा सामग्री , वैजयंती, गुंजा , स्फटिक , मोती माला के लिए लिंक पर क्लिक करें*

https://wa.me/c/919873251921

श्रीवृन्दावन महिमामृत - परमाभिवन्दनीय श्री गौरांग(चैतन्य) महाप्रभु के परम प्रिय कृपापात्र भगवत् प्रिय पार्षद श्रीप्रबोधा...
13/08/2026

श्रीवृन्दावन महिमामृत - परमाभिवन्दनीय श्री गौरांग(चैतन्य) महाप्रभु के परम प्रिय कृपापात्र भगवत् प्रिय पार्षद श्रीप्रबोधानंद सरस्वती पाद द्वारा रचित ग्रंथ

▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎

🅿️🅾ST - 205

➖➖➖➖➖➖➖

*त्रयोदश-शतकम् - 10*

*═══════⊰⧱⊱═══════*

क्रमश: आगे........

आतन्वानौ स्थिरचरमपि प्रेममाध्वी मदान्ध्यं राधाकृष्णावपि च लुठतो भूतले यद्रलेण। वृन्दारण्यं तदिदमतुल प्रोन्मदानन्द सिन्धु-स्यन्दि द्राक् पदमिव ममाऽचूचुरच्चित्त रत्नम् ।। 52।।

*जिसके रस में स्वयं श्रीराधाकृष्ण एवं स्थावर जंगम भी प्रेम-सुधा-मद की मत्तता को प्राप्त होकर पृथिवी पर लोटने लगते हैं, उस अतुलनीय प्रोन्मद-आनन्द सागर को प्रवाहित करने वाले इस श्रीवृन्दारण्यने मेरा चित्तरूपी रत्न एकदम चोरी कर लिया है।। 52 ।।*

मुमुक्षूणां याता लयमलमहाभूर्यापचितिं-हरेरेकान्ती त्वामहह गृहयातां धिगकरोत् । न यायास्त्वं मुक्ते कुकृतिरुप वृन्दाटवि तदा-श्रयै र्दुष्टाया स्ते जगति नहि नामापि भविता । । 53 ।।

*हे मुक्ते ! तुम मुमुक्षुओं के लिये लय (सायुज्य मुक्ति) मल रूप महान अनिष्ट प्राप्त कराओ श्रीहरि के एकान्तिक भक्तों के घर में जाने पर भी वह तुम्हें धिक्कार करेंगे अतएव तुम कुकर्म करने वाली हो, तुम श्रीवृन्दावन के तो पास ही मत जाना, क्योंकि उसका आश्रय लेने से तुम्हारा नाम दुष्ट-बुद्धि जगत् में बाकी नहीं रहेगा।। 53 ।।*

ता स्ताः सम्पादिता स्ते बहुजनिषु निजा किं प्रतिष्ठाः शृणोषि दिव्य स्रक्चन्दन स्त्र्यादिक विषयभुजः का नु तृप्ति स्तवाभूत् । तस्मान्मिध्येन्द्रियार्थे प्रयतन विमुखस्त्वं सुखस्यातिसीम्नः सारं सारंगवत् सुञ्चर मधुरवने राधिका केलिधाम्नि।। 54।।

*तुम्हें अनेक जन्मों में उन्हीं उन्हीं विषयों में प्रतिष्ठा प्राप्त हुई है, तब फिर क्यों तू इन्हें सुनता है? तुमने जो दिव्य माला, चन्दन, स्त्री आदिक विषयों को भोग किया, उनसे क्या तुम्हारी तृप्ति हुई है? इसलिये मिथ्या इन्द्रियों के विषयों में प्रयत्नशील न होकर तू इस राधिका-केलि-धाम श्रीवृन्दावन में भ्रमरवत् सुधा भण्डार के परमसार का आस्वादन कर।।54।।*

कान्त त्वङ् मात्र संछादित युवतिमयाऽमेध्य वीभत्स पिण्डे द्राग दृष्टे पण्डितानामपि विलयमिता धैर्य्यरक्षाति शिक्षाः । का भक्तिः का विरक्ति स्तदपहृतधियां कैव वृन्दावनाशा तासां नामाऽप्यशृण्वंस्तदनुसर सखे राधिका कुञ्जवाटीम् ।। 55 ।।

*केवल सुन्दर त्वचा द्वारा आच्छादित जो स्त्री का अपवित्र घृणित देह पिण्ड है, उसे देखते ही पण्डित लोग भी धीरज छोड़ बैठते हैं एवं उनकी दीक्षा-शिक्षा भी लोप हो जाती है। जिनकी बुद्धि नारी ने हरण कर ली है, उनकी फिर भक्ति कैसी? और विराग ही कैसा ? और श्रीवृन्दावन की आशा करना ही क्या? अतएव हे सखे ! ऐसे मनुष्यों का नाम तक भी न सुन और श्रीराधा-कुञ्जमहल की ओर शीघ्र चल ।। 55।।*

महा मोहनावुन्मदानन्द मूर्ती महामोहिताम्बुन्मदानन्दितौ च। अहो येन तौ राधिका कृष्णचन्द्रौ तदानन्द वृन्दाय वृन्दावनं मे।। 56 ।।

*अहो ! जिसके द्वारा वे श्रीराधाकृष्णचन्द्र महामोहन एवं उन्मद आनन्द मूर्ति होते हुए भी महामोहित एवं आनन्द में उन्मत्त हो उठते हैं, वही श्रीवृन्दावन मेरे आनन्दों की वृद्धि करे।। 56 ।।*श्रीवृन्दावन महिमामृत - परमाभिवन्दनीय श्री गौरांग(चैतन्य) महाप्रभु के परम प्रिय कृपापात्र भगवत् प्रिय पार्षद श्रीप्रबोधानंद सरस्वती पाद द्वारा रचित ग्रंथ

▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎▪︎

🅿️🅾ST - 206

➖➖➖➖➖➖➖

*त्रयोदश-शतकम् - 11*

*═══════⊰⧱⊱═══════*

क्रमश: आगे........

यत्राश्रुणां प्रवाहश्चलति नयनतः सन्ति सर्वांगरोमो भेद-स्वेद प्रकम्प क्षितिलुण्ठन मुहुः श्वासमूर्च्छादिभावाः । तादृग्भक्ति प्रवाहादपि खलु परतोऽत्यद्भुत स्वानुभावात् स्वानन्दं काष्ठ कुड्यादिवदपि वसतां राति वृन्दाटवीयम् ।। 57।।

*जो श्रीवृन्दावन में काष्ठ, दीवार आदि की तरह होकर वास करते हैं, उनके नेत्रों से भी अश्रुधारा प्रवाहित होती है, शरीर में स्वेद, रोमाञ्च, प्रकम्प, भूमि पर लुण्ठन, बार-बार श्वास, मूर्च्छा आदि भावों का विकास होता है, इस प्रकार की भक्ति के प्रवाह तथा अत्यद्भुत स्वानुभाव से भी उत्तम निज आनन्द यह श्रीवृन्दावन उनको प्रदान करता है।। 57 ।।*

मान्धातृप्रमुखा गता नृपतयो येषां यशोभि जंगद व्याप्तं भूरपि... मेरुमन्दरम् ।
सर्वत उज्ज्वलामृतपदं विन्दाशु वृन्दाटवीम् । । 58 ।।

*जिनका यश मेरु-मन्दरादि सुवृहत् पर्वतमाला युक्त समस्त धरणी तो क्या, समस्त जगत् में फैल रहा है, वही मान्धाता प्रमुख नृपतिगण भी....जिस सुखमय श्रीवृन्दावन के रजकण का आश्रय लेते हैं, उसी उज्ज्वल अमृतमय स्थान श्रीवृन्दावन का तुम शीघ्र ही आश्रय करो। । 58 ।।*

वृन्दाटव्यां नव्याम्भोदः श्यामो राधा प्रेमोद्दामः । तस्या आस्याम्भोज भ्राजन्माध्वीस्तृष्णः कृष्णोऽव्याद् वः । । 59 ।।

*श्रीवृन्दावन में राधा प्रेम में उद्दाम नवीन श्याम बादल उदित हो रहा है, वह श्रीराधा के मुख कमल का मधु पान करते हुए भी तृषित है, वह श्रीकृष्ण ही तुम्हारी रक्षा करें।। 59 ।।*

वृन्दारण्ये प्रेम्णः कन्दे नित्यानन्दद्‌गोपीवृन्दे ।
निन्दयाऽहं वन्धेयाऽथ प्रीति विन्दे चेत् किं देवैः ।। 60 ।।

*प्रेम के मूल एवं नित्यानन्दमय गोपियों से परिमण्डित श्रीवृन्दावन में यदि मेरी प्रीति हो जावे, तब मैं निन्दनीय होने पर भी वन्दनीय हो जाऊंगा एवं फिर मुझे देवताओं से क्या प्रयोजन? ।। 60।।*

येषां कर्णाभ्यर्णास्पर्शि प्रेमर्दीनां धारावर्षि।
वृन्दारण्यं पूर्ण प्रार्थ्यन्ते काकानां यायु स्तीर्थम् । ।61 ।।

*सबकी प्रार्थनीय प्रेम-सम्पत्ति की धारा को वर्णन करने वाले इस श्रीवृन्दावन का विषय जिनके कानों में नहीं पड़ा है, उन्हें काकतीर्थ में ही जाना चाहिये ।। 61।।*

गौरश्याम ज्योतिर्द्वन्द्वामन्द प्रेमानन्दास्पन्दाः । केचिद् वृन्दारण्याऽनन्याधन्याः पुण्यादत्रावन्याः । ।62।।

*श्रीवृन्दावन का कोई-कोई अनन्य भक्त गौरश्याम युगल किशोर के प्रचुर प्रेमानन्द में स्तम्भित हो रहा है, वह धन्य है एवं परम पुनीत होने के कारण वह वहां रक्षणीय है तथा शोभनीय है।।62।।*

क्वाऽसौ भक्तिः क्वाऽनासक्तिः क्वात्मज्ञानं क्वानुष्ठानम् । कालव्यालागम्यं रम्यं वृन्दारण्यं त्वेकधन्यम् । ।63।।

*वह भक्ति कहां है? और वह वैराग्य अब कहां है? आत्मज्ञान तथा धर्म का अनुष्ठान कहां है? किन्तु कालरूप सर्प से अगम्य यह श्रीवृन्दावन धन्य है। । 63 ।।*

यामः कापस्मय पिशुनता क्रोध लोभादिहि स्त्रैः
संसाराध्वन्यहह गहनेऽत्यूढ़ मोहान्धकारे।
द्राधीयस्यां चलति न पदं भीममाया रजन्या
श्रीमद् वृन्दाटवि ! तव कृपौदार्यमेकं स्मरामः ।।64 ।।

*अहो! काम, दम्भ, दुष्टता, क्रोध, लोभादि हिंसक जन्तुओं से पूर्ण, अति घन मोहान्धकार से ढके हुए संसार रूप वन में हम जा रहे हैं, सुदीर्घकर इस भीषण मायामय रजनी में पांव चलता नहीं है, हे श्रीवृन्दावन ! (उद्धार पाने के लिये) तुम्हारी कृपा एवं उदारता को ही केवल स्मरण करता हूं। । 64 ।।*

मौदयं मा कुरु मा कुरंग नयनेक्षादौ कृथाः साहसं साम्मुख्येन सखे न खेल निखिलग्रासेन कालाहिना।
सर्वानर्थ निदानमर्थमपि नो देहार्थमभ्यर्थना क्लेशैः संचिनु निश्चिनु स्थितिमिहैवोल्लस्य वृन्दावने ।। 65 ।।

*हे मूर्ख ! मूर्खता मतकर, मृगनैनी स्त्री की ओर देखने का और साहस न करना, सबको ग्रास करने वाले सर्प के साथ खेलना नहीं, शरीर के लिये सब अनर्थों का मूल कारण जो धन है, उसे भी भिक्षा का क्लेश सहन करके सञ्चय नहीं करना, श्रीवृन्दावन में ही केवल स्थिर रहने का निश्चय कर।। 65।।*

कोनाम वृन्दावन कीर्ति वृन्दादन्यत्र कर्णो सकृदर्पयेत् । यदेव राधा पदयोरगाधां दधात्यऽसारण भावलक्ष्मी । । 66 ।।

*एकमात्र जो श्रीराधा के चरणकमलों की असीम असाधारण भावरूप सम्पत्ति को मान करने वाली है-उसी श्रीवृन्दावन की कीर्ति को छोड़कर और बातों में अपने कानों को कौन लगाये ? । । 66 ।।*

____________________________________

क्रमश:-............. शेष अगली पोस्ट 207 में

।।श्रीराधामाधव चरन बंदौं बारंबार।।

▭▬▭▬▭▭▬▭▬▭▬▭▬▭...
#श्रीराधामाधव * शुद्ध प्राकृतिक इत्र , तुलसी , रुद्राक्ष , शंख , श्रृंगी , रत्न उपरत्न* *तथा सभी प्रकार की पूजा सामग्री , वैजयंती, गुंजा , स्फटिक , मोती माला के लिए लिंक पर क्लिक करें*

https://wa.me/c/919873251921
____________________________________

क्रमश:-............. शेष अगली पोस्ट 206 में

।।श्रीराधामाधव चरन बंदौं बारंबार।।

▭▬▭▬▭▭▬▭▬▭▬▭▬▭...

*प्रतिकूलता में अनुकूलता* -२५८*उमा संत कड़ इहइ बड़ाई*। *मंद करत जो करइ भलाई* ॥ *तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा*। *रामु...
13/08/2026

*प्रतिकूलता में अनुकूलता* -२५८

*उमा संत कड़ इहइ बड़ाई*।
*मंद करत जो करइ भलाई* ॥
*तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा*।
*रामु भजें हित नाथ तुम्हारा* ।।
(सुंदरकांड ४१/७-८)
[शिवजी कहते हैं-] हे उमा! संतकी यही बड़ाई (महिमा) है कि वे बुराई करनेपर भी [बुराई करनेवालेकी भलाई ही करते हैं। [विभीषणजीने कहा-] आप मेरे पिताके समान हैं, मुझे मारा सो तो अच्छा ही किया; परन्तु हे नाथ! आपका भला श्रीरामजीको भजनेमें ही है ॥
*उमा संत कइ इहइ बड़ाई*
उनकी इस विनम्रता को देखकर शंकरजी ने आद्रमन से कहा- हे उमा ! संतों की यही महिमा है, यदि कोई इनका अहित (नुकसान, मंद) भी करता है तो वे प्रतिदान में उसका भला ही करते हैं। भगवान शिव के वचनानुसार इन्होंने अपने वचन और व्यवहार दोनों से ही इसे सिद्ध कर दिया कि वे सच्चे संत हैं।
लातें मारनेवाले दुष्ट शिरोमणि दशाननके चरणोंकी रामभक्त विभीषणने बारंबार बन्दना की, यह सुनकर उमाजीको आश्चर्य लगा; भगवान शंकर कहते हैं-
इसमें यद्यपि यह दीखता हो कि भगवद्भक्त संतका अपमान हुआ, उनको हलकापन प्राप्त हुआ, तो भी उसका विचार करनेका काम संतोंका नहीं, भगवानका है। इसमें संत पुरुषार्थहीन दीखते हो तो भी साधुता-संतमन इसमें ही है।
*'उपकारिषु यः साधुः साधुत्वे तस्य को गुणः*।
*अपकारिषु यः साधुः स साधुः सद्भिरुच्यते*
उपकार करनेवालेसे साधुतासे बर्ताव करनेमें साधुता क्या है? अपकार करनेवालेसे साधुतासे बर्ताव करनेमें ही सच्ची साधुता है।
(क) व्यवहारमें जो घटना आज वर्तमान कालमें, अनिष्ट, दुःखदायक और अपमानकारकसी दीख पड़ती है, वही भविष्यमें परम इष्ट, परम सुखदायक और स्पृहणीय सिद्ध होती है।
*'दुख सो सुख मानि सुखी चरिये'*। रावण यदि लात प्रहार न करता तो क्या परिणाम हो जाता इसका विचार कीजिए।
*तुम्ह पितु सरिस भलेहि मोहि मारा*
विभीषणजी ने शुद्ध हृदय से कहा हे नाथ! आप पिता तुल्य हैं, मेरे भले के लिये मुझे मारा। पुनः कह रहा हूँ कि आपका भला भी श्रीरामजी को भजने से ही होगा। वे आपके भी नाथ हैं। अभी तक 'राम' कह रहे थे, यहाँ आदर से 'रामु' कहा है और रावण को भी संकेत किया कि ये ही 'नाथ तुम्हारा' भी है। पहले 'प्रहार' (जोर से मारना) और अब 'मारा' कहा है, इससे स्पष्ट है कि आघात काफी जोर से किये गये गीतावली में कहा है कि हुमक कर हृदय में लात मारी
*"हुमकि हिये हन्यो लात भले तात चल्यो सुरतरु तकि तजि घोर घामहिं"* पद २५।
*भलेहिं मोहि मारा'*
आप पिताके समान हैं। पिता पुत्रको जो मारता पीटता है वह पुत्रके कल्याणहीके लिये। पिताकी मारपीट जो शान्तिसे सहता है और पिताके पैर पकड़ता है उस पुत्रका भला ही होता है। उसका अकल्याण नहीं होता। आपने जो मुझे मारा, उससे मेरा कल्याण ही होगा। रावणने जो लातें मारीं, यह उसने बिभीषणपर और पुलस्त्यकुलपर अपार उपकार ही किया। नहीं तो रावणने जो निकल जानेको कहा वह ऊपर-ऊपरका समझकर विभीषण लंकामें ही रह जाते और युद्धमें मारे जाते और पुलस्त्य वंशका उच्छेद ही हो जाता। बिभीषणजी कहते हैं कि मुझे श्रीरामजीके पास जानेकी आज्ञा देकर चरण प्रहार करके मेरा जैसे आपने परम कल्याण किया। वैसे ही आपको भी अपना हित एवं परमहित कर लेना हो तो वह राम भजन करनेसे ही होगा। रामविरोधसे हित न होगा।
रावणने बिभीषणको जो आज्ञा दी कि
*'सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती'*
वह सच्ची या विनोद, इसका निश्चय कर लेनेके लिये वे अबतक ठहरे थे। पद प्रहारोंसे सिद्ध हुआ कि वह आज्ञा हृदय तलसे दी हुई, सत्य है। बिभीषणजी प्रारंभसे ही 'ज्येष्ठो भ्राता पितुः समः' इस भावनासे बर्ताव करते रहे। अतः उस आज्ञाका पालन करना उनका धर्म, कर्तव्य ही था। कठोपनिषदमें आठ वर्षके नचिकेता पुत्रपर पिताने बहुत क्रोध किया और उसके पूछनेपर कहा कि मैंने तुझको यमराजको दिया। एक, दो, तीन बार वही उत्तर ! तब पिताको आज्ञा पालन करना अपना कर्तव्य, पुत्रधर्म जानकर नचिकेता बालक यमराजके पास चला गया। यहाँ हूबहू वैसे ही हुआ है। बिभीषणजी लंका छोड़कर रामजीके पास गए इसमें उनका तनिक भी दोष नहीं है। #श्रीराधामाधव * शुद्ध प्राकृतिक इत्र , तुलसी , रुद्राक्ष , शंख , श्रृंगी , रत्न उपरत्न* *तथा सभी प्रकार की पूजा सामग्री , वैजयंती, गुंजा , स्फटिक , मोती माला के लिए लिंक पर क्लिक करें*

https://wa.me/c/919873251921

Address

Delhi

Telephone

+919873251921

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Shri Giriraaj Dharn Prabhu Teri Sharn परमार्थ सेवा समिति , दिल्ली posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Place Of Worship

Send a message to Shri Giriraaj Dharn Prabhu Teri Sharn परमार्थ सेवा समिति , दिल्ली:

Shortcuts

Share