Ram Temple Geetanjali Enclave New Delhi

Ram Temple Geetanjali Enclave New Delhi This is cultural and spiritual centre of the 45 year old Geetanjali enclave. worshippers from across Delhi come here.Festivals hosted with fanfare.

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार नहाने के समय यदि यहां बताए गए इन वस्तुओं को मिलाकर व्यक्ति नहाता है तो उसे कभी भी आर्थिक परेशा...
26/04/2024

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार नहाने के समय यदि यहां बताए गए इन वस्तुओं को मिलाकर व्यक्ति नहाता है तो उसे कभी भी आर्थिक परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता. ऐसे में आइए विस्तार में इन खास वस्तुओं के बारे में जानें.*

हर व्यक्ति की यह इच्छा होती है कि उस पर मां लक्ष्मी के साथ कुबेर देवता का आशीर्वाद बना रहे. जिससे कि उसे कभी आर्थिक परेशानी का सामना ना करना पड़े.

वहीं अगर वह व्यक्ति से नाराज हो जाए तो आर्थिक संकट का भी सामना करना पड़ सकता है. ऐसे में व्यक्ति को कुबेर देवता और मां लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए नहाने के पानी में कुछ ऐसी खास वस्तुओं को मिलाना होगा, जिससे कि सालों उनकी तिजोरी भरी रहे. आइए विस्तार में नहाने के पानी में मिलाए जाने वाली इन खास वस्तुओं के बारे में जानें.

⚜️१. नमक

ज्योतिष शास्त्र की मानें तो यदि व्यक्ति सप्ताह में दो दिन नमक के पानी से नहाता है तो उस पर से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है. यदि व्यक्ति मंगलवार और शनिवार के दिन नमक के पानी से स्नान करता है तो मां लक्ष्मी के साथ कुबेर देवता का आशीर्वाद बना रहता है. नमक के पानी से लगातार व्यक्ति ६ महीने स्नान करता है तो उसे सकारात्मक परिणाम देखने को मिलेंगे.

⚜️२. दूध
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यदि व्यक्ति सोमवार के दिन नहाने के पानी में थोड़ा सा दूध डाल कर स्नान करता है तो उसे मानसिक शांति मिलती है. साथ ही उसका घर हमेशा धन से भरा रहेगा. इसके अलावा भगवान शिव के कृपा से सभी रोग भी दूर हो जाते हैं.

⚜️३. इत्र
शुक्रवार वाले दिन व्यक्ति अगर नहाने वाले पानी में इत्र मिला कर नहाता है तो कुबेर देवता की कृपा से जीवन में तरक्की होने लगती है. साथ ही व्यक्ति की तिजोरी सालों भर भरी रहती है.

⚜️४. हल्दी
ज्योतिष शास्त्र की माने तो गुरुवार वाले दिन यदि व्यक्ति हल्दी वाले पानी से स्नान करता है तो कुंडली में गुरु ग्रह मजबूत होता है. यदि व्यक्ति इस उपाय को तीन महीने तक करता है तो धन दौलत में वृद्धि होने लगेगी.

⚜️5. नमक और हल्दी
यदि व्यक्ति शनिवार वाले दिन नहाने वाले पानी में नमक और हल्दी मिलाकर स्नान करता है तो इससे शनि महाराज काफी प्रसन्न हो जाते हैं. साथ ही कुबेर देवता और मां लक्ष्मी का आशीर्वाद हमेशा बना रहता है

कनकधारा स्तोत्र हिन्दी अनुवाद सहित〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️Tarot Reader  Astrorrachita Gupta कनकधारा स्तोत्र की रचना आदिगुरु श...
12/01/2024

कनकधारा स्तोत्र हिन्दी अनुवाद सहित
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Tarot Reader Astrorrachita Gupta
कनकधारा स्तोत्र की रचना आदिगुरु शंकराचार्य जी ने की थी। कनकधारा का अर्थ होता है स्वर्ण की धारा, कहते हैं कि इस स्तोत्र के द्वारा माता लक्ष्मी को प्रसन्न करके उन्होंने सोने की वर्षा कराई थी। यह सम्भव भी है; क्योंकि 32 वर्ष की आयु में (सन् 788 से सन् 820 तक) ब्रह्मसूत्र और गीता जैसे अनेक उपनिषदों पर भाष्य लिखना, अनेक स्तोत्र की रचना करना, विवेक चूड़ामणि जैसे ग्रन्थ की रचना, कई शक्तिपीठ की स्थापना, कोई साधारण आत्मा नहीं कर सकती। आदि शंकराचार्य ने कनकधारा स्तोत्र के सन्दर्भ में कोई विधि-विधान का उल्लेख नहीं किया है। इसका एक बार पाठ करना भी पर्याप्त है। समय और सुविधा हो तो नियत समय, नियत संख्या में अपने सामर्थ्य अनुसार जप किया जा सकता है।

सिद्ध मंत्र होने के कारण कनकधारा स्तोत्र का पाठ शीघ्र फल देनेवाला और दरिद्रता का नाश करनेवाला है। इसके नित्य पाठ से धन सम्बंधित सभी प्रकार के अवरोध दूर होते हैं और महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। विशेषकर दीपावली की रात्रि वृषभ एवं सिंह लग्न में इसका पाठ विशेष फलदायक माना गया है जो भी इस समय पूरे भाव के साथ इस स्तोत्र का पाठ करता है माता लक्ष्मी अवश्य ही अपनी कृपा उसके ऊपर बरसाती है।

सर्वप्रथम कनकधारा को यन्त्र दोनों हाथ जोड़कर ध्यान करे।

ध्यान
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ॐ वन्दे वन्दारु मन्दार मिन्दीरानन्द कल्दलं | अमंदानन्द सन्दोह बन्धुरं सिंधुराननं ||

स्तोत्र आरम्भ
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ॐ अङ्गं हरै (हरेः) पुलकभूषणमाश्रयन्ती भृङ्गाऽगनेव मुकुलाभरणं तमालं | अंगीकृताऽखिलविभूतिरपॉँगलीलामाँगल्यदाऽस्तु मम् मङ्गलदेवतायाः || १ ||

अर्थ👉 जैसे भ्रमरी अर्धविकसित पुष्पों से अलङ्कृत तमालवृक्ष का आश्रय ग्रहण करती है, वैसे ही भगवान् श्रीहरि के रोमाँच से शोभायमान माँ लक्ष्मीजी कटाक्षलीला, श्रीअङ्गों पर अनवरत पड़ती रहती है, जिसमे समस्त ऐश्वर्य, धन, संपत्ति का निवास है, वो समस्त मंगलो की अधिष्ठात्री माँ लक्ष्मीजी की कटाक्षलीला मेरे लिये मङ्गलकारी हो ।

मुग्धा मुहुर्विदधी वदने मुरारेः प्रेमत्रपा प्रणिहितानि गताऽगतानि ।
मलार्दशोर्मधुकरीव महोत्पले या सा में श्रियं दिशतु सागर सम्भवायाः || २ ||

अर्थ👉 जिस प्रकार भ्रमरी कमल पर आती-जाती रहती है, (मंडराती रहती है), वैसे ही भगवान् मुरारी के मुखकमल की और प्रेम सहित जाकर और लज्जा से वापिस आकर समुद्रतनया लक्ष्मी की मनोहर मुख दृष्टिमाला मुझे खूब धन-संपत्ति प्रदान करे।

विश्वामरेन्द्र पदविभ्रमदानदक्षमानन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोपि |
ईषन्निषीदतु मयि क्षण मीक्षणार्धंमिन्दीवरोदर सहोदरमिन्दीरायाः || ३ ||

अर्थ👉 जो देवताओ के स्वामी इंद्र को भी सबकुछ देने में समर्थ है, मुर नामके दैत्य के शत्रु भगवान् विष्णु को भी आप अत्यंत प्रिय हो, नीलकमल जिसका सहोदर है अर्थात भाई है, ऐसी लक्ष्मी अर्ध खुले हुए नेत्रों की दृश्टि किंचित क्षण के लिए मुझ पर डाले (पड़े)।

आमीलिताक्षमधिगम्य मुदामुकुन्दमानन्द
कंदमनिमेषमनंगतन्त्रं |
आकेकर स्थित कनीतिकपद्मनेत्रं भूत्यै भवेन्मम भुजङ्ग शयाङ्गनायाः || ४ ||

अर्थ👉 जिसकी पुतली एवं भौहे काम के वशीभूत हो अर्धविकसित एकटक आँखों से देखनेवाले आनंदद सत्चिदानन्द मुकुंद भगवान् को अपने निकट पाकर किन्छित तिरछी हो जाती हो, ऐसे शेषपर शयन करनेवाले भगवान् नारायण की अर्द्धांगिनी श्रीमहालक्ष्मीजी के नेत्र हमें धन-संपत्ति प्रदान करे।

बाह्यन्तरे मुरजितः (मधुजितः) श्रुतकौस्तुभे या हारावलीव हरिनीलमयी विभाति ।
कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला कल्याणमावहतु में कमलालयायाः ॥ ५ ॥

अर्थ👉 भगवान् मधुसूदन के कौस्तुभमणि से विभूषित वक्षःस्थल में इंद्रनीलमयी हारावली की तरह जो सुशोभित है, उन भगवान् के चित्त में काम संचारिणी, कमल निवासिनी लक्ष्मीजी कृपाकटाक्ष मेरा भी सदासर्वदा मंगल करे।

कालाम्बुदालि ललितोरसि कैटभारेर्धाराधरे स्फुरति या तडिदंगनेव |
मातुः समस्तजगतां महनीयमूर्तिर्भद्राणि में दिशतु भार्गवनंदनायाः || ६ |

अर्थ👉 जिस तरह से बिजली चमकती है, उसी प्रकार मधु-कैटभ के शत्रु भगवान विष्णु के काली मेघपंक्ति की तरह सुमनोहर वक्षःस्थल पर आप एक विद्युत के समान देदीप्यमान होती हो, जो समस्त लोको की माता है, भार्गवापुत्र भगवती महालक्ष्मीजी पूजनीय है वो मुझे कल्याण प्रदान करे।

प्राप्तं पदं प्रथमतः किल यत प्रभावान्मांगल्यभाजि मधुमाथिनी मन्मथेन |
मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षणार्धं मन्दालसं च मकरालयकन्यकायाः || ७ ||

अर्थ👉 समुद्रतनया ( समुद्र की पुत्री) लक्ष्मी की वह मन्दालस, मन्थर, अर्धोन्मीलित दृष्टि के प्रभावमात्र से कामदेव ने भगवान् मधुसूदन के हृदय में स्थान प्राप्त किया था, वही दृष्टि मेरे ऊपर भी पड़े।

दद्याद दयानुपवनो द्रविणाम्बुधारामस्मिन्नकिञ्चन विहङ्गशिशो विषण्णे |
दुष्कर्मधर्ममपनीय चिराय दूरं नारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाहः ॥ ८ ॥

अर्थ👉 भगवान् श्रीहरि की प्रेमिका का नेत्र रूपी मेघ, दयारूपी वायु से प्रेरित होकर दुष्कर्म रूपी धाम को दीर्घकाल के लिए दूर कर, मुझ दुखी सदृश चातक पर धन रूपी जलधारा की वर्षा करे।

इष्टाविषिश्टमतयोऽपि यया दयार्द्रदृष्टया त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते ।
दृष्टिः प्रहष्टकमलोदरदीप्तिरिष्टां पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टरायाः || ९ ||

अर्थ👉 मतिहीन मनुष्य भी जिसके स्मरण मात्र से ही स्वर्ग को प्राप्त कर लेता है, उन्ही कमलासना कमला लक्ष्मीजी के विकसित कमल गर्भ के सदृश कांतिमयी दृष्टि मुझे मनोभिलषित पुष्टि, संतान आदि की वृद्धि प्रदान करे।

गीर्देवतेति गरुड़ध्वजसुन्दरीति शाकम्भरीति शशिशेखरवल्लभेति |
सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायै तस्यै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुण्यै || १० ||

अर्थ👉 जो माँ भगवती श्री सृष्टिक्रीड़ा में अवसर अनुसार वाग्देवता के रूप में बिराजमान होती है, पालनक्रीड़ा के समय लक्ष्मीके रूप में विष्णुकी पत्नी के बिराजमान होती है, प्रलयक्रीड़ा के समय शाकम्भरी भगवान् शंकर की पत्नी के रूप में विद्यमान होती है, उन त्रिलोक के एकमात्र गुरु पालनहार विष्णु की नित्य यौन प्रेमिका भगवती लक्ष्मीको मेरा सम्पूर्ण नमस्कार है।

श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यै रत्यै नमोऽस्तु रमणीय गुणार्णवायै |
शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्रनिकेतनायै पुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै || ११ ||

अर्थ👉 हे माँ लक्ष्मी, शुभकर्मफलप्रदायिनी रतिस्वरुप मै आपको प्रणाम करता हु। रमणीय गुणों के समुद्र स्वरूपा रति के रूप में आपको प्रणाम है। शतपत्र वाले अर्थात सौ पत्रोंवाले कमलकुञ्ज में निवास करनेवाली शक्तिरूपा माँ रमा को नमस्कार है। पुरुषोत्तम की प्रेयसी को मेरा
नमस्कार है।

नमोऽस्तु नालीकनिभाननायै नमोऽस्तु
दुग्धोदधिजन्मभूत्यै |
नमोऽस्तु सोमामृतसोदरायै नमोऽस्तु
नारायणवल्लभायै || १२ ||

अर्थ👉 कमल समान मुखवाली लक्ष्मी को नमस्कार है। क्षीरसमुद्र में उत्पन्न होने वाली समुद्रतनया रमा को नमस्कार है | चंद्र और अमृत की बहन को नमस्कार है। भगवान् नारायण की प्रेयसी को नमस्कार है।

नमोऽस्तु हेमाम्बुज पीठिकायै नमोऽस्तु भूमण्डल नयिकायै । नमोऽस्तु देवादि दयापरायै नमोऽस्तु शारङ्गयुध वल्लभायै || १३ ||

अर्थ👉 सोने के कमलासन पर बैठनेवाली, भूमण्डल नायिका, देवताओ पर दयाकरनेवाली, शाङ्घायुध विष्णु की वल्लभा शक्ति को नमस्कार है।

नमोऽस्तु देव्यै भृगुनन्दनायै नमोऽस्तु विष्णोरुरसि * संस्थितायै । नमोऽस्तु लक्ष्म्यै कमलालयायै नमोऽस्तु दामोदरवल्लभायै || १४ ||

अर्थ👉 भगवान् विष्णु के वक्षःस्थल में निवास करनेवाली देवी, कमल के आसनवाली, दामोदर प्रिय लक्ष्मी, आपको मेरा नमस्कार है।

नमोऽस्तु कान्त्यै कमलेक्षणायै नमोऽस्तु भूत्यै भुवनप्रसूत्यै नमोऽस्तु देवादिभिरर्चितायै नमोऽस्तु
नन्दात्मजवल्लभायै ॥ १५ ॥

अर्थ👉 भगवान् विष्णु की कान्ता, कमल के जैसे नेत्रोंवाली, त्रैलोक्य को उत्पन्न करनेवाली, देवताओ के द्वारा पूजित, नन्दात्मज की वल्लभा ऐसी श्रीलक्ष्मीजी को मेरा नमस्कार है।

सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनंदनानि साम्राज्यदानविभवानि सरोरुहाक्षि । त्वद्वन्दनानि दुरिताहरणोद्यतानी मामेव मातरनिशं कलयन्तु मान्ये || १६ |

अर्थ👉 हे कमलाक्षी (कमल के जैसे आँखोंवाली), आपके चरणों में की हुई स्तुति प्रार्थना ऐश्वर्यदायिनी और समस्त इन्द्रियों को आनंदकारिणी है, सभी सुखो को देनेवाली (साम्राज्यादायिनी), सभी पापो को नष्ट करनेवाली, हे पाप हिन् आप मुझे अपने चरणों की वंदना करने का अवसर सदा प्रदान करे।

यत्कटाक्षसमुपासनाविधिः सेवकस्य
सकलार्थसम्पदः ।
सन्तनोति वचनाङ्गमानसैस्त्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे ॥ १७ ॥

अर्थ👉 जिनके कृपा कटाक्ष के लिए की गई उपासना सेवक के लिए समस्त मनोरथ और धन-संपत्ति का विस्तार करती है उस मुरारी की हृदयेश्वरी लक्ष्मीको, में मन, वचन और शरीर से भजन करता हु ।

सरसिजनिलये सरोजहस्ते
धवलतमांशुकगन्धमाल्यशोभे । भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद
मह्यं ॥ १८ ॥

अर्थ👉 हे भगवती नारायण की पत्नी आप कमलकुञ्ज में रहनेवाली है, आप के चरण कमल में नीलकमल शोभायमान है आप श्वेत वस्त्र तथा गंध, माला आदि से सुशोभित है, आपकी छवि अतिसुन्दर है, रमणीय है, अद्वितीय है, हे त्रिभुवन को वैभव प्रदान करनेवाली आप मेरे ऊपर भी प्रसन्न होइये ।

दिग्धस्तिभिः
कनककुम्भमुखावसृष्टस्वर्वाहिनीविमलचारुजलप्लु तांगीं । प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेषलोकाधिनाथगृहिणीममृताब्धिपुत्रीं || १९ ॥

अर्थ👉 महानुभावो द्वारा (दिग्गजजनो के द्वारा पूजित) कनककुम्भ से मुख से पतित, आकाशगंगा के स्वच्छ से मनोहर जल से जिस भगवान के श्रीअङ्ग का अभिषेक होता है, उस समस्त लोको के अधीश्वर भगवान् विष्णु की पत्नी, समुद्रतनया (क्षीरसागर पुत्री), जगन्माता भगवती लक्ष्मी को में प्रातःकाल नमस्कार करता हु ।

कमले कमलाक्षवल्लभे त्वां करुणापूरतरङ्गीतैरपारङ्गैः । अवलोकयमांकिञ्चनानां प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयायाः || २० ||

अर्थ👉 हे कमलनयन भगवान् विष्णु की प्रिया लक्ष्मीजी मेँ दीनहीन मनुष्यो का अग्रगण्य हु, इसलिए आपकी कृपा का स्वभावसिद्ध पात्र हू। आप छलकती हुई करुणा के बाढ़ की तरल - तरंगो के सदृश कटाक्षों के द्वारा मेरी दिशाओ में भी थोड़ा अवलोकन कीजिये।

स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमूभिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमां ।
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभाजिनो (भागिनो) भवन्ति ते भुवि बुधभाविताशयाः || २१ ||

अर्थ👉 जो मनुष्य या साधक इन स्तोत्रों के द्वारा नित्य वेदत्रयी स्वरूपा, भगवती रमा (लक्ष्मीजी का एक नाम) के स्तोत्र पाठ करते है वो मनुष्य इस पृथ्वी पर सौभाग्यशाली होते है, और विद्वान लोग भी उनके भाव को जाने के लिए उच्छुक रहते है।

ॐ सुवर्णधारास्तोत्रं यच्छंकराचार्य निर्मितं | त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नित्यं स कुबेरसमो भवेत || २२ ||

अर्थ👉 यह उत्तम स्तोत्र जो आद्यगुरु शंकराचार्य विरचित स्तोत्र का (कनकधारा) का पाठ तीनो कालो में (प्रातःकाल मध्याह्नकाल-सायंकाल) करता है वो मनुष्य या साधक कुबेर के समान धनवान हो जाता है।

|| इति श्रीमद्द शंकराचार्य विरचित कनकधारा स्तोत्र सम्पूर्णं ||
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सोमवार 22 जनवरी को है कार्यक्रम राम मंदिर मेँ 3pm to 6pm आप सब attend  करे Jai shri ram !
12/01/2024

सोमवार 22 जनवरी को है कार्यक्रम राम मंदिर मेँ 3pm to 6pm
आप सब attend करे
Jai shri ram !

🍁🍁 सोमनाथ 🍁🍁बैजन्ती (संस्कृत : वैजयन्ती) एक पुष्प का नाम है जिससे वैजयन्ती-माला बनती है। यह माला श्रीकृष्ण और विष्णु को ...
04/01/2024

🍁🍁 सोमनाथ 🍁🍁

बैजन्ती (संस्कृत : वैजयन्ती) एक पुष्प का नाम है जिससे वैजयन्ती-माला बनती है। यह माला श्रीकृष्ण और विष्णु को सुशोभित करती है। 'वैजयन्ती माला' का शाब्दिक अर्थ है- 'विजय दिलाती हुई माला' या 'विजय दिलाने वाली माला' ।

वैजयन्ती माला धारण किए हुए भगवान विष्णु
वैजयन्ती माला की शास्त्रों में बड़ी महिमा है। ये श्री कृष्ण भक्ति प्रदान करने वाली मानी गयी है। इस माला से श्री कृष्ण मन्त्रो का जप किया जाता है। इसे गले में धारण करना शुभ माना गया है। यह माला भगवान श्रीकृष्ण की प्रिय 6 वस्तुओं में से है - गाय, बांसुरी, मोर पंख, माखन, मिश्री और वैजयन्तीमाला । कहा जाता है कि जो भी मनुष्य इसे धारण करता है उसे जीवन में शांति एवं सुख की प्राप्ति होती है।

वैजयन्ती एक पौधे का नाम भी है। इसके पत्ते हाथ भर तक के लम्बे और चार पाँच अंगुल चौड़े होते हैं। इसमें टहनियां नहीं होतीं। यह हल्दी और कचूर की जाति का पौधा है। इसके सिर पर लाल या पीले फूल लगते हैं। फूल लम्बे और कई दलों के होते हैं और गुच्छों में लगते हैं। इसके काले दाने कड़े होते हैं जिनमें लोग छेदकर माला बनाकर पहनते हैं।

एक दूसरा मत यह है कि वैजयन्ती के पत्ते हाथ हाथ भर तक के लम्बे और एक इंच चौडे़ होते हैं। इसमें टहनियाँ नहीं होतीं, केले की तरह कांड सीधा ऊपर की ओर जाता है। इसमे कोई फूल नहीं आता, एक बीज फली के साथ निकलता है। बीज में ही जुड़ा हुआ पराग होता है। कुछ लोग बैजन्ती को कैना लिली भी समझते हैं, किन्तु दोनो पौधे अलग हैं।

बैजन्ती के पौधे की सबसे बड़ी खासियत ये है कि इसके बीज में माला बनाने के लिए कोई छेद नहीं करना पड़ता। यह माला भगवान विषणु जी की सर्वाधिक प्रिय मानी जाती है।

पौराणिक आठ दिव्य बालक🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸हमारे धर्म ग्रंथों में ऐसे अनेक बच्चों के बारे में बताया गया है जिन्होंने कम उम्र में ही कु...
03/01/2024

पौराणिक आठ दिव्य बालक
🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸
हमारे धर्म ग्रंथों में ऐसे अनेक बच्चों के बारे में बताया गया है जिन्होंने कम उम्र में ही कुछ ऐसे काम किए, जिन्हें करना किसी के बस में नहीं था। लेकिन अपनी ईमानदारी, निष्ठा व समर्पण के बल पर उन्होंने मुश्किल काम भी बहुत आसानी से कर दिए। आज हम आपको 8 ऐसे ही बच्चों के बारे में बता रहे हैं-

1. बालक ध्रुव
🔸🔸🔹🔹
बालक ध्रुव की कथा का वर्णन श्रीमद्भागवत में मिलता है। उसके अनुसार ध्रुव के पिता का नाम उत्तानपाद था। उनकी दो पत्नियां थीं, सुनीति और सुरुचि। ध्रुव सुनीति का पुत्र था। एक बार सुरुचि ने बालक ध्रुव को यह कहकर राजा उत्तानपाद की गोद से उतार दिया कि मेरे गर्भ से पैदा होने वाला ही गोद और सिंहासन का अधिकारी है। बालक ध्रुव रोते हुए अपनी मां सुनीति के पास पहुंचा। मां ने उसे भगवान की भक्ति के माध्यम से ही लोक-परलोक के सुख पाने का रास्ता सूझाया।

माता की बात सुनकर ध्रुव ने घर छोड़ दिया और वन में पहुंच गया। यहां देवर्षि नारद की कृपा से ऊं नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र की दीक्षा ली। यमुना नदी के किनारे मधुवन में बालक ध्रुव ने इस महामंत्र को बोल घोर तप किया। इतने छोटे बालक की तपस्या से खुश होकर भगवान विष्णु प्रकट हुए। भगवान विष्णु ने बालक ध्रुव को ध्रुवलोक प्रदान किया। आकाश में दिखाई देने वाला ध्रुव तारा बालक ध्रुव का ही प्रतीक है।

2. गुरुभक्त आरुणि
🔸🔸🔹🔹🔸🔸
महाभारत के अनुसार आयोदधौम्य नाम के एक ऋषि थे। उनके एक शिष्य का नाम आरुणि था। वह पांचालदेश का रहने वाला था। आरुणि अपने गुरु की हर आज्ञा का पालन करता था। एक दिन गुरुजी ने उसे खेत की मेढ़ बांधने के लिए भेजा। गुरु की आज्ञा से आरुणि खेत पर गया और मेढ़ बांधने का प्रयास करने लगा। काफी प्रयत्न करने के बाद भी जब वह खेत की मेढ़ नहीं बांध पाया तो मेढ़ के स्थान पर वह स्वयं लेट गया ताकि पानी खेत के अंदर न आ सके।

जब बहुत देर तक आरुणि आश्रम नहीं लौटा तो उसके गुरु अपने अन्य शिष्यों के साथ उसे ढूंढते हुए खेत तक आ गए। यहां आकर उन्होंने आरुणि को आवाज लगाई। गुरु की आवाज सुनकर आरुणि उठकर खड़ा हो गया। जब उसने पूरी बात अपने गुरु को बताई तो आरुणि की गुरुभक्ति देखकर गुरु आयोदधौम्य बहुत प्रसन्न हुए और उसे सारे वेद और धर्मशास्त्रों का ज्ञान हो जाने का आशीर्वाद दिया।

3. परमज्ञानी अष्टावक्र
🔸🔸🔹🔹🔸🔸
प्राचीन काल में कहोड नामक एक ब्राह्मण थे। उनकी पत्नी का नाम सुजाता था। समय आने पर सुजाता गर्भवती हुई। एक दिन जब कहोड वेदपाठ कर रहे थे, तभी सुजाता के गर्भ में स्थित शिशु बोला – पिताजी। आप रातभर वेदपाठ करते हैं, किंतु वह ठीक से नहीं होता। गर्भस्थ शिशु के इस प्रकार कहने पर कहोड क्रोधित होकर बोले कि- तू पेट में ही ऐसी टेढ़ी-मेढ़ी बातें करता है, इसलिए तू आठ स्थानों से टेढ़ा उत्पन्न होगा। इस घटना के कुछ दिन बाद कहोड राजा जनक के पास धन की इच्छा से गए।

वहां बंदी नामक विद्वान से वे शास्त्रार्थ में हार गए। नियमानुसार उन्हें जल में डूबा दिया गया। कुछ दिनों बाद अष्टावक्र का जन्म हुआ किंतु उसकी माता ने उसे कुछ नहीं बताया। जब अष्टावक्र 12 वर्ष का हुआ, तब एक दिन उसने अपनी माता से पिता के बारे पूछा। तब माता ने उसे पूरी बात सच-सच बता दी। अष्टावक्र भी राजा जनक के दरबार में शास्त्रार्थ करने के लिए गया। यहां अष्टावक्र और बंदी के बीच शास्त्रार्थ हुआ, जिसमें अष्टावक्र ने उसे पराजित कर दिया।

अष्टावक्र ने राजा से कहा कि बंदी को भी नियमानुसार जल में डूबा देना चाहिए। तब बंदी ने बताया कि वह जल के स्वामी वरुणदेव का पुत्र है। उसने जितने भी विद्वानों को शास्त्रार्थ में हराकर जल में डुबाया है, वे सभी वरुण लोक में हैं। उसी समय जल में डूबे हुए सभी ब्राह्मण पुन: बाहर आ गए। अष्टावक्र के पिता कहोड भी जल से निकल आए। अष्टावक्र के विषय में जानकर उन्हें बहुत प्रसन्न हुई और पिता के आशीर्वाद से अष्टावक्र का शरीर सीधा हो गया।

4. आस्तिक
🔸🔸🔹🔹
महाभारत के अनुसार आस्तिक ने ही राजा जनमेजय के सर्प यज्ञ को रुकवाया था। आस्तिक के पिता जरत्कारु ऋषि थे और उनकी माता का नाम भी जरत्कारु था। आस्तिक की माता नागराज वासुकि की बहन थी। जब राजा जनमेजय को पता चला कि उनके पिता की मृत्यु तक्षक नाग द्वारा काटने पर हुई थी तो उन्होंने सर्प यज्ञ करने का निर्णय लिया। उस यज्ञ में दूर-दूर से भयानक सर्प आकर गिरने लगे। जब यह बात नागराज वासुकि को पता चली तो उन्होंने आस्तिक से इस यज्ञ को रोकने के लिए निवेदन किया।

आस्तिक यज्ञ स्थल पर जाकर ज्ञान की बातें करने लगे, जिसे सुनकर राजा जनमेजय बहुत प्रसन्न हुए। जनमेजय ने आस्तिक को वरदान मांगने के लिए कहा, तब आस्तिक ने राजा से सर्प यज्ञ बंद करने के लिए निवेदन किया। राजा जनमेजय ने पहले तो ऐसा करने से इनकार कर दिया, लेकिन बाद में वहां उपस्थित ब्राह्मणों के कहने पर उन्होंने सर्प यज्ञ रोक दिया और आस्तिक की प्रशंसा की।

5. भक्त प्रह्लाद
🔸🔸🔹🔸🔸
बालक प्रह्लाद की कथा का वर्णन श्रीमद्भागवत में मिलता है। प्रह्लाद के पिता हिरण्यकश्यपु दैत्यों के राजा थे। वह भगवान विष्णु को अपना शत्रु मानता था परंतु प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। जब यह बात हिरण्यकश्यपु को पता चली तो उसने प्रह्लाद पर अनेक अत्याचार किए, लेकिन फिर भी प्रह्लाद की ईश्वर भक्ति कम न हुई। अंत में स्वयं भगवान विष्णु प्रह्लाद की रक्षा के लिए नृसिंह अवतार लेकर प्रकट हुए। नृसिंह भगवान ने हिरण्यकश्यपु का वध कर दिया और प्रह्लाद को अपनी गोद में बैठा कर प्रेम किया।

6. गुरुभक्त उपमन्यु
🔸🔸🔹🔹🔸🔸
गुरु आयोदधौम्य के एक शिष्य का नाम उपमन्यु था। वह बड़ा गुरुभक्त था। गुरु की आज्ञा से वह रोज गाय चराने जाता था। एक दिन गुरु ने उससे पूछा कि तुम अन्य शिष्यों से मोटे और बलवान दिख रहे हो। तुम क्या खाते हो? तब उपमन्यु ने बताया कि मैं भिक्षा मांगकर ग्रहण कर लेता हूं। गुरु ने उससे कहा कि मुझे निवेदन किया बिना तुम्हें भिक्षा का अन्न नहीं खाना चाहिए। उपमन्यु ने गुरुजी की बात मान ली।

कुछ दिनों बाद पुन: गुरुजी ने उपमन्यु से वही प्रश्न पूछा तो उसने बताया कि वह गायों का दूध पीकर अपनी भूख मिटाता है। तब गुरु ने उसे ऐसा करने से भी मना कर दिया, लेकिन इसके बाद भी उपमन्यु के पहले जैसे दिखने पर गुरुजी ने उससे पुन: वही प्रश्न किया। तब उपमन्यु ने बताया कि बछड़े गाय का दूध पीकर जो फेन (झाग) उगल देते हैं, वह उसका सेवन करता है। गुरु आयोदधौम्य ने उसे ऐसा करने से भी मना कर दिया।

जब उपमन्यु के सामने खाने-पीने के सभी रास्ते बंद हो गए तब उसने एक दिन भूख से व्याकुल होकर आकड़े के पत्ते खा लिए। वह पत्ते जहरीले थे। उन्हें खाकर उपमन्यु अंधा हो गया और वह वन में भटकने लगा। दिखाई न देने पर उपमन्यु एक कुएं में गिर गया। जब उपमन्यु शाम तक आश्रम नहीं लौटा तो गुरु अपने अन्य शिष्यों के साथ उसे ढूंढने वन में पहुंचे। वन में जाकर गुरु ने उसे आवाज लगाई तब उपमन्यु ने बताया कि वह कुएं में गिर गया है।

गुरु ने जब इसका कारण पूछा तो उसने सारी बात सच-सच बता दी। तब गुरु आयोदधौम्य ने उपमन्यु को देवताओं के चिकित्सक अश्विनी कुमार की स्तुति करने के लिए कहा। उपमन्यु ने ऐसा ही किया। स्तुति से प्रसन्न होकर अश्विनी कुमार प्रकट हुए और उपमन्यु को एक फल देकर बोले कि इसे खाने से तुम पहले की तरह स्वस्थ हो जाओगे। उपमन्यु ने कहा कि बिना अपने गुरु को निवेदन किए मैं यह फल नहीं खा सकता।

उपमन्यु की गुरुभक्ति से प्रसन्न होकर अश्विन कुमार ने उसे पुन: पहले की तरह स्वस्थ होने का वरदान दिया, जिससे उसकी आंखों की रोशनी भी पुन: लौट आई। गुरु के आशीर्वाद से उसे सारे वेद और धर्मशास्त्रों का ज्ञान हो गया।

7. मार्कण्डेय ऋषि
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धर्म ग्रंथों के अनुसार मार्कण्डेय ऋषि अमर हैं। आठ अमर लोगों में मार्कण्डेय ऋषि का भी नाम आता है। इनके पिता मर्कण्डु ऋषि थे। जब मर्कण्डु ऋषि को कोई संतान नहीं हुई तो उन्होंने अपनी पत्नी के साथ भगवान शिव की आराधना की। उनकी तपस्या से प्रकट हुए भगवान शिव ने उनसे पूछा कि वे गुणहीन दीर्घायु पुत्र चाहते हैं या गुणवान 16 साल का अल्पायु पुत्र। तब मर्कण्डु ऋषि ने कहा कि उन्हें अल्पायु लेकिन गुणी पुत्र चाहिए। भगवान शिव ने उन्हें ये वरदान दे दिया।

जब मार्कण्डेय ऋषि 16 वर्ष के होने वाले थे, तब उन्हें ये बात अपनी माता द्वारा पता चली। अपनी मृत्यु के बारे में जानकर वे विचलित नहीं हुए और शिव भक्ति में लीन हो गए। इस दौरान सप्तऋषियों की सहायता से ब्रह्मदेव से उनको महामृत्युंजय मंत्र की दीक्षा मिली। इस मंत्र का प्रभाव यह हुआ कि जब यमराज तय समय पर उनके प्राण हरने आए तो शिव भक्ति में लीन मार्कण्डेय ऋषि को बचाने के लिए स्वयं भगवान शिव प्रकट हो गए और उन्होंने यमराज के वार को बेअसर कर दिया। बालक मार्कण्डेय की भक्ति देखकर भगवान शिव ने उन्हें अमर होने का वरदान दिया।

8. गुरुभक्त एकलव्य
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एकलव्य की कथा का वर्णन महाभारत में मिलता है। उसके अनुसार एकलव्य निषादराज हिरण्यधनु का पुत्र था। वह गुरु द्रोणाचार्य के पास धनुर्विद्या सीखने गया था, लेकिन राजवंश का न होने के कारण द्रोणाचार्य ने उसे धनुर्विद्या सिखाने से मना कर दिया। तब एकलव्य ने द्रोणाचार्य की एक प्रतिमा बनाई और उसे ही गुरु मानकर धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा। एक बार गुरु द्रोणाचार्य के साथ सभी राजकुमार शिकार के लिए वन में गए।

उस वन में एकलव्य अभ्यास कर रहा था। अभ्यास के दौरान कुत्ते के भौंकने पर एकलव्य ने अपने बाणों से कुत्ते का मुंह बंद कर दिया। जब द्रोणाचार्य व राजकुमारों ने कुत्ते को इस हाल में देखा तो वे उस धनुर्धर को ढूंढने लगे, जिसने इतनी कुशलता से बाण चलाए थे। एकलव्य को ढूंढने पर द्रोणाचार्य ने उससे उसके गुरु के बारे में पूछा। एकलव्य ने बताया कि उसने प्रतिमा के रूप में ही द्रोणाचार्य को अपना गुरु माना है। तब गुरु द्रोणाचार्य ने गुरु दक्षिणा के रूप में एकलव्य से दाहिने हाथ का अंगूठा मांग लिया। एकलव्य ने बिना कुछ सोचे अपने अंगूठा द्रोणाचार्य को दे दिया।
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02/01/2024

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02/01/2024

Khatu Shyam Satsang on New Year 2024 on 1.1.2024 in Ram Temple Geetanjali Enclave New Delhi
Very sacred and energetic performance by bhakts of Krishna and Khatu ji.

02/01/2024

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