18/04/2026
माया का दर्शन: सुदामा की कथा
जिज्ञासा और चुनौती: परम भक्त सुदामा के मन में भगवान की 'माया' को देखने की इच्छा जगी। श्रीकृष्ण ने उन्हें चेतावनी दी कि माया को देखने के लिए ईश्वर को भूलना पड़ता है, क्योंकि जहाँ ज्ञान (ईश्वर) है, वहाँ अज्ञान (माया) नहीं रह सकता।
माया का जाल: गोमती नदी में स्नान के दौरान सुदामा क्षण भर के लिए संध्या-वंदन की जल्दबाजी में प्रभु को भूल गए। इसी पल माया ने उन्हें घेर लिया। वे नदी की बाढ़ में बहकर एक अनजान राज्य में पहुँच गए।
राजसी जीवन और विस्मृति: माया के प्रभाव में सुदामा अपना पिछला जीवन भूल गए। वे उस राज्य के राजा बने, विवाह किया और संतानों के सुख में डूब गए। प्रभु का विस्मरण ही उनके दुखों का कारण बनने वाला था।
दुख में जागृति: जब उनकी रानी की मृत्यु हुई, तो वहां के कठोर नियम के अनुसार सुदामा को भी जीवित चिता पर चढ़ने के लिए विवश किया गया। मृत्यु के निकट देख भयभीत सुदामा ने व्याकुल होकर भगवान को याद किया।
सत्य का बोध: जैसे ही सुदामा के हृदय में प्रभु का नाम आया, माया का पर्दा हट गया। उन्हें अपनी असलियत याद आई और उन्होंने खुद को वापस गोमती नदी में पाया। श्रीकृष्ण वहीं खड़े मुस्कुरा रहे थे।
निष्कर्ष: भगवान ने समझाया कि संसार में उनके बिना जो कुछ भी दिखता है, वह केवल 'माया' (भ्रम) है। जिस प्रकार 'नर्तकी' शब्द का उल्टा 'कीर्तन' होता है, उसी प्रकार जो व्यक्ति प्रभु के नाम का कीर्तन करता है, वह माया के नाच से बचकर परम शांति प्राप्त करता है।