24/01/2026
जय कामाख्या माई की
नीलाचल की गर्भगृह
जहाँ शक्ति स्वयं श्वास लेती है
असम की पावन धरती पर नीलाचल पर्वत आज भी वैसे ही मौन खड़ा है, जैसे युगों से किसी गूढ़ रहस्य की रक्षा कर रहा हो। उसी पर्वत की कोख में स्थित है माँ कामाख्या का गर्भगृह
न कोई मूर्ति, न कोई आकृति…
केवल शक्ति, केवल अनुभूति।
इस चित्र में दिखाई देने वाला यह कक्ष कोई साधारण मंदिर नहीं, बल्कि सृष्टि के आदि रहस्य का द्वार है।
रक्तवस्त्र से ढकी शक्ति की शय्या
गर्भगृह की भूमि पर बिछा लाल वस्त्र केवल कपड़ा नहीं है।
यह रजस्वला शक्ति का प्रतीक है
वही शक्ति जिससे सृष्टि का जन्म होता है।
देवी यहाँ सृष्टि-बीज रूपा हैं।
यही कारण है कि यहाँ रक्तवर्ण सर्वत्र है
फूल, वस्त्र, दीपों की आभा, यहाँ तक कि वायु में भी लालिमा व्याप्त है।
कहते हैं
“जहाँ रक्त है, वहीं जीवन है।”
दीपों की लौ और साधकों की श्वास
चित्र में जलते दीप केवल प्रकाश नहीं देते,
वे साधकों की तपस्या को साक्षी बनाते हैं।
हर दीपक की लौ में
किसी तांत्रिक की सिद्धि,
किसी भक्त की पुकार,
किसी स्त्री की कामना,
किसी साधक का मौन तप
समाया हुआ है।
जब हवा में धुएँ की लकीरें उठती हैं,
तो ऐसा लगता है मानो माँ स्वयं श्वास ले रही हों।
माँ कामाख्या केवल कामना नहीं हैं,
वह काम का नियंत्रण भी हैं।
यहाँ आने वाला साधक
यदि वासना से आया—तो भस्म हो जाता है।
यदि भक्ति से आया—तो मुक्त हो जाता है।
यह स्थान क्यों गुप्त है?
कहते हैं
सती के योनिभाग के गिरने से यह पीठ प्रकट हुआ।
इसी कारण यहाँ मूर्ति नहीं, योनि-शिला पूजित है।
यह वही स्थान है जहाँ
कामदेव को पुनर्जीवन मिला
शिव का वैराग्य शृंगार में बदला
मृत्यु भी जीवन के आगे नतमस्तक हुई
रजस्वला काल और सृष्टि उत्सव
हर वर्ष अंबुबाची में
माँ स्वयं रजस्वला होती हैं।
मंदिर बंद रहता है
क्योंकि यह उत्सव पूजा का नहीं, प्रकृति के सम्मान का है।
यह काल्पनिक चित्र उसी दिव्य अवस्था की स्मृति है,
जब माँ विश्राम में हैं
और सृष्टि उनकी प्रतीक्षा करती है।
चित्र का मौन संदेश
यदि इस चित्र को ध्यान से देखें
तो यह बोलता नहीं,
आह्वान करता है।
यह कहता है
“माँ को पाने के लिए आँख नहीं,
अंतरात्मा खोलो।”
यह गर्भगृह नहीं
यह सृष्टि की योनि है।
यह मंदिर नहीं
यह शक्ति का श्वासकक्ष है।
जो यहाँ पहुँचा,
वह कही नहीं लौटता