03/10/2026
सिद्ध बिमला मंदिर: उड्डीयान पीठ की दिव्य परंपरा और षोडश दुर्गोत्सव का पवित्र केंद्र
श्री श्री बिमलायै नमः।
पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर शहर (नजरगंज) क्षेत्र में स्थित सिद्ध बिमला मंदिर एक प्रसिद्ध, पवित्र और आध्यात्मिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण हिंदू तीर्थस्थल है। यह मंदिर केवल एक पूजा-स्थल नहीं, बल्कि देवी बिमला और भगवान जगन्नाथ की प्राचीन दुर्गा-माधव परंपरा का जीवंत प्रतीक है।
नाथ संप्रदाय से गहराई से जुड़ा हुआ।
यह मंदिर नाथ संप्रदाय की प्राचीन योग, तंत्र और आध्यात्मिक परंपरा से गहरे रूप में जुड़ा हुआ है। नाथ संप्रदाय, जिसकी स्थापना आदिनाथ शिव और गुरु गोरखनाथ की परंपरा से मानी जाती है, हठयोग, सिद्धि साधना, शिव-शक्ति उपासना तथा आत्मज्ञान के मार्ग को महत्व देता है।
सिद्ध बिमला मंदिर में देवी बिमला की उपासना, तंत्र-साधना और विशेष वेश-परंपरा इसी नाथ परंपरा की गूढ़ आध्यात्मिक धारा को दर्शाती है। यहाँ की पूजा-विधि केवल बाह्य आराधना नहीं, बल्कि शरीर, मन और आत्मा के कल्याण का मार्ग भी है।
यहाँ वर्षभर श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं, परंतु अश्विन मास का षोडश-दिवसीय दुर्गोत्सव इस पीठ को विशेष गौरव प्रदान करता है।
आध्यात्मिक महत्व
सिद्ध बिमला मंदिर पुरी जगन्नाथ धाम की प्राचीन अवधारणा, तंत्र-परंपरा और उड्डीयान पीठ से गहरे रूप में जुड़ा हुआ है। यहाँ दुर्गा-माधव की पूजा होती है, जो भगवान जगन्नाथ और देवी बिमला के अभिन्न संबंध को दर्शाती है। भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में देवी और भगवान की यह युगल-उपासना शक्ति, करुणा, संरक्षण और लोककल्याण का संदेश देती है।
देवी बिमला को उड्डीयान पीठ की अधिष्ठात्री और जगन्नाथ संस्कृति की प्राणशक्ति माना जाता है। इसी दृष्टि से सिद्ध बिमला मंदिर केवल क्षेत्रीय श्रद्धा का केंद्र नहीं, बल्कि भारत की शाक्त और वैष्णव परंपराओं के संगम का द्योतक भी है। यहाँ की पूजा-विधि, वेश-परंपरा और उत्सव तंत्र साधना की गहरी छाप रखते हैं।
षोडश-दिवसीय दुर्गोत्सव
इस मंदिर की सबसे भव्य परंपरा अश्विन मास में आयोजित 16 दिवसीय दुर्गोत्सव है। इस उत्सव में माँ बिमला को विभिन्न दिव्य रूपों में सजाया जाता है, जिन्हें “वेश” कहा जाता है। प्रत्येक वेश देवी की किसी न किसी शक्ति, लीला या रक्षा-स्वरूप का प्रतीक होता है। इस महापर्व की वेश-सूची इस प्रकार है:
इस वर्ष सिद्ध बिमला मंदिर में 03 अक्टूबर 2026 से 19 अक्टूबर 2026 तक षोडश-दिवसीय दुर्गोत्सव भव्य रूप से आयोजित होगा।
उत्सव का प्रारंभ 03 अक्टूबर 2026, शनिवार को जयदुर्गा जी के सहस्रकुंभाभिषेक और श्री बिमला जी की षोडशपूजा से होगा।
इसके बाद 04 अक्टूबर को सिंहवाहिनी वेश, 05 अक्टूबर को नारायणी वेश और 06 अक्टूबर को निजस्व वेश होगा।
07 अक्टूबर को राजराजेश्वरी वेश, 08 अक्टूबर को उग्रतारा वेश, 09 अक्टूबर को जयदुर्गा वेश तथा 10 अक्टूबर को बनदुर्गा वेश आयोजित होगा।
11 अक्टूबर को बगलामुखी वेश, 12 अक्टूबर को भुवनेश्वरी वेश, 13 अक्टूबर को पुनः निजस्व वेश, 14 अक्टूबर को हरचंडी वेश, 15 अक्टूबर को मातंगी वेश और 16 अक्टूबर को दशभुजा दुर्गा वेश होगा।
इसके उपरांत 17 अक्टूबर को पीठे महासप्तमी, 18 अक्टूबर को पीठे महाष्टमी तथा 19 अक्टूबर को पीठे महानवमी मनाई जाएगी। इन दिनों में महादेवी की तीन दिवसीय निषिद्ध महापूजा होगी और माँ को काण्तहेङ्गुला साड़ी अर्पित कर विशेष वेश सजाया जाएगा।
इस उत्सव के अंतिम चरण में महादेवी की तीन दिवसीय निषिद्ध महापूजा होती है। इस अवसर पर माँ को काण्तहेङ्गुला साड़ी अर्पित की जाती है और विशेष विधि-विधान से उनका वेश सजाया जाता है। यह परंपरा देवी-उपासना की गूढ़, पवित्र और तंत्रात्मक परंपरा को दर्शाती है।
देवी के विभिन्न वेशों का अर्थ
सिंहवाहिनी वेश: देवी दुर्गा के शौर्य, साहस और असुर-विनाश के स्वरूप का प्रतीक है।
नारायणी वेश: देवी का विष्णु-तत्व से जुड़ा रक्षात्मक और लोकपालक स्वरूप दर्शाता है।
राजराजेश्वरी वेश: समस्त राज्यों और शक्तियों की स्वामिनी देवी की महाराज्ञी-भावना का बोध कराता है।
उग्रतारा, बगलामुखी, मातंगी वेश: दस महाविद्याओं से जुड़े देवी के शक्तिशाली तंत्र-स्वरूपों को दर्शाते हैं।
भुवनेश्वरी वेश: सम्पूर्ण ब्रह्मांड की जगत्जननी और चेतना-शक्ति के रूप में देवी की महिमा प्रकट करता है।
दशभुजा दुर्गा वेश: दस दिशाओं में व्याप्त देवी की रक्षा-शक्ति और महिषासुर-वध की परंपरा का प्रतीक है।
इस प्रकार यह उत्सव केवल आडंबर या सामाजिक आयोजन नहीं, बल्कि देवी के अनंत स्वरूपों का ध्यान, आराधना और अनुभव है।
स्थान और दर्शन
सिद्ध बिमला मंदिर, नजरगंज (मलियारा), मेदिनीपुर, पश्चिम बंगाल — पिन कोड 721101। Phone : 7478373350
मंदिर सामान्यतः सुबह और शाम के समय श्रद्धालुओं के दर्शन हेतु खुला रहता है। दुर्गोत्सव के दिनों में यहाँ भक्तों की भारी संख्या आती है, इसलिए दर्शन के लिए सांझ का समय अधिक उपयुक्त रहता है।
सांस्कृतिक धरोहर
सिद्ध बिमला मंदिर भारतीय लोक-परंपरा, शाक्त उपासना, जगन्नाथ संस्कृति और बंग-उड़िया सांस्कृतिक संबंधों का अद्भुत उदाहरण है। यहाँ का षोडश दुर्गोत्सव यह सिद्ध करता है कि देवी-पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि समाज में श्रद्धा, अनुशासन, कला, संगीत, सेवा और सामूहिक आस्था को जोड़ने वाली जीवंत परंपरा है।
जय माँ सिद्ध बिमला। 🌺🙏🏻