24/09/2024
पुरश्चरणम्
पुरः अग्रे (इष्ट देवस्य अथवा मन्त्राधिष्ठातृदेवस्य अग्रे) चरणं वर्तनं(सर्वतोभावेन समर्पणपूर्वकं नियमबद्धाचरणं) अपने इष्ट देव के अथवा मन्त्राधिष्ठातृ देव के सान्निध्य का अनुभव करते हुए आत्मानुसन्धान हेतुक साधना।।
पुरः अग्रे अभ्युन्नति पथे चरणं गमनं इति पुरश्चरणं,,आध्यात्मिक पथ पर आगे बढने की सुनियजित प्रक्रिया।।
किसी भी मन्त्र का पुरश्चरण उस मन्त्र की वर्ण संख्या को लक्षगुणित जपने पर पूर्ण माना जाता है,,जैसे कि गायत्री मन्त्र में 24 वर्ण हैं,,तो इस मन्त्र का 24 (24,00000) लाख जप करने से पुरश्चरण पूर्ण होता है।तदनन्तर इसका दशांश (2,40,000) होम,तद्दशांश (24,000) तर्पण ,तद्दशांश (2400) मार्जन,तद्दशांश (240) ब्राह्मणभोजन कराने से सांगोपांग एक पुरश्चरण पूर्ण माना जाता है।
परन्तु राम नाम आदि मन्त्रों को कोटिगुणित जपने से ही पुरश्चरण माना जाता है,,एकाक्षर द्व्यक्षर मन्त्र को करोङ गुना जपने पर पुरश्चरण मान्य होता है,,ऐसी शिष्ट तथा शास्त्र परम्परा है।।
सप्रणव महाव्याहृति संयुक्त गायत्री मन्त्र के जप से बढकर पापशोधन का अन्य उपाय नहीं है।
गायत्र्यास्तु परं नास्ति,शोधनं पाप कर्मणाम्।
महाव्याहृति संयुक्तां,प्रणवेन च संजपेत्।।(संवर्त स्मृति 2-8)
गै इति प्राणाः तान् त्रायते इति गायत्री गयाँस् तत्रे प्राणाः वै गयाँ तस्मात्गायत्री (5-14-4 वृहदारण्यके) जिसके जप करने से प्राणों का संरक्षण होता है, उस मन्त्र को गायत्री कहते हैं।
संध्योपासना के विना कोई भी उपासना फलवती नहीं होती,कदाचित् घुणाक्षरन्याय से संयोगवशात् पूर्वजन्मकृतसत्कर्मजन्यफलावाप्तिकालवशात् सफलता मिल भी जाये तब भी शास्त्राज्ञा की अवहेलना का प्रत्यवाय तो लगेगा ही।
अहरहः संध्यामुपासीत्,,,,प्रतिदिन उभयकालिक संध्या करनी ही चाहिये।।
जो त्रैवर्णिक संध्या नहीं करते वे द्विज कहलाने के योग्य कदापि नहीं।।
संध्याहीनोशुचिर्नित्यः,अनर्हःसर्वकर्मषु।
स शूद्रवद्बहिष्कार्यः सर्वस्माद्दिवजकर्मणः।
संध्यारहित द्विज समस्त द्विजोचित कर्मों में शूद्र के समान अनधिकारी कहा गया है,,।
भगवान श्री राम संध्या वन्दन करते थे,,
विगत दिवस गुरु आयसु पाई,संध्या करन चले दोउ भाई।।
निशि प्रवेश मुनि आयसु दीन्हा,सबही संध्या वन्दन कीन्हा।।(मानसे)
भगवान श्री कृष्ण संध्यावन्दन करते हैं,,
सायं भेजे दिशं पश्चात् गविष्ठो गां गतस्तदा।। (1-11-36,,भागवते)
सायं भेजे,,सांध्कालिकं संध्यावंदनादिकम् सम्पादितवान्..
क्वापि संध्यामुपासीनम् जपन्तं ब्रह्म वाग्यतम्।। (10-69-25 भागवते)
कहीं संध्यावंदन करते हुए,कहीं मौनपूर्वक गायत्री का जप करते हुए,।।
धर्मराज युधिष्ठिर ,,
अजातशत्रुः कृतमैत्रो हुताग्निः,,,(1-13-30 भागवते)
कृतमैत्रः,,मित्र ,,सूर्य तत्सम्बन्धी कृत्य को मैत्र कहते है
कृतं सम्पादितं मित्रकृत्यं सन्ध्यावन्दनादिकम् इति कृतमैत्रः
हुता अग्निः येन इति हुताग्निः ,, सन्ध्यावन्दनोपरान्त हवन करके ,,महाराज युधिष्ठिर नित्य की भांति विप्रों को दानादि देकर गुरुवन्दनार्थ(गुरु ,,माता पिता ताऊ पितामहादि) घर में प्रविष्ट हुए।।
सन्ध्या के प्रति जब ब्राह्मणों में ही उदासीनता देखी जाती है,,तब क्षत्रिय वैश्य की तो क्या कथा।।सम्भवतः यही कलियुग के आगमन का प्रमाण है।लोग अगरवत्ती जलाने को भी संध्या करना मान लेते हैं,,इतनी सस्ती सफल सिद्ध उपासना की उपेक्षा करके इस अमूल्य अवसर को व्यर्थ करने वाले द्विजों से अधिक अभागा इस दुनिया में दूसरा कोई न मिलेगा।।संध्या को पानी फेंकना बताने बाले क्या बता सकते हैं कि फिर इस दुनिया में महत्वपूर्ण क्या है।।जल की महिमा तथा मन्त्र महिमा से अनभिज्ञ स्वयं तो करते ही नहीं,,अपितु करने वालों का उपहास तक करते देखे जाते हैं।
सर्वं अप्सु प्रतिष्ठितम्।।।
अपाम् मध्ये स्थिताः देवाः।।
आपो नाराः इति प्रोक्ताः।।
श्रीमन्नारायण का आश्रयभूत जल वह भी पवित्रतम मन्त्रों के साहचर्य से अतीव पवित्र होकर हमारे सकल अमंगलों का शमन करता हुआ ओज तेज विद्या तपादि का संवर्धक होता हैं,,संध्या के मन्त्रों का कितना मंगलमय अर्थ है, कैसी पवित्रभावना से महर्षियों ने इसका प्रणयन करके लोक हित के लिये इसका प्रकाशन किया था,,पर वाह रे कलिकाल तेरा पार पाना असम्भव है।।
पुरश्चरण काल के कुछ सामान्य नियम,,,,,,,,,
1,,,यथा सम्भव प्रतिग्रह से बचें,,,लेना ही पङे तो सीधे न लेकर भूमि पर कोई रख जाये तो उसमें से उपयोगितानुरूप उतनी ही मात्रा में लेकर शेष का वितरण कर दे।
2,,,स्वपाकी होना अधिक उचित है,,,स्वेनैव पाकः अथवा स्वकीयेनैव पाकः। स्वयं प्रसाद वनाकर भगवान का भोग लगाकर अतिथि आदि को संतुष्ट करके तब पाये। अथवा अपने किसी विश्वसनीय परिक्षित पवित्राचरण वाले संध्यावन्दन निष्ठ साथी का सहयोग प्रसाद निर्माण में ले ।।पर सबके हाथ का न खाये।।
3,,युक्त आहार ,विहार,,युक्त चेष्टायें,,युक्त सोना जगना,,साधना में सहयोगी होता है,,
युक्ताहार विहारस्य,युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्त स्वप्नाबबोधस्य योगो भवति दुखहा।।6-17 गीता
अधिक खाना,,या बिल्कुल न खाना,,अधिक सोना या बिल्कुल न सोना,,,ये सब रोग हैं जो साधना पथ में घातक होते हैं।।
नात्यश्नतस्तु योगोस्ति,न चैकान्तमनश्नतः।
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन।।6-16 गीता
अधिक खायेगा तो आलस्य में अजगर की भांति उसको पचाने में ही दिन चला जायेगा,,,नहीं खायेगा तो इस शरीर रूपी यन्त्र के साथ अत्याचार का फल होगा ये साथ न देगा,,,रोगी हो जायेगा।।
अति किसी भी प्रकार की ठीक नहीं,,,संयम रहे।।
4,,,अपनी निजी अनुभूतियों को मात्र प्रशंसा पाने के लिये सबको न सुनाये,,कोई अधिकारी अनुभवी सज्जन सन्त हो तो जिज्ञासा वश जानकारी के लिये पूछ सकते हैं,,,सबको वताने पर पछताने के अलाबा कुछ बचता नहीं है,,(नारद जी की काम विजय कथा स्मरणीय है) गुप्त प्रेम सखी सदा दुरइये..,,,,
5,,,किसी भी प्रकार के मादक द्रव्य का सेवन न करें,,चाहे समाज में स्वीकार्य क्यों न हों,,,बङे लोग बङी शान के साथ कुछ मादक द्रव्यों का प्रयोग करके अपने नवागत अनुयायियों के भविष्य के ,साथ खिलवाङ करते हैं।
6,,,लालमिर्च,खटाई,तेल,गरिष्ठ वादी कारक,कफ बर्धक,पदार्थों का सेवन न करे,गाजर मूली,बेंगन,गोभी उङद,काशीफल,अरबी,चाय काफी,,,न ले।
7,,,साधना से गर्मी का अनुभव हो तो दही मट्ठा अधिक न ले ,,क्योंकि इनसे वात जन्य रोग हो सकते हैं,,,वादाम को पीसकर गोदुग्ध तथा गोघृत के साथ छोंककर लेने से गर्मी शान्त हो जाती है,,,
8,,हितभुक्.मितभुक्,ऋतभुक् हितकारक,अल्प,तथा पवित्र आहार ही लें।
9,,,,हितवाक् मितवाक् ऋतवाक्,,कम बोले हितकर बोले,,तथा सत्य ही बोलें...ये सब साधना के सहयोगी हैं।
10,,,प्रातःकाल (रात में भरे गये ताम्रपात्रस्थ) जलपान करें।मध्याह्न में भोजनोपरान्त तक्र (छाच) लें,रात में शयन से 1घण्टा पूर्व गुनगुना दूध लें।इससे पेट साफ रहता है फलतः रोग होने के अवसर कम आते हैं।
निशान्ते च पिवेत् वारि,दिवसान्ते पिवेत् पयः।
भोजनान्ते पिवेत् तक्रं,त्रिभिः रोगी न जायते।।
11,,,अखंड दीप आत्म रक्षार्थ होता है,कर्म साक्षी होता है,,
12,,,जप करते समय मन को एकाग्र करें,जप मन से ही हो होठ नहीं हिलने चाहिये,,,वाचिक से उपांशु जप श्रेष्ठ होता है,उपांशु से मानसिक जप श्रेष्ठ कहा गया है। हर हर महादेव 🙏🌹🌹