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24/11/2024

भगवान् और ईश्वर
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संस्कृत वाङ्मय में परमात्मा के बोधक अनेक नाम हैं। महर्षि दयानन्द सरस्वती जी तो कहते हैं कि सभी सार्थक संज्ञाएं परमात्मा की बोधक हैं। गुण, कर्म और स्वभाव के आधार पर परमात्मा के असंख्य नाम हैं। उन्हें परमात्मा के "गौण" नाम कहते हैं। परमात्मा का मुख्य नाम "ओ३म्" है। शेष ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गणेश, शिव आदि नाम उसके गुण, कर्म अथवा स्वभाव के बोधक हैं। भगवान् और ईश्वर भी गौण नाम हैं।

१. #भगवान् -
यह परमात्मा का गौण नाम है। 'भग' वाला होने के कारण परमात्मा को "भगवान्" कहते हैं। 'भग' शब्द के साथ 'वतुप्' प्रत्यय लगाने से "भगवान्" शब्द बनता है। भग शब्द का अर्थ है-ऐश्वर्य। भगवान् का अर्थ होगा- "ऐश्वर्यवान्।"
ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशस: श्रिय:।
ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा।।
--धन, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य को "भग" कहते हैं। इसलिए अतीव ऐश्वर्यवान्, धार्मिक, यशस्वी, श्री संपन्न, परमज्ञानी और वीतराग व्यक्ति को भी भगवान् कह सकते हैं। "भगवान्" शब्द प्रकरण के अनुसार किसी व्यक्ति अथवा परमात्मा के लिए भी प्रयोग किया जा सकता है। यह अर्थानुसारी व्याख्या है। भावानुसारी व्याख्या के अनुसार -
उत्पत्तिञ्च विनाशञ्च भूतानामागतिं गतिम्।
वेत्ति विद्याञ्चाविद्याञ्च स च वाच्यो भगवानिति।।
--जो सृष्टि तथा प्रलय को, प्राणियों के जन्म तथा मरण को, विद्या तथा अविद्या को पूर्णतया जानता है उसे "भगवान्" कहते हैं।
२. #ईश्वर-
यह भी परमात्मा का गौण नाम है। "भगवान्" की तरह यह भी मनुष्यों के विशेषण के रूप में भी प्रयोग किया जा सकता है। ईश्वर शब्द "ईश् ऐश्वर्ये" धातु से बनता है। ईश का अर्थ है "ऐश्वर्यवान्" और "स्वामी।" ईश्वर का अर्थ होगा ऐश्वर्यवानों में श्रेष्ठ।
प्रायः लोग समझते हैं कि ईश्वर शब्द केवल परमात्मा का ही वाचक है परन्तु यह सत्य नहीं है। संस्कृत साहित्य में यह ऐश्वर्यवान् और स्वामी के अर्थ में मनुष्य के लिए भी प्रयोग किया गया है। जैसे गीता में यह जीव का विशेषण है -
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वर:।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गंधानिवाशयात्।। १५/१८
अर्थ - यह मन और इन्द्रियों का ईश्वर जीव इन इन्द्रियों और मन को साथ लेकर ही जन्म लेता है और मरते समय भी इन मन और इन्द्रियों को उसी तरह साथ लेकर चला जाता है जिस प्रकार वायु अपने मार्ग की गंध को साथ लेकर चली जाती है।

ईश्वरता क्षत्रिय का स्वाभाविक गुण है-
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्।।
अर्थ - पराक्रम, तेजस्विता, धैर्य, उदारता, दक्षता, युद्ध से न भागना, दानशीलता और ईश्वर-भाव क्षत्रिय का स्वाभाविक कर्म होता है।
असुरों की प्रवृत्ति को दर्शाने के लिए भी "ईश्वर" शब्द का प्रयोग हुआ है -
असौ मया हत: शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि।
ईश्वरो ऽहमहम्भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी।। १६/११
अर्थ - आसुरी भाव से प्रेरित व्यक्ति डींग हांकता है- मैंने उस शत्रु को मार डाला है, दूसरे शत्रुओं को भी मार डालूंगा। मैं ईश्वर (मालिक) हूं। मैं सभी भोगों को भोग सकता हूं। मैं सिद्ध पुरुष हूं, मैं बलवान् हूं और मैं ही सुखी हूं।
यहां पर "ईश्वर" शब्द का प्रयोग "स्वामीभाव" में हुआ है। जहां परमात्मा के अर्थ में "ईश्वर" शब्द का प्रयोग हुआ है वह भी "स्वामी" के अर्थ में ही हुआ है-
ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। १८/६१
अर्थ - अर्जुन! ईश्वर तो सब प्राणियों के हृदय में निवास करता है।.... जनेश्वर, धनेश्वर, योगेश्वर आदि शब्दों में ईश्वर शब्द सीमित स्वामित्व का वाचक है लेकिन समग्र के अधीश्वर के अर्थ में "परमेश्वर" और महेश्वर शब्द का प्रयोग हुआ है -
तमीश्वराणां परमं महेश्वरं,
तं देवतानां परमं च दैवतम्।
पतिं पतीनां परमं परस्तात्,
विदामि देवं भुवनेशमीड्यम्।। श्वेताश्वतर ६/७
अर्थ - मैं उस ईश्वरों के भी परम महेश्वर, देवताओं के भी परम देवता, राजाओं के भी राजा, महान् से भी महान्, सभी लोक-लोकांतरों के स्वामी और पूजनीय परमात्मा को जानता हूं।
यहां "ईश्वरों के भी ईश्वर" वाक्य के प्रयोग से स्पष्ट होता है कि "ईश्वर" शब्द सामान्य रूप से स्वामी भाव और ऐश्वर्य के लिए प्रयोग होता है। संसार में स्वामित्व तथा ऐश्वर्य के अनेक स्तर हैं। उनके लिए भी ईश्वर शब्द का प्रयोग होता है और "परमात्मा" के अर्थ में भी ईश्वर शब्द का प्रयोग होता है। परंतु केवल परमात्मा के लिए ईश्वर नहीं अपितु ईश्वर के साथ परम शब्द जोड़ कर "परमेश्वर" शब्द ही प्रयोग होता है।
~डॉ. नरेन्द्र वेदालंकार

27/07/2024

सायणाचार्य का वेदार्थ◼️
✍🏻 लेखक - पदवाक्यप्रमाणज्ञ पण्डित ब्रह्मदत्तजी जिज्ञासु
प्रस्तुति - 🌺 ‘अवत्सार’
सायणाचार्य से पूर्व उपलब्ध होनेवाले स्कन्द, दुर्ग आदि के वेदभाष्यों तथा सायणाचार्य के भाष्य में बहुत अधिक भेद नहीं, किन्तु सायण से पूर्ववर्ती भाष्यकारों तक वेदार्थ की विविध (आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधियज्ञ) प्रक्रिया पर्याप्त मात्रा में रही। याज्ञिक प्रक्रिया का शुद्ध स्वरूप बना रहता, तब तो कुछ भी हानि नहीं थी; त्रिविध प्रक्रिया में याज्ञिक प्रक्रिया भी एक है ही, तदनुसार भी मन्त्र का अर्थ होना ही चाहिए। पर सायणाचार्य ने तो अपने पूर्ववर्ती आचार्यों की प्रक्रिया को न जाने कैसे छोड़कर केवल याज्ञिक प्रक्रियापरक ही वेदमन्त्रों का अर्थ किया और वह भी अधूरा। अधूरा इसलिए कि सायण का वेदभाष्य केवल श्रौतयज्ञों की प्रक्रिया को लक्ष्य में रखकर ही किया हुआ है। गृह्य सूत्रों में विनियुक्त मन्त्रों के विषय में सायण का भाष्य कुछ एक स्थलों को छोड़कर प्रायः कुछ भी नहीं कहता। गृह्य अर्थात् स्मार्त्त प्रक्रिया में भी तो वेदमन्त्रों का अर्थ होना ही चाहिये। इस प्रक्रिया के लिए हमें गृह्य सूत्रों के भाष्यकारों के किये वेदार्थ से वेदमन्त्रों के अर्थ देखने होंगे। ऐसी दशा में सायण भाष्य को याज्ञिक प्रक्रिया में अधूरा ही कहेंगे। इतना ही नहीं, श्रौतप्रक्रिया के विषय में भी सायण कहां तक प्रामाणिक है, यह अभी साध्यकोटि में ही है। श्रोत विषय में भी सायण की अनेक भूलें हैं, जो कालान्तर में दिखाई जा सकती हैं।
इसमें तो कुछ भी सन्देह नहीं कि सायणाचार्य ने अपने समय में वैदिक साहित्य में महान् प्रयास किया। वेदों के भाष्य तथा ब्राह्मणग्रन्थों और आरण्यकों के भाष्य बनाए। अन्य अनेक विषयों में भी बहत से प्रौढता पूर्ण ग्रन्थ लिखे, चाहे वे सब उनकी अपनी कृति न हों, उनके संरक्षण में बने हों, पर उनका उत्तरदायित्व तो उन पर ही है। सायणाचार्य के इस प्रयास के लिए प्रत्येक वेद प्रेमी को उनका अनुगृहीत होना चाहिए। उनके वेदभाष्य में व्याकरण और निरुक्तादि का प्रयोग भी हमें पर्याप्त मात्रा में मिलता है। परन्तु मूलभूत धारणा के अनिश्चित वा भ्रान्त होने के कारण उनका मूल्य कुछ भी नहीं है और कई स्थानों में विरुद्ध भी है।
जब सायणाचार्य के मन में यह मिथ्या धारणा निश्चित हो चुकी थी कि वेदमन्त्र यज्ञप्रक्रिया का ही, प्रतिपादन करते हैं, ऐसी अवस्था में यह स्वाभाविक ही था कि वह अपना समस्त यत्न वा प्रमाणादि सामग्री यज्ञप्रक्रिया के लिए ही समर्पित करते। जब ऐनक ही हरी पहन ली तो सब पदार्थ हरे दिखाई देने में आश्चर्य ही क्या हो सकता है ? उपयुक्त धारणा के कारण उसका वेदार्थ में अनेक अनावश्यक और आधाररहित सिद्धान्तों तथा परिणामों पर पहुंचना अनिवार्य था। उदाहरणार्थ पाठक देखें -
सायण के वेदभाष्य में प्रायः सर्वत्र जहां-जहां मूलमन्त्र में जन, मनुष्य, जन्तु, नर, विट्, मर्त आदि सामान्य मनुष्यवाचक शब्द आये हैं, वहां सर्वत्र निर्वचन के आधार को छोड़कर, वाच्यवाचक सम्बन्ध के सामान्य नियम की अवहेलना करके सामान्य ‘मनुष्य’ अर्थ न करके 'यजमानादि' ही किया है। जैसा कि ऋग्वेद १।६०।४ में 🔥'मानुषेषु यजमानेषु'। ऋ० १।६८।४ में 🔥'मनोरपत्ये यजमानरूपायां प्रजायाम्। ऋ० १।१२८।१ में 🔥'मनुषः मनुष्यस्याध्वर्योः'। ऋ० १।१४०।१२ में 🔥'जनान् यजमानान्' आदि। भला बताइये इन मनुष्य, जन्तु, जन आदि शब्दों के अर्थ 'यजमान' ही हों, इसमें क्या नियामक है ? कारण क्या ? कारण यही कि यज्ञप्रक्रिया की ऐनक चढ़ी है। प्रत्येक मनुष्य यजमान या ऋत्विक ही दिखाई दे रहा है। भला नेता या मननशील जो कोई भी हो, यह अर्थ क्यों नहीं लेते? सायण होते तो उनसे पूछा जाता।
सब मन्त्रों का तीन प्रकार का अर्थ होता है। इतने से ही सायण का सारा वेदार्थ तीसरा भाग रह जाता है। शेष दो भाग (आध्यात्मिक तथा आधिदैविक) में उसकी अनभिज्ञता वा अपूर्णता स्पष्ट सिद्ध है।
विविध प्रक्रिया की अवहेलना ही वेदार्थ में एक ऐसी हिमालय जैसी भूल है, जो कदापि क्षन्तव्य नहीं हो सकती। सायण की भूल की समाप्ति यहीं पर ही नहीं हो गई। उनकी अन्य मौलिक भूलों का भी निर्देश करना हम आवश्यक समझते हैं।
◾️(१) यज्ञ में अध्वर्यु आदि के कर्मों को बताने के लिए ही वेदभाष्य करता हूं, ऐसा सायण ने कहा है। (देखो सायण के ऋग्वेदभाष्य के उपोद्घात के प्रारम्भ में)।
◾️(२) सायण सामवेद-भाष्य-भूमिका के प्रारम्भ में -
🔥यज्ञो ब्रह्म च वेदेषु द्वावर्थौ काण्डयोर्द्धयोः।
अध्वयु मुख्यैर्ऋत्विग्भिश्चतुभिर्यज्ञसम्पदः॥६॥
इसमें वेद के मन्त्रों का अर्थ यज्ञपरक तथा ब्रह्मपरक माना। हमें तो सायण के इस लेख से प्रति प्रसन्नता हई कि चलो ब्रह्मपरक अर्थ नहीं किया तो न सही, ब्रह्मपरक अर्थ का निर्देश तो कर ही दिया है। पर हमारी यह प्रसन्नता अधिक देर न रह सकी, जब हमने काण्व-संहिता-भाष्य की भूमिका में सायण का यह लेख देखा-
🔥'तस्मिश्च वेदे द्वौ काण्डो कर्मकाण्डो ब्रह्मकाण्डश्च। बृहदारण्यकाख्यो ग्रन्थो ब्रह्मकाण्डस्तव्यतिरिक्तं शतपथब्राह्मणं संहिता चेत्यनयोर्प्रन्थयोः कर्मकाण्डत्वम्, तत्रोभयत्राधानाग्निहोत्रदर्शपूर्णमासादिकर्मण एवं प्रतिपाद्य स्वात्।
यहां पर सायण शतपथब्राह्मण ही नहीं अपितु 'संहिता' में भी 'दर्शपूर्णमासादिकर्मण एवं प्रतिपाद्यत्वात्' इस वचन से केवल दर्शपूर्ण मासादि यज्ञकर्मों का ही प्रतिपादनमात्र मानता है। पाठक विचार करें कि स्कन्द स्वामी की विविध प्रक्रिया, जिसे वह यास्काभिमत मानता है, उपस्थित होने पर भी, सायण 'न हि स्थाणोरपराधो यदेनमन्धो न पश्यति' वा 'पश्यन्नपि न पश्यति' देखता हया भी नहीं देखता, यही तो कहना पड़ेगा। क्या सायण ने स्कन्द स्वामी का भाष्य देखा ही नहीं होगा, यह कभी हो सकता है ? जब कि इस समय भी सैकड़ों वर्ष पीछे सायण की जन्मभूमि दक्षिण प्रान्त में ही स्कन्द की निरुक्तटीका मिली है।
कुछ भी सही, सायण वेदार्थ की दीवार बन गया। इतनी ऊंची और इतनी दृढ़ कि किसी को लांघने का साहस नहीं होता था। पर प्रभू की असीम कृपा से आचार्य दयानन्द उस दीवार को लांघ गए और उनकी कृपा से आज हम शास्त्र के आधार पर लांघ रहे हैं।
◾️(३) सायण ने ऋग्भूमिका में मीमांसा के सिद्धान्तानुसार वेद में अनित्य इतिहास का-व्यक्तिविशेषों के इतिहास का निषेध मान कर वा निषेध करके भी अपने वेदभाष्य में यत्र तत्र सर्वत्र अनित्य व्यक्तियों का इतिहास स्पष्ट दर्शाया है।
◾️(४) देखिए सायण ऋग्भूमिका में -
▪️(क) 🔥’शतं हिमा इत्येतद् व्याख्येयमन्त्रस्य प्रतीकम्, अविशिष्ट तु तस्य तात्पर्यव्याख्यानम्।’
▪️(ख) 🔥'शतपथब्राह्मणस्य मन्त्रव्याख्यानरूपत्वाद् व्याख्येयमन्त्रप्रतिपादकः संहिताग्रन्थः पूर्वभावित्वात प्रथमो भवति॥' (सायणकाण्व भूमिका)
इन दोनों स्थलों में शतपथ को मन्त्र का व्याख्यान मान कर भी 🔥'मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्' (ऋगादिभाष्यभूमिका) की ही रट लगाई है।
इतिहास तथा वेदलक्षण विषय के परस्पर विरोध को देखकर भला कौन थोड़ा-सा ज्ञान रखनेवाला भी सायण की विद्वत्ता का प्रशंसक हो सकता है ? इन विषयों में वास्तव में सायण के मन में सन्देह ही बना रहा, आध्यात्मिक भावना भी नहीं; नहीं तो आचार्य दयानन्द की भांति १८-१८ घण्टे समाधि द्वारा वेदार्थ के इन परमावश्यक मौलिक सिद्धान्तों का निर्णय आत्मा में करता तब लिखता तो ठीक था।
यदि अनिश्चयात्मकता सायण के हृदय में न होती, यथावत् व्यवसायात्मक बुद्धि से वेदभाष्य करता तो संसार का महान् उपकार होता। इस अनिश्चयात्मकता के कारण ही उसके 'तस्मात् सर्वैरपि परमेश्वर एव हूयते। यद्यपि इन्द्रादयस्तत्र तत्र हूयन्ते तथापि परमेश्वर स्यैवेन्द्रादिरूपेणावस्थानाद' …सायण ऋग्भाष्यभूमिका। अर्थात् परमेश्वर के ही इन्द्रादि रूप में होने से यह सब ईश्वर की ही स्तुति है। सायणाचार्य अपनी इस बात पर भी दृढ़ न रह सका। यह बात हम आचार्य दयानन्द में ही पाते हैं। जो बात लिखी निश्चयात्मकता से लिखी। संसार को सन्देह में नहीं डाल गए। किसी विषय पर न लिखा
हो यह दूसरी बात है।
इस प्रकार की अन्य भी अनेक बातें दर्शाई जा सकती हैं, जिनसे प्रत्येक निष्पक्ष विद्वान् को इसी परिणाम पर पहुंचना होगा और हम इस विवेचना से इसी परिणाम पर पहुंचे हैं कि सायण वेद के मौलिक अर्थों तक नहीं पहुंच सका। सायण की हिमालय जैसी ये मौलिक भूलें कदापि क्षन्तव्य नहीं हो सकतीं।
◼️सायण की भूल के दुष्परिणाम -
यह भूल सायण तक ही रह जाती या शताब्दियों तक भारत तक ही यह भूल रह गई होती तब भी कोई बात नहीं थी। इसके परिणाम बड़े भंयकर हुए । यह ठीक है कि महात्मा बुद्ध के काल में भी यज्ञयागादि की इस प्रधानता ने ही बुद्ध जैसे महापुरुष तथा उनके अनुयायियों को यह कहने पर बाधित कर दिया था कि हम ऐसे वेदों को मानने को तत्पर नहीं, जिनमें पशु-हिंसा का विधान हो।
विदेशीय राज्य की रक्षा को लक्ष्य में रखकर या पीछे से भाषाविज्ञान में विशेष जानकारी प्राप्त करने के विचार से संस्कृत भाषा में सामान्यतया और वेद-विषय में विशेषतया लगनेवाले योरूप, अमेरिकादि देशों के अनेक विद्वानों को भी (अन्य कोई वेदार्थ उपलब्ध न होने से) सायण का ही अनुगामी बनना पड़ा और जो-जो सायण के भाष्य में पुरानी मिथ्या बातों वा मिथ्या धारणाओं पर प्रामाणिकता की मोहर लग चुकी थी, उसी के पीछे विदेशी विद्वानों का समूह चला। - ऐतिहासिक वाद के विषय में सायण से पूर्व आचार्य स्कन्दस्वामी का 🔥'एवमाख्यानस्वरूपाणां मन्त्राणां यजमाने नित्येषु च पदार्थेषु योजना कर्त्तव्या। औपचारिकोऽयं मन्त्रेष्वाख्यानसमय:' यह सिदान्त चला आता था। प्रत्येक मन्त्र का तीन प्रकार का अर्थ होता है, यह धारणा परम्परा से स्कन्द के काल तक चली आई थी। सायण ने उनका उल्लेख भी अपने भाष्य में किया होता, तब भी वेदार्थ की मौलिक धारणायें किसी प्रकार जीवित रह जातीं। तब इन विदेशीय स्कालरों को भी वेदार्थ के विषय में सोचने का अवसर होता कि 'आध्यात्मिक और आधिदैविक अर्थ तो अभी शेष है; सायण के भाष्य में ही वेदार्थ की परिसमाप्ति नहीं हो जाती और इतिहास का सारा वर्णन औपचारिक के रूप में है, न कि वास्तविक घटना' तब महान् उपकार होता। विदेशीय विद्वान् हमारी सारी संस्कृति, सभ्यता और साहित्य को उलटे रूप में सबके सामने न रख सकते।
मैं तो कहता हूं कि यदि सायणभाष्य का ही हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू वा अन्य जिस किसी भाषा में अनुवाद करके किन्हीं शिक्षणालयों में रख दिया जावे तो निश्चय ही समझना चाहिये कि कुछ श्रद्धालुओं को छोड़ कर सबकी एक ध्वनि उठेगी कि ये वेद जङ्गलियों की यों ही बड़बड़ाहट या अण्ट-सण्ट कृत्तियां हैं, जिनसे मानव-समाज को कुछ भी लाभ नहीं हो सकता। पञ्जाब यूनिवर्सिटी की शास्त्री परीक्षा में जितना अंश सायण भाष्य का है उससे, सायण की छाप के कारण, शास्त्री प्राय: वेद विमुख ही हो जाते हैं। क्योंकि उन्हें वेद के वास्तविक स्वरूप का तो दर्शन भी नहीं हो पाता। इस सारे अनर्थ का मूल सायणाचार्य वेदार्थ ही है। यहां हम यह भी कह देना चाहते हैं कि ‘मुख्येन व्यपदेश’ नियमानुसार यदि सेना जा रही हो तो भी मुख्यता से यही कहा जाता है कि 'राजा जा रहा है।' इसी प्रकार याज्ञिक प्रक्रिया के अनुसार भाष्य करनेवाले अन्य सभी भाष्यकार इसी कोटि में आ जाते हैं। उनके प्रथम निर्देश की यहाँ आवश्यकता नहीं। सब 'यथा हरिस्तथा हरः' के अनुसार ही समझने चाहिये। सायण का नाम इसलिए भी बार-बार आता है कि वेदों तथा ब्राह्मण ग्रन्थों पर सबसे अधिक भाष्य सायणाचार्य के ही हैं जिनको लेकर आगे लोगों ने अनुवाद किये। सायण के भाष्य को पढकर कोई भी समझदार वेद के उस स्वरूप तक नहीं पहुंच सकता, जो ऋषि मुनि मानते हैं-
🔥'स सर्वोऽभिहितो वेदे, सर्वज्ञानमयो हि सः'
(मनु० २।७४)
🔥अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा।
आदौ वेदमयी दिव्या यतः सर्वाः प्रवृत्तयः ॥
महाभारत शान्तिपर्व अ० २४।२३२॥
वेद समस्त विद्याओं का स्रोत है, सम्पूर्ण ज्ञान वेद से ही मानवसमाज को प्राप्त हुआ। सार्वभौमिक नियमों का प्रतिपादन वेद में है, इत्यादि सब बातें सायणभाष्य को पढ़कर कभी मन में नहीं बैठ सकतीं।
◼️सायण और विदेशीय विद्वान् -
विदेशीय विद्वानों को वेदविषय में सायणभाष्य ही एकमात्र आश्रय मिला। वह उनके अनुकूल निकला, क्योंकि वे तो चाहते ही थे कि भारतीयों को अपनी प्राचीन संस्कृति, सभ्यता और साहित्य के प्रति जितनी अश्रद्धा पैदा करने में हम सफल हो जायेंगे, उतना ही हमारा राज्य भारत में स्थायी दृढ़ होता जायगा। उन्होंने वेद के जो अनुवाद अंग्रेजी में किये, वे सब के सब सायण की छाया से ही किये। यह ठीक है कि इन विदेशीय विद्वानों ने भारतीय न होते हुए भी हमारे संस्कृत साहित्य में, विशेषकर वैदिक साहित्य में, अनुपम प्रशंसनीय तथा अनुकरणीय उद्योग किया। इसके लिये हम उनके अत्यन्त आभारी हैं। निस्सन्देह उन्होंने वैदिक साहित्य में खोज का उपक्रप करके हम भारतीयों के अपने साहित्य की रक्षा का उत्तम मार्ग दर्शा दिया। जिस-जिस का भी किसी विदेशी ने सम्पादन किया है, सर्वसाधारण की दृष्टि निस्सन्देह वह उनके अत्यन्त परिश्रम और निरन्तर धैर्य तथा गम्भीर विवेचना का परिचय देता है। यह दूसरी बात है कि उनका ज्ञान शास्त्र विषय में गहरा नहीं, अपितु बहुत थोड़ा है। अत: जिस विषय में उनका ज्ञान नहीं, उसमें उनसे भूलें रह जाना स्वाभाविक ही है। पर उन जैसा परिश्रम इस पराधीन देश के विद्वानों ने प्रायः नहीं किया वा उनके गुण की ओर ध्यान नहीं दिया, यही कहना पड़ता है। देश की पराधीनता के बन्धन ढीले होने पर आर्यों (हिन्दुओं) को वा कांग्रेस को समझ आ गई तो सम्भव है हमारी वैदिक साहित्य की यह अमूल्य सम्पत्ति फिर से पहले उच्च शिखर पर पहुंच जावे। (पर यह बात अभी कुछ कठिन प्रतीत होती है। प्रायः सब लोग विदेशी संस्कृति, सभ्यता और साहित्य के उपासक हो रहे हैं। यह विष भारत से न जाने कितने लम्बे काल के पश्चात् निकल सकेगा।)
यह सब होते हुए भी हम यह कहे विना नहीं रह सकते कि उनकी भावना अच्छी नहीं थी, जिससे प्रेरित होकर वे हमारे साहित्य की खोज में लगे। अपने इस विचार की पुष्टि में विचारशील महानुभावों के सामने एक ही उदाहरण उपस्थित करना पर्याप्त होगा। मोनियर विलियम्स अपने कोश की भूमिका में लिखता है कि यह संस्कृत-अंग्रेजी डिक्शनरी या संस्कृत-ग्रन्थों के अनुवाद का कार्य, जो मि० बौडन के ट्रस्ट द्वारा हो रहा है, वह सब भारतीयों को ईसाई बनाने में अपने देश (इङ्गलैण्ड) वासियों को सहायता पहुंचाने के लिये है !!! इतने से ही विचारशील महानुभाव समझ सकते हैं कि विदेशियों ने किस ध्येय को लक्ष्य में रखकर हमारे वैदिक साहित्य तथा अन्य संस्कृत साहित्य में इतना घोर परिश्रम किया। सब योरूपीय तथा अन्य देशीय विद्वान् प्रायः इसी धारणा और भावना को लेकर हमारे सारे साहित्य की खोज में लगे, हमारे कल्याण के लिये नहीं, यह दुःख से कहना पड़ता है।
हमें तो यहां यह बतलाना है कि सायण की वेदार्थ विषय की मिथ्या धारणा का कितना दुष्परिणाम हुआआ। सोचने की बात है कि इन विदेशी विद्वानों को यदि सायण की अपेक्षा वेद का उत्तम भाष्य मिला होता, तो निश्चय ही इनके अंग्रेजी वा अन्य योरोपियन भाषाओं में किये अनुवाद अवश्य ही भिन्न होते। अब तो वे सब के सब सायण से आगे नहीं जा सके। एक आध ने थोड़ा बहुत यत्न किया, पर धारणा सुदृढ़ न होने तथा प्रमाण न मिलने से रह गये। कर ही क्या सकते थे ? यदि सायण की मिथ्या धारणा और उसके आधार पर किया वेदार्थ अर्थात् वेदभाष्य न होता तो मैक्समूलर का ऋग्वेदभाष्य पर का लेख तथा ग्रिफिथ के ऋग्, यजुः, साम और अथर्व के अनुवाद, विलसन का ऋग्वेद का अंग्रेजी अनुवाद, लुड्विंग का ऋग्वेद का जर्मनानुवाद तथा ह्विटनो का अथर्ववेद का अंग्रेजी अनुवाद, वैनफी का सामवेद का जर्मनानुवाद, कीथ का तै० संहिता, ऐतरेय और कौषीतकी ब्राह्मण का अनुवाद, हाग का ऐतरेय ब्राह्मण का अनुवाद, ऐगलिङ्ग का शतपथब्राह्मण का अनुवाद - इन सब का स्वरूप अवश्य ही वह न होता, जो अब है। सायण के वेदार्थ ने इन की आंखों पर भी पट्टी बांध दी।
इनसे अतिरिक्त ओल्डनबर्ग ब्लूमफील्ड, आफ्रैख्ट मैकडानल, बोटलिङ्ग आदि ने जो वैदिक साहित्य के भिन्न-भिन्न विषयों पर घोर परिश्रम किया, इसका स्वरूप भी अवश्य ही भिन्न होता। इसी प्रकार काए जी, क्रिस्ते, रियूटर, सोलोमन्स, बर्नेल, नेगलीन आदि श्रौत और गृह्यसूत्र आदि पर परिश्रम करनेवाले विद्वानों का दृष्टिकोण भी अवश्य ही भिन्न होता। इनमें जिनका स्वार्थ इसी बात में था कि भारत की संस्कृति, सभ्यता का निम्नतम स्वरूप ही संसार के सामने आवे और जिन्हें भारतवासियों को भी उनके वास्तविक स्वरूप से अपरिचित रखना ही अभिप्रेत था, उनको छोड़कर बहुत से विद्वान् वेदार्थ के शुद्ध स्वरूप को जान कर अवश्य प्रसन्न होते और भारत के सदा ऋणी रहते !!!
वेदार्थ का सच्चा स्वरूप कभी भी सामने नहीं आ सकता, जब तक सायण के वेदार्थ की भित्ति (दीवार) बीच में खड़ी रहेगी। जो व्यक्ति उस दीवार को लांघ जाएगा, वही सच्चे वेदार्थ का दर्शन कर सकता है, दूसरा नहीं। यहां इस विषय के हमारे सारे कथन का सार यही है कि अन्य सामग्री के अभाव में सायण के कन्धे पर चढ़कर पूर्वोक्त धारणाओं के आश्रय से (उसकी मिथ्या धारणाओं को छोड़कर) हमें दूर की वस्तु देखने में कुछ सहायता भले ही मिले, परन्तु हमें वेदार्थ के लिये सायण से आगे चलना होगा।
[वेदवाणी, वर्ष १, अङ्क १, २]
✍🏻 लेखक -
पदवाक्यप्रमाणज्ञ पण्डित ब्रह्मदत्तजी जिज्ञासु

13/05/2024

माया सभ्यता की भारतीयता और मैक्सिकन
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हमारी प्राचीन साँस्कृतिक धरोहर इतनी समृद्ध थी कि उसने एक समय समस्त विश्व को अपने रंग में रंग लिया था।

इसका पता विभिन्न देशों की संस्कृतियों, वास्तुकलाओं, एवं पुरातत्व अवशेषों के अध्ययन से सहज ही मिल जाता है। अमरीका भी भारतीय संस्कृति से अछूता नहीं था, इसकी जानकारी इतिहासकारों की विभिन्न रचनाओं से मिलती हैं।

कुछ पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार दुनिया के किसी भी भाग से अमेरिका निवासी एशिया आदि से नहीं गये, वरन् उन्होंने स्वयं अपना विकास किया है, किन्तु वर्तमान में भौगोलिक भूगर्भीय पुरातत्व और प्राणिशास्त्र सम्बन्धी खोज इन तर्कों का खंडन करती है। “हाँम्सवर्थ हिस्ट्री ऑफ द वर्ल्ड” नामक संकलन में लिखा है कि ‘उत्तरी अटलाँटिक समुद्र हमेशा से जलमय नहीं था। वहाँ की भूमि पुरातन विश्व से मिली थी और अमेरिका में मनुष्य ने पुरानी दुनिया से ही प्रवेश किया। कोलम्बिया इक्वेडर, पेरु बोलेविया चिली आदि में जो प्रमाण बिखरे पड़े हैं, उससे चलता है कि किसी समय वहाँ की स्थिति सुविकसित देशों जैसी थी। किन्तु यह सभ्यता कहाँ से पहुँची इसका उत्तर उनके धार्मिक विश्वासों उनके चेहरे की बनावट उनके कुशलशिल्प और निर्माणों उनके पूर्वकालिक गमनागमनों से ही मिल जाता है।

अमेरिका की “जॉन होपकिन्स” नामक पत्रिका तथा हाम्सवर्थ हिस्टी ऑफ दि वर्ल्ड एवं उन पर समीक्षा लिखने वाले भारतीय विद्वान श्री उमेशचन्द्र ने अनेक प्रमाण यह सिद्ध करने के लिए प्रस्तुत किये हैं कि प्राचीन भारत और प्राचीन अमेरिका में घनिष्ठ सम्बन्ध था। व्यापारी और धर्मोपदेशक लम्बी जल यात्राएँ करके आते जाते थे। इन्द्र गणेश, अग्नि शिव, सूर्य एवं अन्य देवी-देवता भारत की तरह वहाँ भी पूजे थे। उक्त इतिहासकार बताते हैं कि उस समय अमेरिका एक प्रकार से भारतवर्ष का साँस्कृतिक उपनिवेश था। मैक्सिको में साथ मनाया जाता है, जिसमें राम लीला की झाँकियाँ निकाली जाती हैं भारत की तरह स्मृति रूप में समाधि, स्तूप एवं स्मारक वहाँ भी बनते थे, जिन्हें “टिकल” कहा जाता था। भी बनते थे, जिन्हें “टिकल” कहा जाता था। इसके अतिरिक्त उनके यहाँ वैवस्वत मनु की जलप्लावन की कथा अब भी प्रख्यात है तथा जनश्रुति का एक अंग है।

मेक्सिको के प्राचीन मन्दिर ‘कोपन’ की दीवारों पर हाथी पर सवार की महावत के भित्ति चित्र’ निकल’ में मुण्डधारी शिव की प्रतिमा अनन्त वासुकि, तक्षक सर्प देवताओं की प्रतिमाएँ आदि भारतीय चित्रकला और मूर्तिकला की अमिट छाप हैं। ‘क्वीरिग्वा’ में मिली मिट्टी की प्राचीन प्रतिमाओं में भारतीय शिल्प देखा जा सकता है। टोलो (मैक्सिको) में विशालकाय पाषाण स्तम्भों पर भारतीय देवताओं की प्रतिमाएँ बड़े कलात्मक ढंग से खुदी हुई हैं। कोयून हाण्डुराँस-मध्य अमेरिका ) में दैत्य की मूर्ति भी उसी आकृति में है, जिस प्रकार असुरों का हमारे यहाँ वर्णन पाया जाता है। ‘कपूरगों’ (ग्वालेभाटा) में उपलब्ध शिला प्रतिमाओं में स्पष्टतः भारतीय शिल्प छलकता देखा जा सकता है। जिस प्रकार अनेक स्तम्भों वाले मन्दिर भारत में जहाँ-तहाँ दिख पड़ते हैं, उसी प्रकार ‘यूक्टास’ के ध्वंसावशेष’ थाइजेण्ड कालम्स’ (हजार स्तम्भों ) को देखा जा सकता है। बिना चूने-गारे की सहायता से केवल पत्थरों से बने भवन भारत की विशिष्ट वास्तु कला है। ऐसा ही एक तक्षशिला जैसा ध्वस्त खण्डहर चाको (द अमेरिका) में विद्यमान है। सन् 1927 में तिआहुआन’ (पेरु द अमेरिका ) में पुरातत्व विभाग ने जो खुदाई कराई है, उसमें एक ऐसा शिव त्रिशूल मिला है, जिसकी ऊँचाई 750 फीट है। इसी में 20 टन भारी और 24 फीट लंबा एक शिवलिंग भी है, जिस पर ग्रह नक्षत्रों की अन्तरिक्षीय स्थितियाँ अंकित हैं। एक ही पत्थर से तराशा हुआ 10 टन भारी सूर्य मन्दिर, तीन कतारों में उपलब्ध 47 प्रतिमाएँ भी उस काल की भारतीय कला एवं संस्कृति की साक्षी देती है।

भारत के प्राचीनतम साहित्य में अमेरिका का उल्लेख भी है। ऐतरेय ब्राह्मण के इन्द्र महाभिषेक में अपाच्यों के राजाओं का वर्णन है और कहा गया है कि ये पश्चिम दिशा में है। भूगोल के अनुसार भी मैक्सिको राष्ट्र में अपाच्य नामक मूल निवासी अब तक रहते हैं। महाभारत में लिखा है कि उद्दालक मुनि पाताल में ही निवास करते थे। हाम्स हिस्ट्री ऑफ दि वर्ल्ड’ में लिखा है कि पाताल अमेरिका को ही कहा जाता था। बलि नामक राजा भी पाताल देश में निवास करता था। पाताल देश में राजा बलि की राजधानी दक्षिण अमेरिका में अभी भी बोलीविया नाम से प्रसिद्ध है। अर्जुन की उलूपी नामक एक पत्नी भी इसी मूल की थी और वेदव्यास भी वहाँ कई बार गये थे। इसका उल्लेख स्वामी दयानन्द सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश में भी किया है। भारतीय पौराणिक उल्लेखों और मेक्सिको में प्रचलित “किजक्स” गाथाओं में आश्चर्यजनक साम्य है। विष्णु पुराण में पाताल लोक का और भी अधिक विस्तारपूर्वक वर्णन है और वह अमेरिका की प्राचीन स्थिति पर वैसा ही प्रकाश डालता है जैसा कि पुरातत्त्ववेत्ता बताते हैं’।

विद्वान लेखक चेसली बैटी “अमेरिका बिफोर कोलम्बस” में लिखते हैं कि मेक्सिको नाम माया+कसको पड़ा है, जिसका अर्थ वहाँ के प्राचीन आदिवासियों की भाषा में ‘मय’ का अनुयायी ‘ है। लैली मिचेल द्वारा लिखित ‘काँक्वेस्ट ऑफ दि माया’ ग्रन्थ में मेक्सिको में उपलब्ध ऐसे अनेक प्रमाणों का वर्णन है, जिनसे पुरातन भारत और मैक्सिको की साँस्कृतिक घनिष्ठता सहज ही सिद्ध होती है। बाल्मीकि रामायण में भी “मय” सभ्यता के अनुयायी भारतीयों की चर्चा लगभग उन्हीं शब्दों में की गई हैं।

भारतीयता के प्रभाव की साक्षी देने वाला दक्षिणी अमरीकी राष्ट्र है पेरु। ‘पेरु’ का शब्दार्थ संस्कृत में ‘सूर्य का देश, ‘सूर्य पुत्रों का देश है।’ वस्तुतः “पेरु” नाम रखा ही गया इस कारण कि जब भारत में सूर्य अस्त हो जाता था तब वहाँ दिन का समय होता था। पूर्व में भारत व पश्चिम में पेरु एक दूसरे से इतनी दूर होने के बावजूद साँस्कृतिक रूप से एक दूसरे से अविच्छिन्न रूप से विश्व को भारत के अजस्र अनुदान” में पूरे विश्व में भारतीय संस्कृति के प्रसार-विस्तार का विशद एवं गूढ़ विवेचन किया गया है।

वस्तुतः भारतीय साँस्कृतिक गौरव एक अमूल्य थाती है। यही आलोक पुनः समस्त विश्व में संव्याप्त हो रहा है। कभी जिसे ब्रह्मवर्त कहा जाता था वह ब्रह्मनिष्ठ आत्माओं के समुच्चय से भरा पूरा सारा विश्व ही था।

साभार

22/06/2023

*तत: पदं तत् परिमार्गितव्यं*
*यस्मिन् गता न निवर्तन्ति भूय:।*
*तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये,*
*यत: प्रवृत्ति: प्रसृता पुराणी।।*
(गईतआ- 15/4)

*अन्वय-*
तत: तत् पदं मार्गितव्यं यस्मिन् गता: भूय: न निवर्तन्ति यत: च पुराणी प्रवृत्ति प्रसृता (अस्ति। अहं अपि) तं एव पुरुषं प्रपद्ये।
*अर्थ-*
(तत:) उसके पश्चात उस (पदम्)परम पद को (मार्गितव्यम्) ढूंढना चाहिए (यस्मिन् गता: न निवर्तन्ति भूय:) जहां पर गये हुए फिर वापस नहीं आते। (यत:च) और जिससे (पुराणी प्रवृत्ति: प्रसृता, अस्ति) यह पुरातन सृष्टि चल रही है। (अहं अपि तम् एव पुरुषं प्रपद्ये) मैं (श्रीकृष्ण) भी उसी परम पुरुष की आराधना करता हूं।
*भावार्थ-*
(भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि- यह संसार अव्यय है। सदा से है और सदा ही रहता है। यह अनादि और अनंत है।सत्व,रजस् और तमस् गुणों के संग से यह जीवात्मा इस संसार रूपी वृक्ष के खट्टे-मीठे फलों रस लेने में उलझा रहता है। जीव को चाहिए कि असंग रूपी शस्त्र से/वैराग्य रूपी शस्त्र से काट देना चाहिए।) {पूर्व श्लोकों का सारांश}
*उसके बाद उस परम पद को ढूंढना चाहिए जहां पर गये हुए फिर वापस नहीं आते हैं और जिससे यह पुरातन सृष्टि चल रही है। मैं भी उसी परम पुरुष की आराधना करता हूं।*
*अर्थात् -*
सृष्टि की रचना करने वाले परमात्मा की उपासना करनी चाहिए। परमात्मा के दर्शन प्राप्त करने वाले जीव के जन्म-मरण के बंधन कट जाते हैं। मैं भी उसी परमात्मा की आराधना करता हूं।
~डॉ. नरेन्द्र वेदालंकार

17/06/2023

तैंतीस कोटि देवता
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सारी सृष्टि ही देवमय है। आजकल कुछ लोग कहते हैं कि देवता तैंतीस करोड़ हैं। यह गलत धारणा है। देवताओं की त्रयस्त्रिंशत् कोटि बताई गई हैं। कोटि का अर्थ है-प्रकार। वेद और उपनिषदों में 33 देवताओं का वर्णन है। वें सब प्राकृतिक शक्तियां हैं। जैसे - अग्निर्देवता सूर्यदेवता चंद्रमा देवता... आदि यजुर्वेद का मंत्र भी यही निर्देश करता है। उपनिषदों के अनुसार 8 वसु, 11 रुद्र, 12 आदित्य, इंद्र और प्रजापति यें कुल 33 देवता हैं।
8 वसु- अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी, आकाश, सूरज, चांद और तारे।
11 रुद्र- 10 प्राण और जीवात्मा ही 11 रुद्र हैं।
12 आदित्य- सूर्य की 12 अवस्थाएं ही 12 आदित्य हैं।
इन्द्र- विद्युत और वर्षा की आधायक शक्ति को इंद्र कहते हैं।
प्रजापति - यज्ञो वै प्रजापति:। यज्ञ अर्थात् शुभ कर्मों को ही प्रजापति कहा गया है। इन 33 देवताओं का संयोजन करने वाली शक्ति ही देवाधिदेव परमात्मा है जिसे महादेव कहते हैं।
इन सभी देवताओं के माध्यम से ही सृष्टि की रचना, रख रखाव होता है। इन्हीं से हमारे शरीर का भी निर्माण और संचालन होता है। इनके वास्तविक स्वरूप को जानकर और समझ कर, इनका सदुपयोग करके मनुष्य सुखी जीवन जी सकता है।
~डॉ. नरेन्द्र वेदालंकार

03/06/2023

बौद्ध संगीति (बौद्ध महासभा)
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बौद्ध मत के विकास में चार बौद्ध संगीतियों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। महासभा को ही संगीति कहा गया है। इन संगीतात्मक के माध्यम से समय-समय पर बौद्ध मत में गहन परिवर्तन हुए हैं।
१. प्रथम बौद्ध संगीति महात्मा बुद्ध की मृत्यु के तुरन्त बाद सन् ४८३ ई०पू० में मगध की राजधानी राजगृह (वर्तमान नाम 'राजगीर') में अजातशत्रु के शासन-काल में हुई।संगीति में बुद्ध की शिक्षाओं का संकलन ‘सुत्त और विनय’ नामक पिटकों में हुआ।
२. द्वितीय बौद्ध संगीति महापरिनिर्वाण के १०० वर्ष बाद वर्ष ३८३ ई०पू० में कालाशोक के शासन-काल में वैशाली में हुई। संगीति में यह सैद्धान्तिक परिवर्तन उभरकर आया कि जगत् पूर्णत: क्षणिक नहीं है; अपितु इसके सारभूत अंश अव्यक्त रूप में सदैव विद्यमान रहते हैं।
३. तृतीय बौद्ध संगीति सम्राट् अशोक के शासन-काल में वर्ष २४७ ई०पू० में पाटलिपुत्र में हुई। इसमें अभिधम्म-पिटक तथा कथावत्तु का संकलन हुआ।
४. चतुर्थ बौद्ध संगीति कनिष्क के शासन-काल में १०२ ईसवी में कश्मीर के कुण्डलवन में हुई। इसमें बौद्धमत हीनयान और महायान नाम की दो शाखाओं में विभाजित हो गया। ‘हीनयान’ का शाब्दिक अर्थ ‘निम्न मार्ग’ और ‘महायान’ का ‘उत्कृष्ट मार्ग’ है।
• हीनयान मूल बौद्धमत है। इसमें बुद्ध एक महापुरुष हैं। यें लोग मूर्त्ति-पूजक नहीं हैं और न ही मांस खाते हैं। इस मत के ग्रन्थ पाली भाषा में हैं।
• महायान परिवर्तन एवं सुधारवादी है। इसमें बुद्ध एक देवता हैं। यें लोग बुद्ध की मूर्त्ति की पूजा करते हैं। इनमें मांस पर प्रतिबन्ध नहीं है। इस मत के ग्रन्थ संस्कृत भाषा में हैं।
• महायानी बौद्धों की संख्या अधिक है। चीन, जापान, थाईलैण्ड आदि देशों में भी यही मत प्रचलित है।
आचार्य रूपचन्द्र ‘दीपक’।

28/05/2023

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सिन्धु घाटी की लिपि : क्यों अंग्रेज़ और कम्युनिस्ट इतिहासकार नहीं चाहते थे कि इसे पढ़ाया जाए! 🔰

▪️इतिहासकार अर्नाल्ड जे टायनबी ने कहा था - विश्व के इतिहास में अगर किसी देश के इतिहास के साथ सर्वाधिक छेड़ छाड़ की गयी है, तो वह भारत का इतिहास ही है।

भारतीय इतिहास का प्रारम्भ सिन्धु घाटी की सभ्यता से होता है, इसे हड़प्पा कालीन सभ्यता या सारस्वत सभ्यता भी कहा जाता है। बताया जाता है, कि वर्तमान सिन्धु नदी के तटों पर 3500 BC (ईसा पूर्व) में एक विशाल नगरीय सभ्यता विद्यमान थी। मोहनजोदारो, हड़प्पा, कालीबंगा, लोथल आदि इस सभ्यता के नगर थे।

पहले इस सभ्यता का विस्तार सिंध, पंजाब, राजस्थान और गुजरात आदि बताया जाता था, किन्तु अब इसका विस्तार समूचा भारत, तमिलनाडु से वैशाली बिहार तक, आज का पूरा पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान तथा (पारस) ईरान का हिस्सा तक पाया जाता है। अब इसका समय 7000 BC से भी प्राचीन पाया गया है।

इस प्राचीन सभ्यता की सीलों, टेबलेट्स और बर्तनों पर जो लिखावट पाई जाती है उसे सिन्धु घाटी की लिपि कहा जाता है। इतिहासकारों का दावा है, कि यह लिपि अभी तक अज्ञात है, और पढ़ी नहीं जा सकी। जबकि सिन्धु घाटी की लिपि से समकक्ष और तथाकथित प्राचीन सभी लिपियां जैसे इजिप्ट, चीनी, फोनेशियाई, आर्मेनिक, सुमेरियाई, मेसोपोटामियाई आदि सब पढ़ ली गयी हैं।

आजकल कम्प्यूटरों की सहायता से अक्षरों की आवृत्ति का विश्लेषण कर मार्कोव विधि से प्राचीन भाषा को पढना सरल हो गया है।

सिन्धु घाटी की लिपि को जानबूझ कर नहीं पढ़ा गया और न ही इसको पढने के सार्थक प्रयास किये गए।
भारतीय इतिहास अनुसन्धान परिषद (Indian Council of Historical Research) जिस पर पहले अंग्रेजो और फिर कम्युनिस्टों का कब्ज़ा रहा, ने सिन्धु घाटी की लिपि को पढने की कोई भी विशेष योजना नहीं चलायी।

आखिर ऐसा क्या था सिन्धु घाटी की लिपि में? अंग्रेज और कम्युनिस्ट इतिहासकार क्यों नहीं चाहते थे, कि सिन्धु घाटी की लिपि को पढ़ा जाए?

अंग्रेज और कम्युनिस्ट इतिहासकारों की नज़रों में सिन्धु घाटी की लिपि को पढने में निम्नलिखित खतरे थे -

1. सिन्धु घाटी की लिपि को पढने के बाद उसकी प्राचीनता और अधिक पुरानी सिद्ध हो जायेगी। इजिप्ट, चीनी, रोमन, ग्रीक, आर्मेनिक, सुमेरियाई, मेसोपोटामियाई से भी पुरानी. जिससे पता चलेगा, कि यह विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता है। भारत का महत्व बढेगा जो अंग्रेज और कम्युनिस्ट इतिहासकारों को बर्दाश्त नहीं होगा।
2. सिन्धु घाटी की लिपि को पढने से अगर वह वैदिक सभ्यता साबित हो गयी तो अंग्रेजो और कम्युनिस्टों द्वारा फैलाये गए आर्य- द्रविड़ युद्ध वाले प्रोपगंडा के ध्वस्त हो जाने का डर है।

3. अंग्रेज और कम्युनिस्ट इतिहासकारों द्वारा दुष्प्रचारित ‘आर्य बाहर से आई हुई आक्रमणकारी जाति है और इसने यहाँ के मूल निवासियों अर्थात सिन्धु घाटी के लोगों को मार डाला व भगा दिया और उनकी महान सभ्यता नष्ट कर दी। वे लोग ही जंगलों में छुप गए, दक्षिण भारतीय (द्रविड़) बन गए, शूद्र व आदिवासी बन गए’, आदि आदि गलत साबित हो जायेगा।

कुछ फर्जी इतिहासकार सिन्धु घाटी की लिपि को सुमेरियन भाषा से जोड़ कर पढने का प्रयास करते रहे तो कुछ इजिप्शियन भाषा से, कुछ चीनी भाषा से, कुछ इनको मुंडा आदिवासियों की भाषा, और तो और, कुछ इनको ईस्टर द्वीप के आदिवासियों की भाषा से जोड़ कर पढने का प्रयास करते रहे। ये सारे प्रयास असफल साबित हुए।

सिन्धु घाटी की लिपि को पढने में निम्लिखित समस्याए बताई जाती है -
सभी लिपियों में अक्षर कम होते है, जैसे अंग्रेजी में 26, देवनागरी में 52 आदि, मगर सिन्धु घाटी की लिपि में लगभग 400 अक्षर चिन्ह हैं। सिन्धु घाटी की लिपि को पढने में यह कठिनाई आती है, कि इसका काल 7000 BC से 1500 BC तक का है, जिसमे लिपि में अनेक परिवर्तन हुए साथ ही लिपि में स्टाइलिश वेरिएशन बहुत पाया जाता है। लेखक ने लोथल और कालीबंगा में सिन्धु घाटी व हड़प्पा कालीन अनेक पुरातात्विक साक्षों का अवलोकन किया।

भारत की प्राचीनतम लिपियों में से एक लिपि है जिसे ब्राह्मी लिपि कहा जाता है। इस लिपि से ही भारत की अन्य भाषाओँ की लिपियां बनी। यह लिपि वैदिक काल से गुप्त काल तक उत्तर पश्चिमी भारत में उपयोग की जाती थी। संस्कृत, पाली, प्राकृत के अनेक ग्रन्थ ब्राह्मी लिपि में प्राप्त होते है।

सम्राट अशोक ने अपने धम्म का प्रचार प्रसार करने के लिए ब्राह्मी लिपि को अपनाया। सम्राट अशोक के स्तम्भ और शिलालेख ब्राह्मी लिपि में लिखे गए और सम्पूर्ण भारत में लगाये गए।

सिन्धु घाटी की लिपि और ब्राह्मी लिपि में अनेक आश्चर्यजनक समानताएं है। साथ ही ब्राह्मी और तमिल लिपि का भी पारस्परिक सम्बन्ध है। इस आधार पर सिन्धु घाटी की लिपि को पढने का सार्थक प्रयास सुभाष काक और इरावाथम महादेवन ने किया।

सिन्धु घाटी की लिपि के लगभग 400 अक्षर के बारे में यह माना जाता है, कि इनमे कुछ वर्णमाला (स्वर व्यंजन मात्रा संख्या), कुछ यौगिक अक्षर और शेष चित्रलिपि हैं। अर्थात यह भाषा अक्षर और चित्रलिपि का संकलन समूह है। विश्व में कोई भी भाषा इतनी सशक्त और समृद्ध नहीं जितनी सिन्धु घाटी की भाषा।

बाएं लिखी जाती है, उसी प्रकार ब्राह्मी लिपि भी दाएं से बाएं लिखी जाती है। सिन्धु घाटी की लिपि के लगभग 3000 टेक्स्ट प्राप्त हैं।

इनमे वैसे तो 400 अक्षर चिन्ह हैं, लेकिन 39 अक्षरों का प्रयोग 80 प्रतिशत बार हुआ है। और ब्राह्मी लिपि में 45 अक्षर है। अब हम इन 39 अक्षरों को ब्राह्मी लिपि के 45 अक्षरों के साथ समानता के आधार पर मैपिंग कर सकते हैं और उनकी ध्वनि पता लगा सकते हैं।

ब्राह्मी लिपि के आधार पर सिन्धु घाटी की लिपि पढने पर सभी संस्कृत के शब्द आते है जैसे - श्री, अगस्त्य, मृग, हस्ती, वरुण, क्षमा, कामदेव, महादेव, कामधेनु, मूषिका, पग, पंच मशक, पितृ, अग्नि, सिन्धु, पुरम, गृह, यज्ञ, इंद्र, मित्र आदि।

निष्कर्ष यह है कि -
1. सिन्धु घाटी की लिपि ब्राह्मी लिपि की पूर्वज लिपि है।
2. सिन्धु घाटी की लिपि को ब्राह्मी के आधार पर पढ़ा जा सकता है।
3. उस काल में संस्कृत भाषा थी जिसे सिन्धु घाटी की लिपि में लिखा गया था।
4. सिन्धु घाटी के लोग वैदिक धर्म और संस्कृति मानते थे।
5. वैदिक धर्म अत्यंत प्राचीन है।
हिन्दू सभ्यता विश्व की सबसे प्राचीन व मूल सभ्यता है, हिन्दुओं का मूल निवास सप्त सैन्धव प्रदेश (सिन्धु सरस्वती क्षेत्र) था जिसका विस्तार ईरान से सम्पूर्ण भारत देश था।वैदिक धर्म को मानने वाले कहीं बाहर से नहीं आये थे और न ही वे आक्रमणकारी थे। आर्य - द्रविड़ जैसी कोई भी दो पृथक जातियाँ नहीं थीं जिनमे परस्पर युद्ध हुआ हो।

जय श्रीराम 🚩
जय हिंदुराष्ट्र भारत।।
विवेकानंद विनय

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