Baglamukhi Astrology

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23/01/2026

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सारे कष्ट भाग जाएंगे उलटे पैर बस सुनो ये हनुमान चालीसा #हनुमानचालीसा ...

30/04/2024
06/01/2023

केतु खराब होने पर जाने ये सब बाते

विशिष्ठ देवताओं की पूजा का प्रभाव उनकी संबंधित ऊर्जा केमाध्यम से पूजा करने वाले व्यक्ति के लिए तदोनुसार फलता है। विशेष रूप से संबंधित ग्रह द्वारा धारण किए गए भाव के अनुसार ब्रह्मांडीय ऊर्जा जो हम हमेशा प्राप्त करते हैं उसमें अलग-अलग खगोलीय पिंडों से आ रही ऊर्जा शामिल होती है।
जब हम बार-बार किसी मंत्र का उच्चारण करते हैं तो हम किसी खास फ्रीक्वेंसी से तालमेल बैठाते हैं और यह फ्रीक्वेंसी ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ संपर्क कर उसे हमारे शरीर केभीतर और आसपास खींचती है।
नवग्रह में केतु एक ऐसा गृह है, जो संसार का सार है। मोक्ष का दाता है। केतु आकाशीय सार्वभौमिक, ऊर्जा के संचारक है।
अश्वनी, मघा, मूल नक्षत्रों के अधिपति है। इन नक्षत्रों में जन्मे जातकों पर मूल पड़ते हैं। अतः इन्हें मूल की शांति निश्चित रूप से कराना चाहिए।
अश्वनी नक्षत्र में जन्म हो, तो दवा दान एवं मरीज़ों कि सेवा करें। हरेक रविवार को ताजी औषधि का रस एक चम्मच चढासने से इनका भाग्योदय होता है।
मघा में जन्म हो, तो ककील पितृ-पूर्वजों का स्मरण, सेवा करें।
मूल में जन्म होने पर परम्त्यों शिवभक्त दैत्य-राक्षसों रावण,हिरणकश्यप आदि का स्मरण करें। मूल नक्षत्र के अधिदेवता दैत्य हैं।
प्रत्येक ग्रह के गुण स्थूल जगत और सुक्ष्म जगत वाले ब्रह्मांड की ध्रुवाभिसारिता के समग्र संतुलन के बनाए रखने में मदद करते हैं।
केतु का करें दान, तो पाएंगे धन और सम्मान…केतु कुंडली में खराब अवस्था में हो, तो ऐसे जातक को प्रत्येक मंगलवार किसी गुरुद्वारे में 5 लोगों के लिए कढ़ी का सामान बेसन, दही, सभी मसाले, कढ़ीपत्ता आदि 17 मङ्गल तक का दान करना चाहिए।
Rahukey oil का दीपक रोज घर में जलाएं
यह उपाय सन्तति की कमी या बच्चे नहीं होना,बच्चों की उन्नति में बाधा हो, गृहकलेश हो, पत्नी से तालमेल बिगड़ा हो, काम में मन न लगता हो, उच्चाटन की समस्या हो तो यह मंगलदान विशेष चमत्कारी रूप फलप्रद है।
सूर्य केंद्र में, चन्द्र सूर्य के दक्षिण पूर्व में (आग्नेय), मंगल सूर्य केदक्षिण में, बुध सूर्य केउत्तर पूर्व (इर्शान कोण), बृहस्पति सूर्य केउत्तर में, शुक्र सूर्य केपूर्व में, शनि सूर्य केपश्चिम में, राहु सूर्य के दक्षिण-पश्चिम में (नैऋत्य) और केतु सूर्य के उत्तर-पश्चिम में (वायव्य) में स्थित होते हैं। इनमें किसी भी देवता का मुख एक दूसरे की तरफ नहीं होता।
केतु ओर सूर्य दोनों की महादशाएं बहुत ही कष्टकाल दायक होती हैं। सूर्य आत्मा का कारक होने आत्मा को दुःख पहुँचाचाते हैं और केतु पितरों के रक्षक होने से केतु की महादशा में पीड़ित पितृ महान परेशानी दायक हैं।

17/11/2022

जानिए क्या है पंचक?
ज्योतिष पांच नक्षत्रों की कालावधि पंचक कहलाती है। यानी चंद्र ग्रह का धनिष्ठा नक्षत्र के तृतीय चरण और शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद तथा रेवती नक्षत्र के चारों चरणों में भ्रमण काल पंचक होता है। मान्यता है कि इनमें संपादित अशुभ कर्मों का पांच बार दोहराव होता है। खगोल विज्ञान की दृष्टि से समझें तो 360 अंशों वाले भचक्र में पृथ्वी जब 300 डिग्री से 360 डिग्री के मध्य भ्रमण की अवधि को पंचक काल कहते हैं, तब धरती पर चंद्रमा का प्रभाव अत्यधिक होता।
ज्योतिष के अनुसार, पंचक काल में 5 कार्य ऐसे होते हैं, जो निषेध बताए गए हैं। मान्यता है कि अगर आप इस दिन लकड़ी खरीदते हैं तो अग्नि का भय रहता है।
निषेध कार्य
1. लकड़ी खरीदना, 2. घर पर छत का निर्माण, 3. शव जलाना, 4. शय्या का निर्माण 5. दक्षिण की यात्रा।

1. पंचक के प्रकार
2. ज्योतिष के अनुसार, हर दिन पड़ने वाले पंचक काल का प्रभाव अलग होता है। कौन सा पंचक क्या प्रभाव देगा, यह इस हिसाब से शुरू होता है कि पंचक की शुरुआत किस दिन से हुई है।
1. रविवार का पंचक रोग पंचक कहलाता है।
2. सोमवार के पंचक को राज पंचक कहते हैं।
3. मंगलवार का पंचक अग्नि पंचक होता है।
4. बुधवार और गुरुवार की पंचक दोषमुक्त हैं।
5. शुक्रवार पंचक चोर पंचक कहलाता है।
6. शनिवार को पड़ने वाला पंचक मृत्यु पंचक है।

पंचक काल में मृत्यु होने पर
पंचक काल में मृत्यु होना शुभ नहीं माना जाता। मान्यता है कि ऐसा करने से परिवार, कुल या रिश्तेदारी बड़ी जन हानि की आशंका बनी रहती है। इस बचने के लिए मृतक व्यक्ति के अंतिम संस्कार करते समय कुशा का एक पुतला बनाकर उसका भी मृतक के साथ दाह संस्कार करने का विधान है।

26/07/2022

व्यापार का घाटा कैसे करे खत्म

व्यवसाय करने वाले व्यक्तियों के सामने व्यवसाय न चलने की समस्या आए दिन आते रहती हैं। परिश्रम के साथ-साथ प्रत्येक व्यवसाय में ईमानदारी भी बहुत आवश्यक है। अचानक व्यवसाय में घाटा आने लगे तो बड़ी चिंता का का विषय है। यहां हम कुछ ऐसे टोटकों के बारे में बताया जा रहा है कि जिनके उपाय से आप दोष मुक्त हो सकते है। संबंधित दोषों की समाप्ति के बाद व्यवसाय भी पहले जैसा तेजी से चलने लगता है।

ये हैं उपाय
- कपूर और कुंकुम मिलाकर जलाएं तथा दीपावली के दिन उसकी भस्म को कागज में बांधकर पुड़िया गल्ले में रखें, तो व्यवसाय पर से नजर दोष हट जाता है।
-दुकान पर पहले ग्राहक को कभी भी वापस न जाने दें, चाहे उस समय आप सफाई कर रहे हों या पूजा। पहला ग्राहक यदि कम लाभ भी देता है तब भी कोशिश करें कि उसे खाली हाथ न जाने दें।
-कोई स्थायी ग्राहक यदि दूसरी जगह जा रहा हो तथा वह अन्य जगह से कार्य कराना चाहता है अथवा माल खरीदना चाहता है तो गेंदे का फूल पीसकर माथे पर तिलक लगाकर उस व्यक्ति से बात करें। वह ग्राहक आपका ही बना रहेगा, आपसे ही कार्य करवाएगा तथा आपसे ही सामान खरीदेगा।
-प्रत्येक मंगलवार को पीपल के 11 पत्ते लें, उनपर लाल चंदन से प्रत्येक पत्ते पर राम-राम लिखें। इसके बाद हनुमान जी के मंदिर में चढ़ा दें। व्यवसाय में कभी असफल नहीं होंगे। इस क्रिया को निरंतर एवं गोपनीय रखें। आप क्या करते हैं, यह किसी सार्वजनिक स्थान या सार्वजनिक व्यक्ति या रिश्तेदारी में उजागर न करें। गोपनीय क्रिया का फल स्वत: प्राप्त हो जाएगा।

-प्रत्येक सोमवार को 11 बिल्वपत्र लें तथा उस पर केसर से ऊं नम: शिवाय लिखकर भगवान शिव को निम्नलिखित मंत्र बोलते हुए चढ़ाएं। इससे व्यवसायिक आपदा दूर हो जाएगी। इसे क्रिया को सिर्फ 16 सोमवार तक करें।
त्रिदलं त्रिगुणकारं त्रिनेत्रं च त्रयायुधम्।
त्रिजन्म पाप संहारं एक बिल्व शिवार्पणम्।।

-व्यापार में माल खरीदने जाते समय व्यापारियों को चाहिए कि वह प्रस्थान से पूर्व इक्कीस रुपये किसी गुप्त स्थान पर रखकर जाएं और यात्रा सो वापस आने से पश्चात वह इक्कीस रुपये लेकर किसी साधु या फकीर अथवा पंडित आदि को खाना खिला दें। यात्रा सफल होगी।

25/07/2022

गजकेसरी योग क्या होता है? क्या आप ऐसे कुछ लोगों का नाम बता सकते हैं जिनके जीवन में गजकेसरी योग हुआ है।
गजकेसरी योग क्या होता है?

चंद्रमा से 1,4,7,10 भावों में गुरु की स्थिति गजकेसरी योग का मूल आधार है।

अर्थात अगर चंद्रमा के साथ या चंद्रमा से चतुर्थ भाव मे या चंद्रमा के ठीक सामने सप्तम भाव मे या चंद्रमा से दशम भाव मे देवगुरु बृहस्पति हो तो ये गजकेसरी योग है।

किन्तु मित्रो अगर ये एक लाइन में समझ आने वाली बात होती तो क्या बात थी!

आइए सर्वसाधारण को समझ मे आने वाली सरल भाषा मे समझते है हम।

हमारे ज्योतिष शास्त्र में सर्वाधिक शुभ ग्रह है देवगुरु बृहस्पति, जिन्हें हम आम भाषा मे गुरु कहते है।

और हमारे ज्योतिष शास्त्र में व्यक्ति के मन के कारक है चंद्रमा।

जब हमारे मन जो है चंद्रमा, उसको जब साथ मिलता है देवगुरु बृहस्पति की सर्वाधिक शुभता का, तब व्यक्ति एक हाथी जैसा आत्मविश्वासी और एक केसरी (सिंह) जैसे साहसी हो जाता है।

आपलोग स्वयं विचार करे की हाथी की ज़बरदस्त ताकत और सिंह की गजब की आक्रामकता किसी व्यक्ति में प्रवेश कर जाए तो कितना डेडली कॉम्बिनेशन बनेगा ये!

ये हो जाएगा "मन बलवान लागे चट्टान रहे मैदान में आगे…दबंग दबंग दबंग"

ऐसा व्यक्ति तो झोंपड़ी में जन्म लेकर भी अपने उत्ताल प्रयत्नों और साहस के द्वारा राजा बन जायेगा जिसके राजभवन के आगे सहस्त्रों सफेद गज (हाथी) और रथों के साथ कई सारे अश्व (घोड़े) बंधे रहेंगे।

गजकेसरी योग का यह फल है!

ये मैं नही कह रहा, ये सारावली, जातक पारिजात, फलदीपिका जैसे प्राचीन ज्योतिष ग्रंथ डिंडिम घोष करके कह रहे है।.

इस गजकेसरी योग की सिम्पल सी लॉजिकल व्याख्या भी आप सुन लीजिए।

आपने आपके जीवन मे ऐसे सैंकड़ो व्यक्ति देखे होंगे जिनके पास हुनर है, कला है, बुद्धि है, धन-संपदा है, शक्ति भी है पर उनका जो मन है ना वो इतना दुर्बल है इतना कमजोर है की कभी भी जीवन मे वो सफलता वो आकाशीय ऊँचाई नही छू पाते जितनी उनमें क्षमता है काबिलियत है।

और जिसका मन मज़बूत है वो तो सामान्य कद काठी का व्यक्ति भी बलिष्ठ पहलवान की आँखों मे आँखे डालकर बात करेगा और अपने मन की शक्ति से बलवान से बलवान रुकावट को भी ध्वंसत कर देगा।

कितनी बार सुना है ना हमने: "मन के हारे हार है और मन के जीते जीत!"

किन्तु मित्रो! अगर शास्त्र के इस नियम को प्रमाण माने तो आज भारत के 130 करोड़ लोगों में से कम से कम 30 करोड़ लोग अपनी जन्मपत्रिका में इतना महान गजकेसरी योग लिए घूम रहे है और यदा कदा कहते मिल जाएंगे..

"कुछ नही होता ये योग वोग! सब ढकोसला है! काहे का गजकेसरी भैया! हम आज साईकल से आना जाना कर रहे है!"

ठीक है बिल्कुल सही बात है! तार्किकों के लिए सबसे अच्छा पॉइंट है ज्योतिष शास्त्र पर कीचड़ उछालने का।

पर रुकिए बंधुवर…

जैसे आधा किलो घी का प्रतिदिन सेवन एक कसरती पहलवान के लिए तो अमृत है उसके शरीर के लिए स्वर्ग है पर वही आधा किलो घी जनसामान्य एक भी दिन पी ले तो चार दिन उल्टी-दस्त से बेहाल तो पक्का रहेगा।

वैसे ही देवगुरु बृहस्पति सबसे शुभ ग्रह है माना किन्तु क्या सभी के सभी प्राणियों के लिए एक जैसे ही शुभ ही शुभ है?

नही है!

पौराणिक आख्यानों में आपने देवगुरु बृहस्पति और दैत्यगुरु शुक्राचार्य के वैर विरोधों के बारे में कई बार पढ़ा होगा ना। ये वही गुरु और शुक्र है जो सौरमण्डल में भी आपस मे परम शत्रु है।

इसका क्या मतलब गजकेसरी योग के संदर्भ में?

इसका ये मतलब की शुक्र के आधिपत्य वाले दोनों लग्न: वृषभ एवं तुला के लिए गुरु सबसे अधिक कष्टकारी है पीड़ा देने वाले ग्रह है।

वृषभ लग्न में तो गुरु मृत्यु भाव के स्वामी है जो जेल,पराजय, बंधन, भयानक कष्ट को द्योतित करते है और तुला लग्न में रोग भाव के स्वामी है जो शत्रुपीडा, षड्यंत्र, चोट-घाव,ऋण को द्योतित करते है।

अब आप ही बताइए कि इन दोनों लग्नो में बना गजकेसरी योग फिर कैसे किसी को राजा बना सकता है!

गजकेसरी योग अपने साथ मे एक गूढ़ नियम लेकर आता है और वो नियम है कि गुरु अगर संबंधित लग्न के लिए परम शुभफलदायक हो तभी गजकेसरी योग वास्तव में चरितार्थ है।

इस नियम के हिसाब से दो लग्नों के लिए गजकेसरी योग निर्बाध प्रचंड राजयोगकारक है।

वृश्चिक लग्न जहाँ गुरु परम शुभ धन भाव के स्वामी है एवं मान-सम्मान-पदप्राप्ति के पंचम भाव के भी स्वामी है, चंद्रमा भी यहाँ सबसे शुभ नवम भाग्य भाव के स्वामी होकर सोने पर सुहागा है।
मीन लग्न जहाँ गुरु लग्नेश ही है और राज्य भाव के स्वामी होकर बड़ी अधिकार प्राप्ति देने में सक्षम है, चंद्रमा यहाँ परम शुभ पंचम भाव के स्वामी है जो धन एवं पद दोनों दिलवाने में सक्षम है, यहाँ भी सोने पर सुहागा।
इसके अलावा कर्क लग्न एवं मेष लग्न के लिए बहुत शुभ प्रभाव, सिंह लग्न, मिथुन लग्न, कन्या लग्न एवं मकर लग्न के लिए सामान्य शुभ प्रभाव, धनु लग्न एवं कुम्भ लग्न के लिए कुछ शुभ प्रभाव तथा तुला-वृषभ के लिए गजकेसरी योग वास्तव में प्रभावहीन ही है।

अब देखिए हम सीधे सीधे एक ऐसे जगप्रसिद्ध व्यक्ति की जन्मपत्रिका देखते है जिसमे गजकेसरी योग के फलीभूत होने की समस्त शर्ते 100/100 पूरी हो रही है।

वृश्चिक लग्न है एवं चंद्रमा नवम भाव भाग्य भाव मे अपनी ही कर्क राशि मे स्थित है।
चंद्रमा से ठीक सामने सप्तम भाव से गुरु अपनी अमृत दृष्टि द्वारा एक प्रचंड गजकेसरी योग बना रहे है।
गजकेसरी योग के साथ ही साथ ये दो सबसे शुभ भावों के स्वामियों का योग है: भाग्य भाव के स्वामी नवमेश चंद्रमा एवं बुद्धि भाव के स्वामी पंचमेश गुरु का। यह एक असाधारण पाराशरीय राजयोग भी है।

25/07/2022

बुधादित्य अर्थात बुध + आदित्य (सूर्य) इसका मतलब है जब भी बुध और सूर्य एक साथ होंगे ये योग बनेगा . यह योग धन,बुद्धि, पद और सम्मान दिलाता है. वैदिक ज्योतिष के शुभ योगों में इस योग की बहुत अधिक चर्चा होती है. इस शुभ योग के प्रभाव से जातक बुद्धिमान होता है और उसके जीवन में धन की कमी नहीं होती है. बुध बुद्धि देने वाला ग्रह है और सूर्य सफलता,यश,आत्मबल और अच्छा स्वास्थ्य देनेवाला ग्रह है. यदि ये दोनों एक साथ आ जाएँ और शुभ स्तिथि में हों तो निश्चय ही जातक को इससे बहुत लाभ होता है.

ये शुभ योग बहुत सारी कुंडली में उपस्तिथ होता है लेकिन सबको इससे वो लाभ प्राप्त नहीं होता है जिसके लिए ये जाना जाता है. इसके प्रभाव को समझने के लिए उनदोनों के बीच की अंशात्मक दुरी महत्वपूर्ण हो जाती है. यदि जातक की कुंडली में ये दोनों ही मजबूत हों तो उससे बहुत अधिक लाभ होता है. दोनों ग्रह की महादशा अन्तर्दशा में इससे अधिक लाभ होता है.

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