Gopal Mandir

Gopal Mandir gopal mandir situated in new delhi.

27/05/2026
19/05/2026

भोजन करने का शास्त्रिय विधान व
स्त्री के साथ भोजन करने का कोई प्रायश्चित नहीं ।
===========================
■ जो व्यक्ति स्त्री के भोजन किये हुए जुठे पात्र में भोजन करता है -- स्त्री का झूठा खाता है तथा स्त्री के साथ एक पात्र में भोजन करता है वह मानो मदिरा पान करता है -- तत्वदर्शी मुनियों ने उस पाप से छूटने का कोई प्रायश्चित ही नहीं देखा है ।
= स्त्रीपात्रभुङ्नरः पापः स्त्रीणामुच्छिष्टभुक्तथा ।
तया सह च यो भुङ्क्ते स भुङ्क्ते मद्यमेव हि ।।
न तस्य निष्कृतिर्दृष्टा मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः।।

● यदि पानी पीते - पीते उसकी बूँद मुँह से निकल कर भोजन पर गिर पडे तो वह खाने योग्य नहीं रह जाता -- जो उसे खा लेता है -- उस पुरुष को चान्द्रायण व्रत का आचरण करना चाहिए ।

● जिस भोजन में बाल या कोई कीडा पडा हो -- जिसे मुँह से फूँककर ठंडा किया गया हो -- उसको अखाद्य समझना चाहिए -- ऐसे अन्न को भोजन कर लेने पर चान्द्रायण व्रत का आचरण करना चाहिए ।

● भोजन करने के स्थान से उठ जाने के बाद जिसे छू दिया गया हो -- जो पैर से छू गया हो या लाँघ दिया गया हो -- वह राक्षस का खाने योग्य अन्न है -- ऐसा समझकर उसका त्याग कर देना चाहिए ।

● यदि आचमन किये बिना ही भोजन करने वाला द्विज भोजन के आसन से उठ जाये तो उसे तुरंत स्नान करना चाहिए -- अन्यथा वह अपवित्र हो जाता है ।

[ महाभारत आश्वमेधिकपर्व के वैष्णवधर्मपर्व से ]

18/05/2026

भोजन करने का शास्त्रिय विधान व
स्त्री के साथ भोजन करने का कोई प्रायश्चित नहीं ।
================================

● द्विज पैर धोकर -- पूर्वाभिमुख होकर -- दोनों पैर या एक पैर पृथ्वी पर रखते हुए भोजन के लिए आसन पर बैठे ।
= आर्द्रपादस्तु भुञ्जीयात् प्राङ्मुखश्चासने शुचौ ।
पादाभ्याम् धरणीं स्पृष्टवा पादेनैकेन वा पुनः ।।

● एक वस्त्र पहनकर तथा सारे शरीर को कपडे से ढककर भी भोजन न करें -- उल्टी पत्तल पर भी भोजन करने का निषेध है ।

● भोजन करते समय दृष्टि इधर-उधर न डालें - दृष्टि भोजन पर रहे -- और अन्न को नमस्कार करें -- परोसे हुए अन्न की निन्दा न करें -- क्योंकि जिस अन्न की निन्दा की जाती है उस अन्न को राक्षस खाते हैं
" जुगुप्सितं च यच्चान्नं राक्षसा एव भुञ्जते। "
● हाथ में जल लेकर उससे अन्न की प्रदक्षिणा कर आचमन करें -- फिर ' प्राणाय स्वाहा ' आदि मंत्रों से पाँच प्राणों को आहुति दें -- ( कारण कि भूख प्राणों को ही लगती है - प्राण वायुरूप हैं - जिससे उन प्राणों और उदरस्थ जठराग्नि में ही यहाँ अन्न का होम किया जाता है -- इससे अन्न के संग्रह - व पकाने आदि के पाप से निवृत्ति हो जाती है ) । और वायु और अग्नि का यजन हो जाता है।
' पञ्च प्राणाहुतीः कुर्यात् समन्त्रं तु पृथक् पृथक् ।
● इसके विपरित भोजन करने वाला मूर्ख ब्राह्मण अन्न के द्वारा असुर - प्रेत और राक्षसों को ही तृप्त करता है ।
= अतोऽन्यथा तु भुञ्जानो ब्राह्मणो ज्ञानदुर्बलः ।
तेनान्नेनासुरान् प्रेतान् राक्षसांस्तर्पयिष्यति ।।

● जो ग्रास मुँह में जाने की अपेक्षा बडा होने कारण एक बार में ना खाया जा सके - उसमें से बचा हुआ ग्रास अपना उच्छिष्ट कहा गया है ।

● ग्रास के बचे हुए तथा मुँह से निकले हुए अन्न को अखाद्य समझें और उसे खा लेने पर चान्द्रायण - व्रत का आचरण करें ।
= पिण्डावशिष्टमन्यच्च वक्त्रान्निस्सृतमेव च।
अभोज्यं तद् विजानीयाद् भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत्।।

● जो अपना झूठा खाता है तथा एक बार खाकर छोडे हुए भोजन को फिर ग्रहण करता है उसको चान्द्रायण -- कृच्छ्र -- अथवा प्राजापत्य - व्रत का आचरण करना चाहिए ।

पिताजी के पुण्य तिथि मे श्राद्ध का लघु दृश्य।
29/04/2026

पिताजी के पुण्य तिथि मे श्राद्ध का लघु दृश्य।

24/04/2026

1. उत्तम पत्नी के 6 प्रमुख गुण (नीतिसार)

कार्येषु दासी, करणेषु मन्त्री, रूपेषु लक्ष्मी, क्षमया धरित्री।
भोज्येषु माता, शयनेषु रम्भा, षट्कर्म युक्ता कुल धर्मपत्नी॥

अर्थ: जो घर के कार्यों में दासी (सेवाभावी) के समान, सलाह देने में मंत्री के समान, रूप-सौंदर्य में लक्ष्मी के समान, क्षमा करने में धरती के समान, भोजन परोसने में माता के समान और शयन में रंभा (अप्सरा) के समान हो—इन छह गुणों से युक्त पत्नी ही उत्तम धर्मपत्नी होती है।

अनुकूलां विमलाङ्गीं कुलजां कुशलां सुशीलसंपन्नाम्।
पञ्चलकारां भार्यां पुरुषः सदा लभेत॥

अर्थ: पुरुष को ऐसी पत्नी मिलनी चाहिए जो अनुकूल (सहयोगी), विमलाङ्गी (स्वच्छ शरीर व मन वाली), कुलजा (सभ्य कुल की), कुशला (कार्यकुशल) और सुशील (अच्छे स्वभाव वाली) हो।

आर्तार्ते मुदिते हृष्टा प्रोषिते मलिना कृशा।
मृते म्रियेत या पत्यौ सा स्त्री ज्ञेया पतिव्रता॥

अर्थ: पति के दुखी होने पर दुखी होने वाली, पति के प्रसन्न होने पर प्रसन्न होने वाली, पति के परदेस जाने पर दुखी (सादे वेश में) रहने वाली और पति की मृत्यु होने पर जो स्वयं भी प्राण त्याग दे (या उसके पीछे सती/समर्पित रहे), ऐसी स्त्री पतिव्रता कही जाती है।

कल्याणभाक् सदा कार्ये सर्वसौभाग्यवर्धिनी।
या खल्वेतादृशी भार्या सा देवी न तु मानुषी॥
अर्थ: जो हमेशा शुभ कार्य करती है और सौभाग्य को बढ़ाती है, ऐसी पत्नी निश्चित रूप से देवी के समान होती है, साधारण मनुष्य नहीं।

Address

Rz C/9 Dabri Ext East
Delhi
110045

Telephone

+919891299417

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Gopal Mandir posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Place Of Worship

Send a message to Gopal Mandir:

Share