Gopal Mandir

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04/10/2026

न धैर्येण विना लक्ष्मीर्नशौर्येण विना जयः।
न ज्ञानेन विना मोक्षो न दानेन विना यशः॥
भावार्थ:-
धैर्यं के विना धन प्राप्त नहीं होती है,पराक्रम के विना युद्ध में विजय नहीं सम्भव है,ज्ञान विना मोक्ष नहीं प्राप्त होती है,और दान के विना यश प्राप्त नहीं होती है!!

01/10/2026
30/09/2026

यच्छाद्धं वीक्षते श्वा वा नारी वाsथ रजस्वला।
पतितो वा वराहो वा तच्श्राद्दं व्यर्थतां व्रजेत्।।
श्राद्ध का अन्न और भोजन मे रजस्वला स्त्री,चाण्डाल और सूअर दृष्टि डालते है , वह श्राद्ध का अन्न (प्रेतान्न)प्रेत ही ग्रहण करते है।पितृ नही।
(स्कन्द-पुराण,नागर०२१७/४३)

28/09/2026

दिवसस्याष्टमे भागे मन्दी भवति भास्करे।
स काल:कुतपो नाम पितृणां दत्तमक्षयम्।।
दिनके आठवें भाग(दोपहर के बाद)में जब संध्या का से पहले सूर्यका ताप घटने लगता है,उस समयका नाम कुतप (पितृ कार्य के लिये उत्तम समय)है उसमें पितरोंके लिये दिया हुआ दान,तर्पण -पिण्ड दान- आदि सभी अक्षय होता है।
(महाभारत,आदि०९३)

27/09/2026

भक्त्या तुष्यन्ति पितरस्तुष्टा: कामान्दिशन्ति ते।
पुत्रं पौत्रं धनं धान्यं कामान्यान्मनसेच्छति।।
भक्त्याचाराधितो दद्यान्नृणां प्रीत: पितामह।
श्राद्धके द्वारा प्रसन्न हुए पितृगण मनुष्यों(श्राद्ध कर्ता)को पुत्र,धन, विद्या,आयु, आरोग्य, लौकिक (संसारिक)सुख,मोक्ष तथा स्वर्ग आदि प्रदान करते है।
( पद्मपुराण, सृष्टि ३४।१२७-१२८)

।तिथि ज्ञान सारिणी।
26/09/2026

।तिथि ज्ञान सारिणी।

18/09/2026

लोभेन बुद्धिश्चलति
लोभो जनयते तृषाम् ।
तृषार्तो दुःखमाप्नोति
परत्रेह च मानवः ॥
भावार्थ:-
लोभ से मन- बुद्धि विचलित हो जाती है, लोभ सरलता से न बुझने वाली तृष्णा रुपी अग्नि को जन्म देता है । जो तृष्णा से ग्रस्त होता है वह दुःख का भागीदार बनता है, इस लोक में और परलोक में भी दुखी रहता है।

16/09/2026

नारायणक्षेत्रमध्ये कर्तव्यञ्च निरूप्येते।
दीक्षां च देवपूजां च जपं गंगातटे चरेत्।।
शुष्कवास: पिधायापि सावित्रीजपमाचरेत्।
श्राद्धञ्च तर्पणं चैव परोपकारकर्म च।।
नारायणक्षेत्र(गंगाके प्रवाहसे सौ हाथ तक, गंगा गर्भक्षेत्रे) में कुछ विशेष करनेका विधान है। दीक्षा,देवपूजा, गायत्री आदि जप, श्राद्ध, तर्पण, परोपकार,द्रव्योत्सर्ग, स्तोत्रपाठ, मौन धारण आदि विशेष फलदायक होते हैं।
( बृ०ध०पु०५४/३२,३३)

14/09/2026

शतहस्तं प्रवाहाद् हि गर्भक्षेत्रमिहोच्यते।
निरूप्येते तत्र वर्ज्यं सावधानमना: श्रृणु।।
हिसां द्वेषं च कलहं मिथ्यावाक्यं प्रतिग्रहताम्।
स्थाननास्थानविकल्पं च अशास्त्रवचनं तथा।।
परान्नभोजनं चैव परद्रव्योपभोजनम्।
शोकं मोहं दुःखचित्तं नास्तिक्यं पापचित्तताम्।।
भिक्षां लिप्सां च चापल्यं परिहासं च वर्जयेत्।
जलान्तरस्पर्शनं च गर्भक्षेत्रे विवर्जयेत्।।
गंगाके प्रवाहसे सौ हाथतक गंगागर्भ माना गया है।इसके अन्तर्गत हिंसा, द्वेष,कलह,असत्यभाषण, प्रतिग्रह,अशास्त्रीयवचन, परान्नभोजन,परद्रव्यग्रहण,शोक,मोह, नास्तिकता, भिक्षा,लालच ,पापवृत्ति,चपलता, परिहास आदि नहीं करना चाहिये।
( बृ.ध.पु.५४/४८/५१)

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