16/01/2026
हज़ार अपराधी छूट जाएँ, एक निर्दोष को सज़ा नहीं | Law, Constitution & Human Rights | Vikas Divyakirti
Video/Audio Credit: Dr.Vikas Divyakirti-(Coaching Head of the Drishti IAS Coaching Institute)..
The credits of these video belongs to Drishti IAS,(This video is made for education purpose only.)
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About the Video
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इस विचारोत्तेजक और गहन व्याख्यान में डॉ. विकास दिव्यकीर्ति भारतीय कानून व्यवस्था, संविधान और मानवाधिकारों के मूल दर्शन को अत्यंत स्पष्ट और तार्किक ढंग से समझाते हैं। वे बताते हैं कि जब भी कानून की बात हो, तो सतही और भावनात्मक प्रतिक्रियाओं से ऊपर उठकर गहराई से सोचना ज़रूरी है। “एनकाउंटर कर दो”, “तुरंत सज़ा दे दो” जैसे नारे सुनने में आसान लगते हैं, लेकिन एक सभ्य समाज के लिए कानून का रास्ता इतना सरल नहीं होता।
डॉ. दिव्यकीर्ति कानून के एक मूल सिद्धांत (Axiom) से बात शुरू करते हैं, जिसे यहूदी दार्शनिक मोज़ेस मेमोनाइड्स से जोड़ा जाता है—
हज़ार अपराधी भले छूट जाएँ, लेकिन एक भी निर्दोष को सज़ा नहीं होनी चाहिए।
यही सिद्धांत आधुनिक लोकतांत्रिक और संवैधानिक कानून व्यवस्था की आत्मा है। वे समझाते हैं कि कानून की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हर अपराधी को सज़ा और हर निर्दोष को न्याय—दोनों एक साथ सुनिश्चित करना व्यवहारिक रूप से असंभव है। इसलिए कानून को दो में से एक रास्ता चुनना पड़ता है।
पहला रास्ता: आरोपी को तब तक निर्दोष मानना, जब तक अपराध सिद्ध न हो।
दूसरा रास्ता: शिकायत होते ही आरोपी को दोषी मान लेना और उससे अपनी बेगुनाही साबित करने को कहना।
डॉ. दिव्यकीर्ति बताते हैं कि दूसरा रास्ता सुनने में भले ही “सख़्त” लगे, लेकिन यह निर्दोष लोगों के लिए बेहद खतरनाक है। इसी कारण भारत सहित दुनिया के सभी सभ्य देशों की कानून व्यवस्था Presumption of Innocence यानी “जब तक साबित न हो, तब तक निर्दोष” के सिद्धांत पर चलती है।
वे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 20(3) को सरल भाषा में समझाते हैं, जिसके अनुसार किसी भी अभियुक्त को अपने ही विरुद्ध गवाही देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। इसी से “Right to Silence” का जन्म होता है। यह अधिकार सिर्फ अपराधी को नहीं, बल्कि हर आम नागरिक को पुलिस की ज्यादती, थर्ड डिग्री और जबरन कबूलनामे से बचाने के लिए है।
इस वीडियो में CRPC की धारा 161 और 164, मजिस्ट्रेट के सामने दिए गए इकबालिया बयान की वैधता, और पुलिस के सामने दिए गए बयान की कानूनी स्थिति को उदाहरणों के साथ स्पष्ट किया गया है। साथ ही नंदिनी सतपथी केस, NHRC गाइडलाइंस, और 2010 के सेल्वी केस के ज़रिए यह समझाया गया है कि नार्को टेस्ट, ब्रेन मैपिंग और पॉलीग्राफ जैसे तरीकों को ज़बरदस्ती क्यों नहीं थोपा जा सकता।
अंत में, डॉ. दिव्यकीर्ति यह स्पष्ट करते हैं कि कानून का उद्देश्य सिर्फ अपराधियों को सज़ा देना नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानसिक निजता की रक्षा करना भी है। यह वीडियो हर उस व्यक्ति के लिए ज़रूरी है जो संविधान, कानून, न्याय और मानवाधिकारों को केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि विवेक और तर्क से समझना चाहता है।
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