Amarnath Yatra

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21/05/2018

Amarnath Yatra 2018
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एक बार देवी पार्वती ने देवों के देव महादेव से पूछा, ऐसा क्यों है कि आप अजर हैं, अमर हैं लेकिन मुझे हर जन्म के बाद नए स्वरूप में आकर, फिर से बरसों तप के बाद आपको प्राप्त करना होता है । जब मुझे आपको पाना है तो मेरी तपस्या और इतनी कठिन परीक्षा क्यों? आपके कंठ में पडी़ नरमुंड माला और अमर होने के रहस्य क्या हैं?

महादेव ने पहले तो देवी पार्वती के उन सवालों का जवाब देना उचित नहीं समझा, लेकिन पत्नीहठ के कारण कुछ गूढ़ रहस्य उन्हें बताने पडे़। शिव महापुराण में मृत्यु से लेकर अजर-अमर तक के कर्इ प्रसंंग हैं, जिनमें एक साधना से जुडी अमरकथा बडी रोचक है। जिसे भक्तजन अमरत्व की कथा के रूप में जानते हैं।

हर वर्ष हिम के आलय (हिमालय) में अमरनाथ, कैलाश और मानसरोवर तीर्थस्थलों में लाखों श्रद्घालु पहुंचते हैं। सैकडों किमी की पैदल यात्रा करते हैं, क्यों? यह विश्वास यूं ही नहीं उपजा। शिव के प्रिय अधिकमास, अथवा आषाढ़ पूर्णिमा से श्रावण मास तक की पूर्णिमा के बीच अमरनाथ की यात्रा भक्तों को खुद से जुडे रहस्यों के कारण और प्रासंगिक लगती है।

पौराणिक मान्याताओं के अनुसार, अमरनाथ की गुफा ही वह स्थान है जहां भगवान शिव ने पार्वती को अमर होने के गुप्त रहस्य बतलाए थे, उस दौरान उन ‘दो ज्योतियों’ के अलवा तीसरा वहां कोर्इ प्राणी नहीं था । न महादेव का नंदी और नही उनका नाग, न सिर पे गंगा और न ही गनपति, कार्तिकेय….!

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20/05/2018

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Amarnath temple – अमरनाथ गुफा एक हिन्दू तीर्थ स्थान है जो भारत के जम्मू कश्मीर में स्थित है। अमरनाथ गुफा जम्मू कश्मीर की...
20/05/2018

Amarnath temple – अमरनाथ गुफा एक हिन्दू तीर्थ स्थान है जो भारत के जम्मू कश्मीर में स्थित है। अमरनाथ गुफा जम्मू कश्मीर की राजधानी श्रीनगर से 3,888 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। हिन्दू धर्म में इस तीर्थ स्थान का काफी महत्त्व है और हिन्दुओ में Amarnath तीर्थ स्थान को सबसे पवित्र भी माना जाता है

इस गुफा के चारो तरफ बर्फीली पहाड़ियाँ है। बल्कि यह गुफा भी ज्यादातर समय पूरी तरह से बर्फ से ढंकी हुई होती है और साल में एक बार इस गुफा को श्रद्धालुओ के लिये खोला भी जाता है। हजारो लोग रोज़ अमरनाथ बाबा के दर्शन के लिये आते है और गुफा के अंदर बनी बाबा बर्फानी को मूर्ति को देखने हर साल लोगो भारी मात्रा में आते है।

इतिहास में इस बात का भी जिक्र किया जाता है की, महान शासक आर्यराजा कश्मीर में बर्फ से बने शिवलिंग की पूजा करते थे। रजतरंगिनी किताब में भी इसे अमरनाथ या अमरेश्वर का नाम दिया गया है। कहा जाता है की 11 वी शताब्दी में रानी सुर्यमठी ने त्रिशूल, बनालिंग और दुसरे पवित चिन्हों को मंदिर में भेट स्वरुप दिये थे। अमरनाथ गुफा की यात्रा की शुरुवात प्रजाभट्ट द्वारा की गयी थी। इसके साथ-साथ इतिहास में इस गुफा को लेकर कयी दुसरे कथाए भी मौजूद है।

कहा जाता है की मध्य कालीन समय के बाद, 15 वी शताब्दी में दोबारा धर्मगुरूओ द्वारा इसे खोजने से पहले लोग इस गुफा को भूलने लगे थे।

इस गुफा से संबंधित एक और कहानी भृगु मुनि की है। बहुत समय पहले, कहा जाता था की कश्मीर की घाटी जलमग्न है और कश्यप मुनि ने कुई नदियों का बहाव किया था। इसीलिए जब पानी सूखने लगा तब सबसे पहले भृगु मुनि ने ही सबसे पहले भगवान अमरनाथ जी के दर्शन किये थे। इसके बाद जब लोगो ने अमरनाथ लिंग के बारे में सुना तब यह लिंग भगवान भोलेनाथ का शिवलिंग कहलाने लगा और अब हर साल लाखो श्रद्धालु भगवान अमरनाथ के दर्शन के लिये आते है।

जम्मू कश्मीर की ददुर्गम वादियों में स्थित अमरनाथ धाम हिन्दू श्र्धलालुयों के लिए काफी महत्व रखता है। चार धाम की तरह भक्तग...
19/05/2018

जम्मू कश्मीर की ददुर्गम वादियों में स्थित अमरनाथ धाम हिन्दू श्र्धलालुयों के लिए काफी महत्व रखता है। चार धाम की तरह भक्तगण इस पूजनीय यात्रा को जीवन में एक बार करने की इच्छा अवश्य रखते हैं। माना जाता है, कि भोले के दरबार में सब भोले की मर्जी से ही पहुंच पाते हैं। हर साल अमरनाथ की यात्रा जून-जुलाई में प्रारम्भ होती है। अमरनाथ की यात्रा बेहद रोमांचक है, क्योंकि यह यात्रा धरती के स्वर्ग के एक ख़ास आनंद से जैसी है। हिमालय की गोदी में स्थित अमरनाथ हिंदुओं का सबसे ज़्यादा आस्था वाला पवित्र तीर्थस्थल है।

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जानें, अमरनाथ यात्रा का महत्व और इससे जुड़े रहस्यश्रीनगर से करीब 145 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है अमरनाथ गुफा जो हिमालय ...
28/12/2017

जानें, अमरनाथ यात्रा का महत्व और इससे जुड़े रहस्य

श्रीनगर से करीब 145 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है अमरनाथ गुफा जो हिमालय पर्वत श्रेणियों में स्थित है। समुद्र तल से 3,978 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह गुफा 160 फुट लम्बी,100 फुट चौड़ी और काफी ऊंची है। अमरनाथ गुफा हिन्दुओं का प्रमुख तीर्थस्‍थल है। प्राचीनकाल में इसे 'अमरेश्वर' कहा जाता था। आगे की स्लाइड्स पर क्लिक करें और जानें क्या है इस यात्रा का महत्व और इससे जुड़े रहस्यों के बारे में-

अमरनाथ की गुफा का महत्व सिर्फ इसलिए नहीं है कि यहां हिम शिवलिंग का निर्माण होता है। इस गुफा का महत्व इसलिए भी है कि इसी गुफा में भगवान शिव ने अपनी पत्नी देवी पार्वती को अमरत्व का मंत्र सुनाया था। ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव साक्षात श्री अमरनाथ गुफा में विराजमान रहते हैं।

भगवान शिव जब पार्वती को अमरकथा सुनाने ले जा रहे थे, तब उन्होंने रास्ते में सबसे पहले पहलगाम में अपने नंदी (बैल) का परित्याग किया। इसके बाद चंदनबाड़ी में अपनी जटा से चंद्रमा को मुक्त किया। शेषनाग नामक झील पर पहुंच कर उन्होंने गले से सर्पों को भी उतार दिया। प्रिय पुत्र श्री गणेश जी को भी उन्होंने महागुणस पर्वत पर छोड़ देने का निश्चय किया। फिर पंचतरणी नामक स्थान पर पहुंच कर भगवान शिव ने पांचों तत्वों का परित्याग किया।

शास्त्रों के अनुसार इसी गुफा में भगवान शिव ने माता पार्वती को अमरत्व का रहस्य बताया था। माता पार्वती के साथ ही इस रहस्य को शुक (तोता) और दो कबूतरों ने भी सुन लिया था। यह शुक बाद में शुकदेव ऋषि के रूप में अमर हो गए, जबकि गुफा में आज भी कई श्रद्धालुओं को कबूतरों का एक जोड़ा दिखाई देता है जिन्हें अमर पक्षी माना जाता है।

पुराणों के अनुसार काशी में दर्शन से दस गुना, प्रयाग से सौ गुना और नैमिषारण्य से हजार गुना पुण्य देने वाले श्री बाबा अमरनाथ का दर्शन है।

अमरनाथ गुफा के अंदर बनने वाला हिम शिवलिंग पक्की बर्फ का बनता है जबकि गुफा के बाहर मीलों तक सर्वत्र कच्ची बर्फ ही देखने को मिलती है। मान्यता यह भी है कि गुफा के ऊपर पर्वत पर श्री राम कुंड है।

श्री अमरनाथ गुफा में स्थित पार्वती पीठ 51 शक्तिपीठों में से एक है। मान्यता है कि यहां भगवती सती का कंठ भाग गिरा था।

किंवदंती के अनुसार रक्षा बंधन की पूर्णिमा के दिन भगवान शंकर स्वयं श्री अमरनाथ गुफा में पधारते हैं। रक्षा बंधन की पूर्णिमा के दिन ही छड़ी मुबारक भी गुफा में बने हिम शिवलिंग के पास स्थापित कर दी जाती है।

ऐसी मान्यता है कि अमरनाथ गुफा के अंदर हिम शिवलिंग के दर्शन मात्र से ही मनुष्य को 23 पवित्र तीर्थों के पुण्य के बराबर पुण्य की प्राप्ति होती है।

ऐसी मान्यता है कि इस गुफा की खोज बूटा मलिक नाम के गड़रिए ने की थी। वह एक दिन भेड़ें चराते-चराते बहुत दूर निकल गया। एक जंगल में पहुंचकर उसकी एक साधू से भेंट हो गई। साधू ने बूटा मलिक को कोयले से भरी एक कांगड़ी दे दी। घर पहुंचकर उसने कोयले की जगह सोना पाया तो वह बहुत हैरान हुआ। उसी समय वह साधू का धन्यवाद करने के लिए गया परन्तु वहां साधू को न पाकर एक विशाल गुफा को देखा। उसी दिन से यह स्थान एक तीर्थ बन गया।

क्‍या है अमरनाथ यात्रा का रहस्य, क्‍यों करें यह यात्रापुराणों में उल्लेख है कि एक बार मां पार्वती ने बड़ी उत्सुकता के सा...
26/12/2017

क्‍या है अमरनाथ यात्रा का रहस्य, क्‍यों करें यह यात्रा

पुराणों में उल्लेख है कि एक बार मां पार्वती ने बड़ी उत्सुकता के साथ देवाधिदेव माहदेव से प्रश्न किया कि ऐसा क्यों होता है कि आप अजर अमर हैं और मुझे हर जन्म के बाद नए स्वरुप में आकर फिर से वर्षों की कठोर तपस्या के बाद आपको प्राप्त करना होता है। जब मुझे आपको ही प्राप्त करना है तो फिर मेरी यह तपस्या और मेरी इतनी कठोर परीक्षा क्यों। आपके कंठ में पड़ी यह नरमुण्ड माला तथा आपके अमर होने का कारण व रहस्य क्या है?

महाकाल ने पहले तो माता को यह गूढ़ रहस्य बताना उचित नहीं समझा परन्तु माता की स्त्री हठ के आगे उनकी एक न चली तब महादेव शिव को मां पार्वती को अपनी साधना की अमर कथा बतानी पड़ी जिसे हम अमरत्व की कथा के रूप में जानते है ।

इसी परम पावन अमरनाथ की गुफा तक अमरनाथ यात्रा हिन्दी मास के आषाढ़ पूर्णिमा से श्रावण मास की पूर्णिमा तक होती है। यह यात्रा लगभग 45 दिन तक चलती है।

भगवान शंकर ने मां पार्वती जी से एकान्त व गुप्त स्थान पर अमर कथा सुनने को कहा जिससे कि इस कथा को कोई भी जीव, व्यक्ति और यहां तक कोई पशु-पक्षी भी न सुन ले। क्योंकि जो कोई भी इस अमर कथा को सुन लेता, वह अमर हो जाता। इस कारण शिव जी पार्वती को लेकर किसी गुप्त स्थान की ओर चल पड़े। सबसे पहले भगवान भोले ने अपनी सवारी नंदी को पहलगाम पर छोड़ दिया, इसीलिए बाबा अमरनाथ की यात्रा पहलगाम से शुरू करने का तात्पर्य या बोध होता है।

आगे चलने पर शिव जी ने अपनी जटाओं से चन्द्रमा को चंदनवाड़ी में अलग कर दिया तथा गंगा जी को पंचतरणी में और कंठाभूषण सर्पों को शेषनाग पर छोड़ दिया, इस प्रकार इस पड़ाव का नाम शेषनाग पड़ा।

आगे की यात्रा में अगला पड़ाव गणेश टॉप पड़ता है, इस स्थान पर बाबा ने अपने पुत्र गणेश को भी छोड़ दिया था, जिसको महागुणा का पर्वत भी कहा जाता है।

पिस्सू घाटी में पिस्सू नामक कीड़े को भी त्याग दिया। इस प्रकार महादेव ने अपने पीछे जीवनदायिनी पांचों तत्वों को भी अपने से अलग कर दिया। इसके बाद मां पार्वती संग एक गुप्त गुफा में प्रवेश कर गये। कोई व्यक्ति, पशु या पक्षी गुफा के अंदर प्रवेश कर अमर कथा को न सुन सके इसलिए शिव जी ने अपने चमत्कार से गुफा के चारों ओर आग प्रज्जवलित कर दी। फिर शिव जी ने जीवन की अमर कथा मां पार्वती को सुनाना शुरू किया।

कथा सुनते-सुनते देवी पार्वती को नींद आ गई और वह सो गईं जिसका शिव जी को पता नहीं चला। भगवन शिव अमर होने की कथा सुनाते रहे इस समय दो सफेद कबूतर शिव जी से कथा सुन रहे थे और बीच-बीच में गूं-गूं की आवाज निकाल रहे थे। शिव जी को लग रहा था कि मां पार्वती कथा सुन रही हैं और बीच-बीच में हुंकार भर रहीं हैं। इस तरह दोनों कबूतरों ने अमर होने की पूरी कथा सुन ली।

कथा समाप्त होने पर शिव का ध्यान पार्वती की ओर गया जो सो रही थीं शिव जी ने सोचा कि पार्वती सो रही हैं तब इसे सुन कौन रहा था। तब महादेव की दृष्टि तब कबूतरों पर पड़ी, महादेव शिव कबूतरों पर क्रोधित हुए और उन्हें मारने के लिए तत्पर हुए इस पर कबूतरों ने शिव जी कहा कि हे प्रभु हमने आपसे अमर होने की कथा सुनी है।

यदि आप हमें मार देंगे तो अमर होने की यह कथा झूठी हो जाएगी इस पर शिव जी ने कबूतरों को जीवित छोड़ दिया और उन्हें आशीर्वाद दिया कि तुम सदैव इस स्थान पर शिव पार्वती के प्रतीक चिन्ह के रूप निवास करोगो ।

अंतत : यह कबूतर का जोड़ा अजर अमर हो गया। माना जाता है कि आज भी इन दोनों कबूतरों का दर्शन भक्तों को यहां प्राप्त होता है । इस तरह से यह गुफा अमर कथा की साक्षी हो गई व इसका नाम अमरनाथ गुफा पड़ा। जहां गुफा के अंदर भगवान शंकर बर्फ के प्रकृति द्वारा निर्मित शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं। पवित्र गुफा में मां पार्वती के अलावा गणेश के भी अलग से बर्फ से निर्मित प्रतिरूपों के भी दर्शन करे जा सकते हैं।

अमरनाथ की पवित्र गुफा की खोज के बारे में पुराणों में भी एक कथा प्रचलित है कि एक बार एक गड़रिये को एक साधू मिला, जिसने उस गड़रिये को कोयले से भरी एक बोरी दी। जिसे गड़रिया अपने कन्धे पर लाद कर अपने घर को चल दिया। घर जाकर उसने बोरी खोली। वह आश्चर्यचकित हुआ, क्योंकि कोयले की बोरी अब सोने के सिक्कों की हो चुकी थी।

इसके बाद वह गड़रिया साधू से मिलने व धन्यवाद देने के लिए उसी स्थान पर गया, जहां पर वह साधू से मिला था। परंतु वहां पर उसे साधू नहीं मिला, बल्कि उसे ठीक उसी जगह एक गुफा दिखाई दी। गड़रिया जैसे ही उस गुफा के अंदर गया तो उसने वहां पर देखा कि भगवान भोले शंकर बर्फ के बने शिवलिंग के आकार में स्थापित थे।

उसने वापस आकर सबको यह कहानी बताई। और इस तरह भोले बाबा की पवित्र अमरनाथ गुफा की खोज हुई और धीरे-धीरे करते दूर-दूर से भी लोग पवित्र गुफा एवं बाबा के दर्शन को पहुंचने लगे जो आज तक प्रतिवर्ष जारी है।

शिव को ब्रह्मा का नाम क्यों चाहिए था ? जानिए अद्भुत अध्यात्मिक सच्चाई हिंदू धर्म में 18 पुराण हैं. सभी पुराण हिंदू भगवान...
22/12/2017

शिव को ब्रह्मा का नाम क्यों चाहिए था ? जानिए अद्भुत अध्यात्मिक सच्चाई

हिंदू धर्म में 18 पुराण हैं. सभी पुराण हिंदू भगवानों की कहानियां बताते हैं. कुछ समान बातों के अलावे सभी कुछ हद तक अलग-अलग कहानियां बयां करते हैं. इसमें त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) के जन्म के साथ ही देवताओं की भी कहानियां सम्मिलित हैं. वेदों में भगवान को निराकार रूप बताया है जबकि पुराणों में त्रिदेव सहित सभी देवों के रूप का उल्लेख होने के साथ ही उनके जन्म की कहानियां भी हैं

भगवान शिव को ‘संहारक’ और ‘नव का निर्माण’ कारक माना गया है. अलग-अलग पुराणों में भगवान शिव और विष्णु के जन्म के विषय में कई कथाएं प्रचलित हैं. शिव पुराण के अनुसार भगवान शिव को स्वयंभू (सेल्फ बॉर्न) माना गया है जबकि विष्णु पुराण के अनुसार भगवान विष्णु स्वयंभू हैं. शिव पुराण के अनुसार एक बार जब भगवान शिव अपने टखने पर अमृत मल रहे थे तब उससे भगवान विष्णु पैदा हुए जबकि विष्णु पुराण के अनुसार ब्रह्मा भगवान विष्णु की नाभि कमल से पैदा हुए जबकि शिव भगवान विष्णु के माथे के तेज से उत्पन्न हुए बताए गए हैं. विष्णु पुराण के अनुसार माथे के तेज से उत्पन्न होने के कारण ही शिव हमेशा योगमुद्रा में रहते हैं

शिव के जन्म की कहानी हर कोई जानना चाहता है. श्रीमद् भागवत के अनुसार एक बार जब भगवान विष्णु और ब्रह्मा अहंकार से अभिभूत हो स्वयं को श्रेष्ठ बताते हुए लड़ रहे थे तब एक जलते हुए खंभे से जिसका कोई भी ओर-छोर ब्रह्मा या विष्णु नहीं समझ पाए, भगवान शिव प्रकट हुए.

विष्णु पुराण में वर्णित शिव के जन्म की कहानी शायद भगवान शिव का एकमात्र बाल रूप वर्णन है. यह कहानी बेहद मनभावन है. इसके अनुसार ब्रह्मा को एक बच्चे की जरूरत थी. उन्होंने इसके लिए तपस्या की. तब अचानक उनकी गोद में रोते हुए बालक शिव प्रकट हुए. ब्रह्मा ने बच्चे से रोने का कारण पूछा तो उसने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया कि उसका नाम ‘ब्रह्मा’ नहीं है इसलिए वह रो रहा है. तब ब्रह्मा ने शिव का नाम ‘रूद्र’ रखा जिसका अर्थ होता है ‘रोने वाला’. शिव तब भी चुप नहीं हुए. इसलिए ब्रह्मा ने उन्हें दूसरा नाम दिया पर शिव को नाम पसंद नहीं आया और वे फिर भी चुप नहीं हुए. इस तरह शिव को चुप कराने के लिए ब्रह्मा ने 8 नाम दिए और शिव 8 नामों (रूद्र, शर्व, भाव, उग्र, भीम, पशुपति, ईशान और महादेव) से जाने गए. शिव पुराण के अनुसार ये नाम पृथ्वी पर लिखे गए थे.

शिव के इस प्रकार ब्रह्मा पुत्र के रूप में जन्म लेने के पीछे भी विष्णु पुराण की एक पौराणिक कथा है. इसके अनुसार जब धरती, आकाश, पाताल समेत पूरा ब्रह्माण्ड जलमग्न था तब ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शिव) के सिवा कोई भी देव या प्राणी नहीं था. तब केवल विष्णु ही जल सतह पर अपने शेषनाग & #8230;..पर लेटे नजर आ रहे थे. तब उनकी नाभि से कमल नाल पर ब्रह्मा जी प्रकट हुए. ब्रह्मा-विष्णु जब सृष्टि के संबंध में बातें कर रहे थे तो शिव जी प्रकट हुए. ब्रह्मा ने उन्हें पहचानने से इनकार कर दिया. तब शिव के रूठ जाने के भय से भगवान विष्णु ने दिव्य दृष्टि प्रदान कर ब्रह्मा को शिव की याद दिलाई. ब्रह्मा को अपनी गलती का एहसास हुआ और शिव से क्षमा मांगते हुए उन्होंने उनसे अपने पुत्र रूप में पैदा होने का आशीर्वाद मांगा. शिव ने ब्रह्मा की प्रार्थना स्वीकार करते हुए उन्हें यह आशीर्वाद प्रदान किया. कालांतर में विष्णु के कान के मैल से पैदा हुए मधु-कैटभ राक्षसों के वध के बाद जब ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना शुरू की तो उन्हें एक बच्चे की जरूरत पड़ी और तब उन्हें भगवान शिव का आशीर्वाद ध्यान आया. अत: ब्रह्मा ने तपस्या की और बालक शिव बच्चे के रूप में उनकी गोद में प्रकट हुए.

इसलिए एक बार आप भी जरुर अमरनाथ जाना चाहेंगेकश्मीर में श्रीनगर से करीब 135 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है हिन्दूओं का परम प...
21/12/2017

इसलिए एक बार आप भी जरुर अमरनाथ जाना चाहेंगे

कश्मीर में श्रीनगर से करीब 135 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है हिन्दूओं का परम पवित्र तीर्थस्थल अमरनाथ धाम। यहां समुद्रतल से 13 हजार 600 फुट की दूरी पर बसा है पवित्र गुफा जिसमें भगवान भोलेनाथ देवी पार्वती के साथ विराजमान रहते हैं।
पुराणों के अनुसार यही वह स्थान है जहां भगवान शिव ने पहली बार अमरत्व का रहस्य प्रकट किया था। इस तीर्थ के मार्ग में कई पड़ाव हैं जो तीर्थ स्वरूप माने जाते हैं।

अमरानाथ की सबसे खास बात

इस तीर्थ की सबसे खास बात है बर्फ से प्राकृतिक शिवलिंग का निर्मित होना। प्राकृतिक हिम से निर्मित होने के कारण इसे स्वयंभू हिमानी शिवलिंग भी कहते हैं।

शिवलिंग श्रावण पूर्णिमा को अपने पूरे आकार में आ जाता है। आश्चर्य की बात यह है कि यह शिवलिंग ठोस वर्फ का निर्मित होता है। जबकि पूरी गुफा पर नजर डालेंगे तो आपको हर तरफ कच्ची बर्फ ही नजर आएगी।

इसलिए हर साल होता है हिमलिंग का निर्माण

शिवलिंग के निर्माण को लेकर पौराणिक कथा है। कहा जाता है कि माता पार्वती को भगवान शिव ने इसी स्थान पर अमर होने का राज बताया था। जब भगवान शिव मां पार्वती को यह कथा बता रहे थे तब वहां पर कबूतर के एक जोड़े ने इस कथा को सुन लिया। माना जाता है कि यह जोड़ा आज भी गुफा में रहता है, जिन्हें अमर पक्षी कहते हैं। भाग्यशाली श्रद्धालुओं को इनके दर्शन प्राप्त होते हैं।

एक कथा के अनुसार इन्हीं पक्षियों को भगवान शिव ने हर वर्ष हिमलिंग के रुप में इस गुफा में विराजमान होने का वरदान दिया था। इसी वरादान के कारण हर वर्ष अमरनाथ गुफा में हिमलिंग निर्मित होता है।

भक्तों को यूं मिले बाबा अमरनाथ

भगवान शिव जब मां पार्वती को अमरत्व की कथा सुनाने के लिए ले जा रहे थे तब उन्होंने छोटे-छोटे अनंत नागों को मार्ग में छोड़ दिया यह स्थान अनंत नाग कहलाया। माथे के चंदन को चंदनबाड़ी में उतारा, पिस्सुओं को पिस्सू टॉप पर और गले के शेषनाग को शेषनाग नामक स्थल पर छोड़ा दिया।

अमरनाथ यात्रा के दौरान मार्ग में आज भी इन स्थलों के दर्शन प्राप्त होते हैं। इस गुफा की सर्वप्रथम जानकारी सोलहवीं शताब्दी के पूर्वाध में एक मुसलमान गड़रिए को प्राप्त हुई थी। इसी कारण मंदिर के चढ़ावे का एक चौथाई भाग आज भी मुसलमान गड़रिए के वंशजों को दिया जाता है।

अमरानाथ यात्रा के मार्ग में खास स्थान

अमरनाथ यात्रा पर जाने के लिए दो रास्ते है। एक रास्ता पहलगाम से होकर जाता है और दूसरा रास्ता सोनमर्ग बालटाल से होकर जाता है। पहलगाम और बालटाल तक किसी भी सवारी से पहुंचा जा सकता है। लेकिन यहां से आगे का रास्ता पैदल ही तय करना होता है।

पहलगाम से जाने वाले रास्ते को सुविधाजनक माना जाता है। क्योकि बलटाल से जाने वाला रास्ता दुर्गम है और असुरक्षित माना जाता है। इसलिए भारत सरकार द्वारा अधिकतर यात्रियों को पहलगाम के रास्ते ही दर्शन की सुविधा उपलब्ध कराई है। जम्मू से पहलगाम की दूरी 315किलोमीटर है सरकार यहां से बस उपलब्ध कराती है।

इसी के साथ गैर सरकारी संस्थाए भी यहां अहम भूमिका निभाती है और दर्शन के लिए आए यात्रियों को सुविधा उपलब्ध कराती है। यात्रा के दौरान पहलगाम से आठ किलोमीटर की दूरी पर पहला पड़ाव चंदनबाड़ी आता है। यहां यात्री विश्राम करते है और फिर दूसरी चढ़ाई यानि पिस्सु घाटी के लिए रवाना होते हैं।

इस स्थान से जुड़ी एक पौराणिक कथा है कि इस घाटी में देवताओं और दानवों के बीच घमासान लड़ाई हुई जिसमें राक्षसों की हार हुई। चंदनबाड़ी से 14 किलोमीटर दूर शेषनाग श्रद्धालुओं का दूसरा पड़ाव होता है। यहां पर एक बहुत सुंदर झील है किंवदंतियों के अनुसार शेषनाग झील में शेषनाग का वास है और चौबीस घंटों के अंदर शेषनाग एक बार झील से बाहर निकलकर लोगों को दर्शन देते है।

शेषनाग से पंचतरणी आठ मील के फासले पर है। मार्ग में बैववैल टॉप और महागुणास दर्रे से आगे बढ़ते हुए महागुणास चोटी से पंचतरणी तक का सारा रास्ता उतराई का है। यहां पांच छोटी-छोटी धाराएं बहती है इसी के कारण इस स्थान का नाम पंचतरणी है।

यहां श्रद्धालुओं को सावधानी बरतनी पड़ती है क्योंकि ऑक्सीजन की कमी इस स्थान पर पाई जाती है। यहां से अमरनाथ की गुफा आठ किलोमीटर दूर रह जाती है लेकिन आगे के रास्ते में बर्फ जमी होने के कारण रास्ता कठिन हो जाता है। इस रास्ते को तय करने के बाद भक्त बाबा अमरनाथ के दर्शन करते है।

जानिए क्या दिखाता है शिव का तीसरा नेत्र...एक दिन पार्वती ने पीछे से आकर शिव की आंखे बंद कर दी. आंखे बंद करते ही सारी दुन...
18/12/2017

जानिए क्या दिखाता है शिव का तीसरा नेत्र...

एक दिन पार्वती ने पीछे से आकर शिव की आंखे बंद कर दी. आंखे बंद करते ही सारी दुनिया में अंधेरा छा गया. अब दोबारा रोशनी करने के लिए सूर्य की जरूरत थी. ऐसे में सूरज को उगाने के लिए शिवजी ने अपनी तीसरी आंख खोली.

तीसरी आंख की चमक से निकली गर्मी इतनी तेज थी कि पार्वती की हथेलियों से पसीना टपकने लगा. पसीने से एक दाग पैदा हुआ. इस धब्बे का नाम अंधक पड़ा. अंधक का मतलब होता है, अंधेरे से बना.

इस अंधक के पालन-पोषण की जिम्मेदारी एक ऐसे असुर को दे दी गई जिसके पास पहले से कोई संतान नहीं थी. बड़े होने पर अंधक ने ब्रह्मा की तपस्या करके एक वरदान मांगा. उसने मांगा कि जब तक वह अपनी मां को वासना की दृष्टि से न देखे तब तक उसकी मौत न हो.

अंधक को इस बात की जानकारी नहीं थी कि वह पैदा कैसे हुआ. उसके मां-बाप कौन हैं, यह भी उसे मालूम नहीं था.

अंधक कैसे मिला अपने माता पिता से

वह पूरी दुनिया जीतने निकल पड़ा. उसे कोई भी हरा नहीं पाया. अपनी जीत का सिलसिला लेकर अंधक कैलाश पर्वत पहुंचा.

कैलाश पर्वत पहुंचते ही अंधक ने शिवजी को ललकारा. तब भगवान शिव ध्यान में थे. अंधक की नजर शिव के बगल में बैठी शक्ति पर पड़ी. अंधक को शक्ति के प्रति आकर्षण हुआ. अंधक को नहीं मालूम था कि यही उसकी मां है.
अंधक पार्वती की ओर बढ़ता है. घबराई पार्वती, शिवजी से उसे रोकने का निवेदन करतीं हैं. ध्यान में लीन शिव अपनी तीसरी आंख खोलते हैं. शिव अपने त्रिशूल से अंधक को निर्बल बनाकर ऐसे ही छोड़ देते हैं. अंधक एक हजार साल तक ऐसे ही खड़ा रहा. नतीजा यह हुआ कि उसकी मांसपेशियां सूखकर खत्म हो जाती हैं. अंधक हड्डी का एक ढांचा मात्र रह जाता है.

इसके बाद उसे एहसास होता है कि पार्वती ही उसकी मां हैं और शिव उसके पिता. अंधक दोनों से माफी मांगता है और उनके साथ गण के रूप में रहने की आज्ञा ले लेता है.

क्या राज छुपा है इस साधारण सी कहानी में ?

ध्यान देने वाली बात यह है कि अंधक का जन्म शिव की तीसरी आंख से होता है. शिव की तीसरी आंख सही और गलत का भेद नहीं कर पाती. उनकी बाकि दोनों आंखें सही और गलत देखती हैं. शिव का तीसरा नेत्र ज्ञान की आंख है.

शिव की तीसरी आंख पति और पत्नी में भेद नहीं कर सकती. इसलिए शिव को अपनी पत्नी रावण को देना गलत नहीं लगता. इसलिए उनके तीसरे नेत्र से पैदा हुआ बालक मां को पहचान नहीं पाता और उनके प्रति आकर्षित हो जाता है.

शिव को इतना ज्यादा भोला माना जाता है कि वो किसी दूसरी महिला और अपनी पत्नी में फर्क नहीं कर पाते. शिव स्त्री और पुरुष में भी अंतर नहीं कर पाते. जब विष्णु उनके लिए मोहिनी का रूप धर कर आते हैं तो वे उनसे आलिंगनबद्ध हो जाते हैं.

ऐसे में विष्णु और पार्वती यह समझ नहीं पाते की कोई शिव को यह कैसे बताए कि ऐसा करना सही नहीं है. इतना ही नहीं भोलेनाथ उन्हें संस्कृति के नियमों पर सवाल उठाने के लिए बाध्य कर देते हैं. कोई व्यवहार सही या गलत क्यों है? सही व्यवहार का आधार क्या है? संस्कृति को हमेशा एक सा क्यों बने रहना चाहिए या संस्कृति बदलनी क्यों नहीं चाहिए?

इसी तरह भोलेनाथ ने एक बार पार्वती से कहा,’मुझे जो समर्पित किया जाता है उसका महत्व नहीं है. महत्व उस भावना का है जिससे वह समर्पित किया जाता है.’

शिव को भोलेनाथ कैसे बनाता है ये नेत्र

तमिल पेरियार पुराणम् की एक कथा है. इस कहानी में टिन्नन नाम का एक आदिवासी युवक हर शाम शिकार करने के बाद शिवलिंग पर एक जंगली फूल चढ़ाता है. इस फूल को वह अपने बालों में लगाता था. झरने का पानी अपने मुंह में भरकर लाता. उसे जल के रूप में शिवलिंग पर चढ़ाता. वह शिकार से हड्डियां निकालकर उसका बचा हुआ मांस भी शिवजी को समर्पित करता है.

ग्रंथों में शिवलिंग को फूल, दूध, धूप, राख और फल चढ़ाने की बात कही गई है.
सच्ची भक्ति जांचने के लिए एक दिन शिवलिंग में से आंखों का एक जोड़ा प्रकट हुआ. एक आंख से खून निकलने लगता है. पुजारी इसे अशुभ समझकर वहां से भागने लगता है. लेकिन आदिवासी युवक टिन्नन इस खून को रोकने की कोशिश करने लगता है.

१२  ज्योतिर्लिंगों का महत्व व महिमाऐसी मान्यता भी है कि सावन के महीने में यदि भगवान शिव के ज्योतिर्लिंगों के दर्शन किए ज...
16/12/2017

१२ ज्योतिर्लिंगों का महत्व व महिमा

ऐसी मान्यता भी है कि सावन के महीने में यदि भगवान शिव के ज्योतिर्लिंगों के दर्शन किए जाएं तो जन्म-जन्म के कष्ट दूर हो जाते हैं। यही कारण है कि सावन के महीने में भारत के प्रमुख १२ ज्योतिर्लिंगों के दर्शन करने के लिए श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है। आज हम आपको बता रहे हैं इन १२ ज्योतिर्लिंगों का महत्व व महिमा-:

१] सोमनाथ :

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग भारत का ही नहीं अपितु इस पृथ्वी का पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। यह मंदिर गुजरात राज्य के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित है। इस मंदिर के बारे में मान्यता है, कि जब चंद्रमा को दक्ष प्रजापति ने श्राप दिया था, तब चंद्रमा ने इसी स्थान पर तप कर इस श्राप से मुक्ति पाई थी। ऐसा भी कहा जाता है कि इस शिवलिंग की स्थापना स्वयं चन्द्र देव ने की थी। विदेशी आक्रमणों के कारण यह १७ बार नष्ट हो चुका है। हर बार यह बिगड़ता और बनता रहा है।

२] मल्लिकार्जुन :

यह ज्योतिर्लिंग आंध्रप्रदेश में कृष्णा नदी के तट पर श्रीशैल नाम के पर्वत पर स्थित है। इस मंदिर का महत्व भगवान शिव के कैलाश पर्वत के समान कहा गया है। अनेक धार्मिक शास्त्र इसके धार्मिक और पौराणिक महत्व की व्याख्या करते हैं।

कहते हैं कि इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने मात्र से ही व्यक्ति को उसके सभी पापों से मुक्ति मिलती है। एक पौराणिक कथा के अनुसार जहां पर यह ज्योतिर्लिंग है, उस पर्वत पर आकर शिव का पूजन करने से व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होते हैं।

३] महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग :

यह ज्योतिर्लिंग मध्यप्रदेश की धार्मिक राजधानी कही जाने वाली उज्जैन नगरी में स्थित है। महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की विशेषता है कि ये एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है। यहां प्रतिदिन सुबह की जाने वाली भस्मारती विश्व भर में प्रसिद्ध है। महाकालेश्वर की पूजा विशेष रूप से आयु वृद्धि और आयु पर आए हुए संकट को टालने के लिए की जाती है। उज्जैनवासी मानते हैं कि भगवान महाकालेश्वर ही उनके राजा हैं और वे ही उज्जैन की रक्षा कर रहे हैं।

४] ओंकारेश्वर :

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध शहर इंदौर के समीप स्थित है। जिस स्थान पर यह ज्योतिर्लिंग स्थित है, उस स्थान पर नर्मदा नदी बहती है और पहाड़ी के चारों ओर नदी बहने से यहां ऊं का आकार बनता है। ऊं शब्द की उत्पति ब्रह्मा के मुख से हुई है। इसलिए किसी भी धार्मिक शास्त्र या वेदों का पाठ ऊं के साथ ही किया जाता है। यह ज्योतिर्लिंग ॐकार अर्थात ऊं का आकार लिए हुए है, इस कारण इसे ओंकारेश्वर नाम से जाना जाता है।

५] केदारनाथ :

केदारनाथ स्थित ज्योतिर्लिंग भी भगवान शिव के १२ प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में आता है। यह उत्तराखंड में स्थित है। बाबा केदारनाथ का मंदिर बद्रीनाथ के मार्ग में स्थित है। केदारनाथ समुद्र तल से ३५८४ मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। केदारनाथ का वर्णन स्कन्द पुराण एवं शिव पुराण में भी मिलता है। यह तीर्थ भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। जिस प्रकार कैलाश का महत्व है उसी प्रकार का महत्व शिव जी ने केदार क्षेत्र को भी दिया है।

६] भीमाशंकर :

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के पूणे जिले में सह्याद्रि नामक पर्वत पर स्थित है। भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग को मोटेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर के विषय में मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धा से इस मंदिर का दर्शन प्रतिदिन सुबह सूर्य निकलने के बाद करता है, उसके सात जन्मों के पाप दूर हो जाते हैं तथा उसके लिए स्वर्ग के मार्ग खुल जाते हैं।

७] काशी विश्वनाथ:

विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग भारत के १२ ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह उत्तर प्रदेश के काशी नामक स्थान पर स्थित है। काशी सभी धर्म स्थलों में सबसे अधिक महत्व रखती है। इसलिए सभी धर्म स्थलों में काशी का अत्यधिक महत्व कहा गया है। इस स्थान की मान्यता है कि प्रलय आने पर भी यह स्थान बना रहेगा। इसकी रक्षा के लिए भगवान शिव इस स्थान को अपने त्रिशूल पर धारण कर लेंगे और प्रलय के टल जाने पर काशी को उसके स्थान पर पुन: रख देंगे।

८] त्र्यंबकेश्वर :

यह ज्योतिर्लिंग गोदावरी नदी के करीब महाराष्ट्र राज्य के नासिक जिले में स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग के सबसे अधिक निकट ब्रह्मागिरि नाम का पर्वत है। इसी पर्वत से गोदावरी नदी शुरू होती है। भगवान शिव का एक नाम त्र्यंबकेश्वर भी है। कहा जाता है कि भगवान शिव को गौतम ऋषि और गोदावरी नदी के आग्रह पर यहां ज्योतिर्लिंग रूप में रहना पड़ा।

९] वैद्यनाथ :

श्री वैद्यनाथ शिवलिंग का समस्त ज्योतिर्लिंगों की गणना में नौवां स्थान बताया गया है। भगवान श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का मन्दिर जिस स्थान पर अवस्थित है, उसे वैद्यनाथ धाम कहा जाता है। यह स्थान झारखंड राज्य (पूर्व में बिहार ) के देवघर जिला में पड़ता है।

१०] नागेश्वर ज्योतिर्लिंग :

यह ज्योतिर्लिंग गुजरात के बाहरी क्षेत्र में द्वारिका स्थान में स्थित है। धर्म शास्त्रों में भगवान शिव नागों के देवता है और नागेश्वर का पूर्ण अर्थ नागों का ईश्वर है। भगवान शिव का एक अन्य नाम नागेश्वर भी है। द्वारका पुरी से भी नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की दूरी १७ मील की है। इस ज्योतिर्लिंग की महिमा में कहा गया है कि जो व्यक्ति पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ यहां दर्शन के लिए आता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती है।

११] रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग :

यह ज्योतिर्लिंग तमिलनाडु राज्य के रामनाथपुरं नामक स्थान में स्थित है। भगवान शिव के १२ ज्योतिर्लिंगों में से एक होने के साथ-साथ यह स्थान हिंदुओं के चार धामों में से एक भी है। इस ज्योतिर्लिंग के विषय में यह मान्यता है कि इसकी स्थापना स्वयं भगवान श्रीराम ने की थी। भगवान राम के द्वारा स्थापित होने के कारण ही इस ज्योतिर्लिंग को भगवान राम का नाम रामेश्वरम दिया गया है।

१२] घृष्णेश्वर मन्दिर :

घृष्णेश्वर महादेव का प्रसिद्ध मंदिर महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर के समीप दौलताबाद के पास स्थित है। इसे घृसणेश्वर या घुश्मेश्वर के नाम से भी जाना जाता है। दूर-दूर से लोग यहां दर्शन के लिए आते हैं और आत्मिक शांति प्राप्त करते हैं। भगवान शिव के १२ ज्योतिर्लिंगों में से यह अंतिम ज्योतिर्लिंग है। बौद्ध भिक्षुओं द्वारा निर्मित एलोरा की प्रसिद्ध गुफाएं इस मंदिर के समीप स्थित हैं। यहीं पर श्री एकनाथजी गुरु व श्री जनार्दन महाराज की समाधि भी है।

अमरनाथ धाम से जुडी शिव-पार्वती कथाएक बार देवी पार्वती ने देवों के देव महादेव से पूछा, ऐसा क्यों है कि आप अजर हैं, अमर है...
15/12/2017

अमरनाथ धाम से जुडी शिव-पार्वती कथा

एक बार देवी पार्वती ने देवों के देव महादेव से पूछा, ऐसा क्यों है कि आप अजर हैं, अमर हैं लेकिन मुझे हर जन्म के बाद नए स्वरूप में आकर, फिर से बरसों तप के बाद आपको प्राप्त करना होता है । जब मुझे आपको पाना है तो मेरी तपस्या और इतनी कठिन परीक्षा क्यों? आपके कंठ में पडी़ नरमुंड माला और अमर होने के रहस्य क्या हैं?

महादेव ने पहले तो देवी पार्वती के उन सवालों का जवाब देना उचित नहीं समझा, लेकिन पत्नीहठ के कारण कुछ गूढ़ रहस्य उन्हें बताने पडे़। शिव महापुराण में मृत्यु से लेकर अजर-अमर तक के कर्इ प्रसंंग हैं, जिनमें एक साधना से जुडी अमरकथा बडी रोचक है। जिसे भक्तजन अमरत्व की कथा के रूप में जानते हैं।

हर वर्ष हिम के आलय (हिमालय) में अमरनाथ, कैलाश और मानसरोवर तीर्थस्थलों में लाखों श्रद्घालु पहुंचते हैं। सैकडों किमी की पैदल यात्रा करते हैं, क्यों? यह विश्वास यूं ही नहीं उपजा। शिव के प्रिय अधिकमास, अथवा आषाढ़ पूर्णिमा से श्रावण मास तक की पूर्णिमा के बीच अमरनाथ की यात्रा भक्तों को खुद से जुडे रहस्यों के कारण और प्रासंगिक लगती है।

पौराणिक मान्याताओं के अनुसार, अमरनाथ की गुफा ही वह स्थान है जहां भगवान शिव ने पार्वती को अमर होने के गुप्त रहस्य बतलाए थे, उस दौरान उन ‘दो ज्योतियों’ के अलवा तीसरा वहां कोर्इ प्राणी नहीं था । न महादेव का नंदी और नही उनका नाग, न सिर पे गंगा और न ही गनपति, कार्तिकेय….!

सबसे पहले नंदी को पहलगाम पर छोड़ा महादेव ने

गुप्त स्थान की तलाश में महादेव ने अपने वाहन नंदी को सबसे पहले छोड़ा, नंदी जिस जगह पर छूटा, उसे ही पहलगाम कहा जाने लगा। अमरनाथ यात्रा यहीं से शुरू होती है। यहां से थोडा़ आगे चलने पर शिवजी ने अपनी जटाओं से चंद्रमा को अलग कर दिया, जिस जगह ऐसा किया वह चंदनवाडी कहलाती है। इसके बादगंगा जी को पंचतरणी में और कंठाभूषण सर्पों को शेषनाग पर छोड़ दिया, इस प्रकार इस पड़ाव का नाम शेषनाग पड़ा।

अगले पड़ाव पर गणेश छूटे

अमरनाथ यात्रा में पहलगाम के बाद अगला पडा़व है गणेश टॉप, मान्यता है कि इसी स्थान पर महादेव ने पुत्र गणेश को छोड़ा। इस जगह को महागुणा का पर्वत भी कहते हैं। इसके बाद महादेव ने जहां पिस्सू नामक कीडे़ को त्यागा, वह जगह पिस्सू घाटी है।

और शुरू हुर्इ शिव-पार्वती की कथा

इस प्रकार महादेव ने अपने पीछे जीवनदायिनी पांचों तत्वों को स्वंय से अलग किया। इसके पश्चात् पार्वती संग एक गुफा में महादेव ने प्रवेश किया। कोर्इ तीसरा प्राणी, यानी कोर्इ कोई व्यक्ति, पशु या पक्षी गुफा के अंदर घुस कथा को न सुन सके इसलिए उन्होंने चारों ओर अग्नि प्रज्जवलित कर दी। फिर महादेव ने जीवन के गूढ़ रहस्य की कथा शुरू कर दी।

कथा सुनते-सुनते सो गर्इं पार्वती, कबूतरों ने सुनी

कहा जाता है कि कथा सुनते-सुनते देवी पार्वती को नींद आ गर्इ, वह सो गर्इं और महादेव को यह पता नहीं चला, वह सुनाते रहे। यह कथा इस समय दो सफेद कबूतर सुन रहे थे और बीच-बीच में गूं-गूं की आवाज निकाल रहे थे। महादेव को लगा कि पार्वती मुझे सुन रही हैं और बीच-बीच में हुंकार भर रही हैं। चूंकि वैसे भी भोले अपने में मग्न थे तो सुनाने के अलावा ध्यान कबूतरों पर नहीं गया।

वे कबूतर अमर हुए और अब गुफा में होते हैं उनके दर्शन

दोनों कबूतर सुनते रहे, जब कथा समाप्त होने पर महादेव का ध्यान पार्वती पर गया तो उन्हें पता चला कि वे तो सो रही हैं। तो कथा सुन कौन रहा था? उनकी दृष्टि तब दो कबूतरों पर पड़ी तो महादेव को क्रोध आ गया। वहीं कबूतर का जोड़ा उनकी शरण में आ गया और बोला, भगवन् हमने आपसे अमरकथा सुनी है। यदि आप हमें मार देंगे तो यह कथा झूठी हो जाएगी, हमें पथ प्रदान करें। इस पर महादेव ने उन्हें वर दिया कि तुम सदैव इस स्थान पर शिव व पार्वती के प्रतीक चिह्न में निवास करोगे। अंतत: कबूतर का यह जोड़ा अमर हो गया और यह गुफा अमरकथा की साक्षी हो गर्इ। इस तरह इस स्थान का नाम अमरनाथ पड़ा।

मान्यता है कि आज इन दो कबूतरों के दर्शन भक्तों को होते हैं। अमरनाथ गुफा में यह भी प्रकृति का ही चमत्कार है कि शिव की पूजा वाले विशेष दिनों में बर्फ के शिवलिंग अपना आकार ले लेते हैं। यहां मौजूद शिवलिंग किसी आश्चर्य से कम नहीं है। पवित्र गुफा में एक ओर मां पार्वती और श्रीगणेश के भी अलग से बर्फ से निर्मित प्रतिरूपों के भी दर्शन किए जा सकते हैं।

अमरनाथ यात्रा- शिव धामसृष्टि का आधार ब्रह्मा, विष्णु और महेश यानी शिव शंकर हैं. ये तीन त्रिदेव ही सृष्टि के आदि, मध्य एव...
13/12/2017

अमरनाथ यात्रा- शिव धाम

सृष्टि का आधार ब्रह्मा, विष्णु और महेश यानी शिव शंकर हैं. ये तीन त्रिदेव ही सृष्टि के आदि, मध्य एवं अंत हैं. ये अजन्मा एवं निरंकार हैं. यह न तो जन्म लेते हैं और न ही इनकी मृत्यु होती है. सृष्टि के आरम्भ काल में यही अपनी बीज शक्ति से सृष्टि को जन्म देते हैं एवं अंत में उसे अपने में समाहित कर लेते हैं.

भक्तों की पूजा एवं अर्चना को साकार रूप देने के लिए यह साकार रूप धारण करते हैं. इन्होने अपनी शक्ति को नारी रूप प्रदान किया है जिसे उमा, लक्ष्मी एवं सरस्वती के नाम पूजा जाता है. उमा शिव की पत्नी हैं. लक्ष्मी विष्णु की और ब्रह्मा की संगिनी देवी सरस्वती हैं. मनुष्य को पाप से दूर रहकर धर्म का मार्ग चुनने की प्रेरणा देने हेतु यह समय-समय पर लीला करते रहते हैं.

भगवान विष्णु तो अपनी लीलाओं के कारण लीलाधारी कहे जाते हैं. इन्हीं के समान शिव की लीलाएं भी अद्भुत हैं. इनकी लीला आज भी अमरनाथ धाम में अमर है जो अमरनाथ की पवित्र गुफा में इनके होने का एहसास कराती है. श्रद्धालु भक्तों के लिए यह अत्यंत पूजनीय स्थल हैं जहां जीवन में कम से कम एक बार जाने की इच्छा सभी की रहती है. लेकिन, यहां पहुंचता वही है जिसे बाबा अमरनाथ अपने दरबार में बुलाते हैं.

Address

C-124 A, Sec/2
Delhi
201301

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