15/10/2025
कबीर, कागद केरी नाव री, पानी केरी गंग।
कहे कबीर कैसे तिरे, पांच कुसंगी संग।।
भावार्थ: यह शरीर कागज की तरह नाशवान है जो संसार रुपी नदी की इच्छाओं-वासनाओं में डूबा हुआ है। जब तक पांच विकार (काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) पर नियंत्रण नहीं कर लिया जाता है तब तक संसार से मुक्ति नहीं मिल सकती।
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