05/10/2026
प्रश्न— किसी को पूरे मन से क्षमा कैसे करें ? हमसे यह नहीं हो पाता है। कृपया मार्गदर्शन करें। 🙏🏻
प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
श्रेय मार्ग पर चलना शुरू कर दीजिए, भगवान से प्रेम करना शुरू कर दीजिए। यह बीमारी ही समाप्त हो जाएगी कि हमें किसी को क्षमा करना है या नहीं।
क्षमा शब्द कब आता है?
जब हम दूसरों में दोष का दर्शन करते हैं। यह सोचते हैं कि मैं सही हूँ और वह गलत है। और अब जब मैं उससे बड़ा हो गया हूँ, तो उसे क्षमा करने का अधिकार भी मेरा है।
यही अहंकार की भावना क्षमा का भाव लाती है। हमें इन सबसे ऊपर उठना पड़ेगा।
हमें यह भान ही नहीं होना चाहिए कि यह गलती है और अब मैं - अर्थात् मेरा अहंकार, उसे क्षमा करूँ या नहीं करूँ।
क्यों इस पर बुद्धि लगानी ?
जो बीत गई, सो बात गई। बस उसे छोड़ दें। न दंड का भाव लाएँ, न क्षमा करने का।
क्योंकि क्षमा वही करेगा, जो दूसरे को गलत समझेगा और स्वयं को बड़ा एवं सही।
तो यह भाव ही क्यों लाना?
किसी व्यक्ति ने हमारे साथ गलत किया। बस एक ही उपाय है - भूल जाइए। लेकिन सावधानी यह रखें कि उस व्यक्ति के प्रति न राग हो, न द्वेष हो और उससे सावधान रहें।
बस! क्योंकि जितना इन सब पर अपनी बुद्धि और हृदय खर्च करेंगे, उतना ही हरि से दूर होते जाएँगे।
क्योंकि दिन-रात यही चिंतन चलता रहेगा कि अमुक व्यक्ति ने हमारे साथ ऐसा किया, तो हम उसे क्षमा करें या दंड दें।
और अगर चलो, क्षमा भी कर दिया, तो स्वतः अन्तःकरण में यह बात पोषित हो जाएगी कि “मैंने उसे क्षमा किया।”
किसने किया?
“मैंने।”
यही अहंकार को पोषित करेगा।
इसीलिए कबीरदास जी ने कहा है—
कबीरा खड़ा बाज़ार में, सबकी माँगे खैर।
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर।।
यही स्थिति लानी है—बिल्कुल राग-द्वेष-शून्य। न किसी के प्रति अनावश्यक लगाव हो और न किसी के प्रति द्वेष।
क्यों अपने छोटे-से जीवन को इन सबमें उलझाए रखना ?
बिल्कुल सहज और सरल बनिए। जितना इन सब चक्करों में पड़ेंगे, उतना ही सिरदर्द, अनिद्रा, तनाव, अवसाद और समय की बर्बादी बढ़ेगी।
जीवन को सुखपूर्वक नहीं जी पाएँगे।
इसीलिए निर्दोष बनते हुए इन सबसे ऊपर उठने का प्रयत्न करें।
अरे, किस-किस को क्षमा करेंगे या दंड देंगे?
यह जीवन जब तक है, तब तक कोई न कोई आपसे टकराता रहेगा, कभी राग के कारण, कभी द्वेष के कारण।
आपसे स्वार्थ की पूर्ति होते ही वह आपका साथ छोड़ देगा। आप भी तो ऐसा ही करते हैं, न ?
तो फिर केवल उसी का ही दोष क्यों देखना ?
जब तक भगवद्प्राप्ति नहीं हो जाती, यह रोग लगा ही रहेगा।
एक ही दिन में अगर गिनाने लगूँ, तो सौ से भी अधिक ऐसे तत्व पहुँच जाएँगे, जिन्हें आपको क्षमा करना होगा या दंड देना होगा।
क्या हम इसीलिए पैदा हुए हैं कि इसी में अपना मन उलझाए रखें कि अमुक व्यक्ति को हमें क्षमा करना है और अमुक व्यक्ति को दंड देना है ?
क्यों इतना बहुमूल्य समय नष्ट करना ?
इसीलिए इन सबसे परे होकर, बस अपने कल्याण के विषय में सोचते हुए -
राग-द्वेष से ऊपर उठिए, अपने मन को हरि में लगाइए और अपने जीवन को भगवद्प्राप्ति की ओर लगाइए।
भज गोविंदम भज गोविंदम
गोविंद भज मूढ़मते
प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
आध्यात्मिक दिग्दर्शक
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