Shwet Prem Ras

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(11)

प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
आध्यात्मिक दिग्दर्शक
Spiritual Preacher

धर्म में पाखंड,अंधविश्वास की बेड़ियों से मुक्त करवाकर जीवों को तत्वज्ञान,शास्त्र सिद्धांतो से अवगत करवाकर दुखनिवृत्ति करवाना ।
www.ShwetPremRas.in

प्रश्न :- प्रेम क्या है?उत्तर :- प्रेम, भगवान की तीन प्रमुख शक्ति हैं- सत्, चित्, आनंद। यह जो आनंद हैं, यह भगवान की विशि...
10/09/2026

प्रश्न :- प्रेम क्या है?

उत्तर :- प्रेम, भगवान की तीन प्रमुख शक्ति हैं- सत्, चित्, आनंद। यह जो आनंद हैं, यह भगवान की विशिष्ट शक्ति है जिससे भगवान जीवों को परमानंद प्रदान करते हैं और स्वयं भी आनंदित रहते हैं। यह भगवान की ह्लादिनी शक्ति है।
✨ यही ह्लादिनी शक्ति के कारण भगवान को "आनंद घन" बोला जाता है। दिव्यानंद, नित्य तृप्त, नित्य आनंदमय भगवान इसी के कारण रहते हैं। यही रस है। इस ह्लादिनी शक्ति का जो सार है, जो सर्वस्व है, उसे कहते हैं "प्रेम"।

"अनिर्वचनीय प्रेम स्वरूपम।"

यह प्रेम न बताया जा सकता है, न परिभाषित किया जा सकता है, न ही अन्य चेष्टा से उसे समझाया जा सकता है।

✨ यह पल-पल बढ़ता है और बढ़ता ही जाता है, इसमें पूर्णता नहीं आती। नित्य नूतन मधुर रूप से बढ़ता है। इस पवित्र प्रेम में इंद्रिय तृप्ति, वासना सिद्धि, भोग लालसा आदि का स्थान नहीं रहता।

यह जो हम संसार में करते हैं और इस गंदगी को प्रेम का नाम देते हैं, यह प्रेम नहीं है। प्रेम में इंद्रिय जनित कामनाएँ नहीं होती। वह विशुद्धाशुद्ध तत्व है, प्रतिक्षण वर्धमानं। यहाँ तो बस थोड़ी देर चिपटाया बस प्रेम खत्म। लेकिन यहाँ वह नित्य बढ़ता है, बढ़ता ही जाता है। यहाँ इंद्रिय सुख की कामना नहीं होती और सांसारिक गंदगी जिसे आम गधे लोग प्रेम कहते हैं, वहाँ एकमात्र इंद्रियों की तृप्ति की ही कामना है।

*श्वेत तत्व दर्शन - भाग 1पृष्ठ संख्या 258*
प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
आध्यात्मिक दिग्दर्शक

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Note

✨यदि आप अपने शहर , नगर , ग्राम आदि में भी समागम करवाना हो तो वह सम्पर्क कर सकते हैं । college , Institutions , Management संस्थान , सरकारी संस्थान , company आदि में Motivational सत्र या व्याख्यान के लिए भी आप नीचे दिए गए नंबर पर सम्पर्क कर सूचना प्राप्त कर सकते हैं ।

✨अगर आप श्वेत प्रेम रस संस्था से जुड़ना चाहते हैं और प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज जी के सानिध्य में प्रैक्टिकल साधना का लाभ लेते हैं तो नीचे दिए गए नंबर पर सम्पर्क कर सकते हैं ।

✨ अक्टूबर में शरद पूर्णिमा के अवसर पर साधना समागम का आयोजन किया जा रहा है,जो कि 24 से 28 अक्टूबर 2026 तक प्रस्तावित है, इस 5 दिवसीय वृन्दावन महोत्सव में भी जो आना चाहते हैं, वह इस नंबर पर सम्पर्क कर सकते हैं ।

8950072203, 9305529349


राधा तत्व - द्वितीय अध्याय:- ************************राधा-कृष्ण तत्त्व सर्वथा अप्राकृत तत्व हैं  अर्थात मायिक मन, बुद्धि...
10/09/2026

राधा तत्व - द्वितीय अध्याय:-

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राधा-कृष्ण तत्त्व सर्वथा अप्राकृत तत्व हैं अर्थात मायिक मन, बुद्धि, इन्द्रियों से परे । यह दिव्य मन बुद्धि और इन्द्रियों से भी परे के तत्त्व हैं । जिनको तत्त्व ज्ञान हो चुका है और जिन्होंने भगवदप्राप्ति कर भी ली है , यह उनके लिए भी अग्राह्य होता है ।

क्योंकि भगवदप्राप्ति के कई स्तर हैं , श्रेणियाँ हैं ।

जैसे दास्य भाव से भगवदप्राप्ति करने वाला महापुरुष माधुर्य भाव में प्रवेश नहीं कर सकता ।

ज्ञान मार्ग से या योग मार्ग से भगवदप्राप्ति करने वाला तत्त्वदर्शी भी प्रेम मार्ग में प्रविष्ट नहीं कर सकता ।

राधा-कृष्ण की समस्त लीलायें अप्राकृत हैं और थी और होती हैं ।

यह लीलायें अप्राकृत क्षेत्र में ( ये वाला वृन्दावन नहीं ) , अप्राकृत मन, बुद्धि, शरीर से अप्राकृत पात्रों में हुई थी ।

उनकी देह आदि सब अप्राकृत होते हैं । यह वह देह नहीं होती जैसा हमारा, आपका या कुत्ता, बिल्ली, गधा, मच्छर का शरीर पंच महाभूत से बना है ।

अप्राकृत कहते हैं जो प्रकृति के पांच तत्त्वों से, तीन गुणों से परे हो ।

प्राकृत देह , मन , बुद्धि ,इन्द्रियाँ तो हमारी होती हैं जो स्थूल या सूक्ष्म प्राकृत तत्त्वों से बनी है ।

अप्राकृत या चिन्मय लीला को देखने , सुनने , समझने , कहने और अनुभव करने के लिए अप्राकृत नेत्र , कान , जिह्वा , इन्द्रियाँ और मन बुद्धि चाहिए ।

ऐसे समझिये जैसे तरंग होती हैं ( waves ), कई प्रकार की होती हैं । उनमें से हम कुछ को देख सकते हैं - जैसे प्रकाश , कुछ को सुन सकते हैं - जैसे Radio तरंगें , कुछ को अनुभव कर सकते हैं - जैसे गामा, X rays आदि और बहुत सी ऐसी तरंगें हैं जिनको हम अपनी इन इन्द्रियों से आभास भी नहीं कर सकते लेकिन वह विभिन्न प्राणियों पर अपना अलग-अलग प्रभाव डालती हैं ।

हमारे शरीर में प्रकृति ने कुछ ही तरंगों को अनुभव या आभास करने के अनुसार बनाया है ।

हर प्राणी के शरीर की अलग-अलग विशेषता है, क्षमता है इन विभिन्न तरंगों को ग्रहण करने और अनुभव में लाने की ।

जैसे चीटियों में जो तरंग ग्रहण करने की क्षमता होगी ,वह मनुष्य में नहीं होगी ।

Virus में जिन तरंगों को अनुभव करने की होगी,वह मनुष्य में नहीं होगी ।

मनुष्य में जो तरंगे ग्रहण करने की क्षमता होगी ,वह हो सकता है किसी अन्य में न हो ।

विज्ञान ने तो अभी मात्र कुछ ही जिसे कहते हैं मात्र 1% तरंगें ही ढूँढने में सफलता पाई है लेकिन इसी प्राकृत पृथ्वी पर अनंत तरंग ऊर्जा भरी पड़ी हैं जिसकी अभी खोज बाकी है ।

ज्यों-ज्यों यह खोज होती जाएगी ,उतना उतना मनुष्य आधुनिक होता जाएगा ।

अब देखिए प्रकृति के प्राकृत तरंगों को ही हमारी प्राकृत देह नहीं ग्रहण कर पा रही है तो विचार कीजिये जो प्रकृति से परे तत्त्व है ,अमायिक है , अप्राकृत तत्व है , उसे हम कैसे अनुभव कर सकते हैं !

अनुभव तो क्या स्वप्न में भी, विचार में नहीं आ सकता ।

ऐसे ही बुद्धि का प्रवेश हृदय के क्षेत्र में नहीं हो सकता ।

ज्ञान का प्रवेश प्रेम क्षेत्र में नहीं हो सकता ।

ज्ञान को पार करके ही प्रेम क्षेत्र या प्रेम राज्य में प्रवेश पाया जा सकता है ।

जब मैं था , तब हरि नहीं , अब हरि हैं मैं नाहिं ।

सब अंधियारा मिट गया , जब दीपक देख्या माहिं ।।

- कबीरदास जी

"मैं" मतलब बुद्धि और ज्ञान का अहंकार ।

कबिरा यहु घर प्रेम का , खाला का घर नाहिं ।

शीश उतारि भुईं धरे , तब पैठे घर माहिं ।।

यह शीश अर्थात बुद्धि अर्थात सब ज्ञान छोड़ना पड़ेगा तब जाकर प्रेम के घर में प्रवेश मिलेगा ।

क्योंकि ज्ञान और बुद्धि की वहाँ गति नहीं है ।

प्रेम पियाला जो पिये , शीश दक्षिणा देय ।

लोभी शीश न दे सके , नाम प्रेम का लेय ।।

- कबीरदास

"शीश" का अर्थ है ज्ञान या बुद्धि ।

लेकिन जो "लोभी" होता है अर्थात भुक्ति -मुक्ति, रिद्धि-सिद्धि आदि का लोभी , वह ज्ञान को छोड़ नहीं पाता , ज्ञान मार्ग का त्याग नहीं कर पाता जिसके कारण वह प्रेम मार्ग में प्रवेश नहीं कर पाता लेकिन नाम लेगा प्रेम का कि मैं प्रेम को जानता हूँ ।

प्रेम बुद्धि का विषय नहीं है ।

ज्ञान बुद्धि का विषय है ।

लेकिन आजकल क्या हो रहा है कि लोग उस क्षेत्र में भी प्रवेश करने की असफल चेष्टा कर रहे हैं जहाँ बुद्धि और मन की गति नहीं है , ज्ञान की गति नहीं है , प्रवेश ही नहीं है ।

प्रेम हृदय का विषय है ।

ऐसे ही अध्यात्म तत्त्व भक्ति का विषय है । "आनंद तत्त्व" बुद्धि का विषय नहीं है , न ही वह मन का विषय है , वह आनंद तत्व दिव्य चित्त या शुचित या शुद्ध अंतःकरण का विषय है ।

अंतःकरण में ही आनंद की प्राप्ति और अनुभूति होगी ।

तो इसीलिए प्राकृत मन बुद्धि चित्त में अप्राकृत विषय अनुभगम्य नहीं है ।

भगवान की जितनी भी लीलायें हुई हैं सब अप्राकृत अवस्था में हुई है ।

इसीलिए गीता में भगवान ने कहा :-

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ।।

अर्थात :- मेरा जन्म ( जो मायामय दिखता या प्रतीत होता है ) और साधुरक्षण आदि कर्म दिव्य हैं अर्थात् अलौकिक हैं अर्थात अप्राकृत हैं , यानी केवल ईश्वरीय तत्त्व से ही होनेवाले हैं ।

इस प्रकार जो तत्त्व से यथार्थ जानता है। हे अर्जुन! वह इस शरीरको छोड़कर पुनर्जन्म अर्थात् पुनः उत्पत्ति को प्राप्त नहीं होता बल्कि मेरे पास आ जाता है । अर्थात वही मुझे जान पाता है ।

यह जितनी भी भगवान की लीलायें हुई हैं सब अप्राकृत थी ।

भगवान वहाँ गाय चरा रहे हैं , गोप बालकों के साथ हैं , लेकिन अप्राकृत रूप से किशोरावस्था में वृन्दावन के कुंज और निकुंज में युगों-युगों के साधकों के साधना का फल प्रदान करने के लिए गोपियों के वेश में ऋषि मुनियों को अपना लीला रस प्रदान कर रहे हैं ।

इसी तरह गोपियाँ भी स्थूल और देह रूप से सभी अपने-अपने घर में पति और सास के साथ कार्य कर रही हैं लेकिन चिन्मय देह और भाव देह से वह वृन्दावन में भगवान के साथ कुंज लीला में राधा कृष्ण की सेवा का आस्वादन कर रही हैं ।

लोगों को लग रहा है कि अरे! चन्द्रावली तो वह देखो कपड़े धो रही है लेकिन चन्द्रावली का भाव और चिन्मय देह भगवान के साथ वृन्दावन में है ।

क्योंकि अलौकिक रस या आनंद जिसे प्राप्त करना है , वह देह को नहीं प्राप्त करना ,वह जीव को और भाव देह को प्राप्त करना है । यह स्थूल शरीर तो उस परमानंद को अनुभव तक नहीं कर सकता , लवलेश मात्र भी आभास मात्र भी अगर इस देह ने उस परमानंद को किया तो इस शरीर की राख तक नहीं बचेगी ।

वह परम आनंद तो दूर की बात है ।

अरे! इस देह में अगर हम लौकिक प्राकृत देवताओं के भी देह की गंध अगर हम सूँघ लें तो तुरंत हृदय के टुकड़े-टुकड़े हो जायेंगे ।

मूर्छा प्राप्त कर तुरंत मर जायेंगे ।

नहीं समझ में आई बात ?

ऐसे समझिये कि वह जो सर्वोच्च परमानंद है । वह Extra Super Voltage है जो आपने Super High Tension Wire से जाते देखा होगा ।

इसमें लगभग 5 लाख वोल्टेज की क्षमता की बिजली का संवाहन होता है ।

इसके नीचे 1 लाख वोल्टेज की क्षमता का Extra High Tension Wire ( EHT ) दिया जाता है जो शहरों में से होकर गुजरता है ।

इसके नीचे फिर Super Tension Cables ( STC ) होती हैं , जिसमें 22 हज़ार वोल्टेज से 35 हज़ार voltage जाती है ।

फिर आता है High Tension Wire ( HT cables ) जिसमें 5000 वोल्टेज से 11 हज़ार voltage का current दौड़ता है ।

फिर इसके नीचे आता है Low Tension cables ( LT Cables ) जिसमें 1000 volt से कम का current दौड़ता है ।

यही आपने अपने खम्भों पर शहरों और गावों में लगा देखा होगा जहाँ से आप cable के माध्यम से अपने घरों में बिजली पहुँचाते हैं ।

जो आपके घरों में बिजली आती है वह मात्र 220 volt की होती है ।

अब सोचिये कि अगर 5 लाख वोल्टेज की बिजली आपके घरों में प्रवाहित कर दिया जाएगा, तो क्या होगा ?

सारे घर के उपकरण ज़ोर की आवाज करके Blast कर जायेंगे ।

अरे! सब छोड़िए , यही 220 volt की बिजली से सामान्य उपकरण ध्वस्त हो जायेंगे अगर हर उपकरण में Transformer या Resistance न लगा हो जो उसे कम voltage में convert कर उसे उस उपकरण के अनुसार बिजली supply करेंगे ।

बस यही बात आध्यात्म क्षेत्र में होती है ।

यह transformer कौन है ? यह गुरु ही आपका tranformer है जो आपके स्तर के अनुसार ज्ञान का संवाहन करता है ।

यह EHT केबल ही वह गुरु है जो उतनी बड़ी POWER को कम करके धीरे-धीरे आपकी साधना , श्रद्धा के अनुसार आपको प्रदान करता है ।

सभी ज्ञान वह एकसाथ नहीं दे सकता । स्तर आने पर वह उसी के अनुसार वह ज्ञान या आनंद या अनुभव को वह आपके अंदर हस्तांतरित करता है ।

अब देखिए! यह मैंने सबसे तुच्छ उदाहरण लिया है हाई Voltage बिजली का ।

हम जिस पर चर्चा कर रहे हैं वह अलौकिक, परम् दिव्य, परम शक्तिमय , नित्य निरंतर आनंद रस सार , अनंत ऐश्वर्यपूर्ण , अनंत सौंदर्ययुक्त , माधुर्य लावण्य निधि , सच्चिदानन्द सान्द्रांग , अविचिन्तयशक्ति , सर्वसिद्धिनिशेवित, मधुररसनिषेवित, अनंत आनंद के गुह्यतम सिद्धि ह्लादिनी का मूल आनंद है , तो उसमें क्या होगा , यह हम सोच क्या, सोच के भी सोच में नहीं सोच सकते ।

इसलिए भगवान की सभी लीलायें अप्राकृत होती हैं जो अप्राकृत देह से ही दिखती हैं या अनुभव की जा सकती हैं ।

केवट भगवान राम को बड़ के वृक्ष के नीचे सोते हुए देख रहे हैं , और उन्हें पंखा भी झल रहे हैं लेकिन वह केवट की स्त्री जो भगवान के पास जा नहीं पाई , उसके पास बैठे हैं और उसके घर का व्यंजन चख रहे हैं ।

यही तो होता था कि गोपियाँ माखन चुराते हुए नंदलाल को अपने घर में बांध कर आती थी कि आज यशोदा को दिखाऊँगी कि देखो तुम्हारा लाला हमारे घर में माखन चुरा रहा था ।

लेकिन यशोदा के पास पहुँचकर देखती हैं कि अरे! यशोदा वही कृष्ण जिसको घर पर बाँध कर आई थी ,वह तो उनकी गोद में बैठकर खाना खा रहे हैं ।

अरे! नंद के पास लाखों गाय थी , उनके घर दूध दही माखन की नदियाँ बहती थी , लेकिन फिर भी भगवान लीला का रस देने के लिए उन अनपढ़-गंवार लेकिन प्रेम से पगी गोपियों के यहाँ जाते थे ।

यही हाल ब्रह्मा जी का हो गया था । जब उन्होंने देखा कि क्या यही भगवान हैं जो गँवार ग्वाल बालों के मुँह से निवाला छीन छीन कर खा रहे हैं !

बस उन्होंने परीक्षा लेने के लिए सभी गोप बालकों और बछड़ों को लेकर अलोप कर दिया ।

लेकिन जब वापस आये तो देखा वही गोप बालक और गाय बछड़ों के साथ 6 महीने से भगवान के साथ हैं ।

ये छह महीने हमारे हिसाब से हैं लेकिन ब्रह्मा जी के लिए एक क्षण के बराबर था ।

समय और काल का नियम आप सब तो जानते होंगे , जिसे आज की भाषा में Time difference या Time Travel कहते हैं ।

तो ऐसे ही जब शरद पूर्णिमा की अर्द्ध रात्रि में भगवान ने वंशी बजायी तो सभी गोपियाँ आ गयी ।

वैसे स्थूल रूप से देह से कोई गोपी अपने पति के साथ सोई है ,कोई सास के पैर दबा रही है , कोई बीमार पड़ी है ,लेकिन भाव देह से सब भगवान के पास पहुँच गयी जिनको भगवान ने छह महीने तक महारास का अद्भुत रस प्रदान किया ।

तो क्या वह वंशी सबको नहीं सुनाई पड़ी ?

तो क्या छह महीने तक सब सोते ही रहे ?

क्या द्वापर युग में शरद पूर्णिमा छः महीने तक रही थी ?

क्या बिना भूख प्यास के यह महारास चलता रहा ?

अरे! अगर पूर्णिमा छह महीने तक रह गयी तो विज्ञान की दृष्टि से अर्थ यह हुआ कि पृथ्वी ने अपनी धूरी पर घूमना बन्द कर दिया और सूर्य के चक्कर लगाना भी बंद कर दिया ।

अगर चक्कर लगाना बन्द कर दिया या घूमना बन्द कर दिया तो पृथ्वी तुरंत सूर्य के चुम्बकत्व शक्ति से खिंच कर सूर्य के अंदर समा जाएगी और पृथ्वी खत्म ।

तो यह सब कैसे ?

हाँ ! यही सब समझना है हमें । और यह समझ कैसे विकसित होगी ? एकमात्र किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष के बताए साधना के अनुसार मन, बुद्धि, चित्त का शुद्धिकरण करके ।

तो यह बात मन-बुद्धि में पुष्ट कर लें और बिठा लें कि जितनी भी लीलायें होती हैं , वह सब अप्राकृत होती हैं ।

सब भाव देह में स्थित होकर किये जाते हैं और एकमात्र अधिकारी जन ही उसका लाभ प्राप्त कर सकते हैं ।

ये जो गोपियाँ थी , यह कोई भगवान श्रीकृष्ण की हम उम्र नहीं थी !

इन गोपियों में शिशु से लेकर वृद्धा तक सम्मिलित थी ।

ऐसा नहीं था कि इनमें सिर्फ स्त्रियाँ थी !

हैं ....? हमने तो अभी तक स्त्रियाँ ही सुना है ।

हाँ ! सुनने और होने में बहुत बड़ा अंतर है । सुना तो आपने बहुत कुछ है , लेकिन जो सुना है वह सत्य नहीं होता ।

जी हाँ ! ये सब गोपियाँ स्त्रियाँ नहीं थी बल्कि स्त्री , पुरुष , नपुंसक से लेकर वृद्धा वृद्ध तक थे ।

लेकिन जब भाव देह धारण होता था लीला क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए तो गोपी रूप में किशोरावस्था रूप में आकर उस लीला क्षेत्र में प्रवेश होता था ।

देह से भले ही पुरुष है , वृद्ध है लेकिन जब भगवान के आनंददायी क्षेत्र वृन्दावन में भाव देह चिन्मय देह से वह किशोरावस्था में परिणत होकर अनुपम अनुपम सौंदर्य युक्त गोपी रूप में प्रवेश करते थे ।।

दूसरी ओर वह वृद्ध पुरुष खाट पर पड़ा हुआ है ,वह शिशु रूप में माता के स्तन से दूध पी रहा है , लेकिन जब भगवान की वंशी बजती थी तो वह भाव देह से भगवान के पास गोपी के रूप में पहुँच जाते थे और उस परम आनंद का आस्वादन करते थे ।

उस क्षेत्र में देह का कोई महत्व नहीं था ।

जो आजकल के वामपंथी महारास को या गोपियों की क्रीड़ा को अपनी कामजनित कुटिल बुद्धि से प्रेषित करते हैं , उन विष्ठा के कीड़ों को क्या पता कि " महारास" कहते किसे हैं ।

"गोपी" कहते किसे हैं ! क्यों गोपी के ही वेश में वृन्दावन के क्षेत्र में प्रवेश है ? यह सब अगले भाग में, "गोपी" का अर्थ फिर अगले भाग में , तब तक के लिए इस लेख को पचाईये ।

धन्यवाद । 🙏

राधाष्टमी तक यह series अनवरत चलती रहेगी।

Prem Rasik Sh Shwetabh Ji Maharaj
प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
आध्यात्मिक दिग्दर्शक

Shwetabh Pathak
Shwetabh Pathak



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Note

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✨ अक्टूबर में शरद पूर्णिमा के अवसर पर साधना समागम का आयोजन किया जा रहा है,जो कि 24 से 28 अक्टूबर 2026 तक प्रस्तावित है, इस 5 दिवसीय वृन्दावन महोत्सव में भी जो आना चाहते हैं, वह इस नंबर पर सम्पर्क कर सकते हैं ।

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#कर्म #सती #मन #शिव #वेद #महादेव #संगम

प्रश्न :- पुराणों में कई व्रत-उपवासों का वर्णन आता है और लिखा होता है कि यह करने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं जबकि आपका ...
09/09/2026

प्रश्न :- पुराणों में कई व्रत-उपवासों का वर्णन आता है और लिखा होता है कि यह करने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं जबकि आपका कहना है कि सारे पापों को भोगना ही पड़ेगा।
दूसरी बात सप्तशती पाठ, महामृत्युंजय मंत्र जप का कुछ तो प्रभाव होता ही होगा, जबकि आपका कहना है कि इनसे कुछ नहीं होता, अतः कृपया शंका निवारण करने की कृपा करें।

उत्तर :-
आपका तथ्य ग़लत है ।
मैंने यह कभी नहीं कहा कि व्रत-उपवास करने से कुछ नहीं होगा या सप्तशती पढ़ने से कुछ नहीं होगा ।
अगर कहीं कहा हो तो कृपा करके वह वाक्य ले आयें ।
समस्त वेद,शास्त्र, उपनिषद, पुराण से लेकर समस्त संत-महापुरुषों की वाणी, क्रिया, कृत्य बस एक लक्ष्य की ओर लेकर चलते हैं, वह है कि येन केन प्रकारेण मन का लगाव संसार से हटकर भगवान में लगे ।

-प्रवृत्ति मार्ग से हटाकर निवृत्ति मार्ग पर ले चले ।
-प्रेय मार्ग से श्रेय मार्ग की ओर ले चले ।
-अज्ञान से ज्ञान की ओर ले चले ।
-दुःख से सुख या आनंद की ओर ले चले ।

और कोई भी लक्ष्य नहीं है, नहीं है, नहीं है, यह स्वर्ण क्या हीरक अक्षरों में लिख लें और दिमाग में बिठा लें ।

इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए उन्होंने विभिन्न प्रकार के साधन बताये हैं और विभिन्न प्रकार से मन को लगाने का उपाय बताया है ।

प्यार से , पुचकार से , डर से , लोभ से , डरा कर , धमका कर , प्यार करके उन्होंने जीवों को इस क्षेत्र में लाने का प्रयास किया है ।

व्रत-उपवास शारारिक तर्पण अर्थात शरीर की शुद्धता या परिमार्जन के उद्देश्य से बनाया गया है ताकि उसके कारण मनुष्य का शरीर सात्विक Hormones Release करे जो कि मन को पुनः शास्त्रों को समझने और भगवद क्षेत्र में मन लगाने में सहायक बने ।

पुराणों में इसके लिए खूब प्रलोभन दिए गए हैं कि तुम्हारा बच्चा जीवित हो जाएगा , तुम्हारा यह ठीक हो जाएगा इत्यादि ।

देखिये अमृत है । चाहे उसको कोई डरा कर पिला दे , कोई धमका कर पिला दे , कोई धोखे से पिला दे ,कोई प्यार से पिला दे , कोई जबरदस्ती पिला दे , कोई जानबूझकर पी ले , अमृत उसे अमर करके ही रहेगा ।

बस यही नीति और फॉर्मूला हमारे शास्त्रों ने पुराणों ने महापुरुषों ने अपनाया कि इन जीवों को किसी तरह इस क्षेत्र में मोड़ा जाय ।

बाकी का जो आपने कर्म किया है , वह अवश्य भोगना ही भोगना पड़ेगा ।

भगवद्क्षेत्र या धर्म या व्रत-उपवास का आलंबन लेने से यह होगा कि उस भोग को भोगने की शक्ति और सामर्थ्य की वृद्धि होगी ।
जिसके कारण उसका प्रभाव अन्तःकरण पर कम पड़ेगा ।
वरना आपने देखा ही होगा कि एक छोटा-सा दुःख आता है तो कई लोग सहन नहीं कर पाते और आत्महत्या तक कर लेते हैं और कई ऐसे होते हैं कि घोर विपत्ति और दुःख में भी सम बने रहते हैं ।

चौदह वर्ष का कठोर वनवास मिला राम-लक्ष्मण-सीता जी को ।
क्या कौशल्या से लेकर समस्त प्रजाजन उनके निमित्त व्रत-उपवास नहीं कर सकते थे और उनका दुख काट नहीं सकते थे ?
उर्मिला, मांडवी, श्रुतकीर्ति से लेकर जनक, सीरध्वज और उनकी पत्नी सुनयना से लेकर सभी व्रत-उपवास करके टाल सकते थे ।

पांडवों को वनवास मिला ? भगवान कृष्ण उनके साथ थे , चाहते तो पाण्डवों को व्रत करवाकर उनका दुख टाल सकते थे ।
अभिमन्यु मरा , बुरी तरह मारा गया ।
वेदव्यास के साथ मिलकर श्रीकृष्ण व्रत-उपवास करके और महामृत्युंजय जाप करवाकर उसकी मृत्यु टाल सकते थे ।

द्रौपदी के पाँचों पुत्रों अर्थात सभी पांडवों के पुत्रों की हत्या हो गयी । महामृत्युंजय करके क्यों नहीं टाला ?

गांधारी भगवान शंकर की प्रचंड भक्त । लेकिन उसने भी महामृत्युंजय से अपने 100 पुत्रों की मृत्यु को नहीं टाल पाई ।

रावण जैसा ज्योतिषी कहीं नहीं था । उसे पता भी था कि उसकी मृत्यु, उसके भाई की मृत्यु, उसके बेटे की मृत्यु होगी ।

भगवान शंकर का बहुत बड़ा भक्त । लेकिन वह भी व्रत-उपवास महामृत्युजंय से मृत्यु नहीं टाल पाया ।

इक लख पूत सवा लख नाती ।
ता रावण घर दिया न बाती ।।

नल दमयंती , हरिश्चंद्र से लेकर अनंत उदाहरण हैं ।

अरे ! परीक्षित को जानते ही होंगे । उन्हें तो 7 दिन पहले ही पता लग गया था । भगवान शुकदेव साथ में थे, ज्ञान लेने की बजाय अपने पुत्र जनमेजय के साथ मिलकर महामृत्युंजय जाप ही करवा डालते ।

अरे ! सब छोड़िए , कलियुग में ही आईये ।
भगवान शंकर के अवतार आदि जगद्गुरु शंकराचार्य 32 वर्ष की अल्पायु में मुँह से खून फेंककर शरीर त्याग कर देते हैं , क्या वह मूर्ख थे ??
क्यों नहीं महामृत्युंजय जाप करवाया उन्होंने ???
तो इसलिये इन पोंगा पंडितों की बात में आना बंद करिये सभी लोग ।

आप लोग सत्य सुनना चाहते थे न तो सत्य यही है कि कहीं कुछ नहीं है, सब महापुरुष-संत हमें धोखा देते हैं, सभी शास्त्र धोखा देते हैं , हमें lure करते हैं इन सब बातों से ताकि हम लोग किसी तरह ज्ञान प्राप्त कर भगवान के क्षेत्र में चल पड़े ।

★ और महामृत्युजंय का अर्थ कहीं ऐसा नहीं है कि यह मृत्यु टाल देगा ।

लोग कहते हैं - जी बहुत पूजा पाठ करके देख लिया जी, कुछ नहीं होता ! सब बकवास है !
मैं रोज़ मंगलवार को व्रत रखता था और 1 kg लड्डू चढ़ाता था ! क्या हुआ ? मेरा बेटा मर गया ! हनुमान जी ने कुछ नहीं किया !

मैंने अपने बेटे के बीमार होने पर पंडितों से महामृत्युंजय मंत्र का जाप कराया, पर मेरा बेटा नहीं बचा ! मैं नहीं मानता भगवान्-वगवान को !

अरे ! सिद्धांत शास्त्र चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि भगवान् भी अपने नियम के विरुद्ध नहीं जाते !
यहाँ तक कि भगवत प्राप्त महापुरुषों तक को भी यह अधिकार नहीं है कि वह भगवान् के बनाये हुए नियम क़ानून का उल्लंघन करें !

“जगतव्यापार वर्जनं !”

हालांकि वह कर सकते हैं, समर्थ हैं, पर नहीं अगर सच्चा महापुरुष होगा तो वह कदापि नहीं करेगा , भगवान् के नियम के विरुद्ध कभी नहीं जाएगा ! हाँ छोटे-मोटे स्थितिप्रज्ञ महापुरुष जो थोड़ी बहुत रिद्धि सिद्धि पा गये हैं, वो भी थोड़े समय के लिए कुछ अंश टाल सकते हैं , पर उसमें उनका पूरा बैंक बैलेंस ( साधना ) खाली हो जाता है और फिर से उन्हें उसी नर्सरी से चलना पड़ेगा ।

लोग “महामृत्युंजय मंत्र” की बात करते हैं , उसमें कहाँ लिखा है कि मृत्यु टल जायेगी ?
ये है मंत्र :
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌ ।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌ ।।

इसका अर्थ है कि “हे प्रभु ! हमें जन्म-मरण के चक्कर से मुक्त करो और मोक्ष प्रदान करो ! इस मंत्र में कहीं भी जीवन देने वाली बात नहीं कही गयी है ।
ये पंडित लोग खुद इन मन्त्रों का अर्थ नहीं जानते तो वो हमारा क्या कल्याण करेगा ?
अभिमन्यु जिनके मामा स्वयं श्री कृष्ण , गांडीवधारी अर्जुन पिता , विवाह करने वाले वेदों को मथने वाले , भगवन के अंश वेदव्यास , वो तक बचा नहीं पाए तो औरो की क्या बिसात !

इसीलिए महापुरुष और ज्ञानी लोग कहते हैं- “पहले सिद्धांत को समझो, तभी आगे बढ़ पाओगे ।”

आज लोगों के दुःख , निराशा , तरह-तरह के आडम्बर , अंध विश्वास , रूढ़िवादियाँ इसीलिए फ़ैल गयी हैं क्योंकि सिद्धांत का अभाव है ।

प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
आध्यात्मिक दिग्दर्शक
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राधा तत्व :-  प्रथम अध्याय भाग 2 ***************************फिर हम इस पर भी हँसेंगे कि बताओ भगवान शंकर जिनको भगवान कहा ज...
09/09/2026

राधा तत्व :- प्रथम अध्याय भाग 2

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फिर हम इस पर भी हँसेंगे कि बताओ भगवान शंकर जिनको भगवान कहा जाता है , जो त्रिकाल दर्शी हैं , जो अंतर्यामी हैं , वह यह नहीं जान पाए कि गणेश उन्हीं के पुत्र हैं और त्रिशूल से गला काट दिया ???

क्या उनको यह भी नहीं पता चला कि स्वयं माता पार्वती ने उन्हें नियुक्त किया था ।

फिर प्रश्न उठेगा कि माता पार्वती का देह तो चिन्मय है , फिर उससे मैल भला कैसे निकलेगा ??

और उन्हें स्नान की क्या आवश्यकता थी ?

अरे हम जैसे पृथ्वी के जीवों को स्नान की आवश्यकता पड़ती है जहाँ सब धूल और गन्दगी होती है ।

पहली बात तो माता पार्वती का देह तो इन पाँच तत्वों से बना ही नहीं है ।

दूसरी बात तो उनका लोक दिव्य ,चिन्मय और परम शुचित है , वहाँ गन्दगी या इन सब का लवलेश भी नहीं है ।

फिर भगवान शंकर मूर्खों जैसा बर्ताव कर रहे हैं , कि जब कटे हाथी का सिर लगा कर गणेश जी को जीवित कर सकते हैं तो गणेश जी का ही सिर लगा देते और जीवित कर देते ।

तो हम सीधे सीधे भगवान शंकर को अज्ञानी , घोर मूर्ख घोषित कर देंगे ।

अरे गणेश जी की उत्पत्ति से पहले ही गणेश जी की पूजा होती थी और उनको प्रथम पूज्य बनाया जाता था ।

दिमाग भन्ना जाएगा ।

फिर रामायण में आईये ।

सीता जी ने भगवान राम को प्राप्त करने के लिए माता पार्वती के मंदिर में जाकर उनकी पूजा करती हैं ।

फिर यहाँ सीता जी के रावण द्वारा हरण करने पर जब भगवान राम रो रो कर वृक्ष आदि से पूछ रहे थे तो वही सती जी सीता जी का वेश बनाकर भगवान राम की परीक्षा लेने पहुँच जाती हैं ।

हैं ??? ये कैसे ?? माता सती के योगाग्नि में देह त्यागने के उपरांत कई कल्पों तक महादेव समाधि में चले गए थे ,फिर पार्वती जी कैसे आ गयी मन्दिर में जहाँ सीता जी उनकी पूजा करने गयी ??

और जब भगवान शंकर बता रहे हैं कि यही भगवान राम हैं ,ब्रह्म हैं , तब भी जिनको सती कहा जाता है वही अपने ही पति की बात नहीं मान रही हैं कि यह तो स्वयं ब्रह्म हैं और इनकी वाणी स्वयं सिद्ध है । वह झूठ तो बोलेंगे नहीं ।

फिर भी संदेह कर के गयी भगवान राम की परीक्षा लेने ।

और तो और सुनिए । जब भगवान शंकर ने पूछा कि कहाँ गयी थी तो उनसे भी झूठ बोल रही हैं कि "करिय प्रणाम तुम्हहिं की नाईं"

मतलब मैं बस भगवान राम को आपकी तरह ही प्रणाम करके आ गयी।

अरे !! स्वयं जगदम्बा आदि शक्ति क्या इतना नहीं जानती कि उनके पति सर्वज्ञ हैं , अंतर्यामी हैं !!! किससे झूठ बोल रही हैं ??

फिर इतने पर भी नहीं मानी ,भगवान शंकर के मना करने पर भी अपने पिता दक्ष प्रजापति के यहाँ यज्ञ में गयी ।

और देखिए , सबसे बड़ा आश्चर्य !!!

माता सती दक्ष प्रजापति के यज्ञ में भगवान शिव के अपमान पर योगाग्नि प्रकट कर रही हैं यह कहकर कि अगर मैं मन वचन कर्म से भगवान शिव की अनुगामी रही हूँ अर्थात उनके अनुसार ही सब कर्म किया है तो योगाग्नि इस शरीर को जला दे ।

वाह !! हर जगह तो उनकी आज्ञा का उल्लंघन किया और दूसरी ओर बोल रही हैं कि उनके प्रतिकूल एक क्षण को भी नहीं सोचा !!!

और इससे बड़ा आश्चर्य देखिये कि योगाग्नि भी प्रकट हो गयी ।

कहाँ कहाँ जायेंगे आप ??

बिना साधना के स्तर को पार किये हुए , कोई बात नहीं समझ आ सकती , अध्यात्म क्षेत्र का ककहरा भी नहीं जान सकते ।

फिर वही वामपंथियों ,जय भीम प्रजातियों ,पश्चिम विचारकों की तरह तर्क कुतर्क वितर्क करके नास्तिक बन कर स्वयं तो आत्म कल्याण से दूर होना ही है साथ ही साथ अन्य जो इस मार्ग पर किसी तरह चल रहे हैं , उन्हें भी पीछे धकेल देना है ।

बस यही कारण था कि आचार , व्यवहार , भोजन की शुद्धता के कारण हमारे ऋषि मुनियों ने हाथ जोड़कर प्रार्थना किया था कि इन शास्त्रों को स्वयं से कभी न पढें जब तक स्तर न हो जाये ।

वह स्तर और बुद्धि विकसित होगी एकमात्र भगवदतत्व को जानने वाले या किसी तत्वदर्शी के अनुगत होकर ,उसकी सेवा कर के , उसके अनुसार साधना करने के पश्चात । तब जाकर वह कृपा करेगा और फिर वह शास्त्रों वेदों के गूढ़ अर्थों और उनमें छुपे रहस्यों को उद्घाटित करेगा ।

लेकिन वह कब करेगा ?? जब साधना द्वारा आपको यह स्तर प्राप्त हो जाएगा कि उन तत्वों को समझने की बुद्धि विकसित हो उनमें यह गूढ़ अर्थ समाहित करने की शक्ति या धारण शक्ति आये ।

अन्यथा ऊपर ऊपर की बस बातें बताएगा ताकि उसकी बुद्धि के कक्षा के अनुसार वह ज्ञान प्रवेश कर जाए ।

जैसा अभी मैं बता रहा हूँ ।

छः ब्रह्म जिज्ञासु ऋषि सुकेशा, शिविकुमार, सत्यकाम, सौर्यायणि, कौसल्य, भार्गव और कबन्धी ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करने के उद्देश्य से ऋषि पिप्पलाद के पास आये ।

यह सब ब्रहर्षि कुमार थे । जिनके पिता स्वयं ब्रह्मज्ञानी ।

और जो स्वयं ही आत्मज्ञानी थे , जिनके अंदर तप , नियम , व्रत , इंद्रिय निग्रह इत्यादि सब समुचित स्थिति में थे ।

ऋषि पिप्पलाद ने अपनी शरण आए जिज्ञासु ऋषियों से कहा कि पहले से ही तपस्वी होने पर भी आप ब्रह्मचर्य, इन्द्रियसंयम, श्रद्धा, आस्तिकता तथा गुरुसेवा करते हुए एक वर्ष तक गुरुकुल में निवास करिए तत्पश्चात आप अपनी इच्छानुसार किसी भी विषय में प्रश्न करना, यदि मैं उस विषय को जानता हुआ तो आपकी पूछी सभी बात बतला दूंगा। इसके एक वर्ष बाद जिज्ञासु ऋषि आचार्य पिप्पलाद से प्रश्न करना शुरू करते हैं और प्रश्नोपनिषद का वास्तविक उद्घाटन होता है।

इतने बड़े बड़े महर्षि के पुत्रों तक को अधिकारी नहीं माना अध्यात्म तत्व का और क्षुद्र बुद्धि से युक्त लोग कलम और किताब लेकर बैठ जाते हैं इस पर विवेचना करने ।

बस इसीलिए सबको वेद शास्त्र पढ़ने की मनाही थी ।

क्योंकि न उनका भोजन शुद्ध होता है , मांस मदिरा मैथुन में संलिप्तता , आचार विचार व्यवहार अनुकूल न होने के कारण व्रत , संयम , नियम , निदिध्यासन से विमुख , जिसके कारण तामसिक उद्वेग और बुद्धि की शुचिता बिल्कुल नष्ट , फिर जब वह स्वयं पढ़ेंगे तो यही हाल होगा जैसा कि जय भीम प्रजाति , मेश्राम , दिलीप मंडल इत्यादि करते हैं ।

और जिन ऋषि मुनियों ने शास्त्रों के अध्ययन को स्वयं मना किया था , वह सभी ब्राह्मण जाति के नहीं होते थे ।

वर्णाश्रम धर्म में सभी जातियों को चाहे वह ब्राह्मण हो , क्षत्रिय हो , वैश्य हो या शूद्र हो सभी को वानप्रस्थ और सन्यास आश्रम में आना होता था ।

इसलिए किसी भी वेद शास्त्र इत्यादि का अध्ययन स्वयं न करके भगवद प्राप्त महापुरुष या गुरु या जो तत्ववेत्ता हो उसके सानिध्य में रहकर अध्ययन करने का आदेश है ।

स्वाध्याय का अर्थ यह नहीं है कि स्वयं पुस्तक लेकर पढ़ने बैठ जाओ ।

स्वाध्याय का अर्थ यह है कि गुरु के सानिध्य में जो कुछ सीखा है उसका स्वयं से निरन्तर मनन और चिंतन ।

स्वयं से तो आज तक स्वयं ब्रह्मा तक नहीं पढ़ पाए या वेदों को समझ पाए तो हम नारकीय जीव स्वयं से क्या समझ या पढ़त पायेंगे !!

वास्तव में हमने सभी शब्दों की परिभाषा को ही गलत अर्थों में प्रयुक्त किया हुआ है और करते आ रहे हैं ।

उपनिषद में स्वाध्याय का एकमात्र यही अर्थ है कि जो गुरु कुल में गुरु के सानिध्य में पढ़ा समझा गया है उसका एकांत में चिंतन और मनन ।

राधा तत्व को समझने के लिए इतनी बड़ी भूमिका आवश्यक थी ,इसलिए यह सब बताना पड़ा ।

अगले लेख में इसके ऊपर की भूमिका .........

तब तक इसे पचाईये ।

Prem Rasik Sh Shwetabh Ji Maharaj
प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
आध्यात्मिक दिग्दर्शक

Shwetabh Pathak
Shwetabh Pathak

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#कर्म #सती #मन #शिव #वेद #महादेव #संगम

08/09/2026

🙏 Bhakti Mein Dasya Bhav Ki Mahima Kya Hai? ❤️

✨ जानिए Prem Rasik Shri Shwetabh Ji Maharaj से दास्य भाव की वास्तविक महिमा।

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♥️ #भगवान #सनातनधर्म

प्रश्न:- क्या रूप ध्यान से भी श्रेष्ठ कोई साधना है??किसी सम्प्रदाय की बात नहीं कर रहामहाराज जी और आपकी ही बात कर रहा हूं...
08/09/2026

प्रश्न:- क्या रूप ध्यान से भी श्रेष्ठ कोई साधना है??

किसी सम्प्रदाय की बात नहीं कर रहा
महाराज जी और आपकी ही बात कर रहा हूं
इसी मार्ग में क्या रूप ध्यान से भी श्रेष्ठ कोई साधना है प्रभु जी?

उत्तर :-
आप ये समझ लीजिए कि चिंतन से बढ़कर कोई साधना नहीं है ।

चिंतन का परिष्कृत रूप रूपध्यान है ।

समस्त वेद शास्त्र और इस विश्व के जितने धर्म हैं , सबके मूल में चिंतन है ।

ज्ञानियों तक को चिंतन करवाया जाता है कि तुम ब्रह्म हो , मैं ब्रह्म हूँ , तत्त्वमसि , सोऽहं , हंसः, अहं ब्रह्मास्मि आदि , सब चिंतन है ।

योगमार्ग में भी चिंतन है जिसे धारणा, ध्यान, समाधि कहते हैं ।

कर्मकांड में भी सभी क्रियाएं और कर्म चिंतन करवाने के लिए ही करवाये जाते हैं ताकि याद रहे और बार-बार अपना उद्देश्य ध्यान रहे ।

यह मनुष्य चिंतन का ही परिणाम है ।

इस सृष्टि के समस्त जीव-जंतुओं की योनियाँ केवल चिंतन का ही परिणाम है ।

कोई भी IAS, PCS, DOCTOR, engineeer, Scientist, Ra**st, Muderer, Dacoit सब कुछ चिंतन का परिणाम है ।

इसी कारण शास्त्र ने कहा है कि अंतिम समय जिसका चिंतन होगा , उसी की प्राप्ति होगी ।

इसी कारण श्रीमहाराज जी का Atomic वाक्य है -

*साध्य को नित सोचना ही साधना है प्यारे ।*

ये 258 उपनिषद् सब चिंतन के लिए हैं ।
ये चारों वेद सब चिंतन के लिए बने हैं ।

ये सब धर्मों के कुरआन , bible , धम्मपिटक आदि सब चिंतन के लिए हैं ।

"चिंतन" का अर्थ है- "चित्त से भाव बनाकर महसूस करना ।"

"मनन" अलग है ।
मनन में मन का प्रयोग होता है जो तर्क-वितर्क से युक्त होता है ।
इसमें planning मात्र होती है ।
सही ग़लत का निर्णय मनन से किया जाता है ।

लेकिन जब विचार में भाव जुड़ जाते हैं तो वह "चिंतन" कहलाता है ।
जब आप उस तत्त्व को Feel करके कार्य करते हैं तो वह चिंतन कहलाता है ।
चिंतन चित्त से होता है जिसमें भाव अवश्यम्भावी है ।

मनन केवल विचार देता है तर्कों और वितर्कों के संग ।

चिंतन से क्रिया उत्पन्न होती है ।

चिंतन से अगर क्रिया नहीं हो रही है तो वह अब भी मनन वाली स्थिति में है ।

चिंतन क्रिया करने को प्रोत्साहित करता है और कार्य करवाता है ।

मनन केवल विचार देता है कि यह करना है ।

लेकिन जब चिंतन होता है तो वह सोते हुए को Bed पर से उठा देता है उस क्रिया को करने के लिए ।

अगर चिंतन आपको क्रिया करने को बाध्य नहीं करता तो अभी मनन पर ही टिका हुआ है ।

मनन में ज्ञान और विचार दोनों का मिश्रण रहता है ।
वह सही ग़लत के द्वंद्वों में ही फँसा रहता है ।
लेकिन जब मनन पुष्ट हो जाता है तो वह चिंतन का रूप लेता है ।
जिसमें चित्त से भाव निकलते हैं ।
तब वह क्रिया में परिणत होता है ।

अगर वह क्रिया में परिणत नहीं हो रहा है तो वह चिंतन नहीं कहलाता ।

तो यह जो रूपध्यान है यह चिंतन का परिणाम होता है न कि मनन का ।

जब आप श्रवण भक्ति कर रहे होते हैं या Speech सुन रहे होते हैं तो यह मनन होता है ।
लेकिन Speech सुनकर उस पर अमल करने का कार्य चिंतन का होता है ।

तो यह जो रूपध्यान है यह चिंतन का सबसे शक्तिशाली Part है जहाँ हम भाव बनाकर उसे Feel करने की कोशिश करते हैं ।

इसलिए चिंतन ही समस्त साधनाओं का सिरमौर है ।

प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
आध्यात्मिक दिग्दर्शक

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