10/09/2026
राधा तत्व - द्वितीय अध्याय:-
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राधा-कृष्ण तत्त्व सर्वथा अप्राकृत तत्व हैं अर्थात मायिक मन, बुद्धि, इन्द्रियों से परे । यह दिव्य मन बुद्धि और इन्द्रियों से भी परे के तत्त्व हैं । जिनको तत्त्व ज्ञान हो चुका है और जिन्होंने भगवदप्राप्ति कर भी ली है , यह उनके लिए भी अग्राह्य होता है ।
क्योंकि भगवदप्राप्ति के कई स्तर हैं , श्रेणियाँ हैं ।
जैसे दास्य भाव से भगवदप्राप्ति करने वाला महापुरुष माधुर्य भाव में प्रवेश नहीं कर सकता ।
ज्ञान मार्ग से या योग मार्ग से भगवदप्राप्ति करने वाला तत्त्वदर्शी भी प्रेम मार्ग में प्रविष्ट नहीं कर सकता ।
राधा-कृष्ण की समस्त लीलायें अप्राकृत हैं और थी और होती हैं ।
यह लीलायें अप्राकृत क्षेत्र में ( ये वाला वृन्दावन नहीं ) , अप्राकृत मन, बुद्धि, शरीर से अप्राकृत पात्रों में हुई थी ।
उनकी देह आदि सब अप्राकृत होते हैं । यह वह देह नहीं होती जैसा हमारा, आपका या कुत्ता, बिल्ली, गधा, मच्छर का शरीर पंच महाभूत से बना है ।
अप्राकृत कहते हैं जो प्रकृति के पांच तत्त्वों से, तीन गुणों से परे हो ।
प्राकृत देह , मन , बुद्धि ,इन्द्रियाँ तो हमारी होती हैं जो स्थूल या सूक्ष्म प्राकृत तत्त्वों से बनी है ।
अप्राकृत या चिन्मय लीला को देखने , सुनने , समझने , कहने और अनुभव करने के लिए अप्राकृत नेत्र , कान , जिह्वा , इन्द्रियाँ और मन बुद्धि चाहिए ।
ऐसे समझिये जैसे तरंग होती हैं ( waves ), कई प्रकार की होती हैं । उनमें से हम कुछ को देख सकते हैं - जैसे प्रकाश , कुछ को सुन सकते हैं - जैसे Radio तरंगें , कुछ को अनुभव कर सकते हैं - जैसे गामा, X rays आदि और बहुत सी ऐसी तरंगें हैं जिनको हम अपनी इन इन्द्रियों से आभास भी नहीं कर सकते लेकिन वह विभिन्न प्राणियों पर अपना अलग-अलग प्रभाव डालती हैं ।
हमारे शरीर में प्रकृति ने कुछ ही तरंगों को अनुभव या आभास करने के अनुसार बनाया है ।
हर प्राणी के शरीर की अलग-अलग विशेषता है, क्षमता है इन विभिन्न तरंगों को ग्रहण करने और अनुभव में लाने की ।
जैसे चीटियों में जो तरंग ग्रहण करने की क्षमता होगी ,वह मनुष्य में नहीं होगी ।
Virus में जिन तरंगों को अनुभव करने की होगी,वह मनुष्य में नहीं होगी ।
मनुष्य में जो तरंगे ग्रहण करने की क्षमता होगी ,वह हो सकता है किसी अन्य में न हो ।
विज्ञान ने तो अभी मात्र कुछ ही जिसे कहते हैं मात्र 1% तरंगें ही ढूँढने में सफलता पाई है लेकिन इसी प्राकृत पृथ्वी पर अनंत तरंग ऊर्जा भरी पड़ी हैं जिसकी अभी खोज बाकी है ।
ज्यों-ज्यों यह खोज होती जाएगी ,उतना उतना मनुष्य आधुनिक होता जाएगा ।
अब देखिए प्रकृति के प्राकृत तरंगों को ही हमारी प्राकृत देह नहीं ग्रहण कर पा रही है तो विचार कीजिये जो प्रकृति से परे तत्त्व है ,अमायिक है , अप्राकृत तत्व है , उसे हम कैसे अनुभव कर सकते हैं !
अनुभव तो क्या स्वप्न में भी, विचार में नहीं आ सकता ।
ऐसे ही बुद्धि का प्रवेश हृदय के क्षेत्र में नहीं हो सकता ।
ज्ञान का प्रवेश प्रेम क्षेत्र में नहीं हो सकता ।
ज्ञान को पार करके ही प्रेम क्षेत्र या प्रेम राज्य में प्रवेश पाया जा सकता है ।
जब मैं था , तब हरि नहीं , अब हरि हैं मैं नाहिं ।
सब अंधियारा मिट गया , जब दीपक देख्या माहिं ।।
- कबीरदास जी
"मैं" मतलब बुद्धि और ज्ञान का अहंकार ।
कबिरा यहु घर प्रेम का , खाला का घर नाहिं ।
शीश उतारि भुईं धरे , तब पैठे घर माहिं ।।
यह शीश अर्थात बुद्धि अर्थात सब ज्ञान छोड़ना पड़ेगा तब जाकर प्रेम के घर में प्रवेश मिलेगा ।
क्योंकि ज्ञान और बुद्धि की वहाँ गति नहीं है ।
प्रेम पियाला जो पिये , शीश दक्षिणा देय ।
लोभी शीश न दे सके , नाम प्रेम का लेय ।।
- कबीरदास
"शीश" का अर्थ है ज्ञान या बुद्धि ।
लेकिन जो "लोभी" होता है अर्थात भुक्ति -मुक्ति, रिद्धि-सिद्धि आदि का लोभी , वह ज्ञान को छोड़ नहीं पाता , ज्ञान मार्ग का त्याग नहीं कर पाता जिसके कारण वह प्रेम मार्ग में प्रवेश नहीं कर पाता लेकिन नाम लेगा प्रेम का कि मैं प्रेम को जानता हूँ ।
प्रेम बुद्धि का विषय नहीं है ।
ज्ञान बुद्धि का विषय है ।
लेकिन आजकल क्या हो रहा है कि लोग उस क्षेत्र में भी प्रवेश करने की असफल चेष्टा कर रहे हैं जहाँ बुद्धि और मन की गति नहीं है , ज्ञान की गति नहीं है , प्रवेश ही नहीं है ।
प्रेम हृदय का विषय है ।
ऐसे ही अध्यात्म तत्त्व भक्ति का विषय है । "आनंद तत्त्व" बुद्धि का विषय नहीं है , न ही वह मन का विषय है , वह आनंद तत्व दिव्य चित्त या शुचित या शुद्ध अंतःकरण का विषय है ।
अंतःकरण में ही आनंद की प्राप्ति और अनुभूति होगी ।
तो इसीलिए प्राकृत मन बुद्धि चित्त में अप्राकृत विषय अनुभगम्य नहीं है ।
भगवान की जितनी भी लीलायें हुई हैं सब अप्राकृत अवस्था में हुई है ।
इसीलिए गीता में भगवान ने कहा :-
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ।।
अर्थात :- मेरा जन्म ( जो मायामय दिखता या प्रतीत होता है ) और साधुरक्षण आदि कर्म दिव्य हैं अर्थात् अलौकिक हैं अर्थात अप्राकृत हैं , यानी केवल ईश्वरीय तत्त्व से ही होनेवाले हैं ।
इस प्रकार जो तत्त्व से यथार्थ जानता है। हे अर्जुन! वह इस शरीरको छोड़कर पुनर्जन्म अर्थात् पुनः उत्पत्ति को प्राप्त नहीं होता बल्कि मेरे पास आ जाता है । अर्थात वही मुझे जान पाता है ।
यह जितनी भी भगवान की लीलायें हुई हैं सब अप्राकृत थी ।
भगवान वहाँ गाय चरा रहे हैं , गोप बालकों के साथ हैं , लेकिन अप्राकृत रूप से किशोरावस्था में वृन्दावन के कुंज और निकुंज में युगों-युगों के साधकों के साधना का फल प्रदान करने के लिए गोपियों के वेश में ऋषि मुनियों को अपना लीला रस प्रदान कर रहे हैं ।
इसी तरह गोपियाँ भी स्थूल और देह रूप से सभी अपने-अपने घर में पति और सास के साथ कार्य कर रही हैं लेकिन चिन्मय देह और भाव देह से वह वृन्दावन में भगवान के साथ कुंज लीला में राधा कृष्ण की सेवा का आस्वादन कर रही हैं ।
लोगों को लग रहा है कि अरे! चन्द्रावली तो वह देखो कपड़े धो रही है लेकिन चन्द्रावली का भाव और चिन्मय देह भगवान के साथ वृन्दावन में है ।
क्योंकि अलौकिक रस या आनंद जिसे प्राप्त करना है , वह देह को नहीं प्राप्त करना ,वह जीव को और भाव देह को प्राप्त करना है । यह स्थूल शरीर तो उस परमानंद को अनुभव तक नहीं कर सकता , लवलेश मात्र भी आभास मात्र भी अगर इस देह ने उस परमानंद को किया तो इस शरीर की राख तक नहीं बचेगी ।
वह परम आनंद तो दूर की बात है ।
अरे! इस देह में अगर हम लौकिक प्राकृत देवताओं के भी देह की गंध अगर हम सूँघ लें तो तुरंत हृदय के टुकड़े-टुकड़े हो जायेंगे ।
मूर्छा प्राप्त कर तुरंत मर जायेंगे ।
नहीं समझ में आई बात ?
ऐसे समझिये कि वह जो सर्वोच्च परमानंद है । वह Extra Super Voltage है जो आपने Super High Tension Wire से जाते देखा होगा ।
इसमें लगभग 5 लाख वोल्टेज की क्षमता की बिजली का संवाहन होता है ।
इसके नीचे 1 लाख वोल्टेज की क्षमता का Extra High Tension Wire ( EHT ) दिया जाता है जो शहरों में से होकर गुजरता है ।
इसके नीचे फिर Super Tension Cables ( STC ) होती हैं , जिसमें 22 हज़ार वोल्टेज से 35 हज़ार voltage जाती है ।
फिर आता है High Tension Wire ( HT cables ) जिसमें 5000 वोल्टेज से 11 हज़ार voltage का current दौड़ता है ।
फिर इसके नीचे आता है Low Tension cables ( LT Cables ) जिसमें 1000 volt से कम का current दौड़ता है ।
यही आपने अपने खम्भों पर शहरों और गावों में लगा देखा होगा जहाँ से आप cable के माध्यम से अपने घरों में बिजली पहुँचाते हैं ।
जो आपके घरों में बिजली आती है वह मात्र 220 volt की होती है ।
अब सोचिये कि अगर 5 लाख वोल्टेज की बिजली आपके घरों में प्रवाहित कर दिया जाएगा, तो क्या होगा ?
सारे घर के उपकरण ज़ोर की आवाज करके Blast कर जायेंगे ।
अरे! सब छोड़िए , यही 220 volt की बिजली से सामान्य उपकरण ध्वस्त हो जायेंगे अगर हर उपकरण में Transformer या Resistance न लगा हो जो उसे कम voltage में convert कर उसे उस उपकरण के अनुसार बिजली supply करेंगे ।
बस यही बात आध्यात्म क्षेत्र में होती है ।
यह transformer कौन है ? यह गुरु ही आपका tranformer है जो आपके स्तर के अनुसार ज्ञान का संवाहन करता है ।
यह EHT केबल ही वह गुरु है जो उतनी बड़ी POWER को कम करके धीरे-धीरे आपकी साधना , श्रद्धा के अनुसार आपको प्रदान करता है ।
सभी ज्ञान वह एकसाथ नहीं दे सकता । स्तर आने पर वह उसी के अनुसार वह ज्ञान या आनंद या अनुभव को वह आपके अंदर हस्तांतरित करता है ।
अब देखिए! यह मैंने सबसे तुच्छ उदाहरण लिया है हाई Voltage बिजली का ।
हम जिस पर चर्चा कर रहे हैं वह अलौकिक, परम् दिव्य, परम शक्तिमय , नित्य निरंतर आनंद रस सार , अनंत ऐश्वर्यपूर्ण , अनंत सौंदर्ययुक्त , माधुर्य लावण्य निधि , सच्चिदानन्द सान्द्रांग , अविचिन्तयशक्ति , सर्वसिद्धिनिशेवित, मधुररसनिषेवित, अनंत आनंद के गुह्यतम सिद्धि ह्लादिनी का मूल आनंद है , तो उसमें क्या होगा , यह हम सोच क्या, सोच के भी सोच में नहीं सोच सकते ।
इसलिए भगवान की सभी लीलायें अप्राकृत होती हैं जो अप्राकृत देह से ही दिखती हैं या अनुभव की जा सकती हैं ।
केवट भगवान राम को बड़ के वृक्ष के नीचे सोते हुए देख रहे हैं , और उन्हें पंखा भी झल रहे हैं लेकिन वह केवट की स्त्री जो भगवान के पास जा नहीं पाई , उसके पास बैठे हैं और उसके घर का व्यंजन चख रहे हैं ।
यही तो होता था कि गोपियाँ माखन चुराते हुए नंदलाल को अपने घर में बांध कर आती थी कि आज यशोदा को दिखाऊँगी कि देखो तुम्हारा लाला हमारे घर में माखन चुरा रहा था ।
लेकिन यशोदा के पास पहुँचकर देखती हैं कि अरे! यशोदा वही कृष्ण जिसको घर पर बाँध कर आई थी ,वह तो उनकी गोद में बैठकर खाना खा रहे हैं ।
अरे! नंद के पास लाखों गाय थी , उनके घर दूध दही माखन की नदियाँ बहती थी , लेकिन फिर भी भगवान लीला का रस देने के लिए उन अनपढ़-गंवार लेकिन प्रेम से पगी गोपियों के यहाँ जाते थे ।
यही हाल ब्रह्मा जी का हो गया था । जब उन्होंने देखा कि क्या यही भगवान हैं जो गँवार ग्वाल बालों के मुँह से निवाला छीन छीन कर खा रहे हैं !
बस उन्होंने परीक्षा लेने के लिए सभी गोप बालकों और बछड़ों को लेकर अलोप कर दिया ।
लेकिन जब वापस आये तो देखा वही गोप बालक और गाय बछड़ों के साथ 6 महीने से भगवान के साथ हैं ।
ये छह महीने हमारे हिसाब से हैं लेकिन ब्रह्मा जी के लिए एक क्षण के बराबर था ।
समय और काल का नियम आप सब तो जानते होंगे , जिसे आज की भाषा में Time difference या Time Travel कहते हैं ।
तो ऐसे ही जब शरद पूर्णिमा की अर्द्ध रात्रि में भगवान ने वंशी बजायी तो सभी गोपियाँ आ गयी ।
वैसे स्थूल रूप से देह से कोई गोपी अपने पति के साथ सोई है ,कोई सास के पैर दबा रही है , कोई बीमार पड़ी है ,लेकिन भाव देह से सब भगवान के पास पहुँच गयी जिनको भगवान ने छह महीने तक महारास का अद्भुत रस प्रदान किया ।
तो क्या वह वंशी सबको नहीं सुनाई पड़ी ?
तो क्या छह महीने तक सब सोते ही रहे ?
क्या द्वापर युग में शरद पूर्णिमा छः महीने तक रही थी ?
क्या बिना भूख प्यास के यह महारास चलता रहा ?
अरे! अगर पूर्णिमा छह महीने तक रह गयी तो विज्ञान की दृष्टि से अर्थ यह हुआ कि पृथ्वी ने अपनी धूरी पर घूमना बन्द कर दिया और सूर्य के चक्कर लगाना भी बंद कर दिया ।
अगर चक्कर लगाना बन्द कर दिया या घूमना बन्द कर दिया तो पृथ्वी तुरंत सूर्य के चुम्बकत्व शक्ति से खिंच कर सूर्य के अंदर समा जाएगी और पृथ्वी खत्म ।
तो यह सब कैसे ?
हाँ ! यही सब समझना है हमें । और यह समझ कैसे विकसित होगी ? एकमात्र किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष के बताए साधना के अनुसार मन, बुद्धि, चित्त का शुद्धिकरण करके ।
तो यह बात मन-बुद्धि में पुष्ट कर लें और बिठा लें कि जितनी भी लीलायें होती हैं , वह सब अप्राकृत होती हैं ।
सब भाव देह में स्थित होकर किये जाते हैं और एकमात्र अधिकारी जन ही उसका लाभ प्राप्त कर सकते हैं ।
ये जो गोपियाँ थी , यह कोई भगवान श्रीकृष्ण की हम उम्र नहीं थी !
इन गोपियों में शिशु से लेकर वृद्धा तक सम्मिलित थी ।
ऐसा नहीं था कि इनमें सिर्फ स्त्रियाँ थी !
हैं ....? हमने तो अभी तक स्त्रियाँ ही सुना है ।
हाँ ! सुनने और होने में बहुत बड़ा अंतर है । सुना तो आपने बहुत कुछ है , लेकिन जो सुना है वह सत्य नहीं होता ।
जी हाँ ! ये सब गोपियाँ स्त्रियाँ नहीं थी बल्कि स्त्री , पुरुष , नपुंसक से लेकर वृद्धा वृद्ध तक थे ।
लेकिन जब भाव देह धारण होता था लीला क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए तो गोपी रूप में किशोरावस्था रूप में आकर उस लीला क्षेत्र में प्रवेश होता था ।
देह से भले ही पुरुष है , वृद्ध है लेकिन जब भगवान के आनंददायी क्षेत्र वृन्दावन में भाव देह चिन्मय देह से वह किशोरावस्था में परिणत होकर अनुपम अनुपम सौंदर्य युक्त गोपी रूप में प्रवेश करते थे ।।
दूसरी ओर वह वृद्ध पुरुष खाट पर पड़ा हुआ है ,वह शिशु रूप में माता के स्तन से दूध पी रहा है , लेकिन जब भगवान की वंशी बजती थी तो वह भाव देह से भगवान के पास गोपी के रूप में पहुँच जाते थे और उस परम आनंद का आस्वादन करते थे ।
उस क्षेत्र में देह का कोई महत्व नहीं था ।
जो आजकल के वामपंथी महारास को या गोपियों की क्रीड़ा को अपनी कामजनित कुटिल बुद्धि से प्रेषित करते हैं , उन विष्ठा के कीड़ों को क्या पता कि " महारास" कहते किसे हैं ।
"गोपी" कहते किसे हैं ! क्यों गोपी के ही वेश में वृन्दावन के क्षेत्र में प्रवेश है ? यह सब अगले भाग में, "गोपी" का अर्थ फिर अगले भाग में , तब तक के लिए इस लेख को पचाईये ।
धन्यवाद । 🙏
राधाष्टमी तक यह series अनवरत चलती रहेगी।
Prem Rasik Sh Shwetabh Ji Maharaj
प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
आध्यात्मिक दिग्दर्शक
Shwetabh Pathak
Shwetabh Pathak
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Note
✨यदि आप अपने शहर , नगर , ग्राम आदि में भी समागम करवाना हो तो वह सम्पर्क कर सकते हैं । college , Institutions , Management संस्थान , सरकारी संस्थान , company आदि में Motivational सत्र या व्याख्यान के लिए भी आप नीचे दिए गए नंबर पर सम्पर्क कर सूचना प्राप्त कर सकते हैं ।
✨अगर आप श्वेत प्रेम रस संस्था से जुड़ना चाहते हैं और प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज जी के सानिध्य में प्रैक्टिकल साधना का लाभ लेते हैं तो नीचे दिए गए नंबर पर सम्पर्क कर सकते हैं ।
✨ अक्टूबर में शरद पूर्णिमा के अवसर पर साधना समागम का आयोजन किया जा रहा है,जो कि 24 से 28 अक्टूबर 2026 तक प्रस्तावित है, इस 5 दिवसीय वृन्दावन महोत्सव में भी जो आना चाहते हैं, वह इस नंबर पर सम्पर्क कर सकते हैं ।
8950072203, 9305529349
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