08/06/2026
प्रश्न: गुरुजी प्रणाम, अध्यात्म में प्रवेश करने से पहले क्या संसारी माया लोभ प्रपंच आदि देकर रोकना चाहती है या यह मन की परीक्षा होती हैं या कुछ और?
उत्तर: प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
परीक्षा आदि कुछ नहीं होता ।
यह सब मन की धारणा जो हमारे मन में बसी हुई है , उन धारणाओं के विपरीत कोई बात आ जाती है तो हम उसे परीक्षा बोल देते हैं ।
परीक्षा या भगवान ने या गुरु ने मेरी परीक्षा ली , यह सब केवल हमारे मन की धारणा है , इससे भगवान का कुछ लेना-देना नहीं है ।
जो लोग कहते हैं कि भगवान परीक्षा लेते हैं , यह सब केवल अपने मन को बहलाने का तरीका मात्र है ।
अपनी गलती को भगवान पर मढ़ने का तरीका या बचाव ।
इसका आध्यात्मिक सत्य से कोई लेना देना नहीं है । यह एक धारणा है । एक खतरनाक धारणा है ।
इसको समझिये -
जब आप यह धारणा लेकर भक्ति के मार्ग पर चलते हैं कि "मुझे दुःख आएगा, या मेरी परीक्षा होगी", तो आपका मन वह सब पैदा करना शुरू कर देता है ।
दुःख आता है , परीक्षा आती है , कष्ट आता है ।
और आप सोचते हो – "देखो, भगवान मेरी परीक्षा ले रहे हैं।" पर भगवान कहीं खड़ा हुआ कुछ कर नहीं रहा है । यह सब आपका मन कर रहा है ।
आपकी धारणा कर रही है जो आपके मन में समाज , परिवार , पढ़ाई , लिखाई , सदियों से ठूसी गयी धारणायें और मान्यतायें हैं ।
भगवान न तो तुम्हें दुख देने के लिए खड़ा है, न सुख देने के लिए । वह तो बस है एक जगह स्थित , एक नियम उसने बना दिया है और सब उसी से संचालित हो रहा है ।
यह सब खेल हमारे मन का है ।
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम् ।।
अर्थ – मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण है। जब मन विषयों (धारणाओं, विचारों) में आसक्त होता है, तो वही बंधन बन जाता है । और जब वही मन उन धारणाओं , मान्यताओं से मुक्त हो जाता है, तो मोक्ष मिलता है या जीव मुक्त माना जाता है ।
*संकल्पो हि जगत् सर्वम् ।*
मनमूलः हि संसारः ।
यह पूरा जगत तुम्हारे संकल्प से, तुम्हारी धारणा से ही बना है । जो दुख तुम देख रहे हो, वह बाहर नहीं है – वह तुम्हारी धारणा का प्रक्षेपण है ।
तो क्या करना है ??
होश संभालो , दृष्टा बनो । धारणाओं को देखना शुरू करो ।
मान्यताओं को समझना शुरू करो जिसने तुम्हें बाँधा हुआ है । अपनी बुद्धि से काम लो ।
साक्षी भाव से देखो ।
बस एक बार सारी धारणाओं को गिरते हुए देख लो ।
उसे घुलते हुए , नष्ट होते हुए देखो और सब कुछ नष्ट कर दो , क्या अच्छा क्या बुरा , क्या विधि क्या निषेध ।
जिसकी सारी धारणाएँ गिर जाती हैं, उसे अपने स्वरूप का बोध हो जाता है ।
वह समझ जाता है कि वह शरीर नहीं, नाम नहीं, रूप नहीं – वह शुद्ध चेतना है । वह भगवान का अंश है । उसी आनंद का अंश जिसमें कोई धारणा मान्यता या मन की बनाई इधर उधर की बातें नहीं हैं ।
भक्ति का मतलब है आनंद में विलीन होना, शांति में डूब जाना ।
एक प्रयोग करके देखो –
अपने मन में बैठी किसी एक दृढ़ धारणा को लो – जैसे *"मुझे हमेशा देर से सफलता मिलती है"* या *"भगवान ने मुझे दर्द दिया है"।*
या *मुझे कोई समझता नहीं है , मेरे दर्द को कोई समझने वाला नहीं* ,
या कोई victim card खेलना शुरू कर दो , अब उस धारणा को पकड़ो, और पूछो – क्या यह सच है ??
क्या भगवान ने खुद आकर तुमसे कहा या ये दुःख दिया या तुमने यह स्वयं से सोच लिया या उसको स्वयं ही पकड़ा है मन की feeling से ।
फिर उस धारणा को छोड़ो , गिरा दो नीचे । बस देखो कि उसके बिना तुम क्या हो ।
आप पायेंगे – सारा दुख उसी धारणा के गिरने और नष्ट होने के साथ चला गया । नया प्रकाश आ गया ।
जब आप यह समझ जाते हैं कि दुख और परीक्षा भगवान नहीं, आपकी अपनी धारणाएँ पैदा कर रही हैं – तो आप डरना बंद कर देते हैं ।
दुःख की समाप्ति हो जाती है ।
आप किसी से नहीं डरते, आप अपनी धारणाओं के मालिक बन जाते हैं ।
और जब मात्र विचार करने से ही जगत में हलचल पैदा कर सकते हैं – तो फिर क्या असंभव है ??
धारणा शक्ति ही सबसे बड़ी शक्ति है। उसे पहचानिये , उसे समझिये, उसे अपने वश में करिये ।
एक लाइन में सार –
"भगवान तुम्हारी परीक्षा नहीं ले रहा – तुम्हारी अपनी धारणाएँ तुम्हारी परीक्षा ले रही हैं ।
बस साक्षी बनकर देखो, सारी धारणाएँ गिर जाएँगी, और तुम अपने शुद्ध स्वरूप में स्थिर हो जाओगे ।"
Prem Rasik Sh Shwetabh Ji Maharaj
प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
आध्यात्मिक दिग्दर्शक
Shwetabh Pathak
Shwetabh Pathak
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