Shiv Jyotish Kendra

Shiv Jyotish Kendra Astrology, daily predictions

28/04/2026

मलमास/अधिक मास/अधिमास/पुरुषोत्तम मास :~
सम्वत् 2083 सन 2026/27 में वर्ष में 12 नही 13 महीने होंगे जिसमें ज्येष्ठ का माह 30 दिन की जगह 59-60 दिन का होगा।
जब चंद्र वर्ष में कोई महीना दो बार आता है, तो एक महीना #निज (शुद्ध) और दूसरा #अधि (अधिक/मल) कहलाता है।

शुद्ध ज्येष्ठ
02-05-2026 से 16-05-2026
मलमास/पुरुषोत्तममास
17-05-2026 से 15-06-2026
शुद्ध ज्येष्ठ मास
16-06-2026 से 29-06-2026

हिन्दू कैलेण्डर में हर तीन साल में एक बार एक अतिरिक्त माह आता है,जिसे अधिकमास,मल मास या पुरुषोत्तम मास कहते है। जो हर 32 माह, 16 दिन और 8 घटी के अंतर से आता है भारतीय गणना पद्धति के अनुसार प्रत्येक सूर्य वर्ष 365 दिन और करीब 6 घंटे का होता है, वहीं चंद्र वर्ष 354 दिनों का दोनों वर्षों के बीच लगभग 11 दिनों का अन्तर होता है,जो हर तीन वर्ष में लगभग 1 मास के बराबर हो जाता है।

इस अन्तर को पाटने के लिए तीन साल में एक चन्द्र मास अस्तित्व में आता है,जिसे अतिरिक्त होने के कारण अधिक मास का नाम दिया गया और इसीलिए हर 3 वर्षों पर हिन्दू कैलेंडर में मास की संख्या 12 से बढ़कर 13 हो जाती है।
चूँकि इस महीने में सूर्य संक्रांति नहीं होती यानी सूर्य किसी राशि में प्रवेश नहीं करते, इसलिए इसे 'मल' (अशुद्ध) मास मान लिया गया और इसमें शुभ कार्यो को वर्जित माना गया।

शास्त्रानुसार ज्येष्ठ/अधिक मास का फल -

ज्येष्ठद्वये नृपध्वंसो-धान्यानिक्षितिसत्तमे ।
अर्थात् जिस वर्ष दो ज्येष्ठ आवें, उस वर्ष राष्ट्राध्यक्षों में परस्पर टकराव होते हैं। किसी विशिष्ट गणमान्य राजनेता के निधन एवं अपदस्थ होने के योग बनते हैं,और साथ ही कहीं शासन-परिवर्तन के। उपद्रव एवं हिंसक घटनाएं घटित हों। प्रजा में रोगों से कष्ट, परन्तु यज्ञ और दानादि अधिक होंगे।

ॐ विष्णुरूपी सहस्रांशुः सर्वपापप्रणाशनः ।
अपूपान्न प्रदानेन मम पापं व्यपोहतु ।।
इसके बाद आगे लिखे मन्त्र से भगवान् विष्णु को प्रार्थना करें-

यस्य हस्ते गदाचक्रे गरुडोयस्य वाहनम् ।
शङ्खः करतले यस्य स मे विष्णुः प्रसीदतु ।।

इसके अतिरिक्त ज्येष्ठ अधिक मास में #श्रीपुरुषोत्तम_माहात्म्य का पाठ, #श्रीविष्णु_स्तोत्र, #श्रीविष्णु_सहस्रनाम और #श्रीसूक्त आदि का पाठ उत्तम है।

भारतीय मनीषियों ने अपनी गणना से हर चन्द्र मास के लिए एक देवता निर्धारित किए चूंकि अधिकमास सूर्य और चन्द्र मास के बीच सन्तुलन बनाने के लिए प्रकट हुआ था , तो इस अतिरिक्त मास का अधिपति बनने के लिए कोई देवता तैयार नहीं हुए तब ऋषि मुनियों ने भगवान विष्णु से आग्रह किया कि वे ही इस मास का भार उठाएं भगवान विष्णु ने इस आग्रह को स्वीकार कर लिया और इस तरह मलमास के साथ यह पुरुषोत्तम मास भी बन गया।

अन्य कथानुसार हिरण्यकश्यप ने अपने घोर तप से ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया तथा उनसे अमरता का वरदान माँगा। ब्रह्मा जी ने जब यह वरदान नहीं दिया तो उसने अपनी बुद्धि अनुसार बड़ी चतुराई से अपनी मृत्यु को असंभव बनाने वर मांगा कि उसे संसार का कोई नर-नारी,पशु,देवता या असुर ना मार सके ना ही वर्ष के 12 महीनों में मृत्यु प्राप्त हो। जब वह मरे, तो ना दिन हो ना रात हो , ना किसी अस्त्र से मरे ना शस्त्र से उसे ना घर में मारा जा सके, ना ही घर से बाहर। इस वरदान के मिलते ही हिरण्यकश्यप स्वयं को अमर मानने लगा और उसने स्वयं को भगवान घोषित कर दिया।
तब प्रह्लाद को बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अधिक मास में नरसिंह अवतार (आधा पुरुष आधे शेर) में प्रकट होकर, गोधुली बेला में, उसके महल की देहरी पर अपनी जंघा पर रखकर अपने नाखूनों से हिरण्यकश्यप का सीना चीर दिया।
इसलिए भी इस मास में भगवान विष्णु की पूजा की जाती है।

कुछ मान्यताओं के अनुसार 13 दिन के पक्ष को अशुभ मानते है तथा किसी कि मृत्यु का शोक भी तेरहवी तक मनाया जाता है। इसलिए स्वयं को दुःख और मृत्यु से दूर रखने के लिए मलमास, जो कि तेरहवां महीना होता है, में भगवान शिव की भी आराधना की जाती है।

मलमास में शुभ कार्य न कर ईश्वर कि प्रार्थना करने को प्राथमिकता दी गयी है।
वैसे वैज्ञानिक या व्यावहारिक दृष्टि से मलमास में कोई भी शुभ कार्य करने में कोई समस्या नहीं है यदि 13 अंक का आपके मस्तिष्क में किसी प्रकार का कोई दुष्प्रभाव नहीं है, क्योंकि मस्तिष्क से ही सब कुछ नियन्त्रित होता है ,यदि मस्तिष्क में कोई बात रह जाए तो वह हमारे क्रिया-कलाप को प्रभावित कर सकती है अन्यथा कोई समस्या नहीं है।
शिव ज्योतिष केन्द्र

आप सभी को रामनवमी की शुभकामनाएँ ~भक्ति काल में वृन्दावन में सन्त कुम्भनदास रहते थे वो हर समय ठाकुर जी की भक्ति में लीन र...
27/03/2026

आप सभी को रामनवमी की शुभकामनाएँ ~

भक्ति काल में वृन्दावन में सन्त कुम्भनदास रहते थे वो हर समय ठाकुर जी की भक्ति में लीन रहते थे और पूरे नियम से भगवान की सेवा करते थे, वे उन्हें छोड़ कर कहीं नहीं जाते थे, ताकि उनकी सेवा में कोई विघ्न न हो।

एक दिन वृन्दावन में ही एक जगह उनके लिए भागवत् कथा करने का न्योता आया, पहले तो उन्होंने मना कर दिया लेकिन लोगों के जोर देने पर वे कथा कहने के लिए तैयार हो गए। उन्होंने सोचा कि भगवान की सेवा की तैयारी करके वे रोजाना कथा करके वापस लौट आएंगे, जिससे भगवान का सेवा नियम भी नहीं छूटेगा।

सन्त कुम्भनदास ने जाते समय अपने बेटे से कहा कि वे भोग तैयार कर चुके हैं, तुम्हें बस समय पर ठाकुर जी को भोग लगा देना है। उनका बेटा रघुनन्दन छोटा था, उसे समझ में आया कि भोग लगाने पर भगवान खुद आकर प्रसाद ग्रहण करते हैं। इधर, कुम्भनदास ने अपने बेटे रघुनन्दन को समझाया और वहाँ से प्रस्थान कर गए। इसके बाद समय पर रघुनन्दन ने भोजन की थाली ठाकुर जी के सामने रखी और सरल मन से आग्रह किया कि ठाकुर जी आओ और भोग लगाओ, उसके बाल मन में यह छवि थी कि वे आकर अपने हाथों से भोजन करेंगे, जैसे हम सभी करते हैं। उसने बार-बार ठाकुर जी से आग्रह किया लेकिन भोजन तो वैसे का वैसे ही रखा रहा।

अब रघुनन्दन उदास हो गया और रोते हुए पुकारा कि ठाकुर जी आओ और भोग लगाओ नही तो मैं भी भूखा रहूंगा जिसके बाद ठाकुर जी ने एक बालक का रूप धारण किया और भोजन करने बैठ गए। यह देखकर रघुनन्दन बहुत प्रसन्न हुआ। रात को जब कुम्भनदास जी ने लौट कर पूछा- बेटा, तुमने ठाकुर जी को भोग लगाया था तो रघुनन्दन ने कहा- हाँ , उन्होंने प्रसाद मांगा तो पुत्र ने कहा कि ठाकुर जी ने सारा भोजन खा लिया, उन्होंने सोचा कि बच्चे को भूख लगी होगी तो सारा भोजन उसने ही खा लिया होगा।

अब तो ये रोज का नियम हो गया कि कुम्भनदास जी भोजन की थाली लगाकर जाते और रघुनन्दन ठाकुर जी को भोग लगाते और जब वे वापस लौटकर प्रसाद मांगते तो एक ही जवाब मिलता कि ठाकुर जी ने सारा भोजन खा लिया। कुम्भनदास जी को अब लगने लगा कि बेटा झूठ बोलने लगा है।

इसका पता लगाने के लिए सन्त कुम्भनदास ने एक दिन लड्डू बनाकर थाली में सजा दिए और छिप कर देखने लगे कि बच्चा क्या करता है, रघुनन्दन ने रोज की तरह ही ठाकुर जी को पुकारा तो ठाकुर जी बालक के रूप में प्रकट हो गए और लड्डू खाने लगे। यह देखकर कुम्भनदास जी दौड़ते हुए आए और प्रभु के चरणों में गिरकर विनती करने लगे। उस समय ठाकुर जी के एक हाथ मे लड्डू और दूसरे हाथ वाला लड्डू मुख में जाने को ही था कि वे जड़ हो गए।

ठाकुर जी के इसी मनमोहक, अद्भुत और अप्रतिम स्वरूप को 'लड्डू गोपाल' कहा जाने लगा और उसके बाद से ही उनकी इसी रूप में पूजा की जाती है और ये लड्डू गोपाल कहलाए।

मन्त्र :~मन्त्र का अर्थ होता है मन को एक तंत्र में बांधना। यदि अनावश्य विचार उत्पन्न हो रहे हैं और जिनके कारण चिन्ता पैद...
26/03/2026

मन्त्र :~
मन्त्र का अर्थ होता है मन को एक तंत्र में बांधना। यदि अनावश्य विचार उत्पन्न हो रहे हैं और जिनके कारण चिन्ता पैदा हो रही है, तो मन्त्र सबसे कारगर औषधि है। आप जिस भी ईष्ट की पूजा, प्रार्थना या ध्यान करते हैं उसके नाम का मन्त्र जप सकते हैं।

मन्त्र 3 प्रकार के होते हैं - सात्विक, तान्त्रिक और साबर। सभी मन्त्रों का अपना अलग महत्व है। प्रतिदिन जपने वाले मंत्रों को सात्विक मन्त्र माना जाता है। कुछ ऐसे मंत्र होते हैं जिनमें से कोई भी मन्त्र प्रतिदिन जपने से मन को शक्ति और सभी संकटों से मुक्ति भी मिलती है।
इन मंत्रों के जप या स्मरण के वक्त सामान्य पवित्रता का ध्यान रखें। जैसे घर में हो तो देवस्थान में बैठकर, कार्यालय में हो तो पैरों से जूते-चप्पल उतारकर इन मंत्र और देवताओं का ध्यान करें। इससे आप मानसिक बल पाएंगे और आपकी ऊर्जा बढेगी।

#क्लेशनाशक_मंत्र :
कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।
प्रणत क्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नम:॥

#शांतिदायक_मंत्र :
श्री राम, जय राम, जय जय राम।

#चिंतामुक्ति_मंत्र :
ॐ नम: शिवाय।

#संकटमोचन_मंत्र :
ॐ हं हनुमते नम:।*

#शांति_सुख_और_समृद्धि_हेतु :
भगवान विष्णु के कुछ मंत्र :-
1) ॐ नमो नारायण।
2) ॐ भूरिदा भूरि देहिनो, मा दभ्रं भूर्या भर। भूरि घेदिन्द्र दित्ससि।।
ॐ भूरिदा त्यसि श्रुत: पुरूत्रा शूर वृत्रहन्। आ नो भजस्व राधसि।।
3) ॐ नारायणाय विद्महे,वासुदेवाय धीमहि।
तन्नो विष्णु प्रचोदयात्।।*
4) त्वमेव माता च पिता त्वमेव। त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव। त्वमेव सर्व मम देवदेव।।

5) शांताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशम्।
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।।
लक्ष्मीकान्तंकमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्।
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।

#मृत्यु_पर_विजय के लिए #महामृंत्युजय_मंत्र :*
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिंपुष्टिवर्द्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धानान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्।।
शिव ज्योतिष केन्द्र

जब जीवन में संकट या डर का समय हो, तो हनुमान जी की शरण में जाने का सबसे सरल और प्रभावशाली मार्ग पूर्ण विश्वास और समर्पण ह...
21/03/2026

जब जीवन में संकट या डर का समय हो, तो हनुमान जी की शरण में जाने का सबसे सरल और प्रभावशाली मार्ग पूर्ण विश्वास और समर्पण है।

#हनुमान_चालीसा का पाठ :~
यह सबसे सुलभ उपाय है संकट के समय "जो सत बार पाठ कर कोई, छूटहि बंदि महा सुख होई" के भाव से निरंतर पाठ करने से मानसिक शक्ति मिलती है और भय दूर होता है।
मन में यह अटूट विश्वास रखें कि "अंजनीपुत्र" आपकी रक्षा करेंगे।
डर के समय केवल #हनुमते_नमः" का मानसिक जाप करते रहें।

#राम_नाम का जाप :~
हनुमान जी को प्रसन्न करने का सबसे छोटा रास्ता भगवान राम का नाम लेना है। "राम" नाम का जाप करने वाले की रक्षा हनुमान जी स्वयं करते हैं।

#संकटमोचन_हनुमानाष्टक :~
यदि संकट बहुत गहरा हो, तो 'संकटमोचन हनुमानाष्टक' का पाठ करना चाहिए। इसकी हर चौपाई संकटों को काटने वाली मानी गई है।

#बजरंग_बाण का पाठ :~
जब शत्रु भय या कोई अज्ञात डर बहुत अधिक सता रहा हो, तब बजरंग बाण का पाठ करना अत्यंत प्रभावशाली होता है (इसे हमेशा नही केवल विशेष कठिन परिस्थितियों में ही करना चाहिए)।

#सात्विकता :~
हनुमान जी की शरण में रहने के दौरान खान-पान और विचारों में शुद्धता रखें।

#दीपक_प्रज्वलित करना :~
हनुमान जी के सामने चमेली के तेल या शुद्ध घी का दीपक जलाकर अपनी समस्या उनसे कहें।
हनुमान जी 'संकटमोचन' हैं, वे केवल सच्चे मन की पुकार सुनते ही अपने भक्त की सहायता के लिए तत्पर हो जाते हैं।

19/03/2026
18/03/2026

रौद्र नामक संवत्सर में विक्रमी संवत 2083 का प्रवेश चैत्र अमावस्या की समाप्ति 19 मार्च 2026 ई. की प्रातः 06:53 मि. पर उत्तराभाद्रपद नक्षत्र- कालीन द्वीस्वभाव मीन लग्न में उदित होने के कारण लग्न-भाव केन्द्रीय नेतृत्व भाव में सूर्य-शनि आदि उग्र ग्रहों का योग बनने से विश्व अथवा एशिया के किसी प्रमुख नेता का पद से हटना सम्भव है।

द्वादश भाव अर्थात गुप्तशत्रु एवं षडयन्त्रो से सम्बन्धित के भाव में मंगल-राहू से अंगारक-योग बनने के कारण विश्व के अधिकांश देशों के मध्य परमाणु एवं अन्य संहारक हथियारों की प्रतिस्पर्धा बढेगी।

पश्चिमी एशिया इजरायल, फिलीस्तीन, ईरान, लेबनान और पाकिस्तान तथा दक्षिण एशिया के देशों में कहीं अग्निकाण्ड, हिंसक आन्दोलन एवं विस्फोटक घटनाएं होने की सम्भावनाएं हैं ।

चैत्र मास 4 मार्च से 2 अप्रैल में पाँच बहस्पतिवार, 14 मार्च तक #चतुर्गहीयोग ,13 मार्च से #कालसर्पयोग ,14 मार्च से #सूर्य_शनि तथा #मंगल_राहू योग रहने से कई देशों में भारी अशान्ति बनेगी। प्रधान-नेता के खिलाफ जन आन्दोलन या सत्ता-हस्तान्तरण या अचानक सत्तापरिवर्तन होने के भी योग।

#पंचग्रही_योग रहने से विश्व में कई देशों के मध्य युद्ध की परिस्थितियाँ बनेगी।
भयंकर प्राकृतिक प्रकोपों भूकम्प, बवण्डर आदि से जन धन हानि का भय किसी मुस्लिम अथवा एशिया के ही देश में क्रान्ति, विरोध प्रदर्शन या छत्रभंग होगा।

एकराशौ यदा यान्ति चत्वारः पंचशेखरा: ।
प्लावयन्ति मही सर्वा रूधिरेण जलेन वा।

बैसाख 3 अप्रैल से 1 मई में पाँच शुक्रवार, मंगल-शनि योग, काल योग रहने से विश्व के कुछ देशों में तख्तापलट की घटनाएँ घटित होंगी और युद्ध की सम्भावना। शान्ति-वार्ता से कोई परिणाम नहीं निकलेगा।

प्रथम ज्येष्ठ मास 2 मई से 31 मई में पाँच शनिवार एवं पांच रविवार, 15 तारीख से सूर्य पर शनि की विशेष दृष्टि रहने से विश्व में अशान्ति रहेगी। कहीं भूकम्प , तूफान आदि प्राकतिक दूर्षटनाएं एवं हिंसक वारदातें आदि होंगी ।

द्वितीय ज्येष्ठ मास 1 जून से 29 जून में पाँच सोमवार, 15 जून को #खप्पर योग बनने एवं एक ही दिन संक्रान्ति एवं अमावस आना , कालसर्प योग के साथ ही गुरु- शुक्र योग तथा मंगल पर शनि की दृष्टि भी रहेगी। इन योगों के प्रभाव से पाकिस्तान, चीन आदि पड़ोसी देश भारत के प्रति कुटिल चालों का प्रयोग करेंगे।

आषाढ़ मास 30 जून से 29 जुलाई में पाँच मंगलवार, 14 जुलाई को भौमवती अमावस , गुरु का कर्कराशि मे अतिचारी गति से संचार, शनि-मंगल का दृष्टि सम्बन्ध तथा 26 जुलाई से शनि का वक्री होना। इस अवधि में पाक, ईरान, गाजा, सीरिया, कतर आदि इस्लामिक देशों में कहीं युद्ध तो कहीं हवाई-अड्डों पर आक्रमण कहीं विस्फोट होंगे ,कहीं अकाल व अराजकता फैलने का भय होगा --
अतिचारगते जीवे वक्री भूते शनैश्चरे।
हा ! हा ! भूतं जगत सर्व रुण्डमाला महीतले।।
अपरं च-शनि वक्रे, दभिक्षंच राजां यदं परस्परम्।।
पाकिस्तान, यूक्रेन, सीरिया, ईरान, गाजा, लेबनान, यमन आदि देशों में अप्रत्याशित घरनाएँ घटित होने के संकेत।

श्रावण मास 30 जुलाईं से 28 अगस्त में पाँच गुरुवार तथा पाँच शुक्रवार आने और अगस्त तक गुरु अस्त रहने से आर्थिक मन्दी तथा बेरोजगारी के कारण आर्थिक संकट।

भाद्रपद मास 29 अगस्त से 26 सितम्बर में पांच शनिवार होने से पश्चिमी एशिया के देशों में सत्ता-परिवर्तंन , अग्निकाण्ड, यान-दुर्घटनाएँ, किसी बडे नेता या व्यक्ति की हत्या या निधन की सम्भावना।

आश्विन मास 27 सितम्बर सें 26 अक्टूबर में 5 रविवार, शनिवारी संक्रान्ति, सूर्य-शनि का समसप्तक योग होने से महाशक्तियों के मध्य टकराव का माहौल। इस्लामिक देशों में यदजन्य माहौल बनेगा अमरीका-रूस एवं चीन-अमरीका का शीत एवं आर्थिक-युद्ध नई दिशा लेगा।

कार्तिक मास 27 अक्तूबर से 24 नवंबर पाँच मंगलवार होने से विश्व युद्ध का भय, राजनीतिक उलट-फेर, उपद्रव तया किसी प्रमख नेता की आकिस्मक मृत्यु, अग्निकाण्ड व भूकम्प आने के संकेत हैं।
शिव ज्योतिष केन्द्र

इस बार 19-03-2026 से चैत्र नवरात्र शुरू होंगे जिसका समापन 27-03-2026 को होगा। इस समयावधि में माँ दुर्गा के नौ रूपों की व...
18/03/2026

इस बार 19-03-2026 से चैत्र नवरात्र शुरू होंगे जिसका समापन 27-03-2026 को होगा।
इस समयावधि में माँ दुर्गा के नौ रूपों की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है साथ ही जीवन में सुख-शान्ति के लिए व्रत किया जाता है।
मान्‍यता के अनुसार, नवरात्र में जिस वाहन पर माँ दुर्गा आती हैं उसका अलग-अलग अर्थ होता है।

शशिसूर्ये गजारूढ़ा । शनिभौमे तुरंगमे।।
गुरौ शुक्रे चदोलायां । बुधे नौका प्रकी‌र्त्तिता ।।

श्लोक के अनुसार , सोमवार या रविवार को घट स्थापना होने पर मां दुर्गा का वाहन हाथी होता है। शनिवार या मंगलवार को नवरात्रि की शुरुआत होने पर वाहन घोड़ा होता है। इसके अलावा, गुरुवार या शुक्रवार को देवी डोली में बैठकर आती है। बुधवार से नवरात्र शुरू होने पर मां दुर्गा नाव में आती है।

इस बार नवरात्र बृहस्पतिवार से आरम्भ हैं तो इसका तात्पर्य है माँ पालकी पर सवार होकर आ रही हैं।
शास्त्रों की मानें तो अगर मां पालकी पर सवार होकर आती हैं, तो इसे किसी महामारी का संकेत माना जाता है मां दुर्गा के वाहन शुभ को शुभ नहीं माना जाता यह देश-दुनिया में बीमारियाँ, प्राकृतिक आपदाएँ, राजनीतिक अस्थिरता और व्यापार में मंदी का संकेत है। इसका अर्थ है, आने वाले छह महीनों में अधिक संघर्ष और उथल-पुथल की स्थिति बनी रह सकती है।

मां दुर्गा हाथी पर सवार होकर आती हैं तो ज्यादा बारिश होती है।
घोड़े पर सवार होकर मां दुर्गा आती हैं, तो युद्ध के हालात बनते है।
नौका पर सवार होकर माता रानी आती हैं, तो यह फलदायी है।
मां दुर्गा डोली पर सवार होकर आती हैं, तो महामारी का अंदेशा है।
मां नौका पर सवार होकर आती है, तो सर्व काम में सिद्धि होती है।

माता के जाने का वाहन :~

शशि सूर्य दिने यदि सा विजया , महिषागमने रुज शोककरा।
शनि भौमदिने यदि सा विजया , चरणायुध यानि करी विकला।।
बुधशुक्र दिने यदि सा विजया , गजवाहन गा शुभ वृष्टिकरा।
सुरराजगुरौ यदि सा विजया , नरवाहन गा शुभ सौख्य करा॥

रविवार या सोमवार को मां दुर्गा भैंसे की सवारी से प्रस्थान करती है जब-जब वह ऐसा करती है, देश में रोग और शोक बढ़ता हैं।
शनिवार या मंगलवार को देवी मुर्गे पर प्रस्थान करती है, जिससे दुख और कष्ट बढ़ते है।
मां बुधवार या शुक्रवार को हाथी पर प्रस्थान करती है, तो बारिश अधिक होने का संकेत होता है।
गुरुवार को मां दुर्गा के प्रस्थान का वाहन मनुष्य होता है, जिससे सुख और शांति की वृद्धि होती है।
सन्ध्या जोशी
शिव ज्योतिष केन्द्र।

सपने में स्वप्न में हनुमानजी को देखना बहुत ही शुभ है, लेकिन यह भी देखना होगा कि बजरंगबली आपको किस रूप और अवस्था में दिखा...
13/03/2026

सपने में स्वप्न में हनुमानजी को देखना बहुत ही शुभ है, लेकिन यह भी देखना होगा कि बजरंगबली आपको किस रूप और अवस्था में दिखाई देते हैं क्योंकि हर सपने के अलग अलग अर्थ होता है।

🚩सपने में हनुमान जी को देखना :~ सपने में हनुमानजी का सामान्य रूप देखना या हनुमानजी का मन्दिर अथवा मूर्ति दिखाई दे तो समझें कि हनुमानजी की आप पर कृपा प्रारंभ हो चुकी है। इसका अर्थ है कि आपको बड़ी सफलता मिलने वाली है। यदि कोई कानूनी मामले हैं तो उसमें भी विजय मिलने की सम्भावना है। यह आपके सौभाग्य का प्रतीक भी है।

🚩सपने में बालाजी को देखना :~ बालाजी हनुमानजी का बाल रूप है। यदि आपको उनका बाल रूप दिखाई दे तो इसका अर्थ है कि बहुत जल्द ही कार्यक्षेत्र में आपको कोई नया पद या जिम्मेदारी मिलने वाली है जिसमें आपको सफलता मिलेगी।

🚩सपने में बंदर को देखना :~यदि आपको दो बार किसी बंदर के सपने आए तो आप समझ जाएं कि हनुमानजी की आप पर कृपा है।

🚩सपने में हनुमान जी को क्रोधित देखना :~ यदि सपने में हनुमान जी का रौद्र रूप दिखे तो इसका अर्थ है कि आपसे कोई बड़ी गलती हुई है। आपको क्षमा मांगकर अपनी गलती सुधारनी चाहिए।

🚩सपने में पंचमुखी हनुमानजी देखना :~ सपने में पंचमुखी हनुमान जी दिखाई देने के अर्थ है कि आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होने वाली है और अपने शत्रुओं पर विजय मिलेगी।

🚩सपने में हनुमानजी की पूजा करना :~ यदि स्वप्न में आप हनुमानजी जी की पूजा या भजन कर रहे हैं और उनके समक्ष प्रसाद भी ग्रहण कर रहे हैं तो आपके सभी कार्य पूर्ण होने वाले हैं और आपको मान सम्मान की प्राप्ति होगी।

🚩सपने में हनुमानजी का प्रसाद खाना :~ किसी कीर्तन में बैठकर हनुमानजी का प्रसाद खा रहे हैं तो आप पर हनुमानजी की विशेष कृपा है।

🚩श्रीराम जी के साथ हनुमान जी को देखना :~ यदि आपको स्वप्न में हनुमाजी या श्री राम जी किसी भी प्रकार से दर्शन दे तो समझ लें कि उनकी कृपा है आप पर।

🚩सपने में हनुमान जी को उड़ते हुए देखना:-* इस सपने का अर्थ ये होता है कि आने वाले दिनों में आपको सफलता के साथ ही आनंद की प्राप्ति होने वाली है। कार्यक्षेत्र में आपका पद बढ़ने वाला है और इसी के साथ मान सम्मान भी बढ़ जाएगा। व्यापारी हैं तो बड़ा फायदे मिलने वाला है।

🚩हनुमान जी को चोला चढ़ाना :~ इसका अर्थ है कि नौकरी और व्यवसाय में तरक्की होगी आप अपने कार्यक्षेत्र में ऊंचाई को छूएंगे, आपका मान सम्मान बढ़ेगा।

🚩सपने में हनुमान जी से बात करना :~ यदि आप किसी परेशानी से घिरे हुए हैं तो यह सपना इस बात का संकेत है कि आपको अपने किसी मित्र या परिजन से बात करनी चाहिए और समस्या का हल निकालने के लिए उनका साथ लेना चाहिए। आपकी दुविधा दूर होगी।

🚩सपने में हनुमान जी का नाम लेना :~ इसका अर्थ है कि आप को कोई मदद मिलने वाली है और जल्द ही हनुमानजी आप पर कृपा करेंगे।
जय श्रीराम
शिव ज्योतिष केन्द्र

नवरात्र :-नवरात्र वर्ष में चार बार  आतें है ।चैत्र, आषाढ़, शरद्  और  माघ महिनों के  शुक्ल पक्ष में ।पूजन मन्त्र  -" ऊॅ  ...
13/03/2026

नवरात्र :-
नवरात्र वर्ष में चार बार आतें है ।
चैत्र, आषाढ़, शरद् और माघ महिनों के शुक्ल पक्ष में ।

पूजन मन्त्र -
" ऊॅ जयन्ती मंगला काली , भद्र काली कपालिनी।
ऊॅ नमश्चञ्डिकाये , आच्छादित वरदे देवि,
पूजां गृहाण सुमुखि , नमस्ते शंकर प्रिये ।।

रामायण और महाभारत में भी यह स्पष्ट है कि जब भी देवता या मनुष्य को शक्ति की आवश्यकता होती है वे माँ दुर्गा की आराधना कर शक्ति को प्राप्त करते हैं ।शक्ति के बिना तो शिव भी पूर्ण नहीं है। माँ दुर्गा के नौ रूप हैं ,मनुष्य की उत्पत्ति भी पंचभूतों और चार अन्तःकरण से मिलकर हुई है ।

#मौसम_परिवर्तन के कारण इन तत्वों पर बुरा प्रभाव पड़ता है इस कुप्रभाव को दूर करने और सही सन्तुलन बनाने के लिए कम से कम दो ॠतु परिवर्तन के समय नौ दिन उपवास रखना चाहिए, ताकि पूरे वर्ष हम स्वस्थ रह सके इसीलिए हमारे ऋषि-मुनियो ने हमारी सामाजिक,आध्यात्मिक,आर्थिक और स्वास्थ्य की दृष्टि से उन्हें ठीक से चलाने के लिए वेद,शास्त्र और पुराणों की रचना की और मानव कल्याण की बातों को त्यौहारों के साथ जोड दिया। इसी कारण धार्मिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए नवरात्रों की रचना की ।

चैत्र और आश्विन मास सन्धि मास है और इनमें ऋतु परिवर्तन होने के कारण इसका प्रभाव हमारे शरीर पर भी पडता है । इससे वात-पित-कफ उत्पन्न होते हैं अतः उनसे बचने के लिए नौ दिन तक व्रत और पूजन का विधान बना दिया । ऋतु-परिवर्तन के कारण ही इन्हें नवरात्र कहा जाता है ।

इन दिनों में उपवास रखने से हमारे शरीर के पंचभूतों और अन्तःकरण की शुद्धि के साथ ही शक्ति का संचार होता है ,जिससे शरीर की भीतरी शक्ति को बल मिलता है ।

उपवास में एक समय फलाहार आवश्यक है ताकि शरीर को ऊर्जा मिल सके और भोजन सूर्यास्त से पूर्व करना चाहिए ।

व्रत पूरे होने पर कन्या पूजन का विधान इसलिए है कि जब ये कन्याएँ युवती बने तो हमारे मन में कोई कुविचार ना उत्पन्न हो इसीलिए हमारे ॠषियो ने केवल ब्राह्मण कन्या ही नही बल्कि सभी वर्ग की कन्याओ को पूजने का विधान बनाया ।

जिसके अन्तर्गत दो वर्ष की कन्या - कुमारी। तीन वर्ष की - त्रिमुर्तनी। चार वर्ष की - कल्याणी। पांच वर्ष की - रोहिणी। छह वर्ष की - काली। सात वर्ष की - चण्डिका। आठ वर्ष की - शाम्भकी। नो वर्ष की - दुर्गा और दस वर्ष की कन्या को सुभद्रा का स्वरुप माना गया है।
सन्ध्या जोशी
शिव ज्योतिष केन्द्र

11/03/2026

वर्ष 2026 में हिन्दू नव वर्ष का प्रारम्भ 19 मार्च 2026 को होगा। इस दिन से विक्रमी सम्वत्सर 2083 की शुरुआत मानी जाएगी। वैदिक पंचांग के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि 19 मार्च को सुबह 6 बजकर 52 मिनट से प्रारंभ होकर अगले दिन तक रहेगी।
मार्च माह से ही दुनियाभर में पुराने कामकाज को समेटकर नए कामकाज की रूपरेखा तय की जाती है। इस धारणा का प्रचलन विश्व के प्रत्येक देश में आज भी होता है।

21 मार्च को पृथ्वी सूर्य का एक चक्कर पूरा कर लेती है, उस वक्त दिन और रात बराबर होते हैं।

12 माह का एक वर्ष और 7 दिन का एक सप्ताह रखने का प्रचलन विक्रमी सम्वत् से ही शुरू हुआ। महीने की गणना सूर्य व चन्द्रमा की गति पर रखी जाती है।
विक्रमी सम्वत् से 6676 ईसवी पूर्व से शुरू हुए #प्राचीन_सप्तर्षि_सम्वत को हिंदुओं का सबसे प्राचीन सम्वत् माना जाता है, जिसकी विधिवत शुरुआत 3076 ईस्वी पूर्व हुई मानी जाती है।

विक्रमी सम्वत् में वर्ष को सौर वर्ष और मास को चन्द्रमास कहते हैं यहाँ यह भी बताना आवश्यक है कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से सिर्फ #उत्तर_भारत में ही नया वर्ष मनाते है #दक्षिण_भारत में विक्रम संवत का नया वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष से शुरू होता है!

वर्षारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही क्यों?

चैत्र ही एक ऐसा माह है जिसमें वृक्ष तथा लताएँ पल्लवित व पुष्पित होती हैं। इसी मास में उन्हें वास्तविक मधुरस पर्याप्त मात्रा में मिलता है।
वैशाख मास, जिसे माधव कहा गया है, में मधुरस का परिणाम मात्र मिलता है। इसी कारण प्रथम श्रेय चैत्र को ही मिला और वर्षारंभ के लिए यही उचित समझा गया।

जितने भी धर्म कार्य होते हैं, उनमें सूर्य के अलावा चन्द्रमा का भी महत्वपूर्ण स्थान है। जीवन का जो मुख्य आधार अर्थात वनस्पतियाँ हैं, उन्हें सोमरस चन्द्रमा ही प्रदान करता है। इसीलिए इसे औषधियों और वनस्पतियों का राजा कहा गया है। शुक्ल प्रतिपदा चन्द्र की कला का प्रथम दिवस है। अतः इसे छोड़कर किसी अन्य दिवस को वर्षारम्भ मानना अनुचित है।

संवत्सर शुक्ल पक्ष से ही आरम्भ माना जाता है क्योंकि कृष्ण के आरम्भ में मलमास आने की सम्भावना रहती है जबकि शुक्ल में नहीं।

ब्रह्माजी ने जब सृष्टि का निर्माण किया था तब इस तिथि को प्रवरा अर्थात सर्वोत्तम माना था।

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का ऐतिहासिक महत्व

इसी दिन के सूर्योदय से ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना प्रारम्भ की।

सम्राट विक्रमादित्य ने इसी दिन राज्य स्थापित किया। इन्हीं के नाम पर विक्रमी संवत् का पहला दिन प्रारंभ होता है।

प्रभु श्री राम के राज्याभिषेक का दिन यही है।

शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात् नवरात्र का पहला दिन यही है।

सिक्खो के द्वितीय गुरू श्री अंगद देव जी का जन्म दिवस है।

स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने इसी दिन आर्य समाज की स्थापना की एवं कृष्णवंतो विश्वमआर्यम का संदेश दिया।

सिंध प्रान्त के प्रसिद्ध समाज रक्षक वरूणावतार भगवान झूलेलाल इसी दिन प्रगट हुए।

राजा विक्रमादित्य की भांति शालिवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना। विक्रम संवत की स्थापना की ।

युधिष्ठिर का राज्यभिषेक भी इसी दिन हुआ।

महर्षि गौतम जयंती
शिव ज्योतिष केंद्र

सभी को छोटी होली की शुभकामनाएँभारतीय संस्कृति त्योहारों, आयोजनों और रीति-रिवाजों में बहुत प्राचीन और समृद्ध है ऐसा माना ...
02/03/2026

सभी को छोटी होली की शुभकामनाएँ
भारतीय संस्कृति त्योहारों, आयोजनों और रीति-रिवाजों में बहुत प्राचीन और समृद्ध है ऐसा माना जाता है कि होली गुप्त काल के बहुत पहले से मनाई जाती थी। रंगों के त्योहार होली का उल्लेख सनातन धर्म के कई ग्रंथों जैसे : ृह्य_सूत्र, #जैमिनी के पूर्व #मीमांसा_सूत्र, #नारद_पुराण और #भविष्य_पुराण में मिलता है। #सातवीं_शताब्दी के राजा हर्ष के प्रसिद्ध नाटक रत्नावली में होलि के उत्सव का उल्लेख है। दण्डिन के दशकुमार चरित और #चौथी_शताब्दी के आदिकवि कालिदास की रचनाओं में भी होली के बारे मे विवरण हैं। 17 वीं शताब्दी में यूरोपीय व्यापारियों और ब्रिटिश औपनिवेशिक कर्मचारियों ने भी भारतीयों के हर्ष और उल्लास के त्योहार होली का उल्लेख किया है।

होली का त्यौहार मनाने के तीन धार्मिक कारण हैं :--
1) हिन्दू धर्म के अनुसार होलिका दहन मुख्य रूप से भक्त प्रह्लाद से जुडा है जो कि राक्षस कुल में जन्मे परन्तु भगवान नारायण के अनन्य भक्त थे। उनके पिता हिरण्यकश्यप को उनकी ईश्वर भक्ति अच्छी नहीं लगती थी इसलिए हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को अनेकों प्रकार के जघन्य कष्ट दिए। उनकी बुआ होलिका को ऐसा वस्त्र वरदान में मिला था जिसे पहनकर आग में बैठने से आग उसे नहीं जला सकती थी। होलिका प्रह्लाद को मारने के लिए वह वस्त्र पहनकर उन्हें गोद में लेकर आग में बैठ गई। लेकिन प्रह्लाद की भक्ति के कारण होलिका जल गई और प्रह्लाद बच गए अतः तब से शक्ति पर भक्ति की जीत की ख़ुशी में यह पर्व मनाया जाने लगा साथ में रंगों का पर्व यह सन्देश देता है कि काम, क्रोध,मद,मोह एवं लोभ रुपी दोषों को त्यागकर ईश्वर भक्ति में मन लगाना चाहिए।

2) पौराणिक समय में श्री कृष्ण और राधा की बरसाने की होली के साथ ही होली के उत्सव की शुरुआत हुई और आज भी बरसाने और नंदगाव की लट्ठमार होली विश्व विख्यात है।

3) शिवपुराण के अनुसार ,हिमालय-पुत्री पार्वती शिव से विवाह हेतु तपस्या कर रहीं थीं और शिव भी तपस्या में लीन थे एवं इंद्र का भी शिव-पार्वती विवाह में स्वार्थ था क्योकि तारकासुर का वध शिव-पार्वती के पुत्र द्वारा होना था।

बसन्तपंचमी पर,शिव को दुनिया में वापस लाने हेतु कामदेव की सहायता ली जब शिवयोगी ने अपनी तीसरी आँख खोली तो काम को जलाकर राख कर दिया क्योंकि कामदेव शिव पर काम का तीर चलाते हैं। इससे काम की पत्नी रति परेशान हो गईं और तब शिव ने ध्यान में रति की चालीस दिन की तपस्या को पहचाना,करुणावश उसे क्षमा कर दिया और परिणाम स्वरूप कामदेव को पुनर्र्स्थापित किया।
इसीलिए वसन्त पंचमी त्यौहार के 40 दिन बाद कामदेव की वापसी हुई और साथ ही देवताओं ने शिवजी को पार्वती से विवाह के लिए भी मना लिया तो माना जाता है #कामदेव के पुनर्जीवन और #शिव_पार्वती विवाह के स्वीकृति की खुशी में देवताओं ने जिस दिन को उत्सव की तरह मनाया वो फाल्गुन पूर्णिमा का दिन था।
इस प्रसंग के आधार पर #काम_की_भावना को प्रतीकात्मक रूप से जला कर #सच्चे_प्रेम की विजय का उत्सव मनाया जाता है।

वैज्ञानिक कारण :~
होली का त्योहार मनाने का वैज्ञानिक कारण है यह है कि #शरद्ऋतु की समाप्ति और बसन्त ऋतु के आगमन का यह काल #पर्यावरण और #शरीर_में_बैक्टीरिया की वृद्धि कर देता है लेकिन जब होलिका जलाई जाती है तो उससे करीब 145 डिग्री फारेनहाइट तक तापमान बढ़ता है जिससे ये बैक्टीरिया नष्ट हो जाते हैं।

परंपरानुसार जब लोग जलती होलिका की परिक्रमा करते हैं तो होलिका से निकलता ताप शरीर और आसपास के पर्यावरण में मौजूद बैक्टीरिया को नष्ट कर देता है और इस प्रकार यह शरीर तथा पर्यावरण को स्वच्छ करता है।

दक्षिण भारत में लोग होलिका दहन के बाद होलिका की राख को माथे पर लगाते हैं और अच्छे स्वास्थ्य के लिए चंदन तथा हरी कोंपलों और आम के वृक्ष के बोर को मिलाकर उसका सेवन करते हैं।

2) कुछ वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि रंगों से खेलने से स्वास्थ्य पर इनका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है क्योंकि रंग हमारे शरीर तथा मानसिक स्वास्थ्य पर कई तरीके से असर डालते हैं। पश्चिमी फीजिशियन और डॉक्टरों का मानना है कि एक स्वस्थ शरीर के लिए रंगों का महत्वपूर्ण स्थान है।

हमारे शरीर में किसी रंग विशेष की कमी कई बीमारियों को जन्म देती है और जिनका इलाज केवल उस रंग विशेष की आपूर्ति करके ही किया जा सकता है।

लाल : प्यार, जुनून और प्रजनन क्षमता का रंग।

नारंगी : नई शुरुआत और क्षमा का रंग।

पीला : खुशी, शांति, आनंद, ध्यान, ज्ञान और शिक्षा का प्रतिनिधित्व करता है।

गुलाबी : दया,करुणा और सकारात्मकता का प्रतीक है।

हरा : प्रकृति, जीवन और फसल का प्रतिनिधित्व करता है।

नीला : भगवान कृष्ण का रंग शक्ति और आध्यात्मिक विकास का प्रतीक है।
सन्ध्या जोशी

25/02/2026

ग्रह बिगड़ने के तीन प्रमुख कारण हैं :~
गलत कर्म
गलत संगत
गलत सोच
कुण्डली में ग्रह जन्म से बुरा फल नहीं देते, हम उन्हें खराब करते हैं।
शनि खराब होता है झूठ, आलस और शॉर्टकट से।
राहु खराब होता है लालच और दिखावे से।
चन्द्रमा खराब होता है नेगेटिव सोच या माँ से कटाव या बुरे बर्ताव के कारण।

पूजा ग्रहों को शुभ नहीं बनाती बल्कि ग्रह को Control में लाती है अर्थात ग्रह सजा देना बंद करता है लेकिन परीक्षा लेना बंद नहीं करता यही बात लोग नहीं समझते।

अगर पूजा के बाद अहंकार बढ़ गया,तो पूजा बेकार क्योंकि असली पूजा के बाद इंसान शांत होता है कम बोलता है ज़्यादा समझता है पूजा करानी है तो बदलाव के लिए तैयार रहो, आराम के लिए नहीं।

जब सूर्य बिगड़ा हो आत्मविश्वास कम हो जाता है डर लगता है और अपने से अधिक दूसरों पर निर्भरता हो जाती है।
सूर्य पूजा के बाद जातक ना कहना सीखता है लोग नाराज होते हैं और खुद फैसले लेने पडते हैं।
सूर्य पूजा के बाद लोग दुश्मन बनते हैं, लेकिन आप मजबूत बनते हो।

जब चन्द्र बिगड़ा हो तो मन स्थिर नही रहता माँ से दूरी और सम्बन्ध बिगड जाते हैं।
चन्द्र पूजा या रुद्राभिषेक के बाद -
रोना आता है मन हल्का होता है नींद सुधरती है माँ से रिश्ते ठीक होते हैं।
रोना चन्द्र सुधरने की निशानी है।

जब बुध बिगड़ता है गलत फैसले,धोखा ,कम्युनिकेशन गलत करने से।
बुध पूजा :-- गणेश साधना के बाद दिमाग तेज़ हो जाता है ,झूठ जल्दी पकड़ में आता है बुध ठीक होते ही व्यक्ति बेवकूफ बनना बंद कर देता है।

जब शुक्र बिगड़ा है तो गलत रिश्ते बनते हैं पैसा आते ही चला जाता है लेकिन शुक्र की पूजा के बाद नकली रिश्ते टूटते हैं अकेलापन लगता है पर असली सुख मिलता है
शुक्र की पूजा भीड़ कम करती है और सही लोगो की संगत बढ़ाती है।

जब शनि बिगड़ा हो मेहनत ज़्यादा, रिज़ल्ट कम। पैसे की कदर नहीं लोग इस्तेमाल कर जाते हैं।
हनुमान पूजा / शनि पूजा के बाद
अकेले काम करना पड़ता है शॉर्टकट बंद हो जाते हैं रिज़ल्ट देर से, लेकिन पक्का।
शनि पूजा के बाद आदमी अकेला पड़ता है, विफल नहीं होता।

जब राहु बिगड़ा हो जल्दी अमीर बनने की चाहत में गलत फैसले लें लेते हैं।
राहु शांति के बाद धोखेबाज मित्र कटते हैं ,गलत रास्ते बंद होते हैं अचानक नुकसान दिख सकता है राहु पूजा पहले गिराती है, फिर उठाती है।

जब केतुबिगड़ा हो मन खाली किसी चीज़ में मन नहीं लगता अकेलापन होता है।
केतु शांति के बाद भीड़ से मन हटता है भगवान की तरफ खिंचाव होता है दुनिया नकली लगने लगती है।
केतु पूजा इंसान को बाहर से काटकर अंदर सें जोड़़ती है।
शिव ज्योतिष केन्द्र

Address

Delhi

Telephone

+918595659014

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Shiv Jyotish Kendra posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share