25/02/2015
शिव पुराण में शिव पूजन के लिए बिल्वपत्र(बेल के पत्तों) का इस्तेमाल करने का वर्णन है, किन्तु बहुत से लोगों के मन में प्रश्न आता है कि बिल्वपत्रों को इतना महत्वपूर्ण क्यों माना गया है।
शिवपुराण से ही जानते हैं शिव-पूजन के बारे में।
पार्थिवलिंगों की पूजा कोटि कोटि यज्ञों का फल देने वाली है। कलयुग में लोगों के लिए शिवलिंग-पूजन जैसा श्रेष्ठ दिखाई देता है, वैसा दूसरा कोई साधन नहीं है। यह समस्त शास्त्रों का निश्चित सिद्धांत है। शिवलिंग भोग और मोक्ष देने वाला है।
लिंग तीन प्रकार के कहे गए हैं (1) उत्तम (2) मध्यम (3) अधम। जो चार अंगुल ऊंचा और देखने में सुन्दर हो तथा वेदी से युक्त हो, उस शिवलिंग को शास्त्रज्ञ महर्षियों ने 'उत्तम' कहा है। उससे आधा 'मध्यम' और उससे भी आधा अधम माना गया है।
इस प्रकार तीन प्रकार के शिवलिंग कहे गए हैं, जो उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैं।
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र सभी वर्णों को शिवलिंग की उपासना करनी चाहिए।
स्त्रियों तथा अन्य सभी लोगों को शिव लिंग का पूजन वैदिक अथवा तंत्र-मंत्र अनुसार करनी चाहिए।
विधिपूर्वक भगवान शंकर का नैवेद्यान्त पूजन करके उनकी त्रिभुवनमयी आठ मूर्तियों भी पूजन करें। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चंद्र तथा यजमान - ये भगवान शंकर की आठ मूर्तियां कही गयी हैं। इनके साथ शर्व, भव, उग्र, भीम, ईश्वर, महादेव तथा पशुपति ये सात नाम कहे गए हैं तथा इन नामों की उपासना की जानी चाहिये।
ईशान, नन्दी, चण्ड, महाकाल, भृंगी, वृष, स्कन्द, कपर्दीश्वर, सोम तथा ये शिव-परिवार कहे गए हैं। अक्षत तथा बिल्वपत्र द्वारा शिव-परिवार का पूजन करना चाहिए।
विद्वान-ज्ञानी भष्म का ललाट में त्रिपुण्ड(अभाव में मिटटी) लगाकर, रुद्राक्ष माला तथा बिल्वपत्र का संग्रह करके ही पूजन करें।
बिल्व का महत्त्व --- बिल्वपत्र महादेव का ही रूप है।
देवताओं ने भी इसकी स्तुति की है। फिर जिस किसी तरह से इसकी महिमा की जा सकती है। तीनों लोकों में जितने पुण्य तीर्थ हैं, वे सम्पूर्ण तीर्थ बिल्व के मूलभाग में निवास करते हैं। जो पुण्यात्मा मनुष्य बिल्व के मूल में लिंगस्वरूप अविनाशी महादेव जी का पूजन करता है, वह निश्चय ही शिव-पद को प्राप्त होता है। जो बिल्व की जड़ के पास जल से अपने मस्तक को सींचता है, वह सम्पूर्ण तीर्थों में स्नान का फल पा लेता है और वही इस भूतल पर पावन माना जाता है।
बिल्व की जड़ के परम उत्तम थाले को जल से भरा हुआ देखकर महादेव जी पूर्णतया संतुष्ट होते हैं।
जो मनुष्य गंध, पुष्प, आदि से बिल्व के मूल भाग का सेवन करता है, वह शिव लोक को प्राप्त करता है और इस लोक में भी सुख-संतति बढ़ती है।
जो बिल्व की जड़ के पास दीपावली जलाकर रखता है, वह तत्वज्ञान से संपन्न होकर भगवान महेश्वर में मिल जाता है।
जो बिल्व की शाखा थामकर हाथ से उसके नए नए पल्लव उतारता और उनसे बिल्व की पूजा करता है वह पापों से मुक्त हो जाता है।
जो बिल्व की जड़ के पास शिव में अनुराग रखने वाले एक भक्त को भी भक्तिपूर्वक भोजन कराता है उसे कई गुना पुण्य प्राप्त होता है। जो बिल्व की जड़ के पास शिवभक्त को खीर और धृत से युक्त अन्न देता है वह दरिद्र नहीं होता।
हे देवों के देव!
हे महादेव!
हे नीलकण्ठ!
हे विश्वनाथ!
हे आदिदेव!
हे उमानाथ!
हे काशीपति!
आपको बारम्बार नमस्कार है। आप मुझे ऐसी कृपा शक्ति दो जिससे मैं दिन के चार और रात्रि के चार पहरों मे आपकी अर्चना कर सकूं और मुझे क्षुधा, पिपासा, लोभ, मोह पीड़ित न करें, मेरी बुद्धि निर्मल हो मै जीवन को सद्कर्मों, सन्मार्ग में लगाते हुए इस धरा पर चिरस्मृति छोड़ आपकी परम कृपा प्राप्त करूं।