बुद्धम शरणम् गच्छामि्

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बौद्ध दर्शन के विकास व विनाश के षड़यंत्रों की साक्षी रही पहली सहस्राब्दीविगत् कुछ वर्षों में यूरोप तथा अमरीका के हजारों ...
30/05/2017

बौद्ध दर्शन के विकास व विनाश के षड़यंत्रों की साक्षी रही पहली सहस्राब्दी

विगत् कुछ वर्षों में यूरोप तथा अमरीका के हजारों रोमन कैथोलिकों ने बौद्ध धर्म अपनाया है, जिनमें इटली के विश्व प्रसिद्ध फुटबाल खिलाड़ी राबर्टो बज्जियो तथा हालीबुड के सुपर स्टार रिचार्ड गेरे भी शामिल हैं। पिछले दिनों रोम के एक अखबार को दिये गये साक्षात्कार में सोवियत संघ के पूर्व राष्ट्रपति गोर्वाचोव ने ठीक ही कहा 'इक्कीसवीं सदी बुद्ध की सदी होगी।`

मैंने तुझे नौका दी थी नदी पार करने के लिए न कि पार होने के बाद सिर पर ढोने के लिए।` बुद्ध की इस उक्ति से उनके तर्क-संगत दर्शन की साफ झलक मिल जाती है। उनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण शिक्षा यह थी कि सत्य को पहले तर्क की कसौटी पर परखो, फिर उसमें विश्वास करो। इसे उन्होंने अपनी शिक्षाओं पर भी लागू किया। उन्होंने साफ कहा कि मेरी बात इसलिए नहीं मानो कि मैं स्वयं (बुद्ध) कह रहा हूं, बल्कि 'सत्य हो` तभी मानो। अब तक इस धरती पर किसी दार्शनिक या ईश्वर ने अपने बारे में ऐसा नहीं कहा।

ढाई हजार वर्ष पूर्व जब बुद्ध के विचार विकसित हुए उस समय भारत में कुल ६२ विचारधाराओं के मत केन्द्र प्रचलित थे, जिनमें ऊंच-नीच पर आधारित वैदिक विचारधारा सर्वोपरि थी। इस तथ्य की ज्वलंत पुष्टि संघ परिवार द्वारा शासित गुजरात के नवीं कक्षा के 'सामाजिक अध्ययन` नाम पाठ्यक्रम से होती है, जिसमें कहा गया है : 'वर्ण-व्यवस्था आर्यों द्वारा मानव जाति को दिया गया एक अमूल्य उपहार है।` यदि सही मायनों में देखा जाए तो इसी ऊंची-नीच पर आधारित वर्ण व्यवस्था के विरोध में तथागत् बुद्ध का दर्शन विकसित हुआ। यही कारण था कि आर्य संस्कृति की रक्षा करने का नारा देने वाले तत्वों ने हर सदी में बौद्ध धर्म को नष्ट करने का षड्यंत्र जारी रखा। इसी षड्यंत्र के तहत आज का 'संघ परिवार` स्कूली पाठ्यक्रमों में आर्य संस्कृति का गुणगान करते हुए एक तरफ वर्ण व्यवस्था को न्यायोचित ठहरा रहा है, तो दूसरी ओर बौद्ध धर्म को रोकने का प्रयास कर रहा है।

यदि विश्व स्तर पर देखा जाय तो बुद्ध के समय में चीन में कनफ्यूसियस विचार तथा ईरान में जोरोस्टर या जर्तुस्ती विचारधारा का बोलबाला था। बाकी दुनिया ग्रीस को छोड़कर लगभग विचार शून्य ही थी। उस समय भारत सैकड़ों रियासतों में बंटा हुआ था तथा हर एक दूसरे के खून के प्यासे थे। स्वयं बुद्ध के पिता शक्यवंशीय शुद्दोधन की राजधानी कपिलवस्तु हमेशा से पासवर्ती राज्य कोसल के निशाने पर थी। अंततोगत्वा कोसल के राजा विदुदाभ ने शाक्यों को बर्बाद कर दिया तथा बुद्ध की प्रिय स्थली श्रावस्ती के राजा प्रसेनजित् को अपने ही बेटे ने पदच्युत कर दिया। प्रसेनजित बुद्ध के प्रशंसक मगध सम्राट अजातशत्रु से सहायता के लिए भागा, किन्तु रास्ते में ही मर गया। एक तरफ ऐसा अशांत वातावरण तो दूसरी ओर जिसे आर्य संस्कृति कहा जाता है, उसके तहत वर्ण व्यवस्था-जन्य ऊंच-नीच का भेदभाव, वैदिक कर्मकाण्डों के चलते हजारों पशुओं, जिनमें गाय भी शामिल थी, की बलि, नरबलि, घातक हथियारधारी भगवानों का भय, पुनर्जन्म का मिथकीय आविष्कार, आत्मा का अमरत्व, अंधविश्वास तथा युद्धोन्माद आदि का बोलबाला था। तथागत् बुद्ध के दर्शन ने इन्हीं मान्यताओं के विरूद्ध शीघ्र ही एक विश्वव्यापी आंदोलन का रूप ले लिया। हैरत सिर्फ इस बात पर होती है कि बुद्ध का यह महान दर्शन चीन, जापान, श्रीलंका, वर्मा, थाईलैंड, वियतनाम, कम्बोडिया, लाओस, मध्य एशिया, साइबेरिया समेत लगभग समस्त एशिया, तथा दुनिया के अन्य लाखों लोगों के बीच आज भी विकासमान है, किन्तु सदियों पहले अपनी जन्मभूमि भारत में क्यों विलुप्त हो गया? हकीकत यह है कि आर्य संस्कृति के पालकों ने भारत में बौद्ध धर्म की हत्या कर दी। आज बौद्ध धर्म के बढ़ते प्रभाव से पीड़ित होकर आर्य-पूजक लोग उसे हिन्दू धर्म का अभिन्न अंग सिद्ध करने का विश्वव्यापी अभियान चला रहे हैं। यहां प्रश्न यह उठता है कि यदि हिन्दू धर्म तथा बौद्ध धर्म एक हैं, तो फिर विश्व भर के लोगों ने बौद्ध धर्म के बदले हिन्दू धर्म को क्‍यों नहीं अपनाया? जाहिर है, वर्ण व्यवस्था तथा ऊंच-नीच के कारण हिन्दू धर्म कहीं और नहीं फैला। विदेशों में यह सिर्फ प्रवासी भारतीयों तक सीमित है। एक समय था जब दुनिया की एक-तिहाई आबादी बौद्ध थी। अनेक हिन्दू इतिहासकार यह दावा पेश करते हैं कि अफ्रीकी देश मारीशस हिन्दू देश है किन्तु वहां वर्ण व्यवस्था नहीं है। इस संदर्भ में सर्वाधिक उल्लेखनीय तथ्य यह है कि करीब १७० वर्ष पहले अंग्रेजों ने भारत से हजारों दलितों तथा अति पिछड़ी जातियों के लोगों को मारीशस में मजदूरी कराने के लिए जबरन भेजा था, जो वहीं बस गये तथा बाद में वे स्वयं वहां के शासक बन बैठे। असलियत यह है कि वहां आर्य संस्कृति के पोषक, विशेष रूप से ब्राह्मण तथा क्षत्रिय नहीं पहुंच सके, इसलिए मारीशस में वर्ण व्यवस्था उस रूप में नहीं जा सकी, जिस रूप में वह अभी भी भारत में है।

जहां तक बौद्ध धर्म का सवाल है, यह अन्य धर्मों की तरह नहीं है। बुद्ध ने इसे हमेशा 'धम्म` कहा। पाली में 'धम्म` का अर्थ सिद्धांत होता है, किन्तु संस्कृत में गलत अनुवाद करके इसे 'धर्म` बना दिया गया। बुद्ध के दार्शनिक विचार मूल रूप से आर्य-सांस्कृतिक मान्यताओं के विरूद्ध ईश्वर को न मानने, आत्मा के अमरत्व को इनकार करने, किसी ग्रंथ को स्वत: प्रमाण न मानने तथा जीवन को सिर्फ इसी शरीर तक सीमित मानने से संबद्ध थे। एक बार आत्मा तथा पुनर्जन्म पर दो भिक्षुओं के बीच चल रही गहन बहस में हस्तक्षेप करते हुए बुद्ध ने कहा कि जिस किसी भी वस्तु का जन्म होता है, उसका विनाश अवश्यंभावी है, किन्तु उस रूप में नहीं, उसका रूप बदल जाता है, जिसे बुद्ध ने 'प्रतीत्य-समुत्पाद` कहा तथा जिसमें आत्मा के लिए कोई स्थान नहीं है। इसे और भी साफ करते हुए बुद्ध ने कहा कि किसी भी जीवधारी की मृत्यु के साथ ही उसका हमेशा के लिए व्यक्तिगत विलोप हो जाता है, जिसे निर्वाण कहते हैं, अर्थात् पुनर्जन्म से संपूर्ण मुक्ति। यही प्रतीत्य-समुत्पाद बुद्ध के दर्शन की एकमात्र कुंजी है, जिसके कारण दुनिया के अनेक वैज्ञानिक दार्शनिकों ने उन्हें विश्व का पहला वैज्ञानिक बताया।

बुद्ध इस दुनिया को ईश्वर की कृति नहीं मानते थे। उनका तर्क यह था कि घड़ा मिट्टी का रूपान्तर है अर्थात् मिट्टी का गुण घड़े में चला गया। इसी तरह यदि शिशु पैदा होता है, तो वह अपने मां-बाप का रूपान्तर हो जाता है, न कि किसी ईश्वर की कृति का। मनुष्य अत्याचारी तथा दु:खदायी होता है, इसलिए मानव समाज का प्रचण्ड बहुमत दु:खी रहता है। यदि मनुष्य ईश्वर का रूपान्तर है तो ईश्वर स्वयं अत्याचारी एवं दु:खदायी है। यदि ईश्वर वैसा नहीं है तो मनुष्य उसका रूपान्तर या कृति भी नहीं है। इसी दार्शनिक पृष्ठभूमि में बुद्ध ने बौद्धगया में महाज्ञान प्राप्त करके दु:ख है, दु:ख का कारण है, दु:ख का निवारण है तथा दु:ख से मुक्ति है, का रहस्य ढूंढ निकाला। उनके दार्शनिक विचार शीघ्र ही अन्य विचारों पर हावी होकर उनके जीवनकाल में ही सारी दुनिया में फैल गये। बुद्ध के समकालीन राजा बिम्बसार, अजातशत्रु तथा प्रसेनजित ने बौद्ध धर्म के विकास में बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया, किन्तु ईसा पूर्व तीसरी सदी में सम्राट अशोक ने इसे विश्वव्यापी बनाने का चमत्कारिक काम किया। अशोक के प्रयासों से श्रीलंका से लेकर यूनान तक बौद्ध धर्म की गूंज सुनायी देने लगी।

इस तरह हम देखते हैं कि ईसा पूर्व की अर्द्ध सहस्राब्दी बौद्ध धर्म के उत्तरोत्तर विकास की अवधि थी। इस बीच पुष्यमित्र तथा मिहिरकुल दो ऐसे शासक हुए, जिन्होंने बौद्ध धर्म को समूल नष्ट करने की कोशिश की। पुष्यमित्र ने अंतिम मोर्य बौद्ध सम्राट बृहद्रथ को ई.पू. १८७ में मार कर शुंगवंश की स्थापना की थी। पुष्यमित्र बृहद्रथ का सेनापति था। सोलवहीं सदी के महान तिब्बती बौद्ध भिक्षु तथा इतिहासकार तारानाथ के अनुसार पुष्यमित्र बौद्ध धर्म का घनघोर दुश्मन था तथा उसने मध्य प्रदेश से लेकर पंजाब के जालंधर तक सैकड़ों बौद्ध मठों को ध्वस्त करने के साथ-साथ अनेक विद्वान भिक्षुओं की हत्या कर दी थी। पुष्यमित्र ने पाटलीपुत्र के विख्यात मठ कुक्कुटराम को भी ध्वस्त करने की कोशिश की थी, किन्तु अंदर से सिंह के दहाड़ने जैसी आवाज सुनकर वह भाग गया। पुष्यमित्र ने वैदिक कर्मकाण्डों तथा ब्राह्मणों के वर्चस्व को पुनर्जीवित करने का अथक प्रयास किया था। इसी तरह हूण शासक मिहिरकुल ने छठी ईसवी में कश्मीर से लेकर गान्धार तक बौद्ध मठों की भयंकर तोड़फोड़ की। प्रख्यात् चीनी बौद्ध यात्री, ह्उावेन सांग के अनुसार मिहिरकुल ने १६०० मठों को ध्वस्त कर दिया था। वह भारत आकर शिवपूजक बन गया था।

ईसा मसीह के जन्म के पूर्व बौद्ध धर्म की गूंज येरुशलम तक पहुंच चुकी थी। यही कारण है कि बुद्ध की करुणा तथा शांति की झलक बाइबिल में साफ दिखायी देती है। अनेक यूरोपी विद्वानों ने भी इस तथ्य को स्वीकार किया है कि बुद्ध का ईसा मसीह पर गहरा प्रभाव पड़ा था, विशेष रूप से उनका चर्च-सिस्टम बौद्ध मठों का प्रतिरूप है। ईसा की प्रथम सहस्राब्दी में बौद्ध धर्म का दार्शनिक विकास बड़ी तेजी से हुआ। इसे बौद्ध दार्शनिकों की सहस्राब्दी कहा जाए, तो अनुचित न होगा। पहली सदी से लेकर हजारहवीं सदी के बीच अश्वघोष, नागार्जुन, आर्यदेव, मैत्रेय, असंग, वसुबन्धु, दिग्नाग, धर्मपाल, शीलभद्र, धर्मकीर्ति, देवेन्द्रबोधि, शाक्यबोधि, शान्त रक्षित, कमलशील, कल्याणरक्षित, धर्मोत्तराचार्य, मुक्तकुंभ, रत्नकीर्ति, शंकरानंद, शुभकार गुप्त तथा मोक्षकार गुप्त आदि अनेक बौद्ध दार्शनिक पैदा हुए। अश्वघोष ने प्रथम सदी में वर्ण व्यवस्था के विरूद्ध 'वज्रसूची` (हीरे की सुई) नामक संस्कृत काव्य लिख कर ब्राह्मणवाद की नींव हिला दी थी। उक्त बौद्ध दार्शनिकों में नागार्जुन, असंग, वसुबन्धु, दिग्नाग तथा धर्मकीर्ति ने बौद्ध तर्कशा (लॉजिक) को वैज्ञानिक ऊंचाईयों तक पहुंचाते हुए हिन्दू तर्कशास्त्रियों को मूक बना दिया था। 'माध्यमक` लिख कर नागार्जुन 'शून्यवाद` के प्रवर्तक बने। वे बुद्ध के अनात्मवाद को शून्यवाद कहते थे। वे पूंजीवाद के भी प्रबल विरोधी थे। उन्होंने अपने समकालीन सत्वाहन राजा यज्ञश्री को एक पत्र लिखकर सारे धन को भिक्षुओं, गरीबों, मित्रों तथा ब्राह्मणों को दान में बांट देने का आग्रह किया था। नागार्जुन दूसरी सदी के दार्शनिक थे। चौथी सदी के पेशावर निवासी असंग अद्वैत विज्ञानवाद के प्रवर्तक थे। उनके छोटे भाई वसुबन्धु थे, जिन्होंने अयोध्या में रहकर बौद्ध त्रिपिटक के सार के रूप में 'अभिधम्म कोश` की रचना की थी। दिग्नाग पांचवीं सदी के दार्शनिक थे। वे बौद्ध तर्कशा तथा ज्ञान मीमांसा के सबसे महान प्रवर्तक थे। रूस तथा विश्व के अति विशिष्ट बौद्ध दार्शनिक श्चेर्वात्सकी ने इस तथ्य का रहस्योद्घाटन किया है कि यदि दिग्नाग जैसे दार्शनिकों ने बौद्ध लॉजिक को विकसति नहीं किया होता, तो तथाकथित 'हिन्दू लॉजिक` कभी पैदा ही नहीं होता, क्योंकि हिन्दू दार्शनिकों ने बौद्धों की तर्कसंगत तर्कणा के विरोध में अपनी लॉजिक विकसित की थी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि सातवीं-आठवीं सदी के दो अति महत्वपूर्ण हिन्दू दार्शनिक कुमारिल भट्ट तथा आदि शंकराचार्य का सारा दर्शन बौद्धों के खण्डन-मण्डन पर आधारित है। बौद्धों की दार्शनिक परंपरा में सातवीं सदी के सबसे महान दार्शनिक धर्मकीर्ति थे, जिन्होंने दिग्नाग के प्रमाण शा को आगे विकसित करते हुए अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ 'प्रमाणवार्तिकम्` की रचना की। श्चेर्वात्स्की ने धर्मकीर्ति की तुलना जर्मन दार्शनिक कान्ट से की है। धर्मकीर्ति को तत्कालीन नालन्दा बौद्ध विश्वविद्यालय के कुलपति तथा उद्भट विद्वान भिक्षु धर्मपाल ने भिक्षु बनाया था। धर्मकीर्ति ने 'न्याय बिन्दु` लिखकर न्याय दर्शन को सर्वाधिक संपन्न बताया तथा उन्होंने अपने समय के तमाम ब्राह्मणों को शाा़र्थ के लिए ललकारा था और जिसने भी उनके साथ शाा़र्थ किया, हार गया। इन हारे हुए वैदिक विद्वानों में कुमारिल भट्ट भी शामिल थे, जो शर्त के अनुसार नालंदा में बौद्ध भिक्षु बन कर धर्मपाल के शिष्य बन गये थे। किन्तु बाद में कुमारिल भट्ट की विजय को वैदिक कर्मकांडों की विजय समझा गया। अत: उन्होंने बौद्ध धर्म को नष्ट करने का हिंसक अभियान चलाया। कुमारिल भट्ट ने बौद्ध धर्म को 'फटा दूध` कहकर उस पर यह आरोप लगाया कि उसके चक्कर में आकर विभिन्न राजाओं ने वैदिक कर्मकांडों को नष्ट कर दिया था। हकीकत यह है कि बौद्ध धर्म ने हिंसा के बल पर कभी कोई परिवर्तन नहीं किया, बल्कि तर्कसंगत मस्तिष्क परिवर्तन के मध्यम से वैदिक कुरीतियों को बदला था, जबकि कुमारिल भट्ट ने स्वयं विभिन्न राजाओं को उकसा कर बौद्ध धर्म को समूल नष्ट करने का अभियान चलाया था, जिसमें आदि शंकराचार्य भी शामिल हो गये थे। शंकराचार्य दर्शन के प्रचारक स्वामी अपूर्नानन्द जी द्वारा मूलरूप से बांग्ला भाषा में लिखित तथा रामकृष्ण मठ द्वारा अधिकारिक रूप से प्रकाशित शंकराचार्य की आत्मकथा 'अचार्य शंकर` में प्रस्तुत यह तथ्य विचारणीय है, जिसमें कहा गया है : 'कुमारिल की इस विजय ने समस्त भारत के लोगों में वैदिक धर्म के नवजागरण की सृष्टि की। उस समय के मगध राज आदित्य सेन ने उस विजय को गौरवान्वित करने के लिए विशेष ठाट-बाट से कुमारिल भट्ट को प्रधान पुरोहित रख कर एक विराट अश्वमेघ यज्ञ का अनुष्ठान किया। गौड़ देश (बंगाल) के हिन्दू राजा शशांक नरेन्द्र वर्धन वैदिक धर्म के अनुरागी थे। उन्होंने मौका पाकर हिन्दू धर्म के विजय अभियान के यज्ञ में बोध गया के जिस बोधि वृक्ष के नीचे बैठकर तथागत् ने सिद्धि प्राप्त की थी, उस बोधिद्रुम को काट डाला और बौद्ध मंदिर पर अधिकार स्थापित कर बुद्धदेव की मूर्ति को दिवाल उठा कर बंद कर दिया। केवल इतना ही नहीं, उन्होंने तीन बार उस वृक्ष के मूल को खोद कर उसे समूल नष्ट कर दिया। कुमारिल भट्ट ने उत्तर भारत में सर्वत्र विजयी होकर बुद्ध और जैन धर्मों के प्राधान्य को नष्ट किया।`

कुमारिल भट्ट ने 'श्लोक वार्तिका`, 'तंत्र वार्तिका` तथा 'तुप्तिका` नामक ग्रंथों को लिखकर वैदिक कर्मकाण्डों को चमत्कारित किया। उनके बौद्ध विनाश के अधूरे कार्य को शंकराचार्य ने पूरा किया। शंकराचार्य ने बौद्ध दर्शन को खण्डित करने के लिए अपनी प्रसिद्ध रचना 'ब्रह्मसूत्र भाष्य` को दिग्नाग के विज्ञानवाद, धर्मकीर्ति के बौद्ध न्याय तथा नागार्जुन के माध्ययक (शून्यवाद) के विरुद्ध खड़ा किया। शंकराचार्य ने बड़ी चालाकी से बौद्ध धर्म के विरूद्ध अभियान चलाया था, यहां तक कि जनता में भ्रम पैदा करने के लिए उन्होंने अपनी पुस्तक 'दसावतान स्न्नानेत` में बुद्ध वन्दना में एक श्लोक भी लिखा, जिसमें बुद्ध को सबसे बड़े योगी के रूप में प्रस्तुत करते हुए ध्यानमग्न अवस्था में उनके नेत्रों के नासिका पर उतरने का उन्होंने जिक्र किया है। शंकराचार्य ने बुद्ध को अपने मस्तिष्क का परिचालक भी बताया है, किन्तु दूसरी तरफ उन्होंने बौद्ध स्थलियों को नेस्तोनाबूद करने का अभियान भी चलाया। प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी तथा इतिहासकार विश्वंभर नाथ पाण्डे ने लिखा है कि बौद्ध विरोधी राजा 'सुधन्वा की सेना के आगे-आगे शंरकाचार्य चलते थे। स्मरण रहे कि उज्जैन के राजा सुधन्वा ने अनगिनत मठों को धवस्त कराया था। जिन चार पीठों की स्थापना शंकराचार्य ने की, वहां पुराने बौद्ध मठ हुआ करते थे, आचार्य शंकर का तथाकथित 'विश्व विजय` अभियान कुछ और न होकर वास्तव में बौद्धों के ऊपर हिंसक विजय का अभियान था। शंकर ने इसे 'विश्व विजय` इस लिए कहा था, क्योंकि उनके समय (आठवीं सदी) तक बौद्ध धर्म विश्व के दर्जनों देशों में फैल चुका था। इस तरह हम देखते हैं कि पहली सहस्राब्दी जहां एक ओर बौद्ध दर्शन के विकास के रूप में उमड़ कर सामने आयी, वहीं दूसरी ओर कुमारिल भट्ट तथा शंकराचार्य ने उसके विनाश की ठोस नींव भी डाली। इस तरह पांचवीं सदी से दसवीं सदी के बीच वर्ण व्यवस्था पर आधारित ब्राह्मणवाद या आधुनिक हिन्दूत्व की नींव पड़ी। यह वही समय था जब वर्ण व्यवस्था को ईश्वरीय ठहराने वाले अनेक हिन्दू ग्रंथों की रचना की गयी, जिनमें याज्ञवल्क्य स्मृति, मनुस्मृति, गीता, महाभारत, कौटिल्य का अर्थशा, वाल्मीकि रामायण तथा सारे पुराण आदि शामिल थे। इन सारे ग्रंथों में वर्ण व्यवस्था को ईश्वरीय ठहराते हुए बौद्ध दर्शन पर हमला किया गया है, किन्तु अक्सर बुद्ध का जिक्र किए बिना। एक भी हिन्दू ग्रंथ ऐसा नहीं है, जिसमें वर्ण व्यवस्था को ईश्वरीय न कहा गया हो। हिन्दू लोग इन ग्रंथों को ईश्वर के मुख से निकला अनन्तकालीन कहकर रहस्यमयी सिद्ध करने का सतत् प्रयत्न करते रहते हैं, किन्तु एक अकाट्य सत्य यह है कि चूंकि बौद्ध दर्शनिकों ने हमेशा वर्ण व्यवस्था का विरोध किया, इसलिए उसे पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से ब्राह्मणों ने नये ग्रंथों की रचना करके उन्हें 'इश्वरीय` बना दिया, जबकि ये सारे ग्रंथ बुद्ध के बाद के हैं। वर्ण व्यवस्था को दैवी ठहराने वाले इन तमाम हिन्दू ग्रंथों के रचनाकाल को निर्धारित करने की यह सबसे बड़ी कुंजी है। अन्यथा, इन ग्रंथों में बौद्धों का जिक्र कैसे आता? गीता का अठारहवां अध्याय सिर्फ वर्ण व्यवस्था को ईश्वरीय बताने के लिए लिखा गया। कौटिल्य के 'अर्थशा` में शूद्र विरोधी कानून हंै। याज्ञवल्क्य स्मृति में बौद्धों के दर्शन को अपशकुन बताया गया है। वाल्मीकि रामायण में बौद्धों को चोरों की तरह दण्ड देने की बात है। मनुस्मृति की तो बात ही कुछ और है।

इस काल की एक खास बात यह है कि जहां एक तरफ ब्राह्मणों ने लाखों बौद्ध भिक्षुओं का कत्लेआम कराया तथा बौद्ध मठों को ध्वस्त करने के बाद बचे-खुचे को मंदिरों में बदल दिया था, वहीं इस कुत्सित उद्देश्य के साथ बड़ी चालाकी से बुद्ध के प्रति तथाकथित 'आत्म सात्करण` के सिद्धान्त को अपनाते हुए 'अग्निपुराण` में उन्हें विष्णु का अवतार घोषित कर दिया था। साथ ही, बुद्ध की नैतिक शिक्षाओं को अपना बनाकर ब्राह्मणों ने लोगों के समक्ष पेश करना शुरू कर दिया। उन्होंने पाली भाषा को प्रतिबंधित कर दिया, क्योंकि बौद्ध धर्म के वर्चस्व के स्थापित होते ही वर्ण व्यवस्था का मिथकीय रूप बड़ी तेजी से लागू होने लगा। कालिदास जैसे संस्कृत कवियों ने बौद्धों के खिलाफ टिप्पणी की। उन्होंने 'मेघदूत` में 'दिग्नागिनाम् पथि परिहरन्` अर्थात् दिग्नागों के बताये गये रास्ते पर चलने से लोगों को मना कर दिया। स्मरण रहे कि महान बौद्ध दार्शनिक दिग्नाग का आम जनता में बहुत असर था, इसलिए कालिदास को उक्त टिप्पणी करनी पड़ी। संस्कृत साहित्य में बौद्धों के खिलाफ अनगिनत टिप्पणियां मिलती हैं। आत्मसात्करण के संदर्भ में एक ऐतिहासिक तथ्य यह है कि आज हिन्दू लोग गाय को 'गोमाता` कहकर गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने की मांग करते हुए धार्मिक दंगा फैलाने का सतत् प्रयत्न करते रहते हैं, किन्तु सदियों पहले ये हिन्दू वैदिक यज्ञों में हजारों गायों की न सिर्फ बलि चढ़ाते थे, बल्कि उसका मांस भी खाया करते थे। सर्वप्रथम तथागत बुद्ध ने ही इन बलियों के विरूद्ध संघर्ष चलाकर गोहत्या बंद करायी थी तथा उन्होंने स्वयं गाय को माता कहकर पुकारा था। 'दीर्घ निकाय` समेत अनेक बौद्ध ग्रंथों में इसके उदाहरण मिलते हैं। गोमाता तथा गोहत्या से संबंधित बुद्ध की शिक्षा को अपहृत करके ब्राह्मणों ने उल्टा आरोप बौद्धों पर लगा दिया कि वे गोमांस भक्षण करते हैं। बौद्धों के खिलाफ इस आरोप को ब्राह्मणों ने इतने बड़े पैमाने पर प्रचारित किया कि देश भर में बौद्ध बदनाम हो गये। वास्तविकता यह थी कि बुद्ध की शिक्षा के अनुसार भिक्षा में मिली किसी भी वस्तु को खाने का प्रावधान था, भले ही वह गोमांस क्यों न हो, किन्तु बुद्ध ने किसी जीव को मार कर खाने को कड़ाई से प्रतिबंधित किया था। इसके अनुसार बौद्ध भिक्षु भिक्षा में मिले किसी भी पशु मांस को खा लेते थे। स्वयं तथागत् बुद्ध ने कुशीनारा में चुन्दक नामक लोहार द्वारा भोजदान में दिये गये सूअर के मांस को खाकर निर्वाण प्राप्त किया था। इस तरह बुद्ध की नैतिक शिक्षाओं को ब्राह्मणों ने उल्टा करके बौद्धों को हमेशा बदनाम किया।

ईसा की दूसरी सहस्राब्दी भारत में बौद्ध धर्म के लिए समापन की अवधि थी। इसके पहले ही भारत में इस्लाम पहुंच चुका था तथा सल्तनत स्थापित हो चुकी थी। मध्य एशिया से आने वाले मुस्लिम हमलावरों ने बौद्ध स्थलियों को तोड़ऩे में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की, जिसके पीछे स्वार्थी ब्राह्मणों की भूमिका पथ प्रदर्शक की थी। बारहवीं-तेरहवीं सदी में बख्तियार खिलजी नाम एक हमलावर उत्तर भारत की उन समस्त बौद्ध स्थलियों पर गया, जिनका सीधा संबंध बुद्ध से था। उसने कुशी नगर की विश्व प्रसिद्ध सात मीटर लंबी सुनहरी मूर्ति को तीन टुकड़ों में तोड़कर फेंक दिया था। उसने ही नालंदा विश्वविद्यालय को जलाकर हमेशा के लिए राख कर दिया था। इसके पहले हिन्दू राजा शशांक ने नालंदा विश्वविद्यालय को जलाया था। बख्तियार ने उदान्तपुरी (बिहार शरीफ) के प्रख्यात बौद्ध मठ के विशाल टावर को किला समझ कर ध्वस्त कर दिया, जिसमें सैकड़ों बौद्ध भिक्षु मारे गये तथा हजारों बौद्ध ग्रंथ खून से लथ-पथ होकर नष्ट हो गये। बचे-खुचे बहुमूल्य बौद्ध ग्रंथों को जीवित बचे कुछ भिक्षु अपने रक्त रंजित चीवरों में छिपाकर बर्मा, नेपाल तथा तिब्बत ले गये। स्मरण रहे कि हजरत मोहम्मद के समय बौद्ध पश्चिम एशिया में फैल चुका था, इसलिए वहां के अरबी भाषी लोगों ने 'बुद्ध पूजा` को गलत उच्चारण के कारण 'बुत पूजा` कहकर विरोध किया, जिसके चलते मुस्लिम हमलावार जहां भी गये, उन्होंने बुद्ध मूर्तियों को तोड़ डाला। मुस्लिम विजेताओं ने अफगानिस्तान से लेकर मध्य एशिया तक फैले बौद्ध धर्म को समूल नष्ट कर दिया।

बौद्धों की कीमत पर भारत में ईसाई तथा इस्लाम धर्म जरूर पनपा, जिसके कारण ए.एल. बाशम जैसे नामी इतिहासकारों ने हिन्दू धर्म को उदार कहकर अपनी श्रद्धांजली पेश की, जो सही नहीं है। हकीकत यह है कि इन दोनों धर्मों का विकास हिन्दू धर्म की उदारता के कारण नहीं, बल्कि उसके वर्ण व्यवस्थावादी कट्टरता के कारण हुआ। यदि हिन्दू धर्म उदार होता, तो इस धरती से उत्पन्न विश्व के सर्वश्रेष्ठ दर्शन बौद्ध धर्म को क्रूरता के साथ नष्ट नहीं करता। प्रसिद्ध भारतीय दार्शनिक देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय ने बौद्ध धर्म को भारतीय इतिहास का करिश्मा कहा है। अत: यह करिश्मा आज भी जारी है। हाल ही में एक अमरीकी मीडिया सर्वेक्षण में बौद्ध धर्म को सर्वाधिक तीव्र गति से पनपने वाला धर्म बताया गया। विगत् कुछ वर्षों में यूरोप तथा अमरीका के हजारों रोमन कैथोलिकों ने बौद्ध धर्म को अपनाया है, जिनमें इटली के विश्व प्रसिद्ध फुटबाल खिलाड़ी राबर्टो बज्जियो तथा हालीबुड के सुपर स्टार रिचार्ड गेरे भी शामिल हंै। विगत् दिनों रोम के एक अखबार को दिये गये एक साक्षात्कार में सोवियत संघ के पूर्व राष्ट्रपति गोर्वाचोव ने ठीक ही कहा : 'इक्कीसवीं सदी बुद्ध की सदी होगी।`

बौद्ध धर्म का इतिहास और महत्‍वपूर्ण तथ्‍यबौद्ध धर्म भारत की श्रमण परम्परा से निकला धर्म और दर्शन है. इसके प्रस्थापक महात...
08/11/2016

बौद्ध धर्म का इतिहास और महत्‍वपूर्ण तथ्‍य

बौद्ध धर्म भारत की श्रमण परम्परा से निकला धर्म और दर्शन है. इसके प्रस्थापक महात्मा बुद्ध शाक्यमुनि (गौतम बुद्ध) थे. वे 563 ईसा पूर्व से 483 ईसा पूर्व तक रहे. ईसाई और इस्लाम धर्म से पहले बौद्ध धर्म की उत्पत्ति हुई थी. दोनों धर्म के बाद यह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा धर्म है. इस धर्म को मानने वाले ज्यादातर चीन, जापान, कोरिया, थाईलैंड, कंबोडिया, श्रीलंका, नेपाल, भूटान और भारत जैसे कई देशों में रहते हैं:
(1) बौद्ध धर्म के संस्थापक थे गौतम बुद्ध. इन्हें एशिया का ज्योति पुंज कहा जाता है.

(2) गौतम बुद्ध का जन्म 563 ई. पूर्व के बीच शाक्य गणराज्य की तत्कालीन राजधानी कपिलवस्तु के निकट लुंबिनी, नेपाल में हुआ था.

(3) इनके पिता शुद्धोधन शाक्य गण के मुखिया थे.

(4) सिद्धार्थ के जन्म के सात दिन बाद ही उनकी मां मायादेवी का देहांत हो गया था.

(5) सिद्धार्थ की सौतेली मां प्रजापति गौतमी ने उनको पाला.

(6) इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था.

(7) सिद्धार्थ का 16 साल की उम्र में दंडपाणि शाक्य की कन्या यशोधरा के साथ विवाह हुआ.

(8) इनके पुत्र का नाम राहुल था.

(9) सिद्धार्थ जब कपिलावस्तु की सैर के लिए निकले तो उन्होंने चार दृश्यों को देखा:
(i) बूढ़ा व्यक्ति
(ii) एक बिमार व्यक्ति
(iii) शव
(iv) एक संयासी

(10) सांसारिक समस्याओं से दुखी होकर सिद्धार्थ ने 29 साल की आयु में घर छोड़ दिया. जिसे बौद्ध धर्म में महाभिनिष्कमण कहा जाता है.

(11) गृह त्याग के बाद बुद्ध ने वैशाली के आलारकलाम से सांख्य दर्शन की शिक्षा ग्रहण की.

(12) आलारकलाम सिद्धार्थ के प्रथम गुरू थे.

(13) आलारकलाम के बाद सिद्धार्थ ने राजगीर के रूद्रकरामपुत्त से शिक्षा ग्रहण की.

(14) उरूवेला में सिद्धार्थ को कौण्डिन्य, वप्पा, भादिया, महानामा और अस्सागी नाम के 5 साधक मिले.

(15) बिना अन्न जल ग्रहण किए 6 साल की कठिन तपस्या के बाद 35 साल की आयु में वैशाख की पूर्णिमा की रात निरंजना नदी के किनारे, पीपल के पेड़ के नीचे सिद्धार्थ को ज्ञान प्राप्त हुआ.

(16) ज्ञान प्राप्ति के बाद सिद्धार्थ बुद्ध के नाम से जाने जाने लगे. जिस जगह उन्‍हें ज्ञान प्राप्‍त हुआ उसे बोधगया के नाम से जाना जाता है.

(17) बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया जिसे बौद्ध ग्रंथों में धर्मचक्र प्रवर्तन कहा जाता है.

(18) बुद्ध ने अपने उपदेश कोशल, कौशांबी और वैशाली राज्य में पालि भाषा में दिए.

(19) बुद्ध ने अपने सर्वाधिक उपदेश कौशल देश की राजधानी श्रीवस्ती में दिए.

(20) इनके प्रमुख अनुयायी शासक थे:
(i) बिंबसार
(ii) प्रसेनजित
(iii) उदयन

(21) बुद्ध की मृत्यु 80 साल की उम्र में कुशीनारा में चुन्द द्वारा अर्पित भोजन करने के बाद हो गई. जिसे बौद्ध धर्म में महापरिनिर्वाण कहा गया है.

(22) मल्लों ने बेहद सम्मान पूर्वक बुद्ध का अंत्येष्टि संस्कार किया.

(23) एक अनुश्रुति के अनुसार मृत्यु के बाद बुद्ध के शरीर के अवशेषों को आठ भागों में बांटकर उन पर आठ स्तूपों का निर्माण कराया गया.

(24) बुद्ध के जन्म और मृत्यु की तिथि को चीनी पंरपरा के कैंटोन अभिलेख के आधार पर निश्चित किया गया है.

(25) बौद्ध धर्म के बारे में हमें विशद ज्ञान पालि त्रिपिटक से प्राप्त होता है.

(26) बौद्ध धर्म अनीश्वरवादी है और इसमें आत्मा की परिकल्पना भी नहीं है.

(27) बौद्ध धर्म में पुनर्जन्म की मान्यता है.

(28) तृष्णा को क्षीण हो जाने की अवस्था को ही बुद्ध ने निर्वाण कहा है.

(29) बुद्ध के अनुयायी दो भागों मे विभाजित थे:
(i) भिक्षुक- बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए जिन लोगों ने संयास लिया उन्हें भिक्षुक कहा जाता है.
(ii) उपासक- गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हुए बौद्ध धर्म अपनाने वालों को उपासक कहते हैं. इनकी न्यूनत्तम आयु 15 साल है.

(30) बौद्धसंघ में प्रविष्‍ट होने को उपसंपदा कहा जाता है.

(31) प्रविष्ठ बौद्ध धर्म के त्रिरत्न हैं-
(i) बुद्ध
(ii) धम्म
(iii) संघ

(32) चतुर्थ बौद्ध संगीति के बाद बौद्ध धर्म दो भागों में विभाजित हो गया:
(i) हीनयान
(ii) महायान

(33) धार्मिक जुलूस सबसे पहले बौद्ध धर्म में ही निकाला गया था.

(34) बौद्ध धर्म का सबसे पवित्र त्यौहार वैशाख पूर्णिमा है जिसे बुद्ध पूर्णिमा कहा जाता है.

(35) बुद्ध ने सांसारिक दुखों के संबंध में चार आर्य सत्यों का उपदेश दिया है. ये हैं
(i) दुख
(ii) दुख समुदाय
(iii) दुख निरोध
(iv) दुख निरोधगामिनी प्रतिपदा

(36) सांसारिक दुखों से मुक्ति के लिए बुद्ध ने अष्टांगिक मार्ग की बात कही. ये साधन हैं.
(i) सम्यक दृष्टि
(ii) सम्यक संकल्प
(iii) सम्यक वाणी
(iv) सम्यक कर्मांत
(v) सम्यक आजीव
(vi) सम्यक व्यायाम
(vii) सम्यक स्मृति
(viii) सम्यक समाधि

(37) बुद्ध के अनुसार अष्टांगिक मार्गों के पालन करने के उपरांत मनुष्य की भव तृष्णा नष्ट हो जाती है और उसे निर्वाण प्राप्त होता है.

(38) बुद्ध ने निर्वाण प्राप्ति के लिए 10 चीजों पर जोर दिया है:
(i) अहिंसा
(ii) सत्य
(iii) चोरी न करना
(iv) किसी भी प्रकार की संपत्ति न रखना
(v) शराब का सेवन न करना
(vi) असमय भोजन करना
(vii) सुखद बिस्तर पर न सोना
(viii) धन संचय न करना
(ix) महिलाओं से दूर रहना
(X) नृत्य गान आदि से दूर रहना.

(39) बुद्ध ने मध्यम मार्ग का उपदेश दिया.

(40) अनीश्वरवाद के संबंध में बौद्धधर्म और जैन धर्म में समानता है.

(41) जातक कथाएं प्रदर्शित करती हैं कि बोधिसत्व का अवतार मनुष्य रूप में भी हो सकता है और पशुओं के रूप में भी.

(42) बोधिसत्व के रूप में पुनर्जन्मों की दीर्घ श्रृंखला के अंतर्गत बुद्ध ने शाक् मुनि के रूप में अपना अंतिम जन्म प्राप्त किया.

(43) सर्वाधिक बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण गंधार शैली के अंतर्गत किया गया था. लेकिन बुद्ध की प्रथम मूर्ति मथुरा कला के अंतर्गत बनी थी.

 #बौद्ध  #धर्म से जुड़ी कुछ  #महत्वपूर्ण  #जानकारी...........*★ दुनिया की 25% से अधिक जनसंख्या (1.8 अरब) बौद्ध धर्म की अ...
15/10/2016

#बौद्ध #धर्म से जुड़ी कुछ #महत्वपूर्ण #जानकारी...........
*★ दुनिया की 25% से अधिक जनसंख्या (1.8 अरब) बौद्ध धर्म की अनुयायी है।*
*★ बौद्ध धर्म दुनिया का पहला "विश्वधर्म" है।*
*★ जनसंख्या की तुलना में बौद्ध धर्म दुनिया का "दूसरा" सबसे बडा धर्म है।*
*★ 1,22,00,00,000 (91%) चीन में है सबसे अधिक बौद्ध अनुयायी। दुनिया के 68% बौद्ध चीन में है।*
*★ 6,67,00,000 (5.5%) बौद्ध अनुयायी भारत में है।*
*★ एशिया महाद्वीप का "प्रमुख धर्म" बौद्ध धर्म है, करीब 45% एशियाई जनसंख्या बौद्ध है।*
*★ करीब 18 देशों में बौद्ध धर्म "प्रमुख धर्म " है और 6 देशों का "राष्ट्रधर्म" (राजधर्म) है।*
*★ 11 देशों में 90% से अधिक बौद्ध जनसंख्या है।*
*★ गौतम बुद्ध का जन्म 563 ई.पू. में नेपाल की तराई में स्थित कपिलवस्तु के 'लुम्बिनी' ग्राम में हुआ था।*
*★ बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था। सिद्धार्थ की मां का नाम 'महामाया' और पिता का नाम 'शुद्धोदन' था। माता के देहान्त के बाद इनका लालन-पालन इनकी मौसी 'गौतमी' ने किया।*
*★ भगवान बुद्ध का विवाह 'यशोधरा' नामक राजकन्या से हुआ था, उन्हें एक पुत्र हुआ, जिसका नाम 'राहुल' था।*
*★ बुद्ध ने 29 वर्ष की आयु में ज्ञान प्रकाश की तृष्णा को तृप्त करने के लिए घर त्याग दिया, जिसे बौद्ध धर्म ग्रंथों में 'महाभिनिष्क्रमण' कहा गया है।*
*★ 2500 वर्ष पुर्व गौतम बुद्ध को 35 वर्ष आयु में गया के निकट निरंजना नदी के किनारे एक पीपल (बोधि वृक्ष) के नीचे 49वें दिन ज्ञान प्राप्त हुआ। ज्ञान प्राप्ति के बाद सिद्धार्थ 'बुद्ध' कहलाए। बौद्ध ग्रंथों में इनके ज्ञान प्राप्ति को 'निर्वाण' कहा गया है।*
*★ वाराणसी के निकट 'सारनाथ' में भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश पांच पंडितों, साधुओं को दिया, जो बौद्ध परंपरा में 'धर्मचक्रप्रवर्तन' के नाम से विख्यात हैं।*
*★ भगवान बुद्ध का देहावसान अस्सी वर्ष की आयु में 483 ईसा पूर्व में वर्तमान उत्तरप्रदेश के कुशीनगर में हुआ था। इसे बौद्ध परंपरा में 'महापरिनिर्वाण' के नाम से जाना जाता है।*
*★ बौद्ध धर्म का मूलाधार चार आर्य सत्य हैं। ये चार आर्य सत्य हैं- दुःख है, दुःख का कारण है, दुःख का निवारण है और दुःख निरोध-गामिनी-प्रतिपदा (दुःख निवारक मार्ग) यानी अष्टांगिक मार्ग है।*
*★ दुःख को हरने वाले और तृष्णा का नाश करने वाले आर्य अष्टांगिक मार्ग के आठ अंग हैं। उन्हें मज्झिम प्रतिपदा यानी मध्यम मार्ग भी कहते हैं।*
*★ अष्टांगिक मार्ग को भिक्षुओं का कल्याण मित्र कहा गया।*
*★ गौतम बुद्ध ने तपस्स एवं मल्लक नाम के दो शूद्रों को बौद्ध धर्म का सर्वप्रथम अनुयायी बनाया।*
*★ तथागत बुद्ध ने अपने जीवन में सर्वाधिक उपदेश कौशल देश की राजधानी 'श्रावस्ती' में दिए। उन्होंने 'मगध' को भी अपना प्रचार केंद्र बनाया।*
*★ भगवान बुद्ध के प्रधान शिष्य उपालि व आनंद थे। सारनाथ में ही बौद्ध संघ की स्थापना हुई।*
*★ बौद्ध धर्म अनीश्वरवादी है। वास्तव में बुद्ध ने काल्पनिक ईश्वर के स्थान पर मानव प्रतिष्ठा पर ही बल दिया।*
*★ बौद्ध धर्म में 'वर्ण व्यवस्था', 'जाति प्रथा' एवं किसी भी प्रकार के भेदभाव नहीं है।*
*★ बौद्धों के लिए महीने के 4 दिन अमावस्या, पूर्णिमा और दो चतुर्थी दिवस उपवास यानि उपोसत के दिन होते थे।*
*★ बौद्धों का सबसे पवित्र एवं महत्वपूर्ण त्योहार 'वैशाख' की पूर्णिमा है, जिसे 'बुद्ध पूर्णिमा' के नाम से भी जाना जाता है। इसी दिन ही बुद्ध का जन्म, विवाह, ज्ञानप्राप्ती और महापरिनिर्वाण हुआ था।*
*★ बौद्ध धर्म के दो प्रमुख सम्प्रदाय हैं- हीनयान और महायान।*
*★ हीनयान सम्प्रदाय के लोग श्रीलंका, म्यानमार, थाइलैंड, कम्बोडिया, सिंगापुर, लाओस आदि देशों में फैले हुए हैं।*
*★ वर्तमान में महायान सम्प्रदाय के लोग तिब्बत, चीन, कोरिया, ताइवान, हांगकांग, वियतनाम और जापान में हैं।*
*★ बौद्ध धर्म की एक और शाखा 'व्रजयान' प्रचलित हुई 7वीं शताब्दी आई। जिसका प्रमुख केंद्र भागलपुर जिला (बिहार) में स्थित विक्रमशिला विश्वविद्यालय था। भूटान और मंगोलिया इन दो बौद्ध देशों में वज्रयानी बौद्ध है।*
*★ तथागत बुद्ध के अस्थि अवशेषो पर भट्टि (द.भारत) में निर्मित प्रचीनतम स्तूप को महास्तूप की संज्ञा दी गई है।*
*★ बौद्ध धर्म के मूल सिद्धांत 'त्रिपिटक' ग्रंथ में संग्रहीत हैं। यह तीन विभागों मे बटा हुआ है, क्रमशः सुत्त पिटक, विनय् पिटक और अभिधम्म पिटक। त्रिपिटक के इन 3 पिटकों में कुल 17 ग्रंथ है।*
*★ भगवान बुद्ध ने अपने उपदेश लोकभाषा पाली (मूल रूप में मागधी) में दिए थे।*
*★ बौद्ध धर्म के दो अनुयायी समूदाय है, एक भिक्खू और दूसरा उपासक।*
*★ बौद्ध धर्म के त्रिरत्न है – बुद्ध, धम्म और संघ।*
*★ मूर्ति एवं शिल्प कला के क्षेत्र में बौद्ध धर्म का बडा योगदान रहा है।*

डा बी.आर. अम्बेडकर ने दीक्षा भूमि, नागपुर, भारत में ऐतिहासिक बौद्ध धर्मं में परिवर्तन के अवसर पर,15 अक्टूबर 1956 को अपने...
12/10/2016

डा बी.आर. अम्बेडकर ने दीक्षा भूमि, नागपुर, भारत में ऐतिहासिक बौद्ध धर्मं में परिवर्तन के अवसर पर,15 अक्टूबर 1956 को अपने अनुयायियों के लिए 22 प्रतिज्ञाएँ निर्धारित कीं.800000 लोगों का बौद्ध धर्म में रूपांतरण ऐतिहासिक था क्योंकि यह विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक रूपांतरण था.उन्होंने इन शपथों को निर्धारित किया ताकि हिंदू धर्म के बंधनों को पूरी तरह पृथक किया जा सके.ये 22 प्रतिज्ञाएँ हिंदू मान्यताओं और पद्धतियों की जड़ों पर गहरा आघात करती हैं. ये एक सेतु के रूप में बौद्ध धर्मं की हिन्दू धर्म में व्याप्त भ्रम और विरोधाभासों से रक्षा करने में सहायक हो सकती हैं.इन प्रतिज्ञाओं से हिन्दू धर्म,जिसमें केवल हिंदुओं की ऊंची जातियों के संवर्धन के लिए मार्ग प्रशस्त किया गया, में व्याप्त अंधविश्वासों, व्यर्थ और अर्थहीन रस्मों, से धर्मान्तरित होते समय स्वतंत्र रहा जा सकता है. प्रसिद्ध 22 प्रतिज्ञाएँ निम्न हैं:
1. मैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश में कोई विश्वास नहीं करूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा
2. मैं राम और कृष्ण, जो भगवान के अवतार माने जाते हैं, में कोई आस्था नहीं रखूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा
3. मैं गौरी, गणपति और हिन्दुओं के अन्य देवी-देवताओं में आस्था नहीं रखूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा.
4. मैं भगवान के अवतार में विश्वास नहीं करता हूँ
5. मैं यह नहीं मानता और न कभी मानूंगा कि भगवान बुद्ध विष्णु के अवतार थे. मैं इसे पागलपन और झूठा प्रचार-प्रसार मानता हूँ
6. मैं श्रद्धा (श्राद्ध) में भाग नहीं लूँगा और न ही पिंड-दान दूँगा.
7. मैं बुद्ध के सिद्धांतों और उपदेशों का उल्लंघन करने वाले तरीके से कार्य नहीं करूँगा
8. मैं ब्राह्मणों द्वारा निष्पादित होने वाले किसी भी समारोह को स्वीकार नहीं करूँगा
9. मैं मनुष्य की समानता में विश्वास करता हूँ
10. मैं समानता स्थापित करने का प्रयास करूँगा
11. मैं बुद्ध के आष्टांगिक मार्ग का अनुशरण करूँगा
12. मैं बुद्ध द्वारा निर्धारित परमितों का पालन करूँगा.
13. मैं सभी जीवित प्राणियों के प्रति दया और प्यार भरी दयालुता रखूँगा तथा उनकी रक्षा करूँगा.
14. मैं चोरी नहीं करूँगा.
15. मैं झूठ नहीं बोलूँगा
16. मैं कामुक पापों को नहीं करूँगा.
17. मैं शराब, ड्रग्स जैसे मादक पदार्थों का सेवन नहीं करूँगा.
18. मैं महान आष्टांगिक मार्ग के पालन का प्रयास करूँगा एवं सहानुभूति और प्यार भरी दयालुता का दैनिक जीवन में अभ्यास करूँगा.
19. मैं हिंदू धर्म का त्याग करता हूँ जो मानवता के लिए हानिकारक है और उन्नति और मानवता के विकास में बाधक है क्योंकि यह असमानता पर आधारित है, और स्व-धर्मं के रूप में बौद्ध धर्म को अपनाता हूँ
20.मैं दृढ़ता के साथ यह विश्वास करता हूँ की बुद्ध का धम्म ही सच्चा धर्म है.
21. मुझे विश्वास है कि मैं फिर से जन्म ले रहा हूँ (इस धर्म परिवर्तन के द्वारा).
22.मैं गंभीरता एवं दृढ़ता के साथ घोषित करता हूँ कि मैं इसके (धर्म परिवर्तन के) बाद अपने जीवन का बुद्ध के सिद्धांतों व शिक्षाओं एवं उनके धम्म के अनुसार मार्गदर्शन करूँगा.

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