01/12/2025
श्रीमद्भगवद्गीता दुनिया भर के दार्शनिक शास्त्रों में एक ऐसा अनूठा शास्त्र है जिसे किसी धर्म विशेष के अनुयाइयों ने नहीं, बल्कि अलग अलग संप्रदायों के सत्यान्वेषियों ने सराहा है. शायद ही दुनिया की कोई ऐसी भाषा होगी जिसमें गीता का अनुवाद न हुआ हो. यह गीता के अपने गुणों के दम पर है, राजसत्ता के प्रभाव से नहीं. भारत ही में इसकी सैंकड़ों टीकाएं होंगी जिनमें आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, मधुसूदन सारस्वती, हनुमत, संत ज्ञानेश्वर, माध्व, गंगाधर तिलक, प्रभुपाद, ऑरोबिन्दो के भाष्य शामिल हैं. प्रवृत्त मार्ग वाले इसे अपना ग्रंथ मानते हैं, उधर निवृत्त मार्गी को इसमें संन्यास की शिक्षा ही नज़र आती है. द्वैतवादी गीता में जीव और ईश्वर के भेद को हर जगह स्पष्टतया पाते हैं, उधर अद्वैतवादी शंकर की लिखी भगवद्गीता की टीका में अपने मूल्यों का आधार मानते हैं. इसीलिए यह एक अद्वितीय ग्रन्थ है. इसमें अन्य सभी शास्त्र समाहित हैं, पर इसके सिद्धांत कहीं नहीं पाए जाते.
गीता को लेकर अनजान लोगों में कई भ्रम भी फैले हैं - जैसे श्रीमद भागवतम और श्रीमद भगवद्गीता को एक समझना, गीता को उपनिषदों का हिस्सा समझना, गीता को शिव की उक्ति कहना आदि. गीता द्वापरयुग के अंतिम चरण में परमेश्वर अवतार श्रीकृष्णचंद्र और पांडव अर्जुन का महाभारत युद्ध से ठीक पहले कुरुक्षेत्र की रणभूमि में हुआ आध्यात्मिक संवाद है. इसमें धर्मसंमूढचेताः अर्जुन के प्रश्न और स्थितप्रज्ञ कृष्ण के उत्तर हैं. कहते हैं वेदज्ञ अर्जुन के प्रश्नों का समाधान धरती पर उस समय केवल भगवान् श्रीकृष्ण की पापविनाशिनी ब्रह्मवाणी ही कर सकती थी.
मनुष्य के संघर्षपूर्ण जीवन में ऐसा समय अवश्य आता है जब उसका विवेक साथ छोड़ देता है, आगे क्या करें नहीं सूझता, हृदय दुर्बल हो जाता है, यहाँ तक वह जीवन जीने की आस तक छोड़ देता है. अर्जुन की दुविधा 'कॉन्फ्लिक्ट ऑफ़ ड्यूटीज़' हर मनुष्य से जुड़ी है. इस दुविधा का निवारण श्रीमद्भगद्गीता से संभव है.
भारत के मनीषियों ने आध्यात्मिक ज्ञान को पाने के लिए प्रस्थान त्रयी (उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र और गीता) बताई है. इनमें गीता सर्वश्रेष्ठ है!
मधुसूदन सारस्वती अपनी गीता की टीका 'गूढ़ार्थदीपिका' में लिखते हैं -
सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः ।
पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत् ।
यदि उपनिषद् गायें हैं, तो गोपाल कृष्ण ने उनका दूध निकालकर उसका मक्खन रूपी सार अपने भक्तों को खिलाया.
अतः सभी को किसी ब्रह्मज्ञानी से गीता के गूढ़ रहस्यों को समझकर उस अमृतमय नवनीत का सेवन करना चाहिए, जिससे उनका शोक और चिंता मिटकर आध्यात्मिक बल पुष्ट हो सके.