14/08/2026
🌺जरूर पढ़े:👉"सेवा का असली फल — एक गहरी साखी
"एक बार एक सेवादार कई वर्षों से आश्रम में सेवा कर रहा था। वह सुबह सबसे पहले पहुँचता और अपनी जिम्मेदारी पूरी लगन से निभाता। लोग उसकी मेहनत की प्रशंसा भी करते थे। लेकिन धीरे-धीरे उसके मन में यह भाव आने लगा कि “मैं दूसरों से ज्यादा सेवा करता हूँ।”
एक दिन उसे किसी दूसरे सेवादार की छोटी-सी गलती पर बहुत क्रोध आ गया। उसने उसे सबके सामने डाँट दिया। शाम को जब वह सतगुरु के पास पहुँचा तो सतगुरु ने उसके चेहरे की उदासी देखकर पूछा, “आज मन इतना भारी क्यों है?”
सेवादार ने सारी बात बता दी और कहा, “महाराज जी, मैं इतने वर्षों से सेवा कर रहा हूँ, फिर भी मेरे अंदर क्रोध और अहंकार क्यों है?”
सतगुरु ने शांत स्वर में कहा, “तुमने सेवा तो बहुत की, लेकिन कभी यह देखने की कोशिश नहीं की कि सेवा करते-करते तुम्हारे भीतर क्या बदल रहा है।”
सेवादार चुप हो गया।
सतगुरु ने आगे कहा, “अगर सेवा करने के बाद तुम्हें अपने से कम सेवा करने वाले व्यक्ति पर अभिमान होने लगे, तो समझो सेवा ने तुम्हारे हाथ तो व्यस्त रखे, लेकिन मन को अभी नहीं छुआ। सच्ची सेवा वह है जिसके बाद मनुष्य अपने गुण नहीं गिनता, बल्कि अपनी कमियाँ देखने लगता है।”
फिर सतगुरु ने एक सुंदर बात कही, “बेटा, सेवा का हिसाब मत रखा करो। यह मत सोचो कि मैंने आज कितनी सेवा की। बल्कि यह देखो कि आज सेवा ने मेरे अंदर से कितना ‘मैं’ कम किया।”
उस दिन से उस सेवादार ने अपनी सेवा का ढंग बदल दिया। अब वह किसी की प्रशंसा की प्रतीक्षा नहीं करता था। कोई धन्यवाद देता तो भी मुस्कुरा देता और कोई उसकी गलती निकालता तो भी शांत रहने की कोशिश करता।
कुछ समय बाद उसके एक साथी ने पूछा, “तुममें इतना बदलाव कैसे आ गया?”
😍वह बोला, “पहले मैं समझता था कि मैं सतगुरु की सेवा कर रहा हूँ। अब समझ आया है कि असल में सतगुरु मेरी सेवा के माध्यम से मेरे अंदर का अहंकार साफ कर रहे हैं।”