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जगन्नाथ मंदिर का सबसे पहला प्रमाण महाभारत के वनपर्व में मिलता है। कहा जाता है कि सबसे पहले सबर जनजाति विश्‍ववसु ने नीलमा...
21/07/2026

जगन्नाथ मंदिर का सबसे पहला प्रमाण महाभारत के वनपर्व में मिलता है। कहा जाता है कि सबसे पहले सबर जनजाति विश्‍ववसु ने नीलमाधव के रूप में इनकी पूजा की थी। आज भी पुरी के मंदिरों में कई सेवक हैं जिन्हें दैतापति के नाम से जाना जाता है।

राजा इंद्रदयुम्न ने बनवाया था यहां मंदिर : राजा इंद्रदयुम्न मालवा का राजा था जिनके पिता का नाम भारत और माता सुमति था। राजा इंद्रदयुम्न को सपने में जगन्नाथ के दर्शन हुए थे । भगवान विष्णु ने उनको सपने में दर्शन दिए और कहा नीलांचल पर्वत की एक गुफा में मेरी एक मूर्ति है उसे नीलमाधव कहते हैं। ‍तुम एक मंदिर बनवाकर उसमें मेरी यह मूर्ति स्थापित कर दो। राजा ने अपने सेवकों को नीलांचल पर्वत की खोज में भेजा। उसमें से एक था ब्राह्मण विद्यापति।

विद्यापति ने सुन रखा था कि सबर कबीले के लोग नीलमाधव की पूजा करते हैं और उन्होंने अपने देवता की इस मूर्ति को नीलांचल पर्वत की गुफा में छुपा रखा है। वह यह भी जानता था कि सबर कबीले का मुखिया विश्‍ववसु नीलमाधव का उपासक है और उसी ने मूर्ति को गुफा में छुपा रखा है। चतुर विद्यापति ने मुखिया की बेटी से विवाह कर लिया। आखिर में वह अपनी पत्नी के जरिए नीलमाधव की गुफा तक पहुंचने में सफल हो गया। उसने मूर्ति चुरा ली और राजा को लाकर दे दी।

विश्‍ववसु अपने आराध्य देव की मूर्ति चोरी होने से बहुत दुखी हुआ। अपने भक्त के दुख से भगवान भी दुखी हो गए। भगवान गुफा में लौट गए, लेकिन साथ ही राज इंद्रदयुम्न से वादा किया कि वो एक दिन उनके पास जरूर लौटेंगे बशर्ते कि वो एक दिन उनके लिए विशाल मंदिर बनवा दे। राजा ने मंदिर बनवा दिया और भगवान विष्णु से मंदिर में विराजमान होने के लिए कहा। भगवान ने कहा कि तुम मेरी मूर्ति बनाने के लिए समुद्र में तैर रहा पेड़ का बड़ा टुकड़ा उठाकर लाओ, जो द्वारिका से समुद्र में तैरकर पुरी आ रहा है। राजा के सेवकों ने उस पेड़ के टुकड़े को तो ढूंढ लिया लेकिन सब लोग मिलकर भी उस पेड़ को नहीं उठा पाए। तब राजा को समझ आ गया कि नीलमाधव के अनन्य भक्त सबर कबीले के मुखिया विश्‍ववसु की ही सहायता लेना पड़ेगी। सब उस वक्त हैरान रह गए, जब विश्ववसु भारी-भरकम लकड़ी को उठाकर मंदिर तक ले आए।

अब बारी थी लकड़ी से भगवान की मूर्ति गढ़ने की। राजा के कारीगरों ने लाख कोशिश कर ली लेकिन कोई भी लकड़ी में एक छैनी तक भी नहीं लगा सका। तब तीनों लोक के कुशल कारीगर भगवान विश्‍वकर्मा एक बूढ़े व्यक्ति का रूप धरकर आए। उन्होंने राजा को कहा कि वे नीलमाधव की मूर्ति बना सकते हैं, लेकिन साथ ही उन्होंने अपनी शर्त भी रखी कि वे 21 दिन में मूर्ति बनाएंगे और अकेले में बनाएंगे। कोई उनको बनाते हुए नहीं देख सकता। उनकी शर्त मान ली गई।

लोगों को आरी, छैनी, हथौड़ी की आवाजें आती रहीं। राजा इंद्रदयुम्न की रानी गुंडिचा अपने को रोक नहीं पाई। वह दरवाजे के पास गई तो उसे कोई आवाज सुनाई नहीं दी। वह घबरा गई। उसे लगा बूढ़ा कारीगर मर गया है। उसने राजा को इसकी सूचना दी। अंदर से कोई आवाज सुनाई नहीं दे रही थी तो राजा को भी ऐसा ही लगा। सभी शर्तों और चेतावनियों को दरकिनार करते हुए राजा ने कमरे का दरवाजा खोलने का आदेश दिया।

जैसे ही कमरा खोला गया तो बूढ़ा व्यक्ति गायब था और उसमें 3 अधूरी ‍मूर्तियां मिली पड़ी मिलीं। भगवान नीलमाधव और उनके भाई के छोटे-छोटे हाथ बने थे, लेकिन उनकी टांगें नहीं, जबकि सुभद्रा के हाथ-पांव बनाए ही नहीं गए थे। राजा ने इसे भगवान की इच्छा मानकर इन्हीं अधूरी मूर्तियों को स्थापित कर दिया। तब से लेकर आज तक तीनों भाई बहन इसी रूप में विद्यमान हैं।

वर्तमान में जो मंदिर है वह 7वीं सदी में बनवाया था। हालांकि इस मंदिर का निर्माण ईसा पूर्व 2 में भी हुआ था। यहां स्थित मंदिर 3 बार टूट चुका है। 1174 ईस्वी में ओडिसा शासक अनंग भीमदेव ने इसका जीर्णोद्धार करवाया था।

24/05/2026

अधकुवारी गुफा आरती | LIVE दर्शन गर्भजून से

18 May 2025 को माँ भगवती की संध्याकालीन आरती में सपरिवार शामिल होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ . माँ अर्धकुँवारी आप सब की मनोकामना पूरी करें . 🙏

02/05/2026
15/03/2026

कहते हैं जिसे महाकाल स्वयं बुलाते हैं… वही भक्त श्री Mahakaleshwar Jyotirlinga तक पहुँच पाता है।” 🙏
जय महाकाल

“आज हम Hahuch गए हैं महाकाल के दरबार में।

यह वही ज्योतिर्लिंग है जहाँ महाकाल स्वयं विराजमान हैं और भक्तों की हर मनोकामना पूरी करते हैं।

सुबह की अद्भुत भस्म आरती, मंदिर में गूंजता डमरू और हर तरफ बस एक ही जयकारा —

🔱 हर हर महादेव!
🚩 जय महाकाल!

Aur Ab Hum Pahunch gye hain Mahakaleshwar Jyotirlinga ke Prangan mein. Aur ye hai Wo Divya Shivling, DUNIYA KA एकमात्र ऐसा ज्योतिर्लिंग जिसका मुख दक्षिण की ओर है। तंत्र परंपरा में इसका बहुत महत्व है, क्योंकि भगवान शिव को यहाँ 'काल के देवता' (महाकाल) के रूप में पूजा जाता है।

यहाँ की सबसे अनोखी परंपरा है भस्म आरती ,जो हर सुबह ब्रह्म मुहूर्त में arthaat 4 बजे होती है। इसमें भगवान को ताजी भस्म (राख) अर्पित की जाती है।

Jeevan mein Ek baar Iss Alokik Drisy ka Anand avashy lein, “अगर आप भी महाकाल के भक्त हैं तो कमेंट में ज़रूर लिखें —
🔱 जय महाकाल! 🔱

🙏🕉

14/03/2026

Mangalnath Mandir Ujjain

12/03/2026

ऋणमुक्तेश्वर महादेव मंदिर, उज्जैन

This is the place where Raja Harishchandra pleased Lord Shiva and Mahadev released his Loan and Debts... People come here to get rid of their past karma, Pitr Rin and even Loans & debts release...

#धर्म_संस्कृति

11/03/2026

Sandeepani Ashram I Ujjain Diary I Day 1

“उज्जैन की पवित्र भूमि पर संदीपनि आश्रम — दिव्य स्थान जहाँ भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और सुदामा ने महर्षि संदीपनि से शिक्षा Grahan की थी।

आश्रम परिसर में विराजमान हैं सर्वेश्वर महादेव… जिनके बारे में मान्यता है कि यहाँ भगवान शिव स्वयं समस्त सृष्टि के स्वामी रूप में विराजते हैं और साधकों को ज्ञान व शांति का आशीर्वाद देते हैं।

Ashram prangan mein prvesh kare hi Dahini OR स्थित है कुंडलेश्वर महादेव — जो पवित्र Gomti Kund के समीप स्थापित हैं। मान्यता है Ki लंकापति रावण ने भगवान शिव की तपस्या करके is शिवलिंग को स्थापित किया था। इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग का आकार हर साल चावल के एक दाने के बराबर बढ़ता है। Yahin Pr hai Khde Nandi Ki Prtima... Is roop mein Nandi Maharaj aapko Kahin nahin Milenge

Aur ye hai Gomti कुंड... Maana Jaata hai Ki जब कृष्ण अपने गुरु सांदीपनि के आश्रम में शिक्षा ले रहे थे, तब उन्होंने अपने गुरु को तीर्थयात्रा के कष्ट से बचाने के लिए इस कुंड में saari पवित्र नदियों का जल मंगाया था, इसलिए इसे 'गोमती कुंड' कहा जाता है। लगभग 3,000 वर्ष पुराना ye कुंड Kyunki is कुंड में दुनिया भर के तीर्थों का जल समाहित है, जिसमें डुबकी लगाने से पाप धुल जाते हैं और सुख-समृद्धि आती है।

Aur Ab Jhalak Un 64 Kalaon ki jo Shri krishn ne yahan seekhi AUR Uske Baad Wo Yogeshwer Kahlaye....

To Dosto... Ye tha संदीपनि आश्रम jo आज भी हमें हमारी सनातन गुरु-शिष्य परंपरा, ज्ञान और भक्ति की याद दिलाता है।”


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