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*जय श्री हरि* *गुप्त नवरात्र में आठवीं भगवती मां बगलामुखी* *10 महाविद्याओं का कोई भी मंत्र यज्ञ जप साधना करने के लिए योग...
26/01/2026

*जय श्री हरि*

*गुप्त नवरात्र में आठवीं भगवती मां बगलामुखी*

*10 महाविद्याओं का कोई भी मंत्र यज्ञ जप साधना करने के लिए योग्य गुरु का परामर्श अवश्य लें और योग्य गुरु की देख रेख में ही करें*

*काली तारा महाविद्या षोडसी भुवनेश्वरी। बाग्ला छिन्नमस्ता च विद्या धूमावती तथा।।*

*मातंगी त्रिपुरा चैव विद्या च कमलात्मिका। एता दश महाविद्या सिद्धिदा प्रकीर्तिता।।*

*माँ बगलामुखी पौराणिक कथा*


*एक बार सतयुग में महाविनाश उत्पन्न करने वाला ब्रह्मांडीय तूफान उत्पन्न हुआ, जिससे संपूर्ण विश्व नष्ट होने लगा इससे चारों ओर हाहाकार मच गया। संसार की रक्षा करना असंभव हो गया। यह तूफान सब कुछ नष्ट-भ्रष्ट करता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था, जिसे देख कर भगवान विष्णु जी चिंतित हो गए।*

*इस समस्या का कोई हल न पा कर वह भगवान शिव को स्मरण करने लगे, तब भगवान शिव ने कहा: शक्ति रूप के अतिरिक्त अन्य कोई इस विनाश को रोक नहीं सकता अत: आप उनकी शरण में जाएं।*

*तब भगवान विष्णु ने हरिद्रा सरोवर के निकट पहुंच कर कठोर तप किया। भगवान विष्णु के तप से देवी शक्ति प्रकट हुईं। उनकी साधना से महात्रिपुरसुंदरी प्रसन्न हुईं। सौराष्ट्र क्षेत्र की हरिद्रा झील में जलक्रीड़ा करती महापीतांबरा स्वरूप देवी के हृदय से दिव्य तेज उत्पन्न हुआ। इस तेज से ब्रह्मांडीय तूफान थम गया।*

*मंगलयुक्त चतुर्दशी की अर्धरात्रि में देवी शक्ति का देवी बगलामुखी के रूप में प्रादुर्भाव हुआ था। त्रैलोक्य स्तम्भिनी महाविद्या भगवती बगलामुखी ने प्रसन्न होकर भगवान विष्णु जी को इच्छित वर दिया और तब सृष्टि का विनाश रुक सका। देवी बगलामुखी को वीर रति भी कहा जाता है क्योंकि देवी स्वयं ब्रह्मास्त्र रूपिणी हैं। इनके शिव को महारुद्र कहा जाता है। इसीलिए देवी सिद्ध विद्या हैं। तांत्रिक इन्हें स्तंभन की देवी मानते हैं। गृहस्थों के लिए देवी समस्त प्रकार के संशयों का शमन करने वाली हैं।*

*दसमहाविधाओ मे से आठवी महाविधा है देवी बगलामुखी। इनकी उपासना इनके भक्त शत्रु नाश, वाकसिद्ध और वाद विवाद मे विजय के लिए करते है। इनमे सारे ब्राह्मण की शक्ति का समावेश है, इनकी उपासना से भक्त के जीवन की हर बाधा दूर होती है और शत्रुओ का नाश के साथ साथ बुरी शक्तियों का भी नाश करती है। देवी को बगलामुखी, पीताम्बरा, बगला, वल्गामुखी, वगलामुखी, ब्रह्मास्त्र विद्या आदि नामों से भी जाना जाता है।*

*ॐ ह्रीं बगलामुखी सर्वदुष्टानांवाचं मुखं पदं स्तंभय जिह्वां कीलयबुद्धि विनाशय ह्रीं ॐ स्वाहा।*

*मॉं बगलामुखी स्तुति*

*या देवी सर्वभूतेषु पीतरूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।*

*या देवी सर्वभूतेषु शत्रुहंता संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।*

*या देवी सर्वभूतेषु प्रेतनाशिनी संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।*

*या देवी सर्वभूतेषु रोगनाशिनी संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।*

*या देवी सर्वभूतेषु सर्वभयनाशिनी संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।*

*या देवी सर्वभूतेषु सर्वसम्पतिदायनी संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।*

*या देवी सर्वभूतेषु मगंलकारिणी संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।*

*या देवी सर्वभूतेषु मोक्षदायिनी संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।*

*या देवी सर्वभूतेषु बगलारूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः*

*जय श्री राम*

*जय श्री हरि* *10 महाविद्या अनुष्ठान के अंतर्गत आज सातवां दिन मां धूमावती का है**देवी धूमावती की उत्पत्ति कैसे हुई, यह व...
25/01/2026

*जय श्री हरि*

*10 महाविद्या अनुष्ठान के अंतर्गत आज सातवां दिन मां धूमावती का है*

*देवी धूमावती की उत्पत्ति कैसे हुई, यह विचित्र कथा पढ़कर हो जाएंगे हैरान*

*देवी धूमावती की पौराणिक कथा...*

*पुराणों के अनुसार एक बार मां पार्वती को बहुत तेज भूख लगी होती है किंतु कैलाश पर उस समय कुछ न रहने के कारण वे अपनी क्षुधा शांत करने के लिए भगवान शंकर के पास जाती हैं और उनसे भोजन की मांग करती हैं किंतु उस समय शंकरजी अपनी समाधि में लीन होते हैं। मां पार्वती के बार-बार निवेदन के बाद भी शंकरजी ध्यान से नहीं उठते और वे ध्यानमुद्रा में ही मग्न रहते हैं।*

*मां पार्वती की भूख और तेज हो जाती है और वे भूख से व्याकुल हो उठती हैं, परंतु जब मां पार्वती को खाने की कोई चीज नहीं मिलती है, तब वे श्वास खींचकर शिवजी को ही निगल जाती हैं। भगवान शिव के कंठ में विष होने के कारण मां के शरीर से धुआं निकलने लगता है, उनका स्वरूप श्रृंगारविहीन तथा विकृत हो जाता है तथा मां पार्वती की भूख शांत होती है तत्पश्चात भगवान शिव माया के द्वारा मां पार्वती के शरीर से बाहर आते हैं और पार्वती के धूम से व्याप्त स्वरूप को देखकर कहते हैं कि अबसे आप इस वेश में भी पूजी जाएंगी। इसी कारण मां पार्वती का नाम 'देवी धूमावती' पड़ा।*

*एक अन्य कथा के अनुसार जब सती ने पिता के यज्ञ में अपनी स्वेच्छा से स्वयं को जलाकर भस्म कर दिया तो उनके जलते हुए शरीर से जो धुआं निकला, उससे धूमावती का जन्म हुआ इसीलिए वे हमेशा उदास रहती हैं।*


*मां धूमावती धुएं के रूप में सती का भौतिक स्वरूप हैं।*

*शत्रुओं का नाश कर देता हैं धूमावती अष्टक स्तोत्रं का पाठ, अवश्य पढ़ें...*

*धूमावती अष्टक स्तोत्रं*

*।।अथ स्तोत्रं।।*

*प्रातर्या स्यात्कुमारी कुसुमकलिकया जापमाला जपन्ती,*
*मध्याह्ने प्रौढरूपा विकसितवदना चारुनेत्रा निशायाम्।*

*सन्ध्यायां वृद्धरूपा गलितकुचयुगा मुण्डमालां,
वहन्ती सा देवी देवदेवी त्रिभुवनजननी कालिका पातु युष्मान्।।1*

बद्ध्वा खट्वाङ्गकोटौ कपिलवरजटामण्डलम्पद्मयोने:,
कृत्वा दैत्योत्तमाङ्गैस्स्रजमुरसि शिर शेखरन्तार्क्ष्यपक्षै:।
पूर्णं रक्तै्सुराणां यममहिषमहाशृङ्गमादाय पाणौ,
पायाद्वो वन्द्यमानप्रलयमुदितया भैरव: कालरात्र्याम्।।2।।

चर्वन्तीमस्थिखण्डम्प्रकटकटकटाशब्दशङ्घातम्,
उग्रङ्कुर्वाणा प्रेतमध्ये कहहकहकहाहास्यमुग्रङ्कृशाङ्गी।
नित्यन्नित्यप्रसक्ता डमरुडिमडिमां स्फारयन्ती मुखाब्जम्,
पायान्नश्चण्डिकेयं झझमझमझमा जल्पमाना भ्रमन्ती।।3।।

टण्टण्टण्टण्टटण्टाप्रकरटमटमानाटघण्टां वहन्ती,
स्फेंस्फेंस्फेंस्कारकाराटकटकितहसा नादसङ्घट्टभीमा।
लोलम्मुण्डाग्रमाला ललहलहलहालोललोलाग्रवाचञ्चर्वन्ती,
चण्डमुण्डं मटमटमटिते चर्वयन्ती पुनातु।।4।।

वामे कर्णे मृगाङ्कप्रलयपरिगतन्दक्षिणे सूर्यबिम्बङ्कण्ठे,
नक्षत्रहारंव्वरविकटजटाजूटके मुण्डमालाम्।
स्कन्धे कृत्वोरगेन्द्रध्वजनिकरयुतम्ब्रह्मकङ्कालभारं,
संहारे धारयन्ती मम हरतु भयम्भद्रदा भद्रकाली।।5।।

तैलाभ्यक्तैकवेणी त्रपुमयविलसत्कर्णिकाक्रान्तकर्णा लौहेनैकेन कृत्वा चरणनलिनकामात्मन: पादशोभाम्।
दिग्वासा रासभेन ग्रसति जगदिदंय्या यवाकर्णपूरा,
वर्षिण्यातिप्रबद्धा ध्वजविततभुजा सासि देवि त्वमेव।।6।।

सङ्ग्रामे हेतिकृत्वैस्सरुधिरदशनैर्यद्भटानां,
शिरोभिर्मालामावद्ध्य मूर्ध्नि ध्वजविततभुजा त्वं श्मशाने प्रविष्टा।
दृष्टा भूतप्रभूतैः पृथुतरजघना वद्धनागेन्द्रकाञ्ची,
शूलग्रव्यग्रहस्ता मधुरुधिरसदा ताम्रनेत्रा निशायाम्।।7।।

दंष्ट्रा रौद्रे मुखेऽस्मिंस्तव विशति जगद्देवि सर्वं क्षणार्द्धात्,

संसारस्यान्तकाले नररुधिरवशा सम्प्लवे भूमधूम्रे।
काली कापालिकी साशवशयनतरा योगिनी योगमुद्रा रक्तारुद्धिः,
सभास्था भरणभयहरा त्वं शिवा चण्डघण्टा।।8।।

धूमावत्यष्टकम्पुण्यं सर्वापद्विनिवारकम्,
य: पठेत्साधको भक्त्या सिद्धिं व्विन्दन्ति वाञ्छिताम्।।9।।

महापदि महाघोरे महारोगे महारणे,
शत्रूच्चाटे मारणादौ जन्तूनाम्मोहने तथा।।10।।

पठेत्स्तोत्रमिदन्देवि सर्वत्र सिद्धिभाग्भवेत्,

देवदानवगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगा:।।11।।

सिंहव्याघ्रादिकास्सर्वे स्तोत्रस्मरणमात्रत:,
दूराद्दूरतरं य्यान्ति किम्पुनर्मानुषादय:।।12।।

स्तोत्रेणानेन देवेशि किन्न सिद्ध्यति भूतले,
सर्वशान्तिर्ब्भवेद्देवि ह्यन्ते निर्वाणतां व्व्रजेत्।।13।।

।।इत्यूर्द्ध्वाम्नाये धूमावतीअष्टक स्तोत्रं समाप्तम्

1. मां धूमावती सप्ताक्षर मंत्र
धूं धूमावती स्वाहा॥

2. मां धूमावती अष्टक्षर मंत्र
धूं धूं धूमावती स्वाहा॥

3. मां धूमावती दशाक्षर मंत्र
धूं धूं धूं धूमावती स्वाहा॥

4. मां धूमावती चतुर्दशाक्षर मंत्र
धूं धूं धुर धुर धूमावती क्रों फट् स्वाहा॥

5. मां धूमावती पंचदशाक्षर मंत्र
ॐ धूं धूमावती देवदत्त धावति स्वाहा॥

6. धूमावती गायत्री मंत्र
ॐ धूमावत्यै विद्महे संहारिण्यै धीमहि तन्नो धूमा प्रचोदयात्॥

*जय श्री राम*

*जय श्री हरि**गुप्त नवरात्रि पांचवा दिन मां भैरवी पूजन*10 महाविद्या, माता सती के दस उग्र रूप हैं, जो गुप्त नवरात्रि पर स...
23/01/2026

*जय श्री हरि*
*गुप्त नवरात्रि पांचवा दिन मां भैरवी पूजन*

10 महाविद्या, माता सती के दस उग्र रूप हैं, जो गुप्त नवरात्रि पर सिद्धियों और मनोकामना पूर्ति के लिए पूजी जाती हैं। इन दस महाविद्याओं में से मां भैरवी को पंचम महाविद्या माना जाता है। कुछ ग्रन्थों में माँ भैरवी, त्रिमूर्ति से भी श्रेष्ठतर हैं। माता भैरवी का रूप इतना भयंकर व डरावना है कि उन्हें न केवल माँ काली के समकक्ष माना गया है, बल्कि ये भगवान शिव के रूद्र अवतार भगवान भैरव के समान भी हैं।

माता भैरवी की उत्पत्ति
जब राजा दक्ष ने सती और भगवान् शिव कि यज्ञ में नहीं बुलाया था, तो भगवान् शिव ये बात जानते थे, जबकि सती इस बात से अनजान थीं। यज्ञ से पहले जब माता सती ने आकाश मार्ग से सभी देवी-देवताओं व ऋषि-मुनियों को अपने पिता के राज्य में जाते देखा, तो उन्होंने इस बारे में भगवान् शिव से पूछा। भगवान शिव ने माता सती को कि उनके पिता ने यज्ञ रखा है लेकिन उन्हें आमंत्रित नहीं किया। तब माता सती ने भगवान शिव से कहा कि पुत्री होने के कारण उन्हें यज्ञ में जाने के लिए आमंत्रण की आवश्यकता नहीं और उन्होंने भगवान् शिव से वहां जाने की अनुमति माँगी। भगवान् शिव त्रिकालदर्शी हैं। उन्हें ज्ञात था कि वहाँ क्या होगा। इसलिए, उन्होंने माता सती को रोकने का प्रयास किया लेकिन शिवजी के बार-बार रोकने के प्रयास से माता सती गुस्सा हो गईं और उन्होंने क्रोध में भगवान शिव को अपने 10 रूपों के दर्शन दिए, जिनमें से पांचवीं माँ भैरवी देवी थीं। धार्मिक कथाओं के अनुसार, माँ भैरवी की उत्पत्ति महाकाली के छाया विग्रह से हुई है।

इनके कई नाम हैं, जैसे कि षोडशी भी रूद्र भैरवी, चैतन्य भैरवी, नित्य भैरवी, भद्र भैरवी, कौलेश भैरवी, श्मशान भैरवी, संपत प्रदा भैरवी। माँ भैरवी के दो रूप हैं। उग्र रूप में वो काले वर्ण में हैं और उनके केश खुले हुए हैं। उनके तीन नेत्र हैं तथा जीभ लंबी व बाहर निकली हुई है, जिसमें से रक्त निकल रहा है माँ के चार हाथ हैं जिनमें उन्होंने खड्ग, तलवार, राक्षस की खोपड़ी पकड़ी हुई है तथा एक हाथ अभय मुद्रा में है, जो उनके भक्तों को अभय प्रदान करता है। माँ राक्षस की खोपड़ियों के आसन पर विराजमान हैं, जो उनके रूप को और भी भयावह बनाता है

वहीं माँ का दूसरा स्वरूप सौम्य है। इस रूप में माँ एक कमल के आसन पर विराजमान हैं, जिसका वर्ण सुनहरा है। उनके सिर पर सूर्य के समान तेज वाला मुकुट है। माँ के केश खुले हुए हैं व तीन नेत्र हैं। उनके चार हाथ हैं जिनमें से दो में उन्होंने पुस्तक व जपमाला पकड़ी हुई है, जबकि अन्य दो हाथ वरदान व अभय मुद्रा में हैं। माँ अपने इस रूप में भी गले में राक्षसों की खोपड़ियों की माला पहने हुई हैं।

माँ भैरवी की आराधना के फायदे
गुप्त नवरात्रि के पांचवें दिन माँ भैरवी की पूजा करने से बुरी आदतों, बुरी शक्तियों व आत्माओं के प्रभाव से मुक्ति मिलती है। अगर किसी व्यक्ति को किसी भी प्रकार की शारीरिक कमजोरी है, तो उसे भी माँ भैरवी के इस रूप की पूजा करनी चाहिए। माँ का यह रूप भय से मुक्ति प्रदान कर अभय बनाता है। माँ भैरवी के सुंदर स्वरूप की पूजा करने से सुखमय वैवाहिक जीवन, एक अच्छा जीवनसाथी तथा जीवन में प्रेम मिलता है। संतान प्राप्ति के लिए भी माँ भैरवी की आराधना की जाती है। आप इस मंत्र के साथ माँ भैरवी की साधना कर सकते हैं -
भैरवी साधना मंत्र - ॐ ह्रीं भैरवी कलौं ह्रीं स्वाहा॥
लक्ष्मी लज्जे महा विद्ये श्रद्धे पुष्टि स्वधे ध्रुवे,
महा रात्रि महा विद्ये भैरवी नमोस्तुते ।

मेधे विद्या वरे भूति बभ्रवी महा काली,
नियति तवं प्रसि देशे भैरवी नमोस्तुते ।

सर्व स्वरूपे सर्व शक्ति समन्विते,
भये भ्या स्त्राही नो भैरवी नमोस्तुते ।
भक्तिभारत वंदना

एतते मुखम सौम्यं नयना त्रया भूषितं,
पातु नाह भीति भ्यः भैरवी नमोस्तुते ।

त्रैलोक्यविजय भैरवी कवचम् रुद्रयामल तंत्रे हिन्दी अर्थ सहित

श्री गणेशाय नमः
श्रीदेव्युवाच

भैरव्याः सकला विद्याः श्रुताश्चाधिगता मया ।
साम्प्रतं श्रोतुमिच्छामि कवचं यत्पुरोदितम् ॥ १॥
त्रैलोक्यविजयं नाम शस्त्रास्त्रविनिवारणम् ।
त्वत्तः परतरो नाथ कः कृपां कर्तुमर्हति ॥ २॥

ईश्वर उवाच
श्रुणु पार्वति वक्ष्यामि सुन्दरि प्राणवल्लभे ।
त्रैलोक्यविजयं नाम शस्त्रास्त्रविनिवारकम् ॥ ३॥

पठित्वा धारयित्वेदं त्रैलोक्यविजयी भवेत् ।
जघान सकलान्दैत्यान् यधृत्वा मधुसूदनः ॥ ४॥

ब्रह्मा सृष्टिं वितनुते यधृत्वाभीष्टदायकम् ।
धनाधिपः कुबेरोऽपि वासवस्त्रिदशेश्वरः ॥ ५॥

यस्य प्रसादादीशोऽहं त्रैलोक्यविजयी विभुः ।
न देयं परशिष्येभ्योऽसाधकेभ्यः कदाचन ॥ ६॥
पुत्रेभ्यः किमथान्येभ्यो दद्याच्चेन्मृत्युमाप्नुयात् ।
ऋषिस्तु कवचस्यास्य दक्षिणामूर्तिरेव च ॥ ७॥

*जय श्री राम*

*जय श्री हरि* *मां त्रिपुर सुंदरी की साधना करने से पहले योग्य गुरु की शरण में जाएं**आज गुप्त नवरात्रि का तीसरा दिन आद्य ...
21/01/2026

*जय श्री हरि*
*मां त्रिपुर सुंदरी की साधना करने से पहले योग्य गुरु की शरण में जाएं*

*आज गुप्त नवरात्रि का तीसरा दिन आद्य महाविद्या त्रिपुर सुंदरी का होता है। देवी त्रिपुर सुंदरी अनुपम सौंदर्य, भक्तों को अभय प्रदान करने वाली, यौवनयुक्त और तीनों लोकों में विराजमान है और उन्हें कई नामों से जाना जाता है। इन्हें राज-राजेश्वरी, बाला, ललिता, मीनाक्षी, कामाक्षी, शताक्षी, कामेश्वरी कहा जाता है। अपनी सुंदरता और मोहकता से देवासुर संग्राम में असुरों को वश में कर लिया था। कहते हैं कि त्रिपुर सुंदरी की आराधना करने वाले भक्तों को लौकिक और पारलौकिक शक्तियां प्राप्त होती हैं। देवी पुराण में माता की बहुत सी शक्तियों के बारे में बात की गई है। ये सिर्फ तंत्र साधना के लिए ही नहीं बल्कि सुंदर रूप के लिए भी विख्यात जानी जाती है। आइए जानते हैं इनके स्वरूप और इसके पीछे जुड़ी पौराणिक कथा के बारे में-*

*देवी त्रिपुर सुंदरी शांत मुद्रा में लेटे हुए सदाशिव की नाभि से निर्गत कमल-आसन पर विराजमान हैं। चतुर्रभुजी भुजाओं में देवी के पाश, अंकुश, धनुष और बाण हैं। देवी के आसन को ब्रह्मा, विष्णु, शिव और यमराज अपने मस्तक पर धारण करते हैं। देवी तीन नेत्रों से युक्त और मस्तक पर अर्ध चन्द्र धारण करती हैं। देवी त्रिपुर सुंदरी अपने भक्तों की हर प्रकार की मनोकामना को पूरी करती है। उनकी हर विपत्ति को दूर करती हैं और उन्हें अभय प्रदान करती हैं। कहा जाता है कि देवी त्रिपूर सुंदरी की पूजा करने से आत्मिक बल, यश और कीर्ति की प्राप्ति होती है।*

*पौराणिक कथाओं के अनुसार देवी त्रिपुरसुंदरी के उत्पत्ति का रहस्य, सती वियोग के पश्चात भगवान शिव सर्वदा ध्यान मग्न रहते हुए हैं। उन्होंने अपने संपूर्ण कर्म का परित्याग कर दिया था जिसके कारण तीनों लोकों के संचालन में व्याधि उत्पन्न हो रही थी। उधर तारकासुर ब्रह्मा जी से वर प्राप्त किया कि उसकी मृत्यु शिव के पुत्र द्वारा ही होगी। समस्त देवताओं ने भगवान शिव को ध्यान से जगाने के लिए कामदेव और उनकी पत्नी रति देवी को कैलाश भेजा।*

*कामदेव ने कुसुम सर नमक मोहिनी वाण से भगवान शिव पर प्रहार किया, परिणामस्वरूप शिव जी का ध्यान भंग हो गया। देखते ही देखते भगवान शिव के तीसरे नेत्र से उत्पन्न क्रोध अग्नि ने कामदेव को जला कर भस्म कर दिया। कामदेव की पत्नी रति द्वारा अत्यंत दारुण विलाप करने पर भगवान शिव ने कामदेव को पुनः द्वापर युग में भगवान कृष्ण के पुत्र रूप में जन्म धारण करने का वरदान दिया और वहां से अंतर्ध्यान हो गए। सभी देवताओं और रति के जाने के पश्चात भगवान शिव के एक गण द्वारा कामदेव के भस्म से मूर्ति निर्मित की गई और उस निर्मित मूर्ति से एक पुरुष पैदा हुआ। उस पुरुष ने भगवान शिव की स्तुति करी इसके भगवान शिव द्वारा उस पुरुष का नाम भांड रखा गया। शिव के क्रोध से उत्पन्न होने के कारण भांड, तमो गुण सम्पन्न था और वह धीरे-धीरे तीनों लोकों पर भयंकर उत्पात मचाने लगा। देवराज इंद्र के राज्य के समान ही, भाण्डासुर ने स्वर्ग जैसे राज्य का निर्माण किया तथा राज करने लगा। तदनंतर, भाण्डासुर ने स्वर्ग लोक पर आक्रमण कर, देवराज इन्द्र और स्वर्ग राज्य को चारों ओर से घेर लिया। भयभीत इंद्र नारद मुनि की शरण में गए और इस समस्या के निवारण का उपाय पूछा। देवर्षि नारद ने, आद्या शक्ति की यथा विधि अपने रक्त तथा मांस से आराधना करने का परामर्श दिया। देवराज इंद्र ने देवी की आराधना की और देवी ने त्रिपुरसुंदरी स्वरूप से प्रकट हो भाण्डासुर वध कर देवराज पर कृपा की और समस्त देवताओं को भय मुक्त किया।*

*माँ षोडशी त्रिपुर सुन्दरी स्तुति*

*पंच प्रेत महाशव सिंहासन, उस पर खिले कमल दल ।*

*लाल रंग की दीप्तिमान, चतुरहस्ता त्रिलोचना ।
मस्तक पर राजे चंद्रमा, रत्न आभूषण धारिणी ।
बाला, त्रिपुरसुन्दरी, ललिता, माँ षोडशी…
हाथों से देती अभय मुद्रा, वर मुद्रा, धारण किये पुस्तक और अक्षमाला ।
पाश, अंकुश, वाण ,धनुष, धारण करनेवाली माँ ललिता ।
योग-भोग एक साथ दिलानेवाली ।
कामेश्वरी, वज्रेशवरी, भग़ मालिनी, ललिताम्बिका ।
माँ षोडशी…
बरबस आकर्षित करनेवाली, हर काम को पूरा करनेवाली ।
सदा नमन करते हैं उनका, सर्व उपास्या, तुरीया, माँ षोडशी…
।।माँ षोडशी त्रिपुर सुन्दरी स्तुति सम्पूर्णम्!

*जय श्री राम*

20/01/2026

*जय श्री हरि*


*मां भगवती दुर्गा के पवन गुप्त नवरात्रों में दूसरे दिन मां तारा की पूजा होती है*

*महाविद्या तारा*

*देवी तारा दस महाविद्याओं में दूसरी महाविद्या हैं। तारा, अर्थात तारों के समान सुन्दर एवं तेजोमयी देवी। अतः देवी तारा प्राणियों के जीवन को गति प्रदान करने वाली अतृप्त भूख को प्रदर्शित करती हैं।*

*देवी तारा ज्ञान एवं मोक्ष प्रदान करने वाली देवी हैं तथा उन्हें नील सरस्वती के रूप में भी जाना जाता है। वह खड्ग, तलवार तथा कैंची को शस्त्र के रूप में धारण करती हैं।*

*तांत्रिकों की प्रमुख देवी तारा। तारने वाली कहने के कारण माता को तारा भी कहा जाता है। सबसे पहले महर्षि वशिष्ठ ने तारा की आराधना की थी। शत्रुओं का नाश करने वाली सौन्दर्य और रूप ऐश्वर्य की देवी तारा आर्थिक उन्नति और भोग दान और मोक्ष प्रदान करने वाली हैं। भगवती तारा के तीन स्वरूप हैं तारा , एकजटा और नील सरस्वती।*

*तारापीठ में देवी सती के नेत्र गिरे थे, इसलिए इस स्थान को नयन तारा भी कहा जाता है। यह पीठ पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिला में स्थित है। इसलिए यह स्थान तारापीठ के नाम से विख्यात है। प्राचीन काल में महर्षि वशिष्ठ ने इस स्थान पर देवी तारा की उपासना करके सिद्धियां प्राप्त की थीं। इस मंदिर में वामाखेपा नामक एक साधक ने देवी तारा की साधना करके उनसे सिद्धियां हासिल की थी।*

*तारा माता के बारे में एक दूसरी कथा है कि वे राजा दक्ष की दूसरी पुत्री थीं। तारा देवी का एक दूसरा मंदिर हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से लगभग 13 किमी की दूरी पर स्थित शोघी में है। देवी तारा को समर्पित यह मंदिर, तारा पर्वत पर बना हुआ है। तिब्‍बती बौद्ध धर्म के लिए भी हिन्दू धर्म की देवी 'तारा' का काफी महत्‍व है।*

*तारा रूपी देवी की साधना करना तंत्र साधकों के लिए सर्वसिद्धिकारक माना गया है। जो भी साधक या भक्त माता की मन से प्रार्धना करता है उसकी कैसी भी मनोकामना हो वह तत्काल ही पूर्ण हो जाती है।*

*तारा माता का मंत्र :*

*नीले कांच की माला से बारह माला प्रतिदिन*

*'ऊँ ह्नीं स्त्रीं हुम फट'*

*कोई भी साधना करने से पहले योग्य गुरु की शरणागति हो*

*ॐ कारो मे शिर: पातु ब्रह्मारूपा महेश्वरी ।*

*ह्रींकार: पातु ललाटे बीजरूपा महेश्वरी ।।*

*स्त्रीन्कार: पातु वदने लज्जारूपा महेश्वरी ।*

*हुन्कार: पातु ह्रदये भवानीशक्तिरूपधृक् ।*

*फट्कार: पातु सर्वांगे सर्वसिद्धिफलप्रदा ।*

*नीला मां पातु देवेशी गंडयुग्मे भयावहा ।*

*लम्बोदरी सदा पातु कर्णयुग्मं भयावहा ।।*

*व्याघ्रचर्मावृत्तकटि: पातु देवी शिवप्रिया ।*

*पीनोन्नतस्तनी पातु पाशर्वयुग्मे महेश्वरी ।।*

*रक्त वर्तुलनेत्रा च कटिदेशे सदाऽवतु ।*

*ललज्जिहव सदा पातु नाभौ मां भुवनेश्वरी ।।*

*करालास्या सदा पातु लिंगे देवी हरप्रिया ।पिंगोग्रैकजटा पातु जन्घायां विघ्ननाशिनी ।।*

*खड्गहस्ता महादेवी जानुचक्रे महेश्वरी ।*

*नीलवर्णा सदा पातु जानुनी सर्वदा मम ।।*

*नागकुंडलधर्त्री च पातु पादयुगे तत: ।*

*नागहारधरा देवी सर्वांग पातु सर्वदा ।।*

*। तारा प्रत्य़ञ्गिरा कवचम् ।।*

*।। ॐ प्रत्य़ञ्गिरायै नमः ।।*

*ईश्वर उवाच*

*ॐ तारायाः स्तम्भिनी देवी मोहिनी क्षोभिनी तथा ।*

*हस्तिनी भ्रामिनी रौद्री संहारण्यापि तारिणी । शक्तयोहष्टौ क्रमादेता शत्रुपक्षे नियोजितः धारिता साधकेन्द्रेण सर्वशत्रु निवारिणी*

*ॐ स्तम्भिनी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् स्तम्भय स्तम्भय ।*

*ॐ क्षोभिनी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् क्षोभय क्षोभय ।*

*ॐ मोहिनी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् मोहय मोहय ।*
*ॐ जृम्भिनी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् जृम्भय जृम्भय ।*

*ॐ भ्रामिनी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् भ्रामय भ्रामय ।*

*ॐ रौद्री स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् सन्तापय सन्तापय ।*

*ॐ संहारिणी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् संहारय संहारय ।*

*ॐ तारिणी स्त्रें स्त्रें सर्व्वपद्भ्यः सर्व्वभूतेभ्यः सर्व्वत्र रक्ष रक्ष मां स्वाहा ।।*

*य इमां धारयेत् विध्यां त्रिसन्ध्यं वापि यः पठेत् ।*

*स दुःखं दूरतस्त्यक्त्वा ह्यन्याच्छत्रुन् न संशयः ।
रणे राजकुले दुर्गे महाभये विपत्तिषु ।
विध्या प्रत्य़ञ्गिरा ह्येषा सर्व्वतो रक्षयेन्नरं ।।
अनया विध्या रक्षां कृत्वा यस्तु पठेत् सुधी ।
मन्त्राक्षरमपि ध्यायन् चिन्तयेत् नीलसरस्वतीं ।
अचिरे नैव तस्यासन् करस्था सर्व्वसिद्ध्यः
ॐ ह्रीं उग्रतारायै नीलसरस्वत्यै नमः ।।
इमं स्तवं धीयानो नित्यं धारयेन्नरः ।
सर्व्वतः सुखमाप्नोति सर्व्वत्रजयमाप्नुयात् ।
नक्कापि भयमाप्नोति सर्व्वत्रसुखमाप्नुयात्

जय श्री राम

19/01/2026

*जय श्री हरि*

नोट *मां काली की कोई भी पूजा मंत्र जाप करने से पहले योग्य गुरु से परामर्श अवश्य लें केवल पढ़ कर साधना मत करें*

*आप सभी को मां के पावन गुप्त नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाएं*

*10 महाविद्याओं में प्रथम देवी काली*

*दस महाविद्या में से प्रथम देवी हैं तथा यह देवी दुर्गा का सर्वाधिक उग्र स्वरूप हैं। माँ काली को काल एवं परिवर्तन की देवी माना जाता है। सृष्टि-निर्माण के पूर्व से ही उनका काल अथवा समय पर आधिपत्य रहा है। देवी काली को भगवान शिव की अर्धांगिनी के रूप में दर्शाया गया है। वह श्मशान में निवास करती हैं तथा शस्त्र के रूप में खड्ग एवं त्रिशूल धारण करती हैं।*

*देवी माहात्म्य के अनुसार, रक्तबीज नामक दैत्य का संहार करने हेतु देवी दुर्गा ने काली रूप धारण किया था। रक्तबीज को यह वरदान प्राप्त था कि, भूमि पर जिस ओर भी उसकी रक्त की बूँदे गिरेंगी, उसी ओर उसका एक अन्य रूप जीवित हो उठेगा। भीषण युद्ध में समस्त प्रयत्नों के पश्चात् जब रक्तबीज को परास्त करना असम्भव प्रतीत होने लगा, तब देवी दुर्गा ने काली स्वरूप धारण किया तथा भूमि पर स्पर्श होने से पूर्व ही रक्तबीज के रक्त का पान करने लगीं। फलस्वरूप रक्तबीज का अन्त हो गया। हिन्दु पञ्चाङ्ग के अनुसार, काली जयन्ती श्रावण माह (पूर्णिमान्त भाद्रपद माह) की कृष्ण अष्टमी के दिन मनायी जाती है।*

*काली स्वरूप वर्णन देवी काली को युद्धभूमि में खड़े, अपना एक पग चित अवस्था में लेटे भगवान शिव के वक्षस्थल पर रखे हुये दर्शाया जाता है। भगवान शिव के वक्षस्थल पर पग रखने के कारण देवी की जिह्वा को अचम्भित मुद्रा में बाहर की ओर निकला दर्शाया जाता है। वह श्याम वर्ण की हैं तथा उनके मुखमण्डल पर उग्र एवं क्रूर भाव हैं। उन्हें चतुर्भुज रूप में दर्शाया जाता है।*

*देवी अपने ऊपर के एक हाथ में रक्तरञ्जित खड्ग (कृपाण) लिये हुये हैं तथा उनके दूसरे हाथ में एक दैत्य का नरमुण्ड है। अन्य एक हाथ में खप्पर (लोहे का पात्र) है, जिसमें राक्षस के मुण्ड से टपकता रक्त एकत्रित होता है। अन्तिम हाथ वरद मुद्रा में रहता है। उन्हें नग्नावस्था में गले में नरमुण्ड माल (कटे हुये नरमुण्डों का हार) धारण किये हुये चित्रित किया जाता है। वह कमर में कटी हुयी नर-भुजाओं की करधनी धारण करती हैं।*

*देवी काली के विभिन्न स्वरूपों में उन्हें, ऊपरी एक हाथ को वरद मुद्रा तथा निचले एक हाथ में त्रिशूल धारण किये हुये चित्रित किया गया है।*

*काली साधना*

*शत्रुओं पर विजय प्राप्ति हेतु काली साधना की जाती है। काली साधना शत्रुओं को परास्त तथा उन्हें दुर्बल करने में सहायता करती है। रोग, दुष्टात्माओं, अशुभ ग्रहों, अकाल मृत्यु के भय आदि से मुक्ति तथा काव्य कलाओं में निपुणता हेतु भी काली साधना की जाती है।*

*काली मन्त्र*

*ॐ क्रीं क्रीं क्रीं हूँ हूँ ह्रीं ह्रीं दक्षिणे कालिका क्रीं क्रीं क्रीं हूँ हूँ ह्रीं ह्रीं स्वाहा॥*

*जय माँ काली!*

*नमो शैलपुत्री शिवा शम्भुरानी।|*
*उमा अम्बिका विश्व की है भवानी।*

*तू ही सृष्टिकरणी सब कष्टहरणी।*
*तू ही मौनधरणी महादेव वरणी।*

*नमो क्रोधिनी कालिका वेगधारी।*
*सुनो कान दे माँ विनती हमारी।*

*नमो मात गिरिजा करो आस पूरी।*
*नमो अम्बा माता करो दुःख दूरी।*

*करो दूर मेरे जित्ते पाप भारे।*
*परायो अनिदिन दुआरे तिहारे।*

*बिना कौन तेरे हित है हमारी।*
*कहो कौन के द्वार पे मैं पुकारूँ।*

*बजे शंख वीणा नफारी नगाड़े।*
*रहे भीड़ तेरे सदा ही द्वारे।*

*रहूँ मैं महादीन होके तेरी।*
*न दूजा भरोसा सुनो मात मेरी।*

*खड़े हाथ जोड़े सेवक दुखारी।*
*करे आरती स्वच्छ पूजा तुम्हारी*

*जय श्री राम*

16/01/2026

*जय श्री हरि*

*आप सभी भक्तजनों को जय श्री राम*

*आपको जानकर प्रसन्नता होगी की महादेव शिव मंदिर प्रेम नगर फर्स्ट नांगलोई दिल्ली में में हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी आने वाली 19 जनवरी 2026 दिन सोमवार से 10 महाविद्या का अनुष्ठान किया जा रहा है जिसमें प्रतिदिन माता की पूजा होगी कीर्तन होगा और शाम को हवन होगा यह अनुष्ठान विशेष मनोकामना पूर्ति के लिए किया जाता व श्री विद्या ( लक्ष्मी जी )का विशेष रूप से मंत्र जाप किया जाएगा और श्री यंत्र सिद्ध किए जाएंगे*

*आप सभी इस दिव्य अनुष्ठान में सादर आमंत्रित हैं जिसे भी श्रीयंत्र की आवश्यकता है वह पहले बताएं ताकि विधिवत पूजा में नाम और गोत्र से श्री यंत्र को सिद्ध किया जा सके*

*श्री विद्या के अनुष्ठान से काम में बरकत आती है. नौकरी से बाधा हटती है व लक्ष्मी की प्राप्ति होकर घर में प्यार प्रेम बना रहता है*

*इस दिव्य अनुष्ठान में अपना सहयोग जरुर दें धन्यवाद*

संपर्क करें

*पंडित सतबीर वत्स*
*9812817128*
*9812817138*

14/01/2026

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*जय श्री हरि !*

*पौष पुत्रदा एकादशी के उपरांत, माघ माह के कृष्ण पक्ष मे आने वाली इस एकादशी को षटतिला एकादशी कहा जाता है।*
*1. तिल स्नान*
*2. तिल का उबटन*
*3. तिल का हवन*
*4. तिल का तर्पण*
*5. तिल का भोजन और*
*6. तिलों का ‍दान, तिल के ये 6 प्रयोग इस व्रत मैं अवश्य करें। इनके प्रयोग के कारण यह षटतिला एकादशी कहलाती है। इस व्रत के करने से अनेक प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं।*

*षटतिला एकादशी का महत्त्व:*
*एक समय दालभ्य ऋषि ने पुलस्त्य ऋषि से पूछा कि हे महाराज, पृथ्वी लोक में मनुष्य ब्रह्महत्यादि महान पाप करते हैं, पराए धन की चोरी तथा दूसरे की उन्नति देखकर ईर्ष्या करते हैं। साथ ही अनेक प्रकार के व्यसनों में फँसे रहते हैं, फिर भी उनको नर्क प्राप्त नहीं होता, इसका क्या कारण है?*

*वे न जाने कौन-सा दान-पुण्य करते हैं जिससे उनके पाप नष्ट हो जाते हैं। यह सब कृपापूर्वक आप कहिए। पुलस्त्य मुनि कहने लगे कि हे महाभाग! आपने मुझसे अत्यंत गंभीर प्रश्न पूछा है। इससे संसार के जीवों का अत्यंत भला होगा। इस भेद को इंद्र आदि भी नहीं जानते परंतु मैं आपको यह गुप्त तत्व अवश्य बताऊँगा।*

*उन्होंने कहा कि माघ मास लगते ही मनुष्य को स्नान आदि करके शुद्ध रहना चाहिए। इंद्रियों को वश में कर काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या तथा द्वेष आदि का त्याग कर भगवान का स्मरण करना चाहिए। पुष्य नक्षत्र में गोबर, कपास, तिल मिलाकर उनके कंडे बनाना चाहिए। उन कंडों से 108 बार हवन करना चाहिए।*

*उस दिन मूल नक्षत्र हो और एकादशी तिथि हो तो अच्छे पुण्य देने वाले नियमों को ग्रहण करें। स्नानादि नित्य क्रिया से निवृत्त होकर सब देवताओं के देव श्री भगवान का पूजन करें और एकादशी व्रत धारण करें। रात्रि को जागरण करना चाहिए।*

*उसके दूसरे दिन धूप-दीप, नैवेद्य आदि से भगवान का पूजन करके खिचड़ी का भोग लगाएँ। तत्पश्चात पेठा, नारियल, सीताफल या सुपारी का अर्घ्य देकर स्तुति करनी चाहिए:*

*हे भगवान! आप दीनों को शरण देने वाले हैं, इस संसार सागर में फँसे हुओं का उद्धार करने वाले हैं। हे पुंडरीकाक्ष! हे विश्वभावन! हे सुब्रह्मण्य! हे पूर्वज! हे जगत्पते! आप लक्ष्मीजी सहित इस तुच्छ अर्घ्य को ग्रहण करें।*

*इसके पश्चात जल से भरा कुंभ (घड़ा) ब्राह्मण को दान करें तथा ब्राह्मण को श्यामा गौ और तिल पात्र देना भी उत्तम है। तिल स्नान और भोजन दोनों ही श्रेष्ठ हैं। इस प्रकार जो मनुष्य जितने तिलों का दान करता है, उतने ही हजार वर्ष स्वर्ग में वास करता है। इतना कहकर पुलस्त्य ऋषि कहने लगे कि अब मैं तुमसे इस एकादशी की कथा कहता हूँ।*

*षटतिला एकादशी व्रत कथा!*
*एक समय नारदजी ने भगवान श्रीविष्णु से यही प्रश्न किया था और भगवान ने जो षटतिला एकादशी का माहात्म्य नारदजी से कहा: सो मैं तुमसे कहता हूँ। भगवान ने नारदजी से कहा कि हे नारद! मैं तुमसे सत्य घटना कहता हूँ। ध्यानपूर्वक सुनो।*

*प्राचीनकाल में मृत्युलोक में एक ब्राह्मणी रहती थी। वह सदैव व्रत किया करती थी। एक समय वह एक मास तक व्रत करती रही। इससे उसका शरीर अत्यंत दुर्बल हो गया। यद्यपि वह अत्यंत बुद्धिमान थी तथापि उसने कभी देवताअओं या ब्राह्मणों के निमित्त अन्न या धन का दान नहीं किया था। इससे मैंने सोचा कि ब्राह्मणी ने व्रत आदि से अपना शरीर शुद्ध कर लिया है, अब इसे विष्णुलोक तो मिल ही जाएगा परंतु इसने कभी अन्न का दान नहीं किया, इससे इसकी तृप्ति होना कठिन है।*

*भगवान ने आगे कहा: ऐसा सोचकर मैं भिखारी के वेश में मृत्युलोक में उस ब्राह्मणी के पास गया और उससे भिक्षा माँगी।*
*वह ब्राह्मणी बोली: महाराज किसलिए आए हो? मैंने कहा: मुझे भिक्षा चाहिए।*

*इस पर उसने एक मिट्टी का ढेला मेरे भिक्षापात्र में डाल दिया। मैं उसे लेकर स्वर्ग में लौट आया। कुछ समय बाद ब्राह्मणी भी शरीर त्याग कर स्वर्ग में आ गई। उस ब्राह्मणी को मिट्टी का दान करने से स्वर्ग में सुंदर महल मिला, परंतु उसने अपने घर को अन्नादि सब सामग्रियों से शून्य पाया।*

*घबराकर वह मेरे पास आई और कहने लगी कि भगवन् मैंने अनेक व्रत आदि से आपकी पूजा की परंतु फिर भी मेरा घर अन्नादि सब वस्तुओं से शून्य है। इसका क्या कारण है?*

*इस पर मैंने कहा: पहले तुम अपने घर जाओ। देवस्त्रियाँ आएँगी तुम्हें देखने के लिए। पहले उनसे षटतिला एकादशी का पुण्य और विधि सुन लो, तब द्वार खोलना। मेरे ऐसे वचन सुनकर वह अपने घर गई। जब देवस्त्रियाँ आईं और द्वार खोलने को कहा तो ब्राह्मणी बोली: आप मुझे देखने आई हैं तो षटतिला एकादशी का माहात्म्य मुझसे कहो।*

*उनमें से एक देवस्त्री कहने लगी कि मैं कहती हूँ। जब ब्राह्मणी ने षटतिला एकादशी का माहात्म्य सुना तब द्वार खोल दिया। देवांगनाओं ने उसको देखा कि न तो वह गांधर्वी है और न आसुरी है वरन पहले जैसी मानुषी है। उस ब्राह्मणी ने उनके कथनानुसार षटतिला एकादशी का व्रत किया। इसके प्रभाव से वह सुंदर और रूपवती हो गई तथा उसका घर अन्नादि समस्त सामग्रियों से युक्त हो गया।*

*अत: मनुष्यों को मूर्खता त्यागकर षटतिला एकादशी का व्रत और लोभ न करके तिलादि का दान करना चाहिए। इससे दुर्भाग्य, दरिद्रता तथा अनेक प्रकार के कष्ट दूर होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है।*

*जय श्री राम*

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13/01/2026

*जय श्री हरि*

*आप सभी को लोहड़ी की महापर्व की हार्दिक शुभकामनाएं*

*लोहड़ी का संबंध सुंदरी नामक एक कन्या तथा दुल्ला भट्टी नामक एक योद्धा से जोड़ा जाता है। इस संबंध में प्रचलित ऐतिहासिक कथा के अनुसार, गंजीबार क्षेत्र में एक ब्राह्मण रहता था जिसकी सुंदरी नामक एक कन्या थी जो अपने नाम की भांति बहुत सुंदर थी। वह इतनी रूपवान थी कि उसके रूप, यौवन व सौंदर्य की चर्चा गली-गली में होने लगी थी। धीरे-धीरे उसकी सुंदरता के चर्चे उड़ते-उड़ते गंजीबार के नवाब जो एक मुस्लिम था तक पहुंचे। राजा उसकी सुंदरता का बखान सुनकर सुंदरी पर मोहित हो गया और उसने सुंदरी को अपने हरम की शोभा बनाने का निश्चय किया।*

*गंजीबार के नवाब ने सुंदरी के पिता को संदेश भेजा कि वह अपनी बेटी को उसके हरम में भेज दे, इसके बदले में उसे धन-दौलत से लाद दिया जाएगा। उसने उस ब्राह्मण को अपनी बेटी को उसके हरम में भेजने के लिए अनेक तरह के प्रलोभन दिए।*

*नवाब का संदेश मिलने पर बेचारा ब्राह्मण घबरा गया। वह अपनी लाडली बेटी को उसके हरम में नहीं भेजना चाहता था। जब उसे कुछ नहीं सूझा तो उसे जंगल में रहने वाले राजपूत योद्धा दुल्ला-भट्टी का ख्याल आया, जो एक कुख्यात डाकू बन चुका था लेकिन गरीबों व शोषितों की मदद करने के कारण लोगों के दिलों में उसके प्रति अपार श्रद्धा थी।*

*ब्राह्मण उसी रात दुल्ला भट्टी के पास पहुंचा और उसे विस्तार से सारी बात बताई। दुल्ला भट्टी ने ब्राह्मण की व्यथा सुन उसे सांत्वना दी और रात को खुद एक सुयोग्य ब्राह्मण लड़के की खोज में निकल पड़ा। दुल्ला भट्टी ने उसी रात एक योग्य ब्राह्मण लड़के को तलाश कर सुंदरी को अपनी ही बेटी मानकर अग्रि को साक्षी मानते हुए उसका कन्यादान अपने हाथों से किया और ब्राह्मण युवक के साथ सुंदरी का रात में ही विवाह कर दिया। उस समय दुल्ला-भट्टी के पास बेटी सुंदरी को देने के लिए कुछ भी न था। अत: उसने तिल व शक्कर देकर ही ब्राह्मण युवक के हाथ में सुंदरी का हाथ थमाकर सुंदरी को उसकी ससुराल विदा किया।*

*गंजीबार के नवाब को इस बात की सूचना मिली तो वह आग-बबूला हो उठा। उसने उसी समय अपनी सेना को गंजीबार इलाके पर हमला करने तथा दुल्ला भट्टी का खात्मा करने का आदेश दिया। राजा का आदेश मिलते ही सेना दुल्ला भट्टी के ठिकाने की ओर बढ़ी लेकिन दुल्ला-भट्टी और उसके साथियों ने अपनी पूरी ताकत लगा कर राजा की सेना को बुरी तरह धूल चटा दी।*

*दुल्ला भट्टी के हाथों शाही सेना की करारी शिकस्त होने की खुशी में गंजीबार में लोगों ने अलाव जलाए और दुल्ला-भट्टी की प्रशंसा में गीत गाकर भंगड़ा डाला। कहा जाता है कि तभी से लोहड़ी के अवसर पर गाए जाने वाले गीतों में सुंदरी और दुल्ला भट्टी को विशेष तौर पर याद किया जाने लगा।*

*तब से लेकर जीवन पर्यंत दूल्हे भट्टी ने तमाम हिंदू लड़कियों की मुगल शासको से रक्षा की*

*सुंदर मुंदरिए हो*
*तेरा कौण विचारा हो*
*दुल्ला भट्टी वाला हो*
*दुल्ले धी ब्याही हो*
*सेर शक्कर पाई हो*
*कुड़ी दे मामे आए हो*
*मामे चूरी कुट्टी हो*
*जमींदारा लुट्टी हो*
*कुड़ी दा लाल दुपट्टा हो*
*दुल्ले धी ब्याही हो*
*दुल्ला भट्टी वाला हो*
*दुल्ला भट्टी वाला हो*

*लोहड़ी के मौके पर यह*
*गीत आज भी जब* *वातावरण में गूंजता है तो दुल्ला भट्टी के प्रति लोगों की अपार श्रद्धा का आभास स्वत: ही हो जाता है।*

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