Shree Mahadev Shiv Mandir Prem Nagar

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09/08/2026

॥ जय श्री हरि ॥
कामिका एकादशी का महत्त्व:
अर्जुन ने कहा: हे प्रभु! मैंने आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी का सविस्तार वर्णन सुना। अब आप मुझे श्रावण माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी की कथा सुनाने की कृपा करें। इस एकादशी का नाम क्या है? इसकी विधि क्या है? इसमें किस देवता का पूजन होता है? इसका उपवास करने से मनुष्य को किस फल की प्राप्ति होती है?
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा: हे श्रेष्ठ धनुर्धर! मैं श्रावण माह की पवित्र एकादशी की कथा सुनाता हूँ, ध्यानपूर्वक श्रवण करो। एक बार इस एकादशी की पावन कथा को भीष्म पितामह ने लोकहित के लिये नारदजी से कहा था।

एक समय नारदजी ने कहा: हे पितामह! आज मेरी श्रावण के कृष्ण पक्ष की एकादशी की कथा सुनने की इच्छा है, अतः आप इस एकादशी की व्रत कथा विधान सहित सुनाइये।

नारदजी की इच्छा को सुन पितामह भीष्म ने कहा: हे नारदजी! आपने बहुत ही सुन्दर प्रस्ताव किया है। अब आप बहुत ध्यानपूर्वक इसे श्रवण कीजिए- श्रावण माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम कामिका एकादशी है। इस एकादशी की कथा सुनने मात्र से ही वाजपेय यज्ञ के फल की प्राप्ति होती है। कामिका एकादशी के उपवास में शंख, चक्र, गदाधारी भगवान विष्णु का पूजन होता है। जो मनुष्य इस एकादशी को धूप, दीप, नैवेद्य आदि से भगवान विष्णु की पूजा करते हैं, उन्हें गंगा स्नान के फल से भी उत्तम फल की प्राप्ति होती है।

सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण में केदार और कुरुक्षेत्र में स्नान करने से जिस पुण्य की प्राप्ति होती है, वह पुण्य कामिका एकादशी के दिन भगवान विष्णु की भक्तिपूर्वक पूजा करने से प्राप्त हो जाता है।

भगवान विष्णु की श्रावण माह में भक्तिपूर्वक पूजा करने का फल समुद्र और वन सहित पृथ्वी दान करने के फल से भी ज्यादा होता है।

व्यतिपात में गंडकी नदी में स्नान करने से जो फल प्राप्त होता है, वह फल भगवान की पूजा करने से मिल जाता है।

संसार में भगवान की पूजा का फल सबसे ज्यादा है, अतः भक्तिपूर्वक भगवान की पूजा न बन सके तो श्रावण माह के कृष्ण पक्ष की कामिका एकादशी का उपवास करना चाहिये।

आभूषणों से युक्त बछड़ा सहित गौदान करने से जो फल प्राप्त होता है, वह फल कामिका एकादशी के उपवास से मिल जाता है।

जो उत्तम द्विज श्रावण माह के कृष्ण पक्ष की कामिका एकादशी का उपवास करते हैं तथा भगवान विष्णु का पूजन करते हैं, उनसे सभी देव, नाग, किन्नर, पितृ आदि की पूजा हो जाती है, इसलिये पाप से डरने वाले व्यक्तियों को विधि-विधान सहित इस उपवास को करना चाहिये।

संसार सागर तथा पापों में फँसे हुए मनुष्यों को इनसे मुक्ति के लिये कामिका एकादशी का व्रत करना चाहिये।

कामिका एकादशी के उपवास से भी पाप नष्ट हो जाते हैं, संसार में इससे अधिक पापों को नष्ट करने वाला कोई और उपाय नहीं है।

हे नारदजी! स्वयं भगवान ने अपने मुख से कहा है कि मनुष्यों को अध्यात्म विद्या से जो फल प्राप्त होता है, उससे अधिक फल कामिका एकादशी का व्रत करने से मिल जाता है। इस उपवास के करने से मनुष्य को न यमराज के दर्शन होते हैं और न ही नरक के कष्ट भोगने पड़ते हैं। वह स्वर्ग का अधिकारी बन जाता है।

जो मनुष्य इस दिन तुलसीदल से भक्तिपूर्वक भगवान विष्णु का पूजन करते हैं, वे इस संसार सागर में रहते हुए भी इस प्रकार अलग रहते हैं, जिस प्रकार कमल पुष्प जल में रहता हुआ भी जल से अलग रहता है।

तुलसीदल से भगवान श्रीहरि का पूजन करने का फल एक बार स्वर्ण और चार बार चाँदी के दान के फल के बराबर है। भगवान विष्णु रत्न, मोती, मणि आदि आभूषणों की अपेक्षा तुलसीदल से अधिक प्रसन्न होते हैं।

जो मनुष्य प्रभु का तुलसीदल से पूजन करते हैं, उनके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। हे नारदजी! मैं भगवान की अति प्रिय श्री तुलसीजी को प्रणाम करता हूँ।

तुलसीजी के दर्शन मात्र से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और शरीर के स्पर्श मात्र से मनुष्य पवित्र हो जाता है। तुलसीजी को जल से स्नान कराने से मनुष्य की सभी यम यातनाएं नष्ट हो जाती हैं। जो मनुष्य तुलसीजी को भक्तिपूर्वक भगवान के श्रीचरण कमलों में अर्पित करता है, उसे मुक्ति मिलती है।

इस कामिका एकादशी की रात्रि को जो मनुष्य जागरण करते हैं और दीप-दान करते हैं, उनके पुण्यों को लिखने में चित्रगुप्त भी असमर्थ हैं। एकादशी के दिन जो मनुष्य भगवान के सामने दीपक जलाते हैं, उनके पितर स्वर्गलोक में अमृत का पान करते हैं।

भगवान के सामने जो मनुष्य घी या तिल के तेल का दीपक जलाते हैं, उनको सूर्य लोक में भी सहस्रों दीपकों का प्रकाश मिलता है।

कामिका एकादशी व्रत कथा!
एक गाँव में एक वीर क्षत्रिय रहता था। एक दिन किसी कारण वश उसकी ब्राह्मण से हाथापाई हो गई और ब्राह्मण की मृत्य हो गई। अपने हाथों मरे गये ब्राह्मण की क्रिया उस क्षत्रिय ने करनी चाही। परन्तु पंडितों ने उसे क्रिया में शामिल होने से मना कर दिया। ब्राह्मणों ने बताया कि तुम पर ब्रह्म-हत्या का दोष है। पहले प्रायश्चित कर इस पाप से मुक्त हो तब हम तुम्हारे घर भोजन करेंगे।

इस पर क्षत्रिय ने पूछा कि इस पाप से मुक्त होने के क्या उपाय है। तब ब्राह्मणों ने बताया कि श्रावण माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को भक्तिभाव से भगवान श्रीधर का व्रत एवं पूजन कर ब्राह्मणों को भोजन कराके सदश्रिणा के साथ आशीर्वाद प्राप्त करने से इस पाप से मुक्ति मिलेगी। पंडितों के बताये हुए तरीके पर व्रत कराने वाली रात में भगवान श्रीधर ने क्षत्रिय को दर्शन देकर कहा कि तुम्हें ब्रह्म-हत्या के पाप से मुक्ति मिल गई है।

इस व्रत के करने से ब्रह्म-हत्या आदि के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और इहलोक में सुख भोगकर प्राणी अन्त में विष्णुलोक को जाते हैं। इस कामिका एकादशी के माहात्म्य के श्रवण व पठन से मनुष्य स्वर्गलोक को प्राप्त करते हैं। ॥ जय श्री हरि ॥

*सभी देश वासियों को जय राम जी की*   *आप सभी को राम मन्दिर के शिलान्यास की प्रथम वर्षगांठ की हार्दिक शुभकामनाएं**पुरे विश...
05/08/2026

*सभी देश वासियों को जय राम जी की*

*आप सभी को राम मन्दिर के शिलान्यास की प्रथम वर्षगांठ की हार्दिक शुभकामनाएं*

*पुरे विश्व में *राम*जी को सबसे ज्यादा हरियाणा वासियों ने आत्मसात किया है*

सबसे पहले तो हरियाणवी अभिवादन में *राम-राम* बोलते हैं अपितु सारी दुनिया में जहाँ भगवान, ईश्वर इत्यादि शब्द प्रयोग होते हैं वहाँ हरियाणा में राम शब्द का प्रयोग किया जाता है ।

जैसे दुनिया कहेगी - भगवान देख रहा है, ईश्वर न्याय करेगा, धर्मराज के द्वार जाना है इत्यादि।

लेकिन हरियाणा मे कहेंगे ―

राम जी देखै है,
राम जी न्याय करेगा,
राम जी के घर जाना है,
राम से डर।

हरियाणा की कहावतें भी केवल राम से संबंधित है जैसे ―

*हिम्मती का राम हिमायती,*
*आंधे की मक्खी राम उड़ावै,*
*राम को राम नहीं कहता,*
*अपने को राम से बड़ा समझना।*

हरियाणा में आकाश को भी राम कहते है और आराम को भी राम कहते है।

जैसे दुनिया कहेगी आराम से चल, आराम कर ले।

लेकिन हरियाणा में कहेंगे कि ―

राम से चल, राम कर ले।

जब कही जाना हो तो गाड़ी मे बैठने के बाद दुनिया वाले कहते हैं कि "चलो"

लेकिन हरियाणा मे कहते है कि ―

"चालन दे भाई ले कै राम का नाम"

हरियाणा में बारिश को भी राम कहते है। जब बरसात होती है तो दुनिया वाले कहते हैं कि बूंदे आई थी, बहुत बारिश हुई, हो रही है इत्यादि ।

लेकिन हरियाणा में कहते हैं कि राम आया था, बहोत राम बरसा भाई।

जब कोई किसी का हाल चाल पूछता है तो बाकी दुनिया मे कहते है कि सब बढिय़ा है इत्यादि

लेकिन हरियाणा मे कहते हैं कि ―

"राम राजी सै" या "दया है राम की

हरियाणा मे गाँव को गाम कहते हैं और हरियाणवी कहावत है कि ―

"गाम राम होता है"

*किसी भण्डारे में खाना परोसने वालों की शब्द शैली देखिए

*नमक को हम राम रस कहते हैं।*
*जल राम*
*मिर्च को लंका राम*

*और तो और एक जाती विशेष को भी जाट राम कहते हैं।*

*हरियाणा वाले राम से प्यार करते हैं*
*राम का व्यापार नहीं करते हैं*

हरियाणा के कण-कण और शब्द-शब्द मे राम बसता है और

मुझे गर्व है स्वयं के हरियाणवी होने का |

सभी हरियाणा वासियों को मेरी
🙏🏻🙏🏻राम-राम🙏🏻🙏

30/07/2026

हर हर महादेव

30/07/2026

महादेव रुद्राभिषेक लाइव दर्शन श्री महादेव शिव मंदिर प्रेम नगर फर्स्ट दिल्ली

🔱🌺 ॥ हर-हर महादेव ॥ 🌺🔱रुद्राक्ष प्रतिष्ठा महायज्ञ एवं 108 रुद्राभिषेकश्री महादेव शिव मंदिर🙏 समस्त श्रद्धालु भक्तजनों को ...
30/07/2026

🔱🌺 ॥ हर-हर महादेव ॥ 🌺🔱
रुद्राक्ष प्रतिष्ठा महायज्ञ एवं 108 रुद्राभिषेक
श्री महादेव शिव मंदिर
🙏 समस्त श्रद्धालु भक्तजनों को सादर आमंत्रण 🙏
सावन के पावन अवसर पर भगवान भोलेनाथ की असीम कृपा प्राप्त करने का दुर्लभ अवसर।
प्रतिदिन भगवान श्री महादेव का 108 रुद्राभिषेक किया जाएगा तथा भगवान शिव को दो मुखी, पाँच मुखी एवं सात मुखी रुद्राक्ष अर्पित किए जाएंगे।
📿 रुद्राक्ष का महत्व 🔸 दो मुखी रुद्राक्ष – दांपत्य सुख एवं पारिवारिक सौहार्द के लिए।
🔸 पाँच मुखी रुद्राक्ष – उत्तम स्वास्थ्य, शांति एवं आध्यात्मिक उन्नति के लिए।
🔸 सात मुखी रुद्राक्ष – धन, लक्ष्मी कृपा, व्यापार एवं व्यवसाय में उन्नति के लिए।
🌺 पूजन के उपरांत प्रतिष्ठित रुद्राक्ष श्रद्धालु भक्तों को प्रसाद स्वरूप वितरित किए जाएंगे।
📿 रुद्राक्ष प्राप्त करने हेतु अपना नाम एवं गोत्र अवश्य दर्ज कराएं।
आप अपनी श्रद्धा एवं सामर्थ्य के अनुसार दूध, दही, घी, शहद, फल, पुष्प, बेलपत्र, प्रसाद एवं दक्षिणा अर्पित कर इस पुण्य महायज्ञ में सहभागी बन सकते हैं।
🕉️ प्रतिदिन कार्यक्रम 🕙 प्रातः 10:00 बजे – 108 रुद्राभिषेक
🪔 प्रातः 11:00 बजे – भगवान शिव की महाआरती
🎶 अपराह्न 3:30 बजे से सायं 6:00 बजे तक – भजन-कीर्तन
🪔 सायं 6:00 बजे – संध्या आरती
📍 स्थान:
श्री महादेव शिव मंदिर
हरसुख ब्लॉक, स्टेशन रोड, प्रेम नगर फर्स्ट, किराड़ी, नांगलोई, दिल्ली – 110086
📞 संपर्क:
पं. सतबीर वत्स
📱 9812817128
📱 9812817138
आइए, परिवार सहित पधारें, jभगवान भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त करें तथा पावन रुद्राक्ष प्रसाद ग्रहण करें।
🙏 महादेव सबका कल्याण करें।
🔱 हर-हर महादेव! 🔱

🕉️ ।। जय महादेव ।।https://youtube.com/?si=LD1P6S6eRqktOY9xमेरे यूट्यूब चैनल को सब्स्क्राइब करें ताकि आपको पूजा की वीडियो...
29/07/2026

🕉️ ।। जय महादेव ।।
https://youtube.com/?si=LD1P6S6eRqktOY9x

मेरे यूट्यूब चैनल को सब्स्क्राइब करें ताकि आपको पूजा की वीडियो प्रतिदिन प्राप्त होती रहे

समस्त श्रद्धालु भक्तजनों को सादर आमंत्रण
आप सभी को यह जानकर अत्यंत हर्ष होगा कि पिछले वर्ष की भाँति इस वर्ष भी भगवान महादेव शिव मंदिर में पावन श्री रुद्राक्ष प्रतिष्ठा महाअनुष्ठान का शुभारंभ श्रावण मास के प्रथम दिवस से होने जा रहा है। यह दिव्य अनुष्ठान पूरे एक माह तक चलेगा।
इस महाअनुष्ठान के अंतर्गत प्रतिदिन—
🔱 भगवान शिव का 108 रुद्राभिषेक किया जाएगा।
🔱 भगवान भोलेनाथ को 111 रुद्राक्ष श्रद्धापूर्वक अर्पित किए जाएंगे।
🔱 संपूर्ण अनुष्ठान पूर्ण होने के पश्चात प्रतिष्ठित एवं अभिमंत्रित रुद्राक्ष सभी श्रद्धालु भक्तों में वितरित किए जाएंगे।
आप सभी श्रद्धालुओं से विनम्र निवेदन है कि इस पुण्य अवसर पर प्रतिदिन रुद्राभिषेक एवं पूजा-अर्चना में सम्मिलित होकर भगवान शिव की कृपा प्राप्त करें तथा अपने जीवन को धन्य बनाएं।
🪔 प्रतिदिन सायं 3:00 बजे भव्य शिव कीर्तन का आयोजन भी होगा। आप सभी सपरिवार सादर आमंत्रित हैं।
विशेष सूचना:
जो श्रद्धालु अपने नाम एवं गोत्र से रुद्राक्ष प्रतिष्ठित करवाना चाहते हैं, वे कृपया पहले अपना नाम एवं गोत्र अवश्य दर्ज करा दें, ताकि उसी संकल्प से रुद्राक्ष की प्रतिष्ठा की जा सके।
हर हर महादेव!
जय महाकाल! 🔱

जय श्री हरि  आप सभी को गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएंबंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।महामोह तम पुंज जासु बचन...
28/07/2026

जय श्री हरि

आप सभी को गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं

बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।
महामोह तम पुंज जासु बचन रवि कर निकर॥
भावार्थ: गुरु कृपा के सागर और मनुष्य रूप में स्वयं भगवान हैं। उनके वचन अज्ञान रूपी अंधकार का नाश करने वाले सूर्य की किरणों के समान हैं।
2.
श्रीगुरु पद नख मणि गन जोती।
सुमिरत दिव्य दृष्टि हियँ होती॥
भावार्थ: गुरु के चरण-नखों की ज्योति का स्मरण करने से हृदय में दिव्य ज्ञान का प्रकाश होता है।
3.
गुर पद रज मृदु मंजुल अंजन।
नयन अमिय दृग दोष विभंजन॥
भावार्थ: गुरुचरणों की धूल अमृतमय अंजन है, जो अज्ञान रूपी नेत्र-दोष को दूर कर देती है।
4.
बंदउँ गुरु पद पदुम परागा।
सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥
भावार्थ: मैं गुरु के चरणकमलों की धूल को प्रणाम करता हूँ, जो प्रेम और पवित्रता से परिपूर्ण है।
5.
तेहि कर बिमल बिबेक बिलोचन।
बरनउँ रामचरित भवमोचन॥
भावार्थ: गुरु की कृपा से प्राप्त विवेक-रूपी नेत्रों द्वारा मैं श्रीराम के चरित्र का वर्णन करता हूँ।
6.
गुरु बिनु होइ कि ज्ञान, ज्ञान कि होइ बिराग बिनु।
गावहिं बेद पुरान, सुख कि लहिअ हरि भगति बिनु॥
भावार्थ: गुरु के बिना ज्ञान नहीं, ज्ञान के बिना वैराग्य नहीं और भगवान की भक्ति के बिना सच्चा सुख नहीं।
7.
जे गुरु चरन रेनु सिर धरहीं।
ते जन सकल विभव बस करहीं॥
भावार्थ: जो गुरु के चरणों की धूल को सिर पर धारण करते हैं, वे सभी प्रकार की सिद्धियाँ और ऐश्वर्य प्राप्त करते हैं।
8.
गुरु के बचन प्रतीति न जेही।
सपनेहुँ सुगम न सुख सिद्धि तेही॥
भावार्थ: जिसे गुरु के वचनों पर विश्वास नहीं, उसे स्वप्न में भी सुख और सिद्धि प्राप्त नहीं होती।
9.
गुरु गृह गए पढ़न रघुराई।
अल्पकाल विद्या सब पाई॥
भावार्थ: श्रीराम गुरु के आश्रम में शिक्षा ग्रहण करने गए और थोड़े ही समय में समस्त विद्याएँ प्राप्त कर लीं।
10.
गुरु पितु मातु स्वामि हित बानी।
सुनि मन मुदित करिअ भल जानी॥
भावार्थ: गुरु, माता-पिता और स्वामी की हितकारी वाणी को प्रसन्न मन से स्वीकार करना चाहिए।

24/07/2026

जय श्री हरि

देवश्यनी एकादशी का व्रत आज रखे

देवशयनी एकादशी व्रत की कथा: हिंदू धर्म में देवशयनी एकादशी व्रत का विशेष महत्व है। इस बार देवशयनी एकादशी व्रत 25 जुलाई 2026, शनिवार को है। एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा- हे केशव! आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? इस व्रत की क्या विधि है और किस देवता के पूजन का विधान है? श्री कृष्ण कहने लगे कि हे युधिष्ठिर! जिस कथा को ब्रह्मा जी ने नारद जी को सुनाया था वहीं मैं तुमसे कहता हूं। एक बार नारद जी ने भी ब्रह्मा जी से यही प्रश्न किया था।

तब ब्रह्मा जी ने उत्तर दिया था कि हे नारद तुमने कलियुगी जीवों के उद्धार के लिए बहुत अच्छा प्रश्न किया है। क्योंकि देवशयनी एकादशी का व्रत सभी व्रतों में उत्तम है। व्रत के पु्ण्य प्रभाव से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

प्राचीन काल में मांधाता नाम के एक चक्रवर्ती राजा राज्य करते थे। वे सत्यवादी, धर्मपरायण, महान प्रतापी और प्रजा के हितों के लिए कार्य करने वाले थे। उनके राज्य में प्रजा हमेशा सुखी और धन-धान्य से परिपूर्ण रहती थी। उनके राज्य में कभी अकाल नहीं पड़ता था।
राज्य में भयंकर पड़ा अकाल:
एक बार राजा मांधाता के राज्य में लगातार तीन वर्षों तक बारिश नहीं हुई। बारिश नहीं होने के कारण पूरे राज्य में भयंकर अकाल पड़ गया। राज्य में अन्न-जल के अभाव में प्रजा बहुत परेशान रहने लगी। अन्न और जल नहीं होने के कारण राज्य में यज्ञ, हवन, पूजन और धार्मिक अनुष्ठान बंद हो गए, राज्य और प्रजा की इस स्थिति को देखकर राजा अत्यंत चिंतित हो गए। एक दिन प्रजा राजा के पास जाकर कहने लगी कि राजन पूरा प्रजा परेशान हो रही है क्योंकि सृष्टि का कल्याण वर्षा से होता है। वर्षा के अभाव में अकाल पड़ गया है और प्रजा मर रही है। इसलिए हे राजन! कोई ऐसा उपाय बताओ जिससे यह दुख दूर हो सके।

राजा मांधाता ने प्रजा की बात सुनकर विचार किया कि अगर उन्होंने कभी कोई गलत काम नहीं किया तो, फिर भी उनकी प्रजा को इतनी परेशानी या कष्ट क्यों भोगने पड़ रहे हैं। इस परेशानी का हल खोजने के लिए राजा अपनी सेना के साथ जंगल की ओर निकल पड़े।

महर्षि अंगिरा के पहुंचे आश्रम
वन में घूमते हुए राजा मांधाता ब्रह्मा जी के पुत्र महर्षि अंगिरा के आश्रम में पहुंचे। राजा ने घोड़े से उतरकर महर्षि को प्रणाम किया। महर्षि अंगिरा ने राजा से उनके वहां आने का कारण पूछा। तब राजा ने विनम्र भाव से हाथ जोड़कर कहा कि हे ऋषिवर! मैं हमेशा से ही धर्म का पालन करता आया हूं, फिर भी मेरे राज्य में तीन वर्षों से अकाल पड़ा हुआ है। प्रजा घोर कष्ट में है। राजा के पापों से ही प्रजा को कष्ट होता है, ऐसा शास्त्रों में वर्णित है। कृपया मुझे कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे मेरी प्रजा का कष्ट दूर हो सके। धर्म के अनुसार राज्य में काम करता हूं फिर भी अकाल कैसे पड़ा इसका कारण मुझे अभी तक नहीं मिल सका।

अकाल से मुक्ति का बताया उपाय-
राजा ने कहा कि मैं आपके पास इसी संदेह को दूर कराने के लिए आया हूं। कृपा मेरे इस संदेह को दूर कीजिए। राजा की बात सुनकर महर्षि अंगिरा ने कहा- "हे राजन्! आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम देवशयनी एकादशी ( हरिशयनी एकादशी) है। यह एकादशी सभी पापों से मुक्ति दिलाने वाली और सब प्रकार की सिद्धियों को प्रदान कराने वाली है। आप अपनी प्रजा और मंत्रियों सहित इस एकादशी का विधि-विधान से व्रत और पूजन करें। भगवान विष्णु की कृपा से आपके राज्य में उत्तम वर्षा होगी और अकाल दूर हो जाएगा।

राज्य में हुई मूसलाधार वर्षा-
महर्षि अंगिरा से व्रत का विधान जानने के बाद राजा मांधाता अपने राज्य वापस लौट आए। उन्होंने आषाढ़ शुक्ल एकादशी पर प्रजा और मंत्रियों के साथ पूरे भक्ति-भाव और श्रद्धा के साथ विधि-विधान से देवशयनी एकादशी का व्रत किया और भगवान विष्णु की उपासना की। राजा से भगवान विष्णु प्रसन्न हुए। एकादशी का व्रत पूर्ण होते ही राज्य में मूसलाधार बारिश हुई। बारिश के कारण हर तरफ हरियाली छा गई। अन्न और जल की परेशानी दूर हो गई। राज्य की प्रजा फिर से खुशहाल रहने लगी

जय श्री ram

25/06/2026

जय श्री हरि

आप सभी को निर्जला एकादशी की हार्दिक शुभकामनाएं

निर्जला एकादशी का व्रत ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को किया जाता है। हिन्दू धर्म में एकादशी व्रत का मात्र धार्मिक महत्त्व ही नहीं है। ये व्रत मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य के नज़रिए से भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की आराधना को समर्पित होता है। इस एकादशी का व्रत करके श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार दान करना चाहिए। इस दिन विधिपूर्वक जल कलश का दान करने वालों को पूरे साल की एकादशियों का फल मिलता है। इस प्रकार जो इस पवित्र एकादशी का व्रत करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।



एकादशी व्रत का इतिहास
एक बार बहुभोजी भीमसेन ने व्यासजीके मुख से प्रत्येक एकादशी को निराहार रहने का नियम सुनकर विनम्र भाव से निवेदन किया कि ‘महाराज! मुझसे कोई व्रत नही किया जाता। दिन भर बड़ी तीव्र क्षुधा बनी ही रहती है। अतः आप कोई ऐसा उपाय बतला दीजिये जिसके प्रभाव से स्वत: सद्गति हो जाय।‘ तब व्यासजी ने कहा कि ‘तुमसे वर्षभर की सम्पूर्ण एकादशी नहीं हो सकती तो केवल एक निर्जला कर लो, इसीसे सालभर की एकादशी करने के समान फल हो जायगा।’ तब भीम ने वैसा ही किया और स्वर्ग को गये। इसलिए यह एकादशी ' भीमसेनी एकादशी' के नाम से भी जानी जाती है।



निर्जला एकादशी का महत्व
निर्जला यानि यह व्रत बिना जल ग्रहण किए और उपवास रखकर किया जाता है। इसलिए यह व्रत कठिन तप और साधना के समान महत्त्व रखता है। हिन्दू पंचाग अनुसार वृषभ और मिथुन संक्रांति के बीच शुक्ल पक्ष की एकादशी निर्जला एकादशी कहलाती है। इस व्रत को भीमसेन एकादशी या पांडव एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक मान्यता है कि पाँच पाण्डवों में एक भीमसेन ने इस व्रत का पालन किया था और वैकुंठ को गए थे।इसलिए इसका नाम भीमसेनी एकादशी भी हुआ।

सिर्फ निर्जला एकादशी का व्रत कर लेने से अधिकमास की दो एकादशियों सहित साल की 25 एकादशी व्रत का फल मिलता है। जहाँ साल भर की अन्य एकादशी व्रत में आहार संयम का महत्त्व है। वहीं निर्जला एकादशी के दिन आहार के साथ ही जल का संयम भी ज़रूरी है। इस व्रत में जल ग्रहण नहीं किया जाता है यानि निर्जल रहकर व्रत का पालन किया जाता है। यह व्रत मन को संयम सिखाता है और शरीर को नई ऊर्जा देता है। यह व्रत पुरुष और महिलाओं दोनों द्वारा किया जा सकता है। व्रत का विधान है।



दिनभर इन बातों का ध्यान रखें
1. पवित्रीकरण के समय जल आचमन के अलावा अगले दिन सूर्योदय तक पानी नहीं पीएं।

2. दिनभर कम बोलें और हो सके तो मौन रहने की कोशिश करें।

3. दिनभर न सोएं।

4. ब्रह्मचर्य का पालन करें।

5. झूठ न बोलें, गुस्सा और विवाद न करें।





व्रत कथा



जब वेदव्यास ने पांडवों को चारों पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाले एकादशी व्रत का संकल्प कराया था। तब युधिष्ठिर ने कहा - जनार्दन! ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी पड़ती हो, कृपया उसका वर्णन कीजिए। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा हे राजन् ! इसका वर्णन परम धर्मात्मा व्यासजी करेंगे, क्योंकि ये सम्पूर्ण शास्त्रों के तत्त्वज्ञ और वेद वेदांगों के पारंगत विद्वान् हैं।


तब वेदव्यासजी कहने लगे- कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी में अन्न खाना वर्जित है। द्वादशी को स्नान करके पवित्र होकर फूलों से भगवान केशव की पूजा करें। फिर पहले ब्राह्मणों को भोजन देकर अन्त में स्वयं भोजन करें। यह सुनकर भीमसेन बोले- परम बुद्धिमान पितामह! मेरी उत्तम बात सुनिए। राजा युधिष्ठिर, माता कुन्ती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव, ये एकादशी को कभी भोजन नहीं करते तथा मुझसे भी हमेशा यही कहते हैं कि भीमसेन एकादशी को तुम भी न खाया करो परन्तु मैं उन लोगों से यही कहता हूँ कि मुझसे भूख नहीं सही जाएगी।


भीमसेन की बात सुनकर व्यासजी ने कहा- यदि तुम नरक को दूषित समझते हो और तुम्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति अभीष्ट है और तो दोनों पक्षों की एकादशियों के दिन भोजन नहीं करना।


भीमसेन बोले महाबुद्धिमान पितामह! मैं आपके सामने सच कहता हूँ। मुझसे एक बार भोजन करके भी व्रत नहीं किया जा सकता, तो फिर उपवास करके मैं कैसे रह सकता हूँ। मेरे उदर में वृक नामक अग्नि सदा प्रज्वलित रहती है, अत: जब मैं बहुत अधिक खाता हूँ, तभी यह शांत होती है। इसलिए महामुनि ! मैं पूरे वर्षभर में केवल एक ही उपवास कर सकता हूँ। जिससे स्वर्ग की प्राप्ति सुलभ हो तथा जिसके करने से मैं कल्याण का भागी हो सकूँ, ऐसा कोई एक व्रत निश्चय करके बताइये। मैं उसका यथोचित रूप से पालन करुँगा।


व्यासजी ने कहा- भीम! ज्येष्ठ मास में सूर्य वृष राशि पर हो या मिथुन राशि पर, शुक्लपक्ष में जो एकादशी हो, उसका यत्नपूर्वक निर्जल व्रत करो। केवल कुल्ला या आचमन करने के लिए मुख में जल डाल सकते हो, उसको छोड़कर किसी प्रकार का जल विद्वान् पुरुष मुख में न डालें, अन्यथा व्रत भंग हो जाता है। एकादशी को सूर्योदय से लेकर दूसरे दिन के सूर्योदय तक मनुष्य जल का त्याग करे तो यह व्रत पूर्ण होता है। इसके बाद द्वादशी को प्रभातकाल में स्नान करके ब्राह्मणों को विधिपूर्वक जल और सुवर्ण का दान करे। इस प्रकार सब कार्य पूरा करके जितेन्द्रिय पुरुष ब्राह्मणों के साथ भोजन करें। वर्षभर में जितनी एकादशियां होती हैं, उन सबका फल इस निर्जला एकादशी से मनुष्य प्राप्त कर लेता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान केशव ने मुझसे कहा था कि ‘यदि मानव सबको छोड़कर एकमात्र मेरी शरण में आ जाय और एकादशी को निराहार रहे तो वह सब पापों से छूट जाता है।"


कुन्तीनन्दन! निर्जला एकादशी के दिन श्रद्धालु स्त्री पुरुषों के लिए जो विशेष दान और कर्त्तव्य विहित हैं, उन्हें सुनो। उस दिन जल में शयन करने वाले भगवान विष्णु का पूजन और जलमयी धेनु यानी पानी में खड़ी गाय का दान करना चाहिए, सामान्य गाय या घी से बनी गाय का दान भी किया जा सकता है। इस दिन दक्षिणा और कई तरह की मिठाइयों से ब्राह्मणों को सन्तुष्ट करना चाहिए। उनके संतुष्ट होने पर श्रीहरि मोक्ष प्रदान करते हैं।


जिन्होंने श्रीहरि की पूजा और रात्रि में जागरण करते हुए इस निर्जला एकादशी का व्रत किया है, उन्होंने अपने साथ ही बीती हुई सौ पीढ़ियों को और आने वाली सौ पीढ़ियों को भगवान वासुदेव के परम धाम में पहुँचा दिया है। निर्जला एकादशी के दिन अन्न, वस्त्र, गौ, जल, शैय्या, सुन्दर आसन, कमण्डलु तथा छाता दान करने चाहिए। जो श्रेष्ठ तथा सुपात्र ब्राह्मण को जूता दान करता है, वह सोने के विमान पर बैठकर स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है। जो इस एकादशी की महिमा को भक्तिपूर्वक सुनता अथवा उसका वर्णन करता है, वह स्वर्गलोक में जाता है। चतुर्दशीयुक्त अमावस्या को सूर्यग्रहण के समय श्राद्ध करके मनुष्य जिस फल को प्राप्त करता है, वही फल इस कथा को सुनने से भी मिलता है।


भीमसेन! ज्येष्ठ मास में शुक्ल पक्ष की जो शुभ एकादशी होती है, उसका निर्जल व्रत करना चाहिए। उस दिन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को शक्कर के साथ जल के घड़े दान करने चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य भगवान विष्णु के समीप पहुँचकर आनन्द का अनुभव करता है। इसके बाद द्वादशी को ब्राह्मण भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन करे। जो इस प्रकार पूर्ण रूप से पापनाशिनी एकादशी का व्रत करता है, वह सब पापों से मुक्त हो आनंदमय पद को प्राप्त होता है। यह सुनकर भीमसेन ने भी इस शुभ एकादशी का व्रत आरम्भ कर दिया।

27/04/2026

जय श्री हरि

आज 27 अप्रैल 2026 दिन सोमवार को भगवान नारायण को प्रसन्न करने के लिए एकादशी व्रत रखें

वैशाख शुक्ल एकादशी

धर्मराज युधिष्ठिर कहने लगे कि हे कृष्ण! वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है तथा उसकी कथा क्या है? इस व्रत की क्या विधि है, यह सब विस्तारपूर्वक बताइए।

श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे धर्मराज! मैं आपसे एक कथा कहता हूँ, जिसे महर्षि वशिष्ठ ने श्री रामचंद्रजी से कही थी। एक समय श्रीराम बोले कि हे गुरुदेव! कोई ऐसा व्रत बताइए, जिससे समस्त पाप और दु:ख का नाश हो जाए। मैंने सीताजी के वियोग में बहुत दु:ख भोगे हैं।

महर्षि वशिष्ठ बोले- हे राम! आपने बहुत सुंदर प्रश्न किया है। आपकी बुद्धि अत्यंत शुद्ध तथा पवित्र है। यद्यपि आपका नाम स्मरण करने से मनुष्य पवित्र और शुद्ध हो जाता है तो भी लोकहित में यह प्रश्न अच्छा है। वैशाख मास में जो एकादशी आती है उसका नाम मोहिनी एकादशी है। इसका व्रत करने से मनुष्य सब पापों तथा दु:खों से छूटकर मोहजाल से मुक्त हो जाता है। मैं इसकी कथा कहता हूँ। ध्यानपूर्वक सुनो।

सरस्वती नदी के तट पर भद्रावती नाम की एक नगरी में द्युतिमान नामक चंद्रवंशी राजा राज करता था। वहाँ धन-धान्य से संपन्न व पुण्यवान धनपाल नामक वैश्य भी रहता है। वह अत्यंत धर्मालु और विष्णु भक्त था। उसने नगर में अनेक भोजनालय, प्याऊ, कुएँ, सरोवर, धर्मशाला आदि बनवाए थे। सड़कों पर आम, जामुन, नीम आदि के अनेक वृक्ष भी लगवाए थे। उसके 5 पुत्र थे- सुमना, सद्‍बुद्धि, मेधावी, सुकृति और धृष्टबुद्धि।

इनमें से पाँचवाँ पुत्र धृष्टबुद्धि महापापी था। वह पितर आदि को नहीं मानता था। वह वेश्या, दुराचारी मनुष्यों की संगति में रहकर जुआ खेलता और पर-स्त्री के साथ भोग-विलास करता तथा मद्य-मांस का सेवन करता था। इसी प्रकार अनेक कुकर्मों में वह पिता के धन को नष्ट करता रहता था।

इन्हीं कारणों से त्रस्त होकर पिता ने उसे घर से निकाल दिया था। घर से बाहर निकलने के बाद वह अपने गहने-कपड़े बेचकर अपना निर्वाह करने लगा। जब सबकुछ नष्ट हो गया तो वेश्या और दुराचारी साथियों ने उसका साथ छोड़ दिया। अब वह भूख-प्यास से अति दु:खी रहने लगा। कोई सहारा न देख चोरी करना सीख गया।

एक बार वह पकड़ा गया तो वैश्य का पुत्र जानकर चेतावनी देकर छोड़ दिया गया। मगर दूसरी बार फिर पकड़ में आ गया। राजाज्ञा से इस बार उसे कारागार में डाल दिया गया। कारागार में उसे अत्यंत दु:ख दिए गए। बाद में राजा ने उसे नगरी से निकल जाने का कहा।

वह नगरी से निकल वन में चला गया। वहाँ वन्य पशु-पक्षियों को मारकर खाने लगा। कुछ समय पश्चात वह बहेलिया बन गया और धनुष-बाण लेकर पशु-पक्षियों को मार-मारकर खाने लगा।

एक दिन भूख-प्यास से व्यथित होकर वह खाने की तलाश में घूमता हुआ कौडिन्य ऋषि के आश्रम में पहुँच गया। उस समय वैशाख मास था और ऋषि गंगा स्नान कर आ रहे थे। उनके भीगे वस्त्रों के छींटे उस पर पड़ने से उसे कुछ सद्‍बुद्धि प्राप्त हुई।

वह कौडिन्य मुनि से हाथ जोड़कर कहने लगा कि हे मुने! मैंने जीवन में बहुत पाप किए हैं। आप इन पापों से छूटने का कोई साधारण बिना धन का उपाय बताइए। उसके दीन वचन सुनकर मुनि ने प्रसन्न होकर कहा कि तुम वैशाख शुक्ल की मोहिनी नामक एकादशी का व्रत करो। इससे समस्त पाप नष्ट हो जाएँगे। मुनि के वचन सुनकर वह अत्यंत प्रसन्न हुआ और उनके द्वारा बताई गई विधि के अनुसार व्रत किया।

हे राम! इस व्रत के प्रभाव से उसके सब पाप नष्ट हो गए और अंत में वह गरुड़ पर बैठकर विष्णुलोक को गया। इस व्रत से मोह आदि सब नष्ट हो जाते हैं। संसार में इस व्रत से श्रेष्ठ कोई व्रत नहीं है। इसके माहात्म्य को पढ़ने से अथवा सुनने से एक हजार गौदान का फल प्राप्त होता है।

जय श्री राम

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