Temples Worldwide ॐ

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"ॐ"
The valor of our Ancestors,
The temples of our Gods,
The land of our forefathers,
The traditional shall live on,
Let's protect our temples for the next generations.

 ी_सनातन_संस्कृति_का_प्रचार_हमारा_कर्तव्य_है_ॐ                         🚩🔱🙏🏼  #मां  #ब्रह्मचारिणी 🙏🏼🔱🚩https://www.faceboo...
03/04/2022

ी_सनातन_संस्कृति_का_प्रचार_हमारा_कर्तव्य_है_ॐ

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नवरात्रि के दूसरे दिन मां दुर्गा के ब्रह्मचारिणी स्वरूप की पूजा की जाती है. मां के नाम से ही पता लग रहा है कि ब्रह्म यानि तपस्या का आचरण करने वाली मां. इन्हें तपस्चारिणी के नाम से भी जाना जाता है. 3 अप्रैल ब्रह्मचारिणी मां की पूजा की जाएगी. मान्यता है कि किसी भी देवी-देवता की पूजा आरती और मंत्र जाप के बिना अधूरी मानी जाती है. मां ब्रह्माचारिणी की पूजा के बाद उनकी आरती और मंत्र जाप अवश्य करें. ऐसा करने से भक्तों की सभी इच्छाएं जल्द पूरी होगी.

मां ब्रह्मचारिणी का मंत्र
1 – दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलु| देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा ||
वन्दे वांछित लाभायचन्द्रार्घकृतशेखराम्।
जपमालाकमण्डलु धराब्रह्मचारिणी शुभाम्॥
गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम।
धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालंकार भूषिताम्॥
परम वंदना पल्लवराधरां कांत कपोला पीन।
पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥
2 – या देवी सर्वभेतेषु मां ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
3 – दधाना कर मद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।
4 – ब्रह्मचारयितुम शीलम यस्या सा ब्रह्मचारिणी.
सच्चीदानन्द सुशीला च विश्वरूपा नमोस्तुते..
5 – ऊँ ब्रां ब्रीं ब्रूं ब्रह्मचारिण्यै नम:

ब्रह्मचारिणी की आरती
जय अंबे ब्रह्माचारिणी माता।
जय चतुरानन प्रिय सुख दाता।
ब्रह्मा जी के मन भाती हो।
ज्ञान सभी को सिखलाती हो।
ब्रह्मा मंत्र है जाप तुम्हारा।
जिसको जपे सकल संसारा।
जय गायत्री वेद की माता।
जो मन निस दिन तुम्हें ध्याता।
कमी कोई रहने न पाए।
कोई भी दुख सहने न पाए।
उसकी विरति रहे ठिकाने।
जो तेरी महिमा को जाने।
रुद्राक्ष की माला ले कर।
जपे जो मंत्र श्रद्धा दे कर।
आलस छोड़ करे गुणगाना।
मां तुम उसको सुख पहुंचाना।
ब्रह्माचारिणी तेरो नाम।
पूर्ण करो सब मेरे काम।
भक्त तेरे चरणों का पुजारी।
रखना लाज मेरी महतारी।
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02/04/2022

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भारत का सर्वमान्य संवत विक्रम संवत है, जिसका प्रारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है। ब्रह्म पुराण के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही सृष्टि का प्रारंभ हुआ था और इसी दिन भारत वर्ष में काल गणना प्रारंभ हुई थी। कहा है कि :-

चैत्र मासे जगद्ब्रह्म समग्रे प्रथमेऽनि
शुक्ल पक्षे समग्रे तु सदा सूर्योदये सति। - ब्रह्म पुराण

चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा वसंत ऋतु में आती है। वसंत ऋतु में वृक्ष, लता फूलों से लदकर आह्लादित होते हैं जिसे मधुमास भी कहते हैं। इतना ही यह वसंत ऋतु समस्त चराचर को प्रेमाविष्ट करके समूची धरती को विभिन्न प्रकार के फूलों से अलंकृत कर जन मानस में नववर्ष की उल्लास, उमंग तथा मादकाता का संचार करती है।

इस नव संवत्सर का इतिहास बताता है कि इसका आरंभकर्ता शकरि महाराज विक्रमादित्य थे। कहा जाता है कि देश की अक्षुण्ण भारतीय संस्कृति और शांति को भंग करने के लिए उत्तर पश्चिम और उत्तर से विदेशी शासकों एवं जातियों ने इस देश पर आक्रमण किए और अनेक भूखंडों पर अपना अधिकार कर लिया और अत्याचार किए जिनमें एक क्रूर जाति के शक तथा हूण थे।

ये लोग पारस कुश से सिंध आए थे। सिंध से सौराष्ट्र, गुजरात एवं महाराष्ट्र में फैल गए और दक्षिण गुजरात से इन लोगों ने उज्जयिनी पर आक्रमण किया। शकों ने समूची उज्जयिनी को पूरी तरह विध्वंस कर दिया और इस तरह इनका साम्राज्य शक विदिशा और मथुरा तक फैल गया। इनके कू्र अत्याचारों से जनता में त्राहि-त्राहि मच गई तो मालवा के प्रमुख नायक विक्रमादित्य के नेतृत्व में देश की जनता और राजशक्तियां उठ खड़ी हुईं और इन विदेशियों को खदेड़ कर बाहर कर दिया।

इस पराक्रमी वीर महावीर का जन्म अवन्ति देश की प्राचीन नगर उज्जयिनी में हुआ था जिनके पिता महेन्द्रादित्य गणनायक थे और माता मलयवती थीं। इस दंपत्ति ने पुत्र प्राप्ति के लिए भगवान भूतेश्वर से अनेक प्रार्थनाएं एवं व्रत उपवास किए। सारे देश शक के उन्मूलन और आतंक मुक्ति के लिए विक्रमादित्य को अनेक बार उलझना पड़ा जिसकी भयंकर लड़ाई सिंध नदी के आस-पास करूर नामक स्थान पर हुई जिसमें शकों ने अपनी पराजय स्वीकार की।

इस तरह महाराज विक्रमादित्य ने शकों को पराजित कर एक नए युग का सूत्रपात किया जिसे विक्रमी शक संवत्सर कहा जाता है।

राजा विक्रमादित्य की वीरता तथा युद्ध कौशल पर अनेक प्रशस्ति पत्र तथा शिलालेख लिखे गए जिसमें यह लिखा गया कि ईसा पूर्व 57 में शकों पर भीषण आक्रमण कर विजय प्राप्त की।

इतना ही नहीं शकों को उनके गढ़ अरब में भी करारी मात दी और अरब विजय के उपलक्ष्य में मक्का में महाकाल भगवान शिव का मंदिर बनवाया।

नवसंवत्सर का हर्षोल्लास

* आंध्रप्रदेश में युगदि या उगादि तिथि कहकर इस सत्य की उद्घोषणा की जाती है। वीर विक्रमादित्य की विजय गाथा का वर्णन अरबी कवि जरहाम किनतोई ने अपनी पुस्तक 'शायर उल ओकुल' में किया है।

उन्होंने लिखा है वे लोग धन्य हैं जिन्होंने सम्राट विक्रमादित्य के समय जन्म लिया। सम्राट पृथ्वीराज के शासन काल तक विक्रमादित्य के अनुसार शासन व्यवस्था संचालित रही जो बाद में मुगल काल के दौरान हिजरी सन् का प्रारंभ हुआ। किंतु यह सर्वमान्य नहीं हो सका, क्योंकि ज्योतिषियों के अनुसार सूर्य सिद्धांत का मान गणित और त्योहारों की परिकल्पना सूर्य ग्रहण, चंद्र ग्रहण का गणित इसी शक संवत्सर से ही होता है। जिसमें एक दिन का भी अंतर नहीं होता।

* सिंधु प्रांत में इसे नव संवत्सर को 'चेटी चंडो' चैत्र का चंद्र नाम से पुकारा जाता है जिसे सिंधी हर्षोल्लास से मनाते हैं।

* कश्मीर में यह पर्व 'नौरोज' के नाम से मनाया जाता है जिसका उल्लेख पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि वर्ष प्रतिपदा 'नौरोज' यानी 'नवयूरोज' अर्थात्‌ नया शुभ प्रभात जिसमें लड़के-लड़कियां नए वस्त्र पहनकर बड़े धूमधाम से मनाते हैं।

* हिंदू संस्कृति के अनुसार नव संवत्सर पर कलश स्थापना कर नौ दिन का व्रत रखकर मां दुर्गा की पूजा प्रारंभ कर नवमीं के दिन हवन कर मां भगवती से सुख-शांति तथा कल्याण की प्रार्थना की जाती है। जिसमें सभी लोग सात्विक भोजन व्रत उपवास, फलाहार कर नए भगवा झंडे तोरण द्वार पर बांधकर हर्षोल्लास से मनाते हैं।

* इस तरह भारतीय संस्कृति और जीवन का विक्रमी संवत्सर से गहरा संबंध है लोग इन्हीं दिनों तामसी भोजन, मांस मदिरा का त्याग भी कर देते हैं।
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02/04/2022

ी_सनातन_संस्कृति_का_प्रचार_हमारा_कर्तव्य_है_ॐ

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🚩 #02अप्रैल2022 , #चैत्र_शुक्ल_1 #चैत्र_नवरात्रि 🚩
नवरात्रि एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है 'नौ रातें'। इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान, शक्ति / देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। नवरात्रि वर्ष में चार बार आता है। पौष, चैत्र, आषाढ, अश्विन प्रतिपदा से नवमी तक मनाया जाता है।

इसे बसंत नवरात्री भी कहते है. चैत्र माह के शुक्ल पक्ष में आती है। इस नवरात्री के साथ हिन्दू कैलेंडर के अनुसार नए साल की शुरुवात होती है। यह मार्च अप्रैल के समय आती है। इस नवरात्री के नौवें दिन, रामनवमी का त्यौहार मनाया जाता है। इस लिए इसे राम नवरात्री नाम से भी जाना जाता है। जो रीती, पूजा शरद नवरात्री में होती है। वो इस नवरात्री में भी होती है. यह नवरात्री उत्तरी भारत में बहुत प्रसिद्ध है. महाराष्ट्र में गुडी पड़वा एवं आंध्रप्रदेश में उगडी के साथ शुरू होती है।

घट स्थापना हेतु शुभ मुहूर्त -

दिनांक : 02 अप्रैल 2022
शुभ चौघडिया
प्रातः - 07:52:35 से प्रातः 09:25:37

चर चौघड़िया
दोपहर - 12:31:41 से सायं 02:04:43

लाभ-अमृत चौघडिया
दोपहर - 02:04:43 से सायं 05:10:47

लाभ चौघडिया
सायं - 18:43:49 से रात्रि 08 :10:47

शुभ – अमृत चौघडिया
रात्रि - 09:37:45 से 12:31:41
हमारी चेतना के अंदर सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण- तीनों प्रकार के गन व्याप्त हैं। प्रकृति के साथ इसी चेतना के उत्सव को नवरात्रि कहते है। इन ९ दिनों में पहले तीन दिन तमोगुणी प्रकृति की आराधना करते हैं, दूसरे तीन दिन रजोगुणी और आखरी तीन दिन सतोगुणी प्रकृति की आराधना का महत्व है ।

माँ की आराधना -
नवरात्रि के नौ रातों में तीन देवियों - महालक्ष्मी, महासरस्वती या सरस्वती और दुर्गा के नौ स्वरुपों की पूजा होती है जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं। इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान, शक्ति / देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। दुर्गा का मतलब जीवन के दुख कॊ हटानेवाली होता है। नवरात्रि एक महत्वपूर्ण प्रमुख त्योहार है जिसे पूरे भारत में महान उत्साह के साथ मनाया जाता है। माँ सिर्फ आसमान में कहीं स्थित नही हैं, ऐसा कहा जाता है कि -
"या देवी सर्वभुतेषु चेतनेत्यभिधीयते" -
"सभी जीव जंतुओं में चेतना के रूप में ही माँ / देवी तुम स्थित हो"

नौ देवियाँ :
शैलपुत्री - इसका अर्थ- पहाड़ों की पुत्री होता है।
ब्रह्मचारिणी - इसका अर्थ- ब्रह्मचारीणी।
चंद्रघंटा - इसका अर्थ- चाँद की तरह चमकने वाली।
कूष्माण्डा - इसका अर्थ- पूरा जगत उनके पैर में है।
स्कंदमाता - इसका अर्थ- कार्तिक स्वामी की माता।
कात्यायनी - इसका अर्थ- कात्यायन आश्रम में जन्मि।
कालरात्रि - इसका अर्थ- काल का नाश करने वली।
महागौरी - इसका अर्थ- सफेद रंग वाली मां।
सिद्धिदात्री - इसका अर्थ- सर्व सिद्धि देने वाली।

शक्ति की उपासना का पर्व चैत्र नवरात्र प्रतिपदा से नवमी तक निश्चित नौ तिथि, नौ नक्षत्र, नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ सनातन काल से मनाया जा रहा है। आदिशक्ति के हर रूप की नवरात्र के नौ दिनों में क्रमशः अलग-अलग पूजा की जाती है। माँ दुर्गा की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री है। ये सभी प्रकार की सिद्धियाँ देने वाली हैं। इनका वाहन सिंह है और कमल पुष्प पर ही आसीन होती हैं। नवरात्रि के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है।
नवदुर्गा और दस महाविद्याओं में काली ही प्रथम प्रमुख हैं। भगवान शिव की शक्तियों में उग्र और सौम्य, दो रूपों में अनेक रूप धारण करने वाली दशमहाविद्या अनंत सिद्धियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं। दसवें स्थान पर कमला वैष्णवी शक्ति हैं, जो प्राकृतिक संपत्तियों की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी हैं। देवता, मानव, दानव सभी इनकी कृपा के बिना पंगु हैं, इसलिए आगम-निगम दोनों में इनकी उपासना समान रूप से वर्णित है। सभी देवता, राक्षस, मनुष्य, गंधर्व इनकी कृपा-प्रसाद के लिए लालायित रहते हैं।
नवरात्रि उत्सव देवी अंबा (विद्युत) का प्रतिनिधित्व है। वसंत की शुरुआत और शरद ऋतु की शुरुआत, जलवायु और सूरज के प्रभावों का महत्वपूर्ण संगम माना जाता है। इन दो समय मां दुर्गा की पूजा के लिए पवित्र अवसर माने जाते है। त्योहार की तिथियाँ चंद्र कैलेंडर के अनुसार निर्धारित होती हैं। नवरात्रि पर्व, माँ-दुर्गा की अवधारणा भक्ति और परमात्मा की शक्ति (उदात्त, परम, परम रचनात्मक ऊर्जा) की पूजा का सबसे शुभ और अनोखा अवधि माना जाता है। यह पूजा वैदिक युग से पहले, प्रागैतिहासिक काल से है। ऋषि के वैदिक युग के बाद से, नवरात्रि के दौरान की भक्ति प्रथाओं में से मुख्य रूप गायत्री साधना का हैं।

नवरात्रि के पहले तीन दिन :
नवरात्रि के पहले तीन दिन देवी दुर्गा की पूजा करने के लिए समर्पित किए गए हैं। यह पूजा उसकी ऊर्जा और शक्ति की की जाती है। प्रत्येक दिन दुर्गा के एक अलग रूप को समर्पित है। त्योहार के पहले दिन बालिकाओं की पूजा की जाती है। दूसरे दिन युवती की पूजा की जाती है। तीसरे दिन जो महिला परिपक्वता के चरण में पहुंच गयी है उसकि पूजा की जाती है। देवी दुर्गा के विनाशकारी पहलु सब बुराई प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त करने के प्रतिबद्धता के प्रतीक है।

नवरात्रि के चौथा से छठे दिन :
व्यक्ति जब अहंकार, क्रोध, वासना और अन्य पशु प्रवृत्ति की बुराई प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त कर लेता है, वह एक शून्य का अनुभव करता है। यह शून्य आध्यात्मिक धन से भर जाता है। प्रयोजन के लिए, व्यक्ति सभी भौतिकवादी, आध्यात्मिक धन और समृद्धि प्राप्त करने के लिए देवी लक्ष्मी की पूजा करता है। नवरात्रि के चौथे, पांचवें और छठे दिन लक्ष्मी- समृद्धि और शांति की देवी, की पूजा करने के लिए समर्पित है। शायद व्यक्ति बुरी प्रवृत्तियों और धन पर विजय प्राप्त कर लेता है, पर वह अभी सच्चे ज्ञान से वंचित है। ज्ञान एक मानवीय जीवन जीने के लिए आवश्यक है भले हि वह सत्ता और धन के साथ समृद्ध है। इसलिए, नवरात्रि के पांचवें दिन देवी सरस्वती की पूजा की जाती है। सभी पुस्तकों और अन्य साहित्य सामग्रियों को एक स्थान पर इकट्ठा कर दिया जाता हैं और एक दीया देवी आह्वान और आशीर्वाद लेने के लिए, देवता के सामने जलाया जाता है।

नवरात्रि का सातवां और आठवां दिन :
सातवें दिन, कला और ज्ञान की देवी, सरस्वती, की पूजा की है। प्रार्थनायें, आध्यात्मिक ज्ञान की तलाश के उद्देश्य के साथ की जाती हैं। आठवे दिन पर एक 'यज्ञ' किया जाता है। यह एक बलिदान है जो देवी दुर्गा को सम्मान तथा उनको विदा करता है।

नवरात्रि का नौवां दिन :
नौवा दिन नवरात्रि समारोह का अंतिम दिन है। यह महानवमी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन कन्या पूजन होता है। उन नौ जवान लड़कियों की पूजा होती है जो अभी तक यौवन की अवस्था तक नहीं पहुँची है। इन नौ लड़कियों को देवी दुर्गा के नौ रूपों का प्रतीक माना जाता है। लड़कियों का सम्मान तथा स्वागत करने के लिए उनके पैर धोए जाते हैं। पूजा के अंत में लड़कियों को उपहार के रूप में नए कपड़े भेंट किए जाते हैं।
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31/03/2022

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||ॐ || सहस्र शीर्षं देवं विश्वाक्षं विश्वशंभुवम् ।
विश्वै नारायणं देवं अक्षरं परमं पदम् ॥

विश्वतः परमान्नित्यं विश्वं नारायणं हरिम् ।
विश्वं एव इदं पुरुषः तद्विश्वं उपजीवति ॥

पतिं विश्वस्य आत्मा ईश्वरं शाश्वतं शिवमच्युतम् ।
नारायणं महाज्ञेयं विश्वात्मानं परायणम् ॥

नारायण परो ज्योतिरात्मा नारायणः परः ।
नारायण परं ब्रह्म तत्त्वं नारायणः परः ।
नारायण परो ध्याता ध्यानं नारायणः परः ॥

यच्च किंचित् जगत् सर्वं दृश्यते श्रूयतेऽपि वा ।
अंतर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः ॥

अनन्तं अव्ययं कविं समुद्रेन्तं विश्वशंभुवम् ।
पद्म कोश प्रतीकाशं हृदयं च अपि अधोमुखम् ॥
अधो निष्ठ्या वितस्त्यान्ते नाभ्याम् उपरि तिष्ठति ।
ज्वालामालाकुलं भाती विश्वस्यायतनं महत् ॥

सन्ततं शिलाभिस्तु लम्बत्या कोशसन्निभम् ।
तस्यान्ते सुषिरं सूक्ष्मं तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥

तस्य मध्ये महानग्निः विश्वार्चिः विश्वतो मुखः ।
सोऽग्रविभजंतिष्ठन् आहारं अजरः कविः ॥

तिर्यगूर्ध्वमधश्शायी रश्मयः तस्य सन्तता ।
सन्तापयति स्वं देहमापादतलमास्तकः ।
तस्य मध्ये वह्निशिखा अणीयोर्ध्वा व्यवस्थिताः ॥

नीलतोयद-मध्यस्थ-द्विद्युल्लेखेव भास्वरा ।
नीवारशूकवत्तन्वी पीता भास्वत्यणूपमा ॥
तस्याः शिखाया मध्ये परमात्मा व्यवस्थितः ।
स ब्रह्म स शिवः स हरिः स इन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट् ॥

ऋतं सत्यं परं ब्रह्म पुरुषं कृष्ण पिङ्गलम् ।
ऊर्ध्वरेतं विरूपाक्षं विश्वरूपाय वै नमो नमः ॥

ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि ।
तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ॥

ॐ शांति शांति शांतिः
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30/03/2022

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सहस्रनाम स्तोत्रम् ||🌹🙏
ॐ स्थिरः स्थाणुः प्रभुर्भानुः प्रवरो वरदो वरः |
सर्वात्मा सर्वविख्यातः सर्वः सर्वकरो भवः || 1 ||

जटी चर्मी शिखण्डी च सर्वाङ्गः सर्वाङ्गः सर्वभावनः |
हरिश्च हरिणाक्शश्च सर्वभूतहरः प्रभुः || 2 ||

प्रवृत्तिश्च निवृत्तिश्च नियतः शाश्वतो ध्रुवः |
श्मशानचारी भगवानः खचरो गोचरोऽर्दनः || 3 ||

अभिवाद्यो महाकर्मा तपस्वी भूत भावनः |
उन्मत्तवेषप्रच्छन्नः सर्वलोकप्रजापतिः || 4 ||

महारूपो महाकायो वृषरूपो महायशाः |
महाऽऽत्मा सर्वभूतश्च विरूपो वामनो मनुः || 5 ||

लोकपालोऽन्तर्हितात्मा प्रसादो हयगर्दभिः |
पवित्रश्च महांश्चैव नियमो नियमाश्रयः || 6 ||

सर्वकर्मा स्वयम्भूश्चादिरादिकरो निधिः |
सहस्राक्शो विरूपाक्शः सोमो नक्शत्रसाधकः || 7 ||

चन्द्रः सूर्यः गतिः केतुर्ग्रहो ग्रहपतिर्वरः |
अद्रिरद्\{\}र्यालयः कर्ता मृगबाणार्पणोऽनघः || 8 ||

महातपा घोर तपाऽदीनो दीनसाधकः |
संवत्सरकरो मन्त्रः प्रमाणं परमं तपः || 9 ||

योगी योज्यो महाबीजो महारेता महातपाः |
सुवर्णरेताः सर्वघ्Yअः सुबीजो वृषवाहनः || 10 ||

दशबाहुस्त्वनिमिषो नीलकण्ठ उमापतिः |
विश्वरूपः स्वयं श्रेष्ठो बलवीरोऽबलोगणः || 11 ||

गणकर्ता गणपतिर्दिग्वासाः काम एव च |
पवित्रं परमं मन्त्रः सर्वभाव करो हरः || 12 ||

कमण्डलुधरो धन्वी बाणहस्तः कपालवानः |
अशनी शतघ्नी खड्गी पट्टिशी चायुधी महानः || 13 ||

स्रुवहस्तः सुरूपश्च तेजस्तेजस्करो निधिः |
उष्णिषी च सुवक्त्रश्चोदग्रो विनतस्तथा || 14 ||

दीर्घश्च हरिकेशश्च सुतीर्थः कृष्ण एव च |
सृगाल रूपः सर्वार्थो मुण्डः कुण्डी कमण्डलुः || 15 ||

अजश्च मृगरूपश्च गन्धधारी कपर्द्यपि |
उर्ध्वरेतोर्ध्वलिङ्ग उर्ध्वशायी नभस्तलः || 16 ||

त्रिजटैश्चीरवासाश्च रुद्रः सेनापतिर्विभुः |
अहश्चरोऽथ नक्तं च तिग्ममन्युः सुवर्चसः || 17 ||

गजहा दैत्यहा लोको लोकधाता गुणाकरः |
सिंहशार्दूलरूपश्च आर्द्रचर्माम्बरावृतः || 18 ||

कालयोगी महानादः सर्ववासश्चतुष्पथः |
निशाचरः प्रेतचारी भूतचारी महेश्वरः || 19 ||

बहुभूतो बहुधनः सर्वाधारोऽमितो गतिः |
नृत्यप्रियो नित्यनर्तो नर्तकः सर्वलासकः || 20 ||

घोरो महातपाः पाशो नित्यो गिरि चरो नभः |
सहस्रहस्तो विजयो व्यवसायो ह्यनिन्दितः || 21 ||

अमर्षणो मर्षणात्मा यघ्Yअहा कामनाशनः |
दक्शयघ्Yआपहारी च सुसहो मध्यमस्तथा || 22 ||

तेजोऽपहारी बलहा मुदितोऽर्थोऽजितो वरः |
गम्भीरघोषो गम्भीरो गम्भीर बलवाहनः || 23 ||

न्यग्रोधरूपो न्यग्रोधो वृक्शकर्णस्थितिर्विभुः |
सुदीक्श्णदशनश्चैव महाकायो महाननः || 24 ||

विष्वक्सेनो हरिर्यघ्Yअः संयुगापीडवाहनः |
तीक्श्ण तापश्च हर्यश्वः सहायः कर्मकालवितः || 25 ||

विष्णुप्रसादितो यघ्Yअः समुद्रो वडवामुखः |
हुताशनसहायश्च प्रशान्तात्मा हुताशनः || 26 ||

उग्रतेजा महातेजा जयो विजयकालवितः |
ज्योतिषामयनं सिद्धिः सन्धिर्विग्रह एव च || 27 ||

शिखी दण्डी जटी ज्वाली मूर्तिजो मूर्धगो बली |
वैणवी पणवी ताली कालः कालकटङ्कटः || 28 ||

नक्शत्रविग्रह विधिर्गुणवृद्धिर्लयोऽगमः |
प्रजापतिर्दिशा बाहुर्विभागः सर्वतोमुखः || 29 ||

विमोचनः सुरगणो हिरण्यकवचोद्भवः |
मेढ्रजो बलचारी च महाचारी स्तुतस्तथा || 30 ||

सर्वतूर्य निनादी च सर्ववाद्यपरिग्रहः |
व्यालरूपो बिलावासी हेममाली तरङ्गवितः || 31 ||

त्रिदशस्त्रिकालधृकः कर्म सर्वबन्धविमोचनः |
बन्धनस्त्वासुरेन्द्राणां युधि शत्रुविनाशनः || 32 ||

साङ्ख्यप्रसादो सुर्वासाः सर्वसाधुनिषेवितः |
प्रस्कन्दनो विभागश्चातुल्यो यघ्Yअभागवितः || 33 ||

सर्वावासः सर्वचारी दुर्वासा वासवोऽमरः |
हेमो हेमकरो यघ्Yअः सर्वधारी धरोत्तमः || 34 ||

लोहिताक्शो महाऽक्शश्च विजयाक्शो विशारदः |
सङ्ग्रहो निग्रहः कर्ता सर्पचीरनिवासनः || 35 ||

मुख्योऽमुख्यश्च देहश्च देह ऋद्धिः सर्वकामदः |
सर्वकामप्रसादश्च सुबलो बलरूपधृकः || 36 ||

सर्वकामवरश्चैव सर्वदः सर्वतोमुखः |
आकाशनिधिरूपश्च निपाती उरगः खगः || 37 ||

रौद्ररूपोंऽशुरादित्यो वसुरश्मिः सुवर्चसी |
वसुवेगो महावेगो मनोवेगो निशाचरः || 38 ||

सर्वावासी श्रियावासी उपदेशकरो हरः |
मुनिरात्म पतिर्लोके सम्भोज्यश्च सहस्रदः || 39 ||

पक्शी च पक्शिरूपी चातिदीप्तो विशाम्पतिः |
उन्मादो मदनाकारो अर्थार्थकर रोमशः || 40 ||

वामदेवश्च वामश्च प्राग्दक्शिणश्च वामनः |
सिद्धयोगापहारी च सिद्धः सर्वार्थसाधकः || 41 ||

भिक्शुश्च भिक्शुरूपश्च विषाणी मृदुरव्ययः |
महासेनो विशाखश्च षष्टिभागो गवाम्पतिः || 42 ||

वज्रहस्तश्च विष्कम्भी चमूस्तम्भनैव च |
ऋतुरृतु करः कालो मधुर्मधुकरोऽचलः || 43 ||

वानस्पत्यो वाजसेनो नित्यमाश्रमपूजितः |
ब्रह्मचारी लोकचारी सर्वचारी सुचारवितः || 44 ||

ईशान ईश्वरः कालो निशाचारी पिनाकधृकः |
निमित्तस्थो निमित्तं च नन्दिर्नन्दिकरो हरिः || 45 ||

नन्दीश्वरश्च नन्दी च नन्दनो नन्दिवर्धनः |
भगस्याक्शि निहन्ता च कालो ब्रह्मविदांवरः || 46 ||

चतुर्मुखो महालिङ्गश्चारुलिङ्गस्तथैव च |
लिङ्गाध्यक्शः सुराध्यक्शो लोकाध्यक्शो युगावहः || 47 ||

बीजाध्यक्शो बीजकर्ताऽध्यात्मानुगतो बलः |
इतिहास करः कल्पो गौतमोऽथ जलेश्वरः || 48 ||

दम्भो ह्यदम्भो वैदम्भो वैश्यो वश्यकरः कविः |
लोक कर्ता पशु पतिर्महाकर्ता महौषधिः || 49 ||

अक्शरं परमं ब्रह्म बलवानः शक्र एव च |
नीतिर्ह्यनीतिः शुद्धात्मा शुद्धो मान्यो मनोगतिः || 50 ||

बहुप्रसादः स्वपनो दर्पणोऽथ त्वमित्रजितः |
वेदकारः सूत्रकारो विद्वानः समरमर्दनः || 51 ||

महामेघनिवासी च महाघोरो वशीकरः |
अग्निज्वालो महाज्वालो अतिधूम्रो हुतो हविः || 52 ||

वृषणः शङ्करो नित्यो वर्चस्वी धूमकेतनः |
नीलस्तथाऽङ्गलुब्धश्च शोभनो निरवग्रहः || 53 ||

स्वस्तिदः स्वस्तिभावश्च भागी भागकरो लघुः |
उत्सङ्गश्च महाङ्गश्च महागर्भः परो युवा || 54 ||

कृष्णवर्णः सुवर्णश्चेन्द्रियः सर्वदेहिनामः |
महापादो महाहस्तो महाकायो महायशाः || 55 ||

महामूर्धा महामात्रो महानेत्रो दिगालयः |
महादन्तो महाकर्णो महामेढ्रो महाहनुः || 56 ||

महानासो महाकम्बुर्महाग्रीवः श्मशानधृकः |
महावक्शा महोरस्को अन्तरात्मा मृगालयः || 57 ||

लम्बनो लम्बितोष्ठश्च महामायः पयोनिधिः |
महादन्तो महादंष्ट्रो महाजिह्वो महामुखः || 58 ||

महानखो महारोमा महाकेशो महाजटः |
असपत्नः प्रसादश्च प्रत्ययो गिरि साधनः || 59 ||

स्नेहनोऽस्नेहनश्चैवाजितश्च महामुनिः |
वृक्शाकारो वृक्श केतुरनलो वायुवाहनः || 60 ||

मण्डली मेरुधामा च देवदानवदर्पहा |
अथर्वशीर्षः सामास्य ऋकःसहस्रामितेक्शणः || 61 ||

यजुः पाद भुजो गुह्यः प्रकाशो जङ्गमस्तथा |
अमोघार्थः प्रसादश्चाभिगम्यः सुदर्शनः || 62 ||

उपहारप्रियः शर्वः कनकः काझ्ण्चनः स्थिरः |
नाभिर्नन्दिकरो भाव्यः पुष्करस्थपतिः स्थिरः || 63 ||

द्वादशस्त्रासनश्चाद्यो यघ्Yओ यघ्Yअसमाहितः |
नक्तं कलिश्च कालश्च मकरः कालपूजितः || 64 ||

सगणो गण कारश्च भूत भावन सारथिः |
भस्मशायी भस्मगोप्ता भस्मभूतस्तरुर्गणः || 65 ||

अगणश्चैव लोपश्च महाऽऽत्मा सर्वपूजितः |
शङ्कुस्त्रिशङ्कुः सम्पन्नः शुचिर्भूतनिषेवितः || 66 ||

आश्रमस्थः कपोतस्थो विश्वकर्मापतिर्वरः |
शाखो विशाखस्ताम्रोष्ठो ह्यमुजालः सुनिश्चयः || 67 ||

कपिलोऽकपिलः शूरायुश्चैव परोऽपरः |
गन्धर्वो ह्यदितिस्तार्क्श्यः सुविघ्Yएयः सुसारथिः || 68 ||

परश्वधायुधो देवार्थ कारी सुबान्धवः |
तुम्बवीणी महाकोपोर्ध्वरेता जलेशयः || 69 ||

उग्रो वंशकरो वंशो वंशनादो ह्यनिन्दितः |
सर्वाङ्गरूपो मायावी सुहृदो ह्यनिलोऽनलः || 70 ||

बन्धनो बन्धकर्ता च सुबन्धनविमोचनः |
सयघ्Yआरिः सकामारिः महादंष्ट्रो महाऽऽयुधः || 71 ||

बाहुस्त्वनिन्दितः शर्वः शङ्करः शङ्करोऽधनः |
अमरेशो महादेवो विश्वदेवः सुरारिहा || 72 ||

अहिर्बुध्नो निरृतिश्च चेकितानो हरिस्तथा |
अजैकपाच्च कापाली त्रिशङ्कुरजितः शिवः || 73 ||

धन्वन्तरिर्धूमकेतुः स्कन्दो वैश्रवणस्तथा |
धाता शक्रश्च विष्णुश्च मित्रस्त्वष्टा ध्रुवो धरः || 74 ||

प्रभावः सर्वगो वायुरर्यमा सविता रविः |
उदग्रश्च विधाता च मान्धाता भूत भावनः || 75 ||

रतितीर्थश्च वाग्मी च सर्वकामगुणावहः |
पद्मगर्भो महागर्भश्चन्द्रवक्त्रोमनोरमः || 76 ||

बलवांश्चोपशान्तश्च पुराणः पुण्यचझ्ण्चुरी |
कुरुकर्ता कालरूपी कुरुभूतो महेश्वरः || 77 ||

सर्वाशयो दर्भशायी सर्वेषां प्राणिनाम्पतिः |
देवदेवः मुखोऽसक्तः सदसतः सर्वरत्नवितः || 78 ||

कैलास शिखरावासी हिमवदः गिरिसंश्रयः |
कूलहारी कूलकर्ता बहुविद्यो बहुप्रदः || 79 ||

वणिजो वर्धनो वृक्शो नकुलश्चन्दनश्छदः |
सारग्रीवो महाजत्रु रलोलश्च महौषधः || 80 ||

सिद्धार्थकारी सिद्धार्थश्चन्दो व्याकरणोत्तरः |
सिंहनादः सिंहदंष्ट्रः सिंहगः सिंहवाहनः || 81 ||

प्रभावात्मा जगत्कालस्थालो लोकहितस्तरुः |
सारङ्गो नवचक्राङ्गः केतुमाली सभावनः || 82 ||

भूतालयो भूतपतिरहोरात्रमनिन्दितः || 83 ||

वाहिता सर्वभूतानां निलयश्च विभुर्भवः |
अमोघः संयतो ह्यश्वो भोजनः प्राणधारणः || 84 ||

धृतिमानः मतिमानः दक्शः सत्कृतश्च युगाधिपः |
गोपालिर्गोपतिर्ग्रामो गोचर्मवसनो हरः || 85 ||

हिरण्यबाहुश्च तथा गुहापालः प्रवेशिनामः |
प्रतिष्ठायी महाहर्षो जितकामो जितेन्द्रियः || 86 ||

गान्धारश्च सुरालश्च तपः कर्म रतिर्धनुः |
महागीतो महानृत्तोह्यप्सरोगणसेवितः || 87 ||

महाकेतुर्धनुर्धातुर्नैक सानुचरश्चलः |
आवेदनीय आवेशः सर्वगन्धसुखावहः || 88 ||

तोरणस्तारणो वायुः परिधावति चैकतः |
संयोगो वर्धनो वृद्धो महावृद्धो गणाधिपः || 89 ||

नित्यात्मसहायश्च देवासुरपतिः पतिः |
युक्तश्च युक्तबाहुश्च द्विविधश्च सुपर्वणः || 90 ||

आषाढश्च सुषाडश्च ध्रुवो हरि हणो हरः |
वपुरावर्तमानेभ्यो वसुश्रेष्ठो महापथः || 91 ||

शिरोहारी विमर्शश्च सर्वलक्शण भूषितः |
अक्शश्च रथ योगी च सर्वयोगी महाबलः || 92 ||

समाम्नायोऽसमाम्नायस्तीर्थदेवो महारथः |
निर्जीवो जीवनो मन्त्रः शुभाक्शो बहुकर्कशः || 93 ||

रत्न प्रभूतो रक्ताङ्गो महाऽर्णवनिपानवितः |
मूलो विशालो ह्यमृतो व्यक्ताव्यक्तस्तपो निधिः || 94 ||

आरोहणो निरोहश्च शलहारी महातपाः |
सेनाकल्पो महाकल्पो युगायुग करो हरिः || 95 ||

युगरूपो महारूपो पवनो गहनो नगः |
न्याय निर्वापणः पादः पण्डितो ह्यचलोपमः || 96 ||

बहुमालो महामालः सुमालो बहुलोचनः |
विस्तारो लवणः कूपः कुसुमः सफलोदयः || 97 ||

वृषभो वृषभाङ्काङ्गो मणि बिल्वो जटाधरः |
इन्दुर्विसर्वः सुमुखः सुरः सर्वायुधः सहः || 98 ||

निवेदनः सुधाजातः सुगन्धारो महाधनुः |
गन्धमाली च भगवानः उत्थानः सर्वकर्मणामः || 99 ||

मन्थानो बहुलो बाहुः सकलः सर्वलोचनः |
तरस्ताली करस्ताली ऊर्ध्व संहननो वहः || 100 ||

छत्रं सुच्छत्रो विख्यातः सर्वलोकाश्रयो महानः |
मुण्डो विरूपो विकृतो दण्डि मुण्डो विकुर्वणः || 101 ||

हर्यक्शः ककुभो वज्री दीप्तजिह्वः सहस्रपातः |
सहस्रमूर्धा देवेन्द्रः सर्वदेवमयो गुरुः || 102 ||

सहस्रबाहुः सर्वाङ्गः शरण्यः सर्वलोककृतः |
पवित्रं त्रिमधुर्मन्त्रः कनिष्ठः कृष्णपिङ्गलः || 103 ||

ब्रह्मदण्डविनिर्माता शतघ्नी शतपाशधृकः |
पद्मगर्भो महागर्भो ब्रह्मगर्भो जलोद्भवः || 104 ||

गभस्तिर्ब्रह्मकृदः ब्रह्मा ब्रह्मविदः ब्राह्मणो गतिः |
अनन्तरूपो नैकात्मा तिग्मतेजाः स्वयम्भुवः || 105 ||

ऊर्ध्वगात्मा पशुपतिर्वातरंहा मनोजवः |
चन्दनी पद्ममालाऽग्\{\}र्यः सुरभ्युत्तरणो नरः || 106 ||

कर्णिकार महास्रग्वी नीलमौलिः पिनाकधृकः |
उमापतिरुमाकान्तो जाह्नवी धृगुमाधवः || 107 ||

वरो वराहो वरदो वरेशः सुमहास्वनः |
महाप्रसादो दमनः शत्रुहा श्वेतपिङ्गलः || 108 ||

प्रीतात्मा प्रयतात्मा च संयतात्मा प्रधानधृकः |
सर्वपार्श्व सुतस्तार्क्श्यो धर्मसाधारणो वरः || 109 ||

चराचरात्मा सूक्श्मात्मा सुवृषो गो वृषेश्वरः |
साध्यर्षिर्वसुरादित्यो विवस्वानः सविताऽमृतः || 110 ||

व्यासः सर्वस्य सङ्क्शेपो विस्तरः पर्ययो नयः |
ऋतुः संवत्सरो मासः पक्शः सङ्ख्या समापनः || 111 ||

कलाकाष्ठा लवोमात्रा मुहूर्तोऽहः क्शपाः क्शणाः |
विश्वक्शेत्रं प्रजाबीजं लिङ्गमाद्यस्त्वनिन्दितः || 112 ||

सदसदः व्यक्तमव्यक्तं पिता माता पितामहः |
स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्शद्वारं त्रिविष्टपमः || 113 ||

निर्वाणं ह्लादनं चैव ब्रह्मलोकः परागतिः |
देवासुरविनिर्माता देवासुरपरायणः || 114 ||

देवासुरगुरुर्देवो देवासुरनमस्कृतः |
देवासुरमहामात्रो देवासुरगणाश्रयः || 115 ||

देवासुरगणाध्यक्शो देवासुरगणाग्रणीः |
देवातिदेवो देवर्षिर्देवासुरवरप्रदः || 116 ||

देवासुरेश्वरोदेवो देवासुरमहेश्वरः |
सर्वदेवमयोऽचिन्त्यो देवताऽऽत्माऽऽत्मसम्भवः || 117 ||

उद्भिदस्त्रिक्रमो वैद्यो विरजो विरजोऽम्बरः |
ईड्यो हस्ती सुरव्याघ्रो देवसिंहो नरर्षभः || 118 ||

विबुधाग्रवरः श्रेष्ठः सर्वदेवोत्तमोत्तमः |
प्रयुक्तः शोभनो वर्जैशानः प्रभुरव्ययः || 119 ||

गुरुः कान्तो निजः सर्गः पवित्रः सर्ववाहनः |
शृङ्गी शृङ्गप्रियो बभ्रू राजराजो निरामयः || 120 ||

अभिरामः सुरगणो विरामः सर्वसाधनः |
ललाटाक्शो विश्वदेहो हरिणो ब्रह्मवर्चसः || 121 ||

स्थावराणाम्पतिश्चैव नियमेन्द्रियवर्धनः |
सिद्धार्थः सर्वभूतार्थोऽचिन्त्यः सत्यव्रतः शुचिः || 122 ||

व्रताधिपः परं ब्रह्म मुक्तानां परमागतिः |
विमुक्तो मुक्ततेजाश्च श्रीमानः श्रीवर्धनो जगतः || 123 ||

श्रीमानः श्रीवर्धनो जगतः ॐ नम इति

इति श्री महाभारते अनुशासन पर्वे

||श्री शिव सहस्रनाम स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ||
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29/03/2022

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🌹🙏श्री बजरंग बाण का पाठ🙏🌹
निश्चय प्रेम प्रतीति ते, बिनय करैं सनमान।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥

चौपाई :
जय हनुमंत संत हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥

जन के काज बिलंब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै॥

जैसे कूदि सिंधु महिपारा। सुरसा बदन पैठि बिस्तारा॥

आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुरलोका॥

जाय बिभीषन को सुख दीन्हा। सीता निरखि परमपद लीन्हा॥

बाग उजारि सिंधु महँ बोरा। अति आतुर जमकातर तोरा॥

अक्षय कुमार मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा॥

लाह समान लंक जरि गई। जय जय धुनि सुरपुर नभ भई॥

अब बिलंब केहि कारन स्वामी। कृपा करहु उर अंतरयामी॥

जय जय लखन प्रान के दाता। आतुर ह्वै दुख करहु निपाता॥

जै हनुमान जयति बल-सागर। सुर-समूह-समरथ भट-नागर॥

ॐ हनु हनु हनु हनुमंत हठीले। बैरिहि मारु बज्र की कीले॥

ॐ ह्नीं ह्नीं ह्नीं हनुमंत कपीसा। ॐ हुं हुं हुं हनु अरि उर सीसा॥

जय अंजनि कुमार बलवंता। शंकरसुवन बीर हनुमंता॥

बदन कराल काल-कुल-घालक। राम सहाय सदा प्रतिपालक॥

भूत, प्रेत, पिसाच निसाचर। अगिन बेताल काल मारी मर॥

इन्हें मारु, तोहि सपथ राम की। राखु नाथ मरजाद नाम की॥

सत्य होहु हरि सपथ पाइ कै। राम दूत धरु मारु धाइ कै॥

जय जय जय हनुमंत अगाधा। दुख पावत जन केहि अपराधा॥

पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत कछु दास तुम्हारा॥

बन उपबन मग गिरि गृह माहीं। तुम्हरे बल हौं डरपत नाहीं॥

जनकसुता हरि दास कहावौ। ताकी सपथ बिलंब न लावौ॥

जै जै जै धुनि होत अकासा। सुमिरत होय दुसह दुख नासा॥

चरन पकरि, कर जोरि मनावौं। यहि औसर अब केहि गोहरावौं॥

उठु, उठु, चलु, तोहि राम दुहाई। पायँ परौं, कर जोरि मनाई॥

ॐ चं चं चं चं चपल चलंता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता॥

ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराने खल-दल॥

अपने जन को तुरत उबारौ। सुमिरत होय आनंद हमारौ॥

यह बजरंग-बाण जेहि मारै। ताहि कहौ फिरि कवन उबारै॥

पाठ करै बजरंग-बाण की। हनुमत रक्षा करै प्रान की॥

यह बजरंग बाण जो जापैं। तासों भूत-प्रेत सब कापैं॥

धूप देय जो जपै हमेसा। ताके तन नहिं रहै कलेसा॥



दोहा :

उर प्रतीति दृढ़, सरन ह्वै, पाठ करै धरि ध्यान।

बाधा सब हर, करैं सब काम सफल हनुमान॥
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🙏🌹|| श्री शिव सहस्रनाम स्तोत्रम् ||🌹🙏
ॐ स्थिरः स्थाणुः प्रभुर्भानुः प्रवरो वरदो वरः |
सर्वात्मा सर्वविख्यातः सर्वः सर्वकरो भवः || 1 ||

जटी चर्मी शिखण्डी च सर्वाङ्गः सर्वाङ्गः सर्वभावनः |
हरिश्च हरिणाक्शश्च सर्वभूतहरः प्रभुः || 2 ||

प्रवृत्तिश्च निवृत्तिश्च नियतः शाश्वतो ध्रुवः |
श्मशानचारी भगवानः खचरो गोचरोऽर्दनः || 3 ||

अभिवाद्यो महाकर्मा तपस्वी भूत भावनः |
उन्मत्तवेषप्रच्छन्नः सर्वलोकप्रजापतिः || 4 ||

महारूपो महाकायो वृषरूपो महायशाः |
महाऽऽत्मा सर्वभूतश्च विरूपो वामनो मनुः || 5 ||

लोकपालोऽन्तर्हितात्मा प्रसादो हयगर्दभिः |
पवित्रश्च महांश्चैव नियमो नियमाश्रयः || 6 ||

सर्वकर्मा स्वयम्भूश्चादिरादिकरो निधिः |
सहस्राक्शो विरूपाक्शः सोमो नक्शत्रसाधकः || 7 ||

चन्द्रः सूर्यः गतिः केतुर्ग्रहो ग्रहपतिर्वरः |
अद्रिरद्\{\}र्यालयः कर्ता मृगबाणार्पणोऽनघः || 8 ||

महातपा घोर तपाऽदीनो दीनसाधकः |
संवत्सरकरो मन्त्रः प्रमाणं परमं तपः || 9 ||

योगी योज्यो महाबीजो महारेता महातपाः |
सुवर्णरेताः सर्वघ्Yअः सुबीजो वृषवाहनः || 10 ||

दशबाहुस्त्वनिमिषो नीलकण्ठ उमापतिः |
विश्वरूपः स्वयं श्रेष्ठो बलवीरोऽबलोगणः || 11 ||

गणकर्ता गणपतिर्दिग्वासाः काम एव च |
पवित्रं परमं मन्त्रः सर्वभाव करो हरः || 12 ||

कमण्डलुधरो धन्वी बाणहस्तः कपालवानः |
अशनी शतघ्नी खड्गी पट्टिशी चायुधी महानः || 13 ||

स्रुवहस्तः सुरूपश्च तेजस्तेजस्करो निधिः |
उष्णिषी च सुवक्त्रश्चोदग्रो विनतस्तथा || 14 ||

दीर्घश्च हरिकेशश्च सुतीर्थः कृष्ण एव च |
सृगाल रूपः सर्वार्थो मुण्डः कुण्डी कमण्डलुः || 15 ||

अजश्च मृगरूपश्च गन्धधारी कपर्द्यपि |
उर्ध्वरेतोर्ध्वलिङ्ग उर्ध्वशायी नभस्तलः || 16 ||

त्रिजटैश्चीरवासाश्च रुद्रः सेनापतिर्विभुः |
अहश्चरोऽथ नक्तं च तिग्ममन्युः सुवर्चसः || 17 ||

गजहा दैत्यहा लोको लोकधाता गुणाकरः |
सिंहशार्दूलरूपश्च आर्द्रचर्माम्बरावृतः || 18 ||

कालयोगी महानादः सर्ववासश्चतुष्पथः |
निशाचरः प्रेतचारी भूतचारी महेश्वरः || 19 ||

बहुभूतो बहुधनः सर्वाधारोऽमितो गतिः |
नृत्यप्रियो नित्यनर्तो नर्तकः सर्वलासकः || 20 ||

घोरो महातपाः पाशो नित्यो गिरि चरो नभः |
सहस्रहस्तो विजयो व्यवसायो ह्यनिन्दितः || 21 ||

अमर्षणो मर्षणात्मा यघ्Yअहा कामनाशनः |
दक्शयघ्Yआपहारी च सुसहो मध्यमस्तथा || 22 ||

तेजोऽपहारी बलहा मुदितोऽर्थोऽजितो वरः |
गम्भीरघोषो गम्भीरो गम्भीर बलवाहनः || 23 ||

न्यग्रोधरूपो न्यग्रोधो वृक्शकर्णस्थितिर्विभुः |
सुदीक्श्णदशनश्चैव महाकायो महाननः || 24 ||

विष्वक्सेनो हरिर्यघ्Yअः संयुगापीडवाहनः |
तीक्श्ण तापश्च हर्यश्वः सहायः कर्मकालवितः || 25 ||

विष्णुप्रसादितो यघ्Yअः समुद्रो वडवामुखः |
हुताशनसहायश्च प्रशान्तात्मा हुताशनः || 26 ||

उग्रतेजा महातेजा जयो विजयकालवितः |
ज्योतिषामयनं सिद्धिः सन्धिर्विग्रह एव च || 27 ||

शिखी दण्डी जटी ज्वाली मूर्तिजो मूर्धगो बली |
वैणवी पणवी ताली कालः कालकटङ्कटः || 28 ||

नक्शत्रविग्रह विधिर्गुणवृद्धिर्लयोऽगमः |
प्रजापतिर्दिशा बाहुर्विभागः सर्वतोमुखः || 29 ||

विमोचनः सुरगणो हिरण्यकवचोद्भवः |
मेढ्रजो बलचारी च महाचारी स्तुतस्तथा || 30 ||

सर्वतूर्य निनादी च सर्ववाद्यपरिग्रहः |
व्यालरूपो बिलावासी हेममाली तरङ्गवितः || 31 ||

त्रिदशस्त्रिकालधृकः कर्म सर्वबन्धविमोचनः |
बन्धनस्त्वासुरेन्द्राणां युधि शत्रुविनाशनः || 32 ||

साङ्ख्यप्रसादो सुर्वासाः सर्वसाधुनिषेवितः |
प्रस्कन्दनो विभागश्चातुल्यो यघ्Yअभागवितः || 33 ||

सर्वावासः सर्वचारी दुर्वासा वासवोऽमरः |
हेमो हेमकरो यघ्Yअः सर्वधारी धरोत्तमः || 34 ||

लोहिताक्शो महाऽक्शश्च विजयाक्शो विशारदः |
सङ्ग्रहो निग्रहः कर्ता सर्पचीरनिवासनः || 35 ||

मुख्योऽमुख्यश्च देहश्च देह ऋद्धिः सर्वकामदः |
सर्वकामप्रसादश्च सुबलो बलरूपधृकः || 36 ||

सर्वकामवरश्चैव सर्वदः सर्वतोमुखः |
आकाशनिधिरूपश्च निपाती उरगः खगः || 37 ||

रौद्ररूपोंऽशुरादित्यो वसुरश्मिः सुवर्चसी |
वसुवेगो महावेगो मनोवेगो निशाचरः || 38 ||

सर्वावासी श्रियावासी उपदेशकरो हरः |
मुनिरात्म पतिर्लोके सम्भोज्यश्च सहस्रदः || 39 ||

पक्शी च पक्शिरूपी चातिदीप्तो विशाम्पतिः |
उन्मादो मदनाकारो अर्थार्थकर रोमशः || 40 ||

वामदेवश्च वामश्च प्राग्दक्शिणश्च वामनः |
सिद्धयोगापहारी च सिद्धः सर्वार्थसाधकः || 41 ||

भिक्शुश्च भिक्शुरूपश्च विषाणी मृदुरव्ययः |
महासेनो विशाखश्च षष्टिभागो गवाम्पतिः || 42 ||

वज्रहस्तश्च विष्कम्भी चमूस्तम्भनैव च |
ऋतुरृतु करः कालो मधुर्मधुकरोऽचलः || 43 ||

वानस्पत्यो वाजसेनो नित्यमाश्रमपूजितः |
ब्रह्मचारी लोकचारी सर्वचारी सुचारवितः || 44 ||

ईशान ईश्वरः कालो निशाचारी पिनाकधृकः |
निमित्तस्थो निमित्तं च नन्दिर्नन्दिकरो हरिः || 45 ||

नन्दीश्वरश्च नन्दी च नन्दनो नन्दिवर्धनः |
भगस्याक्शि निहन्ता च कालो ब्रह्मविदांवरः || 46 ||

चतुर्मुखो महालिङ्गश्चारुलिङ्गस्तथैव च |
लिङ्गाध्यक्शः सुराध्यक्शो लोकाध्यक्शो युगावहः || 47 ||

बीजाध्यक्शो बीजकर्ताऽध्यात्मानुगतो बलः |
इतिहास करः कल्पो गौतमोऽथ जलेश्वरः || 48 ||

दम्भो ह्यदम्भो वैदम्भो वैश्यो वश्यकरः कविः |
लोक कर्ता पशु पतिर्महाकर्ता महौषधिः || 49 ||

अक्शरं परमं ब्रह्म बलवानः शक्र एव च |
नीतिर्ह्यनीतिः शुद्धात्मा शुद्धो मान्यो मनोगतिः || 50 ||

बहुप्रसादः स्वपनो दर्पणोऽथ त्वमित्रजितः |
वेदकारः सूत्रकारो विद्वानः समरमर्दनः || 51 ||

महामेघनिवासी च महाघोरो वशीकरः |
अग्निज्वालो महाज्वालो अतिधूम्रो हुतो हविः || 52 ||

वृषणः शङ्करो नित्यो वर्चस्वी धूमकेतनः |
नीलस्तथाऽङ्गलुब्धश्च शोभनो निरवग्रहः || 53 ||

स्वस्तिदः स्वस्तिभावश्च भागी भागकरो लघुः |
उत्सङ्गश्च महाङ्गश्च महागर्भः परो युवा || 54 ||

कृष्णवर्णः सुवर्णश्चेन्द्रियः सर्वदेहिनामः |
महापादो महाहस्तो महाकायो महायशाः || 55 ||

महामूर्धा महामात्रो महानेत्रो दिगालयः |
महादन्तो महाकर्णो महामेढ्रो महाहनुः || 56 ||

महानासो महाकम्बुर्महाग्रीवः श्मशानधृकः |
महावक्शा महोरस्को अन्तरात्मा मृगालयः || 57 ||

लम्बनो लम्बितोष्ठश्च महामायः पयोनिधिः |
महादन्तो महादंष्ट्रो महाजिह्वो महामुखः || 58 ||

महानखो महारोमा महाकेशो महाजटः |
असपत्नः प्रसादश्च प्रत्ययो गिरि साधनः || 59 ||

स्नेहनोऽस्नेहनश्चैवाजितश्च महामुनिः |
वृक्शाकारो वृक्श केतुरनलो वायुवाहनः || 60 ||

मण्डली मेरुधामा च देवदानवदर्पहा |
अथर्वशीर्षः सामास्य ऋकःसहस्रामितेक्शणः || 61 ||

यजुः पाद भुजो गुह्यः प्रकाशो जङ्गमस्तथा |
अमोघार्थः प्रसादश्चाभिगम्यः सुदर्शनः || 62 ||

उपहारप्रियः शर्वः कनकः काझ्ण्चनः स्थिरः |
नाभिर्नन्दिकरो भाव्यः पुष्करस्थपतिः स्थिरः || 63 ||

द्वादशस्त्रासनश्चाद्यो यघ्Yओ यघ्Yअसमाहितः |
नक्तं कलिश्च कालश्च मकरः कालपूजितः || 64 ||

सगणो गण कारश्च भूत भावन सारथिः |
भस्मशायी भस्मगोप्ता भस्मभूतस्तरुर्गणः || 65 ||

अगणश्चैव लोपश्च महाऽऽत्मा सर्वपूजितः |
शङ्कुस्त्रिशङ्कुः सम्पन्नः शुचिर्भूतनिषेवितः || 66 ||

आश्रमस्थः कपोतस्थो विश्वकर्मापतिर्वरः |
शाखो विशाखस्ताम्रोष्ठो ह्यमुजालः सुनिश्चयः || 67 ||

कपिलोऽकपिलः शूरायुश्चैव परोऽपरः |
गन्धर्वो ह्यदितिस्तार्क्श्यः सुविघ्Yएयः सुसारथिः || 68 ||

परश्वधायुधो देवार्थ कारी सुबान्धवः |
तुम्बवीणी महाकोपोर्ध्वरेता जलेशयः || 69 ||

उग्रो वंशकरो वंशो वंशनादो ह्यनिन्दितः |
सर्वाङ्गरूपो मायावी सुहृदो ह्यनिलोऽनलः || 70 ||

बन्धनो बन्धकर्ता च सुबन्धनविमोचनः |
सयघ्Yआरिः सकामारिः महादंष्ट्रो महाऽऽयुधः || 71 ||

बाहुस्त्वनिन्दितः शर्वः शङ्करः शङ्करोऽधनः |
अमरेशो महादेवो विश्वदेवः सुरारिहा || 72 ||

अहिर्बुध्नो निरृतिश्च चेकितानो हरिस्तथा |
अजैकपाच्च कापाली त्रिशङ्कुरजितः शिवः || 73 ||

धन्वन्तरिर्धूमकेतुः स्कन्दो वैश्रवणस्तथा |
धाता शक्रश्च विष्णुश्च मित्रस्त्वष्टा ध्रुवो धरः || 74 ||

प्रभावः सर्वगो वायुरर्यमा सविता रविः |
उदग्रश्च विधाता च मान्धाता भूत भावनः || 75 ||

रतितीर्थश्च वाग्मी च सर्वकामगुणावहः |
पद्मगर्भो महागर्भश्चन्द्रवक्त्रोमनोरमः || 76 ||

बलवांश्चोपशान्तश्च पुराणः पुण्यचझ्ण्चुरी |
कुरुकर्ता कालरूपी कुरुभूतो महेश्वरः || 77 ||

सर्वाशयो दर्भशायी सर्वेषां प्राणिनाम्पतिः |
देवदेवः मुखोऽसक्तः सदसतः सर्वरत्नवितः || 78 ||

कैलास शिखरावासी हिमवदः गिरिसंश्रयः |
कूलहारी कूलकर्ता बहुविद्यो बहुप्रदः || 79 ||

वणिजो वर्धनो वृक्शो नकुलश्चन्दनश्छदः |
सारग्रीवो महाजत्रु रलोलश्च महौषधः || 80 ||

सिद्धार्थकारी सिद्धार्थश्चन्दो व्याकरणोत्तरः |
सिंहनादः सिंहदंष्ट्रः सिंहगः सिंहवाहनः || 81 ||

प्रभावात्मा जगत्कालस्थालो लोकहितस्तरुः |
सारङ्गो नवचक्राङ्गः केतुमाली सभावनः || 82 ||

भूतालयो भूतपतिरहोरात्रमनिन्दितः || 83 ||

वाहिता सर्वभूतानां निलयश्च विभुर्भवः |
अमोघः संयतो ह्यश्वो भोजनः प्राणधारणः || 84 ||

धृतिमानः मतिमानः दक्शः सत्कृतश्च युगाधिपः |
गोपालिर्गोपतिर्ग्रामो गोचर्मवसनो हरः || 85 ||

हिरण्यबाहुश्च तथा गुहापालः प्रवेशिनामः |
प्रतिष्ठायी महाहर्षो जितकामो जितेन्द्रियः || 86 ||

गान्धारश्च सुरालश्च तपः कर्म रतिर्धनुः |
महागीतो महानृत्तोह्यप्सरोगणसेवितः || 87 ||

महाकेतुर्धनुर्धातुर्नैक सानुचरश्चलः |
आवेदनीय आवेशः सर्वगन्धसुखावहः || 88 ||

तोरणस्तारणो वायुः परिधावति चैकतः |
संयोगो वर्धनो वृद्धो महावृद्धो गणाधिपः || 89 ||

नित्यात्मसहायश्च देवासुरपतिः पतिः |
युक्तश्च युक्तबाहुश्च द्विविधश्च सुपर्वणः || 90 ||

आषाढश्च सुषाडश्च ध्रुवो हरि हणो हरः |
वपुरावर्तमानेभ्यो वसुश्रेष्ठो महापथः || 91 ||

शिरोहारी विमर्शश्च सर्वलक्शण भूषितः |
अक्शश्च रथ योगी च सर्वयोगी महाबलः || 92 ||

समाम्नायोऽसमाम्नायस्तीर्थदेवो महारथः |
निर्जीवो जीवनो मन्त्रः शुभाक्शो बहुकर्कशः || 93 ||

रत्न प्रभूतो रक्ताङ्गो महाऽर्णवनिपानवितः |
मूलो विशालो ह्यमृतो व्यक्ताव्यक्तस्तपो निधिः || 94 ||

आरोहणो निरोहश्च शलहारी महातपाः |
सेनाकल्पो महाकल्पो युगायुग करो हरिः || 95 ||

युगरूपो महारूपो पवनो गहनो नगः |
न्याय निर्वापणः पादः पण्डितो ह्यचलोपमः || 96 ||

बहुमालो महामालः सुमालो बहुलोचनः |
विस्तारो लवणः कूपः कुसुमः सफलोदयः || 97 ||

वृषभो वृषभाङ्काङ्गो मणि बिल्वो जटाधरः |
इन्दुर्विसर्वः सुमुखः सुरः सर्वायुधः सहः || 98 ||

निवेदनः सुधाजातः सुगन्धारो महाधनुः |
गन्धमाली च भगवानः उत्थानः सर्वकर्मणामः || 99 ||

मन्थानो बहुलो बाहुः सकलः सर्वलोचनः |
तरस्ताली करस्ताली ऊर्ध्व संहननो वहः || 100 ||

छत्रं सुच्छत्रो विख्यातः सर्वलोकाश्रयो महानः |
मुण्डो विरूपो विकृतो दण्डि मुण्डो विकुर्वणः || 101 ||

हर्यक्शः ककुभो वज्री दीप्तजिह्वः सहस्रपातः |
सहस्रमूर्धा देवेन्द्रः सर्वदेवमयो गुरुः || 102 ||

सहस्रबाहुः सर्वाङ्गः शरण्यः सर्वलोककृतः |
पवित्रं त्रिमधुर्मन्त्रः कनिष्ठः कृष्णपिङ्गलः || 103 ||

ब्रह्मदण्डविनिर्माता शतघ्नी शतपाशधृकः |
पद्मगर्भो महागर्भो ब्रह्मगर्भो जलोद्भवः || 104 ||

गभस्तिर्ब्रह्मकृदः ब्रह्मा ब्रह्मविदः ब्राह्मणो गतिः |
अनन्तरूपो नैकात्मा तिग्मतेजाः स्वयम्भुवः || 105 ||

ऊर्ध्वगात्मा पशुपतिर्वातरंहा मनोजवः |
चन्दनी पद्ममालाऽग्\{\}र्यः सुरभ्युत्तरणो नरः || 106 ||

कर्णिकार महास्रग्वी नीलमौलिः पिनाकधृकः |
उमापतिरुमाकान्तो जाह्नवी धृगुमाधवः || 107 ||

वरो वराहो वरदो वरेशः सुमहास्वनः |
महाप्रसादो दमनः शत्रुहा श्वेतपिङ्गलः || 108 ||

प्रीतात्मा प्रयतात्मा च संयतात्मा प्रधानधृकः |
सर्वपार्श्व सुतस्तार्क्श्यो धर्मसाधारणो वरः || 109 ||

चराचरात्मा सूक्श्मात्मा सुवृषो गो वृषेश्वरः |
साध्यर्षिर्वसुरादित्यो विवस्वानः सविताऽमृतः || 110 ||

व्यासः सर्वस्य सङ्क्शेपो विस्तरः पर्ययो नयः |
ऋतुः संवत्सरो मासः पक्शः सङ्ख्या समापनः || 111 ||

कलाकाष्ठा लवोमात्रा मुहूर्तोऽहः क्शपाः क्शणाः |
विश्वक्शेत्रं प्रजाबीजं लिङ्गमाद्यस्त्वनिन्दितः || 112 ||

सदसदः व्यक्तमव्यक्तं पिता माता पितामहः |
स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्शद्वारं त्रिविष्टपमः || 113 ||

निर्वाणं ह्लादनं चैव ब्रह्मलोकः परागतिः |
देवासुरविनिर्माता देवासुरपरायणः || 114 ||

देवासुरगुरुर्देवो देवासुरनमस्कृतः |
देवासुरमहामात्रो देवासुरगणाश्रयः || 115 ||

देवासुरगणाध्यक्शो देवासुरगणाग्रणीः |
देवातिदेवो देवर्षिर्देवासुरवरप्रदः || 116 ||

देवासुरेश्वरोदेवो देवासुरमहेश्वरः |
सर्वदेवमयोऽचिन्त्यो देवताऽऽत्माऽऽत्मसम्भवः || 117 ||

उद्भिदस्त्रिक्रमो वैद्यो विरजो विरजोऽम्बरः |
ईड्यो हस्ती सुरव्याघ्रो देवसिंहो नरर्षभः || 118 ||

विबुधाग्रवरः श्रेष्ठः सर्वदेवोत्तमोत्तमः |
प्रयुक्तः शोभनो वर्जैशानः प्रभुरव्ययः || 119 ||

गुरुः कान्तो निजः सर्गः पवित्रः सर्ववाहनः |
शृङ्गी शृङ्गप्रियो बभ्रू राजराजो निरामयः || 120 ||

अभिरामः सुरगणो विरामः सर्वसाधनः |
ललाटाक्शो विश्वदेहो हरिणो ब्रह्मवर्चसः || 121 ||

स्थावराणाम्पतिश्चैव नियमेन्द्रियवर्धनः |
सिद्धार्थः सर्वभूतार्थोऽचिन्त्यः सत्यव्रतः शुचिः || 122 ||

व्रताधिपः परं ब्रह्म मुक्तानां परमागतिः |
विमुक्तो मुक्ततेजाश्च श्रीमानः श्रीवर्धनो जगतः || 123 ||

श्रीमानः श्रीवर्धनो जगतः ॐ नम इति

इति श्री महाभारते अनुशासन पर्वे

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