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13/12/2025

प्रथम ज्योतिर्लिंग श्री सोमनाथ महादेव के दिव्य दर्शन🙏🚩
आज दिनांक 13 दिसम्बर 2025

27/10/2025

छठ महापर्व हमारा इमोशन है।

महादेव की कृपा से आज मैने अपनी द्वादश ज्योतिर्लिंग की यात्रा के क्रम में आठवां ज्योर्तिलिंग श्री घृष्णेश्वर महादेव ज्योत...
25/09/2024

महादेव की कृपा से आज मैने अपनी द्वादश ज्योतिर्लिंग की यात्रा के क्रम में आठवां ज्योर्तिलिंग श्री घृष्णेश्वर महादेव ज्योतिर्लिंग🚩 के दर्शन पूरे किए।

श्री घृष्णेश्वर या श्री घुश्मेश्वर ज्योर्तिलिंग एक स्वयंभू शिवलिंग है जो ज्योर्तिलिंग के रूप में स्थित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, पुराने समय में सुधर्मा नाम का एक ब्राह्मण था उसकी पत्नी का नाम सुदेहा था। उनकी कोई संतान नहीं थी। इसलिए सुदेहा ने सुधर्मा का विवाह अपनी बहन घुष्मा से करवा दिया था। घुष्मा शिव भक्त थी और शिवजी की कृपा से उसे एक पुत्र को प्राप्ति हुई थी। परंतु बाद में सुदेहा को अपनी बहन से जलन होने लगी। इसी जलन की वजह से उसने अपनी बहन के बेटे की हत्या कर दी और उसको एक कुंड में डाल दिया। यह बात जब घुष्मा को पता चली तो वो दुखी हुए बिना शिवजी की पूजा करने लगी। शिवजी इससे प्रसन्न होकर प्रकट हुए और उसके पुत्र को जीवित लौटा दिया। घुश्मा ने शिवजी से प्रार्थना की वो यहीं विराजमान हो जाए। शिवजी ने उसकी बात मानकर ज्योति रूप में यही विराजमान हो गए। शिवभक्त घुश्मा के आराध्य होने के कारण ही इनका नाम घुश्मेश्वर महादेव पड़ा। इसे घृष्णेश्वर के नाम से भी जाना जाता है।

महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजी नगर जिले के वेरुल के पास श्री घृष्णेश्वर ज्योर्तिलिंग स्थित है। यहां पास में ही एलोरा की गुफाएं हैं।

इस मंदिर में फोन ले जाना अलाउड नही है। आपको यहां पर शिवजी के गर्भगृह में जाने का मौका मिलता है। गर्भ गृह में जाने के लिए पुरुषों को शरीर के ऊपरी भाग में कोई भी वस्त्र नही पहनना होता है। महिलाओं के लिए ऐसा नियम नही है। आप शिवलिंग को स्पर्श कर सकते हैं और अभिषेक कर सकते हैं। पितृ पक्ष के दौरान भीड़ काफी कम थी तो मैने लगभग आधे घंटे में दर्शन पूरे कर लिए थे। वैसे इस मंदिर में शीघ्र या वीआईपी दर्शन की कोई व्यवस्था नहीं है।

शीघ्र मिलते हैं एक अगली कथा के साथ।




  श्री त्र्यंबकेश्वर महादेव के दर्शन के पश्चात सिगनापुर की यात्रा का विचार था। इस यात्रा क्रम को आगे बढ़ाते हुए, मैने अग...
24/09/2024



श्री त्र्यंबकेश्वर महादेव के दर्शन के पश्चात सिगनापुर की यात्रा का विचार था। इस यात्रा क्रम को आगे बढ़ाते हुए, मैने अगली सुबह मैने त्र्यंबकेश्वर महादेव को नमन करके प्रस्थान की आज्ञा ली। फिर वहां से शनि सिगनापुर के दर्शन को निकल पड़े थे।

सिगनापुर की यात्रा मेरे लिए थोड़ी प्रभावित करने वाली रही थी क्योंकि मैं स्वयं उस जगह को अनुभव करना चाहता था जहां कोई द्वार बंद नही होता। शनि देव के मंदिर पहुंच कर सच में अहसास हुआ कि यहां कोई दरवाजा ही नही है। कहते हैं कि जहां के राजा स्वयं शनिदेव हैं, वहां किसी की क्या हिम्मत की कोई अपराध करे। यहां रहने वाले लोग अपने घरों में ताला नही लगाते। अगर किसी ने भी यहां आकर चोरी करने का प्रयास किया तो वो इस गांव को सीमा पार नही कर पायेगा, उसके पहले शनिदेव का प्रकोप उस पर हावी हो जाता है।

यहां शनिदेव किसी मूर्ति के रूप में नही बल्कि एक काले लंबे पत्थर के रूप में विराजमान है। शनिदेव की 5 फीट 9 इंच ऊंची और 1 फीट 6 इंच चौड़ी काले पत्थर की स्वयंभू मूर्ति बिना किसी छत्र के विराजमान है। शनि सिगनापुर को शनिदेव का जन्मस्थल कहा जाता है और इस जगह पर दर्शन करके ही आप शनिदेव के दंड से बच सकते हैं।
आप शनिदेव का अभिषेक भी कर सकते है, जिसका शुल्क अभी वर्तमान में 500 रूपये है। आप शनिदेव के अभिषेक के लिए तेल बाहर से खरीद सकते है या अंदर ट्रस्ट की निर्धारित दुकान से खरीद सकते हैं।

अगले दिन की यात्रा का भाग जल्दी लिखूंगा।
(तस्वीरें 23 सितंबर 2024 की शनि सिगनापुर की हैं)



सहाद्री शीर्षे विमले वसंतमगोदावरीतीर पवित्रदेशे यध्दर्शनात् पातकनाशु नाशंप्रमाणित तं त्रयम्बकमीशमीडेकल भोलेनाथ की कृपा स...
23/09/2024

सहाद्री शीर्षे विमले वसंतम
गोदावरीतीर पवित्रदेशे
यध्दर्शनात् पातकनाशु नाशं
प्रमाणित तं त्रयम्बकमीशमीडे

कल भोलेनाथ की कृपा से मैंने अपनी 12 ज्योतिर्लिंग की यात्रा के 7वें ज्योतिर्लिंग श्री त्र्यंबकेश्वर महादेव के दर्शन पूरे किए। यह ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के नासिक जिले में ब्रह्मगिरी पर्वत के पास स्थित है। यहां पर स्थित ज्योतिर्लिंग में ब्रह्मा, विष्णु और महेश की पूजा एक साथ होती है।

नाशिक से यहां तक की दूरी लगभग 30 किमी है। यहां आने के लिए आपको नासिक रोड रेलवे स्टेशन के बाहर से ऑटो या टैक्सी मिल जायेगी। यहां से शेयरिंग टैक्सी और सीधी बस भी नासिक से उपलब्ध है। टैक्सी लगभग 1000, ऑटो का लगभग 500 रूपये लेते हैं, बस का किराया 70 रूपये का है।

गोदावरी नदी के किनारे स्थित त्र्यंबकेश्‍वर मंदिर काले पत्‍थरों से बना है। मंदिर का स्‍थापत्‍य अद्भुत है। इस मंदिर में कालसर्प शांति, त्रिपिंडी विधि और नारायण नागबलि की पूजा संपन्‍न होती है। जिन्‍हें भक्‍तजन अलग-अलग मुराद पूरी होने के लिए करवाते हैं।

यहां पर गौतम ऋषि ने तप करके शिवजी को प्रसन्न किया था और शिवजी यहां पर प्रकट हुए थे। गौतम ऋषि ने गौ हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए कठोर तप करके शिवजी से गंगा को यहां अवतरित होने का वरदान मांगा था। इसके फलस्वरूप दक्षिण की गंगा अर्थात गोदावरी का उद्गम हुआ।

तीन नेत्रों वाले शिवशंभु के यहाँ विराजमान होने के कारण इस जगह को त्र्यंबक (तीन नेत्रों वाले) कहा जाने लगा। उज्जैन और ओंकारेश्वर की ही तरह त्र्यंबकेश्वर महाराज को इस गाँव का राजा माना जाता है, इसलिए कहते हैं कि हर सोमवार को त्र्यंबकेश्वर के राजा अपनी प्रजा का हाल जानने के लिए नगर भ्रमण के लिए निकलते हैं।

इस प्राचीन मंदिर का पुनर्निर्माण तीसरे पेशवा बालाजी अर्थात नाना साहब पेशवा ने करवाया था। इस मंदिर का जीर्णोद्धार 1755 में शुरू हुआ था और 31 साल के लंबे समय के बाद 1786 में जाकर पूरा हुआ।



हरियाणा के नूह जिले में नूह टाउन से लगभग 3 किमी की दूरी पर अरावली की गोद में स्थित है, " नल्हड़ महादेव मंदिर"नल्हड़ महाद...
20/09/2024

हरियाणा के नूह जिले में नूह टाउन से लगभग 3 किमी की दूरी पर अरावली की गोद में स्थित है, " नल्हड़ महादेव मंदिर"

नल्हड़ महादेव मंदिर महाभारत काल से है और इसका भगवान कृष्ण से इस मंदिर का गहरा रिश्ता है. इस मंदिर के नाम से ही स्पष्ट होता है कि यह भगवान शिव को समर्पित है. लेकिन अब आपके मन में यह सवाल जरूर आएगा कि भगवान शिव के मंदिर से भगवान कृष्ण का आखिर क्या संबंध है?

अभी हाल ही में नूह हिंसा में चर्चा में आए नल्हड़ महादेव मंदिर का ऐतिहासिक परिचय बहुत ही अद्भुत है। पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान इसी अरावली पर्वत में कुछ समय बिताया था. यही कारण है कि इस क्षेत्र में 5000 वर्ष से ज्यादा पुराने शिवलिंग मिले हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार जब महाभारत का युद्ध चल रहा था तब भगवान कृष्ण ने कौरवों और पांडवों के बीच समझौता कराने के लिए इसी मंदिर को चुना था.

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि नल्हड़ मंदिर में स्थित कदम के पेड़ से लगातार पानी निकलता रहता है और वहां जाने के लिए 287 सीढ़ियां बनाई गई हैं. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जहां भगवान कृष्ण जिस जगह कदम रखते थे वहां अक्सर कदम का पेड़ पाया जाता है. नल्हड़ मंदिर में स्थित कदम के पेड़ की ऊंचाई 500 फीट से भी अधिक है. सदियों से इस पेड़ से पानी निकलता आ रहा है जो कि मीठा और स्वच्छ है. इस पेड़ के नीचे एक कुंडली बनाई गई है और मोटर के जरिए इससे पानी भी निकाला जाता है. मान्यता है कि इस कुंडली से कितना भी पानी निकाल लें उसकी मात्रा कभी कम नहीं होती. इसलिए लोगों के बीच इस मंदिर की विशेष मान्यता भी है. हालांकि इसका रास्ता मुख्य मंदिर परिसर से बाहर से है।

नल्हड़ महादेव मंदिर में महाशिवरात्रि के दिन भव्य मेला लगता है और शिवभक्तों की भीड़ उमड़ती है. वहीं कांवड़ यात्रा के दौरान यात्री यहां कांवड़ चढ़ाने भी आते हैं. कहते हैं कि इस मंदिर में भोलेनाथ के दर्शन करने से उनके साथ-साथ भगवान कृष्ण का भी आशीर्वाद प्राप्त होता है।

आप यहां एक बार आएंगे तो आपका बार बार आने का मन करेगा।

20/01/2024
   भीमताल (उत्तराखंड )में महाभारत के शक्तिशाली पात्र भीम के नाम पर भीमेश्वर महादेव मंदिर स्थित है। किंवदंतियों के अनुसार...
30/12/2023




भीमताल (उत्तराखंड )में महाभारत के शक्तिशाली पात्र भीम के नाम पर भीमेश्वर महादेव मंदिर स्थित है। किंवदंतियों के अनुसार यह मंदिर द्वापर युग का प्राचीन मंदिर है।

स्कंदपुराण के अनुसार, एक बार भीम ने अकेले ही हिमालय की यात्रा की। पांडवों में दूसरे नंबर पर एक शक्तिशाली व्यक्ति भीम थे। एक बार अपने अज्ञातवास के समय वे हिमालय की पर्वत श्रृंखलाओं पर चढ़ रहे थे। रास्ते में अचानक आकाश से एक दिव्य आवाज आई, जिसने उससे कहा कि यदि वह पीढ़ियों तक पहचाना जाना चाहता है, तो उसे पूरी श्रद्धा के साथ एक शिव मंदिर बनाना चाहिए। भीम एक सच्चे शिव भक्त थे, इसलिए उन्होंने उस स्थान पर पहाड़ से भगवान शिव के लिए एक मंदिर बनवाया।

कहते हैं कि भीम में 100 हाथियों की शक्ति थी। उन्होंने अपनी गदा का प्रयोग किया और पर्वत को तोड़ डाला। वहां से गंगा बहती है और गंगा का पानी बहकर एक झील बन जाती है जिसे भीमताल झील के नाम से जाना जाता है। बाद में, उन्होंने यहां शिव लिंगम का अभिषेक किया था।

आप इस मंदिर के दर्शन पूरे साल भर कर सकते हैं। इस स्थान पर पूरे वर्ष सुखद मौसम और वातावरण रहता है। लेकिन भीमेश्वर महादेव मंदिर जाने का सबसे अच्छा समय गर्मी और मानसून के मौसम के दौरान है। गर्मियों में इस जगह का तापमान बहुत ठंडा रहता है। यह स्थान भी एक बहुत ही लोकप्रिय ग्रीष्मकालीन अवकाश स्थल है। भीमताल का तापमान 15 डिग्री से 29 डिग्री तक रहता है। मानसून के मौसम में पूरा क्षेत्र हरियाली से ढक जाता है और प्रकृति प्रेमियों को एक अद्भुत प्राकृतिक दृश्य प्रदान करता है।

तस्वीरें, दिसंबर 2023 की भीमेश्वर महादेव मंदिर की ही हैं।

माननीय महामहिम सनातन  श्री मनोज सिन्हा जी की पहल से BRO की टीम न इतिहास में पहली बार अमरनाथ की गुफा के पास रोड बनाने के ...
29/10/2023

माननीय महामहिम सनातन श्री मनोज सिन्हा जी की पहल से BRO की टीम न इतिहास में पहली बार अमरनाथ की गुफा के पास रोड बनाने के लिए बड़ी मशीन और जीप डंपर लेकर पहुंची हैं। BRO को शामिल करने का उद्देश्य यात्रियों के लिए सुखद रास्ते का निर्माण करना है, ताकि आने वाले समय में सभी शिव भक्तों के लिए यात्रा को सुलभ बनाया जाए।


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