02/02/2026
कहा जाता है कि एक बार नीमकरौली महाराज जी सरयू नदी के तट से होकर यात्रा कर रहे थे।
उस समय सरयू का प्रवाह तेज था और ठंड भी काफी थी। नदी के किनारे एक गरीब वृद्ध बैठा काँप रहा था उसके पास न वस्त्र थे, न भोजन। लोग उसे देखकर भी आगे बढ़ जाते थे।
महाराज जी ने जैसे ही उस वृद्ध को देखा, तुरंत रुक गए। उन्होंने अपने साथ चल रहे शिष्यों से कहा, देखो,भगवान यहाँ ठिठुर रहे हैं।
शिष्य असमंजस में पड़ गए। किसी ने कहा, महाराज, यह तो साधारण व्यक्ति है।
महाराज जी मुस्कुराए और बोले, जो हर प्राणी में राम को नहीं देखता, वह राम को कैसे पाएगा महाराज जी ने अपने ही कंबल उस वृद्ध को ओढ़ा दिए और शिष्यों से भोजन मँगवाकर उसे खिलाया।
कहते हैं, जैसे ही वृद्ध ने भोजन किया और कंबल ओढ़ा,उसके चेहरे पर अद्भुत तेज़ आ गया। कुछ ही क्षणों में वह व्यक्ति अदृश्य हो गया।
शिष्य घबरा गए। तब महाराज जी ने शांत स्वर में कहा, सरयू के तट पर राम की लीला सदा चलती रहती है।
करुणा ही सबसे बड़ा चमत्कार है। उस दिन के बाद शिष्यों ने देखा कि सरयू तट पर ध्यान करने से महाराज जी की भक्ति और भी गहरी हो जाती थी।
वे कहा करते थे, सरयू माँ के जल में राम नाम बहता है।
महाराज जी यह कहते थे कि सेवा, करुणा और प्रेम यही सच्ची साधना है। तीर्थ स्थानों का महत्व तभी है जब वहाँ जाकर हमारा हृदय कोमल हो