29/06/2026
🌷🌷 श्रीराधाकवचम् हिन्दी अर्थ सहित 🌷
🔶🔶🔶 नारद पांचरात्रांर्गत 🔶🔶🔶🔶
श्रीगणेशाय नमः ।
🍁पार्वत्युवाच
कैलासिअवासिन् भगवन् भक्तानुग्रहकारक ।
राधिकाकवचं पुण्यं कथयस्व मम प्रभो ॥ १॥
पार्वती जी ने कहा- हे कैलाश वासिन! भक्तों पर अनुग्रह करने वाले हे प्रभु । श्री राधिका जी का पवित्र कवच मुझको सुनाओ।(1)
🍁यद्यस्ति करुणा नाथ त्राहि मां दुःखतो भयात् ।
त्वमेव शरणं नाथ शूलपाणे पिनाकधृक् ॥ २॥
हे त्रिशूल और धनुष धारण करने वाले नाथ! मैं आपकी शरण में हूं, यदि मुझ पर पूर्ण कृपा है तो दुख के भय से मेरी रक्षा कीजिए(2)
🍁शिव उवाच
शृणुष्व गिरिजे तुभ्यं कवचं पूर्वसूचितम् ।
सर्वरक्षाकरं पुण्यं सर्वहत्याहरं परम् ॥ ३॥
श्री शिवजी बोले- हे गिरिराज कुमारी सुनो! यह वह प्राचीन कवच तुमको सुना रहा हूं जो बड़ा पवित्र है। संपूर्ण पापों को हरने वाला है और सब प्रकार से रक्षा करने वाला है।(3)
🍁हरिभक्तिप्रदं साक्षाद्भुक्तिमुक्तिप्रसाधनम् ।
त्रैलोक्याकर्षणं देवि हरिसान्निध्यकारकम् ॥ ४॥
सुख भोग और मोक्ष का साधन एवं श्री श्याम सुंदर की भक्ति को देने वाला है । हे देवी यह कवच त्रिलोकी का आकर्षण कर सकता है और साधक को प्रभु की सन्नधि में पहुंचा देता है।(4)
🍁सर्वत्र जयदं देवि सर्वशत्रुभयावहम् ।
सर्वेषां चैव भूतानां मनोवृत्तिहरं परम् ॥ ५॥
यह सभी शत्रु को डराने वाला, सर्वत्र विजय प्राप्त कराने वाला और सभी प्राणियों की मनोवृति यों को हराने वाला है। (5)
🍁चतुर्धा मुक्तिजनकं सदानन्दकरं परम् ।
राजसूयाश्वमेधानां यज्ञानां फलदायकम् ॥ ६॥
इस कवच के पढ़ने से सदा ही आनंद रहता है। सालोंक्य सृष्टि सामीप्य ,सायुज्य चारों ही प्रकार की मुक्ति प्राप्त हो जाती है एवं अनेकों राजसूय और अश्वमेघ यज्ञ का फल प्राप्त होता है।(6)
🍁इदं कवचमज्ञात्वा राधामन्त्रं च यो जपेत् ।
स नाप्नोति फलं तस्य विघ्नास्तस्य पदे पदे ॥ ७॥
इस कवच के बिना यदि कोई केवल श्री राधा मंत्र को जपे तो उसे उसका फल नहीं मिलता, और पद- पद पर विघ्न बाधाएं उपस्थित होने लगती हैं ।(7)
🍁ऋषिरस्य महादेवोऽनुष्टुप् छन्दश्च कीर्तितम् ।
राधाऽस्य देवता प्रोक्ता रां बीजं कीलकं स्मृतम् ॥ ८॥
श्री राधा कवच का मैं( महादेव) ऋषि हूं ,अनुष्टुप छंद है, श्री राधा देवता है, रां बीज और रां ही कीलक है।(8)
🍁धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोगः प्रकीर्तितः ।
श्रीराधा मे शिरः पातु ललाटं राधिका तथा ॥ ९॥
धर्म, अर्थ ,काम और मोक्ष इन सब में ही इसका विनियोग किया जाता है।( कवच के मूल शब्दों का भावार्थ इस प्रकार जानना चाहिए )श्री राधा जी मेरे मस्तक और ललाट की रक्षा करें, (9)
🍁श्रीमती नेत्रयुगलं कर्णौ गोपेन्द्रनन्दिनी ।
हरिप्रिया नासिकां च भ्रूयुगं शशिशोभना ॥ १०॥
श्रीमती दोनों नेत्रों की और गोपेंद्र नंदिनी दोनों कानों की रक्षा करें और श्री हरि प्रिया जी नासिका की और शशि शोभना जी दोनों भृकुटियों की रक्षा करें ।(10)
🍁ओष्ठं पातु कृपादेवी अधरं गोपिका तथा ।
वृषभानुसुता दन्तांश्चिबुकं गोपनन्दिनी ॥ ११॥
श्री कृपादेवि ऊपर के होठ की और गोपीका जी नीचे के होंठ की रक्षा करें, ऊपर के दांतो की श्री वृषभानु सुता और ठोड़ी की श्री गोप नंदिनी जी रक्षा करें ,।
🍁चन्द्रावली पातु गण्डं जिह्वां कृष्णप्रिया तथा ।
कण्ठं पातु हरिप्राणा हृदयं विजया तथा ॥ १२॥
कपोलो (गालों) की चंद्रावली जी रक्षा करें और श्री कृष्ण प्रिया जी जीभ की रक्षा करें ।श्री हरि प्रिया कंठ की और विजया जी हृदय की रक्षा करें।(12)
🍁बाहू द्वौ चन्द्रवदना उदरं सुबलस्वसा ।
कोटियोगान्विता पातु पादौ सौभद्रिका तथा ॥ १३॥
चंद्र वदना दोनों भुजाओं की, सुवलस्वसा पेट की, योगान्वता कमर की और सौभद्रिका दोनों पैरों की रक्षा करें (13
🍁नखांश्चन्द्रमुखी पातु गुल्फौ गोपालवल्लभा ।
नखान् विधुमुखी देवी गोपी पादतलं तथा ॥ १४॥
चंद्रमुखी नखों की गोपा वल्लभा टखनों की, जया घुटनों की और गोपी सभी ओर से मेरी रक्षा करें ।(14)
🍁शुभप्रदा पातु पृष्ठं कुक्षौ श्रीकान्तवल्लभा ।
जानुदेशं जया पातु हरिणी पातु सर्वतः ॥ १५॥
शुभप्रदा पीठ की, पेट की, श्रीकांत वल्लभा जानू देश (घुटना) की ,जया और हरिणी मेरी सभी ओर से रक्षा करें।(15)
🍁वाक्यं वाणी सदा पातु धनागारं धनेश्वरी ।
पूर्वां दिशं कृष्णरता कृष्णप्राणा च पश्चिमाम् ॥ १६॥
वाणी, वचनों की रक्षा करें, धनेश्वरी खजाने की, कृष्णरता पूर्व दिशा की, और कृष्ण प्राणा पश्चिमी दिशा की रक्षा करें।(16)
🍁उत्तरां हरिता पातु दक्षिणां वृषभानुजा ।
चन्द्रावली नैशमेव दिवा क्ष्वेडितमेखला ॥ १७॥
उत्तर दिशा की हरिता ,दक्षिण दिशा के वृष भानुजा, रात्रि में चंद्रावली और क्षवेडित-मेखला दिन में रक्षा करें ।(17)
🍁सौभाग्यदा मध्यदिने सायाह्ने कामरूपिणी ।
रौद्री प्रातः पातु मां हि गोपिनी रजनीक्षये ॥ १८॥
मध्यान्ह में सौभाग्यदा , सांय में कामरुपणी, प्रातः काल में रुद्री तथा रात्रि के अवसान होने पर गोपीनी हमारी रक्षा करें।(18)
🍁हेतुदा सङ्गवे पातु केतुमाला दिवार्धके ।
शेषाऽपराह्णसमवे शमिता सर्वसन्धिषु ॥ १९॥
संगम में हेतु दा दिन वृद्धि के अवसर में केतु माला अपराह्न में हमें शेषा और संपूर्ण संधियों में शमिता रक्षा करें ।(19)
🍁योगिनी भोगसमये रतौ रतिप्रदा सदा ।
कामेशी कौतुके नित्यं योगे रत्नावली मम ॥ २०॥
उपभोग के समय योगिनी ,रती प्रदा रति के समय, योग के समय में रत्नावली और कामेशी एवं कोतुकी नित्य प्रति मेरी रक्षा करें।(20)
🍁सर्वदा सर्वकार्येषु राधिका कृष्णमानसा ।
इत्येतत्कथितं देवि कवचं परमाद्भुतम् ॥ २१॥
कृष्ण मानसा श्री राधिका जी सदा सर्वदा सब कामों में मेरी रक्षा करें ।जिन स्थलों के नामों की चर्चा नहीं की गई है उन सब की श्री ललिता जी रक्षा करें। हे देवी! यह अद्भुत कवच हमने तुम्हें सुना दिया (21)
🍁सर्वरक्षाकरं नाम महारक्षाकरं परम् ।
प्रातर्मध्याह्नसमये सायाह्ने प्रपठेद्यदि ॥ २२॥
इसका नाम है सर्व रक्षा कारक, यदि इसे कोई प्रातः मध्यान्ह और सायंकाल पढ़ता है, तो इससे बड़ी भारी रक्षा हो जाती है ।(22)
🍁सर्वार्थसिद्धिस्तस्य स्याद्यन्मनसि वर्तते ।
राजद्वारे सभायां च सङ्ग्रामे शत्रुसङ्कटे ॥ २३॥
🍁प्राणार्थनाशसमये यः पठेत्प्रयतो नरः ।
तस्य सिद्धिर्भवेद्देवि न भयं विद्यते क्वचित् ॥ २४॥
श्री राधा कवच के पढ़ने से उस साधक के मन में जैसी कामना हो वैसे ही सिद्धि हो जाती है। राजद्वार, सभा संग्राम और शत्रुओं द्वारा पहुंचाए हुए संकट के समय,
प्राण और धन विनिष्ट होने के समय, यदि मनुष्य यत्न से इसका पाठ करें ,तो हे देवी उनका कार्य सिद्ध हो जाता है और उसको कहीं भी भय नहीं रहता।(23---,24)
🍁आराधिता राधिका च तेन सत्यं न संशयः ।
गङ्गास्नानाद्धरेर्नामग्रहणाद्यत्फलं लभेत् ॥ २५॥
🍁तत्फलं तस्य भवति यः पठेत्प्रयतः शुचिः ।
हरिद्रारोचनाचन्द्रमण्डितं हरिचन्दनम् ॥ २६॥
🍁कृत्वा लिखित्वा भूर्जे च धारयेन्मस्तके भुजे ।
कण्ठे वा देवदेवेशि स हरिर्नात्र संशयः ॥ २७॥
सचमुच उसने श्री राधिका जी की आराधना कर ली, गंगा स्नान और भगवान के नाम से जो फल प्राप्त होता है
,निसंदेह वह फल इस कवच के पढ़ने वाले को मिल जाता है। हल्दी ,गोरोचन ,चंदन से भोजपत्र पर इस कवच को लिखकर जो कोई मस्तक भुजा और कंठ में बांध ले हे देव वह हरि के समान हो जाता है।(25,, 26, ,27)
🍁कवचस्य प्रसादेन ब्रह्मा सृष्टिं स्थितिं हरिः ।
संहारं चाहं नियतं करोमि कुरुते तथा ॥ २८॥
ब्रह्मा जी इस कवच के प्रसाद से सृष्टि रचते हैं और विष्णु पालन करते हैं और मैं (शंकर )इसी कवच के प्रसाद से सृष्टि का संहार करता हूं ।
🍁वैष्णवाय विशुद्धाय विरागगुणशालिने ।
दद्यात्कवचमव्यग्रमन्यथा नाशमाप्नुयात् ॥ २९॥
यह कवच विशुद्ध वैष्णव को देना चाहिए जिनमें वैराग्य आदि गुण हो, जिसकी बुद्धि व्यग्र ना हो ,नहीं तो अनाधिकारी को देने वाला स्वयं नष्ट हो जाता है। इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं करना चाहिए।(
॥ इति श्रीनारदपञ्चरात्रे ज्ञानामृतसारे राधाकवचं सम्पूर्णम् ॥
श्री राधा कवच टीका का संपूर्ण हुई...!
जय श्री राधे
@टॉप फ़ैन
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