श्रद्धा और विश्वास

श्रद्धा और विश्वास जो बाहर की सुनता है बिखर जाता है, जो अपने अंदर की सुनता है सवर जाता है, राधे राधे���

*यदि कोई व्यक्ति श्रद्धापूर्वक सेवा करता है, तो निराशा की कोई सम्भावना नहीं रहती, क्योंकि भक्त की प्रगति का भार स्वयं श्...
05/02/2026

*यदि कोई व्यक्ति श्रद्धापूर्वक सेवा करता है, तो निराशा की कोई सम्भावना नहीं रहती, क्योंकि भक्त की प्रगति का भार स्वयं श्रीभगवान् ले लेते हैं। श्रीभगवान् हर एक के हृदय में विराजमान हैं और वे भक्त के आशय को जानते हैं तथा उपलब्ध हो सकने वाली हर वस्तु की व्यवस्था करते हैं। दूसरे शब्दों में, छद्म (दिखावटी) भक्त, जो कि भौतिक लाभ पाने हेतु उत्सुक रहता है, वह सर्वोच्च पूर्ण अवस्था इसलिए प्राप्त नहीं कर सकता, क्योंकि श्रीभगवान् को उसके आशय की जानकारी रहती है। मनुष्य को अपने उद्देश्य में केवल निष्ठावान् बनने की आवश्यकता है और फिर श्रीभगवान् सभी तरह से उसकी सहायता करने हेतु वहाँ पर मौजूद रहते हैं।*

राधे राधे 🙏🙏

*शायद ही कुछ गिने चुने हिंदुओं को पता होगा....**काशी में मणिकर्णिका घाट पर चिता जब शांत हो जाती है तब मुखाग्नि देने वाला...
02/02/2026

*शायद ही कुछ गिने चुने हिंदुओं को पता होगा....*

*काशी में मणिकर्णिका घाट पर चिता जब शांत हो जाती है तब मुखाग्नि देने वाला व्यक्ति चिता भस्म पर 94 लिखता है।*

*यह सभी को नहीं मालूम है।*

*खांटी बनारसी लोग या अगल बगल के लोग ही इस परम्परा को जानते हैं। बाहर से आये शवदाहक जन इस बात को नहीं जानते।*

*जीवन के शतपथ होते हैं।*

*100 शुभ कर्मों को करने वाला व्यक्ति मरने के बाद उसी के आधार पर अगला जीवन शुभ या अशुभ प्राप्त करता है।*

*94 कर्म मनुष्य के अधीन हैं। वह इन्हें करने में समर्थ है पर 6 कर्म का परिणाम ब्रह्मा जी के अधीन होता है।*

*हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश- अपयश ये 6 कर्म विधि के नियंत्रण में होते हैं।*

*अतः आज चिता के साथ ही तुम्हारे 94 कर्म भस्म हो गये।*

*आगे के 6 कर्म अब तुम्हारे लिए नया जीवन सृजित करेंगे।*

*अतः 100 - 6 = 94 लिखा जाता है।*

*गीता में भी प्रतिपादित है कि मृत्यु के बाद मन अपने साथ 5 ज्ञानेन्द्रियों को लेकर जाता है।*

*यह संख्या 6 होती है। मन और पांच ज्ञान इन्द्रियाँ।*

*अगला जन्म किस देश में कहाँ और किन लोगों के बीच होगा यह प्रकृति के अतिरिक्त किसी को ज्ञात नहीं होता है।*

*अतः 94 कर्म भस्म हुए 6 साथ जा रहे हैं।*

*विदा यात्री।*

*तुम्हारे 6 कर्म तुम्हारे साथ हैं।*

*आपके लिए इन 100 शुभ कर्मों का विस्तृत विवरण दिया जा रहा है जो जीवन को धर्म और सत्कर्म की ओर ले जाते हैं एवं यह सूची आपके जीवन को सत्कर्म करने की प्रेरणा देगी......*

*100 शुभ कर्मों की गणना धर्म और नैतिकता के कर्म-*

1.सत्य बोलना

2.अहिंसा का पालन

3.चोरी न करना

4.लोभ से बचना

5.क्रोध पर नियंत्रण

6.क्षमा करना

7.दया भाव रखना

8.दूसरों की सहायता करना

9.दान देना (अन्न, वस्त्र, धन)

10.गुरु की सेवा

11.माता-पिता का सम्मान

12.अतिथि सत्कार

13.धर्मग्रंथों का अध्ययन

14.वेदों और शास्त्रों का पाठ

15.तीर्थ यात्रा करना

16.यज्ञ और हवन करना

17.मंदिर में पूजा-अर्चना

18.पवित्र नदियों में स्नान

19.संयम और ब्रह्मचर्य 9का पालन

20.नियमित ध्यान और योग सामाजिक और पारिवारिक कर्म

21.परिवार का पालन-पोषण

22.बच्चों को अच्छी शिक्षा देना

23.गरीबों को भोजन देना

24.रोगियों की सेवा

25.अनाथों की सहायता

26.वृद्धों का सम्मान

27.समाज में शांति स्थापना

28.झूठे वाद-विवाद से बचना

29.दूसरों की निंदा न करना

30.सत्य और न्याय का समर्थन

31.परोपकार करना

32.सामाजिक कार्यों में भाग लेना

33.पर्यावरण की रक्षा

34.वृक्षारोपण करना

35.जल संरक्षण

36.पशु-पक्षियों की रक्षा

37.सामाजिक एकता को बढ़ावा देना

38.दूसरों को प्रेरित करना

39.समाज में कमजोर वर्गों का उत्थान

40.धर्म के प्रचार में सहयोग आध्यात्मिक और व्यक्तिगत कर्म

41.नियमित जप करना

42.भगवान का स्मरण

43.प्राणायाम करना

44.आत्मचिंतन

45.मन की शुद्धि

46.इंद्रियों पर नियंत्रण

47.लालच से मुक्ति

48.मोह-माया से दूरी

49.सादा जीवन जीना

50.स्वाध्याय (आत्म-अध्ययन)

51.संतों का सान्निध्य

52.सत्संग में भाग लेना

53.भक्ति में लीन होना

54.कर्मफल भगवान को समर्पित करना

55.तृष्णा का त्याग

56.ईर्ष्या से बचना

57.शांति का प्रसार

58.आत्मविश्वास बनाए रखना

59.दूसरों के प्रति उदारता

60.सकारात्मक सोच रखना सेवा और दान के कर्म

61.भूखों को भोजन देना

62.नग्न को वस्त्र देना

63.बेघर को आश्रय देना

64.शिक्षा के लिए दान

65.चिकित्सा के लिए सहायता

66.धार्मिक स्थानों का निर्माण

67.गौ सेवा

68.पशुओं को चारा देना

69.जलाशयों की सफाई

70.रास्तों का निर्माण

71.यात्री निवास बनवाना

72.स्कूलों को सहायता

73.पुस्तकालय स्थापना

74.धार्मिक उत्सवों में सहयोग

75.गरीबों के लिए निःशुल्क भोजन

76.वस्त्र दान

77.औषधि दान

78.विद्या दान

79.कन्या दान

80.भूमि दान, नैतिक और मानवीय कर्म

81.विश्वासघात न करना

82.वचन का पालन

83.कर्तव्यनिष्ठा

84.समय की प्रतिबद्धता

85.धैर्य रखना

86.दूसरों की भावनाओं का सम्मान

87.सत्य के लिए संघर्ष

88.अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना

89.दुखियों के आँसू पोंछना

90.बच्चों को नैतिक शिक्षा

91.प्रकृति के प्रति कृतज्ञता

92.दूसरों को प्रोत्साहन

93.मन, वचन, कर्म से शुद्धता

94.जीवन में संतुलन बनाए रखना

*विधि के अधीन 6 कर्म*

95.हानि

96.लाभ

97.जीवन

98.मरण

99.यश

100.अपयश

*🙏 कोशिश करे ये सब ध्यान दे कि ये मृत्यु लोक है यहां से सबको जाना है आज नहीं को कल सब जाएंगे 🙏🌹🙏

शंका समाधान_गजराज का उद्धार और हमॐ श्री परमहंस परमानंद शिष्य स्वामी अड़गड़ानन्द जी महाराज जी की वाणी।🌹।। ॐ श्री सद्गुरुद...
13/01/2026

शंका समाधान_गजराज का उद्धार और हम
ॐ श्री परमहंस परमानंद शिष्य स्वामी अड़गड़ानन्द जी महाराज जी की वाणी।
🌹।। ॐ श्री सद्गुरुदेव भगवान की जय ।।🌹

🙏🌹विचार🌹धारा🌹अनुभव🌹🙏
🙏🌹आत्मदर्शन🔱भक्तिप्रकाश🌹🙏
🙏🌹यथार्थ गीता आत्म ज्ञान 🌹🙏

🙏🌹मन मतंग मानै नहीं, जब लगि खता न खाय।
🙏🌹जैसे विधवा नारि कोउ, गर्भ रहे पछताय ।।
महापुरुषों ने मन को कामनाओं में लिप्त, पशुवत् आचरण में प्रवृत्त, महान् उन्मादी एवं कठिनता से वश में होनेवाला देखकर एक मदमत्त हाथी की संज्ञा दी है।

गोस्वामी तुलसीदासजी ने भी कहा है-

🙏🌹मन करि बिषय अनल बन जरई।
🙏🌹होइ सुखी जौं एहिं सर परई ।।
🙏🌹🌹मानस, १/३४/८)🌹🌹🙏
मनरूपी हाथी निरन्तर विषयानल में जलता रहता है, यदि ब्रह्मरस से पूरित भक्ति के सर में पड़ जाय तो सुखी हो जाय।
यह मदान्ध मन ही पुरुष के अन्तराल में हाथी है जो भवाटवी में पड़ा हुआ है, संसार-सागर में पड़ा हुआ है, प्रार्थना कर रहा है।
असहनीय पीड़ा का रूप प्रत्यक्ष हो गया है, अब गज छुटकारा चाहता है। वह नाम-जप जानता है अतः नाम में रत है।
यदि मान लिया जाय कि वह पशु था, तब तो योगेश्वर श्रीकृष्ण और गोस्वामी तुलसीदास इत्यादि सम्पूर्ण महात्माओं की वाणी ही गलत हो जायेगी।

🙏🌹 'कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके' 🌹🙏
🙏🌹🌹(गीता, ५/२) 🌹🌹🌹
योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार मनुष्य योनि में कर्मों के अनुसार बाँधनेवाली अहंता और ममतारूपी जड़ें नीचे और ऊपर सर्वत्र फैली हैं। शेष सब योनियाँ केवल भोग भोगने की हैं। पशु इत्यादि योनियाँ पूर्ण निवृत्ति का भाजन नहीं होतीं। गोस्वामीजी ने कहा है -

🙏🌹नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो।
🙏🌹सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो ।।
🙏🌹🌹(मानस, ७/४३/७)🌹🌹🙏

🙏🌹बड़े भाग मानुष तनु पावा।
🙏🌹सुर दुर्लभ सब ग्रन्थन्हि गावा ।।
🙏🌹साधन धाम मोच्छ कर द्वारा।
🙏🌹पाइ न जेहिं परलोक सँवारा ।।
🙏🌹🌹(मानस, ७/४२/७-८)🌹🌹🙏

🙏🌹सो परत्र दुख पावइ, सिर धुनि धुनि पछताइ।
🙏🌹कालहि कर्महि ईस्वरहि, मिथ्या दोष लगाइ ।।🙏🌹 (मानस, ७/४३)🌹🙏
इस प्रकार मानव-तन ही साधन के लिए उपयुक्त है।

🙏🌹मनुज देह सुर-साधु सराहत, सो सनेह सिय पी के। (विनय०, पद १७५)🌹🙏
मनुष्य देह की सुर-साधु सराहना करते हैं; क्योंकि कल्याणकारी प्रभु के चरणों में प्रेम इसी तन में सम्भव है।
गिद्धराज, काकभुशुण्डि, वानर हनुमान, भालू जामवन्त यह सभी सन्तों के नाम हैं।
इन अनन्य भक्तों ने भजन की पूर्ति या रक्षा के लिए कुवेष बना रखा था-

🙏🌹किएहुँ कुबेषु साधु सनमानू।
🙏🌹 जिमि जग जामवन्त हनुमानू ।।
🙏🌹🌹(मानस, १/६/७)🌹🌹🙏
ये सन्त भक्ति की रक्षा के लिए ही वेश बनाकर रहते थे, पशु नहीं थे।

मगरमच्छ काल का प्रतीक है।
संसार का स्वरूप दर्शाते हुए गोस्वामीजी कहते हैं-

🙏🌹रबिकर-नीर बसै अति दारुन, मकर रूप तेहि माहीं।
🙏🌹बदनहीन सो ग्रसै चराचर, पान करन जे जाहीं ।।
🙏🌹🌹(विनय०, पद १११)🌹🌹🙏
संसार मृगतृष्णा का सागर है, जिसमें एक मगर रहता है। उस मगर का शरीर नहीं है फिर भी चराचर को ग्रसे हुए है।
काल ही मगर है, जिसने चराचर को परोसी थाली बनाकर अनवरत ग्रसने का कार्य प्रारम्भ किया है।
संसार सागर के तल में फँसा एवं मगर से स्वाभाविक ग्रसा हुआ मन जब तक अपनी शक्ति से लड़ता है तब तक काल का बन्धन कटता नहीं; किन्तु जब वह मन-वचन-कर्म से अपने बल का भरोसा खोकर एक ईश्वर पर निर्भर हो जाता है और चिन्तन की पकड़, स्थिति का एक नाम मात्र शेष रह जाती है,
मन नाम में समाहित हो जाता है, इस निरोध के साथ ही परमात्मा स्वयं उतर आते हैं और सर्वत्र प्रसारित उस मगर, काल का अन्त कर ऐसे भक्त का उद्धार कर देते हैं।
इस भव-सरिता में बहते हुए मानव का वास्तव में यही इलाज है जो सृष्टि से उद्धार की सदैव प्रयोगात्मक विधि-विशेष एवं मानव के लिए सदैव कल्याण का प्रशस्त पथ है।
सृष्टि में उत्पन्न पुरुष की मनःस्थिति उपर्युक्त परिवेश में गज की तरह होती है तथा त्राण पाने के लिए छटपटाहटें भी इसी तरह ही होंगी। मोक्ष भी प्रभु-दर्शन के साथ सम्भव है।

इस संघर्ष में एक विशेषता यह भी थी कि सहस्र वर्षपर्यन्त मन (गज) स्वयं लड़ा और अन्त में उसने प्रभु को पुकारा।
वह जीवित कैसे था? पानी में चारा कहाँ से मिला?
वास्तव में यह मन के निरोध की एक युक्ति है। चित्त सहस्रों प्रवृत्तियों में प्रवाहित है, कोई न कोई ऊधम करता रहता है।
ज्योंही हजारों प्रवृत्तियों का निरोध हुआ,
चित्त एक चिन्तन में समाहित एवं तद्रूप होकर मिट गया, त्योंही विष्णु विश्व में अणु सत्ता परमात्मा प्रकट होकर बन्धन काटकर समाहित कर लेता है, यही उद्धार है।
प्रभु सर्वस्व का हरण कर अपने स्वरूप की स्थिति प्रदान कर देते हैं इसलिए उन अवतारों में से एक यह भी 'हरि' अवतार है।

🌹।। ॐ श्री सद्गुरुदेव भगवान की जय ।।🌹

एक बार की बात है नारद जी विष्णु भगवानजी से मिलने गए। भगवान ने उनका बहुत सम्मान किया। जब नारद जी वापिस गए तो विष्णुजी ने ...
07/01/2026

एक बार की बात है नारद जी विष्णु भगवानजी से मिलने गए। भगवान ने उनका बहुत सम्मान किया। जब नारद जी वापिस गए तो विष्णुजी ने कहा हे लक्ष्मी जिस स्थान पर नारद जी बैठे थे। उस स्थान को गाय के गोबर से लीप दो।

जब विष्णुजी यह बात कह रहे थे तब नारदजी बाहर ही खड़े थे। उन्होंने सब सुन लिया और वापिस आ गए और विष्णु भगवान जी से पुछा हे भगवान जब मै आया तो आपने मेरा खूब सम्मान किया पर जब मै जा रहा था, तो आपने लक्ष्मी जी से यह क्यों कहा कि जिस स्थान पर नारद बैठा था उस स्थान को गोबर से लीप दो।

भगवान ने कहा हे नारद मैंने आपका सम्मान इसलिए किया क्योंकि आप देव ऋषि है और मैंने देवी लक्ष्मी से ऐसा इसलिए कहा क्योंकि आपका कोई गुरु नहीं है।
आप निगुरे है। जिस स्थान पर कोई निगुरा बैठ जाता है वो स्थान गन्दा हो जाता है।

यह सुनकर नारद जी ने कहा हे भगवान आपकी बात सत्य है पर मै गुरु किसे बनाऊ?
नारायण बोले: हे नारद !धरती पर चले जाओ जो व्यक्ति सबसे पहिले मिले उसे अपना गुरु मानलो।

नारद जी ने प्रणाम किया और चले गए। जब नारद जी धरती पर आये तो उन्हें सबसे पहले एक मछली पकड़ने वाला एक मछुवारा मिला। नारद जी वापिस नारायण के पास चले गए और कहा महाराज वो मछुवारा तो कुछ भी नहीं जानता मै उसे गुरु कैसे मान सकता हूँ?

यह सुनकर भगवान ने कहा नारद जी अपना प्रण पूरा करो। नारद जी वापिस आये और उस मछुवारे से कहा मेरे गुरु बन जाओ। पहले तो मछुवारा नहीं माना बाद में बहुत मनाने से मान गया। मछुवारे को राजी करने के बाद नारद जी लौट कर भगवान के पास गए और कहा हे भगवान। मेरे गुरूजी को तो कुछ भी नहीं आता वे मुझे क्या सिखायेगे?

यह सुनकर विष्णु जी को क्रोध आ गया और उन्होंने कहा: हे नारद गुरु निंदा करते हो जाओ मै आपको श्राप देता हूँ कि आपको ८४ लाख योनियों में घूमना पड़ेगा।

यह सुनकर नारद जी ने दोनों हाथ जोड़कर कहा हे भगवान। इस श्राप से बचने का उपाय भी बता दीजिये। भगवान नारायण ने कहा इसका उपाय जाकर अपने गुरुदेव से पूछो। नारद जी ने सारी बात जाकर गुरुदेव को बताई। गुरूजी ने कहा ऐसा करना भगवान से कहना ८४ लाख योनियों की तस्वीरे धरती पर बना दे फिर उस पर लेट कर गोल घूम लेना और विष्णु जी से कहना ८४ लाख योनियों में घूम आया मुझे छमा कर दीजिए आगे से गुरु निंदा नहीं करूँगा।

नारद जी ने विष्णु जी के पास जाकर ऐसा ही किया उनसे कहा ८४ लाख योनिया धरती पर बना दो और फिर उन पर लेट कर घूम लिए और कहा नारायण मुझे छमा कर दीजिए आगे से कभी गुरु निंदा नहीं करूँगा। यह सुनकर विष्णु जी ने कहा देखा जिस गुरु की निंदा कर रहे थे उसी ने मेरे श्राप से बचा लिया। नारदजी गुरु की महिमा अपरम्पार है।

गुरु गूंगे गुरु बाबरे, गुरु के रहिये दास,
गुरु जो भेजे नरक को, स्वर्ग कि रखिये आस !

गुरु चाहे गूंगा हो, चाहे गुरु बावरा हो गुरु के हमेशा दास रहना चाहिए। गुरु यदि नरक को भेजे तब भी शिष्य को यह इच्छा रखनी चाहिए कि मुझे स्वर्ग प्राप्त होगा, अर्थात इसमें मेरा कल्याण ही होगा! यदि शिष्य को गुरु पर पूर्ण विश्वास हो तो उसका बुरा स्वयं गुरु भी नहीं कर सकते।

यह प्रसंग पंडित श्री धन्ने भगत ने एक साधारण पत्थर देकर कहा इसे भोग लगाया करो एक दिन भगवान कृष्ण दर्शन देंगे। उस धन्ने भक्त के विश्वास से एक दिन उस पत्थर से भगवान प्रकट हो गए। फिर गुरु पर तो वचन विश्वास रखने वाले का उद्धार निश्चित है।

मैं अब गहराई से समझने लगा हूँ उन लोगों को जो चुप हो जाते हैं — घमंड से नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को बचाने के लिए। जो चुप...
13/11/2025

मैं अब गहराई से समझने लगा हूँ उन लोगों को जो चुप हो जाते हैं — घमंड से नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को बचाने के लिए। जो चुपचाप दूर हो जाते हैं, इसलिए नहीं कि उन्होंने प्यार या परवाह करना छोड़ दिया, बल्कि इसलिए क्योंकि उन्हें साँस लेने की, अपने अंदर की टूटी चीजों को जोड़ने की, और उस असली 'स्व' से फिर से जुड़ने की सख्त ज़रूरत होती है जो शोर, दबाव और अंतहीन अपेक्षाओं के बोझ तले कहीं खो गया होता है।

ज़िंदगी कभी-कभी असहनीय रूप से भारी हो जाती है। और उन पलों में, सबसे बड़ा साहस यह नहीं होता कि आप दूसरों के लिए लगातार उपस्थित रहें — बल्कि यह होता है कि आप अपने लिए खड़े हों, भले ही इसका मतलब हो चुपचाप हट जाना। यह स्वार्थ नहीं है। यह त्याग नहीं है। यह आत्म-संरक्षण है। यह तब होता है जब आप दुनिया की मांगों के सामने अपनी भलाई को चुनते हैं।

अब मैं उस मौन ताक़त को देख सकता हूँ उन लोगों में जो लौटते हैं — वैसे नहीं जैसे वे गए थे, बल्कि अधिक समझदार होकर। वे अपराधबोध या ज़िम्मेदारी की भावना से नहीं लौटते, बल्कि उद्देश्य, स्पष्टता और उन सीमाओं के साथ लौटते हैं जो उन्होंने अंधेरे में सीखी हुई सीख से तय की होती हैं। उनका दिल और अधिक कोमल होता है, लेकिन आत्मा कहीं अधिक मज़बूत।

वे किसी को चोट पहुँचाने के लिए नहीं गए थे। वे गए थे खुद को ठीक करने के लिए। और इस प्रक्रिया में उन्होंने अपने उन हिस्सों को फिर से पा लिया जो शोर के नीचे दब गए थे। अब मैं समझता हूँ — कभी-कभी फिर से ज़िंदा होने का सबसे शक्तिशाली तरीका यही होता है... कि आप पहले खुद को चुपचाप हट जाने की अनुमति दें।

कर्म भोग का नियम — यह प्रकृति का  अटल सत्य है। कोई भी जीव, चाहे वह अवतार हो या सिद्ध, अपने कर्मों के प्रभाव से पूरी तरह ...
13/11/2025

कर्म भोग का नियम — यह प्रकृति का अटल सत्य है। कोई भी जीव, चाहे वह अवतार हो या सिद्ध, अपने कर्मों के प्रभाव से पूरी तरह अछूता नहीं रह सकता। अवतार पुरुष भी केवल इसलिए जन्म लेते हैं कि वे कर्म-फल के माध्यम से ही लोक कल्याण कर सकें। वे अपने कर्मों का वहन करते हैं परंतु उनकी दृष्टि में राग-द्वेष नहीं होता।

सदमार्ग पर आने से पाप कर्मों की तीव्रता कम हो सकती है लेकिन भोगना फिर भी पड़ता है" यह कर्म सिद्धांत का अत्यंत सटीक विवेचन है। सद्गुरु का आश्रय, आत्मचिन्तन और तपस्या के द्वारा कर्मों की तीव्रता को मन्द किया जा सकता है, परंतु उसे पूर्णतः शून्य करना इस जीवन में सम्भव नहीं होता जब तक कि पूर्ण निर्विकार अवस्था (अविद्या-क्षय) प्राप्त न हो।

वैकुण्ठ चतुर्दशी                  शिवाय विष्णु रूपाय     शिव रूपाय विष्णवे ।           शिवस्य हृदयं विष्णुं      विष्णोश...
13/11/2025

वैकुण्ठ चतुर्दशी


शिवाय विष्णु रूपाय शिव रूपाय विष्णवे ।
शिवस्य हृदयं विष्णुं विष्णोश्च हृदयं शिवः ॥

यथा शिवमयो विष्णुरेवं विष्णुमयः शिवः ।
यथाऽन्तरम् न पश्यामि तथा में स्वस्तिरायुषि ।
यथाऽन्तरं न भेदाः स्युः शिवराघवयोस्तथा ॥


यथा शिवस्तथा विष्णुर्यथा विष्णुस्तथा शिवः ।
अन्तरं शिवविष्ण्वोश्च भनागपि न विद्यते ॥

यौ तौ शङ्खकपालभूषितकरौ मालास्थिमालाधरौ
देवौ द्वारवतीश्मशाननिलयौ नागारिगोवाहनौ ।
द्वित्र्यक्षौ बलिदक्षयज्ञमथनौ श्रीशैलजावल्लभौ
पापं वो हरतां सदा हरिहरौ श्रीवत्सगङ्गाधरौ ॥

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