15/05/2022
Gyanvapi Masjid) का विवाद इन दिनों चर्चा में है. कोर्ट ने आदेश दिया है कि पूरे परिसर का सर्वे करवाया जाए. एक पक्ष का दावा है कि ज्ञानवापी मस्जिद को तोड़कर बनाया गया है और इसके तहखाने में मंदिर से जुड़े प्रमाण भी मौजूद हैं. इसी को लेकर कोर्ट ने वीडियोग्राफी और सर्वे करवाने का आदेश दिया है
इतिहास की किताबों में कुछ पन्ने इस स्थान का सच बयान करते हैं. इनके मुताबिक, साल 1194 से 1669 के बीच ज्ञानवापी परिसर पर कई बार हमले हुए. काशी हिंदू विश्वविद्यालय और पटना यूनिवर्सिटी में प्राध्यपाक रहे इतिहासकार डॉ. अनंत सदाशिव अल्तेकर की किताब हिस्ट्री ऑफ बनारस (History of Benaras) में इसका प्रमुखता से जिक्र है.
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ज्ञानवापी केस में इस किताब को भी संदर्भ के तौर पर पेश किया गया है. इस किताब के हवाले से दावा किया गया है कि इस्लामी आक्रांताओं ने हिंदुओं के धार्मिक स्थलों को तहस-नहस करने का विवरण भी दर्ज है. इसमें यह भी बताया गया है कि काशी विश्वनाथ मंदिर को 1194 से 1669 के बीच कई बार तोड़ा गया है.
15वीं सदी में अकबर के समय हुआ था मंदिर का पुनरुद्धार
इस किताब में लिखा गया है कि 15वीं शताब्दी में मुगल शासक अकबर के कार्यकाल में राजा मान सिंह और राजा टोडरमल ने काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनरुद्धार कराया था. इस किताब में बताया गया है कि अकबर के समय बनारस के हालात बदलते और 1567 में शांति व्यवस्था कायम हुई.
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कागजातों के हिसाब से मानें तो 1936 में चले एक मुकदमें में प्रोफेसर अल्तेकर समेत कई लोगों ने गवाही दी थी. 14 मई 1937 को बनारस मूल के इतिहासकार प्रो. परमात्मा शरण ने ब्रिटिश सरकार की ओर से बयान दिया था. उन्होंने औरंगजेब के समय के इतिहास लेखक के 'मा आसिरे आलम गिरि' पेश करते हुए कहा था कि 16वीं शताब्दी के अंतिम चरण में यह एक मंदिर ही था.
कानून और इतिहास के आधार पर दावा कर रहा है मंदिर पक्ष
मंदिर पक्ष की ओर से पैरवी करने वाले वाद मित्र विजय शंकर रस्तोगी बताते हैं कि भारतीय साक्ष्य अधिनियिम की धारा 57 (13) के तहत सामान्य इतिहास की किताबों में भी वर्णित ऐतिहासिक तथ्य को साक्ष्य के तौर पर मान्यता है.