Shastri Manoj Gaur

आज का पूजा इस्थल  28/2023
28/08/2023

आज का पूजा इस्थल 28/2023

राधे राधे जरूर बोलये जी
29/07/2023

राधे राधे जरूर बोलये जी

देव भूमि उत्तराखंड यादगार पल
27/06/2023

देव भूमि उत्तराखंड यादगार पल

https://youtu.be/OeyirVEh9Zcनमस्कार आप सभी मित्रो को मित्रो अगर आप को वीडियो पसन्द आये तो पिल्ज़ like subucribe  जरूर की...
18/06/2023

https://youtu.be/OeyirVEh9Zc
नमस्कार आप सभी मित्रो को मित्रो अगर आप को वीडियो पसन्द आये तो पिल्ज़ like subucribe जरूर कीजिए बहुत बहुत धन्यवाद आप सभी का

https://youtu.be/Sa93Uarv8Os  आज का बहुत आनंद मय सुन्दरकाण्ड पाठ जरूर सुनिये  बहुत आनंद मय    अगर अच्छा लगे पिल्ज़ like ...
10/05/2023

https://youtu.be/Sa93Uarv8Os आज का बहुत आनंद मय सुन्दरकाण्ड पाठ जरूर सुनिये बहुत आनंद मय अगर अच्छा लगे पिल्ज़ like subucribe जरूर कीजिए sheer कीजिए आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद

07/03/2023
25/12/2022

[[[नमःशिवाय]]]
श्री गुरूवे नमः

#महामाया_का_मायाजाल

यह कितनी विचित्र बात है कि मनुष्य प्रति दिन अनेकों को जन्म लेते व मृत्यू को प्राप्त होते देखता है ।
और जीवन मृत्यु के शाश्वत सत्य को समझता है और मानता है, परन्तु यह जानना नही चाहता है कि वह क्या है कौन है कहां से आया है ।
उसकी अनुभूति एवं चेतना या क्या रहस्य है? इस प्रकृति का क्या रहस्य है, वह इन सारी बातो को निरर्थक समझता है ।
उसको इससे महत्त्वपूर्ण और आकर्षक यह विश्व लगता है यह प्रकृति लगती है । वह अपने आस पास ये वातावरण को भोगने मे लग जाता है ,उसकी अनुभूतियां उसकी कामनाएं जगाती है ।और वह उन कामनाओं को पूर्ण करने के लिए प्रत्येक क्षण दुखी और व्याकुल रहता है।
एक कामना पुर्ण होती है, तो दुसरी उत्पन्न हो जाती है और वह अपना पुरा जीवन इन्ही पूर्ति मे लगा देता है।
इस प्रकृति के बारे मे अपने बारे मे अपने अन्दर उत्पन्न होने वाली चेतना और संज्ञान को बारे मे कुछ जानने का प्रयत्न ही नही करता।
वह अज्ञानता के अन्धकार मे ही उत्पन्न होता है और उसी अन्धकार मे नष्ट हो जाता है ।
प्रकृति मे जन्म लेकर इसे भोगते हुए भी वह इसके बारे मे एवं अपने बारे मे कुछ भी नही जानता।
अगर हम उपर्युक्त कथन कि गम्भीरता से विश्लेषण करे तो इसे सत्या पायेगे
जीव, चेतना, और प्रकृति इसकी विचित्रता के कारणों को तलाशने कि प्रयत्न कौन करता है ।
जीव को अपनी भोग कामनाओं से ही फुरसत नही होती है
हमारे ऋषि मुनियों ने कहा है कि जीव की प्रकृति बडी ही विचित्र होती है वह जानता है कि घर में आग लगी है और वह इसी आग मे जल जायेगा ।
वह यह भी जानता है कि नष्ट हो जाना उसकी नियति है, परन्तु वह अपने को शाश्वत मानकर सारे क्रिया कलाप करता है ।
इस प्रकृति मे कुछ भी शाश्वत नही है, यह जानते हुए भी अपने को जीवित रखने के लिए न जाने क्या क्या करता है स्वयं ये अस्तित्व को शाश्वत बनाने के लिए किले बनवाया है धर्मशालाएं सड़कें कुए मन्दिर और न जाने क्या क्या बनवाता है स्वयं की प्रशस्ति में पुस्तकें लिखवाता है।
फिर इस जगत को छोड़कर चला जाता है।
इस मै के अहंकार मे ही युद्धों संघर्षों और बर्बरता को अपनाकर पशु बन जाता है फिर भी स्वमं को शाश्वत नही रख पाता है।
भला इस रहस्यमय प्रकृति ब्रह्माण्ड मे कुछ शाश्वत है ।इस पृथ्वी प्राचीन ऋषियों की पृथ्वी का अर्थ कुछ और है यहां वह अर्थ नही है ।
आधुनिक अर्थ है पृथ्वी नामक ग्रह कि अस्तित्व ही नगण्य है फिर इससे किसी क्षुद्र जीव ये इतिहास का मुल्य ही क्या है ।
जब कोई जीव जन्म लेता है तो उसकी इन्द्रियों बाह्य जगत के संकेतों को ग्रहण करके उस तक पहुँचाती है।
इन संकेतों के कारण उसमें अनुभूतियां उत्पन्न होती है और ये इतनी मनमोहक होती है ।
जीव उन अनुभूतियों को राग मे पड जाता है और अपने आस पास के वातावरण को भोगने लग जाता है।
इसके बाद उसे सोचने का मौका ही नही मिलता कि वह सत्य कि तलाश के बारे मै विचार कर सकें।
किन्तु जीव जिस जगत मे विचरण करता है । उसकी कोई वास्तविक सत्ता होती ही नही वह सम्पूर्ण जगत उसकी अनुभूतियों का जगत होता है और अनुभूतियां इन्द्रियों ये संकेतों के कारण उत्पन्न होती है ।
इन इन्द्रियों सी क्षमता अत्यन्त न्युन होती है ।आधूनिक विज्ञान की भाषा मे कहा जाये , तो इनकी फ्रीक्वेंसी निर्धारित होती है ।
ये उसके दायरे से बाहर के सत्य को नही बता सकतीं एक वातावरण ,एक जैसे पर्यावरण के जीवों की इन्द्रिय सामर्थ्य में अन्तर कम होता है नस्लों में वह एक जैसा होता है ।
इसलिए सबकी अनुभूतियां लगभग एक जैसी होती हैऔर उन अनुभूतियों का जगत सत्य लगने लगता है ।

09/07/2022

18 दिन के युद्ध ने,
द्रोपदी की उम्र को
80 वर्ष जैसा कर दिया था ...

शारीरिक रूप से भी
और मानसिक रूप से भी

शहर में चारों तरफ़
विधवाओं का बाहुल्य था..

पुरुष इक्का-दुक्का ही दिखाई पड़ता था

अनाथ बच्चे घूमते दिखाई पड़ते थे और उन सबकी वह महारानी
द्रौपदी हस्तिनापुर के महल में
निश्चेष्ट बैठी हुई शून्य को निहार रही थी ।

तभी,

श्रीकृष्ण
कक्ष में दाखिल होते हैं

द्रौपदी
कृष्ण को देखते ही
दौड़कर उनसे लिपट जाती है ...
कृष्ण उसके सिर को सहलाते रहते हैं और रोने देते हैं

थोड़ी देर में,
उसे खुद से अलग करके
समीप के पलंग पर बैठा देते हैं ।

द्रोपदी : यह क्या हो गया सखा ??

ऐसा तो मैंने नहीं सोचा था ।

कृष्ण : नियति बहुत क्रूर होती है पांचाली..
वह हमारे सोचने के अनुरूप नहीं चलती !

वह हमारे कर्मों को
परिणामों में बदल देती है..

तुम प्रतिशोध लेना चाहती थी और, तुम सफल हुई, द्रौपदी !

तुम्हारा प्रतिशोध पूरा हुआ... सिर्फ दुर्योधन और दुशासन ही नहीं,
सारे कौरव समाप्त हो गए

तुम्हें तो प्रसन्न होना चाहिए !

द्रोपदी: सखा,
तुम मेरे घावों को सहलाने आए हो या उन पर नमक छिड़कने के लिए ?

कृष्ण : नहीं द्रौपदी,
मैं तो तुम्हें वास्तविकता से अवगत कराने के लिए आया हूँ
हमारे कर्मों के परिणाम को
हम, दूर तक नहीं देख पाते हैं और जब वे समक्ष होते हैं..
तो, हमारे हाथ में कुछ नहीं रहता।

द्रोपदी : तो क्या,
इस युद्ध के लिए पूर्ण रूप से मैं ही उत्तरदायी हूँ कृष्ण ?

कृष्ण : नहीं, द्रौपदी
तुम स्वयं को इतना महत्वपूर्ण मत समझो...

लेकिन,

तुम अपने कर्मों में थोड़ी सी दूरदर्शिता रखती तो, स्वयं इतना कष्ट कभी नहीं पाती।

द्रोपदी : मैं क्या कर सकती थी कृष्ण ?

तुम बहुत कुछ कर सकती थी

कृष्ण:- जब तुम्हारा स्वयंवर हुआ...
तब तुम कर्ण को अपमानित नहीं करती और उसे प्रतियोगिता में भाग लेने का एक अवसर देती
तो, शायद परिणाम
कुछ और होते !

इसके बाद जब कुंती ने तुम्हें पाँच पतियों की पत्नी बनने का आदेश दिया...
तब तुम उसे स्वीकार नहीं करती तो भी, परिणाम कुछ और होते ।

और

उसके बाद
तुमने अपने महल में दुर्योधन को अपमानित किया...
कि अंधों के पुत्र अंधे होते हैं।

वह नहीं कहती तो, तुम्हारा चीर हरण नहीं होता...

तब भी शायद, परिस्थितियाँ कुछ और होती ।

"हमारे शब्द भी
हमारे कर्म होते हैं" द्रोपदी...

और, हमें

"अपने हर शब्द को बोलने से पहले तोलना
बहुत ज़रूरी होता है"...
अन्यथा,
उसके दुष्परिणाम सिर्फ़ स्वयं को ही नहीं... अपने पूरे परिवेश को दुखी करते रहते हैं ।

संसार में केवल मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है...
जिसका
"ज़हर"
उसके
"दाँतों" में नहीं,
"शब्दों " में है...

इसलिए शब्दों का प्रयोग सोच समझकर करें।

ऐसे शब्द का प्रयोग कीजिये जिससे, .
किसी की भावना को ठेस ना पहुँचे।

क्योंकि महाभारत हमारे अंदर ही छिपा हुआ है ।
*जय श्रीकृष्ण*

05/01/2022

*ॐ नमो भगवते वासुदेवाय*
*यतः सत्यं यतो धर्मो,*
*यतो ह्रीरार्जवं यतः l*
*ततो भवति गोविन्दो,*
*यतः कृष्णस्ततो जय: ll*

भावार्थ -- *जहाँ सत्य, धर्म, लज्जा और सरलता है वहीं भगवान् श्रीकृष्ण रहते हैं और जहाँ श्रीकृष्ण रहते हैं वहीं जय-विजय होती है ।*

शास्त्री मनोज गौड़

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