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29/04/2026

कहां सूरज की आग, ओलो को देख गई भाग #शिखरजी

क्या जैन धर्म के होने वाले हैं दो नए भेद ?…. तो यह धर्म तीर्थ नष्ट होते देर नहीं लगेगी https://www.channelmahalaxmi.com/...
29/04/2026

क्या जैन धर्म के होने वाले हैं दो नए भेद ?…. तो यह धर्म तीर्थ नष्ट होते देर नहीं लगेगी https://www.channelmahalaxmi.com/jain-division/ via Mahalaxmi
जैन दर्शन में परमात्मा को स्वीकार किया गया है, किंतु उसे न सृष्टि का कर्त्ता माना गया है और न जीवों के सुख दुख का नियंता। प्रत्येक जीव अपने कर्मों का स्वयं कर्त्ता और भोक्ता है। कर्मबंध, आस्रव, संवर और निर्जरा की प्रक्रिया में ही संसार और मोक्ष का संपूर्ण तत्त्व समाहित है। पूजा पाठ, अभिषेक, शांतिधारा, प्रतिक्रमण या स्वाध्याय का उद्देश्य भी किसी देवता को प्रसन्न करना नहीं बल्कि आत्म जागृति है और कषायों को मंद करना है।

अब एक व्यावहारिक प्रश्न विचारणीय है। यदि जैन दर्शन अकर्त्तावाद है तो क्या हमारे धार्मिक व्यवहार भी उसी दर्शन के अनुरूप हैं ? या कहीं ऐसा तो नहीं कि दर्शन अध्यात्म एक ओर चल रहा है और व्यवहार दूसरी ओर ?

आज मंदिरों में पूजा पाठ, अभिषेक, शांतिधारा, विविध विधान और इसके परिणाम में विभिन्न सांसारिक मनौतियों की प्रवृत्ति निरंतर बढ़ती दिखाई दे रही है। कई बार ऐसा आभास होता है मानो कर्म सिद्धांत की गहन और दीर्घ प्रक्रिया के स्थान पर धर्म और क्रिया कांड का कोई त्वरित मार्ग खोज लिया गया हो। विधि ठीक से हो जाए, मंत्र पूरे पढ़ लिए जाएँ और सामग्री पूरी चढ़ा दी जाए तो मोक्ष भी हो जाएगा और लौकिक अपेक्षाएँ भी पूरी हो जाएँगी। श्रावकों के लिए यह विचार स्वाभाविक रूप से आकर्षक है, क्योंकि पुरुषार्थ का मार्ग सदैव कठिन होता है और अपेक्षा का मार्ग सरल।

इस प्रवृत्ति का एक कारण यह भी है कि मंदिरों में मूल आगम और दार्शनिक ग्रंथों के स्वाध्याय की परंपरा क्रमशः क्षीण होती जा रही है। बड़े बड़े तीर्थ क्षेत्रों तक में प्रतिदिन की स्वाध्याय सभा अब नहीं होती । जहाँ कभी समयसार, प्रवचनसार, पंचास्तिकाय, तत्वार्थसूत्र आदि ग्रंथों पर चिंतन होता था, वहाँ अब अधिकतर अनुष्ठानों की व्यस्तता दिखाई देती है। परिणाम यह हुआ है कि आध्यात्मिक चिंतन की प्रवृत्ति घट रही है, सम्यग्दृष्टि बनने की अभिलाषा दुर्बल पड़ती जा रही है और आत्मानुभूति की साधना के प्रति अरुचि बढ़ती प्रतीत होती है।

29/04/2026

#दिल्ली वालों को दिल से #खुशखबरी

29/04/2026

विश्व का सबसे छोटा चट्टान (रॉक कट) मंदिर

29/04/2026

#शाबाश ! छोटे से कस्बे को बिटिया ने कर दिया बड़ा, कैसे

29/04/2026

#कोल्हापुर से आई खुशखबरी, पर मिठास बाकी है

28/04/2026

बिटिया घर छोड़कर चल दी और परिजन भी उसको छोड़ आए

28/04/2026

#शिखरजी में कहां है यह रहस्यमयी गुफा

28/04/2026

पालीताणा में तीर्थयात्री पर चाकू से हमला, लूट https://www.channelmahalaxmi.com/palitana-loot/ via Mahalaxmi
17 अप्रैल को पालीताणा तीर्थ पर चैन्नई के दिनेश कागरेचा वंदना यात्रा कर रहे थे, कि तभी वहां चार लोगों ने चाकू लूट के इरादे से निकाल लिया। उनसे सोने की चेन छीन ली और फिर अगले ही मिनट भाग गये। इस बारे में श्री दिनेश ने स्वयं 15 सेकेंड का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर जारी किया।
जैन तीर्थ पर यात्रियों से इस तरह की लूटपाट ने सचेत कर दिया है कि अब ये भी लूटपाट से सुरक्षित नहीं है।

अक्षय तृतीया को दर्शाते सिक्के का सच https://www.channelmahalaxmi.com/akshay-tritya-10/ via  Mahalaxmi पिछले कई वर्षों स...
28/04/2026

अक्षय तृतीया को दर्शाते सिक्के का सच https://www.channelmahalaxmi.com/akshay-tritya-10/ via Mahalaxmi
पिछले कई वर्षों से अक्षय तृतीया के अवसर पर यह सिक्का व्हाट्सअप यूनिवर्सिटी पर जैन ग्रुपों में छा जाता है। टिप्पणी की जाती है कि1818 ई. से ईस्ट इंडिया कम्पनी ने यह एक आने का सिक्का जारी किया।
इसका प्रमाण जानने के लिये चैनल महालक्ष्मी टीम पुहंची ब्रिटिश एम्बेसी में, वहां कुछ पुस्तकों में यह खंगाल ही रहे थे, तभी वहां एक जिम्मेदार अधिकारी से इस बारे में जानकारी ली, तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि यह ब्रिटिश काल या ईस्ट इंडिया कम्पनी द्वारा जारी सिक्का नहीं है। यह भी स्पष्ट किया कि 1818 या उसके आसपास भी ईस्ट इंडिया कम्पनी ने कभी भी जैन तीर्थंकरों या किसी हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीर वाले कोई भी सिक्के जारी नहीं किये। यह असली मुद्रा का कोई सिक्का नहीं है। इसलिये कभी भी इस तरह की बात लिखकर पोस्ट जारी नहीं करे। इसकी जानकारी चैनल महालक्ष्मी के एपिसोड नं. 3690 में देखी जा सकती है।

28/04/2026

आर्यिका संघ किस प्रवेश स्वर्ण द्वार पर

27/04/2026

सांगानेर के श्री शांतिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर ठोलियान में आचार्य सुन्दर सागर महाराज, आचार्य शशांक सागर महाराज एवं गणिनी आर्यिका नन्दीश्वर मति माताजी ससंघ के सानिध्य में पांच दिवसीय महामस्तकाभिषेक महोत्सव के लिए 23 अप्रैल को श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ एवं महामस्तकाभिषेक हेतु निकाले गए मंदिर जी के भूगर्भ स्थित चैत्यालय में विराजमान अतिशय युक्त जिनबिम्बों को आचार्य संघ द्वारा पूर्व में लिये गये संकल्प अनुरुप सोमवार, 27 अप्रैल को विधि विधान से वापस भूगर्भ में विराजमान कर गया । उपाध्याय विकसंत सागर महाराज ससंघ (5 पिच्छीका ) का मंदिर जी में भव्य मंगल प्रवेश हुआ। इस मौके पर पूर्व में विराजमान 36 पिच्छीका के साथ इन 5 पिच्छीका का भव्य मिलन भी हुआ।
आचार्य श्री सुन्दर सागर महाराज द्वारा श्योपुर प्रतापनगर निवासी स्व. गुलाब चन्द हाडा की धर्मपत्नी चन्द्रकांता हाडा को जिनेश्वरी दीक्षा प्रदान कर आर्यिका चंदनामति माताजी नाम दिया गया।

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