23/08/2026
रामायण संदेश परिवार के सभी श्रद्धालु सदस्यों एवं पाठकों को दास का सादर प्रणाम।
बजरंग बाण पाठ यात्रा में पिछले भाग में हमने उस भाव का चिंतन किया था, जहाँ भक्त श्रीहनुमानजी को श्रीराम की दुहाई देकर पुकारता है - उठिए, चलिए और अपने भक्त की सहायता कीजिए। हमने समझा कि श्रीहनुमानजी का स्मरण हमें केवल संकट से बचाने के लिए नहीं, बल्कि अपने भीतर सोई हुई शक्ति, साहस और पुरुषार्थ को जगाने के लिए भी है।
आज उसी भाव को आगे बढ़ाते हुए हम श्री बजरंग बाण की अगली चौपाई का चिंतन करेंगे।
चौपाई :
ॐ चं चं चं चं चपल चलंता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता।।
अर्थात : हे चपल गति से चलने वाले, अत्यंत शीघ्रता से कार्य करने वाले श्रीहनुमानजी! आप तीव्र गति से अपने भक्तों के कार्य में उपस्थित हों और उनके संकटों का निवारण करें।
गूढ़ार्थ : बजरंग बाण की यह पंक्ति अपने आप में बहुत ऊर्जावान है।
पिछली चौपाई में भक्त कह रहा था - उठु, उठु, चलु।
और अब वह श्रीहनुमानजी की उस अद्भुत गति का स्मरण करता है, जिसके सामने कोई दूरी, कोई बाधा और कोई परिस्थिति बड़ी नहीं होती।
लेकिन यहाँ चपल चलंता का अर्थ केवल तेज गति से दौड़ने वाले हनुमानजी से लेना पर्याप्त नहीं है।
यह उस चेतना का प्रतीक है जो अवसर आने पर तुरंत जाग जाती है।
श्रीहनुमानजी के जीवन में एक बात बार-बार दिखाई देती है - रामकाज में विलंब नहीं।
जहाँ प्रभु का कार्य सामने आया, वहाँ विचारों में उलझकर समय नहीं गंवाया।
समुद्र सामने आया - छलांग लगा दी।
सुरसा ने रोका - बुद्धि का प्रयोग किया।
लंकिनी ने रोका - मार्ग बनाया।
माता सीता का पता चला - तुरंत श्रीराम का संदेश पहुँचाया।
लंका में संकट आया - परिस्थिति के अनुसार निर्णय लिया।
यही हनुमत गति है।
आज अक्सर ऐसा होता है कि हमें पता होता है कि क्या सही है, लेकिन हम निर्णय लेने में इतना समय लगा देते हैं कि अवसर हाथ से निकल जाता है।
कभी डर रोकता है।
कभी लोग क्या कहेंगे यह रोकता है।
कभी असफलता का भय रोकता है।
कभी हम सही समय का इंतजार करते रहते हैं।
और कभी सही समय आता ही नहीं, क्योंकि हम शुरुआत ही नहीं करते।
श्रीहनुमानजी हमें सिखाते हैं कि हर काम जल्दबाजी से नहीं करना चाहिए, लेकिन जहाँ धर्म, कर्तव्य और सेवा का प्रश्न हो, वहाँ अनावश्यक विलंब भी उचित नहीं।
यही चपल चलंता का भाव है।
गति हो, लेकिन विवेक के साथ।
साहस हो, लेकिन अहंकार के बिना।
शीघ्रता हो, लेकिन उद्देश्य स्पष्ट हो।
आज हमारे जीवन में भी कई ऐसे काम हैं जिन्हें हम लंबे समय से टाल रहे हैं।
किसी से क्षमा माँगनी है।
किसी से संबंध सुधारना है।
किसी गलत आदत को छोड़ना है।
किसी अच्छे काम की शुरुआत करनी है।
किसी जरूरतमंद की सहायता करनी है।
अपने बच्चों के साथ समय बिताना है।
अपने माता-पिता से बैठकर बात करनी है।
प्रभु के लिए थोड़ा समय निकालना है।
लेकिन हम कहते रहते हैं - कल से करेंगे।
यही कल धीरे-धीरे महीनों और वर्षों में बदल जाता है।
श्रीहनुमानजी का स्मरण हमें पूछता है - जब करना सही है, तो फिर विलंब क्यों?
हनुमानजी के जीवन में गति का अर्थ केवल शरीर की गति नहीं है।
उनकी बुद्धि भी गतिशील थी।
उनका विवेक भी गतिशील था।
उनका मन प्रभु के कार्य में लगा हुआ था।
उनकी ऊर्जा सेवा में लगी हुई थी।
इसीलिए वे जहाँ आवश्यक हुआ, वहाँ विशाल बने और जहाँ आवश्यकता हुई, वहाँ सूक्ष्म।
जहाँ युद्ध करना पड़ा, वहाँ पराक्रम दिखाया।
जहाँ माता सीता के सामने जाना था, वहाँ अत्यंत विनम्र हो गए।
जहाँ विभीषण से मिलना था, वहाँ विवेक से काम लिया।
यानी हनुमानजी की गति केवल तेज नहीं थी, सही दिशा में थी।
आज अक्सर ऐसा होता है कि हम बहुत व्यस्त रहते हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि सही दिशा में आगे बढ़ रहे हों।
दिन भर काम करते हैं।
दौड़ते रहते हैं।
फोन देखते हैं।
मीटिंग करते हैं।
व्यवसाय संभालते हैं।
परिवार संभालते हैं।
लेकिन दिन के अंत में जब स्वयं से पूछते हैं - आज वास्तव में जीवन में क्या आगे बढ़ा?
तो कभी-कभी उत्तर बहुत छोटा होता है।
इसलिए जीवन में केवल गति नहीं, दिशा भी चाहिए।
श्रीहनुमानजी हमें गति और दिशा दोनों देते हैं।
उनकी गति रामकाज की ओर थी।
उनकी शक्ति रामकाज के लिए थी।
उनकी बुद्धि रामकाज में लगी थी।
उनका जीवन राममय था।
इसलिए उनकी हर गति सार्थक थी।
अब दूसरी पंक्ति आती है - हनु हनु हनु हनुमंता।
यहाँ बार-बार हनुमानजी का स्मरण किया गया है।
क्यों?
क्योंकि संकट के समय मन बहुत तेजी से भटकता है।
एक चिंता दूसरी चिंता को जन्म देती है।
एक डर दूसरे डर को पैदा करता है।
और देखते ही देखते मन समस्या से ज्यादा उसके विचारों में उलझ जाता है।
ऐसे समय में नाम-स्मरण मन को एक केंद्र देता है।
जब मन बार-बार कहता है - हनुमानजी, हनुमानजी, हनुमानजी - तो वह धीरे-धीरे अपनी चिंता से हटकर अपने आराध्य की ओर जाने लगता है।
आज अक्सर ऐसा होता है कि परेशानी आने पर हम उसी बात को बार-बार सोचते रहते हैं।
समस्या एक बार हुई, लेकिन हम उसे अपने मन में सौ बार जी लेते हैं।
और फिर कहते हैं - मेरा मन बहुत परेशान है।
ऐसे समय में नाम-स्मरण मन की दिशा बदलने का सरल माध्यम बन सकता है।
इसका अर्थ समस्या से भागना नहीं है।
समस्या का समाधान करना है, लेकिन घबराहट के साथ नहीं।
प्रभु के स्मरण के साथ।
यही हनुमत साधना है।
इस चौपाई में छिपा एक और संदेश है - तत्परता।
सच्चा भक्त केवल अपनी समस्या लेकर भगवान के पास नहीं जाता।
वह भगवान के कार्य के लिए भी तत्पर रहता है।
हम चाहते हैं कि श्रीहनुमानजी हमारे संकट में तुरंत आएँ।
लेकिन क्या हम किसी दूसरे के संकट में तुरंत पहुँचने के लिए तैयार हैं?
किसी मित्र को आवश्यकता हो और हम कहें - अभी व्यस्त हूँ।
किसी रिश्तेदार को सहायता चाहिए और हम कहें - बाद में देखते हैं।
किसी जरूरतमंद को हमारी थोड़ी-सी मदद चाहिए और हम सोचें - मेरे अकेले से क्या होगा?
यहीं हनुमानजी का जीवन हमें आईना दिखाता है।
रामकाज सुनते ही वे चल पड़े।
यही हनुमत भाव है।
जहाँ हमारी थोड़ी-सी सहायता किसी के जीवन में बड़ा परिवर्तन ला सकती है, वहाँ विलंब न करना।
किसी के लिए समय देना भी सेवा है।
किसी को सही सलाह देना भी सेवा है।
किसी निराश व्यक्ति को दो शब्दों का सहारा देना भी सेवा है।
किसी भूखे को भोजन देना भी सेवा है।
किसी दुखी व्यक्ति के पास चुपचाप बैठ जाना भी सेवा है।
और इन सबमें यदि प्रभु का भाव जुड़ जाए तो वही सामान्य कर्म साधना बन जाता है।
इसलिए आज की चौपाई हमें तीन बातें सिखाती है।
पहली - जीवन में गति रखो, लेकिन सही दिशा में।
दूसरी - संकट में मन को बार-बार प्रभु के स्मरण से स्थिर करो।
तीसरी - जहाँ किसी के लिए तुम्हारी आवश्यकता हो, वहाँ अनावश्यक विलंब मत करो।
श्रीहनुमानजी की तरह हमारा जीवन भी ऐसा बने कि हमारी शक्ति केवल हमारे लिए न रहे।
हमारी बुद्धि केवल हमारे लाभ के लिए न हो।
हमारा समय केवल हमारी इच्छाओं में न लगे।
बल्कि हमारे भीतर का थोड़ा-सा समय, थोड़ा-सा सामर्थ्य और थोड़ा-सा प्रेम भी प्रभु के कार्य और समाज के कल्याण में लग सके।
तब शायद हमें समझ आएगा कि हनुमानजी का स्मरण केवल संकट में उनका नाम लेना नहीं है।
हनुमानजी का स्मरण स्वयं को हनुमानजी के गुणों के योग्य बनाने की यात्रा है।
यदि आज की यह आध्यात्मिक चर्चा आपके हृदय को स्पर्श कर गई हो, तो केवल पढ़कर आगे न बढ़ें। कमेंट में पूरे श्रद्धाभाव से जय बजरंग बली अवश्य लिखें, ताकि यह भी पता चले कि इस बजरंग बाण यात्रा में कितने श्रद्धालु हमारे साथ जुड़े हुए हैं।
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श्रीहरि चरणों का दास - सुनील मिश्रा
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