रामायण संदेश

रामायण संदेश रामायण हमें बहुत कुछ सिखाती है और इस पेज के माध्यम से हम आपको बताते हैं आपको रामायण की सीख...
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यह पृष्ठ भगवान राम और गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरित मानस में दिए गए उपदेशों को समर्पित है।

रामचरित मानस के बालकाण्ड में गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं

रामचरितमानस एहि नामा। सुनत श्रवन पाइअ बिश्रामा॥
मन करि बिषय अनल बन जरई। होई सुखी जौं एहिं सर परई॥

भावार्थ-इसका नाम रामचरितमानस है, जिसके सुनते ही कानों को शांति मिलती है। मनरूपी हाथी विषय रूपी दावानल में जल रहा है, वह यदि इस रामचरितमानस रूपी सरोवर में आ पड़े तो सुखी हो जाए।

जीवनी : अवध क्षेत्र के ब्राह्मण परिवार में जन्म होने से
बालकाल्य से ही रामचरित मानस की अमिट छाप मन पर रही।

सुनील कुमार मिश्रा एक कार्यकारी पेशेवर हैं, जिन्होंने विभिन्न बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ काम किया है, अपने करियर की शुरूआत उन्होने एक कंप्यूटर शिक्षक के रूप में की और रूचि न होने के कारण प्रबंधन क्षेत्र में अपने व्यवसायिक जीवन की नई शुरुआत की।

एक सामाजिक संचारक के रूप में वह जमीन से जुड़े हुए हैं और सामाजिक मुद्दों और आधुनिक जीवन शैली सहित आधुनिक जीवन के विभिन्न पहलुओं पर लिखते हैं।

जीवन परिचय
सुनील कुमार मिश्रा
जन्म: 25 अगस्त
जन्म स्थान: मनकापुर, गोंडा, उत्तर प्रदेश (भारत)

इस पृष्ठ को बनाने का अभिप्राय हिंदू धर्म में निहित मिथकों को दूर करना है और जन-मानस को रामचरित मानस के बारे में जागरूक करना है ।

रामायण संदेश परिवार के सभी श्रद्धालु सदस्यों एवं पाठकों को दास का सादर प्रणाम।बजरंग बाण पाठ यात्रा में पिछले भाग में हमन...
23/08/2026

रामायण संदेश परिवार के सभी श्रद्धालु सदस्यों एवं पाठकों को दास का सादर प्रणाम।

बजरंग बाण पाठ यात्रा में पिछले भाग में हमने उस भाव का चिंतन किया था, जहाँ भक्त श्रीहनुमानजी को श्रीराम की दुहाई देकर पुकारता है - उठिए, चलिए और अपने भक्त की सहायता कीजिए। हमने समझा कि श्रीहनुमानजी का स्मरण हमें केवल संकट से बचाने के लिए नहीं, बल्कि अपने भीतर सोई हुई शक्ति, साहस और पुरुषार्थ को जगाने के लिए भी है।

आज उसी भाव को आगे बढ़ाते हुए हम श्री बजरंग बाण की अगली चौपाई का चिंतन करेंगे।

चौपाई :

ॐ चं चं चं चं चपल चलंता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता।।

अर्थात : हे चपल गति से चलने वाले, अत्यंत शीघ्रता से कार्य करने वाले श्रीहनुमानजी! आप तीव्र गति से अपने भक्तों के कार्य में उपस्थित हों और उनके संकटों का निवारण करें।

गूढ़ार्थ : बजरंग बाण की यह पंक्ति अपने आप में बहुत ऊर्जावान है।

पिछली चौपाई में भक्त कह रहा था - उठु, उठु, चलु।

और अब वह श्रीहनुमानजी की उस अद्भुत गति का स्मरण करता है, जिसके सामने कोई दूरी, कोई बाधा और कोई परिस्थिति बड़ी नहीं होती।

लेकिन यहाँ चपल चलंता का अर्थ केवल तेज गति से दौड़ने वाले हनुमानजी से लेना पर्याप्त नहीं है।

यह उस चेतना का प्रतीक है जो अवसर आने पर तुरंत जाग जाती है।

श्रीहनुमानजी के जीवन में एक बात बार-बार दिखाई देती है - रामकाज में विलंब नहीं।

जहाँ प्रभु का कार्य सामने आया, वहाँ विचारों में उलझकर समय नहीं गंवाया।

समुद्र सामने आया - छलांग लगा दी।

सुरसा ने रोका - बुद्धि का प्रयोग किया।

लंकिनी ने रोका - मार्ग बनाया।

माता सीता का पता चला - तुरंत श्रीराम का संदेश पहुँचाया।

लंका में संकट आया - परिस्थिति के अनुसार निर्णय लिया।

यही हनुमत गति है।

आज अक्सर ऐसा होता है कि हमें पता होता है कि क्या सही है, लेकिन हम निर्णय लेने में इतना समय लगा देते हैं कि अवसर हाथ से निकल जाता है।

कभी डर रोकता है।

कभी लोग क्या कहेंगे यह रोकता है।

कभी असफलता का भय रोकता है।

कभी हम सही समय का इंतजार करते रहते हैं।

और कभी सही समय आता ही नहीं, क्योंकि हम शुरुआत ही नहीं करते।

श्रीहनुमानजी हमें सिखाते हैं कि हर काम जल्दबाजी से नहीं करना चाहिए, लेकिन जहाँ धर्म, कर्तव्य और सेवा का प्रश्न हो, वहाँ अनावश्यक विलंब भी उचित नहीं।

यही चपल चलंता का भाव है।

गति हो, लेकिन विवेक के साथ।

साहस हो, लेकिन अहंकार के बिना।

शीघ्रता हो, लेकिन उद्देश्य स्पष्ट हो।

आज हमारे जीवन में भी कई ऐसे काम हैं जिन्हें हम लंबे समय से टाल रहे हैं।

किसी से क्षमा माँगनी है।

किसी से संबंध सुधारना है।

किसी गलत आदत को छोड़ना है।

किसी अच्छे काम की शुरुआत करनी है।

किसी जरूरतमंद की सहायता करनी है।

अपने बच्चों के साथ समय बिताना है।

अपने माता-पिता से बैठकर बात करनी है।

प्रभु के लिए थोड़ा समय निकालना है।

लेकिन हम कहते रहते हैं - कल से करेंगे।

यही कल धीरे-धीरे महीनों और वर्षों में बदल जाता है।

श्रीहनुमानजी का स्मरण हमें पूछता है - जब करना सही है, तो फिर विलंब क्यों?

हनुमानजी के जीवन में गति का अर्थ केवल शरीर की गति नहीं है।

उनकी बुद्धि भी गतिशील थी।

उनका विवेक भी गतिशील था।

उनका मन प्रभु के कार्य में लगा हुआ था।

उनकी ऊर्जा सेवा में लगी हुई थी।

इसीलिए वे जहाँ आवश्यक हुआ, वहाँ विशाल बने और जहाँ आवश्यकता हुई, वहाँ सूक्ष्म।

जहाँ युद्ध करना पड़ा, वहाँ पराक्रम दिखाया।

जहाँ माता सीता के सामने जाना था, वहाँ अत्यंत विनम्र हो गए।

जहाँ विभीषण से मिलना था, वहाँ विवेक से काम लिया।

यानी हनुमानजी की गति केवल तेज नहीं थी, सही दिशा में थी।

आज अक्सर ऐसा होता है कि हम बहुत व्यस्त रहते हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि सही दिशा में आगे बढ़ रहे हों।

दिन भर काम करते हैं।

दौड़ते रहते हैं।

फोन देखते हैं।

मीटिंग करते हैं।

व्यवसाय संभालते हैं।

परिवार संभालते हैं।

लेकिन दिन के अंत में जब स्वयं से पूछते हैं - आज वास्तव में जीवन में क्या आगे बढ़ा?

तो कभी-कभी उत्तर बहुत छोटा होता है।

इसलिए जीवन में केवल गति नहीं, दिशा भी चाहिए।

श्रीहनुमानजी हमें गति और दिशा दोनों देते हैं।

उनकी गति रामकाज की ओर थी।

उनकी शक्ति रामकाज के लिए थी।

उनकी बुद्धि रामकाज में लगी थी।

उनका जीवन राममय था।

इसलिए उनकी हर गति सार्थक थी।

अब दूसरी पंक्ति आती है - हनु हनु हनु हनुमंता।

यहाँ बार-बार हनुमानजी का स्मरण किया गया है।

क्यों?

क्योंकि संकट के समय मन बहुत तेजी से भटकता है।

एक चिंता दूसरी चिंता को जन्म देती है।

एक डर दूसरे डर को पैदा करता है।

और देखते ही देखते मन समस्या से ज्यादा उसके विचारों में उलझ जाता है।

ऐसे समय में नाम-स्मरण मन को एक केंद्र देता है।

जब मन बार-बार कहता है - हनुमानजी, हनुमानजी, हनुमानजी - तो वह धीरे-धीरे अपनी चिंता से हटकर अपने आराध्य की ओर जाने लगता है।

आज अक्सर ऐसा होता है कि परेशानी आने पर हम उसी बात को बार-बार सोचते रहते हैं।

समस्या एक बार हुई, लेकिन हम उसे अपने मन में सौ बार जी लेते हैं।

और फिर कहते हैं - मेरा मन बहुत परेशान है।

ऐसे समय में नाम-स्मरण मन की दिशा बदलने का सरल माध्यम बन सकता है।

इसका अर्थ समस्या से भागना नहीं है।

समस्या का समाधान करना है, लेकिन घबराहट के साथ नहीं।

प्रभु के स्मरण के साथ।

यही हनुमत साधना है।

इस चौपाई में छिपा एक और संदेश है - तत्परता।

सच्चा भक्त केवल अपनी समस्या लेकर भगवान के पास नहीं जाता।

वह भगवान के कार्य के लिए भी तत्पर रहता है।

हम चाहते हैं कि श्रीहनुमानजी हमारे संकट में तुरंत आएँ।

लेकिन क्या हम किसी दूसरे के संकट में तुरंत पहुँचने के लिए तैयार हैं?

किसी मित्र को आवश्यकता हो और हम कहें - अभी व्यस्त हूँ।

किसी रिश्तेदार को सहायता चाहिए और हम कहें - बाद में देखते हैं।

किसी जरूरतमंद को हमारी थोड़ी-सी मदद चाहिए और हम सोचें - मेरे अकेले से क्या होगा?

यहीं हनुमानजी का जीवन हमें आईना दिखाता है।

रामकाज सुनते ही वे चल पड़े।

यही हनुमत भाव है।

जहाँ हमारी थोड़ी-सी सहायता किसी के जीवन में बड़ा परिवर्तन ला सकती है, वहाँ विलंब न करना।

किसी के लिए समय देना भी सेवा है।

किसी को सही सलाह देना भी सेवा है।

किसी निराश व्यक्ति को दो शब्दों का सहारा देना भी सेवा है।

किसी भूखे को भोजन देना भी सेवा है।

किसी दुखी व्यक्ति के पास चुपचाप बैठ जाना भी सेवा है।

और इन सबमें यदि प्रभु का भाव जुड़ जाए तो वही सामान्य कर्म साधना बन जाता है।

इसलिए आज की चौपाई हमें तीन बातें सिखाती है।

पहली - जीवन में गति रखो, लेकिन सही दिशा में।

दूसरी - संकट में मन को बार-बार प्रभु के स्मरण से स्थिर करो।

तीसरी - जहाँ किसी के लिए तुम्हारी आवश्यकता हो, वहाँ अनावश्यक विलंब मत करो।

श्रीहनुमानजी की तरह हमारा जीवन भी ऐसा बने कि हमारी शक्ति केवल हमारे लिए न रहे।

हमारी बुद्धि केवल हमारे लाभ के लिए न हो।

हमारा समय केवल हमारी इच्छाओं में न लगे।

बल्कि हमारे भीतर का थोड़ा-सा समय, थोड़ा-सा सामर्थ्य और थोड़ा-सा प्रेम भी प्रभु के कार्य और समाज के कल्याण में लग सके।

तब शायद हमें समझ आएगा कि हनुमानजी का स्मरण केवल संकट में उनका नाम लेना नहीं है।

हनुमानजी का स्मरण स्वयं को हनुमानजी के गुणों के योग्य बनाने की यात्रा है।

यदि आज की यह आध्यात्मिक चर्चा आपके हृदय को स्पर्श कर गई हो, तो केवल पढ़कर आगे न बढ़ें। कमेंट में पूरे श्रद्धाभाव से जय बजरंग बली अवश्य लिखें, ताकि यह भी पता चले कि इस बजरंग बाण यात्रा में कितने श्रद्धालु हमारे साथ जुड़े हुए हैं।

और यदि आपको लगता है कि श्रीहनुमानजी का यह संदेश किसी एक व्यक्ति के जीवन में भी साहस, विश्वास या आशा जगा सकता है, तो इसे अपने मित्रों, परिवारजनों और अपने अन्य समूहों में अवश्य साझा करें। हो सकता है, आपके द्वारा किया गया एक छोटा-सा शेयर किसी ऐसे व्यक्ति तक यह संदेश पहुँचा दे, जिसे आज इसकी सबसे अधिक आवश्यकता हो।

आइए, कमेंट में जय बजरंग बली लिखकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराएं और इस आध्यात्मिक यात्रा को अपने तक सीमित न रखकर अधिक से अधिक श्रद्धालुओं तक पहुँचाने का माध्यम बनें।

श्रीहरि चरणों का दास - सुनील मिश्रा

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हरि अनंत, हरि कथा अनंता...संतों का जीवन जितना सरल दिखाई देता है, उतना ही गहरा होता है। उनके लिए भगवान का नाम केवल जपने क...
23/08/2026

हरि अनंत, हरि कथा अनंता...

संतों का जीवन जितना सरल दिखाई देता है, उतना ही गहरा होता है। उनके लिए भगवान का नाम केवल जपने के लिए कोई शब्द नहीं होता, वह उनके जीवन का आधार होता है। उनके लिए प्रभु का नाम ही वचन है, संकल्प है और स्वयं जीवन से भी अधिक मूल्यवान है।

ऐसी ही एक भावपूर्ण कथा गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज से जुड़ी हुई सुनाई जाती है।

एक बार की बात है। गोस्वामी तुलसीदास जी अवध में थे और प्रतिदिन की तरह एक दिन सरयू नदी के तट पर स्नान करने पहुंचे। भोर का समय था। सरयू का जल शांत था, लेकिन मौसम बेहद ठंडा था।

तुलसीदास जी नदी में उतरकर स्नान के लिए आगे बढ़ ही रहे थे कि उसी समय एक महिला भी वहां पहुंची। उसे किसी कारण से बहुत शीघ्र स्नान करके लौटना था।

उस महिला ने तुलसीदास जी को देखा तो आदरपूर्वक प्रणाम किया और बोली -

बाबा जी, मुझे बहुत जल्दी स्नान करना है। आप कृपा करके नदी में मेरी ओर पीठ करके खड़े हो जाइए। आपको आपके राम जी की शपथ है, जब तक मैं स्वयं न कहूं, तब तक आप पीछे मुड़कर मत देखिएगा और नदी से बाहर भी मत निकलियेगा।

तुलसीदास जी ने सहज भाव से उसकी बात स्वीकार कर ली।

उन्होंने नदी में महिला की ओर पीठ कर ली और शांत भाव से वहीं खड़े हो गए।

महिला ने जल्दी-जल्दी स्नान किया और वहां से चली गई।

लेकिन जल्दबाजी में वह एक बात कहना भूल गई।

वह तुलसीदास जी से यह कहना भूल गई कि अब आप बाहर निकल सकते हैं।

समय बीतता गया।

ठंड बढ़ती गई।

लेकिन तुलसीदास जी वहीं सरयू के जल में खड़े रहे।

उन्हें न अपने शरीर की चिंता थी, न ठंड की और न समय की।

उनके लिए तो एक बार प्रभु श्रीराम की शपथ देकर जो वचन दिया गया था, वह वचन अब उनके लिए धर्म बन चुका था।

इधर मंदिर में जब काफी समय बीत गया और तुलसीदास जी वापस नहीं पहुंचे, तो उनके साथ रहने वाले लोग चिंतित हो उठे।

लोगों ने उन्हें इधर-उधर खोजा।

किसी ने बताया कि बाबा तो सरयू स्नान के लिए गए थे।

लोग तुरंत सरयू के किनारे पहुंचे।

वहां का दृश्य देखकर सब हैरान रह गए।

तुलसीदास जी अभी भी नदी के भीतर खड़े थे।

कड़ाके की ठंड में घंटों बीत चुके थे, लेकिन उनके चेहरे पर न बेचैनी थी, न शिकायत।

लोगों ने हाथ जोड़कर कहा -

बाबा जी, अब बाहर आ जाइए। बहुत देर हो गई है। आपका शरीर ठंड से कांप रहा होगा।

लेकिन तुलसीदास जी ने शांत स्वर में उत्तर दिया -

मैं बाहर नहीं निकल सकता।

लोगों ने पूछा - क्यों?

तब उन्होंने बताया -

एक देवी ने मुझे मेरे प्रभु श्रीराम की शपथ दी है। उन्होंने कहा था कि जब तक वह स्वयं न कहें, मैं न पीछे मुड़ूं और न नदी से बाहर निकलूं। अब जब तक वह स्वयं मुझे बाहर आने की अनुमति नहीं देंगी, मैं यह वचन नहीं तोड़ सकता।

लोग स्तब्ध रह गए।

बात धीरे-धीरे अवध के राजा तक पहुंची।

राजा स्वयं सरयू के तट पर पहुंचे और तुलसीदास जी से विनती करने लगे -

बाबा जी, इस कड़ाके की ठंड में इतनी देर तक नदी में खड़े रहना आपके स्वास्थ्य के लिए उचित नहीं है। आप बाहर आ जाइए।

तुलसीदास जी ने अत्यंत शांत भाव से उत्तर दिया -

राजन, मेरे लिए मेरा स्वास्थ्य महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन मेरे प्रभु का नाम उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है।

जिस देवी ने मुझे श्रीराम की शपथ दी है, उस शपथ को मैं कैसे तोड़ दूं?

मेरे लिए श्रीराम का नाम केवल नाम नहीं है। वही मेरे प्राण हैं, वही मेरा जीवन हैं और वही मेरे अस्तित्व का आधार हैं।

राजा तुलसीदास जी की बात सुनकर कुछ क्षण मौन रहे।

फिर उन्होंने पूछा -

बाबा जी, वह देवी कौन हैं? उनका नाम क्या है? वह कहां रहती हैं?

तुलसीदास जी ने सहज भाव से कहा -

मुझे नहीं मालूम।

अब राजा के सामने भी कोई उपाय नहीं था।

उन्होंने पूरे अवध में ढिंढोरा पिटवाया कि जिस महिला ने तुलसीदास जी को श्रीराम की शपथ दी थी, वह तुरंत सरयू नदी के तट पर पहुंचे और स्वयं जाकर उन्हें शपथ से मुक्त करे।

जब उस महिला को यह समाचार मिला तो उसे अपनी भूल का एहसास हुआ।

वह घबराकर दौड़ती हुई सरयू के तट पर पहुंची।

उसने तुलसीदास जी के सामने हाथ जोड़ दिए और कहा -

बाबा जी, मुझसे बहुत बड़ा अपराध हो गया। मैं जल्दबाजी में आपको यह कहना भूल गई कि अब आप नदी से बाहर आ सकते हैं।

कृपा करके मुझे क्षमा कर दीजिए।

फिर उसने हाथ जोड़कर कहा -

बाबा जी, अब आप पीछे मुड़ सकते हैं और नदी से बाहर भी निकल सकते हैं।

तुलसीदास जी ने उसकी ओर देखा और मुस्कुरा दिए।

उन्होंने कहा -

नहीं देवी, आपने कोई अपराध नहीं किया।

आपसे तो मेरे प्रभु ने एक सुंदर कार्य करा लिया।

शायद मेरे राम यही चाहते थे कि मैं कुछ समय एकांत में उनकी प्रिय सरयू के जल में खड़ा रहकर उनका स्मरण करूं।

आपके कारण मुझे यह अवसर मिला।

इसके लिए मुझे आपसे शिकायत नहीं, बल्कि आपको धन्यवाद देना चाहिए।

यह सुनकर वह महिला भाव-विभोर हो गई।

जिस बात को वह अपनी भूल और अपराध समझकर कांपती हुई आई थी, उसी बात को संत ने प्रभु की इच्छा और कृपा के रूप में स्वीकार कर लिया।

यही तो संत का हृदय होता है।

जहां सामान्य मनुष्य परिस्थिति में दोष खोजता है, वहां संत उसमें भी प्रभु की इच्छा देख लेता है।

जहां हम कहते हैं - मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ?

वहीं संत कहते हैं - प्रभु ने इसमें भी मेरे लिए कुछ अच्छा ही रखा होगा।

तुलसीदास जी ने उस दिन केवल एक स्त्री की बात नहीं मानी थी, उन्होंने अपने प्रभु के नाम की मर्यादा निभाई थी।

उनके लिए श्रीराम की शपथ कोई साधारण वचन नहीं था।

राम का नाम ही उनका जीवन था।

और शायद यही कारण है कि तुलसीदास जी जैसे संतों के जीवन को पढ़ते हुए हमें बार-बार अनुभव होता है कि भारत की संत परंपरा केवल कथाओं की परंपरा नहीं है, यह जीवन को देखने की एक अलग दृष्टि है।

संत वही नहीं जो संसार छोड़ दे।

संत वह है जो संसार की हर परिस्थिति में भी अपने भीतर की शांति को बनाए रखे।

कठोर ठंड में घंटों सरयू के जल में खड़े रहने के बाद भी तुलसीदास जी के मन में उस महिला के प्रति न क्रोध था, न शिकायत और न ही अपने कष्ट का कोई अहंकार।

उन्होंने उस घटना में भी अपने प्रभु की कृपा देखी।

यही संतत्व है।

हरि अनंत, हरि कथा अनंता...

रामायण संदेश की इस कथा-श्रृंखला में ऐसी ही लोकश्रुतियों, संतों के जीवन से जुड़े भावपूर्ण प्रसंगों और भक्ति की अद्भुत अनुभूतियों के साथ फिर मिलेंगे।

क्योंकि संतों की कथाएं समाप्त नहीं होतीं...

हर कथा के भीतर एक नई सीख होती है, हर प्रसंग के भीतर प्रभु का एक नया संकेत होता है और हर बार लगता है -

हरि अनंत हैं, उनकी कथा भी अनंत है।

श्रीहरि चरणों का दास - सुनील मिश्रा

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रामायण संदेश परिवार के सभी श्रद्धालु सदस्यों एवं पाठकों को दास का सादर प्रणाम।बजरंग बाण पाठ यात्रा में पिछले भाग में हमन...
22/08/2026

रामायण संदेश परिवार के सभी श्रद्धालु सदस्यों एवं पाठकों को दास का सादर प्रणाम।

बजरंग बाण पाठ यात्रा में पिछले भाग में हमने उस भाव का चिंतन किया था, जहाँ भक्त श्रीहनुमानजी के चरण पकड़कर अपनी सारी व्यथा उनके सामने रख देता है और कहता है - अब इस समय आपके अतिरिक्त मैं किससे अपनी प्रार्थना करूँ। हमने समझा कि सच्ची शरणागति कमजोरी नहीं, बल्कि प्रभु पर अटूट विश्वास से उत्पन्न होने वाली आंतरिक शक्ति है।

आज उसी भाव को आगे बढ़ाते हुए हम श्री बजरंग बाण की अगली चौपाई का चिंतन करेंगे।

चौपाई :
उठु, उठु, चलु, तोहि राम दुहाई। पायँ परौं, कर जोरि मनाई।।

अर्थात : हे श्रीहनुमानजी! मैं श्रीराम की दुहाई देकर आपसे प्रार्थना करता हूँ - उठिए, चलिए और अपने भक्त की सहायता के लिए आइए। मैं आपके चरणों में पड़कर, हाथ जोड़कर आपसे विनती करता हूँ।

गूढ़ार्थ : - इस चौपाई में भक्त की व्याकुलता अपने चरम पर दिखाई देती है।

पिछली चौपाई में भक्त कह रहा था - आपके चरण पकड़कर मैं आपको मनाता हूँ।

और अब वह कह रहा है - उठु, उठु, चलु।

मानो भक्त के धैर्य की सीमा समाप्त हो गई है।

लेकिन यहाँ एक बहुत सुंदर बात समझने की आवश्यकता है।

भक्त श्रीहनुमानजी को अपनी शक्ति के बल पर नहीं बुला रहा। वह कहता है - तोहि राम दुहाई।

अर्थात मैं आपको श्रीराम की दुहाई देता हूँ।

यहाँ भक्त ने श्रीहनुमानजी को उनके सबसे बड़े संबंध की याद दिलाई - श्रीराम।

श्रीहनुमानजी के जीवन में श्रीराम का स्थान क्या था, इसे समझने के लिए पूरी रामकथा भी कम पड़ जाए।

उनके लिए राम केवल आराध्य नहीं थे।

राम ही उनका जीवन थे।

राम ही उनका लक्ष्य थे।

राम ही उनका कर्म थे।

राम ही उनका विश्राम थे।

इसीलिए जब भक्त श्रीहनुमानजी को पुकारता है तो वह अपने व्यक्तिगत संबंध का सहारा नहीं लेता, बल्कि श्रीराम के नाम का सहारा लेता है।

आज अक्सर ऐसा होता है कि हम किसी बड़े व्यक्ति से अपना काम करवाने के लिए उसके किसी प्रभावशाली परिचित का नाम लेते हैं।

कहते हैं - मेरा उनसे संबंध है।

मेरी उनसे पहचान है।

मेरा काम करवा दीजिए।

लेकिन बजरंग बाण का यह भाव बिल्कुल अलग है।

यहाँ भक्त अपने लिए कोई पहचान नहीं दिखाता।

वह केवल प्रभु के नाम की शरण लेता है।

यही भक्ति की शक्ति है।

उठु, उठु, चलु।

इन शब्दों में एक और बहुत गहरा संदेश छिपा है।

भक्ति केवल बैठकर प्रार्थना करने का नाम नहीं है।

भक्ति के बाद गति चाहिए।

प्रार्थना के बाद पुरुषार्थ चाहिए।

विश्वास के बाद कर्म चाहिए।

श्रीहनुमानजी स्वयं इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं।

उन्होंने श्रीराम का नाम लिया और फिर समुद्र के किनारे बैठकर यह प्रतीक्षा नहीं की कि कोई उन्हें पार पहुँचा देगा।

उन्होंने छलांग लगाई।

सुरसा आई - बुद्धि से मार्ग निकाला।

लंकिनी आई - साहस से मार्ग बनाया।

लंका पहुँचे - सीताजी की खोज की।

रावण की नगरी में गए - श्रीराम का संदेश दिया।

अशोक वाटिका उजाड़ी - अधर्म को चुनौती दी।

और जब समय आया तो लंका में अग्नि भी लगा दी।

अर्थात हनुमानजी की भक्ति निष्क्रिय नहीं थी।

उनकी भक्ति कर्ममय थी।

आज अक्सर ऐसा होता है कि हम भगवान से कहते हैं - प्रभु, मेरी समस्या आप हल कर दीजिए।

लेकिन अपने हिस्से का एक छोटा-सा कदम उठाने में भी हम पीछे हट जाते हैं।

नौकरी चाहिए, लेकिन प्रयास नियमित नहीं।

व्यवसाय बढ़ाना है, लेकिन अनुशासन नहीं।

घर में शांति चाहिए, लेकिन अपनी भाषा बदलने को तैयार नहीं।

स्वास्थ्य अच्छा चाहिए, लेकिन अपनी आदतें बदलने को तैयार नहीं।

मन की शांति चाहिए, लेकिन मन को हर समय चिंता और नकारात्मक विचारों से भरते रहते हैं।

ऐसे में केवल प्रार्थना पर्याप्त कैसे होगी?

श्रीहनुमानजी हमें सिखाते हैं - प्रभु का नाम लो और फिर आगे बढ़ो।

इसीलिए यह चौपाई केवल हनुमानजी को जगाने की पुकार नहीं है।

यह हमारे भीतर सोई हुई शक्ति को जगाने की पुकार भी है।

उठु, उठु, चलु।

कई बार हमें लगता है कि श्रीहनुमानजी को उठने की आवश्यकता है।

लेकिन वास्तव में हमें स्वयं उठने की आवश्यकता होती है।

हमारे भीतर का साहस सो गया है।

हमारा आत्मविश्वास सो गया है।

हमारा पुरुषार्थ सो गया है।

हमारी भक्ति केवल शब्दों में रह गई है।

ऐसे समय में यह चौपाई हमारे भीतर आवाज देती है - उठो।

उठो और अपने जीवन का सामना करो।

उठो और अपने कर्तव्य की ओर चलो।

उठो और अपने भय के सामने खड़े हो जाओ।

उठो और उस काम को शुरू करो जिसे तुम लंबे समय से टाल रहे हो।

और सबसे महत्वपूर्ण - उठो और प्रभु के भरोसे चलो।

आज किसी व्यक्ति के जीवन में सबसे बड़ी समस्या उसकी परिस्थिति नहीं, बल्कि कई बार उसकी निष्क्रियता होती है।

वह जानता है कि क्या करना चाहिए, लेकिन करता नहीं।

वह जानता है कि किस आदत को छोड़ना चाहिए, लेकिन छोड़ता नहीं।

वह जानता है कि किस दिशा में जाना चाहिए, लेकिन पहला कदम नहीं उठाता।

ऐसे समय में श्रीहनुमानजी का स्मरण हमें झकझोरता है।

क्योंकि हनुमानजी का चरित्र ही गति का चरित्र है।

जहाँ श्रीराम का कार्य सामने आया, वहाँ विलंब नहीं हुआ।

यही कारण है कि बजरंग बाण में बार-बार आतुरता दिखाई देती है।

जन के काज बिलंब न कीजै।

आतुर दौरि।

अब यहाँ भी वही भाव आता है - उठु, उठु, चलु।

भक्त कहता है - प्रभु, मेरे लिए देर मत कीजिए।

लेकिन इसका एक दूसरा पक्ष भी है।

क्या हम प्रभु के कार्य के लिए उतनी ही जल्दी तैयार होते हैं?

जब अपने काम की बात आती है तो हम तुरंत दौड़ पड़ते हैं।

जब अपने लाभ की बात आती है तो समय नहीं देखते।

लेकिन जब किसी की सहायता करनी हो, किसी जरूरतमंद के साथ खड़ा होना हो, किसी अच्छे कार्य में अपना समय देना हो, तब हम कहते हैं - अभी समय नहीं है।

यहीं श्रीहनुमानजी का जीवन हमें आईना दिखाता है।

उनका जीवन अपने लिए नहीं था।

उनकी गति रामकाज के लिए थी।

इसलिए सच्ची हनुमत भक्ति केवल यह नहीं कि संकट में हनुमानजी हमारे लिए दौड़कर आएँ।

सच्ची हनुमत भक्ति यह भी है कि जब किसी के जीवन में हमारी आवश्यकता हो, तब हम उसके लिए हनुमानजी की तरह दौड़ सकें।

किसी दुखी व्यक्ति को सहारा देना।

किसी निराश व्यक्ति को आशा देना।

किसी जरूरतमंद की सहायता करना।

किसी के कठिन समय में उसके साथ खड़े रहना।

यही हनुमत भाव को जीवन में उतारना है।

और अंत में तुलसीदासजी कहते हैं - पायँ परौं, कर जोरि मनाई।

मैं आपके चरणों में पड़कर हाथ जोड़कर विनती करता हूँ।

यहाँ फिर वही विनम्रता लौट आती है।

पहले शक्ति।

फिर गति।

लेकिन उसके साथ विनय भी।

यही श्रीहनुमानजी के चरित्र की सुंदरता है।

वे अपार शक्तिशाली हैं, लेकिन अहंकारी नहीं।

वे असंभव कार्य कर सकते हैं, लेकिन श्रेय स्वयं नहीं लेते।

वे समुद्र लांघ सकते हैं, पर्वत उठा सकते हैं, लंका जला सकते हैं, लेकिन अंत में कहते हैं - सब प्रभु की कृपा है।

आज अक्सर ऐसा होता है कि थोड़ी-सी सफलता मिलते ही हम भूल जाते हैं कि हमें चलाने वाली शक्ति कहाँ से आई।

हनुमानजी हमें सफलता के साथ विनम्रता रखना सिखाते हैं।

इस चौपाई का संदेश इसलिए बहुत सीधा है।

जब जीवन में संकट आए तो घबराकर बैठ मत जाओ।

प्रभु का स्मरण करो।

अपने भीतर की शक्ति जगाओ।

अपने कर्तव्य की ओर उठो।

आगे बढ़ो।

और फिर भी अहंकार मत करो।

क्योंकि तुम्हारी शक्ति भी उसी की देन है।

श्रीहनुमानजी से प्रार्थना करते हुए हम भी कह सकते हैं -

हे बजरंग बली, जब मैं भय के कारण रुक जाऊँ तो मुझे उठाइए।

जब मैं भ्रमित हो जाऊँ तो मुझे सही दिशा दिखाइए।

जब मैं अपने सामर्थ्य पर अहंकार करूँ तो मुझे विनम्र बनाइए।

और जब प्रभु का कार्य सामने हो तो मुझे बिना विलंब उसके लिए आगे बढ़ने की शक्ति दीजिए।

यही इस चौपाई का सच्चा संदेश है।

यदि आज की यह आध्यात्मिक चर्चा आपके हृदय को स्पर्श कर गई हो, तो केवल पढ़कर आगे न बढ़ें। कमेंट में पूरे श्रद्धाभाव से जय बजरंग बली अवश्य लिखें, ताकि यह भी पता चले कि इस बजरंग बाण यात्रा में कितने श्रद्धालु हमारे साथ जुड़े हुए हैं।

और यदि आपको लगता है कि श्रीहनुमानजी का यह संदेश किसी एक व्यक्ति के जीवन में भी साहस, विश्वास या आशा जगा सकता है, तो इसे अपने मित्रों, परिवारजनों और अपने अन्य समूहों में अवश्य साझा करें। हो सकता है, आपके द्वारा किया गया एक छोटा-सा शेयर किसी ऐसे व्यक्ति तक यह संदेश पहुँचा दे, जिसे आज इसकी सबसे अधिक आवश्यकता हो।

आइए, कमेंट में जय बजरंग बली लिखकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराएं और इस आध्यात्मिक यात्रा को अपने तक सीमित न रखकर अधिक से अधिक श्रद्धालुओं तक पहुँचाने का माध्यम बनें।

श्रीहरि चरणों का दास - सुनील मिश्रा

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रामायण संदेश परिवार के सभी श्रद्धालु सदस्यों एवं पाठकों को दास का सादर प्रणाम।बजरंग बाण पाठ यात्रा में पिछले भाग में हमन...
21/08/2026

रामायण संदेश परिवार के सभी श्रद्धालु सदस्यों एवं पाठकों को दास का सादर प्रणाम।

बजरंग बाण पाठ यात्रा में पिछले भाग में हमने श्रीहनुमानजी के स्मरण की महिमा का चिंतन किया। हमने समझा कि दुःख का नाश केवल परिस्थिति बदल जाने से नहीं होता, बल्कि जब मन में प्रभु का विश्वास जागता है, तब वही दुःख हमें भीतर से तोड़ नहीं पाता। श्रीहनुमानजी का स्मरण हमें भय के बीच साहस, कठिनाई के बीच धैर्य और निराशा के बीच आशा देता है।

आज उसी भाव को आगे बढ़ाते हुए हम श्री बजरंग बाण की अगली चौपाई का चिंतन करेंगे।

चौपाई :

चरन पकरि, कर जोरि मनावौं।यहि औसर अब केहि गोहरावौं।।

अर्थात : हे प्रभु श्रीहनुमानजी! मैं आपके चरण पकड़कर, हाथ जोड़कर आपको मनाता हूँ। इस समय आपके अतिरिक्त मैं और किससे अपनी प्रार्थना करूँ?

गूढ़ार्थ : यह चौपाई पढ़ते ही ऐसा लगता है जैसे कोई भक्त अपने आराध्य के सामने खड़ा होकर अपने मन की सारी व्यथा कह रहा हो।

न कोई दिखावा।

न कोई तर्क।

न कोई अहंकार।

बस हाथ जुड़े हुए हैं और हृदय में एक ही विश्वास है - अब प्रभु ही मेरे सहारे हैं।

यही शरणागति का आरंभ है।

लेकिन शरणागति का अर्थ हार मान लेना नहीं है।

आज अक्सर ऐसा होता है कि जब हमारी कोशिशें बार-बार असफल होती हैं तो हम कहते हैं - अब मेरे बस की बात नहीं है।

और फिर भगवान के सामने भी उसी निराशा के साथ जाते हैं।

लेकिन भक्त की शरणागति निराशा से नहीं, विश्वास से जन्म लेती है।

भक्त कहता है - प्रभु, मैंने अपनी ओर से जितना समझा उतना किया। अब जहाँ मेरी शक्ति समाप्त होती है, वहाँ से आपकी कृपा प्रारंभ होती है।

यह बहुत बड़ा अंतर है।

एक व्यक्ति कहता है - मैं कुछ नहीं कर सकता।

दूसरा व्यक्ति कहता है - मैं अपना कर्तव्य करूँगा, लेकिन अंतिम भरोसा प्रभु पर रखूँगा।

दूसरे व्यक्ति के भीतर ही भक्ति की शक्ति जन्म लेती है।

चरण पकड़ना यहाँ केवल शारीरिक भाव नहीं है।

चरण का अर्थ है - प्रभु का मार्ग।

जब हम कहते हैं कि मैंने श्रीहनुमानजी के चरण पकड़ लिए, तो इसका अर्थ यह भी है कि मैंने उनके जीवन के आदर्शों को पकड़ लिया।

सेवा का मार्ग।

साहस का मार्ग।

विनम्रता का मार्ग।

श्रीराम के प्रति समर्पण का मार्ग।

और अपने अहंकार को छोड़ने का मार्ग।

आज अक्सर ऐसा होता है कि हम भगवान के चरण तो पकड़ना चाहते हैं, लेकिन अपना अहंकार छोड़ना नहीं चाहते।

हम कहते हैं - प्रभु, मेरी इच्छा पूरी करो।

लेकिन यह नहीं कहते - प्रभु, मुझे अपनी इच्छा के अनुसार चलने की शक्ति दो।

हम चाहते हैं कि भगवान हमारे रास्ते पर चलें।

भक्ति हमें सिखाती है कि हम भगवान के रास्ते पर चलें।

यही इस चौपाई का सबसे सुंदर संदेश है।

चरन पकरि, कर जोरि मनावौं।

हाथ जोड़ना भी बहुत गहरा प्रतीक है।

जब दोनों हाथ जुड़ते हैं तो मानो मनुष्य अपने भीतर के द्वंद्व को भी जोड़ने का प्रयास करता है।

एक ओर इच्छा।

दूसरी ओर विवेक।

एक ओर अहंकार।

दूसरी ओर समर्पण।

एक ओर भय।

दूसरी ओर विश्वास।

जब ये दोनों प्रभु के सामने झुकते हैं, तब मन में शांति का जन्म होता है।

और फिर तुलसीदासजी लिखते हैं -

यहि औसर अब केहि गोहरावौं।

यही वह क्षण है जहाँ भक्त अपनी सारी बाहरी आश्रिताएँ छोड़कर अपने आराध्य की ओर देखता है।

आज हमारे जीवन में भी ऐसे क्षण आते हैं।

कभी अस्पताल की रिपोर्ट हाथ में होती है।

कभी व्यापार में बड़ा नुकसान हो जाता है।

कभी वर्षों की मेहनत के बाद भी परिणाम नहीं मिलता।

कभी अपना ही कोई व्यक्ति साथ छोड़ देता है।

कभी घर में ऐसी परिस्थिति बन जाती है कि समझ नहीं आता किससे बात करें।

और कभी भीड़ के बीच खड़े होकर भी मनुष्य भीतर से बिल्कुल अकेला महसूस करता है।

ऐसे समय में मन पूछता है - अब किससे कहूँ?

यही प्रश्न इस चौपाई में है।

यहि औसर अब केहि गोहरावौं।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि संसार के लोगों से सहायता नहीं लेनी चाहिए।

डॉक्टर की आवश्यकता हो तो डॉक्टर के पास जाना चाहिए।

कानूनी समस्या हो तो योग्य व्यक्ति से सलाह लेनी चाहिए।

व्यवसाय में कठिनाई हो तो अनुभवी व्यक्ति से मार्गदर्शन लेना चाहिए।

परंतु इन सबके साथ मन का अंतिम भरोसा कहाँ है?

यही प्रश्न भक्ति का प्रश्न है।

क्योंकि मनुष्य सहायता कर सकता है, लेकिन परिणाम हमारे हाथ में नहीं होता।

हम प्रयास कर सकते हैं, लेकिन भविष्य हमारे नियंत्रण में नहीं होता।

हम रास्ता चुन सकते हैं, लेकिन रास्ते में क्या आएगा यह हमें पता नहीं होता।

इसलिए भक्त कर्म से पीछे नहीं हटता, लेकिन परिणाम का अहंकार भी नहीं करता।

श्रीहनुमानजी के जीवन को देखिए।

समुद्र सामने था।

लक्ष्य दूर था।

मार्ग में सुरसा थी।

लंकिनी थी।

लंका की विशाल शक्ति सामने थी।

माता सीता की खोज करनी थी।

लेकिन हनुमानजी हर बाधा के सामने एक ही भाव से आगे बढ़ते रहे - श्रीराम का कार्य है, इसलिए यह कार्य पूरा होना ही चाहिए।

यही शरणागति है।

अपने लिए नहीं।

प्रभु के कार्य के लिए।

और यही भाव जब अपने जीवन में आता है, तब कठिन से कठिन परिस्थिति भी साधना बन जाती है।

आज अक्सर हम अपनी समस्याओं को केवल समस्या मानते हैं।

लेकिन यदि हम दृष्टिकोण बदल दें तो वही परिस्थिति हमें कुछ सिखाने लगती है।

कठिन व्यक्ति हमें धैर्य सिखा सकता है।

असफलता हमें विनम्रता सिखा सकती है।

आर्थिक कठिनाई हमें संयम सिखा सकती है।

अकेलापन हमें अपने भीतर देखने का अवसर दे सकता है।

और संकट हमें भगवान के करीब ला सकता है।

इसलिए हर संकट केवल दंड नहीं होता।

कई बार संकट प्रभु का बुलावा भी होता है।

जब मनुष्य हर दरवाजे पर जाकर थक जाता है, तब उसे उस दरवाजे की याद आती है जो हमेशा से खुला था।

वह है प्रभु का दरवाजा।

श्रीहनुमानजी के चरणों में जाकर बैठने का अर्थ यही है कि मनुष्य अपनी चिंता को कुछ क्षण के लिए प्रभु के सामने रख दे और कहे -

हे बजरंग बली, मैं अपनी ओर से प्रयास करूँगा।

लेकिन मुझे सही बुद्धि दीजिए।

सही निर्णय दीजिए।

सही साहस दीजिए।

और जो परिणाम आए, उसे स्वीकार करने की शक्ति भी दीजिए।

यही प्रार्थना धीरे-धीरे मनुष्य को कमजोर नहीं, बल्कि भीतर से अत्यंत मजबूत बना देती है।

क्योंकि जिस व्यक्ति को यह विश्वास हो जाए कि मेरा प्रयास मेरे हाथ में है और मेरा अंतिम आश्रय प्रभु हैं, उसे संसार की परिस्थितियाँ आसानी से हिला नहीं सकतीं।

श्रीहनुमानजी के चरणों में झुकना वास्तव में अपने भय से ऊपर उठना है।

अपने अहंकार से ऊपर उठना है।

अपनी सीमाओं से ऊपर उठना है।

और यह स्वीकार करना है कि जीवन की यात्रा में मुझे अपने से बड़ी किसी शक्ति पर विश्वास करना है।

आज यदि आपके जीवन में भी कोई ऐसी बात है जिसे लेकर मन लगातार परेशान है, तो कुछ क्षण श्रीहनुमानजी के सामने शांत होकर बैठिए।

अपनी समस्या को बार-बार मन में दोहराने के बजाय उनसे कहिए -

हे प्रभु, मैं आपके चरणों में हूँ।

जो मेरे लिए उचित हो, वही कीजिए।

लेकिन मुझे इतना बल दीजिए कि मैं अपने कर्तव्य से पीछे न हटूँ।

कभी-कभी यही छोटी-सी प्रार्थना मन के भीतर बहुत बड़ा परिवर्तन शुरू कर देती है।

और तब हमें समझ आता है कि श्रीहनुमानजी से सहायता माँगना केवल संकट दूर करने की प्रार्थना नहीं है।

यह अपने भीतर हनुमान जैसा साहस जगाने की साधना भी है।

यदि आज की यह आध्यात्मिक चर्चा आपके हृदय को स्पर्श कर गई हो, तो केवल पढ़कर आगे न बढ़ें। कमेंट में पूरे श्रद्धाभाव से जय बजरंग बली अवश्य लिखें, ताकि यह भी पता चले कि इस बजरंग बाण यात्रा में कितने श्रद्धालु हमारे साथ जुड़े हुए हैं। और यदि आपको लगता है कि श्रीहनुमानजी का यह संदेश किसी एक व्यक्ति के जीवन में भी साहस, विश्वास या आशा जगा सकता है, तो इसे अपने मित्रों, परिवारजनों और अपने अन्य समूहों में अवश्य साझा करें। हो सकता है, आपके द्वारा किया गया एक छोटा-सा शेयर किसी ऐसे व्यक्ति तक यह संदेश पहुँचा दे, जिसे आज इसकी सबसे अधिक आवश्यकता हो।

आइए, कमेंट में जय बजरंग बली लिखकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराएं और इस आध्यात्मिक यात्रा को अपने तक सीमित न रखकर अधिक से अधिक श्रद्धालुओं तक पहुँचाने का माध्यम बनें।

श्रीहरि चरणों का दास - सुनील मिश्रा

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हरि अनंत, हरि कथा अनंता...कहा जाता है ना कि भगवान को पाने के लिए केवल आंखें खोलना ही पर्याप्त नहीं होता, कभी-कभी अपने भी...
21/08/2026

हरि अनंत, हरि कथा अनंता...

कहा जाता है ना कि भगवान को पाने के लिए केवल आंखें खोलना ही पर्याप्त नहीं होता, कभी-कभी अपने भीतर की आंखें भी खोलनी पड़ती हैं। प्रभु सामने खड़े हों और हम उन्हें पहचान न पाएं, ऐसा भी हो सकता है। लेकिन जब भक्त का प्रेम सच्चा हो, तो भगवान स्वयं अपने भक्त की भावना के अनुसार अपना स्वरूप प्रकट कर देते हैं।

ऐसी ही एक भावपूर्ण लोककथा गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज और भगवान जगन्नाथ से जुड़ी हुई सुनाई जाती है। इस कथा का स्पष्ट वर्णन मूल रामचरितमानस में नहीं मिलता, लेकिन भक्त परंपरा और जनश्रुति में यह प्रसंग लंबे समय से सुनाया जाता रहा है।

कहा जाता है कि आध्यात्मिक जीवन की ओर बढ़ने के बाद तुलसीदास जी का मन संसार से हटकर पूरी तरह भगवान में रम गया था। उनके हृदय में अपने इष्ट श्रीराम के दर्शन की ऐसी तीव्र लालसा थी कि उन्हें हर समय बस यही लगता था कि किसी प्रकार प्रभु के दर्शन हो जाएं।

इसी दौरान एक दिन किसी भक्त ने उनसे कहा कि जगन्नाथ पुरी में तो स्वयं भगवान साक्षात विराजते हैं।

बस, इतना सुनना था कि तुलसीदास जी का मन प्रसन्न हो उठा। उनके लिए भगवान कोई दूर की वस्तु नहीं थे। वे तो उनके प्राणों में बसे उनके आराध्य श्रीराम थे। उन्होंने सोचा - यदि पुरी में स्वयं भगवान विराजते हैं, तो क्यों न वहां जाकर अपने प्रभु के दर्शन किए जाएं?

फिर क्या था, तुलसीदास जी जगन्नाथ पुरी की कठिन यात्रा पर निकल पड़े।

उस समय यात्रा आज जैसी सरल नहीं थी। न पक्की सड़कें थीं, न आरामदायक वाहन। महीनों की कठिन और थका देने वाली यात्रा के बाद जब वे जगन्नाथ पुरी पहुंचे, तो मंदिर के आसपास भक्तों की भीड़ देखकर उनका मन आनंद से भर गया।

मन में एक ही भाव था - आज अपने राम के दर्शन होंगे।

वे मंदिर में प्रवेश कर गए।

लेकिन जैसे ही भगवान जगन्नाथ के दर्शन किए, उनके मन को जैसे एक गहरा धक्का लगा।

वे कुछ क्षण तक भगवान को देखते रहे।

उनके सामने भगवान जगन्नाथ का अद्भुत स्वरूप था - विशाल गोल नेत्र और हाथ-पैर का स्पष्ट स्वरूप नहीं।

तुलसीदास जी के मन में विचार उठा - मेरे राम तो धनुष-बाण धारण करने वाले हैं, सुंदर श्याम स्वरूप हैं, उनके हाथ हैं, चरण हैं। यह अलग स्वरूप मेरे राम कैसे हो सकते हैं?

उनका मन उदास हो गया।

जिस उत्साह के साथ वे दर्शन करने आए थे, उसी मन के बोझ के साथ वे मंदिर से बाहर निकल आए और एक वृक्ष के नीचे जाकर बैठ गए।

मन में जैसे प्रश्नों का तूफान था।

इतनी दूर से आया... महीनों की यात्रा की... और यहां आकर भी अपने राम के दर्शन नहीं हुए।

रात धीरे-धीरे उतर आई। यात्रा की थकान शरीर पर हावी थी। भूख और प्यास से शरीर टूट रहा था, लेकिन मन की उदासी उससे कहीं अधिक भारी थी।

तभी रात के सन्नाटे में किसी ने आवाज लगाई -

अरे बाबा!

तुलसीदास जी ने चौंककर पीछे देखा।

उन्होंने पूछा - कौन?

एक बालक हाथ में थाली लिए खड़ा था।

बालक ने कहा - आप ही तुलसीदास जी हैं ना? मैं बड़ी देर से आपको खोज रहा हूं।

तुलसीदास जी ने सोचा कि शायद किसी ने मंदिर में उनके आने की सूचना दे दी होगी।

बालक ने थाली आगे बढ़ाते हुए कहा - लीजिए बाबा, जगन्नाथ जी ने आपके लिए प्रसाद भेजा है।

तुलसीदास जी ने विनम्रता से कहा - भैया, कृपा करके इसे वापस ले जाइए।

बालक को आश्चर्य हुआ।

उसने पूछा - क्यों बाबा? स्वयं जगन्नाथ जी ने आपके लिए प्रसाद भेजा है और आप उसे स्वीकार नहीं कर रहे?

तुलसीदास जी बोले - मैं अपने इष्टदेव को भोग लगाए बिना कुछ ग्रहण नहीं करता। मेरे इष्ट श्रीराम हैं। यदि मैं इस प्रसाद को अपने प्रभु को समर्पित ही नहीं कर सकता, तो इसे कैसे ग्रहण करूं?

बालक मुस्कुराया।

उसने पूछा - बाबा, आपको कैसे पता कि आपके इष्ट ने ही यह प्रसाद नहीं भेजा?

तुलसीदास जी बोले - मेरे इष्ट श्रीराम हैं। यह हस्त-पाद रहित दारुमूर्ति मेरे राम कैसे हो सकती है?

बालक के चेहरे पर एक गहरी मुस्कान आई।

फिर उसने ऐसा प्रश्न किया जिसने तुलसीदास जी के भीतर जैसे सब कुछ बदल दिया।

उसने कहा - बाबा, अपने ही श्रीरामचरितमानस में आपने प्रभु के स्वरूप का वर्णन नहीं किया है क्या?

और फिर बालक ने वही चौपाई सुनाई -

बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना।
कर बिनु करम करइ बिधि नाना॥
आनन रहित सकल रस भोगी।
बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥

अर्थात प्रभु बिना पैरों के चलते हैं, बिना कानों के सुनते हैं, बिना हाथों के अनेक प्रकार के कर्म करते हैं। बिना मुख के सभी रसों का भोग करते हैं और बिना वाणी के भी महान वक्ता हैं।

यह सुनते ही तुलसीदास जी जैसे भीतर तक हिल गए।

जिस स्वरूप को देखकर वे कुछ देर पहले निराश होकर मंदिर से बाहर निकल आए थे, उसी निराकार और अगम्य स्वरूप का वर्णन तो उन्होंने स्वयं अपने रामचरितमानस में किया था।

उनकी आंखों से अश्रु बहने लगे।

मुख से शब्द निकलना कठिन हो गया।

उन्हें लगा जैसे भगवान कह रहे हों - तुलसी, तुम मुझे अपने मन के बनाए हुए एक ही रूप में क्यों खोज रहे हो?

तुलसीदास जी का भ्रम टूट चुका था।

जिसे वे अपने राम से अलग समझ रहे थे, वही तो उनके राम का एक और स्वरूप था।

तुलसीदास जी कुछ बोल पाते, उससे पहले बालक ने थाली वहीं रख दी और मुस्कुराते हुए कहा -

मैं ही तुम्हारा राम हूं।

मेरे मंदिर के चारों द्वारों पर हनुमान पहरा देते हैं। विभीषण नित्य मेरे दर्शन करने आते हैं। कल प्रातः तुम फिर आना और अपने प्रभु के दर्शन करना।

इतना कहकर वह बालक वहां से अंतर्धान हो गया।

अब तुलसीदास जी की स्थिति कैसी थी, इसे शब्दों में बताना कठिन है।

शरीर रोमांचित था। आंखों से अश्रु अविरल बह रहे थे। जिस प्रभु को पाने के लिए वे इतनी दूर चले आए थे, उन्हीं प्रभु को अपने सामने पहचान न पाने का भाव उनके हृदय को भीतर तक भिगो रहा था।

उन्होंने बड़े प्रेम और श्रद्धा से वह प्रसाद ग्रहण किया।

सुबह होते ही तुलसीदास जी फिर जगन्नाथ मंदिर पहुंचे।

और भक्त परंपरा में कहा जाता है कि उस दिन उनके लिए वह दृश्य अद्भुत था।

जहां सामान्यतः उन्हें भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और माता सुभद्रा के दर्शन होते थे, वहां उन्हें अपने आराध्य श्रीराम, लक्ष्मण और माता जानकी के दिव्य दर्शन हुए।

तुलसीदास जी की आंखों से अश्रुधारा बह निकली।

अब उनके लिए कोई प्रश्न शेष नहीं था।

उन्हें समझ में आ गया कि भगवान को किसी एक रूप में बांधा नहीं जा सकता।

राम वही हैं, जगन्नाथ वही हैं।
नाम अलग हो सकते हैं, रूप अलग हो सकते हैं, लेकिन भक्त के हृदय में विराजमान प्रभु एक ही हैं।

भक्त जिस भाव से भगवान को पुकारता है, भगवान उसी भाव में उसके सामने प्रकट हो जाते हैं।

कहा जाता है कि जिस स्थान पर तुलसीदास जी ने उस रात विश्राम किया था, वह स्थान आगे चलकर तुलसी चौरा के नाम से प्रसिद्ध हुआ और वहां उनकी पीठ बड़छता मठ के रूप में प्रतिष्ठित हुई।

इस कथा का सबसे सुंदर संदेश शायद यही है कि भगवान को पहचानने के लिए केवल आंखें पर्याप्त नहीं हैं।

दर्शन आंखों से होते हैं, लेकिन पहचान प्रेम से होती है।

तुलसीदास जी श्रीराम को खोजते हुए जगन्नाथ पुरी पहुंचे थे, लेकिन प्रभु ने उन्हें समझा दिया कि जिसे वे राम कहकर पुकारते हैं, वही जगन्नाथ बनकर उनके सामने विराजमान हैं।

शायद इसी को भक्ति कहते हैं - भगवान को अपने मन के बनाए हुए रूप में नहीं, बल्कि उनके हर रूप में पहचान लेना।

किसी के लिए वे राम हैं, किसी के लिए कृष्ण, किसी के लिए जगन्नाथ और किसी के लिए शिव। नाम और रूप अलग हो सकते हैं, लेकिन भाव सच्चा हो तो भगवान कभी दूर नहीं होते।

हरि अनंत, हरि कथा अनंता...

रामायण संदेश की इस कथा-श्रृंखला में ऐसी ही लोकश्रुतियों, भक्तों की अनुभूतियों और रामकथा से जुड़े भावपूर्ण प्रसंगों के साथ फिर मिलेंगे।

अगली कथा में फिर मिलेंगे एक नए प्रसंग और एक नए भाव के साथ। तब तक प्रभु श्रीराम को अपने हृदय में बसाए रखिए।

श्रीहरि चरणों का दास - सुनील मिश्रा

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