भारत एक धर्म प्रधान देश है इसलिए इसकी एक संज्ञा “धर्मप्राण”भी है। धर्म के मर्म को उजागर करने सब धर्मों को पुनः जागृत करने और धार्मिकों विशेषकर देश विदेश में रह रहे सवा सौ करोड़ से अधिक सनातन धर्मियों के मार्ग दर्शन के लिए एक ऐसी संसद की आवश्यकता समझी गई है। जो सच्चे धर्म को वर्तमान वैश्विक के सामने लाए और उन्मुख जनता का मार्गदर्शन करें।
उस सच्चे धर्म को जनता के सामने लाना है जो उनके ऐहिकामुष्मिक
कल्याण का कारण बन सके।
धर्म के नाम पर पाखण्ड, अन्धश्रद्धा और राजनीति का उन्मूलन करना है।
उपर्युक्त उद्देश्यों को पूरा करने के लिये परमधर्मसंसद् 1008 की स्थापना और संचालन के साथ ही साथ वे सभी कार्य करना जो कि परमधर्मसंसद् 1008 के मूल उद्देश्य की पूर्ति में सहायक होता हो।
परमधर्मसंसद् 1008 के माध्यम से उन बिन्दुओं पर देश के विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधियों की राय जानकर विशेषज्ञों से अनुमोदन कराकर परमधर्मादेश निरूपित कराना और देश की जनता को बताना भी संस्था का उद्देश्य है ।
धर्म के विषय में फैली भ्रान्तियों पर चर्चा कराकर शास्र और युक्तिसम्मत ऐसा निर्णय करवाना जिसे जनता स्वीकार कर सके और भ्रम की स्थिति से निकल सके ।
आवश्यकता पड़ने और चाहे जाने पर देश की संसद तथा न्यायालयों आदि को उनके निर्णयों में सहयोग करने के लिये बौद्धिक संसाधन उपलब्ध करवाना भी इस परमधर्मसंसद् 1008 के उद्देश्यों में से है ।
देश की प्राचीन मान्यताओं को संरक्षित करना,
आध्यात्मिक घनीभूतता बनाये रखना,
साम्प्रदायिक सौहार्द्र का सृजन करना और
समाज के प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानित जीवन व्यतीत करने में सहयोग देने वाले समस्त कार्य करना ।