ज्योतिष श्री पण्डित अमर रतूड़ी जी

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ज्योतिष श्री पण्डित अमर रतूड़ी जी "ज्योतिष शास्त्री एवं कर्मकांड विशेष? KUNDALI solution and KARMAKAND

03/07/2024

आजकल एक कुप्रथा चल पड़ी है कि पूजन आरंभ होते हीं रूमाल निकाल कर सर पर रख लेते हैं, और कर्मकांड के लोग भी नहीं मना करते । जबकि पूजा में सिर ढकने को शास्त्र निषेध करता है। शौच के समय हीं सिर ढकने को कहा गया है। प्रणाम करते समय,जप व देव पूजा में सिर खुला रखें। तभी शास्त्रोचित फल प्राप्त होगा।

शास्त्र क्या कहते हैं ? आइए देखते हैं...

उष्णीषो कञ्चुकी चात्र मुक्तकेशी गलावृतः ।
प्रलपन् कम्पनश्चैव तत्कृतो निष्फलो जपः ॥
अर्थात् -
पगड़ी पहनकर, कुर्ता पहनकर, नग्न होकर, शिखा खोलकर, कण्ठको वस्त्रसे लपेटकर, बोलते हुए, और काँपते हुए जो जप किया जाता है, वह निष्फल होता है ।'

शिर: प्रावृत्य कण्ठं वा मुक्तकच्छशिखोऽपि वा |
अकृत्वा पादयोः शौचमाचांतोऽप्यशुचिर्भवेत् ||

( -कुर्म पुराण,अ.13,श्लोक 9)

अर्थात्-- सिर या कण्ठ को ढककर ,शिखा तथा कच्छ(लांग/पिछोटा) खुलने पर,बिना पैर धोये आचमन करने पर भी अशुद्ध रहता हैं(अर्थात् पहले सिर व कण्ठ पर से वस्त्र हटाये,शिखा व कच्छ बांधे, फिर पाँवों को धोना चाहिए, फिर आचमन करने के बाद व्यक्ति शुद्ध(देवयजन योग्य) होता है)।

सोपानस्को जलस्थो वा नोष्णीषी वाचमेद् बुधः।

-कुर्म पुराण,अ.13,श्लोक 10अर्ध।

अर्थात्-- बुध्दिमान् व्यक्ति को जूता पहनें हुए,जल में स्थित होने पर,सिर पर पगड़ी इत्यादि धारणकर आचमन नहीं करना चाहिए ।

शिरः प्रावृत्य वस्त्रोण ध्यानं नैव प्रशस्यते।-(कर्मठगुरूः)

अर्थात्-- वस्त्र से सिर ढककर भगवान का ध्यान नहीं करना चाहिए ।

उष्णीशी कञ्चुकी नग्नो मुक्तकेशो गणावृत।
अपवित्रकरोऽशुद्धः प्रलपन्न जपेत् क्वचित् ॥-

(शब्द कल्पद्रुम )

अर्थात्-- सिर ढककर,सिला वस्त्र धारण कर,बिना कच्छ के,शिखा खुलीं होने पर ,गले के वस्त्र लपेटकर ।

अपवित्र हाथों से,अपवित्र अवस्था में और बोलते हुए कभी जप नहीं करना चाहिए ।।

न जल्पंश्च न प्रावृतशिरास्तथा।-योगी याज्ञवल्क्य

अर्थात्-- न वार्ता करते हुए और न सिर ढककर।

अपवित्रकरो नग्नः शिरसि प्रावृतोऽपि वा ।
प्रलपन् प्रजपेद्यावत्तावत् निष्फलमुच्यते ।। (रामार्च्चनचन्द्रिकायाम्)

अर्थात्-- अपवित्र हाथों से,बिना कच्छ के,सिर ढककर जपादि कर्म जैसे किये जाते हैं, वैसे ही निष्फल होते जाते हैं ।

शिव महापुराण उमा खण्ड अ.14-- सिर पर पगड़ी रखकर,कुर्ता पहनकर ,नंगा होकर,बाल खोलकर ,गले के कपड़ा लपेटकर,अशुद्ध हाथ लेकर,सम्पूर्ण शरीर से अशुद्ध रहकर और बोलते हुए कभी जप नहीं करना चाहिए ।।

13/09/2022

ब्राह्मण सनातन का वो सेतु है जिसने इतिहास के सारे थपेड़े झेल कर भी सनातन की पोथी नहीं छोड़ी,ओर सदियों से सनातन को हिन्दुओ की एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में रोपते रहा.. हजारों वर्षों से सनातन धर्म को हिंदुओं की एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में पहुंचाते रहे। एक ब्राह्मण ही है जिस पर सारे हमले पहले हुए मुगलों ने पहला आक्रमण मंदिरों और पुजारियों पर किया अंग्रेजों ने पहला आक्रमण मंदिर और पुजारियों पर किया कांग्रेस वामपंथियों ने ब्राह्मणवाद के नाम पर पहला हमला ब्राह्मणों पर किया चर्च मिशनरियों ने पहला हमला ब्राह्मणों पर किया! हजार साल के क्रूर इस्लामिक शासनकाल में भी ब्राह्मण ने अपनी सनातनी पोथी नहीं छोड़ी बल्कि तलवार की धार पर चलकर भी अपने हिंदू समाज को सनातन की जड़ों से जोड़े रखा, हर गांव का पुजारी पूज्य है अनपढ़ पुजारी ने भी गांव के छोटे से मंदिर में सनातन की परंपराओं को जिंदा रखा और गांव को तीज त्योहारों के माध्यम से सनातन जीवन पद्धति से जोड़े रखा, यही कारण है कि यूनान रोम और मिश्र 100 साल के आक्रमण में ही अपनी सभ्यता खो बैठे लेकिन एक सनातन भारत है जो हजार साल के आक्रमण काल के बावजूद अपनी सभ्यता संस्कृति को बचाने मैं सफल रहा क्योंकि उसके पास सनातन को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक उसी रूप में पहुंचाने वाले ब्राह्मण थे। और यही कारण है कि सारे हिंदू विरोधी सारे देश द्रोही चर्च मिशनरी सब का पहला टारगेट ब्राह्मण होता है क्योंकि उन्हें पता है सनातन को खत्म करने की पहली शर्त है कि पहले ब्राह्मण को खत्म करना पड़ेगा जब तक ब्राह्मण जिंदा है सनातन को कोई खत्म नहीं कर सकता। इसलिए सनातनी हिंदू अपने पूज्य संत महंत पुजारियों की कीमत समझे यह सामान्य नहीं बल्कि हजारों वर्षों के संघर्ष में खून से लथपथ होने के बावजूद अपने सनातन की पोथी नहीं छोड़ने वाले धर्मवीर है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हिंदुओं में सनातन पहुंचाते हैं।

24/07/2022

क्या होते हैं अघोरी? कैसी होती है अघोर विद्या?

अघोरियों का नाम सुनते ही अमूमन लोगों के मन में डर बैठ जाता है। अघोरी की कल्पना की जाए तो शमशान में तंत्र क्रिया करने वाले किसी ऐसे साधू की तस्वीर जहन में उभरती है जिसकी वेशभूषा डरावनी होती है। लेकिन क्या वास्तव में अघोरी ऐसे ही होते हैं? इन्हें अघोरी क्यों कहा जाता है? अघोरी का अर्थ क्या है और अघोर विद्या किसे कहते हैं?
ऐसे कई सवाल आज भी लोगों के लिए अबूझ पहेली जैसे ही हैं। अघोर विद्या वास्तव में डरावनी नहीं है। उसका स्वरूप डरावना होता है। अघोर का अर्थ है अ+घोर यानी जो घोर नहीं हो, डरावना नहीं हो, जिसमें कोई भेदभाव नहीं हो। अघोर क्रिया व्यक्त को सहज बनाती है। मूलत: अघोरी उसे कहते हैं जिसके भीतर से अच्छे-बुरे, सुगंध-दुर्गंध, प्रेम-नफरत, ईष्र्या-मोह जैसे सारे भाव मिट जाए। जो किसी में फर्क न करे। जो शमशान जैसी डरावनी जगह पर भी उसी सहजता से रह ले जैसे लोग घरों में रहते हैं।
अघोर विद्या भी व्यक्ति को ऐसी शक्ति देती है जो उसे हर चीज के प्रति समान भाव रखने की शक्ति देती है। अघोरी तंत्र को बुरा समझने वाले शायद यह नहीं जानते हैं कि इस विद्या में लोक कल्याण की भावना है। अघोर विद्या व्यक्ति को ऐसा बनाती है जिसमें वह अपने-पराए का भाव भूलकर हर व्यक्ति को समान रूप से चाहता है, उसके भले के लिए अपनी विद्या का प्रयोग करता है।
अघोर विद्या या अघोरी डरने के पात्र नहीं होते हैं, उन्हें समझने की दृष्टि चाहिए। अघोर विद्या के जानकारों का मानना है कि जो असली अघोरी होते हैं वे कभी आम दुनिया में सक्रिय भूमिका नहीं रखते, वे केवल अपनी साधना में ही व्यस्त रहते हैं। हां, कई बार ऐसा होता है कि अघोरियों के वेश में कोई ढोंगी, आपको ठग सकता है। अघोरियों की पहचान ही यही है कि वे किसी से कुछ मांगते नहीं है।

21/02/2022

भगवान की आरती क्यों की जाती है ?

‘आरती’ शब्द संस्कृत के ‘आर्तिका’ शब्द से बना है जिसका अर्थ है अरिष्ट, विपत्ति, आपत्ति, कष्ट, क्लेश । भगवान की आरती को ‘नीराजन’ भी कहते हैं । नीराजन का अर्थ है ‘विशेष रूप से प्रकाशित करना’ ।

आरती के इन्हीं दो अर्थों के आधार पर भगवान की आरती करने के दो कारण (भाव) बतलाये गये हैं—

▪️प्रथम भाव है—आरती या नीराजन में दीपक की लौ को देवता के समस्त अंग-प्रत्यंग में बार-बार इस प्रकार घुमाया जाता है कि भक्तगण आरती के प्रकाश में भगवान के चमकते हुए आभूषण और श्रीअंग की कान्ति की जगमगाहट का दर्शन करके आनन्दित हो सके और उस छवि को अच्छी तरह निहार कर हृदय में स्थित कर सकें; इसीलिए आरती को नीराजन कहते हैं क्योंकि इसमें भगवान की छवि को दीपक की लौ से विशेष रूप से प्रकाशित किया जाता है ।

▪️दूसरे भाव के अनुसार आरती के द्वारा साधक अपने आराध्य के अरिष्टों को दीपक की लौ से विनष्ट कर देता है । भगवान की रूप माधुरी अप्रतिम होती है । जब भक्त उन्हें एकटक निहारता है तो उन्हें नजर भी लग जाती है । आरती के दीपक की लौ से भगवान के समस्त अरिष्टों को दूर करने का प्रयास किया जाता है ।

भगवान की आरती होने के बाद भक्तगण जो दोनों हाथों से आरती लेते हैं उसके भी दो भाव हैं—

पहला—जिस दीपक की लौ ने हमें अपने आराध्य के नख-शिख के इतने सुन्दर दर्शन कराये उसकी हम बलैया लेते हैं, सिर पर धारण करते हैं ।

दूसरा—जिस दीपक की बाती ने भगवान के अरिष्ट हरे हैं, जलाए हैं, उसे हम हमने मस्तक पर धारण करते हैं ।

कैसे करें भगवान की सच्ची आरती ?
यह संसार पंच महाभूतों—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से बना है । आरती में ये पांच वस्तुएं (पंच महाभूत) रहते है—

पृथ्वी की सुगंध—कपूर
जल की मधुर धारा—घी
अग्नि—दीपक की लौ
वायु—लौ का हिलना
आकाश—घण्टा, घण्टी, शंख, मृदंग आदि की ध्वनि ।
इस प्रकार सम्पूर्ण संसार से ही भगवान की आरती होती है ।

मानव शरीर भी पंचमहाभूतों से बना है । मनुष्य अपने शरीर से भी ईश्वर की आरती कर सकता है । लेकिन कैसे ?

अपने देह का दीपक, जीवन का घी, प्राण की बाती, और आत्मा की लौ सजाकर भगवान के इशारे पर नाचना—यही आरती है । इस तरह की सच्ची आरती करने पर संसार का बंधन छूट जाता है और जीव को भगवान के दर्शन होने लगते हैं ।

आरती करने की विधि!!!!!!!!

▪️एक थाली में स्वस्तिक का चिह्न बनाएं और पुष्प व अक्षत के आसन पर एक दीपक में घी की बाती और कपूर रखकर प्रज्ज्वलित करें । प्रार्थना करें—‘हे गोविन्द ! आपकी प्रसन्नता के लिए मैंने रत्नमय दीयट में कपूर और घी में डुबोई हुई बाती जलाई है जो मेरे जीवन के सारे अंधकार दूर कर दें ।’

फिर एक ही स्थान पर खड़े होकर भगवान की आरती करें ।

▪️भगवान की आरती उतारते समय चार बार चरणों में, दो बार नाभि पर, एक बार मुखमण्डल पर व सात बार सभी अंगों पर घुमाने का विधान है । इसके बाद शंख में जल लेकर भगवान के चारों ओर घुमाकर अपने ऊपर तथा भक्तजनों पर जल छोड़ दें । फिर मन से ही ठाकुरजी को साष्टांग प्रणाम करें । इस तरह भगवान की आरती उतारने का विधान है ।

▪️घर में एक बाती की ही आरती करनी चाहिए । जबकि मन्दिरों में 5, 7, 11, 21 या 31 बातियों से आरती की जाती है ।

▪️भगवान की शुद्ध घी में डुबोई बाती से आरती करनी चाहिए ।

▪️पूजन चाहे छोटा (पंचोपचार) हो या बड़ा (षोडशोपचार), बिना आरती के पूर्ण नहीं माना जाता है ।

भगवान की आरती करने व देखने का महत्व
▪️जिस प्रकार आरती के दीपक की बाती ऊपर की ओर रहती है उसी प्रकार आरती देखने, करने व लेने से मनुष्य आध्यात्मिक दृष्टि से उच्चता प्राप्त करता है ।

▪️जो भगवान विष्णु की आरती को नित्य देखता है या करता है, वह सात जन्म तक ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर अंत में मोक्ष पाता है ।

▪️कपूर से भगवान की आरती करने पर अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है साथ ही मनुष्य के कुल का उद्धार हो जाता है और अंत में साधक भगवान अनंत में ही मिल जाता है ।

▪️घी की बाती से जो मनुष्य भगवान की आरती उतारता है वह बहुत समय तक स्वर्गलोक में निवास करता है ।🙏🙏🙏

01/01/2022

*जनेऊ क्या है और इसकी क्या महत्वता है?*

*भए कुमार जबहिं सब भ्राता। दीन्ह जनेऊ गुरु पितु माता॥

जनेऊ क्या है : आपने देखा होगा कि बहुत से लोग बाएं कांधे से दाएं बाजू की ओर एक कच्चा धागा लपेटे रहते हैं। इस धागे को जनेऊ कहते हैं। जनेऊ तीन धागों वाला एक सूत्र होता है। जनेऊ को संस्कृत भाषा में ‘यज्ञोपवीत’ कहा जाता है।

यह सूत से बना पवित्र धागा होता है, जिसे व्यक्ति बाएं कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है। अर्थात इसे गले में इस तरह डाला जाता है कि वह बाएं कंधे के ऊपर रहे।

तीन सूत्र क्यों : जनेऊ में मुख्यरूप से तीन धागे होते हैं। यह तीन सूत्र देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण के प्रतीक होते हैं और यह सत्व, रज और तम का प्रतीक है। यह गायत्री मंत्र के तीन चरणों का प्रतीक है।यह तीन आश्रमों का प्रतीक है। संन्यास आश्रम में यज्ञोपवीत को उतार दिया जाता है।

नौ तार : यज्ञोपवीत के एक-एक तार में तीन-तीन तार होते हैं। इस तरह कुल तारों की संख्या नौ होती है। एक मुख, दो नासिका, दो आंख, दो कान, मल और मूत्र के दो द्वारा मिलाकर कुल नौ होते हैं।

पांच गांठ : यज्ञोपवीत में पांच गांठ लगाई जाती है जो ब्रह्म, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रतीक है। यह पांच यज्ञों, पांच ज्ञानेद्रियों और पंच कर्मों का भी प्रतीक भी है।

वैदिक धर्म में प्रत्येक आर्य का कर्तव्य है जनेऊ पहनना और उसके नियमों का पालन करना। प्रत्येक आर्य को जनेऊ पहन सकता है बशर्ते कि वह उसके नियमों का पालन करे।

जनेऊ की लंबाई : यज्ञोपवीत की लंबाई 96 अंगुल होती है। इसका अभिप्राय यह है कि जनेऊ धारण करने वाले को 64 कलाओं और 32 विद्याओं को सीखने का प्रयास करना चाहिए।

चार वेद, चार उपवेद, छह अंग, छह दर्शन, तीन सूत्रग्रंथ, नौ अरण्यक मिलाकर कुल 32 विद्याएं होती है। 64 कलाओं में जैसे- वास्तु निर्माण, व्यंजन कला, चित्रकारी, साहित्य कला, दस्तकारी, भाषा, यंत्र निर्माण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, दस्तकारी, आभूषण निर्माण, कृषि ज्ञान आदि।

30/11/2021

ज्योतिष शास्त्र अनुसार निम्न योगों द्वारा व्यक्ति का वैवाहिक जीवन अच्छा तथा वैवाहिक जीवन में अलगाव, तनाव तथा आपसी मतभेद का सरलता से ज्ञान प्राप्त किया जा सकता हैः
� -यदि सप्तमेश की स्थिति केंद्र या त्रिकोण भाव में हो या सप्तमेश एकादश भाव में स्थित हो तथा विवाह के कारक ग्रह गुरु और शुक्र शुभ भाव में स्थित हों तो जातक का वैवाहिक जीवन खुशहाल रहता है।

� -सप्तम भाव तथा सप्तमेश पर शुभ ग्रहों की दृष्टि जातक को खुशहाल वैवाहिक जीवन प्रदान करती है।

� -यदि जन्म कुंडली में सप्तमेश लग्न या पंचम भाव में हो तो ऐसे जातक का जीवनसाथी उसे दिल से प्यार करता है।

� -यदि नवमांश कुंडली में लग्न कुंडली के सप्तमेश की स्थिति अच्छी हो तथा नवमांश कुंडली का सप्तमेश नवमांश कुंडली में शुभ भाव में स्थित हो तो ऐसे व्यक्ति का वैवाहिक जीवन खुशहाल रहता है। असफल वैवाहिक जीवन के योग

� -यदि सप्तमेश छठे, आठवें, द्वितीय या द्वादश भाव में स्थित हो तथा शादी का कारक ग्रह गुरु या शुक्र अशुभ भाव में स्थित हों तथा पाप ग्रहों से दृष्ट हों तो जातक का वैवाहिक जीवन अत्यधिक तनावपूर्ण रहता है।

� -यदि सप्तमेश वक्री हो तो जातक का वैवाहिक जीवन अच्छा नहीं होता।

� -यदि सूर्य और शुक्र पंचम, सप्तम तथा नवम भाव में स्थित हों तो ऐसे जातक का वैवाहिक जीवन अच्छा नहीं होता।

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� -यदि केतु लग्न, चतुर्थ, पंचम या दशम भाव में स्थित हों तो ऐसे जातक शकी होने के कारण वैवाहिक जीवन का सुख नहीं ले पाते।

� -यदि सप्तमेश अशुभ भाव (2,6,8,12) में स्थित हों तथा षष्ठेश वक्री हो, तो जातक उम्र भर तलाक को लेकर लंबी कानूनी लड़ाई लड़ता है, लड़ाई लड़ने के बाद भी उसको तलाक में सफलता नहीं मिलती।

� -यदि सप्तमेश द्वादश भाव में शुक्र के साथ स्थित हो तो ऐसे जातक का चरित्र संदेहजनक होता है, जिसके कारण उसका वैवाहिक जीवन सुखी नहीं होता।

� -यदि चंद्रमा 6,8,12 में स्थित हो, तो जातक मानसिक स्तर पर हमेशा विचलित रहता है जिसके कारण उसका वैवाहिक जीवन सुखी नहीं रहता।

� -जन्म कुंडली में राहु की स्थिति लग्न, द्वितीय या अष्टम भाव में हो, तो ऐसा जातक जिद्दी स्वभाव का होने के कारण अपना वैवाहिक जीवन नष्ट कर डालता है।

� -यदि जन्मकुंडली में चंद्रमा और सूर्य पाप ग्रहों की राशि में (सूर्य, मंगल, शनि) हो तो ऐसे जातक कलहप्रिय होते हैं जिसके कारण उनका वैवाहिक जीवन शुभ नहीं होता।

29/11/2021

पुरुष की जन्मपत्रिका में शुक्र पत्नी का एवं स्त्री की जन्मपत्रिका में गुरु पति का कारक माना गया है. जन्मपत्रिका का द्वादश भाव शैय्या सुख का भाव होता है. अत: इन दाम्पत्य सुख प्रदाता कारकों पर यदि पाप ग्रहों, क्रूर ग्रहों व अलगाववादी ग्रहों का प्रभाव हो तो व्यक्ति आजीवन दाम्पत्य सुख को तरसता रहता है. सूर्य, शनि, राहु अलगाववादी स्वभाव वाले ग्रह हैं. वहीं मंगल व केतु मारणात्मक स्वभाव वाले ग्रह है. ये सभी दाम्पत्य-सुख के लिए हानिकारक होते हैं. आइये जानते हैं कि किन योगों के कारण व्यक्ति इससे वंचित होता है.

यदि सप्तम भाव पर राहु, शनि व सूर्य की दृष्टि हो एवं सप्तमेश अशुभ स्थानों में हो और शुक्र पीड़ित व निर्बल हो तो व्यक्ति को दाम्पत्य-सुख नहीं मिलता.

यदि सूर्य-शुक्र की युति हो व सप्तमेश निर्बल व पीड़ित हो एवं सप्तम भाव पर पाप ग्रहों का प्रभाव हो तो व्यक्ति को दाम्पत्य सुख प्राप्त नहीं होता.

यदि सप्तमेश निर्बल व पीड़ित हो एवं सप्तम भाव पर अशुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो व्यक्ति को दाम्पत्य सुख प्राप्त नहीं होता.

यदि लग्न में शनि स्थित हो और सप्तमेश अस्त, निर्बल या अशुभ स्थानों में हो तो जातक का विवाह विलम्ब से होता है व जीवनसाथी से उसका मतभेद रहता है.

यदि सप्तम भाव में राहु स्थित हो और सप्तमेश पाप ग्रहों के साथ छ्ठे, आठवें या बारहवें भाव में स्थित हो तो जातक के तलाक की सम्भावना होती है.

यदि किसी स्त्री की जन्मपत्रिका में गुरु पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव हो, सप्तमेश पाप ग्रहों से युत हो एवं सप्तम भाव पर सूर्य, शनि व राहु की दृष्टि हो तो ऐसी स्त्री को दाम्पत्य सुख प्राप्त नहीं होता.

29/11/2021

कुंडली में तथा हमारे जीवन में महादशा, अंतर्दशा और प्रत्यर्पण दशा तथा अन्य दशाओं का क्या महत्व है ?............................................................................
हमारे कुंडली में चंद्रमा से राशि और चंद्रमा जिनके नक्षत्र में स्थित हो l उसका नक्षत्र स्वामी महादशा निर्धारित करता है l
यानि मान लीजिए किसी कुंडली में वृष राशि में चंद्रमा स्थित हो तो जातक या जातिका का वृष राशि हुआ l अगर रोहिणी नक्षत्र का चंद्रमा हो जाहिर सी बात है l रोहिणी नक्षत्र के स्वामी चंद्र ही हैं जातक या जातिका की महादशा चंद्रमा से ही जन्म के समय प्रारंभ होगा लेकिन अगर कृतिका नक्षत्र का चंद्रमा है तो नक्षत्र स्वामी के अनुसार सूर्य की महादशा से प्रारंभ होगा l.............................................................................
उसके बाद ही हम गणितीय विधि से अंतर्दशा एवं अंतर्दशा निकलते हैं l महादशा से अगर आकी जाय तो हमारी कुल आयु
120 साल होती है l ख़ैर ये सब गणितीय सिद्धांत हैं ज्योतिष के............................................................................
हमारी जो मनोदशा, व्यवहार, स्वभाव, रंग रूप, जीवन की घटनाएं हैं l ये हमारी महादशा अंतर्दशा पर निर्भर करती है l..........................................................................
आपने सुना होगा l कल तक इस जातक का व्यवहार बहुत अच्छा था l सबके बारे में सोचता था लेकिन अब स्वार्थी हो गया है l पहले वह कितना सुंदर था अब बिलकुल रोगी जैसा दिखता है l कल तक गरीब था आज अमीर हो गया l ...........................................................................
ये सारे परिदृश हमारे महादशा और अंतर्दशा पर निर्भर करता है l जैसे अगर आपका सूर्य की महादशा है l जाहिर सी बात है सूर्य आपमें प्रखरता लाएगा l कुंडली में शुभ है तो स्वाभिमानी बनाएगा l न्यायप्रिय बनाएगा l अन्याय का विरोधी होगा l प्रशासनिक छेत्र से लाभ लेगा l सरकार से लाभ होगा l
अभिमानी, अहंगी, तानाशाही रवैया भी हो सकता है l
अगर कुंडली में सूर्य अशुभ है l जाहिर सी बात है l राजदंड यानि आयकर विभाग , सेल टैक्स, प्रशासन से परेशानी हो सकती है l पिता को स्वास्थ संबंधी परेशानी हो सकती है l आपको रीड़ संबंधी परेशानियां हो सकती हैं l पिता से व्याचारिक मतभेद हो सकते हैं l
ये सब लक्षण दिखने लगेंगे l .........................................................................
सूर्य के बाद चंद्रमा की महादशा में सूर्य जैसा अकड़पन आपके स्वभाव में नहीं रह जाएगा l आप थोड़ा शांत और सौम्य स्वभाव के हो जाएंगे l अच्छा अवस्था में रहा तो चंचलता देगी l सौंदर्य प्रेमी बनाएगा l
यानि जैसे ही महादशा बदलेगी आपके हर चीज में उसी अनुसार से बदलाव आ जाएगा l.............................................................................
आप क्या सोचते हैं क्या समझते हैं l सब बदल जाएंगे l यहां तक कि आपका रंग रूप भी l.........................................................................
उसी प्रकार अंतर्दशा भी आपके जीवन पद्धति को बदलती है l
उदाहरण स्वरूप सूर्य की महादशा हो राहु की अंतर्दशा हो तो आप के ऊपर कलंक या आरोप जरूर लगेंगे l चाहे वह झूठा ही क्यों ना हो l
उसी प्रकार गजकेशरी योग में चंद्रमा की महादशा में गुरु की अंतर्दशा हो या गुरु की महादशा में चंद्रमा की अंतर्दशा हो आपका जीवन स्तर जरूर ऊंचा होगा चाहे आप मकान लें या गाड़ी लें या कोई सफलता पाय l........................................................................
इस प्रकार से जीवन में हमारे बहुत अच्छा बदलाव या खराब बदलाव होते रहते हैं l इसे और आप अगर और बारखी से देखना चाहते हैं तो आप पर प्रत्यर्पण दशा की ओर भी जा सकते हैं l

26/10/2019

नवल ज्योति से नव प्रकाश हो
नई सोच हो नई कल्पना
चहुँ दिशी यश, वैभव, सुख बरसे
पूरा हो जाए हर सपना
जिसमे सभी संग दीखते हों
कुछ ऐसे तस्वीर बनाओ
पहले स्नेह लुटाओ सब पर
फिर खुशियों के दीप जलाओ।।

🎇🎇🎆 दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं🎇🎇🎆

06/04/2019

भारतीय नववर्ष विक्रम संवत २०७६ की सभी मित्रों को हार्दिक शुभकामनाएं,,,,

10/02/2019

माघमासस्य शुक्लपक्षस्य पञ्चम्यां तिथौ ऋतुराजवसन्तस्य आगमनसूचना भवति। वसंतपंचमी श्रीपञ्चमी नाम्ना अपि ज्ञायते। अस्मिन् समये प्रकृतेः सौन्दर्यं चरमोत्कर्षम प्राप्नोति। सर्वत्र रमणीयतायाः दर्शनम् भवति। वृक्षेषु नूतनकिसलयरागः राजते। क्षेत्रेषु सर्षपपुष्पाणां सुषमा पीतिमा च मनोहारिणी दृश्यते। आम्रेषु मञ्जरीं परितः भ्रमंतः भ्रमराः दृश्यन्ते। कोकिलानां मधुरस्वरः चित्तम् आकर्षति। वसंतोत्सवे शीतकालस्य अनन्तरं परम्परया सौन्दरस्य पूजनं क्रियते। विविधैः पुष्पैः, नवान्नैः, फलैः च ऋतुराजस्य वसन्तस्य स्वागतं भवति। एषः उत्सवः सौन्दर्यस्य रमणीयतायाः पुष्पाणां, किसलयनां मधुरागमनस्य च उत्सवः अस्ति

19/11/2018

"क्यों हैं शनि देव को दृष्टि दोष"
भगवान शनिदेव का नाम सुनते ही लोगों के मन में दशहत का माहौल पैदा हो जाता है परन्तु शनिदेव हमेशा अहित नहीं करते। अगर शनिदेव किसी के ऊपर मेहरबान हो गए तो उसके वारे-न्यारे हो जाते हैं। शनिदेव सृष्टिकर्ता के इशारों पर चलने के लिए मजबूर हैं। वे स्वयं किसी का अहित नहीं करते। शनि के अधिदेवता प्रजापिता ब्रह्मा और प्रत्यधिदेवता यम हैं। शनि भगवान सूर्य तथा छाया संवर्णा के पुत्र हैं। शनि की दृष्टि में जोक्रूरता है, वह इनकी पत्नी के शाप के कारण है। ब्रह्म पुराण के अनुसार बचपन से ही शनि देवता भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त थे। वह श्रीकृष्ण के अनुराग में निमग्न रहा करते थे।वयस्क होने पर इनके पिता ने चित्ररथ की कन्या से इनका विवाह कर दिया। इनकी पत्नी सती-साध्वी और परम तेजस्विनी थी। शनि देव बचपन से ही कृष्णके भक्त थे। एक रात वह ऋतु-स्नान करके पुत्र प्राप्ति की इच्छा से इनके पास पहुंची पर ये श्रीकृष्ण के ध्यान में निमग्न थे। इन्हें बह्य संसार की सुधि ही नहीं थी। पत्नी प्रतीक्षा करके थक गई। उनका ऋतुकाल निष्फल हो गया। इसलिए उसने क्रुद्ध होकर शनिदेव को श्राप दे दिया कि आज से जिसे तुम देख लोगे, वह नष्ट हो जाएगा। ध्यान टूटने पर शनिदेव ने अपनी पत्नी को मनाया। पत्नी को भी अपनी भूल पर पश्चाताप हुआकिंतु श्राप के प्रतिकार की शक्ति उसमें न थी। तभी से शनि देवता अपना सिर नीचा करके रहने लगे क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि इनके द्वारा किसीका अनिष्ट हो।

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