18/02/2026
जब इंसान के मुँह से कथा सुननी है,
इंसान के मुँह से ही मंत्र सुनने हैं,
और इंसान के ही पैर पकड़ने हैं —
तो फिर अपने ही चरण क्यों नहीं पकड़ते....?
सोचने वाली बात यह है…
अगर किसी को मंच पर बैठाकर
दो लाख रुपये दे दिए जाएँ,
तो वही इंसान मंत्र-तंत्र, साधना, रहस्य, ब्रह्मांड-हर विषय पर लंबी व्याख्या देने लगेगा।
मतलब क्या निकला?
ज्ञान अक्सर अनुभव से नहीं,
अवसर से बोलने लगता है।
आजकल श्रद्धा कम है,
प्रस्तुति ज़्यादा है।
साधना कम है, संवाद ज़्यादा है।
असल गुरु बाहर नहीं होता,
असल गुरु भीतर होता है।
पर भीतर झाँकने का साहस कम लोगों में होता है,
इसलिए लोग बाहर चरण ढूँढते रहते हैं।
एक कड़वा सत्य:
जहाँ पैसा बैठा दिया जाए,
वहाँ प्रवचन अपने-आप खड़ा हो जाता है।
इसलिए प्रश्न यह नहीं कि
कौन कथा सुना रहा है… प्रश्न यह है कि
आप किसे सच मान रहे हैं-बाहर वाले शब्दों को, या भीतर की आवाज़ को।
क्योंकि जागा हुआ इंसान
किसी के पैर नहीं पकड़ता…
वह अपनी चेतना को प्रणाम करता है।
-श्री सीताराम बाबा
अवधूत अखाड़ा