28/01/2026
“ गुरु भागवत “ चतुर्थ खंड संदेश श्रृंखला १३
‘गुरु भागवत ' की विगत संदेश श्रृंखला के अंतर्गत गुरु पूर्णिमा अवसर पर श्री गुरु के पूजन की विधियों और भक्तों की आस्था का प्रसंग स्पष्ट किया गया था, इसी अनुक्रम में अगली छंद में वर्णित है -
“ कर्मकाण्डी पण्डित माने ।। दक्षिणामूर्ति आबाहने
शिवमंत्रे करि अर्चना ।। करन्ति गुरु आराधना ''
( गुरु पूर्णिमा के दिन कर्मकाण्डी अर्थात् शिव के करूणामय स्वरूप का आवाहन करते हुए शिव मंत्र द्वारा अर्चना करके श्री गुरु की पूजा करते हैं । )
आदिगुरू शिव का स्वरूप ही विभिन्न रूपों में अपनी महिमा द्वारा व्यक्त अव्यक्त रूपों में श्री गुरु का स्वरूप और शिवात्म स्वरूप में सर्वत्र सृष्टि में समाहित है । जड़ चेतन जगत में उनकी आराधना के विविध रूप श्री गुरु के माध्यम से अभिव्यक्त है -
“ निर्गुण आदि रूप शिव ।। अन्य नाम रे महादेव
श्री शिव निर्गुणे विश्वात्मा ।। श्री गुरु सगुणे शिवात्मा ''
( वास्तव में निर्गुण आदि गुरु शिव ही अन्य नाम से महादेव हैं और श्री शिव निर्गुण अर्थात् गुण रहित निराकार रूप में विश्वात्मा हैं तथा श्री गुरु सगुण अर्थात् गुण सहित साकार रूप में शिवात्मा हैं । )
सद्गुरु शिव के अनेक रूप हैं , जो मनुष्य मन की कल्पनाओं और कल्पनाओं के परे हर संभावनाओं को समाहित किए हुए है। शिव ही आदि योगी और आदि गुरु हैं , दक्षिणायन सूर्य की पहली पूर्णिमा गुरु पूर्णिमा है , इसी समय आदि योगी ने अपने प्रथम सात शिष्यों अर्थात् सप्तर्षियों में योग विज्ञान का संचार किया था । शिव के रूप विभिन्न हैं , जो उनकी असीमित क्षमताओं और प्रकृति के विभिन्न पहलुओं को प्रकट करते हैं , जैसे योग , संहार , दया और उग्रता । मुख्यतः महादेव अर्थात् देवों के देव और शिव कल्याणमय रूप जो शिवात्म रूप में सभी प्राणियों का कल्याण करते हैं और वे साधकों द्वारा पूजित हैं । तंत्र साधना में वे काल भैरव हैं और वैदिक साहित्य में रूद्र हैं । वे अपने विभिन्न रूपों में शांति , संहार , समय , योग , ध्यान , नृत्य , प्रलय और वैराग्य के देवता हैं और सृष्टि के सृजन संहार कर्ता के साथ जगत्पिता परब्रह्म के रूप में पूजित हैं । शिव अनादि अनंत हैं , संपूर्ण ब्रह्माण्ड शिव में ही समाया हुआ है ।
“ उपवास करिबा पाइँ ।। सद्गुरु बोलन्ति नाहिं
बोलन्ति सबु किछि खास ।। मोते केवल भाव दिअ ''
( सद्गुरु अपने भक्तों से कभी भी उपवास रखने के लिए नहीं कहते हैं , अपितु वे उनसे कहते हैं कि सब कुछ खाओ और मुझे केवल अपने शुद्ध भाव दे दो । )
“ शिष्यकु हेले पराभव ।। गुरु धरन्ति मातृभाव
व्याकुले उठाइ धरन्ति ।। तेणु उपास न करान्ति ''
( शिष्य को तनिक भी दुःख और कष्ट होने पर श्री गुरु मातृभाव अर्थात् ममता से भर उठते हैं और व्याकुल हो कर शिष्य को वत्सलता पूर्वक थाम कर अपने गले से लगा लेते हैं । )
“ तेणु हे गुरु भक्त जन ।। न कार उपवासे दिन
गुरूंक देइ निजे खाअ ।। गरिबंकु भोजन दिअ ''
( अंत: हे गुरु भक्त जन ! कभी उपवास रखकर दिन मत बिताओ अपितु गुरु को अर्पण करके स्वयं भी भोजन करो )
“ मात्र अन्य पूर्णिमा दिन ।। पूजन्ति सत्यनारायण
षोडशोपचारे पूजन ।। करिथाआन्ति भक्त गण ''
( गुरु पूर्णिमा के अतिरिक्त अन्य पूर्णिमा के दिन भक्त गण षोडशोपचार से श्री सत्यनारायण जी की पूजा करते हैं । )
पूर्णमासी तिथि का विशेष महत्व है , प्रत्येक मास की पूर्णिमा विशिष्ट महत्व के साथ ऋतुचक्र के अनुरूप पर्वों के साथ विभिन्न देवों की पूजा से संपन्न की जाती है और भक्त गण उस पूर्णिमा विशेष के विधान के अनुसार पूजा करते हैं । इसी क्रम में ‘ महाशिवरात्रि पर्व ‘ और आदिगुरू शिव के विषय में अगली छंद में वर्णन किया गया है -
“ शिवरात्रि अर्धरात्रे ।। पूजा करन्ति जप साथे
से राति महादेवंकर न।। शिव हिं आदि गुर्वेश्वर ''
( वास्तव में शिव ही आदि गुर्वेश्वर हैं । शिवरात्रि की आधी रात को भक्तगण जप के साथ उनकी पूजा करते हैं क्योंकि वह रात्रि महादेव की होती है । )
“ अनेक भक्त से राति रे ।। ध्यान करन्ति विशेष रे
घर्म पोथिर पारायण ।। करन्ति शुद्ध भक्त गण ''
( उस रात्रि में अनेक शुद्ध भक्तगण विशेष रूप से ध्यान करते हैं और धर्म ग्रंथ का पारायण करते हैं । )
वास्तव में महाशिवरात्रि का उत्सव शिव के निराकार से साकार रूप धारण करने और सृष्टि के कल्याण के लिए विषपान करने और आध्यात्मिक रूप से अज्ञान पर ज्ञान की विजय का प्रतीक है । यह पर्व चेतना , स्थिरता और आंतरिक ज्ञान पाने के लिए ध्यान व, व्रत और जागरण द्वारा भक्तगण मनाते हैं , यह पर्व साधकों के लिए परम आनंद और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है । महाशिवरात्रि का मुख्यतः वैज्ञानिक महत्व है और यह खगोलीय स्थिति और ऊर्जा के प्रवाह से जुड़ा है । शिव को आदि योगी , आदि गुरु होने के कारण महाशिवरात्रि की उपासना , साधना और ब्रह्मांडीय चेतना के साथ जुड़ने का महत्वपूर्ण अवसर है । महाशिवरात्रि , खगोलीय , आध्यात्मिक और दैहिक घटनाओं का अद्भुत समागम है ,जो भक्तों को अपनी ऊर्जा को ऊर्ध्व गति प्रदान करने और आंतरिक विकास के लिए शक्तिशाली अवसर प्रदान करता है । शिव और शक्ति के दिव्य मिलन पर्व है महाशिवरात्रि और आध्यात्म पथ पर चलने वाले साधकों के ऊर्जा का प्राकृतिक स्रोत माना गया है ।
दत्तात्रेय जन्मदिवस के संदर्भ में ‘ गुरु भागवत ‘ की अगली छंद में स्पष्ट किया गया है -
“ श्री दत्तात्रेय अवधूत ।। आदि गुरु परमग्रंथ
त्रिशक्तिरू दत्ता उद्भाव ।। ब्रह्मा विष्णु ओ सदाशिव ''
( श्री दत्तात्रेय आदि गुरु परमतत्व हैं , वस्तुतः ब्रह्मा , विष्णु और सदाशिव इन तीन शक्तियों से श्री दत्तात्रेय का उद्भव हुआ है । )
“ श्री दत्तात्रेय अलौकिक ।। त्रिपुरा रहस्य लेखक
श्री दत्तात्रेय अवधूत ।। जन्मदिन पालन्ति भक्त ''
( अलौकिक श्री दत्तात्रेय ‘ त्रिपुरा रहस्य ‘ के रचनाकार हैं , गुरु भक्त उन अवधूत दत्तात्रेय का जन्मदिन भक्ति भाव से मनाते हैं । )
भगवान दत्तात्रेय के अवतार के विषय में ब्रह्म पुराण में वर्णन आया है , वे सर्वभूतों के अंतरात्मा भगवान विष्णु विश्व कल्याण के रूप में पुनः अवतरित हो कर दत्तात्रेय नाम से विख्यात हुए , ब्रह्मा के मानस पुत्र अत्रि सती अनसूया के माध्यम से वे पृथ्वी पर ‘अवतरित हुए । वे योगमार्ग के प्रवर्तक हैं , शाम्भवी मुद्रा में विराजमान हैं । वे भक्तों पर नित्य अनुग्रह की प्रवृत्ति वाले हैं । वे अवधूत कुल शिरोमणि हैं । त्रिपुर रहस्य महामुनि दत्तात्रेय के भगवान विष्णु के अंशावतार हैं और उन्हें योगीश्वर माना गया है । वे श्री विद्या के भी परम आचार्य हैं , इसीलिए उन परम संत का जन्मदिन सभी भक्तजन परम श्रृद्धा से मनाते हैं । अगली छंदों में ‘ गुरु का जन्मदिन पालन ' के विषय में विवरण वर्णित है -
“ गुरूंक आश्रमरे जाइ ।। बन्धु कुटुम्ब साथे नेइ
मनान्ति गुरु जन्मदिन ।। मिलित भाबे भक्त जन ''
( भक्त जन , बंधु एवं कुटुंब को अपने साथ श्री गुरु के आश्रम में ले जाकर सम्मिलित भाव से श्री गुरु का जन्मदिन मनाते हैं । )
“ दीन जनंकु वस्त्रदान ।। कम्बल द्रव्य अबा धन
गुरूंक नामरे करन्ति ।। गुरूंक महिमा श्रुणान्ति ''
( श्री गुरु के जन्म दिवस पर भक्तगण गुरु के नाम से दीन हीन लोगों को वस्त्र , कंबल , द्रव्य अथवा धन का दान करते हैं , साथ ही श्री गुरु की महिमा का गान भी करते हैं । )
“ दीन ओ दुखींकर पाइँ ।। अनेक सुखाद्य बनाइ
भोजन करन्ति स्नेहरे ।। बाण्टि थाआन्ति सरागरे ''
( इस अवसर पर बहुत से भक्त दीन और दुखियों के लिए अनेक प्रकार के स्वादिष्ट पकवान बना कर उन्हें प्रेमपूर्वक भोजन कराते हैं और श्रद्धा से उसका वितरण करते हैं । )
“ सेवा दीन ओ दुखींकर ।। करिबा अरे श्रेयस्कर
अन्नदान हिं श्रेष्ठ दान ।। तहिंरूं जात हुए पुण्य ''
( वास्तव में दीन एवं दुखियों की सेवा करना श्रेयस्कर है , तथा अन्नदान ही श्रेष्ठ दान और उससे पुण्य प्राप्त होता है । )
“ गुरंकु सजाई से दिन ।। लगाई सुगंध चंदन
आरति गाई भक्त रे ।। पाद सेवा करन्ति धीरे ''
( श्री गुरु के जन्मदिवस पर भक्त गण उसदिन गुरु को सुगंध , चंदन आदि लगाकर उन्हें सजाते हैं और भक्तिभाव से भरकर वे आरती गाते हैं , तथा शांति पूर्वक उनकी चरण सेवा करते हैं )
“ संध्या काले जलाई दीप ।। करन्ति बसि नाम जप
गुरु चरित्रर पठन ।। करन्ति किछि भक्त ''
( भक्त जन उस दिन संध्या के समय दीप जलाते हैं , बैठकर नाम जप करते हैं और कुछ भक्त श्री गुरु चरित्र का पाठ करते हैं । )
“ आलोक जलाई सर्वत्र ।। करान्ति पूजा अबा ब्रत
गुरु चरित्रर पठन ।। करन्ति बसि नाम जप ''
( श्री गुरु का जन्मदिन मनाने के लिए अनेक भक्त सब ओर प्रकाश करके पूजा या व्रत तथा उनका ध्यान करते हैं , अथवा धार्मिक सम्मेलन भी करते हैं । )
“ असि न पारिले मठ रे ।। पर्व मनान्ति निज धरे
निज शक्तिर अनुसारे ।। पालन्ति आनंद भाबरे ''
( जो भक्त मठ अर्थात् गुरु स्थान में नहीं आ पाते , वे अपने घर में ही अपनी सामर्थ्य के अनुसार आनंद भाव से श्री गुरु के जन्मदिन का पर्व मनाते हैं । )
“ पूजन हुए भक्त घरे ।। पंच ओ षौडशोपचारे
एकत्र परिवार जन ।। करन्ति आरति भजन ''
( भक्त के घर पर पंच और षोडशोपचार रूप में श्री गुरु का पूजन होता है , तथा परिवार के लोग सम्मिलित रूप से आरती भजन करते हैं । )
सभी धर्मों में आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में श्री गुरु की भूमिका प्रमुख रहती है , वे मानवता , प्रेम और सेवा का संदेश देते हैं । और उनका जन्मदिन गुरु पर्व के रूप में मनाने के साथ उनके उपदेश को स्मरण करते हैं म, उनके आदर्शों से चलने की प्रेरणा लेते हैं और अपने अंतस्तल को आध्यात्मिक रूप से सशक्त बनाते हैं । गुरूओं के आदर्शों पर चलते हैं , दीन जनों की सेवा करते हैं । गुरु की जन्म - जयंती केवल तिथि नहीं होती , भक्तों के लिए गुरु ज्ञान को अपने जीवन में उतारने का संकल्प दिवस होता है न, इसीलिए भक्तगण गुरु के आश्रम में अथवा अपने घर में ही रहकर उनका भजन पूजन करते हैं । समाधिस्थ गुरु के साथ जीवित सद्गुरु की कृपा प्राप्त करने के लिए उनके जन्मदिन को ‘ गुरू पर्व ‘ के रूप में समर्पित करते हैं , व्यास पूर्णिमा या व्यास पूजा वर्षों से चली आ रही ‘ गुरु परंपरा ‘ का विशिष्ट संदर्भ है , इसी प्रकार विभिन्न धर्मानुयायी अपने अपने गुरुओं का पावन जन्मदिन आत्मकल्याण के लिए मनाते हैं ।
‘ गुरु जन्मदिन ' के अतिरिक्त पूजा अर्चना के विविध अनुष्ठानों ,परायण या पुरश्चरण के विषय में ‘ गुरु भागवत ' में भक्तों के लिए दिशा निर्देश विहित हैं ।इस प्रसंग का वर्णन आगामी गुरुवार को ।