Pragya Trust-Dehradun by Dr. Sudha Rani Pandey

Pragya Trust-Dehradun by Dr. Sudha Rani Pandey Every Thursday, on literature of respected Dr. C B Satpathy, an attempt is made by me Dr. SudhaRani

28/01/2026

“ गुरु भागवत “ चतुर्थ खंड संदेश श्रृंखला १३

‘गुरु भागवत ' की विगत संदेश श्रृंखला के अंतर्गत गुरु पूर्णिमा अवसर पर श्री गुरु के पूजन की विधियों और भक्तों की आस्था का प्रसंग स्पष्ट किया गया था, इसी अनुक्रम में अगली छंद में वर्णित है -

“ कर्मकाण्डी पण्डित माने ।। दक्षिणामूर्ति आबाहने
शिवमंत्रे करि अर्चना ।। करन्ति गुरु आराधना ''
( गुरु पूर्णिमा के दिन कर्मकाण्डी अर्थात् शिव के करूणामय स्वरूप का आवाहन करते हुए शिव मंत्र द्वारा अर्चना करके श्री गुरु की पूजा करते हैं । )

आदिगुरू शिव का स्वरूप ही विभिन्न रूपों में अपनी महिमा द्वारा व्यक्त अव्यक्त रूपों में श्री गुरु का स्वरूप और शिवात्म स्वरूप में सर्वत्र सृष्टि में समाहित है । जड़ चेतन जगत में उनकी आराधना के विविध रूप श्री गुरु के माध्यम से अभिव्यक्त है -

“ निर्गुण आदि रूप शिव ।। अन्य नाम रे महादेव
श्री शिव निर्गुणे विश्वात्मा ।। श्री गुरु सगुणे शिवात्मा ''
( वास्तव में निर्गुण आदि गुरु शिव ही अन्य नाम से महादेव हैं और श्री शिव निर्गुण अर्थात् गुण रहित निराकार रूप में विश्वात्मा हैं तथा श्री गुरु सगुण अर्थात् गुण सहित साकार रूप में शिवात्मा हैं । )

सद्‌गुरु शिव के अनेक रूप हैं , जो मनुष्य मन की कल्पनाओं और कल्पनाओं के परे हर संभावनाओं को समाहित किए हुए है। शिव ही आदि योगी और आदि गुरु हैं , दक्षिणायन सूर्य की पहली पूर्णिमा गुरु पूर्णिमा है , इसी समय आदि योगी ने अपने प्रथम सात शिष्यों अर्थात् सप्तर्षियों में योग विज्ञान का संचार किया था । शिव के रूप विभिन्न हैं , जो उनकी असीमित क्षमताओं और प्रकृति के विभिन्न पहलुओं को प्रकट करते हैं , जैसे योग , संहार , दया और उग्रता । मुख्यतः महादेव अर्थात् देवों के देव और शिव कल्याणमय रूप जो शिवात्म रूप में सभी प्राणियों का कल्याण करते हैं और वे साधकों द्वारा पूजित हैं । तंत्र साधना में वे काल भैरव हैं और वैदिक साहित्य में रूद्र हैं । वे अपने विभिन्न रूपों में शांति , संहार , समय , योग , ध्यान , नृत्य , प्रलय और वैराग्य के देवता हैं और सृष्टि के सृजन संहार कर्ता के साथ जगत्पिता परब्रह्म के रूप में पूजित हैं । शिव अनादि अनंत हैं , संपूर्ण ब्रह्माण्ड शिव में ही समाया हुआ है ।

“ उपवास करिबा पाइँ ।। सद्‌गुरु बोलन्ति नाहिं
बोलन्ति सबु किछि खास ।। मोते केवल भाव दिअ ''
( सद्‌गुरु अपने भक्तों से कभी भी उपवास रखने के लिए नहीं कहते हैं , अपितु वे उनसे कहते हैं कि सब कुछ खाओ और मुझे केवल अपने शुद्ध भाव दे दो । )

“ शिष्यकु हेले पराभव ।। गुरु धरन्ति मातृभाव
व्याकुले उठाइ धरन्ति ।। तेणु उपास न करान्ति ''
( शिष्य को तनिक भी दुःख और कष्ट होने पर श्री गुरु मातृभाव अर्थात् ममता से भर उठते हैं और व्याकुल हो कर शिष्य को वत्सलता पूर्वक थाम कर अपने गले से लगा लेते हैं । )

“ तेणु हे गुरु भक्त जन ।। न कार उपवासे दिन
गुरूंक देइ निजे खाअ ।। गरिबंकु भोजन दिअ ''
( अंत: हे गुरु भक्त जन ! कभी उपवास रखकर दिन मत बिताओ अपितु गुरु को अर्पण करके स्वयं भी भोजन करो )

“ मात्र अन्य पूर्णिमा दिन ।। पूजन्ति सत्यनारायण
षोडशोपचारे पूजन ।। करिथाआन्ति भक्त गण ''
( गुरु पूर्णिमा के अतिरिक्त अन्य पूर्णिमा के दिन भक्त गण षोडशोपचार से श्री सत्यनारायण जी की पूजा करते हैं । )

पूर्णमासी तिथि का विशेष महत्व है , प्रत्येक मास की पूर्णिमा विशिष्ट महत्व के साथ ऋतुचक्र के अनुरूप पर्वों के साथ विभिन्न देवों की पूजा से संपन्न की जाती है और भक्त गण उस पूर्णिमा विशेष के विधान के अनुसार पूजा करते हैं । इसी क्रम में ‘ महाशिवरात्रि पर्व ‘ और आदिगुरू शिव के विषय में अगली छंद में वर्णन किया गया है -

“ शिवरात्रि अर्धरात्रे ।। पूजा करन्ति जप साथे
से राति महादेवंकर न।। शिव हिं आदि गुर्वेश्वर ''
( वास्तव में शिव ही आदि गुर्वेश्वर हैं । शिवरात्रि की आधी रात को भक्तगण जप के साथ उनकी पूजा करते हैं क्योंकि वह रात्रि महादेव की होती है । )

“ अनेक भक्त से राति रे ।। ध्यान करन्ति विशेष रे
घर्म पोथिर पारायण ।। करन्ति शुद्ध भक्त गण ''
( उस रात्रि में अनेक शुद्ध भक्तगण विशेष रूप से ध्यान करते हैं और धर्म ग्रंथ का पारायण करते हैं । )

वास्तव में महाशिवरात्रि का उत्सव शिव के निराकार से साकार रूप धारण करने और सृष्टि के कल्याण के लिए विषपान करने और आध्यात्मिक रूप से अज्ञान पर ज्ञान की विजय का प्रतीक है । यह पर्व चेतना , स्थिरता और आंतरिक ज्ञान पाने के लिए ध्यान व, व्रत और जागरण द्वारा भक्तगण मनाते हैं , यह पर्व साधकों के लिए परम आनंद और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है । महाशिवरात्रि का मुख्यतः वैज्ञानिक महत्व है और यह खगोलीय स्थिति और ऊर्जा के प्रवाह से जुड़ा है । शिव को आदि योगी , आदि गुरु होने के कारण महाशिवरात्रि की उपासना , साधना और ब्रह्मांडीय चेतना के साथ जुड़ने का महत्वपूर्ण अवसर है । महाशिवरात्रि , खगोलीय , आध्यात्मिक और दैहिक घटनाओं का अद्भुत समागम है ,जो भक्तों को अपनी ऊर्जा को ऊर्ध्व गति प्रदान करने और आंतरिक विकास के लिए शक्तिशाली अवसर प्रदान करता है । शिव और शक्ति के दिव्य मिलन पर्व है महाशिवरात्रि और आध्यात्म पथ पर चलने वाले साधकों के ऊर्जा का प्राकृतिक स्रोत माना गया है ।

दत्तात्रेय जन्मदिवस के संदर्भ में ‘ गुरु भागवत ‘ की अगली छंद में स्पष्ट किया गया है -

“ श्री दत्तात्रेय अवधूत ।। आदि गुरु परमग्रंथ
त्रिशक्तिरू दत्ता उद्भाव ।। ब्रह्मा विष्णु ओ सदाशिव ''
( श्री दत्तात्रेय आदि गुरु परमतत्व हैं , वस्तुतः ब्रह्मा , विष्णु और सदाशिव इन तीन शक्तियों से श्री दत्तात्रेय का उद्भव हुआ है । )

“ श्री दत्तात्रेय अलौकिक ।। त्रिपुरा रहस्य लेखक
श्री दत्तात्रेय अवधूत ।। जन्मदिन पालन्ति भक्त ''
( अलौकिक श्री दत्तात्रेय ‘ त्रिपुरा रहस्य ‘ के रचनाकार हैं , गुरु भक्त उन अवधूत दत्तात्रेय का जन्मदिन भक्ति भाव से मनाते हैं । )

भगवान दत्तात्रेय के अवतार के विषय में ब्रह्म पुराण में वर्णन आया है , वे सर्वभूतों के अंतरात्मा भगवान विष्णु विश्व कल्याण के रूप में पुनः अवतरित हो कर दत्तात्रेय नाम से विख्यात हुए , ब्रह्मा के मानस पुत्र अत्रि सती अनसूया के माध्यम से वे पृथ्वी पर ‘अवतरित हुए । वे योगमार्ग के प्रवर्तक हैं , शाम्भवी मुद्रा में विराजमान हैं । वे भक्तों पर नित्य अनुग्रह की प्रवृत्ति वाले हैं । वे अवधूत कुल शिरोमणि हैं । त्रिपुर रहस्य महामुनि दत्तात्रेय के भगवान विष्णु के अंशावतार हैं और उन्हें योगीश्वर माना गया है । वे श्री विद्या के भी परम आचार्य हैं , इसीलिए उन परम संत का जन्मदिन सभी भक्तजन परम श्रृद्धा से मनाते हैं । अगली छंदों में ‘ गुरु का जन्मदिन पालन ' के विषय में विवरण वर्णित है -

“ गुरूंक आश्रमरे जाइ ।। बन्धु कुटुम्ब साथे नेइ
मनान्ति गुरु जन्मदिन ।। मिलित भाबे भक्त जन ''
( भक्त जन , बंधु एवं कुटुंब को अपने साथ श्री गुरु के आश्रम में ले जाकर सम्मिलित भाव से श्री गुरु का जन्मदिन मनाते हैं । )

“ दीन जनंकु वस्त्रदान ।। कम्बल द्रव्य अबा धन
गुरूंक नामरे करन्ति ।। गुरूंक महिमा श्रुणान्ति ''
( श्री गुरु के जन्म दिवस पर भक्तगण गुरु के नाम से दीन हीन लोगों को वस्त्र , कंबल , द्रव्य अथवा धन का दान करते हैं , साथ ही श्री गुरु की महिमा का गान भी करते हैं । )

“ दीन ओ दुखींकर पाइँ ।। अनेक सुखाद्य बनाइ
भोजन करन्ति स्नेहरे ।। बाण्टि थाआन्ति सरागरे ''
( इस अवसर पर बहुत से भक्त दीन और दुखियों के लिए अनेक प्रकार के स्वादिष्ट पकवान बना कर उन्हें प्रेमपूर्वक भोजन कराते हैं और श्रद्धा से उसका वितरण करते हैं । )

“ सेवा दीन ओ दुखींकर ।। करिबा अरे श्रेयस्कर
अन्नदान हिं श्रेष्ठ दान ।। तहिंरूं जात हुए पुण्य ''
( वास्तव में दीन एवं दुखियों की सेवा करना श्रेयस्कर है , तथा अन्नदान ही श्रेष्ठ दान और उससे पुण्य प्राप्त होता है । )

“ गुरंकु सजाई से दिन ।। लगाई सुगंध चंदन
आरति गाई भक्त रे ।। पाद सेवा करन्ति धीरे ''
( श्री गुरु के जन्मदिवस पर भक्त गण उसदिन गुरु को सुगंध , चंदन आदि लगाकर उन्हें सजाते हैं और भक्तिभाव से भरकर वे आरती गाते हैं , तथा शांति पूर्वक उनकी चरण सेवा करते हैं )

“ संध्या काले जलाई दीप ।। करन्ति बसि नाम जप
गुरु चरित्रर पठन ।। करन्ति किछि भक्त ''
( भक्त जन उस दिन संध्या के समय दीप जलाते हैं , बैठकर नाम जप करते हैं और कुछ भक्त श्री गुरु चरित्र का पाठ करते हैं । )

“ आलोक जलाई सर्वत्र ।। करान्ति पूजा अबा ब्रत
गुरु चरित्रर पठन ।। करन्ति बसि नाम जप ''
( श्री गुरु का जन्मदिन मनाने के लिए अनेक भक्त सब ओर प्रकाश करके पूजा या व्रत तथा उनका ध्यान करते हैं , अथवा धार्मिक सम्मेलन भी करते हैं । )

“ असि न पारिले मठ रे ।। पर्व मनान्ति निज धरे
निज शक्तिर अनुसारे ।। पालन्ति आनंद भाबरे ''
( जो भक्त मठ अर्थात् गुरु स्थान में नहीं आ पाते , वे अपने घर में ही अपनी सामर्थ्य के अनुसार आनंद भाव से श्री गुरु के जन्मदिन का पर्व मनाते हैं । )

“ पूजन हुए भक्त घरे ।। पंच ओ षौडशोपचारे
एकत्र परिवार जन ।। करन्ति आरति भजन ''
( भक्त के घर पर पंच और षोडशोपचार रूप में श्री गुरु का पूजन होता है , तथा परिवार के लोग सम्मिलित रूप से आरती भजन करते हैं । )

सभी धर्मों में आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में श्री गुरु की भूमिका प्रमुख रहती है , वे मानवता , प्रेम और सेवा का संदेश देते हैं । और उनका जन्मदिन गुरु पर्व के रूप में मनाने के साथ उनके उपदेश को स्मरण करते हैं म, उनके आदर्शों से चलने की प्रेरणा लेते हैं और अपने अंतस्तल को आध्यात्मिक रूप से सशक्त बनाते हैं । गुरूओं के आदर्शों पर चलते हैं , दीन जनों की सेवा करते हैं । गुरु की जन्म - जयंती केवल तिथि नहीं होती , भक्तों के लिए गुरु ज्ञान को अपने जीवन में उतारने का संकल्प दिवस होता है न, इसीलिए भक्तगण गुरु के आश्रम में अथवा अपने घर में ही रहकर उनका भजन पूजन करते हैं । समाधिस्थ गुरु के साथ जीवित सद्‌गुरु की कृपा प्राप्त करने के लिए उनके जन्मदिन को ‘ गुरू पर्व ‘ के रूप में समर्पित करते हैं , व्यास पूर्णिमा या व्यास पूजा वर्षों से चली आ रही ‘ गुरु परंपरा ‘ का विशिष्ट संदर्भ है , इसी प्रकार विभिन्न धर्मानुयायी अपने अपने गुरुओं का पावन जन्मदिन आत्मकल्याण के लिए मनाते हैं ।

‘ गुरु जन्मदिन ' के अतिरिक्त पूजा अर्चना के विविध अनुष्ठानों ,परायण या पुरश्चरण के विषय में ‘ गुरु भागवत ' में भक्तों के लिए दिशा निर्देश विहित हैं ।इस प्रसंग का वर्णन आगामी गुरुवार को ।

21/01/2026

गुरु भागवत “ चतुर्थ खंड - संदेश शृंखला १२

‘ गुरु भागवत ' की विगत संदेश श्रृंखला में गुरु उपासना , गुरु आज्ञा एवं गुरु दर्शन द्वारा धनी मानी और निर्धन सभी भक्तों की मनोकामना पूर्ण होने और गुरु चरणों की सेवा से ह्रदय के पावन होने की वार्ता के रूप में महातीर्थ रूप श्री गुरु के चरणों की बात की गई थी और यह स्पष्ट किया गया था कि भक्त के लिए वे चरण पुण्य तीर्थ हैं , इसी अनुक्रम में श्री गुरु से संबंधित उत्सवों का विवरण अगली छंदों में स्पष्ट किया गया है -

“ श्री गुरूंकर जन्मदिन ।। पालन्ति मिशि भक्त गण
मनान्ति महोत्सव भलि ।। श्रद्धालु माने प्राण खोलि ''
( सभी भक्तगण और श्रद्धालु जन मिलकर श्री गुरु का जन्मदिन एक महोत्सव के समान हर्षोल्लास पूर्वक मनाते हैं )

“ श्री गुरूंक जनमदिन ।। भक्त पाइँ उत्सव दिन
से दिन दीपावली परि ।। से दिन पर्वकाल परि ''
( वास्तव में श्री गुरु का जन्मदिन भक्त के लिए उत्सव का दिन होता है और वह दिन उन्हें दीपावली के पर्व के समान लगता है । )

“ श्री गुरूंक देवंक पूजन ।। आरति अर्चना बन्दन
साथी रे गरिब भोजन ।। कराइथा ‘ न्ति भक्त ''
( श्री गुरु देव के जन्मदिन पर भक्तगण आरती , अर्चना , वंदन आदि करके श्री गुरु देव का पूजन करते हैं और साथ ही ग़रीबों को भोजन कराते हैं । )

श्री गुरु भक्तों के प्राणाधार हैं , वे ही प्रभु के अवतार होते हैं , इसी कारणवश उनका जन्मदिन भी भक्तजन रामजन्मदिन और श्री कृष्ण जन्माष्टमी की भांति मनाते हैं । गुरु का जन्मदिन भक्तों के लिए महापर्व की भांति होता है । अगली छंद में विदेही रूप और श्री गुरु के महाप्रयाण दिवस पालन के विषय में स्पष्ट किया गया है -

“ सद्‌गुरु जीवन्मुक्त ।। शरीर बिना बि जीवन्ति
महाकारण देहे धाइ ।। भक्तंकु पालन्ति गोसइँ ''
( सद्‌गुरु जीवन्मुक्त होते हैं और वे शरीर के बिना भी जीवन्त रहते हैं , वास्तव में श्री गुरु गोसाई महाकारण देह में रहकर भक्त का पालन करते हैं । )

अपनी साधना के पथ से कालजयी रूप को प्राप्त जीवन्मुक्त होते हैं , भौतिक देह नाश होने पर भी महाकारण देह ( चेतना की चौथी अवस्था ) द्वारा भक्तों का कल्याण करते हैं , महाकारण शरीर चेतना की चौथी अवस्था द्वारा भक्तों का कल्याण करते हैं । महाकारण शरीर चेतना की चौथी और सूक्ष्म अवस्था है , जो कारण शरीर से परे है और स्थूल , सूक्ष्म शरीरों का मूल स्रोत है , इसमें आत्मा के सभी संस्कार , विचार , भावनाएं , वासनाऐं और कर्मों के बीज होते हैं , जो जन्म मृत्यु के चक्र को संचालित करते हैं, साधक इसी महाकारण शरीर में स्थित सच्चे भाव से मैं अर्थात् आत्मा की खोज करते हैं , इसे महातम भी कहा जाता है , जो नीलवर्ण का और ईश्वर परम सत्ता से जुड़ा माना जाता है ।

“ मरण जा’ र इच्छाधीन ।। कि करिब ताकु मरण
भक्त एहि भाबकु धरि ।। गुरु पूजा जाअन्ति करि ''
( वस्तुतः मरण जिनकी इच्छा के अधीन है , मृत्यु उनका क्या कर पाएगी ? इसी भाव को धारण करके भक्त विदेही गुरु की पूजा करते रहते हैं । )

“ महाकारण देहे आइ ।। दिव्य कर्म करन्ति साइँ
कारण देह विश्वव्यापी ।। तेणु श्री गुरु ब्रह्म रूपी ''
( वास्तव में महाकारण देह में रहकर साई दिव्य कर्म करते रहते हैं , चूंकि उनकी कामना देह विश्व व्यापी है , इसीलिये श्री गुरु ब्रह्म रूप हैं । )

“ संथ चलन्ति देह त्यागि ।। स्वेच्छा मरणे बीतरागी
केबे बा आगरू सुचाई ।। अबा किछि इंगित देइ ''
( वस्तुतः वीतरागी संत जन कभी-कभी पूर्व सूचना दे कर या कोई संकेत दे कर स्वेच्छा से अपनी देह त्याग कर महाकारण शरीर में चले जाते हैं )

सिद्ध योगियों और साधकों की देह त्याग और समाधि अवस्था का वर्णन पूर्व में भी गुरु भागवत के संदर्भ में स्पष्ट किया जा चुका है , महाकारण शरीर में प्रवेश करके भी वे भक्तों के कल्याण करते रहते हैं और दिव्य कर्म करते हैं ।

“ अनेक काहाणी एमंत ।। संथ इतिहासे वर्णित
श्री गुरूंक महाप्रयाण ।। अत्यंत दिव्य ओ महान ''
( श्री गुरु के महाप्रयाण संबंधी अनेक दिव्य और महान कथाएं संतों के इतिहास में वर्णित हैं । )

“ केते संथ समाधि नेले ।। स्वेच्छारे बा विहित काले
भूमि अबा जल समाधि ।। संथकर एपरि विधि ''
( संतों के इतिहास में मिलता है कि कितने ही संतों ने स्वेच्छा से या नियत काल में भूमि अथवा जल समाधि ली है , संतों द्वारा देहत्याग की इसी प्रकार की विधि होती है । )

‘ निसंगतां मुक्ति पदं यतीनाम् ' अर्थात् संतों का मुक्ति पद आसक्ति भाव से बिरत रहना होता है और इसी कारण संतजन देहत्याग के बाद भी जीवन्त ज्ञान समाधि में सदैव जागृत रहते हैं ।

“ संथ देहर अवशेष ।। हाड़ , दंत , चर्म बा केश
दिव्य शक्तिरे ओतप्रोत ।। से हेतु समाधि पूजित ''
( वास्तव में संतों की देह हाड़ ( हड्डी ) , दांत चर्म या केश आदि अवशेष दिव्य शक्ति से ओतप्रोत होते हैं व, इसीलिए इन महान् संतों की समाधि भी पूजित होती है । )

समस्त धर्म साधनाओं में धर्म गुरूओं की देहत्याग के बाद उनकी स्मृति में समाधि स्थल निर्मित किया जाता है और युग युग तक उनकी समाधि भी इसीलिए पूजित होती है कि उन उन संतों की ऊर्जा उन अवशेषों के साथ समाधि स्थल में निरंतर प्रवाहमान रहती है ।

“ श्री गुरु व्यवह्रत आसन ।। लुगा , पादुका बा आसन
गुरु पीठे पूजित हुए ।। जहिं गुरूंक स्मृति थाए ''
( यही नहीं श्री गुरु समाधि के भीतर सक्रिय एवं जागृत स्थिति में रहते हैं , इसीलिये भक्त अत्यंत भक्ति भाव से श्री गुरु की समाधि के पास आता है । )

भक्तों के लिए गहरे आध्यात्मिक महत्व से युक्त श्री गुरु के समाधि स्थल दिव्य चामत्कारिक वातावरण से समृद्ध रहते हैं एवं उनकी साधना परंपरा को उनके अनुयायी सहेजते हैं ।

“ समाधिस्थ गुरूवर ।। आध्यात्मिक शक्ति भंडार
थाइ निजर सूक्ष्मदेह ।। भक्तंकु पालन्ति से नेहें ''
( वस्तुतः श्री गुरु का समाधि स्थान आध्यात्मिक शक्ति का भंडार होता है , जहां वे अपनी सूक्ष्म देह में रहकर भक्तों का स्नेह पूर्वक पालन करते हैं । )

“ समाधि पाशे किछि क्षण ।। भक्त करन्ति जे ध्यान
लगान्ति धूप, दीप , फुल ।। घोड़न्ति वस्त्र ओ कंबल ''
( इसीलिए भक्त जन समाधि के पास कुछ क्षण ध्यान करते हैं और धूप दीप तथा फूल अर्पण करते हैं , तथा समाधि पर वस्त्र और कंबल धारण करते हैं । )

“ समाधि पाशे नीरवता ।। मनरे भरे पवित्रता
समाधिर पाखरे ध्यान ।। करन्ति तेणु भक्तगण ''
( श्री गुरु की समाधि के पास नीरवता होती है जो कि भक्त के मन में पवित्रता भर देती है , इसीलिए भक्तजन उस समाधि के पास ध्यान करते हैं । )

“ समाधिरे गुरु जागृत ।। तहिंरू हुए शक्तिपात
समाधिर पाखरे ध्यान ।। करन्ति तेणु भक्त गण ''
( वास्तव में समाधि में श्री गुरु सतत जागृत रहते हैं और वहीं से भक्त में शक्तिपात होता है , इसीलिए भक्तजन समाधि के पास ध्यान करते हैं । )

शक्तिपात संचरण से भक्त की प्राणों में श्री गुरु की जागृत शक्ति अवतरित होती है , समाधि के एकांत शांत क्षेत्र में एकाग्र भाव से भक्त जन निरंतर समाधि की पूजा अर्चना करते हैं ।
“ कृपा कारणे प्रभुंकर ।। दिव्य ज्ञान लभिछि नर
इतर प्राणी ज्ञानहीन ।। तेणु से नरर अधीन ''
( प्रभु की कृपा के कारण ही मनुष्य को दिव्य ज्ञान मिला हुआ है और अन्य प्राणी चूंकि ज्ञान रहित है , इसीलिये वे मनुष्य के अधीन हैं । )

दिव्य ज्ञान एवं मोक्ष रूपी परमपद श्री गुरु की कृपा से ही प्राप्त होता है , ज्ञान शून्य प्राणी केवल साधारण मनुष्यों के अधीन रहकर ही गुरु अर्चना , समाधि आदि का महत्व नहीं जान पाते हैं अतः संसार चक्र में ही भटकते रहते हैं , ज्ञान और योग से ही मोक्ष प्राप्ति संभव होती है । आत्म स्वरूप का ज्ञान हो जाने से योग सिद्धि होती है । आत्मस्वरूप का ज्ञान हो जाने से योग सिद्धि होती है और मोक्ष का साधन योग ही है , इसे श्री गुरु की साधना एवं कृपा द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है ।

“ मरण जा’र इच्छाधीने ।। समाप्त नुहें से मरणे
भक्त सदा ए भाव धरि ।। गुरु पूजा थाआन्ति करि ''
( वास्तव में जिसका मरण अपनी इच्छा के अधीन है वह मृत्यु अर्थात् शरीर नष्ट हो जाने पर भी समाप्त नहीं होता , गुरु की शाश्वतता के कारण इसी भाव को धारण करके भक्त सदैव गुरु की पूजा करते हैं । )

“ गुरूंक समाधि दिवस ।। भक्त पालन्ति विशेष
पूजार साथे अन्न दान ।। मिथि करन्ति भक्तजन ''
( अभी भक्तगण मिलकर श्री गुरु श्री गुरु के समाधि दिवस को विशेष रूप में मनाते हैं और पूजा के साथ अन्नदान करते हैं । )

“ हे गुरुदेव ! हे गुरुदेव ! ॥ समाधि तव दीपस्तंभ
भव सिंधु जागारे थकि ।। आसन्ति केते दीन दुखी “
( हे गुरुदेव ! आपकी समाधि दीपस्तंभ की भांति है , जहाँ पर भवसागर की यात्रा में दिशाहीन थके हारे कितने ही दीन दुखी आपके पास आते हैं )

श्री गुरु की सेवा में अनन्य भाव से लीन रहने वाले भक्त जन गुरु के जीवन काल में तो समर्पित भाव से सेवा रत रहते हैं , देह त्याग के बाद उनके समाधि स्थल पर भी भक्त ही नहीं भटके हुए जीवों का भी मार्ग दर्शन होता है , इसीलिए श्री गुरु की समाधि दीपस्तंभ मानी गई है ।

अगली छंद में श्री गुरु की पूजा अर्चना हेतु विशेष दिवस के पालन का निर्देश विहित है -

“ गुरु थिबा बेले शरीरे ।। अबा शरीर त्याग परे
निज घरे वा गुरु स्थले ।। विशेष पूजा विधि चाले ''
( श्री गुरु के शरीर रूप में रहने अथवा उनके शरीर त्याग के पश्चात भी भक्तों द्वारा अपने घर या गुरु स्थल में विशेष पूजा विधि होती रहती है । )

“ गुरु आदेशे भक्त गण ।। करन्ति पूजा अनुष्ठान
जज्ञ मंत्र ध्यान साथी रे ।। करन्ति विधि अनुसार ''
( श्री गुरु के आदेशों के अनुसार भक्त गण यज्ञ मंत्र ध्यान आदि के साथ विधि विधान के अनुसार पूजा अनुष्ठान आदि करते हैं । )

अलग-अलग पर्वों पर श्री गुरु की बताई विधियों के अनुरूप भक्त गण सतत पूजा अर्चना करते हैं एवं गुरु के प्रति निष्ठा और अनन्य समर्पण भाव को व्यक्त करते हैं , जैसे एकादशी , गुरुवार , गुरूपूर्णिमा , महाशिवरात्रि के अतिरिक्त विविध अनुष्ठान भी करते हैं न, यह परंपरा गुरु धाम में भी और अपने गृह में भी करते हुए भक्तजन श्री गुरु की कृपा प्राप्त करते हैं ।

गुरुवार देवगुरू बृहस्पति की पूजा के दिन के रूप में चिह्नित है , एवं इसी परंपरा में गुरुवार को समस्त गुरुओं का पवित्र दिवस माना गया है , भक्त जनों द्वारा विविध प्रकार से पूजा अर्चना की जाती है -

“ गुरुवासरे उपवास ।। गुरु पूजा हुए विशेष
गुरु पूजन ओ मनन ।। ध्यान ओ पोथि परायण ''
( भक्तगण गुरुवार को उपवास रखकर विशेष रूप से गुरु पूजा करते हैं , उस दिन गुरु पूजा के साथ साथ उनका मनन एवं ध्यान और पोथी का परायण किया जाता है । )

“ गुरु पूर्णिमा दिवस रे ।। पूजा करन्ति भक्ति रे
गुरूंक बंदना पूजन ।। शेषरे प्रसाद ग्रहण ''
( भक्तगण गुरु पूर्णिमा के दिन भक्तिभाव से ओतप्रोत हो कर श्री गुरु की वंदना पूजा करते हैं , अंत में प्रसाद ग्रहण करते हैं । )

गुरु पूर्णिमा पर्व महापर्व के रूप में अभिमंत्रित है , इसे आदि गुरु शंकर भगवान एवं व्यास पूजा के नाम से भी जाना गया है । समस्त धर्मों के अनुयायी भक्तगण अपने गुरु की पूजा अर्चना करते हैं, निर्गुण सगुण रूपों में गुरु पूर्णिमा का पर्व सभी भक्तों के लिए कल्याणकारी होता है और श्री गुरु का आशीर्वाद उन्हें प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप में प्राप्त होता है। गुरु पूर्णिमा उत्सव के विषय में ‘ गुरु भागवत ' की अगली छंदों में भी विवरण स्पष्ट किया गया है , इसकी प्रस्तुति आगामी गुरुवार को ।
“ गुरु भागवत '' को समर्पित गुरुवार का सादर प्रणाम ।
पाठकों से निवेदन है कि इस संदेश के विषय में अपने विचार व्यक्त करने की कृपा करें ।

14/01/2026

गुरु भागवत “ चतुर्थ खंड संदेश शृंखला ११

‘ गुरु भागवत ' की विगत संदेश शृंखला के अन्तर्गत गुरुओं के पूजन , आश्रम या गुरूस्थान में करने के अतिरिक्त श्री गुरु की इच्छा से भक्त को अप्रत्यक्ष रूप से भक्त को आने का आदेश देते हैं और भक्त गुरु के दर्शन के लिए व्यग्र हो उठते हैं ।

“ जिबाकु हेले गुरूधाम ।। उधार न नेबा उत्तम
दीन किंतु अऋणी भक्त ।। सदा गुरूंक प्रिय पात्र ''
( गुरु धाम जाने के लिए किसी से उधार न लेना उत्तम है , इसीलिये दीन किंतु उधार न लेने वाला भक्त सदैव गुरु का प्रिय पात्र होता है । )

“आडम्बरर प्रयोजन ।। लोडन्ति नाहिं गुरु धन
दीन भाव धरिले भक्त ।। गुरु पाशे हुए आहूत ''
( गुरु धन को आडम्बर पूर्ण दिखाने की कोई चाल नहीं रहती है , वास्तव में दीनता का भाव धारण करने पर भक्त गुरु के पास आदर का पात्र बनता है । )

भक्ति परंपरा में दैन्य भाव और दास्य भाव की भक्ति ही सर्वोच्च अवस्था मानी गई है , गुरु हों या भक्त आडम्बर विहीन भाव ही भक्त को साधना की अवस्था तक पंहुचने की पहली सीढ़ी बनते हैं । )

“ गुरूंक पाशे गला बेले ।। भक्त पाशे माया खेले
माया ओगाले पथ ता’र ।। बिलम्ब करे बारम्बार ''
( सामान्यतया ऐसा देखा गया है कि गुरु के पास जाते समय भक्त माया के खेल में फंस जाता है , तब माया अपने खेल से भक्त के मार्ग में अवरोध उत्पन्न करती है , जिसके कारण भक्त को श्री गुरु के पास जाने में बार-बार विलंब होता है । )

“ प्रकृति बाधा दिए जेते ।। सहन शक्ति बढ़े तेते
एहाहिं जे भक्ति परीक्षा ।। भक्त चरित्रर समीक्षा ''
( वस्तुतः गुरु मार्ग में प्रकृति जितनी बाधा उत्पन्न करती है , भक्त की सहन शक्ति उतनी ही बढ़ती जाती है । इसी के द्वारा भक्त की परीक्षा और भक्त के चरित्र का मूल्यांकन होता है । )
यद्यपि बड़े बड़े शास्त्र पुराण इस संसार से मुक्ति के लिए भक्ति मार्ग साधन को ही प्रमुख आधार बताया है ‘ मौलिस्तथापि तेषां स्वयमुक्ता भगवता भक्ति ' भगवान ने स्वयं भक्ति को सभी भक्तों का मुकुट मणि कहा है । अंत: श्री गुरु की प्राप्ति के लिए भी भक्ति ही एकमात्र संबल है ।

“ श्री गुरूदेव इष्ट जा ‘ र ।। कि अबा दु: ख सुख ता ‘ र ''
चित्त ता ‘ र सदा प्रसन्न ।। करूकथाए अक्लांत श्रम ''
( वास्तव में श्री गुरुदेव ही जिसके इष्ट होते हैं , उसके लिए दुःख सुख भला क्या है ? क्योंकि वह सुख दुःख दोनों में ही समभाव रखता है , ऐसे भक्त का चित्त सदैव प्रसन्न रहता है और उसी स्थिति में वह अथक परिश्रम करता है । )

भक्त गुरु आश्रित भक्त अपनी आत्मसिद्धि से पंचमहाभूतों पर विजय प्राप्त कर लेते हैं , शुद्ध चित्त में ज्ञान के प्रकाश से भक्त सुख दुःख में समान भाव रहता है । उसका मन जहाँ जहाँ जाता है , वहीं परम भाव में संतोष पाता है , उसके लिए श्री गुरु सर्वत्र ही समान रूप से विराजमान रहते हैं ।

“ साथीरे नेई फुलमाल ।। नारिकेल वा अन्य फल
श्रृद्धारे धरि उपहार ।। पँहचई से गुरु द्वार ''
( जब भक्त गुरु के पास जाता है तो वह अपने साथ श्रद्धा पूर्वक फूल माला , नारियल या अन्य फल एवं उपहार आदि लेकर गुरु द्वार पर पहुंचता है । )

“ गुरु गृहे बा आश्रमरे ।। आसिते भक्त भक्ति भरे
सरि स्नानादि नित्य कर्म ।। पिन्धे निर्मल परिधान ''
( इस प्रकार गृहस्थ भक्त अपने कुटुम्ब जनों को साथ लेकर आश्रम में आता है और वहाँ सभी को श्री गुरु के दर्शन प्राप्त होते हैं और सभी का कल्याण होता है । )

“ साथे अन्यकु नेबाबेले ।। भाबकु बुझिथिव भले
भाबरे नथिले समता ।। उपुजिथाएँ बिषमता ''
( श्री गुरु के पास अपने साथ किसी अन्य व्यक्ति को ले जाते समय भक्त को उस व्यक्ति के गुरु संबंधी भाव को भी भलीभांति जान लेना चाहिए क्योंकि उसमें गुरु के प्रति भाव में समता न होने पर नकारात्मक स्थिति उत्पन्न होती है । )

“ सेवकंकर माध्यम रे ।। श्री गुरुंकुर खबर करे
गुरु डाकिले पाशे ।। स्वजनंकु साथी रे लिए ''
( जब भक्त सगे संबंधियों को श्री गुरु के पास ले जाता है , तो वह श्री गुरु के सेवकों द्वारा श्री गुरु को ख़बर करता है और फिर श्री गुरु के द्वारा बुलाए जाने पर वह स्वजनों को अपने साथ लेकर जाता है । )

“ आगे करई दंडवत् ।। गुरूंक चरणे भक्त
कहे “ हे गुरु कृपा कल ।। मोते जे दरशन देल ''
( तब श्री गुरु के पास जाकर भक्त पहले श्री गुरु के चरणों में दंडवत् करता है और उनसे कहता है कि “ हे गुरु आपने मुझे दर्शन दे कर मुझ पर कितनी कृपा की है । )

“ साष्टांग प्रणामर परे ।। छिड़ा हुए हस्त रे
प्रश्न करिले गुरूवर ।। परिचय दिए साथीर ''
( फिर श्री गुरु को साष्टांग प्रणाम करने के पश्चात भक्त अपने गुरु के समक्ष हाथ जोड़ कर खड़ा हो जाता है , पर वह अपने साथ आए लोगों का उन्हें परिचय देता है । )

“ श्री गुरूंक पाशे जिबारे ।। अन्यकुजे साहाज्य करे
से अरे असलि भक्त ।। भकति जाहार नि: स्वार्थ ''
( वास्तव में श्री गुरु के पास जाने वाले वे भक्त जो कि अन्य लोगों की सहायता करते हैं और जिनकी भक्ति स्वार्थ रहित होती है , वे ही असली भक्त होते हैं । )

भक्त जन निरंतर सभी प्राणियों की स्वार्थ रहित सेवा में लीन रह कर निरंतर श्री गुरु की कृपा के अधीन उनके स्नेह की कामना करते हैं , स्वार्थ रहित भक्ति होने के कारण वे ही सच्चे भक्त होते हैं । गुरु की शरण में गए साधक गुरु सुश्रूषा से परिचित एवं परिप्रश्न करने की बुद्धि से पूर्ण होते हैं । भक्त प्रणत भाव से गुरु से निवेदन करते हैं -

“ देबाकु मोर किछि नाँहिं ।। सब तुमर भावग्राही
कृपा करे कले ग्रहण ।। कृतार्थ हेव मो जीवन ''
( फिर वह कहता है कि आपको देने के लिए मेरे पास कुछ नहीं है , क्योंकि हे भावग्राही ! जो कुछ भी मेरा है वह सब कुछ आपका ही है , आपके द्वारा कृपा पूर्वक इसे ग्रहण कर लेने से मेरा जीवन कृतार्थ हो जाएगा । )

श्रृद्धा ज्ञान मति , इंद्रिय संयम और निष्ठा ( गुरु सुश्रुषा ) ही श्री गुरु की अभ्यर्थना के लिए आवश्यक होते हैं , इन्हीं पंच साधनों द्वारा ‘ सद्‌गुरु बैद वचन विश्वासा ‘ की परंपरा में भक्त की स्थिति का वर्णन गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी किया है , इसी प्रकार भक्त भी अपने समस्त कर्मफल श्री गुरु को समर्पित कर देते हैं ।

“ गुरंकु देलाबेले दान ।। गर्बर न हेउ उत्पन्न
ए भेंटि हुएना गृहीत ।। जाणन्ति सकल सुभक्त ''
( वास्तव में श्री गुरु को कुछ भी दान देते समय भक्त के मन में अहंकार भाव से दी गई ऐसी भेंट श्री गुरु द्वारा स्वीकार नहीं की जाती , इसे सभी सुभक्त भलीभांति जानते हैं । )

“ श्री गुरु किछि न मांगन्ति ।। श्री गुरु किछि न निअन्ति
भक्त ठारू मिले जे दान ।। आश्रमे हुए वितरण ''
( श्री गुरु किसी से कुछ नहीं मांगते हैं और न ही वे किसी से कुछ लेते हैं , भक्त से जो दान में मिलता है , उसका आश्रम में ही वितरण हो जाता है । )

“ चढाई बेला मात्रे भेंटि ।। न खोल निज दुख पेटि
धीर होई शुण बचन ।। एकत्र करि मन प्राण ''
( श्री गुरु को भेंट चढ़ाते हैं , भक्त को तुरंत गुरु के समक्ष अपने दुख का पिटारा नहीं खोलना चाहिए , बल्कि उस समय उसे मनोयोग पूर्वक धीरज के साथ श्री गुरु के वचन सुनने चाहिए । )

“ शुद्ध चित्तरे प्रश्न कले ।। श्री गुरूंक उत्तर मिले
विनम्र ओ जिज्ञासु नर ।। शीघ्र पाइथाए उत्तर ''
( वास्तव में भक्त द्वारा शुद्ध चित्त से प्रश्न करने पर ही उसे श्री गुरु से उत्तर मिलता है , केवल विनम्र और जिज्ञासु व्यक्ति को ही शीघ्र उत्तर मिलता है । )

श्री गुरु का स्वरूप एवं जीवन दिव्य अविनाशी जीवन है , तप द्वारा ही ज्ञान प्राप्त होता है , अतः भक्त को शुद्ध , शांत चित्त से श्री गुरु के साथ अपनी जिज्ञासा प्रकट कर शंका समाधान कराना चाहिए । ‘ गुरु भागवत ' में निरंतर यह भाव स्पष्ट किया गया है कि ‘ गुरु कृपा ' से साधक का सब प्रकार से आत्मकल्याण हो जाता है , अन्यथा कल्याण की प्राप्ति नहीं होती ।

“ गुरु वाक्य जो महासत्य ।। वाणीर फल जे निश्चित
गुरु वाक्य वेदर गार ।। ज्ञान आउ धर्मर सार ''
( वस्तुतः गुरु वाक्य ही महासत्य है और उनकी वाणी निश्चित रूप से फलीभूत होती है , भक्त के लिए गुरु वाक्य ही श्रेष्ठ है, वेद सदृश है और ज्ञान एवं धर्म का सार है । )

शास्त्रों में गुरु महिमा और शिष्य लक्षण की इतनी महिमा वर्णित है , कि उसकी व्याख्या कुछ शब्दों में व्यक्त नहीं की जा सकती , गुरु के बिना उपासना मार्ग के रहस्य नहीं ज्ञात हो पाते , गुरु के संतोष में ही शिष्य की पूर्णता है , गुरु सर्वश्रेष्ठ है, गुरु स्मरण मे सभी देवों का स्मरण अंतर्भूत है । गुरूमंत्र और इष्ट देवता तीनों अलग नहीं हैं , एक ही हैं । गुरु के बिना मंत्र और इष्टदेव की प्राप्ति और साधना संभव नहीं , अस्तु श्री गुरु ही सर्वस्व है , यह मानने पर अधिकार हीन शिष्य भी सद्‌गुरु की शरण में जाने पर भक्ति और कृपा के अधिकारी बन जाते हैं । श्री गुरुदेव की कृपा और शिष्य की दीक्षा श्रद्धा इन दो पावन भावों का समावेश ही गुरु दीक्षा है ।

“ तर्क न करिबा उचित ।। ज्ञान बड़िमा अनुचित
भक्त चातक गुरु नीर ।। ज्ञान तृष्णा करन्ति दूर ''
( भक्त द्वारा श्री गुरु से तर्क न करना ही उचित है और उनके समक्ष अपने ज्ञान का प्रदर्शन करना अनुचित है , क्योंकि भक्त चातक है और श्री गुरु जल हैं , जो कि भक्त की ज्ञान रूपी तृष्णा को दूर करते हैं । )

भक्ति के संबंध में ‘ चातक प्रेम ' का प्रसंग अति प्राचीन प्रसंग है । भक्तिभाव एक ब्यापक अवधारणा और भक्त का चातक की भांति प्रेम पूर्ण समर्पण और अनन्य प्रेम को प्रकट करता है ।

‘ एक भरोसो एक बल , एक आस विश्वास
एक राम घनश्याम हित चातक तुलसी दास '
कहते हुए तुलसीदास ने चातक के माध्यम से अनन्य भक्ति भाव और भक्ति की निष्ठा को स्पष्ट किया है , जिस प्रकार चातक केवल स्वाति नक्षत्र में जल के लिए प्रतीक्षा करता रहता है , उसी प्रकार श्री गुरु रूपी कृपा जल के लिए भक्त चातक की भांति अनन्य भक्ति और निष्ठा से समर्पित रहते हैं और श्री गुरु को ही एकमात्र आश्रय और प्रेम का पात्र मानते हैं ।

“ गुरु कंठारू पाइ ज्ञान ।। करन्ति साष्टांग प्रणाम
कहन्ति गुरु हेलि धन्य ।। शुणि तब दिव्य वचन ''
( तब भक्त अपने गुरु से ज्ञान प्राप्त कर उन्हें प्रणाम करता है और कह उठता है , हे गुरूवर आपके दिव्य वचन सुनकर मैं धन्य हो गया । )

“ सम्मति देले गुरूबर ।। सेबा करन्ति चरणर
कहन्ति गुरु हेलि धन्य । शुणि तब दिव्य वचन ''
( फिर गुरूबर द्वारा अनुमति मिलने पर भक्त उनके चरणों की सेवा करते हैं , वास्तव में श्री गुरु के चरण महातीर्थ हैं और भक्त के लिए वे पुण्य क्षेत्र हैं )

“ श्री गुरु पारस झरे शक्ति ।। पादस्पर्शरे जागे भक्ति
सेवा करि गुरु चरण ।। मानस हुअई पावन ''
( श्री गुरु के चरणों से शक्ति झरती है , इसीलिए भक्त द्वारा श्री गुरु के चरण स्पर्श से उसके मन में भक्ति जागृत होती है और फिर श्री गुरु चरणों की सेवा करके उसका हृदय पावन हो जाता है । )

मनुष्य रूप में ईश्वर के स्मरण के साथ गुरु के चरण कमल की पहले वंदना ही होती है । श्री गुरु की पद रज से श्री गुरु के नख बिंदु से ब्रह्म ज्योति का प्रकाश होता है , इसीलिए गुरु चरण महातीर्थ की भांति माने जाते हैं ।

“ जोड़ हस्तरे भक्त दास ।। सेवा पाँइ मांगे आदेश
कहे ‘ हे गुरु आज्ञा कर ‘ ।। पालिब निश्चे ए चाकर ''
( इसके पश्चात भक्त दास भाव में हाथ जोड़ें हुए श्री गुरु की सेवा के लिए उनके आदेश चाहते हैं और कहते हैं कि हे गुरूवर आप आज्ञा करें यह चाकर उसका निश्चित रूप से पालन करेगा । )

“ तमर सबु सेवा कर्म ।। करिबा मोर श्रेष्ठ मार्ग
कह मुँ सेवा करिबि ।। निजर सौभाग्य मणिबि ''
( अनन्य भक्ति भाव भरित वह भक्त श्री गुरु से कहता है कि आपका सब सेवा कर्म करना ही मेरा श्रेष्ठ धर्म है , आप ही कहें कि मैं आपकी क्या सेवा करूँ , यह सेवा करके मैं इसे सौभाग्य मानूँगा । )

“ तमर जे अनन्य भक्त ।। धनी मानी ओ शक्तिवंत
तथापि मो व्याकुल मन ।। सेविबाकु तुम चरण ''
( हे गुरूवर ! आपके तो असंख्य भक्त हैं , जो कि धनी मानी और शक्तिशाली हैं , फिर भी आपके चरणों की सेवा करने के लिए मुझ जैसे अकिंचन का मन अति व्याकुल है । )

“ मो धन जन बईभव ।। तम पादे उत्सर्ग सर्व
निज इच्छा प्रकट कर ।। निश्चे पालिब ए किंकर ''
( भक्त कहता है कि हे गुरूबर आपके चरणों में मेरा जन धन बैभव सब कुछ न्योछावर है , आप अपनी इच्छा व्यक्त कीजिए यह दास उसका निश्चित रूप से पालन करेगा )

भक्ति मार्ग में दास्य और सख्य भाव की भक्ति से ही भक्त जन प्रभु रूप गुरु को सहज रूप से प्राप्त कर लेते हैं , वहां सेवक सेव्य भाव से ही इस भव सागर को पार करने का उपाय इंगित किया गया है - ‘ सेवक सेव्य भाव बिनु भव न तरई उरगारि ' के सिद्धांत के अनुसार काकभुशुंडि और गरुड़ के वार्तालाप में रामचरितमानस में स्पष्ट किया गया है कि प्रभु को स्वामी और स्वयं को सेवक मानकर ही सांसारिक प्रपंच से मुक्ति पाई जा सकती है , इसीलिए सच्चे भक्त अनन्य भाव से भगवान ही नहीं प्रभु रूप गुरु की सेवा के लिए स्वयं को समर्पित कर देते हैं ।

‘ गुरु भागवत ' के अगले क्रम में ‘ गुरु से संबंधित उत्सव 'विशेष की चर्चा की गई है और उनके महत्व को स्पष्ट किया गया है, इस विषय पर प्रस्तुति आगामी गुरुवार को ।

“ गुरु भागवत ' को समर्पित गुरुवार का सादर प्रणाम ।

पाठकों से निवेदन है कि इस विषय में अपने विचार व्यक्त करने की कृपा करें ।

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