Pragya Trust-Dehradun by Dr. Sudha Rani Pandey

Pragya Trust-Dehradun by Dr. Sudha Rani Pandey Every Thursday, on literature of respected Dr. C B Satpathy, an attempt is made by me Dr. SudhaRani

27/08/2026

“गुरु भागवत “ चतुर्थ खंड संदेश श्रृंखला ४३

‘ गुरु भागवत ' की विगत संदेश श्रृंखला में आदित्य साधना और गुरु कृपा से साहित्य साधना का प्रसंग स्पष्ट किया गया था , इसी साधना क्रम में अगली छंदों में ‘ अवतारवाद और ‘ अवतारों ' के कर्म की विवेचना में ‘ गुरु भागवत की छंद में स्पष्ट किया गया है -'

“ श्री विष्णु शक्ति सदा काले ।। अगणित ब्रह्माण्डपाले
महाविश्वकु चिरंतन ।। पालन्ति विष्णु नारायण ''
( श्री विष्णु शक्ति सर्वदा असंख्य ब्रह्माण्डों का पालन करती है और श्री विष्णु नारायण महाशिव का चिरंतन पालन करते हैं । )

यह विश्व ब्रह्मांड सहित सम्पूर्ण सृष्टि में ब्रह्मा , विष्णु महेश की शाश्वत शक्तियों का पालन करते हुए असंख्य जीवों सहित धरती के प्राणियों की भी रक्षा करते हैं । विष्णु शक्ति ही महाशिव की शक्ति को भी संरक्षित करती हैं । श्री विष्णु शक्ति ही अवतार रूप में धरती पर क्रीड़ा करती हैं ।

“ अवतारंक दिव्य खेल ।। बुझिब नुँह जे सरल
धरारे हेले संधि क्षण ।। अवतार निअन्ति जन्म ''
( अवतारों के दिव्य खेल को समझ पाना सरल नहीं है , वास्तव में धरा पर संधि क्षण अर्थात् परिवर्तन या कष्ट का समय होने पर अवतार जन्म लेते हैं । )

“ अवतारंक दुई कर्म ।। तात्कालिक ओ चिरंतन
मुख्य जे कर्म चिरंतन ।। ता ‘ परे तात्कालिक कर्म ''
( वस्तुतः अवतारों के दो प्रकार से कर्म होते हैं , तात्कालिक अर्थात् जिस समय अवतार देह समय में रहते हैं , उस समय उनके द्वारा किए जाने वाले कर्म और चिरंतन शाश्वत रूप में किए जाने वाले कर्म उनके मुख्य चिरंतन कर्म होते हैं, बाद में तात्कालिक कर्म होते हैं । )

“ तात्कालिक काम तांकर ।। संघर्ष धर्म अधर्मर
धर्मात्मा नरंक रक्षण ।। पापी जनंक बिनाशन ''
( जिस समय अवतार का अवतरण होता है , उनका उस काल का कार्य धर्म एवं अधर्म के संघर्ष में धर्म का पालन करने वाले मनुष्यों की रक्षा और पापी लोगों का विनाश करना होता है । )

अवतार रूप में भगवान जब भी मानव या किसी अन्य रूप में अवतरित होते हैं , तो वे एक निश्चित समय के लिए आते हैं , लेकिन उनके कार्यों का प्रभाव चिरंतन या स्थायी होता है । तात्कालिक कर्म वे कार्य हैं , जो अवतार अपने जीवन काल में ही किसी विशेष समय की परिस्थितियों या संकट दूर करने के लिए करते हैं , उस समय मानव जाति और समाज में अधर्म को रोकने , दुष्टों का नाश और धर्म की रक्षा करना होता है । इसी समय वे परम भक्तों की आर्त पुकार सुनकर उन्हें दर्शन देते हैं और उनका उद्धार करते हैं । चिरंतन या शाश्वत कर्मों के साथ अवतार अंतर्धान होने के सहस्त्रों वर्षों बाद भी मानव मात्र की व मानवता की रक्षा करते रहे हैं । धर्म की शाश्वत स्थापना , मानव मात्र के लिए सदाचार , कर्तव्य और मानवता के नियम भी वे निर्धारित करते हैं , जो हर युग में अर्थवान होते हैं -

“ निर्देशित समाजर स्थिति ।। अवतार लीला भिआन्ति
समाजरे आणि बदल ।। बनान्ति जे धर्मानुकूल ''
( समाज की स्थिति को निरख कर अवतार लीला रचाते हैं , इस प्रकार अपनी दिव्य लीला के द्वारा वे समाज में परिवर्तन ला कर उसे धर्म के अनुकूल बनाते हैं । )

गीता के श्लोक -
“ यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ''
यह संदर्भ लोक कल्याणकारी परिवर्तन का सर्वाधिक प्रासंगिक और सर्वग्राह्य प्रसंग है । द्वापर युग में कंस के अत्याचारों से मुक्ति और महाभारत युद्ध की भूमिका में श्री कृष्ण का अवतारी रूप सभी प्राणियों की मुक्ति का माध्यम बना था ।

“ आद्यरे उद्यम शरीर ।। करिथाआन्ति अवतार
साम दाम दण्ड ओ भेद ।। साथीरे क्षमा , दया , सत्य ''
( आरंभ में अवतार साम , दाम , दंड , भेद के साथ क्षमा दया एवं सत्य के द्वारा समाज में शांति लाने का प्रयत्न करते हैं । )

आरंभ में ये अवतार तात्कालिक कर्म द्वारा अधर्म को रोकने तथा उस समय के असुरों और पापियों का संहार करने जैसे कार्य करते हैं , जैसे श्री राम कृष्ण रूप में विविध लीलाओं द्वारा भक्तों की समकालीन संकटों से रक्षा की थी , उस समय के समाज , ऋषियों या प्रकृति को तात्कालिक संकटों से मुक्ति दिलाने में भी लीलाएँ करते हैं । इस प्रकार समाज की अव्यवस्था को संतुलित कर धर्म की पुनर्स्थापना के लिए सतत कर्म करते हैं , भक्तों आर्त पुकार सुनकर उन्हें आश्वस्ति प्रदान करते हैं ।

“ तथापि न होले बदल प्रयोग ।।करिथान्ति बल
दिव्य शक्ति प्रयोग करि ।। पापी नष्ट करन्ति हरि ''
( फिर यदि लोककल्याणकारी परिवर्तन न होने पर हरि बल का प्रयोग करते हैं और अपनी दिव्य शक्तियों का प्रयोग करके पापियों को नष्ट करते हैं । )

दशावतार परंपरा में विष्णु के प्रथम अवतार से प्रारंभ घटनाएँ अपने समय में धरती के कष्टों का शमन और दुष्टों के दमन में श्री हरि के अवतार धरती का त्राण करने वाले अवतार रहे हैं ।

“ जुद्धरू शांतिर प्रेरणा ।। नव समाजर स्थापना
नव प्रतिष्ठा पाए धर्म ।। तात्कालिक ए गुरु कर्म ''
( वास्तव में युद्ध द्वारा शांति की प्रेरणा देना नए समाज की स्थापना एवं धर्म की नवीन रूप में प्रतिष्ठा करना अवतारों के तात्कालिक गुरु कर्म होते हैं । )

“ रूढ़िवादी परंपरार ।। समयातीत नियमर
करिथान्ति परिवर्तन ।। नव समाज जाण ''
( वास्तव में अवतार नवीन समाज की संरचना करने के लिए रूढ़िवादी परम्पराओं के स्थान पर कालातीत नियमों को अर्थात् ऐसे मूल्य जो हर युग में समाज के लिए कल्याणकारी हों उन्हें स्थापित करके सामाजिक परिवर्तन करते हैं । )

अवतारों का अवतरण अर्थात् भगवान का पृथ्वी पर अवतरण असुरों और दुष्टों के संहार के अतिरिक्त समाज में फैलती अनैतिकता और असमानता को दूर करने का उद्देश्य भी रहता है , अधर्म का नाश और न्याय की स्थापना , सामाजिक समानता , जाति भेद को नष्ट करना , नारी जाति की रक्षा और उद्धार , लीलाओं द्वारा प्रकृति पूजा और पशु धन की रक्षा , नीतिगत सुधार और कूटनीति द्वारा युगव्यापी परिवर्तन में अवतारों की भूमिका का विस्तृत वर्णन सभी आर्ष ग्रंथों में मिलता है । अगली छंदों में ‘ अवतारों का दिव्य उपदेश ' शीर्षक के अंतर्गत धर्मवाणी के प्रसार और प्रसंग स्पष्ट किया गया है -

“ अवतारंक धर्मवाणी ।। स्मृतिरे रखि जोगी मुनि
परे करन्ति संकलित ।। ग्रंथ रूपरे ज्ञानी भक्त ''
( योगियों मुनियों ने अवतारों की धर्मवाणी को अपनी स्मृति में रखा था । बाद में ज्ञानी भक्तों ने उस धर्म वाणी को ग्रन्थ रूप में संकलित किया है । )

“ अवतारंक दिव्य ज्ञान ।। जुगे जुगे थाए अक्षुण्ण
देइथान्ति शाश्वत ज्ञान ।। बुझान्ति प्रभुंक नियम ''
( वास्तव में अवतारों का दिव्य ज्ञान युगों युगों तक अक्षुण्ण अर्थात् ज्यों का त्यों रहता है , क्योंकि वह शाश्वत ज्ञान देता है और प्रभु के नियम समझता है । )
अवतारों के दिव्य उपदेश में धर्म की पुनर्स्थापना कर्मवाद की प्रतिष्ठा द्वारा समाज में मर्यादा , प्रेम और कर्तव्य का महिमागान , प्रलय और संकट के समय वेदों और दिव्य ज्ञान की रक्षा भी की है । अवतारों के धरती पर आने का दिव्य उद्देश्य मुख्यतः हर युग में धरती पर धर्म स्थापना और कल्याण का उपदेश देते हुए सृष्टि की रक्षा करना रहा है ।

“ पूर्ण करि विहिन कर्म ।। शेष करन्ति देह धर्म
थाए तांकर उपदेश ।। जीवंत गुरूंक सदृश ''
( वस्तुतः अपने नियत एवं औचित्य पूर्ण कर्म को पूरा करने के बाद अवतार अपना शरीर त्याग देते हैं , किंतु उनके उपदेश जीवंत गुरू के समान सदैव मार्ग दर्शक होते हैं । )

“ ग्रंथर करिले पठन ।। साथीरे ध्यान ओ मनन
मिले दिव्य ओ सूक्ष्म ज्ञान ।। भक्तकु करे पुण्यवान ''
( वास्तव में ग्रन्थ का पठन और साथ में ध्यान एवं मनन कराने पर दिव्य एवं सूक्ष्म ज्ञान मिलता है , जो कि भक्त को पुण्यवान बनाता है । )

आर्ष ग्रंथों के श्रवण मनन से गुरु तत्व का सूक्ष्म ज्ञान मिलता है , गुरु की कृपा ही भक्तों को पुण्यवान बनाती है ।

“ गुरु छाड़िले वि शरीर ।। उपदेश थाए अमर
अवतारंक उपदेश ।। गुरु तत्वरे समावेश ''
( वस्तुतः श्री गुरु द्वारा अपना शरीर छोड़ देने पर भी उनके उपदेश अमर रहते हैं और अवतारों का उपदेश गुरु तत्व में समाविष्ट रहता है । )

सभी अवतारों के देहत्याग के उपरांत उनके कल्याणकारी उपदेशों का अमर तत्त्व ग्रंथों के रूप में आज तक सुरक्षित रूप से संग्रहीत है ।

“ श्रीराम देह त्याग काले ।। ‘ जोग बशिष्ठ ' छाड़िगले
ईशमसिंहाकर तत्व ।। ‘ बाइबेल ‘ रे जे लिखित ''
( जैसे कि श्री राम देह त्याग कर गए पर समाज के कल्याण के लिए ‘ योग बशिष्ठ ‘ छोड़ गए और उसी प्रकार ईसामसीह के उपदेशों का सार बाइबिल में लिखा हुआ है । )

“ त्रिपिटक श्री बुद्धंकर ।। कोरान मोहम्मदकर
नानकंकर उपदेश ।। ‘ ग्रंथ साहेबरे ‘ प्रकाश '
( इसी प्रकार श्री बुद्ध के उपदेश ‘ त्रिपिटक ' में हजरत मुहम्मद के उपदेश ‘ क़ुरान ' में हैं और गुरु नानक के उपदेश ‘ गुरु ग्रंथ साहेब ' में प्रकाशित हैं । )

“ श्लोकादि श्री शंकरंकर । भक्तिगीत कबीरंकर
श्लोकादि ‘ रामायण ' समस्त वेद ओ पुराण ''
( श्री शंकर के श्लोक इत्यादि कबीर के भक्ति परक गीत , तुलसीदास की ‘ रामायण 'अर्थात् रामचरितमानस और सभी वेद और पुराण भी अवतारों के उपदेश से युक्त हैं । )

“ गुरुमुख निर्गत वाणी ।। अटे प्रभुंक दिव्य वाणी
धर्म ग्रंथर परायण ।। करन्ति तेणु भक्त गण ''
( गुरु मुख से निकली हुई वाणी प्रभु की दिव्य वाणी होती है , इसीलिए भक्त जन धर्म ग्रंथों का पारायण करते हैं )

“ श्री विष्णु नर देह धरि ।। असिथाआन्ति अवतरि
अधर्म विनाश कारणे ।। धर्म संस्थापना कारणे ''
( वास्तव में श्री विष्णु मनुष्य देह धारण करके अवतार रूप में अधर्म का विनाश और धर्म की स्थापना के लिए आते हैं । )

भारतीय आर्ष परंपरा में विश्व के विभिन्न धर्म ग्रन्थों में संकलित दिव्य ज्ञान और गुरू का संदेश मानव जाति के कल्याण , आत्मसाक्षात्कार और शांति का मार्ग दिखाते हैं । देहधारी नर रूप ईश्वर के अतिरिक्त विभिन्न युगों में धर्म प्रचारक महात्माओं के दिव्य संदेश भी उनके धर्म ग्रंथों में संरक्षित हैं । वेद , उपनिषद , गीता , मे ‘ अहं ब्रह्मास्मि ' ‘ तत्वमसि ' जैसे उपदेश भगवान श्री कृष्ण का कर्मयोग का संदेश निष्काम कर्म से मुक्ति का संदेश ‘ अप्पदीपो भव ' अर्थात् अपना दीपक स्वयं बनो का संदेश , जैन धर्म में भगवान महावीर का ‘ अहिंसा परमो धर्म ‘ का महा उपदेश सिख परंपरा का दिव्य ज्ञान ‘ इक तू ओंकार ' अर्थात् ईश्वर एक है , सत्य ही ईश्वर है , वह ‘ घट घट वासी ' है , नाम जप और प्रेम का संदेश श्री गुरु नानक की वाणी में ‘ श्री गुरु ग्रंथ साहिब ' में अक्षुण्ण रूप से समाहित है । ईसाई धर्म की पवित्र बाइबिल का दिव्य ज्ञान , ईश्वर प्रेम , क्षमा और सेवा ही ईश्वर तक पँहुचने का सच्चा मार्ग है । इस्लाम के पवित्र ग्रंथ क़ुरान के दिव्य ज्ञान में ईश्वर की एकता अर्थात् ‘ अल्लाह ' के सिवा कोई पूजनीय नहीं है । सभी ग्रंथों के गुरु ज्ञानामृत में आत्मकल्याण , ध्यान और साधना के मार्ग विहित हैं । परम प्रभु परमेश्वर श्री गुरु रूप में भक्तों को जीवन के नैतिक आदर्श और आध्यात्म साधन का मार्ग सिखाते हैं । ‘ गुरु भागवत ' के अगले प्रसंग में ‘ श्री रविनारायण ' और अवतार का प्रसंग वर्णित है , इसका विवेचन आगामी गुरुवार को ।
“ गुरु भागवत “ को समर्पित गुरुवार का सादर प्रणाम ।
पाठकों से निवेदन है कि इस संदेश के विषय में अपने विचार व्यक्त करने की कृपा करें ।

19/08/2026

“गुरु भागवत “ चतुर्थ खंड संदेश श्रृंखला ४२

‘ गुरु भागवत ' की विगत संदेश श्रृंखला के अंतर्गत इस धरा पर प्राणी की चेतना के क्रमिक विकास की अवधारणा स्पष्ट करने के साथ यह अवगत कराया गया था कि प्राणियों में श्रेष्ठ स्थिति मनुष्य की है और उसमे दिव्य शक्तियां भी होती हैं । इसी क्रम में ‘ नर जाति का उत्तरण ' छंद द्वारा अभिव्यक्त किया गया है -

“ प्रतिकलप वा मन्वन्तरे ।। रविंक शकति बदले
घटिले तहिँ तारतम्य ।। भांगे धरार भार साम्य ''
( प्रत्येक कल्प या मन्वन्तर में सूर्य की शक्ति बदलती है और जब उसमें तारतम्य घटित होता है अर्थात् सूर्य की ऊर्जा शक्ति कम या अधिक होती है तो पृथ्वी का संतुलन भी कम होता है । )

सूर्य और पृथ्वी के बीच का संतुलन ही प्रत्येक युग में धरती के जीवन का आधार है और सूर्य की ऊर्जा शक्ति के संतुलन असंतुलन से विभिन्न परिवर्तन आते हैं , सूर्य की ऊर्जा तरंगों के रूप में पृथ्वी तक पहुँचती है , इसी ऊर्जा से प्रकाश और जलचक्र चलता है , पृथ्वी जितनी ऊर्जा सूर्य से लेती है उतनी ही वापस भेजती है, यही संतुलन है , जब यह क्रम परिवर्तित होता है , धरती और मानव गतिविधियों पर उसका प्रभाव पड़ता है , इसी कारण प्रकृति में प्रलय जैसी स्थितियां उत्पन्न होती हैं ।

“ आज धरा परे बसति ।। करे चतुर्थ - नर जाति
चतुर्थ जातिर समय ।। बितिलाणि अर्ध समय ''
( आज चेतना के विकास क्रम में चौथी मानव जाति - प्रजाति पृथ्वी पर वास कर रही है , वस्तुतः चतुर्थ मानव जाति का भी आधा समय व्यतीत हो चुका है । )

“ प्रथमे तिनि जाति थिला ।। तहिँरू चतुर्थ जन्मिला
वर्तमान पंचम जाति ।। कलाणि सामान्य प्रगति ''
( वास्तव में पहले मनुष्य की तीन जातियां चेतना के क्रमिक सोपान के रूप में पृथ्वी पर थीं , उन्हीं से चतुर्थ जाति उत्पन्न हुई । वर्तमान पंचम जाति की अभी थोड़ी ही प्रगति हुई है । )

“ से तिनि जातिकु ।। जाणिले ।। चतुर्थकु बुझिब भले
जीव जातिर इतिहास ।। आगतर दिए आभास ''
( पूर्व की उन तीन मानव प्रजातियों को जान लेने पर चतुर्थ प्रजाति को भली प्रकार से समझा जा सकता है , क्योंकि जीव जाति का इतिहास भविष्य का आभास देता है । )

इस धरती पर जीव जाति का अवतरण का इतिहास अनुकूल रूपों में विकसित हुआ सर्वाधिक प्रभावशाली बुद्धि और चेतना से समन्वित मनुष्य यद्यपि विकास क्रम की पंचम प्रजाति का अवतरण है किन्तु अभी भी इसका विकास अपेक्षाकृत कम है । भौतिक विकास के अतिरिक्त आध्यात्मिक दृष्टिकोण से मनुष्य और प्रकृति का विकास एक दूसरे से जुड़ा है , इसमें चेतना का विस्तार पंचतत्वों का संतुलन तथा आंतरिक और बाहरी जगत की एकता मुख्य सूत्र है । आध्यात्मिक रूप में चैतन्य प्राण विकसित मनुष्य जाति प्रकृति के समन्वय कम होने से प्रकृति और मानव के मध्य समस्याएँ बढ़ी हैं ।

“ से तिनि जातिकु जाणिले ।। चतुर्थकु बुझिब भले
जीव जातिर इतिहास ।। आगतर दिए अभ्यास ''
( पूर्व की उन तीन प्रजातियों को जान लेने के पर चतुर्थ प्रजाति को भली प्रकार समझा जा सकेगा क्योंकि जीव जगत का इतिहास भविष्य का आभास देता है । )

जीव जाति , प्रजाति का इतिहास और भविष्य पृथ्वी पर जीवन का अवतरण और क्रमिक विकास , अनुकूलन और अस्तित्व के संघर्ष की एक अद्भुत कहानी है । मानव जाति का अवतरण होने पर मनुष्य ने बुद्धि से प्रकृति पर नियंत्रण करना प्रारंभ कर दिया था , जिससे पूर्व जीव जातियों का संतुलन भी बिगड़ने लगा , इस कारण मानव के क्रमिक जीवन अथवा अतिशय भौतिकता के कारण अन्य प्रजातियों का भविष्य भी संकट में दीख रहा है । मनुष्य के प्रकृति के साथ तालमेल के कारण ही धरती का भविष्य सुरक्षित है, यदि प्रकृति के समन्वय का क्रम संतुलित नहीं रहा तो अन्य जाति - प्रजातियों का अस्तित्व भी संकट में पड़ जाएगा ।

“ धरार विभिन्न स्थानरे ।। चैतन्य जीव रूप धरे
सूक्ष्म शरीर अबा स्थूल ।। प्रकृतिर अदृश्य खेल ''
( धरा के विभिन्न स्थानों पर वस्तुतः सूक्ष्म अथवा स्थूल शरीर में चैतन्य ही जीव रूप धारण करता है । वास्तव में यह प्रकृति का अदृश्य खेल है । )

अगले प्रसंग में ‘ सृष्टि प्रेम और सृष्टा खेल ' के अंतर्गत ‘ गुरु भागवत ' में स्पष्ट किया है -

“ प्रभुकु जे प्रेम करिब ।। प्रभुंगु सृष्टिकु लोड़िब
‘ पूर्ण ' कु जे प्रेम करिब ।। ‘ अंश ' कु बि भल पाइब ''
( प्रभु से जो प्रेम करेगा , वह अंश अर्थात् प्राणी सृष्टि को भी चाहेगा , वस्तुतः जो पूर्ण प्रेम करेगा वह अंश अर्थात् प्राणी सृष्टि को भी प्रभु मानकर प्रेम करेगा । )

यह संपूर्ण सृष्टि प्रभु की लीला का विलास है और इस सृष्टि को प्रभु का अंश मानने वाले मनुष्य ही इस रहस्य को समझ कर संपूर्ण सृष्टि के सभी जीवों के साथ प्रेम संबंध बनाते हैं । ।
“ सेपरि जे श्रेष्ठ भक्त ।। गुरु कंठारे अनुरक्त
लोडे़ना केबे चमत्कार ।। धन घर बा परिवार ''
( श्री गुरु के प्रति अनुरक्त ऐसे श्रेष्ठ भक्त कभी भी चमत्कार धन , घर या परिवार की चाहत नहीं रखते हैं । )

“ केवल गुरुंक से चाहें ।। गुरूंक शकतिकु नुँह
जा मन प्रेमे परिपूर्ण ।। लोड़े नाहिँ से किछि अन्य ''
( वह श्रेष्ठ भक्त गुरु की चामत्कारिक शक्ति को नहीं अपितु केवल गुरु को चाहता है , वास्तव में जिसका मन गुरु के प्रति प्रेम से भरा हुआ होता है , वह कुछ और की चाहत नहीं रखता । )

गुरु शिष्य का सच्चा संबंध देह और आत्मा की भांति माना गया है , अर्थात् गुरु शिष्य एक ही रूप हैं , ऐसी स्थिति में श्री गुरु से तादात्म्य भाव स्थापित हो जाने पर अनन्य प्रेम भाव से समर्पित शिष्य केवल श्री गुरु का ही सामीप्य और कृपा चाहते हैं , इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं ।

“ शिष्यकु किछि महामना ।। शिखान्ति आदित्य साधना
आदित्य साधनार परे ।। निअन्ति उच्चतर स्तरे ''
( कुछ महामना गुरूजन शिष्य को आदित्य साधना द्वारा श्री गुरु शिष्य के आत्मबल और आत्मविश्वास को सुदृढ़ बनाते हैं , शरीर में ऊर्जा की वृद्धि करते हैं , सूर्य संसार के अधिपति तेजपुंज की अनंत राशि हैं , सूर्य तत्व की जागृति से साधक ऊर्ध्व शिखर पर जा पँहुचते हैं । इस साधना के लिए योग्य गुरु का मार्गदर्शन अपेक्षित होता है , गुरु के बिना यह आध्यात्मिक यात्रा अधूरी और कठिन मानी जाती है । अगली छंद में आदित्य साधना का विवरण स्पष्ट किया गया है ।

“ सूर्ज्य साधक जोगस्थ मना ।। करे त्रिदेहर साधना
साधना प्रति शरीरर ।। संपूर्ण चारि बरषर ''
( सूर्य साधक योगस्थित हो कर त्रिदेह साधना करते हैं और उनके द्वारा की गई प्रत्येक देह की साधना चार वर्षों में पूरी होती है । )

सूर्य देव या आदित्य साधना , उपासना , आध्यात्मिक मार्ग मे गुरु के महत्त्व से जुड़ी है , जिसमे सूर्य को प्रत्यक्ष देवता और गुरु को ज्ञान का मार्ग दर्शक माना जाता है ।

“ प्रति देहकु चारि वर्ष ।। तिनि देहकु चार वर्ष
साधना जेबे पूर्ण हुए ।। सूर्ज्य साधना पूर्ण हुए ''
( वस्तुतः आदित्य साधना में प्रत्येक शरीर की साधना में चार वर्ष लगते हैं और तीन देह की साधना में भी चार वर्ष लगने के बाद जब बारह वर्ष पूर्ण हो जाते हैं तो सूर्य साधना सफल होती है । )

“ त्रिदेहर साधना माने ।। आदित्यर साधना बने
रविठुँ शक्ति मिलिथाए ।। तेणु रविंक पूजा हुए ''
( त्रिदेह की साधना का अर्थ ही आदित्य साधना है , चूँकि सूर्य से शक्ति मिलती है , इसलिए सूर्य की पूजा होती है । )

त्रिदेह साधना मनुष्य के शारीरिक और मानसिक और आत्मिक विकास से संबद्ध है , त्रिदेह साधना मनुष्य के तीन शरीरों के शुद्धीकरण और संतुलन पर केंद्रित है और आदित्य साधना साक्षात भगवान सूर्य की ऊर्जा और तेज को भीतर जागृत करने का माध्यम है । त्रिदेह साधना और आदित्य साधना दोनों ही भारतीय आध्यात्म और तंत्र विज्ञान की उच्च स्तरीय साधनाऐ हैं । त्रिदेह से अभिप्राय है मनुष्य का स्थूल शरीर , सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर इन तीनों शरीरों का परिष्कार और उनमें संतुलन स्थापित करने की प्रक्रिया को ही त्रिदेह या त्रिविध साधना कहा गया है । त्रिदेह द्वारा स्थूल शरीर से कर्म योग , सूक्ष्म शरीर से ज्ञान योग और कारण शरीर से भक्ति योग द्वारा साधना मार्ग के पथ को प्रशस्त करते हुए गुरु अर्थात् साक्षात ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण द्वारा साधना संपन्न की जाती है । इस त्रिदेह साधना द्वारा साधक के ‘ त्रिविध ताप ‘ अंत: करण की शुद्धि , इच्छा शक्ति और मानसिक एकाग्रता असाधारण रूप से बढ़ जाती है ।

“ आदिकालरू नर जाति ।। आदित्य पूजा करूछन्ति
प्रति सभ्यता ओ देशरे ।। रबि पूजा करन्ति नरे ''
( वास्तव में आदिकाल से मनुष्य जाति सूर्य पूजा करती रही है और प्रत्येक सभ्यता एवं देश में मनुष्य सूर्य पूजा करते हैं । )

“ आदित्य तत्व नाम जा ‘र' ।। मूल शक्ति से रविंकर
सूर्ज्यक द्वादश शकति ।। जल , अग्नि , वायु प्रभृति ''
( जिसका नाम आदित्य तत्व है , वह सूर्य की मूल शक्ति है वस्तुतः जल , अग्नि , वायु आदि के रूप में सूर्य की बारह शक्तियां होती हैं । )

भारतीय धर्म साधना विशेषत: हिन्दू धर्म साधना में और ज्योतिष में भगवान सूर्य की द्वादश शक्तियां उनके बारह दिव्य नामों से जुड़ी हैं जो संपूर्ण जगत को ऊर्जा , स्वास्थ्य और जीवन प्रदान करती हैं । मित्र , रवि , सूर्य , भानु , खग , पूषण , हिरण्यगर्भ , मरीचि , आदित्य , सवित्र । अर्क भास्कर नाम की द्वादश शक्तियां क्रमशः सभी से मित्र भाव , संपूर्ण संसार में प्रकाश और स्फूर्ति प्रसार , संसार की गति और कार्यों के प्रेरक , तेज कांति और प्रकाश बिखेरने वाली , सभी का पालन पोषण , ब्रह्माण्ड की स्वर्णिम आभा , ऊर्जा की केन्द्र , किरणों के रूप में संपूर्ण जगत में व्याप्त शक्ति अदिति के गर्भ से उत्पन्न शक्ति संसार के सृष्टि कर्ता की और जीवन दाता शक्ति , अत्यंत तेजस्वी शक्ति , ज्ञान बुद्धि और प्रकाश प्रदान करने वाली शक्ति के रूप में साधक की साधना और सिद्धि में सफलता प्रदान करने वाली शक्तियाँ हैं । सूर्य देव के ये बारह नाम और दिव्य शक्तियां साधक ही नहीं संपूर्ण सृष्टि की दिव्य ऊर्जा की प्रमुख शक्तियाँ हैं । सूर्य देव के ये बारह नाम और दिव्य शक्तियां साधक ही नहीं संपूर्ण सृष्टि की ऊर्जा की प्रमुख शक्तियां मानी गई हैं ।

“ पृथ्वी सूर्ज्य ठारू जात ।। सूर्ज्य गर्भे हुए लुप्त
धरारे जड़ वा जीवन ।। सभिएँ सूर्ज्यर अधीन ''
( पृथ्वी सूर्य से उत्पन्न होती है और सूर्य के गर्भ में विलुप्त भी हो जाती है , वास्तव में पृथ्वी पर जड़ या जीवन सभी कुछ सूर्य के अधीन है । )

“ आमे सर्बे सूर्ज्यंक अंश ।। नर प्रेत देबंक वंश
तेणु प्रेतकु मृत्यु परे ।। सूर्ज्यांश बोलन्ति शास्त्ररे ''
( वस्तुतः हम सभी अर्थात् नर , प्रेत , देवों के वंशज आदि सूर्य के अंश हैं , इसीलिए शास्त्रों में प्रेत को मृत्यु के पश्चात सूर्यांश कहा गया है । )

“ रवि नारायण बोलन्ति ।। भैरव रूप रे पूजन्ति
केते नाम ओ रूपे ज्ञात ।। धरार पुणि हिं आदित्य ''
(वास्तव मे सूर्य को रविनारायण भी कहा जाता है और भैरव रूप में उन्हें पूजा जाता है , इस प्रकार कितने ही नाम और रूपों में जाने जाते हैं और धरा पर उनका आदित्य नाम भी है । )

“ आदित्यंकर ध्यान कले ।। सूर्य तत्वर ज्ञान मिले
बारह वर्षे बारहि तत्व ।। साधकर करई आयत्त ''
( वस्तुतः आदित्य का ध्यान करने पर सूर्य तत्व का ज्ञान मिलता है और साधना के इन बारह वर्षों में साधक बारह तत्वों की शक्तियों को प्राप्त करता है । )

आदित्य साधना की बारह वर्षों की अवधि और सूर्य तत्व का ज्ञान सनातन आध्यात्म का गूढ़ और शक्तिशाली रहस्य है । सूर्य केवल एक नक्षत्र और तारा नहीं बल्कि साक्षात देवता और ब्रह्मांड की आत्मा है , साधक बारह वर्ष तक पूर्ण निष्ठा के साथ सूर्य देव की आराधना करता है तो उसे ‘ सूर्य तत्व ‘ का परम ज्ञान प्राप्त होता है । सूर्य तत्व का ज्ञान ब्रह्माण्ड की परम चेतना और ऊर्जा का नाम है जो पूरे संसार को चला रही है । इस साधना द्वारा पिड ( देह ) और ब्रह्माण्ड की एकता , प्राण शक्ति पर नियंत्रण अमृत तत्व की प्राप्ति , ऋतंभरा प्रज्ञा अर्थात् बुद्धि की प्रखरता से साधक में त्रिकालदर्शी अस्तित्व का जागरण होता है । वह अतीत , वर्तमान और भविष्य का ज्ञाता बन जाता है । ‘ गुरु भागवत ‘'की अगली छंदों में अवतार वाद का प्रसंग वर्णित है , इस प्रसंग का विवेचन आगामी गुरुवार को ।

“ गुरु भागवत '' को समर्पित गुरुवार का सादर प्रणाम ।
पाठकों से निवेदन है कि इस संदेश के विषय मे अपने विचार व्यक्त करने की कृपा करें ।

12/08/2026

“गुरु भागवत “ चतुर्थ खंड संदेश श्रृंखला ४१

‘ गुरु भागवत ' के विगत संदेश में ‘ विष्णु माया ' के स्वरूप स्पष्ट करने के साथ धरती पर जीवों के अवतरण और ‘ विष्णु शक्ति ' के आवरण और ‘ विक्षेप ' की स्थिति वर्णित की गई थी , इसी क्रम में ‘ जीव जगत ' का इतिहास ‘ शीर्षक के माध्यम से पूर्व में ‘ अति मानसी ' चेतना के स्वरूप का विवरण किया गया था , अगली छंद में इसी भाव की व्याख्या मे बताया गया है -
“ नर रे ज्ञान स्फुरण ।। मूलरे एमाने कारण
स्थूल ज्ञान देले प्रथमे ।। दिव्य ज्ञान धरिले क्रमे ''
( ये अलौकिक जीव वस्तुतः मनुष्य में ज्ञान की जागृति के मूल कारण थे , इसलिए मनुष्य को पहले स्थूल ज्ञान दिया अर्थात् बाह्य ज्ञान दिया और उसमें क्रमिक दिव्य ज्ञान भरा । )

“ जेमिति माली बगिचारे ।। फल पुष्पकु रक्षा करे
सार - पाणि देइ स्नेहरे ।। बृक्ष लतांकु स्पष्ट करे ''
( जिस प्रकार बगीचे में माली पुष्प की रक्षा करता है और पौधों को प्रेमपूर्वक खाद , पानी , देकर बृक्ष एवं लताओं को पुष्ट करता है )

“ गढ़िबाकु उत्कृष्ट फल ।। मालीर मन जे ब्याकुल
उत्तम फल हेले जात ।। बीजकु लगाए अन्यत्र ''
( फिर उत्तम फल बनाने के लिए माली का मन व्याकुल रहता है और उत्कृष्ट फल उत्पन्न होने पर वह बीज को कहीं और लगाता है , उसी प्रकार माली समान कर्म अतिमानसी जीवों द्वारा धरा पर प्राणी रूप बीज के लिए होता है । )

अतिमानसी चेतना दिव्य चेतना होती है जो गुरु के माध्यम से इस धरती पर जीवों को प्राणी रूप ( मानव रूप ) के मूल बीज अंकुरित रूप की भाँति विद्यमान रहती है ।

“ प्रकृति एहा नियम ।। प्राणी ठारू प्राणीर जन्म
आगे जल ओ स्थल चर ।। व्योम चरर पटेनर ''
( वास्तव मे प्रकृति का यही नियम है , कि प्राणी से प्राणी का जन्म होता है । पहले जल , स्थल और आकाश में विचरण करने वाले प्राणी बने तथा बाद में मनुष्य बना । )

“ जीव प्राणे भरा धरित्री ।। नहिँ असंख्य प्राणी जाति
प्राणींक मध्य श्रेष्ठतर ।। नर पूर्व प्राणी इतर ''
( यह पृथ्वी जीव - प्राण से भरी हुई है और यहाँ असंख्य प्राणियों की जातियाँ हैं । मनुष्य के पूर्व अन्य बहुत से प्राणी हुए हैं , किन्तु सभी प्राणियों में मनुष्य श्रेष्ठ है । )

“ उन्नत नर जनमिला ।। नररू ‘ नर बीज ‘ हेला
नर - बीज कु अन्य स्थाने ।। रोपण कले सिद्ध माने ''
( इस प्रकार चेतना के विकास क्रम में सामान्य नर से उन्नत अर्थात् चेतना की दृष्टि से पूर्ण विकसित नर बना जिससे नर - बीज की सृष्टि हुई । वस्तुतः सिद्ध जनों ने उसी ‘ बीज ‘ को अन्य स्थानों से रोपण किया ) मानव जाति की उत्पत्ति विकास क्रम में ‘ सिद्ध जनों ' की चेतना ही मूल रूप से प्रारम्भ से ही कार्य करती रही है , उन्हीं के माध्यम से नर - बीज की परिकल्पना हुई और जीवों में श्रेष्ठतम जीव नर का बीजारोपण और विकास हुआ है ।

“ अनेक स्थाने नर जाति ।। करिले सहल प्रगति
प्रथमे किछि जण नर ।। पाइले दिव्य ज्ञानसार ''
( अनेक स्थानों पर मनुष्य ने शीघ्र प्रगति भी की है । उनमें से कुछ ज्ञानी मनुष्यों ने दिव्य ज्ञान को प्राप्त किया )

दिव्य ज्ञान से अभिप्राय ब्रह्म ज्ञान या आत्मज्ञान की प्राप्ति है , यह एक अत्यन्त पवित्र और गहन प्रक्रिया है , उपनिषदों मे और गीता में इस दिव्य ज्ञान की प्राप्ति का विस्तृत वर्णन मिलता है । ज्ञानी पुरुष इस ज्ञान को विवेक और वैराग्य , श्रवणमनन और निदिध्यासन , पूर्ण समर्पण और भक्ति , दिव्य ज्ञान प्राप्ति में गुरु का सहयोग भी मुख्य रूप से विद्यमान रहता है । दिव्य ज्ञान प्राप्त महापुरुषों मे समत्व भाव , अद्वैत दृष्टि , अहंकार की समाप्ति , परम आनंद आदि के लक्षण विद्यमान रहते हैं । गुरु हर जीव और कण कण में एक ही परमात्मा का रूप दिखाई देता है ।

“ इंद्रिय ज्ञानर ऊर्ध्वरे ।। अतीन्द्रिय ज्ञान संचरे
जेमिति नभरे गमन ।। स्वेच्छारे बरिब मरण ''
( इंद्रिय ज्ञान के ऊर्ध्व में इंद्रियों के परे का अर्थात् अलौकिक ज्ञान संचारित होता है , जैसे कि आकाश गमन या अपनी इच्छा से मरण का वरण करना अर्थात् इच्छा मृत्यु होना )

“ महत लोकर भ्रमण ।। करिथाआन्ति सिद्ध गण
जेमिति नभरे गमन ।। स्वेच्छारे बरिब मरण ''
( सिद्ध गण महर्लोक का भ्रमण करते रहते हैं और साथ ही वे स्वेच्छा से दूर स्थित ग्रह और लोकों में गमन करते हैं । )

सिद्ध गण और महर्लोक का प्रसंग गुरु भागवत के पूर्व खंडों में भी आया है । सिद्ध जनो को अष्ट सिद्धि और नौ निधियों की प्राप्ति होने के कारण उनकी अपनी इच्छा के अनुसार चलती रहती है और इन्हीं सिद्ध गणों की कृपा से सामान्य जीव भी साधना के मार्ग को सुगम बना पाते हैं ।

“ पितृ पुरुष प्राणींकर ।। महत लोक अटे घर
भिन्न स्थानरे पितृ गण ।। जीव गढ़िले भिन्न भिन्न ''
( वस्तुतः महर्लोक पितृ पुरुष प्राणियों अर्थात् पितरों का घर है । इन पितृ पुरुष प्राणियों ने विभिन्न स्थानों पर भिन्न भिन्न जीवों को गढ़ा है । )

“ महर्लोकर दिव्य जन ।। प्राणी जाति कले सृजन
जाति प्रजाति सृष्टि कले ।। शेषरे नरकु गडिले ''
( वास्तव में महर्लोक के ही दिव्य जनों ने प्राणी जाति की रचना की है , उन्होंने ही विभिन्न जाति प्रजातियों की सर्जना करके अंत में मनुष्य को बनाया है । )

वैदिक ब्रह्मांड विज्ञान और हिंदू पुराणों में सृष्टि की रचना एक अत्यंत जटिल और क्रमबद्ध प्रक्रिया है , इसमें महर्लोक के दिव्य जीवों से लेकर पृथ्वी पर रहने वाली प्रजातियों का विकास भी सम्मिलित है । इस सृष्टि की रचना प्रक्रिया के क्रम में महर्लोक ऊर्ध्वलोक का चौथा लोक है , यहाँ मुख्य रूप से प्रजापति , सिद्ध ऋषि और दिव्य पुरुष रहते हैं । ब्रह्मा जी ने सृष्टि के विस्तार का कार्य अपने मानस पुत्रों को सौंपा , महर्षि कश्यप ऋषि की विभिन्न पत्नियों से अलग अलग प्रजातियों , जैसे देवता ( अदिति ) बारह आदित्यों , देवताओं का जन्म , दैत्य और दानव ( दिति से ) पक्षी और नाग ( कद्रू और विनता से ) यक्ष और राक्षस ( खस से ) पशु पक्षी ( सुरभि से ) इन समस्त प्राणियों की प्रजातियों के निर्माण के बाद ब्रह्मा जी ने पृथ्वी पर कर्म और साधना के लिए मनुष्य की रचना की । मनु और शतरूपा के माध्यम से मानव वंश का प्रारंभ हुआ और मनु की संतान होने के कारण यह प्रजाति मनुष्य योनि या मानव कहलाई , इस मनुष्य लोक को कर्मलोक कहा गया । कर्म करते हुए मोक्ष की प्राप्ति इसी मनुष्य देह द्वारा प्राप्त की जा सकती है , इसीलिए मानव जन्म सभी चौरासी सहस्र योनियों मे श्रेष्ठतम माना गया ।

“ जे जीवन मरणर परे ।। महत लोक पार करे
महासिद्ध से जोगीवर ।। अधिवासी दिव्य लोकर ''
( वस्तुतः जो जीव मरण के पश्चात् महत लोक अर्थात् महर्लोक को पार करता है केवल वह महासिद्ध योगीवर दिव्य लोक में वास करने वाला होता है । )

“ मणिष गर्भाधान परे ।। जनमे विहित क्षण भरे
शुद्ध भक्त प्रकृत रे ।। जनमे गुरंक इच्छारे ''
( सामान्य तप गर्भाधान होने के पश्चात मनुष्य नियत क्षण में जन्म लेता है , किन्तु वास्तव में शुद्ध भक्त गुरु की इच्छा से ही जन्म लेते हैं । )

इस धरती पर श्री गुरु की परब्रह्म परमेश्वर के देहधारी रूप है , अतः शुद्ध भक्त का जन्म श्री गुरु की इच्छा से ही होता है , अनेकों मनुष्यों के बीच ऐसा भक्त धरती पर आकर धर्म साधना के साथ मानव कल्याण का पथ प्रशस्त करते हैं ।

“ ग्रह पृष्ठर जीव प्राण ।। एमानंक द्वारा उत्पन्न
एमाने अति बाहि जीव ।। करन्ति जे गमन तीव्र ''
( वास्तव में ग्रह पृष्ठ के जीव प्राण इन महर्लोक में वास करने वाले होते हैं और ये सूक्ष्म दिव्य जनों के द्वारा उत्पन्न होते हैं और ये सूक्ष्म अलौकिक जीव किरण द्वारा बहुत तीव्र गति से गमन करते हैं । )

“ नरर तत्व जे बीजरे ।। छुपिथाए प्राण रूपरे
प्राण सर्वत्र गति करे ।। जीव बीज धरि साथी रे ''
( वस्तुतः मनुष्य का तत्व अर्थात् जिस तत्व से मनुष्य निर्मित हुआ है , वह प्राण रूप में लय बीज रूप में छुपा रहता है और जीव बीज के साथ में धारण करके प्राण सर्वत्र गति करते करते हैं । )

जीव बीज और प्राण की गति सृष्टि और मानव शरीर के सर्वाधिक गहन रहस्यों में गिनी जाती है , यह पूरा विज्ञान इस तथ्य पर आधारित है कि कैसे एक सूक्ष्म चेतन ऊर्जा भौतिक रूप धारण करती है और शरीर के भीतर काम करती है । जीव ब्रह्माण्डीय चेतना का वह अंश है जो शरीर धारण करता है । बीज से अभिप्राय उस सूक्ष्म मूल बिंदु से है , जिससे किसी भी चीज की उत्पत्ति होती है । प्राण की गति सूक्ष्म जीवनी शक्ति है जो पूरे शरीर को चलाती है , इस गति का रहस्य ही सर्वोपरि है । जब जीव ( आत्मा ) अपने भीतर के नर तत्व को अर्थात् अपने अंतर में विद्यमान स्थिर चेतना को पहचान लेता है और प्राणायाम के द्वारा प्राण की गति को नियंत्रित करके उसे बीज अर्थात् मूल ऊर्जा केंद्र तक ले जाता है , तब सृष्टि के सारे रहस्य प्रकट हो जाते हैं । यह आत्म साक्षात्कार और मोक्ष की स्थिति है । प्राण की गति सर्वत्र भ्रमण करती है और मस्तिष्क की ओर होती है , तो मनुष्य को भीतर अनहद नाद ब्रह्माण्डीय ध्वनि सुनाई देने लगती है और वह समाधि की स्थिति में पहुँच जाता है ।

“ अति बाहि ते सूक्ष्म प्राण ।। महाकाशे करे गमन
अचिन्त्य द्रुत गति ता ‘ र ।। प्रकाश ठारू द्रुततर ''
( वे सूक्ष्म प्राण अत्यंत तीव्र गति से महाकाश में गमन करते हैं , जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती , वस्तुतः उसकी गति प्रकाश की गति से भी अधिक तीव्र होती है । )

सूक्ष्म प्राण ही शरीर और मन को चलाने वाली वह अदृश्य शक्ति है जो श्वास , विकार और भावनाओं के स्पंदन के रूप में पांच प्रमुख वायुओं के ( प्राण , अपान , व्यान , समान और उदान ) के माध्यम से पूरे शरीर में प्रवाहित होती है , यह प्राण की पांच गतियों द्वारा सूक्ष्म शरीर की ऊर्जा को और संतुलित रूप से फैलाने और चेतना के उच्च स्तर को जागृत करता है । प्राण की गति का संबंध सीधे मन से होता है , जब प्राण शांत होता है तो मन भी शांत हो जाता है ।

“ विश्वर विभिन्न कोण रे ।। सूर्ज्य ग्रह केते प्रकारे
जहिँ अनुकूल स्थिति बने ।। तहिँ जीव प्राणी जन्मे ''
( वास्तव में विश्व के विभिन्न कोणों में कितने ही प्रकार से सूर्य ग्रह आदि होते हैं , तब जहाँ अनुकूल स्थिति बनती है , वहीं जीव प्राणी जन्म लेते हैं । )

“ उन्नत नर बीज माने ।। जन्मन्ति विभिन्न स्थाने
जेउँ ग्रहण पृष्ठे जेबे ।। तहिँ प्रगति कराइबे ''
( वस्तुतः विकसित नर बीज विभिन्न स्थानों पर जन्म लेते हैं और वे जिस ग्रह के पृष्ट पर जाऐंगे वे वहाँ पर अवश्य प्रगति कराऐंगे । )

“ जीव प्राण गले ग्रहरे ।। प्राणी रूपे शरीर धरे
ब्रह्माण्ड तेणु जीवमय ।। दृश्य अदृश्य ओ प्राणीमय ''
( जीव प्राण द्वारा ग्रह में जाने पर वह प्राणी रूप में शरीर धारण करता है , इसलिए ब्रह्मांड जीवमय है और वह दृश्य एवं अदृश्य प्राणियों से युक्त है । )

जीवमय ब्रह्माण्ड से अभिप्राय यह है कि यह पूरी सृष्टि या ब्रह्माण्ड निर्जीव नहीं है , बल्कि यह जीवित चेतन इकाई है , पूरे ब्रह्माण्ड में एक परम चेतन इकाई है , एक परम चेतन ब्रह्म या काँस्मास की चेतना व्याप्त है , सारे संसार का कण कण उसी चेतना से जीवंत है । वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी सिद्ध हो चुका है कि ब्रह्माण्ड में कुछ भी पूरी तरह स्थिर या मृत नहीं है , हर परमाणु ऊर्जा से भरा है और लगातार स्पंदन शील है , ब्रह्माण्ड के सभी ग्रह सूर्य चंद्र तारे प्रकृति और जीव एक ही केंद्रीय ऊर्जा से जुड़े हैं , जब यह असीम ब्रह्माण्डीय चेतना एक सीमित भौतिक रूप में प्रकट होती है न, उसे शरीर धारण करना या प्राणी रूप कहा जाता है ।

“ प्रकाश रूपी सूक्ष्म प्राण ।। ब्रह्म चेतनारू उत्पन्न
नर बीज रे थिव प्राण ।। अन्य ग्रहरे निए जन्म ''
( वास्तव में प्रकाश रूप सूक्ष्म प्राण ब्रह्म चेतना से ही उत्पन्न हुए हैं व, जो कि नर बीज में प्राण हो कर अन्य ग्रह में जन्म लेते हैं । )

“ ए धरा गवेषणागार ।। प्राणीर क्रम विकाशर
दिव्य शक्ति थाए नरर ।। प्राणीर श्रेष्ठ गति नर ''
( वस्तुतः धरा प्राणी की चेतना के क्रमिक विकास की प्रयोगशाला है , जिसमे प्राणियों में श्रेष्ठ स्थिति मनुष्य की है और उसमें दिव्य शक्तियां भी होती हैं । )

‘ गुरु भागवत ' के इसी क्रम में अगली छंदों में ‘ नर जाति ' का उ्तरण शीर्षक द्वारा ‘ नर जाति का अवतरण ' और उसकी चेतना के क्रमिक सोपान की स्थिति का प्रसंग वर्णित है , इसका वर्णन आगामी गुरुवार को ।

“ गुरु भागवत '' को समर्पित गुरुवार का सादर प्रणाम ।

पाठकों से निवेदन है कि इस संदेश के विषय में अपने विचार व्यक्त करने की कृपा करें ।

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