27/08/2026
“गुरु भागवत “ चतुर्थ खंड संदेश श्रृंखला ४३
‘ गुरु भागवत ' की विगत संदेश श्रृंखला में आदित्य साधना और गुरु कृपा से साहित्य साधना का प्रसंग स्पष्ट किया गया था , इसी साधना क्रम में अगली छंदों में ‘ अवतारवाद और ‘ अवतारों ' के कर्म की विवेचना में ‘ गुरु भागवत की छंद में स्पष्ट किया गया है -'
“ श्री विष्णु शक्ति सदा काले ।। अगणित ब्रह्माण्डपाले
महाविश्वकु चिरंतन ।। पालन्ति विष्णु नारायण ''
( श्री विष्णु शक्ति सर्वदा असंख्य ब्रह्माण्डों का पालन करती है और श्री विष्णु नारायण महाशिव का चिरंतन पालन करते हैं । )
यह विश्व ब्रह्मांड सहित सम्पूर्ण सृष्टि में ब्रह्मा , विष्णु महेश की शाश्वत शक्तियों का पालन करते हुए असंख्य जीवों सहित धरती के प्राणियों की भी रक्षा करते हैं । विष्णु शक्ति ही महाशिव की शक्ति को भी संरक्षित करती हैं । श्री विष्णु शक्ति ही अवतार रूप में धरती पर क्रीड़ा करती हैं ।
“ अवतारंक दिव्य खेल ।। बुझिब नुँह जे सरल
धरारे हेले संधि क्षण ।। अवतार निअन्ति जन्म ''
( अवतारों के दिव्य खेल को समझ पाना सरल नहीं है , वास्तव में धरा पर संधि क्षण अर्थात् परिवर्तन या कष्ट का समय होने पर अवतार जन्म लेते हैं । )
“ अवतारंक दुई कर्म ।। तात्कालिक ओ चिरंतन
मुख्य जे कर्म चिरंतन ।। ता ‘ परे तात्कालिक कर्म ''
( वस्तुतः अवतारों के दो प्रकार से कर्म होते हैं , तात्कालिक अर्थात् जिस समय अवतार देह समय में रहते हैं , उस समय उनके द्वारा किए जाने वाले कर्म और चिरंतन शाश्वत रूप में किए जाने वाले कर्म उनके मुख्य चिरंतन कर्म होते हैं, बाद में तात्कालिक कर्म होते हैं । )
“ तात्कालिक काम तांकर ।। संघर्ष धर्म अधर्मर
धर्मात्मा नरंक रक्षण ।। पापी जनंक बिनाशन ''
( जिस समय अवतार का अवतरण होता है , उनका उस काल का कार्य धर्म एवं अधर्म के संघर्ष में धर्म का पालन करने वाले मनुष्यों की रक्षा और पापी लोगों का विनाश करना होता है । )
अवतार रूप में भगवान जब भी मानव या किसी अन्य रूप में अवतरित होते हैं , तो वे एक निश्चित समय के लिए आते हैं , लेकिन उनके कार्यों का प्रभाव चिरंतन या स्थायी होता है । तात्कालिक कर्म वे कार्य हैं , जो अवतार अपने जीवन काल में ही किसी विशेष समय की परिस्थितियों या संकट दूर करने के लिए करते हैं , उस समय मानव जाति और समाज में अधर्म को रोकने , दुष्टों का नाश और धर्म की रक्षा करना होता है । इसी समय वे परम भक्तों की आर्त पुकार सुनकर उन्हें दर्शन देते हैं और उनका उद्धार करते हैं । चिरंतन या शाश्वत कर्मों के साथ अवतार अंतर्धान होने के सहस्त्रों वर्षों बाद भी मानव मात्र की व मानवता की रक्षा करते रहे हैं । धर्म की शाश्वत स्थापना , मानव मात्र के लिए सदाचार , कर्तव्य और मानवता के नियम भी वे निर्धारित करते हैं , जो हर युग में अर्थवान होते हैं -
“ निर्देशित समाजर स्थिति ।। अवतार लीला भिआन्ति
समाजरे आणि बदल ।। बनान्ति जे धर्मानुकूल ''
( समाज की स्थिति को निरख कर अवतार लीला रचाते हैं , इस प्रकार अपनी दिव्य लीला के द्वारा वे समाज में परिवर्तन ला कर उसे धर्म के अनुकूल बनाते हैं । )
गीता के श्लोक -
“ यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ''
यह संदर्भ लोक कल्याणकारी परिवर्तन का सर्वाधिक प्रासंगिक और सर्वग्राह्य प्रसंग है । द्वापर युग में कंस के अत्याचारों से मुक्ति और महाभारत युद्ध की भूमिका में श्री कृष्ण का अवतारी रूप सभी प्राणियों की मुक्ति का माध्यम बना था ।
“ आद्यरे उद्यम शरीर ।। करिथाआन्ति अवतार
साम दाम दण्ड ओ भेद ।। साथीरे क्षमा , दया , सत्य ''
( आरंभ में अवतार साम , दाम , दंड , भेद के साथ क्षमा दया एवं सत्य के द्वारा समाज में शांति लाने का प्रयत्न करते हैं । )
आरंभ में ये अवतार तात्कालिक कर्म द्वारा अधर्म को रोकने तथा उस समय के असुरों और पापियों का संहार करने जैसे कार्य करते हैं , जैसे श्री राम कृष्ण रूप में विविध लीलाओं द्वारा भक्तों की समकालीन संकटों से रक्षा की थी , उस समय के समाज , ऋषियों या प्रकृति को तात्कालिक संकटों से मुक्ति दिलाने में भी लीलाएँ करते हैं । इस प्रकार समाज की अव्यवस्था को संतुलित कर धर्म की पुनर्स्थापना के लिए सतत कर्म करते हैं , भक्तों आर्त पुकार सुनकर उन्हें आश्वस्ति प्रदान करते हैं ।
“ तथापि न होले बदल प्रयोग ।।करिथान्ति बल
दिव्य शक्ति प्रयोग करि ।। पापी नष्ट करन्ति हरि ''
( फिर यदि लोककल्याणकारी परिवर्तन न होने पर हरि बल का प्रयोग करते हैं और अपनी दिव्य शक्तियों का प्रयोग करके पापियों को नष्ट करते हैं । )
दशावतार परंपरा में विष्णु के प्रथम अवतार से प्रारंभ घटनाएँ अपने समय में धरती के कष्टों का शमन और दुष्टों के दमन में श्री हरि के अवतार धरती का त्राण करने वाले अवतार रहे हैं ।
“ जुद्धरू शांतिर प्रेरणा ।। नव समाजर स्थापना
नव प्रतिष्ठा पाए धर्म ।। तात्कालिक ए गुरु कर्म ''
( वास्तव में युद्ध द्वारा शांति की प्रेरणा देना नए समाज की स्थापना एवं धर्म की नवीन रूप में प्रतिष्ठा करना अवतारों के तात्कालिक गुरु कर्म होते हैं । )
“ रूढ़िवादी परंपरार ।। समयातीत नियमर
करिथान्ति परिवर्तन ।। नव समाज जाण ''
( वास्तव में अवतार नवीन समाज की संरचना करने के लिए रूढ़िवादी परम्पराओं के स्थान पर कालातीत नियमों को अर्थात् ऐसे मूल्य जो हर युग में समाज के लिए कल्याणकारी हों उन्हें स्थापित करके सामाजिक परिवर्तन करते हैं । )
अवतारों का अवतरण अर्थात् भगवान का पृथ्वी पर अवतरण असुरों और दुष्टों के संहार के अतिरिक्त समाज में फैलती अनैतिकता और असमानता को दूर करने का उद्देश्य भी रहता है , अधर्म का नाश और न्याय की स्थापना , सामाजिक समानता , जाति भेद को नष्ट करना , नारी जाति की रक्षा और उद्धार , लीलाओं द्वारा प्रकृति पूजा और पशु धन की रक्षा , नीतिगत सुधार और कूटनीति द्वारा युगव्यापी परिवर्तन में अवतारों की भूमिका का विस्तृत वर्णन सभी आर्ष ग्रंथों में मिलता है । अगली छंदों में ‘ अवतारों का दिव्य उपदेश ' शीर्षक के अंतर्गत धर्मवाणी के प्रसार और प्रसंग स्पष्ट किया गया है -
“ अवतारंक धर्मवाणी ।। स्मृतिरे रखि जोगी मुनि
परे करन्ति संकलित ।। ग्रंथ रूपरे ज्ञानी भक्त ''
( योगियों मुनियों ने अवतारों की धर्मवाणी को अपनी स्मृति में रखा था । बाद में ज्ञानी भक्तों ने उस धर्म वाणी को ग्रन्थ रूप में संकलित किया है । )
“ अवतारंक दिव्य ज्ञान ।। जुगे जुगे थाए अक्षुण्ण
देइथान्ति शाश्वत ज्ञान ।। बुझान्ति प्रभुंक नियम ''
( वास्तव में अवतारों का दिव्य ज्ञान युगों युगों तक अक्षुण्ण अर्थात् ज्यों का त्यों रहता है , क्योंकि वह शाश्वत ज्ञान देता है और प्रभु के नियम समझता है । )
अवतारों के दिव्य उपदेश में धर्म की पुनर्स्थापना कर्मवाद की प्रतिष्ठा द्वारा समाज में मर्यादा , प्रेम और कर्तव्य का महिमागान , प्रलय और संकट के समय वेदों और दिव्य ज्ञान की रक्षा भी की है । अवतारों के धरती पर आने का दिव्य उद्देश्य मुख्यतः हर युग में धरती पर धर्म स्थापना और कल्याण का उपदेश देते हुए सृष्टि की रक्षा करना रहा है ।
“ पूर्ण करि विहिन कर्म ।। शेष करन्ति देह धर्म
थाए तांकर उपदेश ।। जीवंत गुरूंक सदृश ''
( वस्तुतः अपने नियत एवं औचित्य पूर्ण कर्म को पूरा करने के बाद अवतार अपना शरीर त्याग देते हैं , किंतु उनके उपदेश जीवंत गुरू के समान सदैव मार्ग दर्शक होते हैं । )
“ ग्रंथर करिले पठन ।। साथीरे ध्यान ओ मनन
मिले दिव्य ओ सूक्ष्म ज्ञान ।। भक्तकु करे पुण्यवान ''
( वास्तव में ग्रन्थ का पठन और साथ में ध्यान एवं मनन कराने पर दिव्य एवं सूक्ष्म ज्ञान मिलता है , जो कि भक्त को पुण्यवान बनाता है । )
आर्ष ग्रंथों के श्रवण मनन से गुरु तत्व का सूक्ष्म ज्ञान मिलता है , गुरु की कृपा ही भक्तों को पुण्यवान बनाती है ।
“ गुरु छाड़िले वि शरीर ।। उपदेश थाए अमर
अवतारंक उपदेश ।। गुरु तत्वरे समावेश ''
( वस्तुतः श्री गुरु द्वारा अपना शरीर छोड़ देने पर भी उनके उपदेश अमर रहते हैं और अवतारों का उपदेश गुरु तत्व में समाविष्ट रहता है । )
सभी अवतारों के देहत्याग के उपरांत उनके कल्याणकारी उपदेशों का अमर तत्त्व ग्रंथों के रूप में आज तक सुरक्षित रूप से संग्रहीत है ।
“ श्रीराम देह त्याग काले ।। ‘ जोग बशिष्ठ ' छाड़िगले
ईशमसिंहाकर तत्व ।। ‘ बाइबेल ‘ रे जे लिखित ''
( जैसे कि श्री राम देह त्याग कर गए पर समाज के कल्याण के लिए ‘ योग बशिष्ठ ‘ छोड़ गए और उसी प्रकार ईसामसीह के उपदेशों का सार बाइबिल में लिखा हुआ है । )
“ त्रिपिटक श्री बुद्धंकर ।। कोरान मोहम्मदकर
नानकंकर उपदेश ।। ‘ ग्रंथ साहेबरे ‘ प्रकाश '
( इसी प्रकार श्री बुद्ध के उपदेश ‘ त्रिपिटक ' में हजरत मुहम्मद के उपदेश ‘ क़ुरान ' में हैं और गुरु नानक के उपदेश ‘ गुरु ग्रंथ साहेब ' में प्रकाशित हैं । )
“ श्लोकादि श्री शंकरंकर । भक्तिगीत कबीरंकर
श्लोकादि ‘ रामायण ' समस्त वेद ओ पुराण ''
( श्री शंकर के श्लोक इत्यादि कबीर के भक्ति परक गीत , तुलसीदास की ‘ रामायण 'अर्थात् रामचरितमानस और सभी वेद और पुराण भी अवतारों के उपदेश से युक्त हैं । )
“ गुरुमुख निर्गत वाणी ।। अटे प्रभुंक दिव्य वाणी
धर्म ग्रंथर परायण ।। करन्ति तेणु भक्त गण ''
( गुरु मुख से निकली हुई वाणी प्रभु की दिव्य वाणी होती है , इसीलिए भक्त जन धर्म ग्रंथों का पारायण करते हैं )
“ श्री विष्णु नर देह धरि ।। असिथाआन्ति अवतरि
अधर्म विनाश कारणे ।। धर्म संस्थापना कारणे ''
( वास्तव में श्री विष्णु मनुष्य देह धारण करके अवतार रूप में अधर्म का विनाश और धर्म की स्थापना के लिए आते हैं । )
भारतीय आर्ष परंपरा में विश्व के विभिन्न धर्म ग्रन्थों में संकलित दिव्य ज्ञान और गुरू का संदेश मानव जाति के कल्याण , आत्मसाक्षात्कार और शांति का मार्ग दिखाते हैं । देहधारी नर रूप ईश्वर के अतिरिक्त विभिन्न युगों में धर्म प्रचारक महात्माओं के दिव्य संदेश भी उनके धर्म ग्रंथों में संरक्षित हैं । वेद , उपनिषद , गीता , मे ‘ अहं ब्रह्मास्मि ' ‘ तत्वमसि ' जैसे उपदेश भगवान श्री कृष्ण का कर्मयोग का संदेश निष्काम कर्म से मुक्ति का संदेश ‘ अप्पदीपो भव ' अर्थात् अपना दीपक स्वयं बनो का संदेश , जैन धर्म में भगवान महावीर का ‘ अहिंसा परमो धर्म ‘ का महा उपदेश सिख परंपरा का दिव्य ज्ञान ‘ इक तू ओंकार ' अर्थात् ईश्वर एक है , सत्य ही ईश्वर है , वह ‘ घट घट वासी ' है , नाम जप और प्रेम का संदेश श्री गुरु नानक की वाणी में ‘ श्री गुरु ग्रंथ साहिब ' में अक्षुण्ण रूप से समाहित है । ईसाई धर्म की पवित्र बाइबिल का दिव्य ज्ञान , ईश्वर प्रेम , क्षमा और सेवा ही ईश्वर तक पँहुचने का सच्चा मार्ग है । इस्लाम के पवित्र ग्रंथ क़ुरान के दिव्य ज्ञान में ईश्वर की एकता अर्थात् ‘ अल्लाह ' के सिवा कोई पूजनीय नहीं है । सभी ग्रंथों के गुरु ज्ञानामृत में आत्मकल्याण , ध्यान और साधना के मार्ग विहित हैं । परम प्रभु परमेश्वर श्री गुरु रूप में भक्तों को जीवन के नैतिक आदर्श और आध्यात्म साधन का मार्ग सिखाते हैं । ‘ गुरु भागवत ' के अगले प्रसंग में ‘ श्री रविनारायण ' और अवतार का प्रसंग वर्णित है , इसका विवेचन आगामी गुरुवार को ।
“ गुरु भागवत “ को समर्पित गुरुवार का सादर प्रणाम ।
पाठकों से निवेदन है कि इस संदेश के विषय में अपने विचार व्यक्त करने की कृपा करें ।