Tantra Gurukul

Tantra Gurukul Ta**rakulam is a haven where ancient wisdom and modern self-reliance converge.

Dedicated to protecting Sanatan Dharma, it is not just a place but a transformative movement that nurtures spiritual strength, self-sufficiency, and holistic development.

14/01/2026
नमश्चण्डिकायै,आज वनस्पति तंत्र के अन्तर्गत दो बांदों के प्रयोग दे रहे हैं। एक कोई भी जातक स्वयं कर सकता है, कोई विशेष नि...
05/01/2026

नमश्चण्डिकायै,

आज वनस्पति तंत्र के अन्तर्गत दो बांदों के प्रयोग दे रहे हैं। एक कोई भी जातक स्वयं कर सकता है, कोई विशेष नियमबन्धन नहीं, दूसरा तंत्रकुल के सहयोग से प्राप्त करें तो उत्तम है।

आम का बाँदा तंत्र जगत में एक अत्यंत सुलभ लेकिन प्रभावकारी वनस्पति है। अन्य बाँदाओं की तुलना में इसे प्राप्त करना और प्रयोग करना अपेक्षाकृत सरल है, किन्तु इसका प्रभाव अचूक माना गया है। नस्पतितन्त्र के आधार पर इसका विस्तृत विवेचन दे रहे हैं।

1. आम के बाँदा का स्वरूप और प्राप्ति
यह आम के वृक्ष पर उगने वाला परजीवी पौधा है। यह बहुत ही सुलभ है और प्रायः आम के पेड़ों पर मिल ही जाता है ।

नक्षत्र/मुहूर्त: अन्य बाँदाओं की तरह इसके लिए किसी कठिन नक्षत्र विशेष का बंधन नहीं है । इसे ग्रहण करने के लिए केवल 'रविपुष्य योग' रविवार के दिन पुष्य नक्षत्र का विचार करना पर्याप्त है ।

2. ग्रहण और स्थापन विधि
किसी भी वनस्पति को सिद्ध करने के लिए विधि-विधान आवश्यक है, तभी वह फलदायी होती है:

निमंत्रण: रविपुष्य योग से एक दिन पहले शाम को वृक्ष के पास जाकर जल, अक्षत और सुपारी देकर निमंत्रण दें ।

ग्रहण: अगले दिन (रविपुष्य योग में) विधिपूर्वक प्रणाम करके, अनुमति लेकर बाँदा को काटकर घर ले आएं ।

पूजन: घर लाकर इसे गंगाजल से धोकर, लाल या पीले वस्त्र पर स्थापित करें और पंचोपचार पूजन (गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य) करें ।

सुरक्षा: पूजन के बाद इसे किसी पवित्र स्थान पर सुरक्षित रख दें ।

3. तांत्रिक प्रयोग और लाभ
आम के बाँदा के मुख्य रूप से दो शक्तिशाली प्रयोग ग्रंथ में बताए गए हैं:

प्रयोग 1: सर्वकार्य विजय और सुरक्षा जो कि मुख्य प्रयोग है, यह बाँदा 'विजयदायी' माना गया है ।

विधि: सिद्ध किए हुए बाँदा के छोटे टुकड़े को ताबीज में भर लें।

धारण:

पुरुष: अपनी दाहिनी भुजा में धारण करें ।

स्त्री: अपनी बायीं भुजा में धारण करें ।

फल: इसे धारण करने से किसी भी कार्य में सफलता मिलती है और मुकदमों या संघर्ष में विजय प्राप्त होती है ।

प्रयोग 2: अदृश्य दर्शन और दूरदृष्टि (विशिष्ट तिलक प्रयोग) यह एक उच्च कोटि का तांत्रिक प्रयोग है जिसका उल्लेख तंत्र ग्रंथों में प्राप्त होता है। इससे साधक को गुप्त बातें जानने की शक्ति मिलती है।

सामग्री:

आम का बाँदा (साधित), शाखोट (सिहोर/पिलखन) का बाँदा (साधित), गोखरू, सेंधा नमक (मिश्रण का चौथा हिस्सा)

विधि: रविपुष्य योग में इन तीनों वनस्पतियों को समान मात्रा में मिलाकर चूर्ण बना लें और उसमें चौथा हिस्सा सेंधा नमक मिला दें ।

मंत्र: मिश्रण तैयार होने पर 500 माला 'शिव पंचाक्षर मंत्र' और 36 माला 'देवी नवार्ण मंत्र' का जप करें।

प्रयोग: इस चूर्ण को बकरी के दूध के साथ मिलाकर लेप बनाएं और माथे पर तिलक (त्रिपुण्ड) लगाएं ।

फल: इस तिलक को लगाकर ध्यानस्थ होने पर साधक दूर की घटनाओं या छिपी हुई बातों जैसे लापता व्यक्ति की स्थिति को चलचित्र की भांति देख सकता है ।

4. विशेष सावधानी
आम का बाँदा बहुत पवित्र माना जाता है, तिलक वाले प्रयोग (दूरदृष्टि) का दुरुपयोग कभी न करें। गलत उद्देश्य से प्रयोग करने पर घोर विपत्ति आ सकती है और सिद्धि नष्ट हो जाती है ।

यह प्रयोग सरल होते हुए भी अत्यंत चमत्कारी है। रविपुष्य योग का इन्तजार करें और श्रद्धापूर्वक इसे सिद्ध करें।

05/01/2026

नमश्चण्डिकायै,

तंत्रकुलज्योतिषं के नयी अपडेट में साढे साती सारणी भी जोड दी गयी है जिससे जातक के पूरे जीवन काल में पडने वाली साढे साती एवं ढैय्या का समय एवं उपाय भी आ जायेंगे।

साढ़े साती जीवन विश्लेषण (Life Analysis)
चरण (Phase) राशि (Sign) तिथि (Date) वक्री (Retrograde)
अस्त आरंभ मीन 1997-11-10 नहीं
अस्त समाप्त मेष 1999-05-21 नहीं
उदय आरंभ मकर 2021-03-18 नहीं
उदय समाप्त मकर 2021-08-01 हाँ
उदय आरंभ मकर 2021-03-18 नहीं
उदय समाप्त मकर 2021-08-01 हाँ
उदय आरंभ मकर 2021-12-15 नहीं
उदय समाप्त कुंभ 2024-03-03 नहीं
शिखर आरंभ कुंभ 2024-03-04 नहीं
शिखर समाप्त मीन 2026-05-10 नहीं
अस्त आरंभ मीन 2026-05-11 नहीं
अस्त समाप्त मीन 2026-10-17 हाँ
शिखर आरंभ मीन 2026-10-18 हाँ
शिखर समाप्त मीन 2027-01-31 नहीं
अस्त आरंभ मीन 2027-02-01 नहीं
अस्त समाप्त मेष 2028-07-19 नहीं
अस्त आरंभ मेष 2028-09-26 हाँ
अस्त समाप्त मेष 2029-03-31 नहीं
उदय आरंभ मकर 2051-01-25 नहीं
उदय समाप्त कुंभ 2053-04-13 नहीं
शिखर आरंभ कुंभ 2053-04-14 नहीं
शिखर समाप्त कुंभ 2053-09-09 हाँ
उदय आरंभ कुंभ 2053-09-10 हाँ
उदय समाप्त कुंभ 2054-01-07 नहीं
शिखर आरंभ कुंभ 2054-01-08 नहीं
शिखर समाप्त मीन 2056-03-17 नहीं
अस्त आरंभ मीन 2056-03-18 नहीं
अस्त समाप्त मेष 2058-05-10 नहीं
उदय आरंभ मकर 2080-03-06 नहीं
उदय समाप्त मकर 2080-08-20 हाँ
उदय आरंभ मकर 2080-12-02 नहीं
उदय समाप्त कुंभ 2083-02-22 नहीं
शिखर आरंभ कुंभ 2083-02-23 नहीं
शिखर समाप्त मीन 2085-04-29 नहीं
अस्त आरंभ मीन 2085-04-30 नहीं
अस्त समाप्त मीन 2085-11-09 हाँ
शिखर आरंभ मीन 2085-11-10 हाँ
शिखर समाप्त मीन 2086-01-12 नहीं
अस्त आरंभ मीन 2086-01-13 नहीं
अस्त समाप्त मेष 2087-06-30 नहीं
अस्त आरंभ मेष 2087-10-21 हाँ
अस्त समाप्त मेष 2088-03-19 नहीं
छोटी पनोती (Small Panoti)
चरण (Phase) राशि (Sign) तिथि (Date) वक्री (Retrograde)
आरंभ मेष 1999-06-22 नहीं
समाप्त मेष 1999-10-29 हाँ
आरंभ मेष 2000-03-12 नहीं
समाप्त वृषभ 2001-06-03 नहीं
आरंभ सिंह 2008-09-17 नहीं
समाप्त कन्या 2010-09-13 नहीं
आरंभ धनु 2019-01-20 नहीं
समाप्त धनु 2019-08-18 हाँ
आरंभ मकर 2021-02-04 नहीं
समाप्त मेष 2029-04-29 नहीं
आरंभ वृषभ 2030-07-22 नहीं
समाप्त वृषभ 2030-11-10 हाँ
आरंभ वृषभ 2031-04-10 नहीं
समाप्त सिंह 2037-11-05 नहीं
आरंभ सिंह 2038-02-03 हाँ
समाप्त सिंह 2038-07-27 नहीं
आरंभ कन्या 2039-10-24 नहीं
समाप्त कन्या 2040-04-21 हाँ
आरंभ कन्या 2040-07-06 नहीं
समाप्त धनु 2048-03-06 नहीं
आरंभ धनु 2048-05-28 हाँ
समाप्त धनु 2048-12-02 नहीं
आरंभ मकर 2050-03-19 नहीं
समाप्त मकर 2050-07-07 हाँ
आरंभ मकर 2050-12-16 नहीं
आरंभ मेष 2058-06-09 नहीं
समाप्त मेष 2058-11-19 हाँ
आरंभ मेष 2059-02-24 नहीं
समाप्त वृषभ 2060-05-23 नहीं
आरंभ सिंह 2067-09-07 नहीं
समाप्त कन्या 2068-12-20 नहीं
आरंभ कन्या 2069-09-02 नहीं
समाप्त धनु 2078-01-11 नहीं
आरंभ मकर 2080-01-27 नहीं
समाप्त मेष 2088-04-19 नहीं
आरंभ वृषभ 2089-07-08 नहीं
समाप्त वृषभ 2089-12-01 हाँ
आरंभ वृषभ 2090-03-26 नहीं
समाप्त सिंह 2096-10-22 नहीं
आरंभ सिंह 2097-02-25 हाँ
समाप्त सिंह 2097-07-14 नहीं
आरंभ कन्या 2098-10-14 नहीं
समाप्त कन्या 2099-05-21 हाँ
आरंभ धनु 2107-02-23 नहीं
समाप्त धनु 2107-06-21 हाँ
आरंभ धनु 2107-11-23 नहीं
समाप्त मकर 2109-03-08 नहीं
आरंभ मकर 2109-07-27 हाँ
समाप्त मकर 2109-12-05 नहीं
आरंभ मेष 2117-05-30 नहीं

और जैसा कि विदित है तंत्रकुलज्योतिष सप्रमाण कुण्डली विश्लेषण करता है यथा

२. द्वितीय भाव (धन, कुटुंब - सिंह राशि)
स्थिति: द्वितीय भाव में राहु स्थित है। द्वितीयेश सूर्य चतुर्थ भाव में है।
शास्त्रीय प्रमाण:
"द्वितीयेऽहि बुधौ दृष्टे धननाशः प्रजायते।

दुष्टवाक् च भवेन्नित्यं कुटंबक्लेशसंभवः॥"

(फलदीपिका, अध्याय ८, श्लोक ३१)

अर्थात्, यदि द्वितीय भाव में राहु हो या उस पर बुध की दृष्टि हो तो धन का नाश होता है। व्यक्ति सदैव कटु वाणी वाला होता है और परिवार में क्लेश होता है।

फल: राहु की स्थिति धन के मामलों में अनिश्चितता और अप्रत्याशितता लाती है। धन का आगमन आकस्मिक स्रोतों से हो सकता है, परंतु व्यय भी अप्रत्याशित होगा। जातक को धन संचय में कठिनाई हो सकती है। वाणी में कभी-कभी कटुता या स्पष्टवादिता अधिक हो सकती है, जिससे कुटुंब में मतभेद उत्पन्न हो सकते हैं। पैतृक संपत्ति से जुड़े मामलों में कुछ जटिलताएँ संभव हैं।

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नमश्चण्डिकायै,काले धतूरे की जड भी एक अत्यन्त प्रभावशाली तांत्रिक वनस्पति होती है। इसकी तांत्रिक शक्तियों के स्फुरण के लि...
01/01/2026

नमश्चण्डिकायै,

काले धतूरे की जड भी एक अत्यन्त प्रभावशाली तांत्रिक वनस्पति होती है। इसकी तांत्रिक शक्तियों के स्फुरण के लिए इसे भली प्रकार तांत्रिक विधान से तोडकर लाना एवं सिद्ध करना आवश्यक है। जब वनस्पतियां तांत्रिक विधान से लायी जाती हैं तो उनके अभिमानी देव भी साथ में आते हैं एवं वही तांत्रिक प्रभाव के मूल कारण होते हैं।

काली धतूरे की जड़

सामान्य धतूरा हरा होता है, लेकिन काला धतूरा (जिसका तना और फूल गहरे बैंगनी या काले रंग के हों) तंत्र में बहुत महत्वपूर्ण है। इस प्रमुख प्रयोग ऊपरी बाधा निवारण, पितृ दोष शांति और गंभीर रोग मुक्ति के लिए होता है।

इसे किसी रविपुष्य नक्षत्र या अमावस्या को निमंत्रण देकर उखाड़ना चाहिए। इसपर भैरव मंत्र के जप कर इसे सिद्ध कर लेना चाहिए। इसकी जड़ को रविवार के दिन दाहिनी भुजा में धारण करने से भूत-प्रेत और ऊपरी हवाओं का असर नहीं होता।

इसके निम्न मुख्य लाभ हो जाते हैं।

शत्रु बाधा निवारण: यदि शत्रु अकारण परेशान कर रहा हो।

ऊपरी बाधा/तंत्र काट: यदि घर या व्यक्ति पर किसी ने कुछ किया-कराया हो।

अभय प्राप्ति: अकारण भय, बुरे सपने या आत्मविश्वास की कमी को दूर करने के लिए।

ग्रह शांति: विशेषकर शनि और राहु के दुष्प्रभावों को शांत करने के लिए।

घर के मुख्य द्वार पर इसे लटकाने से घर 'कील' दिया जाता है, जिससे नकारात्मक शक्तियां प्रवेश नहीं करतीं।

जुआ या सट्टा खेलने वाले लोग भी जीत के लिए इसका तांत्रिक प्रयोग करते हैं।

नमश्चण्डिकायै,॥ श्री गणेशाय नमः ॥द्वादश लग्नों के लिए रत्न धारण और निषेध का विस्तृत विचारज्योतिष शास्त्र में रत्नों का ध...
01/01/2026

नमश्चण्डिकायै,

॥ श्री गणेशाय नमः ॥

द्वादश लग्नों के लिए रत्न धारण और निषेध का विस्तृत विचार

ज्योतिष शास्त्र में रत्नों का धारण केवल शोभा बढ़ाने के लिए नहीं अपितु ग्रहों के प्रभाव को संतुलित करने के लिए किया जाता है। फलदीपिका और जातक पारिजात जैसे प्रामाणिक ग्रन्थों के अनुसार नियम यह है कि जो ग्रह लग्न, पंचम अथवा नवम भाव का स्वामी हो, उसका रत्न धारण करना सदा शुभ होता है। इसके विपरीत जो ग्रह छठे, आठवें अथवा बारहवें भाव का स्वामी हो या मारक हो, उसका रत्न धारण करना विपत्ति को निमंत्रण देना है। यहाँ बारह लग्नों का विस्तृत विवरण दिया जा रहा है।

१ मेष लग्न मेष लग्न का स्वामी मंगल है। इस लग्न के जातकों के लिए मंगल, सूर्य और बृहस्पति शुभ ग्रह हैं।

शुभ रत्न

मूँगा यह लग्न स्वामी मंगल का रत्न है। इसे धारण करने से स्वास्थ्य उत्तम रहता है और आत्मविश्वास बढ़ता है।

माणिक्य सूर्य इस लग्न में पंचमेश है। माणिक्य धारण करने से विद्या, बुद्धि और मान सम्मान की प्राप्ति होती है।

पुखराज बृहस्पति भाग्य स्थान का स्वामी है। पुखराज पहनने से भाग्य में वृद्धि और पिता का सुख मिलता है।

वर्जित रत्न

पन्ना बुध इस लग्न के लिए शत्रु है, अत: पन्ना पहनने से रोग और ऋण बढ़ते हैं।

हीरा शुक्र मारक ग्रह है, इसलिए हीरा धारण करना धन और आयु के लिए हानिकारक हो सकता है।

नीलम शनि की स्थिति सामान्यतः इस लग्न के लिए शुभ नहीं मानी जाती।

२ वृषभ लग्न इस लग्न का स्वामी शुक्र है। यहाँ शुक्र, बुध और शनि योगकारक ग्रह होते हैं।

शुभ रत्न

हीरा अथवा ओपल लग्न स्वामी शुक्र का रत्न हीरा पहनने से व्यक्तित्व आकर्षक होता है और सुख साधनों में वृद्धि होती है।

नीलम शनि इस लग्न के लिए सबसे शुभ ग्रह है क्योंकि वह धर्म और कर्म दोनों भावों का स्वामी है। नीलम धारण करने से राजयोग और अपार सफलता मिलती है।

पन्ना बुध पंचमेश होने से शुभ है। पन्ना पहनने से बुद्धि तीक्ष्ण होती है और धन लाभ होता है।

वर्जित रत्न

पुखराज बृहस्पति इस लग्न के लिए प्रबल शत्रु है। पुखराज पहनने से हानि होती है।

मूँगा मंगल मारक है, अत: मूँगा धारण करना दुर्घटना और कलह का कारण बन सकता है।

३ मिथुन लग्न मिथुन लग्न का स्वामी बुध है। यहाँ बुध, शुक्र और शनि मित्र वर्ग में आते हैं।

शुभ रत्न

पन्ना लग्न स्वामी बुध का रत्न पन्ना स्वास्थ्य और व्यापार के लिए सर्वोत्तम है।

हीरा शुक्र पंचम भाव का स्वामी है। हीरा धारण करने से कला, प्रेम और संतान सुख में वृद्धि होती है।

नीलम शनि भाग्य स्थान का स्वामी है, अत: नीलम पहनने से भाग्योदय होता है।

वर्जित रत्न

मूँगा मंगल इस लग्न का परम शत्रु है। मूँगा पहनने से कर्ज और रोग बढ़ते हैं।

पुखराज बृहस्पति मारक स्थानों का स्वामी है, अत: पुखराज वर्जित है।

४ कर्क लग्न कर्क लग्न का स्वामी चन्द्रमा है। यहाँ चन्द्रमा, मंगल और बृहस्पति शुभ फलदाता हैं।

शुभ रत्न

मोती लग्न स्वामी चन्द्रमा का रत्न मोती मानसिक शांति और अच्छे स्वास्थ्य के लिए धारण करना चाहिए।

मूँगा मंगल इस लग्न में राजयोग कारक है। मूँगा धारण करने से पद, प्रतिष्ठा और संपत्ति मिलती है।

पुखराज बृहस्पति भाग्येश है। पुखराज पहनने से ज्ञान और भाग्य बढ़ता है।

वर्जित रत्न

नीलम शनि इस लग्न का प्रबल मारक है। नीलम धारण करने से प्राणों पर संकट आ सकता है।

पन्ना बुध द्वादशेश है, अत: पन्ना हानिकारक है।

५ सिंह लग्न सिंह लग्न का स्वामी सूर्य है। सूर्य, मंगल और बृहस्पति यहाँ मित्र हैं।

शुभ रत्न

माणिक्य लग्न स्वामी सूर्य का रत्न माणिक्य तेज, आरोग्‍य और यश देता है।

मूँगा मंगल भाग्य और सुख का स्वामी है। मूँगा धारण करना अत्यंत शुभ है।

पुखराज बृहस्पति पंचमेश है। पुखराज पहनने से उच्च शिक्षा और संतान सुख मिलता है।

वर्जित रत्न

नीलम शनि और सूर्य में शत्रुता है और शनि यहाँ रोग भाव का स्वामी है। नीलम कभी न पहनें।

हीरा शुक्र भी इस लग्न के लिए अकारक है।

६ कन्या लग्न कन्या लग्न का स्वामी बुध है। बुध, शुक्र और शनि यहाँ शुभ हैं।

शुभ रत्न

पन्ना यह लग्नेश का रत्न है। इसे पहनने से उन्नति और उत्तम स्वास्थ्य मिलता है।

हीरा शुक्र भाग्य स्थान का स्वामी है। हीरा धारण करने से भाग्य चमकता है और धन आता है।

नीलम शनि पंचमेश है, अत: नीलम धारण करना बुद्धि और संतान के लिए शुभ है।

वर्जित रत्न

मूँगा मंगल इस लग्न के लिए घोर पापी ग्रह है। मूँगा पहनने से भाई बहनों से विवाद और दुर्घटना का भय रहता है।

७ तुला लग्न तुला लग्न का स्वामी शुक्र है। शुक्र, शनि और बुध यहाँ शुभ हैं।

शुभ रत्न

हीरा अथवा ओपल लग्नेश शुक्र का रत्न हीरा शरीर को स्वस्थ और जीवन को सुखी बनाता है।

नीलम शनि यहाँ योगकारक है। नीलम धारण करने से बड़ी सफलता और कीर्ति मिलती है।

पन्ना बुध भाग्येश है। पन्ना पहनने से भाग्य साथ देता है।

वर्जित रत्न

पुखराज बृहस्पति इस लग्न के लिए अशुभ है। पुखराज पहनने से रोग बढ़ते हैं।

मूँगा मंगल मारक है, अत: मूँगा त्यागना चाहिए।

८ वृश्चिक लग्न वृश्चिक लग्न का स्वामी मंगल है। मंगल, गुरु, सूर्य और चन्द्रमा यहाँ मित्र हैं।

शुभ रत्न

मूँगा लग्नेश मंगल का रत्न मूँगा बल और साहस देता है।

पुखराज बृहस्पति धन और विद्या का स्वामी है। पुखराज धारण करना धनदायक है।

मोती चन्द्रमा भाग्येश है। मोती पहनने से भाग्य प्रबल होता है।

माणिक्य सूर्य कर्मेश है, अत: माणिक्य राजकृपा दिलाता है।

वर्जित रत्न

पन्ना बुध इस लग्न का शत्रु है। पन्ना पहनने से विपत्तियाँ आती हैं।

हीरा शुक्र मारक है, अत: हीरा न पहनें।

९ धनु लग्न धनु लग्न का स्वामी बृहस्पति है। गुरु, मंगल और सूर्य यहाँ शुभ हैं।

शुभ रत्न

पुखराज लग्नेश गुरु का रत्न पुखराज ज्ञान, मान और स्वास्थ्य देता है।

माणिक्य सूर्य भाग्य स्थान का स्वामी है। माणिक्य पहनने से सर्वत्र विजय मिलती है।

मूँगा मंगल पंचमेश है। मूँगा धारण करना संतान और बुद्धि के लिए उत्तम है।

वर्जित रत्न

हीरा शुक्र शत्रु है, अत: हीरा वर्जित है।

पन्ना बुध मारक और बाधक दोनों है, अत: पन्ना न पहनें।

१० मकर लग्न मकर लग्न का स्वामी शनि है। शनि, शुक्र और बुध यहाँ शुभ हैं।

शुभ रत्न

नीलम लग्नेश शनि का रत्न नीलम सुरक्षा और शक्ति देता है।

हीरा शुक्र यहाँ योगकारक है। हीरा धारण करने से जीवन में पूर्णता और सफलता आती है।

पन्ना बुध भाग्येश है। पन्ना पहनने से भाग्य वृद्धि होती है।

वर्जित रत्न

माणिक्य सूर्य अष्टमेश है और शनि का शत्रु है। माणिक्य धारण करना प्राणघातक हो सकता है।

पुखराज गुरु व्ययेश है, अत: पुखराज न पहनें।

११ कुम्भ लग्न कुम्भ लग्न का स्वामी शनि है। शनि, शुक्र और बुध यहाँ भी शुभ हैं।

शुभ रत्न

नीलम लग्नेश का रत्न होने से नीलम धारण करना अत्यंत शुभ है।

हीरा शुक्र भाग्य और सुख का स्वामी है। हीरा पहनने से भाग्योदय होता है।

पन्ना बुध पंचमेश है। पन्ना धारण करने से बुद्धि और व्यापार में लाभ होता है।

वर्जित रत्न

माणिक्य सूर्य सप्तमेश होकर मारक है और शनि का शत्रु है।

पुखराज बृहस्पति धन भाव का स्वामी है किन्तु मारक भी हो सकता है, अत: सावधानी अपेक्षित है।

१२ मीन लग्न मीन लग्न का स्वामी बृहस्पति है। गुरु, चन्द्रमा और मंगल यहाँ शुभ हैं।

शुभ रत्न

पुखराज लग्नेश गुरु का रत्न पुखराज आरोग्य और सुख देता है।

मोती चन्द्रमा पंचमेश है। मोती धारण करने से मन प्रसन्न और संतान सुख प्राप्त होता है।

मूँगा मंगल भाग्य और धन का स्वामी है। मूँगा पहनना भाग्यवर्धक है।

वर्जित रत्न

हीरा शुक्र अष्टमेश और तृतीयेश होकर परम पापी है। हीरा पहनने से मृत्यु तुल्य कष्ट हो सकता है।

पन्ना बुध मारक और बाधक है। पन्ना सर्वथा त्याज्य है।

नीलम शनि व्ययेश है, अत: नीलम धारण नहीं करना चाहिए।

निष्कर्ष मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी कुण्डली के लग्नेश और भाग्येश को पहचान कर ही रत्न धारण करे। जो रत्न वर्जित बताए गए हैं उन्हें भूलकर भी धारण न करें अन्यथा धन और जन की हानि निश्चित है।

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31/12/2025

नमश्चण्डिकायै,

तंत्रकुल उच्चस्तरीय रत्नों को भी सुलभ कराता है। इसी क्रम में ये सवा सात कैरेट का ट्रान्सपेरेन्ट कोलम्बियन पन्ना उपलब्ध है, इसकी कीमत 13 लाख रु है।

उच्चस्तरीय बर्मीस माणिक 45 हजार रु रत्ती का भी उपलब्ध है।

सस्ते रत्न 2-3 हजार रू रत्ती भी मांग होने पर उपलब्ध कराये जायेंगे। अगर कोई भी रत्न नकली निकलता है तो दूगना धन वापिस कर दिया जायेगा।

नमश्चण्डिकायै,रजत में बना लक्ष्मीयंत्र। यंत्र अत्यधिक प्रभावी होते हैं यदि विधिवत प्राणप्रतिष्ठित करके उनमें मंत्रजप किय...
29/12/2025

नमश्चण्डिकायै,

रजत में बना लक्ष्मीयंत्र। यंत्र अत्यधिक प्रभावी होते हैं यदि विधिवत प्राणप्रतिष्ठित करके उनमें मंत्रजप किया गया हो। उसके पश्चात नित्य धूप दीप देते रहने से प्रभाव दिखता है।

लक्ष्मी मंत्र के पुरश्चरण पूर्वक इस यंत्र को प्राणप्रतिष्ठित करके घर में, व्यापारस्थल में रखने से धनधान्य की वृद्धि होती है। पुरश्चरण कम से कम 50 हजार मंत्रों का करवा लेना चाहिए।

60 हजार + चांदी का व्यय

मंत्रजप कम करवायें तो उसी अनुसार व्यय कम हो जाता है।

28/12/2025

नमश्चण्डिकायै,

धारण यन्त्रों में सर्वाधिक शक्तिशाली एवं परम अद्भुत यन्त्र, जिसे कि आदि गुरु शंकराचार्यजी भी धारणीय बता कर उसके लाभ बताते हैं ऐसा श्रीविद्या की नित्या भगवती त्वरिता के अनुग्रह यंत्र बनकर तैयार हो रहे हैं। यह एकमात्र यंत्र है जो हम स्वयं अपने लिए भी बना रहे हैं, और हमारे कुछ शिष्य भी धारण करेंगे।

शुद्धस्वर्ण में बना यह यंत्र यद्यपि पूर्णविधान से बनाया जाये तो 2.5 लाख का पड रहा है तथापि कुछ विधान आदि सूक्ष्म करके, इसे ढेड लाख से लेकर 1 लाख तक भी बनाया जा सकता है।

इसके धारक पर संसार का कोई भी तंत्र, मंत्र कार्य नहीं करता। कोई भी इतना शक्तिशाली भूतप्रेत, जिन्न, कुष्माण्ड, पिशाचादि नहीं जो इसके धारक पर प्रभाव डाल सके।

2.5 लाख वाले में भगवती त्वरिता का पूर्ण पुरश्चरण यंत्र पर होता है जिससे यंत्र में यह क्षमतायें उत्पन्न हो जाती हैं। पूर्ण महामृत्यंजय अनुष्ठान का सम्पूर्ण लाभ इसके धारक को स्वत: ही प्राप्त हो जाता है। उच्च अधिकारी इसके धारक के प्रति प्रबल आकर्षण महसूस करते हैं। धन धान्यसमृद्धि की प्राप्ति होती है। दुष्ट ग्रह बिना ग्रह शान्ति के ही शान्त हो जाते हैं। मुकद्दमें आदि, चुनाव आदि में विजय प्राप्त होती है। जिसकी सन्तान बाधा हो वह बाधा नष्ट हो जाती है।

24/12/2025

नमश्चण्डिकायै,

मेषलग्न में गुरु एवं शुक्र का द्वादशभावों में फल

अथ मेषलग्ने देवगुरुबृहस्पतिफलकथनम्

मेष लग्न में गुरु नवमेश और द्वादशेश होकर परम 'कारक' ग्रह माने गए हैं।

१. प्रथम भाव (लग्न - मेष राशि): यहाँ गुरु दिग्बली होते हैं। जातक ज्ञानवान, राजमान्य और तेजस्वी होता है। शास्त्रोक्त फल:

विपुलविमलकीर्तिः सर्वशास्त्रार्थवेत्ता।
नृपतिवरपुरोहितः कञ्जनेत्रः सुरेज्ये॥ (जातकपारिजात)

अर्थ: लग्नस्थ गुरु जातक को विपुल कीर्ति, शास्त्रों का ज्ञान, और राजा (सरकार) से सम्मान दिलाते हैं।

२. द्वितीय भाव (धन - वृष राशि): धन स्थान में गुरु वाणी को गम्भीर और सत्यवादी बनाते हैं। जातक को पैतृक सम्पत्ति और कुटुम्ब का सुख मिलता है।

वाग्मी भोजनसुन्दरः प्रियवचाः।
अर्थ: जातक मधुरभाषी और अच्छे भोजन का प्रेमी होता है।

३. तृतीय भाव (सहज - मिथुन राशि): यहाँ गुरु भाइयों के सुख में कुछ कमी कर सकते हैं। जातक को भाग्य जागृत करने के लिए यात्राएँ करनी पड़ती हैं। लेखन और अध्यापन में रुचि होती है।

४. चतुर्थ भाव (सुख - कर्क राशि - उच्चस्थ): यहाँ गुरु उच्च राशि में होकर 'हंस महापुरुष योग' बनाते हैं। यह मेष लग्न के लिए सर्वोत्तम स्थिति है। शास्त्रोक्त फल:

रक्तोत्पलांशचरणः सुकुमारदेहो। शङ्खाब्जमत्स्यकुशकर्मकुलेष्टपादः॥
हंसः कफानिलरुचिः सुविशालनेत्रो। वृत्तस्तनुर्मधुपिङ्गलवर्णकेशः॥ (फलदीपिका)

अर्थ: हंस योग वाला जातक राजा के समान सुखी, वाहन और भूमि का स्वामी, तथा पुण्यकर्म करने वाला होता है। माता का पूर्ण सुख और विशाल भवन प्राप्त होता है।

५. पञ्चम भाव (सुत - सिंह राशि): मित्र सूर्य की राशि में गुरु पुत्र सन्तान, उच्च शिक्षा, और मन्त्र सिद्धि देते हैं। यह 'पूर्वपुण्य' का स्थान है।

सुतभे च सुतप्रदः।
अर्थ: यह स्थिति मेधावी और कुलदीपक सन्तान प्रदान करती है।

६. षष्ठ भाव (रिपु - कन्या राशि): यहाँ गुरु उदर विकार (लिवर समस्या) दे सकते हैं। शत्रुओं पर विजय मिलती है, किन्तु मामा पक्ष से कष्ट सम्भव है।

७. सप्तम भाव (कलत्र - तुला राशि): जातक का जीवनसाथी कुलीन, धार्मिक और सुन्दर होता है। विवाह के पश्चात भाग्योदय होता है।

सुदारः सत्पुत्रः। अर्थ: उत्तम पत्नी और सत्पुत्र की प्राप्ति होती है।

८. अष्टम भाव (आयु - वृश्चिक राशि): यहाँ गुरु गुप्त विद्या, तन्त्र-मन्त्र और शोध में सफलता देते हैं। आयु लम्बी होती है, परन्तु धन संचय में बाधा आती है।

९. नवम भाव (भाग्य - धनु राशि - स्वगृही): यह गुरु का अपना घर है। यहाँ गुरु अतिविशिष्ट राजयोग कारक होते हैं। जातक परम धार्मिक, तीर्थयात्री और पिता का भक्त होता है। शास्त्रोक्त फल:

भाग्यस्थे त्रिदशपतौ भाग्यवान् धार्मिकश्च।

अर्थ: जातक जन्मजात भाग्यशाली और धर्मात्मा होता है।

१०. दशम भाव (कर्म - मकर राशि - नीचस्थ): यहाँ गुरु नीच राशि में होते हैं। कार्यक्षेत्र में अस्थिरता, उच्च अधिकारियों से मतभेद और पदोन्नति में बाधा आती है। (यदि नीचभंग न हो तो)।

नीचगे मानभङ्गः। अर्थ: कर्म स्थान में नीच का गुरु सम्मान में कमी लाता है।

११. एकादश भाव (लाभ - कुम्भ राशि): जातक को सात्विक कार्यों से धन लाभ होता है। पुत्र और मित्रों से सुख मिलता है।

लाभे लाभकरः। अर्थ: गुरु यहाँ निरन्तर आय के स्रोत बनाते हैं।

१२. द्वादश भाव (व्यय - मीन राशि - स्वगृही): यहाँ गुरु 'विमल योग' के समान फल देते हैं। जातक का धन यज्ञ, दान और परोपकार में खर्च होता है। अन्तिम समय में मोक्ष की प्राप्ति सम्भव है।

अथ मेषलग्ने दैत्यगुरुशुक्रविस्तृतफलकथनम्

मेष लग्न में शुक्र द्वितीयेश और सप्तमेश होकर मुख्य 'मारक' ग्रह हैं, परन्तु लक्ष्मी के दाता भी हैं।

१. प्रथम भाव (लग्न - मेष राशि): जातक शौकीन मिजाज, सुन्दर और विपरीत लिङ्ग के प्रति आकर्षण रखने वाला होता है।

कामार्तः सुवपुः। अर्थ: जातक कामी और सुन्दर शरीर वाला होता है।

२. द्वितीय भाव (धन - वृष राशि - स्वगृही): शुक्र अपने ही घर में बलवान होते हैं। जातक को अपार धन, रत्न, आभूषण और मधुर वाणी प्राप्त होती है। नेत्र बड़े और सुन्दर होते हैं। शास्त्रोक्त फल:

द्वितीये भार्गवे यस्य स भवेद् धनवान् नरः।
मिष्टान्नपानभोक्ता च दयालुः प्रियवाचकः॥ (बृहत्पाराशरहोराशास्त्र)

३. तृतीय भाव (सहज - मिथुन राशि): जातक की बहनें अधिक होती हैं। चित्रकला, संगीत या गायन में रुचि होती है। कंजूस प्रवृत्ति हो सकती है।

४. चतुर्थ भाव (सुख - कर्क राशि): जातक को उत्तम वाहन, सजा हुआ घर और माता का सुख मिलता है।

चतुर्थे वाहनप्रदः। अर्थ: शुक्र यहाँ विलासिता पूर्ण जीवन देते हैं।

५. पञ्चम भाव (सुत - सिंह राशि): कन्या सन्तान की अधिकता होती है। प्रेम सम्बन्धों में सफलता मिलती है। सट्टे या आकस्मिक धन का लाभ होता है।

६. षष्ठ भाव (रिपु - कन्या राशि - नीचस्थ): यहाँ शुक्र नीच राशि में होते हैं। यह अशुभ स्थिति है। गुप्त रोग, वैवाहिक जीवन में क्लेश, और चरित्र हनन का भय रहता है। शास्त्रोक्त फल:

षष्ठे शुक्रो यदा तस्य रिपुवृद्धिः पदे पदे। अर्थ: जातक को स्त्री पक्ष से शत्रुता और धन नाश का सामना करना पड़ता है।

७. सप्तम भाव (कलत्र - तुला राशि - स्वगृही): यहाँ शुक्र 'मालव्य महापुरुष योग' का निर्माण करते हैं। शास्त्रोक्त फल:

नाङ्गोष्ठदशनच्छविर्मलयजः सम्प्राप्तराज्यः पुमान्।
कान्ताकाञ्चनकान्तिमान् बहुधनः संभोगभाग्ये रतः॥ फलदीपिका - मालव्य योग

अर्थ: जातक का जीवनसाथी अत्यन्त सुन्दर होता है। जातक को व्यापार में लाभ, वाहन सुख और समाज में राजतुल्य सम्मान मिलता है।

८. अष्टम भाव (आयु - वृश्चिक राशि): ससुराल से धन मिलता है। परन्तु मधुमेह (डायबिटीज) या मूत्र विकार की सम्भावना रहती है।

९. नवम भाव (भाग्य - धनु राशि): जातक का भाग्योदय विवाह के बाद होता है। पत्नी के माध्यम से धन लाभ और विदेश यात्रा के योग बनते हैं।

१०. दशम भाव (कर्म - मकर राशि): जातक कला, सौन्दर्य प्रसाधन, फिल्म, फैशन या विलासिता की वस्तुओं के व्यापार से धन कमाता है।

११. एकादश भाव (लाभ - कुम्भ राशि): स्त्रियों के सहयोग से धन लाभ होता है। आय के एक से अधिक साधन होते हैं।

१२. द्वादश भाव (व्यय - मीन राशि - उच्चस्थ): यहाँ शुक्र उच्च राशि में होते हैं। यद्यपि यह व्यय भाव है, तथापि शुक्र यहाँ 'भोग' के कारक हैं। जातक को शय्या सुख, राजसी ठाठ-बाट और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।

द्वादशे सुखभुक् सदा। अर्थ: जातक जीवन भर सुखों का भोग करता है, चाहे खर्च कितना भी हो।

मेष लग्न की कुण्डली में: १. गुरु यदि केन्द्र या त्रिकोण (विशेषतः कर्क, धनु या मीन) में हों, तो जातक "धर्मध्वज" (धार्मिक नेता) और "महाज्ञानी" होता है। २. शुक्र यदि केन्द्र (विशेषतः वृष, तुला या मीन) में हों, तो जातक "लक्ष्मीपुत्र" होता है।

परन्तु यदि गुरु मकर (नीच) में हों या शुक्र कन्या (नीच) में हों, तो जीवन संघर्षमय हो जाता है।

क्रमश: .......

तंत्रकुलज्योतिषं विश्व की सबसे सटीक वर्तमान, भूत एवं भाविष्य बताने वाली एप्प, सबसे सटीक फलकथन एवं उपाय बताने वाली एप्प है। शास्त्रीय प्रमाण प्रदान करते हुये ग्रहों के साथ, अष्टकवर्ग, उपग्रह कुण्डली बनाकर गुलिक मान्दि आदि का भी सूक्ष्म विश्लेषण कर फलादेश इसकी विशिष्टता है जो और कहीं नहीं दिखती। कोई भी एप्प इसके सन्निकट भी नहीं आ सकती।

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नमश्चण्डिकायै,अथ बुधफलविचारः मेष लग्न के लिए बुध तृतीयेश और षष्ठेश है। यह मङ्गल का शत्रु है, अतः मेष लग्न वालों के लिए ब...
23/12/2025

नमश्चण्डिकायै,

अथ बुधफलविचारः

मेष लग्न के लिए बुध तृतीयेश और षष्ठेश है। यह मङ्गल का शत्रु है, अतः मेष लग्न वालों के लिए बुध एक अशुभ (पापी) ग्रह माना जाता है। यह स्नायु तन्त्र, त्वचा, मामा और लेखन का कारक है।

१. प्रथम भाव (लग्न) में बुध:

फल: जातक बातूनी (वाचाल) होता है। सदैव कुछ न कुछ बोलने की आदत होती है।

शरीर: त्वचा कोमल होती है। वाणी में चतुराई होती है, परन्तु कई बार बिना सोचे-समझे बोलकर शत्रु बना लेता है।

दोष: गणित या लेखन में रुचि, परन्तु निर्णय लेने में दुविधाग्रस्त।

२. द्वितीय भाव (वृषभ) में बुध:

फल: जातक की वाणी तार्किक होती है। वह अच्छा वकील या प्रवक्ता हो सकता है।

धन: अपनी बुद्धि और वाकपटुता से धन अर्जित करता है।

कुटुम्ब: परिवार में हास्य-विनोद का वातावरण रखता है।

३. तृतीय भाव (मिथुन) में बुध (स्वगृही):

फल: 'विपरीत राजयोग' (यदि लग्नेश बलवान हो)।

गुण: जातक महान लेखक, पत्रकार, कवि या सम्पादक बन सकता है। भाई-बहनों का सुख उत्तम रहता है।

साहस: मानसिक साहस अधिक होता है, शारीरिक कम।

४. चतुर्थ भाव (कर्क) में बुध:

फल: माता से वैचारिक मतभेद हो सकते हैं।

शिक्षा: विद्या प्राप्ति में बाधाएँ या विषय परिवर्तन होता है।

सुख: घर में रहने की अपेक्षा बाहर रहना अधिक भाता है।

५. पञ्चम भाव (सिंह) में बुध:

फल: मित्र राशि में होने से शुभ है।

बुद्धि: जातक की स्मरण शक्ति अच्छी होती है। मन्त्रों का ज्ञाता होता है।

सन्तान: सन्तान सुख सामान्य। लेखन कला में निपुणता।

६. षष्ठ भाव (कन्या) में बुध (उच्चस्थ):

फल: यहाँ बुध १५ अंश तक परम उच्च का होता है।

विशेष: यह 'विपरीत राजयोग' की श्रेष्ठ स्थिति है। जातक अपनी बुद्धि से शत्रुओं को परास्त करता है।

मामा: मामा पक्ष सुखी और धनी होता है।

रोग: त्वचा रोग, एलर्जी या वाणी दोष का भय रहता है।

७. सप्तम भाव (तुला) में बुध:

फल: जीवनसाथी बुद्धिमान, कम आयु का या बालसुलभ स्वभाव का हो सकता है।

व्यापार: व्यापार में सफलता मिलती है, विशेषकर साझेदारी में।

दोष: यदि पाप प्रभाव हो तो नपुंसकता या गुप्त रोग का भय।

८. अष्टम भाव (वृश्चिक) में बुध:

फल: यह स्थिति 'आयु' और 'विद्या' दोनों के लिए मध्यम है।

दोष: नसों की कमजोरी, पक्षाघात का भय।

गुण: गूढ़ शोध में सफलता। जातक दूसरों का धन (विरासत) प्राप्त कर सकता है।

९. नवम भाव (धनु) में बुध:

फल: जातक ज्ञानी और वेदान्ती होता है।

भाग्य: भाग्योदय में उतार-चढ़ाव आता है। पिता से सम्बन्ध सामान्य।

यात्रा: धार्मिक यात्राएँ और प्रकाशन से लाभ।

१०. दशम भाव (मकर) में बुध:

फल: जातक गणितज्ञ, चार्टर्ड अकाउंटेंट, बैंकर या शिल्पी होता है।

कर्म: कार्यक्षेत्र में बुद्धि का प्रयोग अधिक करता है। पिता के व्यवसाय को आगे बढ़ा सकता है।

११. एकादश भाव (कुम्भ) में बुध:

फल: अनेक स्रोतों से आय होती है।

लाभ: मित्रों और बड़े भाई-बहनों से लाभ। जातक समाज में लोकप्रिय होता है।

१२. द्वादश भाव (मीन) में बुध (नीचस्थ):

फल: यहाँ बुध १५ अंश तक परम 'नीच' का होता है। यह अत्यंत अशुभ है।

दोष: बुद्धि भ्रमित रहती है। निर्णय गलत होते हैं। मानसिक रोग, डिप्रेशन और जेल यात्रा का भय।

शिक्षा: विद्या में बाधा। धन का अपव्यय।

क्रमश: .......

तंत्रकुलज्योतिषं विश्व की सबसे सटीक वर्तमान, भूत एवं भाविष्य बताने वाली एप्प, सबसे सटीक फलकथन एवं उपाय बताने वाली एप्प है। शास्त्रीय प्रमाण प्रदान करते हुये ग्रहों के साथ, अष्टकवर्ग, उपग्रह कुण्डली बनाकर गुलिक मान्दि आदि का भी सूक्ष्म विश्लेषण कर फलादेश इसकी विशिष्टता है जो और कहीं नहीं दिखती। कोई भी एप्प इसके सन्निकट भी नहीं आ सकती।

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