24/12/2025
नमश्चण्डिकायै,
मेषलग्न में गुरु एवं शुक्र का द्वादशभावों में फल
अथ मेषलग्ने देवगुरुबृहस्पतिफलकथनम्
मेष लग्न में गुरु नवमेश और द्वादशेश होकर परम 'कारक' ग्रह माने गए हैं।
१. प्रथम भाव (लग्न - मेष राशि): यहाँ गुरु दिग्बली होते हैं। जातक ज्ञानवान, राजमान्य और तेजस्वी होता है। शास्त्रोक्त फल:
विपुलविमलकीर्तिः सर्वशास्त्रार्थवेत्ता।
नृपतिवरपुरोहितः कञ्जनेत्रः सुरेज्ये॥ (जातकपारिजात)
अर्थ: लग्नस्थ गुरु जातक को विपुल कीर्ति, शास्त्रों का ज्ञान, और राजा (सरकार) से सम्मान दिलाते हैं।
२. द्वितीय भाव (धन - वृष राशि): धन स्थान में गुरु वाणी को गम्भीर और सत्यवादी बनाते हैं। जातक को पैतृक सम्पत्ति और कुटुम्ब का सुख मिलता है।
वाग्मी भोजनसुन्दरः प्रियवचाः।
अर्थ: जातक मधुरभाषी और अच्छे भोजन का प्रेमी होता है।
३. तृतीय भाव (सहज - मिथुन राशि): यहाँ गुरु भाइयों के सुख में कुछ कमी कर सकते हैं। जातक को भाग्य जागृत करने के लिए यात्राएँ करनी पड़ती हैं। लेखन और अध्यापन में रुचि होती है।
४. चतुर्थ भाव (सुख - कर्क राशि - उच्चस्थ): यहाँ गुरु उच्च राशि में होकर 'हंस महापुरुष योग' बनाते हैं। यह मेष लग्न के लिए सर्वोत्तम स्थिति है। शास्त्रोक्त फल:
रक्तोत्पलांशचरणः सुकुमारदेहो। शङ्खाब्जमत्स्यकुशकर्मकुलेष्टपादः॥
हंसः कफानिलरुचिः सुविशालनेत्रो। वृत्तस्तनुर्मधुपिङ्गलवर्णकेशः॥ (फलदीपिका)
अर्थ: हंस योग वाला जातक राजा के समान सुखी, वाहन और भूमि का स्वामी, तथा पुण्यकर्म करने वाला होता है। माता का पूर्ण सुख और विशाल भवन प्राप्त होता है।
५. पञ्चम भाव (सुत - सिंह राशि): मित्र सूर्य की राशि में गुरु पुत्र सन्तान, उच्च शिक्षा, और मन्त्र सिद्धि देते हैं। यह 'पूर्वपुण्य' का स्थान है।
सुतभे च सुतप्रदः।
अर्थ: यह स्थिति मेधावी और कुलदीपक सन्तान प्रदान करती है।
६. षष्ठ भाव (रिपु - कन्या राशि): यहाँ गुरु उदर विकार (लिवर समस्या) दे सकते हैं। शत्रुओं पर विजय मिलती है, किन्तु मामा पक्ष से कष्ट सम्भव है।
७. सप्तम भाव (कलत्र - तुला राशि): जातक का जीवनसाथी कुलीन, धार्मिक और सुन्दर होता है। विवाह के पश्चात भाग्योदय होता है।
सुदारः सत्पुत्रः। अर्थ: उत्तम पत्नी और सत्पुत्र की प्राप्ति होती है।
८. अष्टम भाव (आयु - वृश्चिक राशि): यहाँ गुरु गुप्त विद्या, तन्त्र-मन्त्र और शोध में सफलता देते हैं। आयु लम्बी होती है, परन्तु धन संचय में बाधा आती है।
९. नवम भाव (भाग्य - धनु राशि - स्वगृही): यह गुरु का अपना घर है। यहाँ गुरु अतिविशिष्ट राजयोग कारक होते हैं। जातक परम धार्मिक, तीर्थयात्री और पिता का भक्त होता है। शास्त्रोक्त फल:
भाग्यस्थे त्रिदशपतौ भाग्यवान् धार्मिकश्च।
अर्थ: जातक जन्मजात भाग्यशाली और धर्मात्मा होता है।
१०. दशम भाव (कर्म - मकर राशि - नीचस्थ): यहाँ गुरु नीच राशि में होते हैं। कार्यक्षेत्र में अस्थिरता, उच्च अधिकारियों से मतभेद और पदोन्नति में बाधा आती है। (यदि नीचभंग न हो तो)।
नीचगे मानभङ्गः। अर्थ: कर्म स्थान में नीच का गुरु सम्मान में कमी लाता है।
११. एकादश भाव (लाभ - कुम्भ राशि): जातक को सात्विक कार्यों से धन लाभ होता है। पुत्र और मित्रों से सुख मिलता है।
लाभे लाभकरः। अर्थ: गुरु यहाँ निरन्तर आय के स्रोत बनाते हैं।
१२. द्वादश भाव (व्यय - मीन राशि - स्वगृही): यहाँ गुरु 'विमल योग' के समान फल देते हैं। जातक का धन यज्ञ, दान और परोपकार में खर्च होता है। अन्तिम समय में मोक्ष की प्राप्ति सम्भव है।
अथ मेषलग्ने दैत्यगुरुशुक्रविस्तृतफलकथनम्
मेष लग्न में शुक्र द्वितीयेश और सप्तमेश होकर मुख्य 'मारक' ग्रह हैं, परन्तु लक्ष्मी के दाता भी हैं।
१. प्रथम भाव (लग्न - मेष राशि): जातक शौकीन मिजाज, सुन्दर और विपरीत लिङ्ग के प्रति आकर्षण रखने वाला होता है।
कामार्तः सुवपुः। अर्थ: जातक कामी और सुन्दर शरीर वाला होता है।
२. द्वितीय भाव (धन - वृष राशि - स्वगृही): शुक्र अपने ही घर में बलवान होते हैं। जातक को अपार धन, रत्न, आभूषण और मधुर वाणी प्राप्त होती है। नेत्र बड़े और सुन्दर होते हैं। शास्त्रोक्त फल:
द्वितीये भार्गवे यस्य स भवेद् धनवान् नरः।
मिष्टान्नपानभोक्ता च दयालुः प्रियवाचकः॥ (बृहत्पाराशरहोराशास्त्र)
३. तृतीय भाव (सहज - मिथुन राशि): जातक की बहनें अधिक होती हैं। चित्रकला, संगीत या गायन में रुचि होती है। कंजूस प्रवृत्ति हो सकती है।
४. चतुर्थ भाव (सुख - कर्क राशि): जातक को उत्तम वाहन, सजा हुआ घर और माता का सुख मिलता है।
चतुर्थे वाहनप्रदः। अर्थ: शुक्र यहाँ विलासिता पूर्ण जीवन देते हैं।
५. पञ्चम भाव (सुत - सिंह राशि): कन्या सन्तान की अधिकता होती है। प्रेम सम्बन्धों में सफलता मिलती है। सट्टे या आकस्मिक धन का लाभ होता है।
६. षष्ठ भाव (रिपु - कन्या राशि - नीचस्थ): यहाँ शुक्र नीच राशि में होते हैं। यह अशुभ स्थिति है। गुप्त रोग, वैवाहिक जीवन में क्लेश, और चरित्र हनन का भय रहता है। शास्त्रोक्त फल:
षष्ठे शुक्रो यदा तस्य रिपुवृद्धिः पदे पदे। अर्थ: जातक को स्त्री पक्ष से शत्रुता और धन नाश का सामना करना पड़ता है।
७. सप्तम भाव (कलत्र - तुला राशि - स्वगृही): यहाँ शुक्र 'मालव्य महापुरुष योग' का निर्माण करते हैं। शास्त्रोक्त फल:
नाङ्गोष्ठदशनच्छविर्मलयजः सम्प्राप्तराज्यः पुमान्।
कान्ताकाञ्चनकान्तिमान् बहुधनः संभोगभाग्ये रतः॥ फलदीपिका - मालव्य योग
अर्थ: जातक का जीवनसाथी अत्यन्त सुन्दर होता है। जातक को व्यापार में लाभ, वाहन सुख और समाज में राजतुल्य सम्मान मिलता है।
८. अष्टम भाव (आयु - वृश्चिक राशि): ससुराल से धन मिलता है। परन्तु मधुमेह (डायबिटीज) या मूत्र विकार की सम्भावना रहती है।
९. नवम भाव (भाग्य - धनु राशि): जातक का भाग्योदय विवाह के बाद होता है। पत्नी के माध्यम से धन लाभ और विदेश यात्रा के योग बनते हैं।
१०. दशम भाव (कर्म - मकर राशि): जातक कला, सौन्दर्य प्रसाधन, फिल्म, फैशन या विलासिता की वस्तुओं के व्यापार से धन कमाता है।
११. एकादश भाव (लाभ - कुम्भ राशि): स्त्रियों के सहयोग से धन लाभ होता है। आय के एक से अधिक साधन होते हैं।
१२. द्वादश भाव (व्यय - मीन राशि - उच्चस्थ): यहाँ शुक्र उच्च राशि में होते हैं। यद्यपि यह व्यय भाव है, तथापि शुक्र यहाँ 'भोग' के कारक हैं। जातक को शय्या सुख, राजसी ठाठ-बाट और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
द्वादशे सुखभुक् सदा। अर्थ: जातक जीवन भर सुखों का भोग करता है, चाहे खर्च कितना भी हो।
मेष लग्न की कुण्डली में: १. गुरु यदि केन्द्र या त्रिकोण (विशेषतः कर्क, धनु या मीन) में हों, तो जातक "धर्मध्वज" (धार्मिक नेता) और "महाज्ञानी" होता है। २. शुक्र यदि केन्द्र (विशेषतः वृष, तुला या मीन) में हों, तो जातक "लक्ष्मीपुत्र" होता है।
परन्तु यदि गुरु मकर (नीच) में हों या शुक्र कन्या (नीच) में हों, तो जीवन संघर्षमय हो जाता है।
क्रमश: .......
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