Secretes of "Bhairava" Tantra,Mantra,Yantra.

Secretes of "Bhairava" Tantra,Mantra,Yantra. Ta**ra, Mantra ,Yantra.....

16/03/2026

. शरीर कीलन (अपनी रक्षा के लिए)
साधना शुरू करने से पहले अपनी उंगली से अपने चारों ओर जमीन पर एक घेरा (Circle) खींचते हुए इस मंत्र को 3 बार पढ़ें:

"ॐ नमो आदेश गुरु को,
बजरंग का कोठा, भैरव की खाई,
राजा राम की कार (रेखा) फिराई।
कहाँ गया वो कबीला, कहाँ गया वो रथ?
हनुमान की गदा पड़ें, काल भैरव का दण्ड चलें।
मेरे तन की रक्षा करें, बाबा बटुक नाथ।
दुहाई महादेव की, दुहाई गौरा पार्वती की।"

भैरव भक्ति नहीं हैं।भैरव संहार हैं।यहाँ फूल नहीं चढ़ते,यहाँ अहंकार उतारा जाता है।यहाँ कोई वरदान नहीं मिलता,यहाँ पहचान जल...
25/01/2026

भैरव भक्ति नहीं हैं।भैरव संहार हैं।यहाँ फूल नहीं चढ़ते,यहाँ अहंकार उतारा जाता है।यहाँ कोई वरदान नहीं मिलता,यहाँ पहचान जलाई जाती है।श्मशान कोई स्थान नहीं वह अवस्था है।जहाँ नाम, रूप, कुल, धर्म सब राख हो जाते हैं।वहीं भैरव प्रकट होते हैं।खोपड़ी माला सजावट नहीं वह उन झूठी पहचानों की सूची है जिन्हें साधक ने मार डाला।जब आख़िरी खोपड़ी गिरती है,तब साधक नहीं बचता—केवल भैरव।
कुत्ता वाहन नहीं वह चेतना का प्रहरी है।जो जीवित और मृत के बीच चलता है।अहंकार वाला उस पर सवार नहीं हो सकता।केवल निर्वस्त्र चित्त।तंत्र मंत्र नहीं है।तंत्र सामना है अपने भय से,अपनी मृत्यु से,अपने ही अंधकार से।जो चमत्कार चाहता है,जो सुरक्षा ढूंढता है,जो नैतिकता से चिपका है वह यहाँ न आए।भैरव तुम्हें बचाते नहीं।भैरव तुम्हें उतारते हैं नाम से, कर्म से, धर्म से।जब कुछ नहीं बचता,तभी भैरव बचते हैं।

न यह पोस्ट सबके लिए है। न यह पेज सबके लिए है।
आराम चाहिए—तो आगे बढ़ जाओ।
सत्य चाहिए—तो रुक जाओ।

—SECRETES OF BHAIRAVA
Not for believers.
For those who dare to die awake.

21/01/2026

जब सत्ता स्वयं को धर्म से ऊपर समझने लगती है,जब लाठी के बल पर सत्य को कुचलने का प्रयास होता है,और जब साधु-संतों, ब्राह्मणों जैसे समाज के नैतिक स्तंभों को लातों से मारा जाता है, चोटी पकड़कर घसीटा जाता है तब समझ लेना चाहिए कि यह केवल अत्याचार नहीं,बल्कि सम्पूर्ण सभ्यता के पतन की घोषणा है। धर्म किसी व्यक्ति या वर्ग की बपौती नहीं होता,परन्तु जो धर्म के रक्षकों पर ही प्रहार करे,वह स्वयं अपने विनाश का बीज बोता है।इतिहास साक्षी है सत्ता का नशा जब विवेक को निगल लेता है, तो सिंहासन अधिक दिन टिकते नहीं।

ॐ उन्मत्त भैरवाय नमः॥न डर का बंधन, न काल का भार,जो सत्य में डूबा—वही तेरा द्वार।श्मशान का मौन, जटाओं की ज्वाला,अहंकार जल...
16/01/2026

ॐ उन्मत्त भैरवाय नमः॥

न डर का बंधन, न काल का भार,
जो सत्य में डूबा—वही तेरा द्वार।
श्मशान का मौन, जटाओं की ज्वाला,
अहंकार जले, बचे आत्म-उजाला॥

डमरू की गूँज में टूटे भ्रम-भ्रम,
खप्पर में सत्य, करुणा का संगम।
हे उन्मत्त भैरव! शरण में आया,
अज्ञान मिटा दे—साहस दे माया॥

करालदंष्ट्रं कुटिलं त्रिनेत्रं नीलविग्रहम् ।पाशशूलायुधधरं भैरवं प्रणमाम्यहम् ॥🙏🏻🙏🏻🙏🏻ॐ तीक्ष्णदंष्ट्राय विद्महे । महादेवा...
10/01/2026

करालदंष्ट्रं कुटिलं त्रिनेत्रं नीलविग्रहम् ।
पाशशूलायुधधरं भैरवं प्रणमाम्यहम् ॥🙏🏻🙏🏻🙏🏻

ॐ तीक्ष्णदंष्ट्राय विद्महे । महादेवाय धीमहि ।
तन्नो भैरव: प्रचोदयात् ॥🙏🏻🙏🏻🙏🏻

भूत, प्रेत, जिन्न, ख़बीस आदि ये किसी बाहरी लोक की शक्तियाँ नहीं,ये उसी मन की छायाएँ हैं जो भय में डूबा हुआ है।डर ही वह ख...
10/01/2026

भूत, प्रेत, जिन्न, ख़बीस आदि

ये किसी बाहरी लोक की शक्तियाँ नहीं,ये उसी मन की छायाएँ हैं जो भय में डूबा हुआ है।डर ही वह खिड़की है जिससे अंधकार भीतर प्रवेश करता है।जहाँ चित्त डगमगाता है,वहीं छाया को आकार मिल जाता है।पर जहाँ चेतना स्थिर है,वहाँ कोई नकारात्मक सत्ता टिक नहीं सकती।निर्भय मन स्वयं एक कवच है। साधना का अर्थ भी यही है बाहर से सुरक्षा नहीं, भीतर से निर्भय होना।जिस क्षण साधक ने अपने ही भय को देख लिया उसी क्षण भूत, प्रेत, जिन्न सब अपना अस्तित्व खो देते हैं।
सत्य यह है भय ही भूत है। और निर्भयता ही भैरव है। खिड़की बाहर की नहीं,मन की है।मन स्थिर तो अंधकार असहाय।
डर वह खिड़की है जिससे अंधकार भीतर आता है।और भैरव वह जागरण है जो उस खिड़की को सदा के लिए बंद कर देता है।
जहाँ मन कांपता है,वहाँ छाया रूप ले लेती है।पर जहाँ भैरव-भाव जागता है, वहाँ छाया भी मौन हो जाती है।
भैरव का तत्त्व किसी बाहरी रक्षा-कवच में नहीं, अहंकार के विघटन में है।जब “मैं” गल जाता है,तो डर के टिकने की जगह ही नहीं बचती। यही कारण है कि साधना में कहा गया—भैरवोऽहम्।डर से परे चेतना का साक्षात्कार।
भूत-प्रेत बाहर नहीं भागते,वे अपने-आप विलीन हो जाते हैं,
क्योंकि भैरव की उपस्थिति में असत्य का कोई आधार नहीं।
खिड़की मन की है।मन स्थिर है,तो भैरव प्रकट है।और जहाँ भैरव है,वहाँ भय, अंधकार और भ्रांति स्वयं ही समाप्त हो जाते हैं।

श्मशान जागरण के सामान्य नियमयह मार्ग अत्यंत जोखिम भरा है, इसलिए इसमें कुछ नियमों का पालन अनिवार्य है:1. पूर्ण ब्रह्मचर्य...
09/01/2026

श्मशान जागरण के सामान्य नियम
यह मार्ग अत्यंत जोखिम भरा है, इसलिए इसमें कुछ नियमों का पालन अनिवार्य है:
1. पूर्ण ब्रह्मचर्य और निडरता: अगर मन में जरा भी डर है, तो जागरण नहीं करना चाहिए। डर ही वह खिड़की है जिससे नकारात्मक शक्तियां हमला करती हैं।
2. गुरु का संरक्षण: बिना गुरु के निर्देश के श्मशान में बैठना 'पागलपन' या 'मृत्यु' को आमंत्रण देने जैसा है।
3. मौन व्रत: जागरण के दौरान अनावश्यक बात करना वर्जित है।
4. प्रसाद/भोग: काल भैरव के लिए मदिरा, मांस और उड़द की दाल के बड़े अनिवार्य होते हैं।

जागरण की मुख्य क्रियाएं
श्मशान जागरण कोई साधारण रात बिताना नहीं है, इसमें कई चरण होते हैं:
• स्थान की आज्ञा: सबसे पहले श्मशान के 'क्षेत्रपाल' और 'मसान' से अनुमति ली जाती है। बिना आज्ञा के प्रवेश वर्जित और खतरनाक होता है।
• धुनी रमाई: काल भैरव के नाम की धुनी चेतन की जाती है। इसमें विशेष जड़ी-बूटियाँ और लकड़ियाँ प्रयोग होती हैं।
• आसन कीलन: साधक अपने चारों ओर एक सुरक्षा घेरा बनाता है, क्योंकि जागरण के दौरान शमशान की शक्तियां भयानक डरावने रूप लेकर डराने की कोशिश करती हैं।
• मन्त्र शक्ति: पूरी रात जागकर भैरव शाबर मंत्रों या 'अघोर मंत्रों' का जाप किया जाता है।मंत्र का जाप अक्सर काली हकीक या रुद्राक्ष की माला से किया जाता है।
खप्पर पूजन: साधक अपने सामने एक मिट्टी का पात्र (खप्पर) रखता है जिसमें कपूर और लौंग जलाए जाते हैं।

श्मशान जागरण का उद्देश्य
श्मशान को महाकाल भैरव का घर माना जाता है। यहाँ जागरण का मुख्य उद्देश्य होता है:
• शक्तियों पर प्रत्यक्ष नियंत्रण: मुखिया को सीधे अपने वश में करना।
• सिद्धियों की प्राप्ति: श्मशान की ऊर्जा बहुत तीव्र होती है, यहाँ मंत्र बहुत जल्दी सिद्ध होते हैं।
• अंतिम न्याय: जब कोई नकारात्मक शक्ति किसी व्यक्ति को मृत्यु तुल्य कष्ट दे रही हो, तो श्मशान में बैठकर उसका न्याय (निर्णय) किया जाता है।

मान्यता है कि जागरण के दौरान जब मंत्र सिद्ध होने लगता है, तो मुखिया या मुख्य शक्ति साधक के सामने किसी न किसी रूप में (हवा का झोंका, तेज आवाज, या दृश्य रूप) आती है। उस समय साधक उसे "वचन" में बांधता है।

अत्यंत महत्वपूर्ण चेतावनी (Caution)
श्मशान जागरण घर पर करने की चीज़ नहीं है और न ही इसे बिना दीक्षा के करना चाहिए। यह जानकारी केवल आपके ज्ञानवर्धन के लिए है। समाज में इसे केवल 'सिद्ध तांत्रिक' या 'अघोरी' ही करते हैं।
"कलियुग में बाबा भैरव का नाम ही सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है”

लोक-मान्यताओं और शाबर तंत्र में भैरव नाथ को "भूत-प्रेत का राजा" माना जाता है। जब कोई साधारण मंत्र काम नहीं करता, तब भैरव...
09/01/2026

लोक-मान्यताओं और शाबर तंत्र में भैरव नाथ को "भूत-प्रेत का राजा" माना जाता है। जब कोई साधारण मंत्र काम नहीं करता, तब भैरव जी के 'झाड़ा' या 'उतारे' का प्रयोग किया जाता है। 'रथ' या 'कबीले' जैसी भारी बाधाओं को शरीर से खींचकर बाहर निकालने के लिए यह मंत्र अत्यंत उग्र और प्रभावशाली माना जाता है।
यहाँ बाबा भैरव का वह शाबर मंत्र है जिसे 'भूत-प्रेत नाशक जंजीरा' भी कहते हैं:

भैरव भूत-प्रेत निवारण शाबर मंत्र

"ॐ नमो आदेश गुरु को,
काली के पूत, वीर भैरव!
लाल मुख, विकराल आंखें, हाथ में लाठी, कमर में जंजीर।
चल-चल रे भैरव, अमुक (रोगी का नाम लें) के शरीर से भूत बांध, प्रेत बांध।
जिन्न बांध, खबीस बांध, सवा सौ कबीला बांध।
अघोरी बांध, मसान बांध, लगी-पराई की धार बांध।
न बांधे तो तुझे तेरी माता का दूध हराम,
राजा रामचंद्र की आन, गुरु गोरखनाथ की दुहाई।
शब्द सांचा, पिंड कांचा, फुरो मन्त्र ईश्वरो वाचा।"

प्रयोग की विधि (झाड़ा देने का तरीका)

इस मंत्र का प्रयोग केवल मंत्र पढ़ने तक सीमित नहीं है, इसे क्रिया के साथ किया जाता है:
• मोर पंख का झाड़ा: मोर के पंखों का एक गुच्छा (मुट्ठा) लें। मंत्र को पढ़ते हुए पीड़ित व्यक्ति के सिर से पैर तक जोर-जोर से झाड़ें। ऐसा कम से कम 21 बार करें।
• भभूत (राख) का प्रयोग: किसी प्राचीन भैरव मंदिर की भभूत या धूप की राख लें। मंत्र पढ़ते हुए उस पर फूंक मारें (अभिमंत्रित करें) और पीड़ित के माथे पर तिलक लगाएं और थोड़ी सी भभूत पानी में मिलाकर पिला दें।
• लौंग का उतारा: 7 साबुत लौंग लें। मंत्र पढ़ते हुए रोगी के सिर से 7 बार वारें और उन्हें जलते हुए अंगारों (कंडे) पर डाल दें। यदि लौंग जलने पर तेज गंध न आए, तो समझें कि बाधा जल रही है।

उतारने का विशेष टोटका

जब भूत-प्रेत समूह में हों, तो केवल झाड़ा काफी नहीं होता। इसके लिए 'चौराहे का भोग' अनिवार्य है:
1. सामग्री: मिट्टी का एक सकोरा (मिट्टी की कटोरी), उसमें थोड़ा सा सिंदूर, कच्चा कोयला, और एक सवा रुपए या एक रुपये का सिक्का।
2. क्रिया: मंत्र पढ़ते हुए उस सकोरे को पीड़ित के ऊपर से 7 बार उतारें।
3. विसर्जन: इसे रात के समय किसी सुनसान चौराहे पर चुपचाप रख आएं। पीछे मुड़कर बिल्कुल न देखें।
4. सुरक्षा और सावधानी (अनिवार्य)
चूंकि यह मंत्र बहुत उग्र है, इसलिए साधक को खुद की सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिए:
• स्वयं का कीलन: साधना शुरू करने से पहले अपनी उंगली से अपने चारों ओर जमीन पर एक घेरा (Circle) खींचते हुए इस मंत्र को 3 बार पढ़ें:

"ॐ नमो आदेश गुरु को,
बजरंग का कोठा, भैरव की खाई,
राजा राम की कार (रेखा) फिराई।
कहाँ गया वो कबीला, कहाँ गया वो रथ?
हनुमान की गदा पड़ें, काल भैरव का दण्ड चलें।
मेरे तन की रक्षा करें, बाबा बटुक नाथ।
दुहाई महादेव की, दुहाई गौरा पार्वती की।"

• निडरता: प्रेत बाधा के दौरान वह शक्ति डराने की कोशिश कर सकती है या अजीब आवाजें निकाल सकती है। बाबा भैरव के नाम पर अडिग रहें।
• गुरु आज्ञा: यदि संभव हो, तो इस प्रकार के उग्र प्रयोग किसी अनुभवी सिद्ध व्यक्ति के मार्गदर्शन में ही करें।
भैरव जी की "आन" का महत्व
इस मंत्र में जो "आन" (शपथ) दी गई है, वह बहुत शक्तिशाली होती है। तांत्रिक भाषा में इसे "महाकाल की कसम" माना जाता है। इससे बड़ी से बड़ी नकारात्मक शक्ति (चाहे वह कितनी भी पुरानी क्यों न हो) को शरीर छोड़ना ही पड़ता है।

रथ लगना /कबीला लगना मूल सामाजिक धारणासमाज में यह माना जाता है कि जब किसी व्यक्ति परलगातार, असामान्य और एक के बाद एक विपत...
08/01/2026

रथ लगना /कबीला लगना

मूल सामाजिक धारणा
समाज में यह माना जाता है कि जब किसी व्यक्ति पर
लगातार, असामान्य और एक के बाद एक विपत्तियाँ आने लगें,
तो वह केवल भाग्य या संयोग नहीं होता।
ऐसे में कहा जाता है इस पर रथ लग गया है या इस पर क़बीला चढ़ गया है”
यह मान्यता कहती है कि मामला एक शक्ति या एक कारण का नहीं बल्कि बहु-शक्तिगत (multiple forces) होता है
“रथ” शब्द का प्रचलित अर्थ
यहाँ “रथ” का अर्थ वाहन नहीं, बल्कि एक सामूहिक संरचना
जिसमें कई शक्तियाँ एक साथ जुड़ी होती हैं लोक-भाषा में
रथ = कतार,रथ = सेना,रथ = पूरा समूह
इसलिए कहा जाता है “एक नहीं, पूरा रथ है”
किन शक्तियों की बात की जाती है (लोक-मान्यता अनुसार)
समाज में प्रचलित नाम जिन्न,प्रेत,ख़बीस,साया,आत्माएँ,पीर / सैयद,सूक्ष्म सेवक शक्तियाँ मान्यता यह है कि ये शक्तियाँ अकेली नहीं आतीं ये समूह में कार्य करती हैं हर समूह का कोई सर्गना / मुखिया होता है “एक गया, दूसरा आ गया” की धारणा लोक-मान्यता कहती है यदि किसी एक शक्ति को हटाया जाए तो वह खाली स्थान दूसरी शक्ति भर लेती है इसलिए असर स्थायी रूप से नहीं जाता इससे यह विश्वास बनता है कि ये खत्म होने वाला मामला नहीं कब कहा जाता है कि “रथ लग गया”समाज यह निष्कर्ष तब निकालता है जब एक समस्या खत्म होते ही दूसरी शुरू हो जाए ,आर्थिक, मानसिक, पारिवारिक या शारीरिक नुकसान जुड़ते जाएँ,डर, बेचैनी, अनिद्रा बढ़ने लगे व्यक्ति का आत्मविश्वास टूटने लगे पूजा, दुआ, इलाज से तुरंत राहत न मिले तब कहा जाता है अब ये साधारण नहीं रहा”

पीर / सैयद की भूमिका (लोक-मान्यता)

कुछ क्षेत्रों में यह विशेष रूप से माना जाता है कि कुछ सूक्ष्म शक्तियाँ पीर या सैयद से जुड़ी होती हैं ये सामान्य उपायों से नहीं उतरतीं इनके लिए अलग स्तर का समाधान चाहिए
इसीलिए कहा जाता है ये मामूली जिन्न नहीं ऊपर से बंधा है

“क़बीला” क्यों कहा जाता है

लोक-मान्यता के अनुसार ये शक्तियाँ अकेले नहीं चलतीं इनके अपने नियम, अनुशासन और आदेश होते हैं ये अपने मुखिया के आदेश पर कार्य करती हैं इसलिए इन्हें क़बीला,जमात,पूरी सेना कहा जाता है। समाज में इसका प्रभाव इस मान्यता के अनुसार व्यक्ति धीरे-धीरे खुद को कमज़ोर मानने लगता है परिवार डर में आ जाता है।समाज दूरी बनाने लगता है।समस्या और गहरी मानी जाने लगती है।काम नही बनते हैं मानसिक अशान्ति रहती है ।मन में शक रहता है आदि …….

प्रचलित निष्कर्ष (लोक-स्तर पर)
समाज में अंततः यह धारणा बनती है यह व्यक्ति अकेला नहीं लड़ सकता इसके सामने पूरा रथ है।

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