Secretes of "Bhairava" Tantra,Mantra,Yantra.

Secretes of "Bhairava" Tantra,Mantra,Yantra. Ta**ra, Mantra ,Yantra.....

भैरव कोई देवता नहीं जिन्हें मनाया जाए।भैरव वह अग्नि हैं जिसमें “मैं” जलता है।भैरव के द्वार पर प्रार्थनाएँ नहीं सुनी जाती...
16/07/2026

भैरव कोई देवता नहीं जिन्हें मनाया जाए।भैरव वह अग्नि हैं जिसमें “मैं” जलता है।भैरव के द्वार पर प्रार्थनाएँ नहीं सुनी जातीं—वहाँ केवल सत्य खड़ा रहता है।यहाँ फूलों की सुगंध नहीं,श्मशान की राख है।यहाँ आरती की लौ नहीं,अहंकार की चिता जलती है।श्मशान कोई भूमि नहीं,वह चेतना की अंतिम अवस्था है—जहाँ नाम समाप्त हो जाता है,रूप मिट जाता है,
कुल, धर्म, मान, अपमान…सब राख बन जाते हैं।और उसी मौन में भैरव प्रकट होते हैं।उनके गले की खोपड़ियाँ मृत्यु की नहीं,
झूठी पहचानों की गवाही हैं।हर खोपड़ी एक भ्रम है—एक “मैं”,
जो गिर चुका है।जब अंतिम भ्रम भी टूट जाता है,तब साधक नहीं रहता।सिर्फ़ भैरव शेष रहते हैं।कुत्ता उनका वाहन नहीं,
सीमा का प्रहरी है—जीवन और मृत्यु के बीच,प्रकाश और अंधकार के बीच,भय और मुक्ति के बीच।अहंकारी उस मार्ग पर नहीं चल सकता।वहाँ केवल वही प्रवेश करता है
जो भीतर से निर्वस्त्र हो चुका हो।तंत्र कोई सिद्धि नहीं।
तंत्र कोई चमत्कार नहीं।
तंत्र है—
अपने भीतर छिपे राक्षस को पहचानना।अपने भय को आँखों में देखना।अपनी मृत्यु को स्वीकार करना।जो शक्ति चाहता है,
वह लौट जाए।जो चमत्कार चाहता है,वह लौट जाए।जो केवल सुरक्षा चाहता है,वह भी लौट जाए।क्योंकि भैरव तुम्हें कुछ देते नहीं।वे छीन लेते हैं—तुम्हारा नाम,तुम्हारी पहचान,तुम्हारा अहंकार,यहाँ तक कि वह भीजिसे तुम “स्वयं” समझते रहे।
और जब छीनने को कुछ नहीं बचता,तब जो शेष रहता है—
उसे ही भैरव कहते हैं।

25/06/2026

रात जितनी गहरी होती है,
भैरवनाथ की उपस्थिति उतनी ही प्रबल होती है।

श्मशान की निस्तब्धता में,
अंधकार की गहराइयों में,
जहाँ साधारण मनुष्य का साहस समाप्त होता है,
वहीं से बाबा भैरव की शक्ति प्रारंभ होती है।

जो सत्य के मार्ग पर चलता है, बाबा उसके रक्षक हैं।
जो अधर्म और छल करता है, उसके लिए भैरव स्वयं काल हैं।

याद रखो…
भैरव के दरबार में देर हो सकती है,
पर न्याय अवश्य होता है।

“भय उसी को लगता है,
जिसके कर्म अंधकार में छिपे हों।
भैरव भक्त के लिए तो अंधेरी रात भी प्रकाश बन जाती है।”

॥ ॐ कालभैरवाय नमः ॥

16/03/2026

. शरीर कीलन (अपनी रक्षा के लिए)
साधना शुरू करने से पहले अपनी उंगली से अपने चारों ओर जमीन पर एक घेरा (Circle) खींचते हुए इस मंत्र को 3 बार पढ़ें:

"ॐ नमो आदेश गुरु को,
बजरंग का कोठा, भैरव की खाई,
राजा राम की कार (रेखा) फिराई।
कहाँ गया वो कबीला, कहाँ गया वो रथ?
हनुमान की गदा पड़ें, काल भैरव का दण्ड चलें।
मेरे तन की रक्षा करें, बाबा बटुक नाथ।
दुहाई महादेव की, दुहाई गौरा पार्वती की।"

भैरव भक्ति नहीं हैं।भैरव संहार हैं।यहाँ फूल नहीं चढ़ते,यहाँ अहंकार उतारा जाता है।यहाँ कोई वरदान नहीं मिलता,यहाँ पहचान जल...
25/01/2026

भैरव भक्ति नहीं हैं।भैरव संहार हैं।यहाँ फूल नहीं चढ़ते,यहाँ अहंकार उतारा जाता है।यहाँ कोई वरदान नहीं मिलता,यहाँ पहचान जलाई जाती है।श्मशान कोई स्थान नहीं वह अवस्था है।जहाँ नाम, रूप, कुल, धर्म सब राख हो जाते हैं।वहीं भैरव प्रकट होते हैं।खोपड़ी माला सजावट नहीं वह उन झूठी पहचानों की सूची है जिन्हें साधक ने मार डाला।जब आख़िरी खोपड़ी गिरती है,तब साधक नहीं बचता—केवल भैरव।
कुत्ता वाहन नहीं वह चेतना का प्रहरी है।जो जीवित और मृत के बीच चलता है।अहंकार वाला उस पर सवार नहीं हो सकता।केवल निर्वस्त्र चित्त।तंत्र मंत्र नहीं है।तंत्र सामना है अपने भय से,अपनी मृत्यु से,अपने ही अंधकार से।जो चमत्कार चाहता है,जो सुरक्षा ढूंढता है,जो नैतिकता से चिपका है वह यहाँ न आए।भैरव तुम्हें बचाते नहीं।भैरव तुम्हें उतारते हैं नाम से, कर्म से, धर्म से।जब कुछ नहीं बचता,तभी भैरव बचते हैं।

न यह पोस्ट सबके लिए है। न यह पेज सबके लिए है।
आराम चाहिए—तो आगे बढ़ जाओ।
सत्य चाहिए—तो रुक जाओ।

—SECRETES OF BHAIRAVA
Not for believers.
For those who dare to die awake.

21/01/2026

जब सत्ता स्वयं को धर्म से ऊपर समझने लगती है,जब लाठी के बल पर सत्य को कुचलने का प्रयास होता है,और जब साधु-संतों, ब्राह्मणों जैसे समाज के नैतिक स्तंभों को लातों से मारा जाता है, चोटी पकड़कर घसीटा जाता है तब समझ लेना चाहिए कि यह केवल अत्याचार नहीं,बल्कि सम्पूर्ण सभ्यता के पतन की घोषणा है। धर्म किसी व्यक्ति या वर्ग की बपौती नहीं होता,परन्तु जो धर्म के रक्षकों पर ही प्रहार करे,वह स्वयं अपने विनाश का बीज बोता है।इतिहास साक्षी है सत्ता का नशा जब विवेक को निगल लेता है, तो सिंहासन अधिक दिन टिकते नहीं।

ॐ उन्मत्त भैरवाय नमः॥न डर का बंधन, न काल का भार,जो सत्य में डूबा—वही तेरा द्वार।श्मशान का मौन, जटाओं की ज्वाला,अहंकार जल...
16/01/2026

ॐ उन्मत्त भैरवाय नमः॥

न डर का बंधन, न काल का भार,
जो सत्य में डूबा—वही तेरा द्वार।
श्मशान का मौन, जटाओं की ज्वाला,
अहंकार जले, बचे आत्म-उजाला॥

डमरू की गूँज में टूटे भ्रम-भ्रम,
खप्पर में सत्य, करुणा का संगम।
हे उन्मत्त भैरव! शरण में आया,
अज्ञान मिटा दे—साहस दे माया॥

करालदंष्ट्रं कुटिलं त्रिनेत्रं नीलविग्रहम् ।पाशशूलायुधधरं भैरवं प्रणमाम्यहम् ॥🙏🏻🙏🏻🙏🏻ॐ तीक्ष्णदंष्ट्राय विद्महे । महादेवा...
10/01/2026

करालदंष्ट्रं कुटिलं त्रिनेत्रं नीलविग्रहम् ।
पाशशूलायुधधरं भैरवं प्रणमाम्यहम् ॥🙏🏻🙏🏻🙏🏻

ॐ तीक्ष्णदंष्ट्राय विद्महे । महादेवाय धीमहि ।
तन्नो भैरव: प्रचोदयात् ॥🙏🏻🙏🏻🙏🏻

भूत, प्रेत, जिन्न, ख़बीस आदि ये किसी बाहरी लोक की शक्तियाँ नहीं,ये उसी मन की छायाएँ हैं जो भय में डूबा हुआ है।डर ही वह ख...
10/01/2026

भूत, प्रेत, जिन्न, ख़बीस आदि

ये किसी बाहरी लोक की शक्तियाँ नहीं,ये उसी मन की छायाएँ हैं जो भय में डूबा हुआ है।डर ही वह खिड़की है जिससे अंधकार भीतर प्रवेश करता है।जहाँ चित्त डगमगाता है,वहीं छाया को आकार मिल जाता है।पर जहाँ चेतना स्थिर है,वहाँ कोई नकारात्मक सत्ता टिक नहीं सकती।निर्भय मन स्वयं एक कवच है। साधना का अर्थ भी यही है बाहर से सुरक्षा नहीं, भीतर से निर्भय होना।जिस क्षण साधक ने अपने ही भय को देख लिया उसी क्षण भूत, प्रेत, जिन्न सब अपना अस्तित्व खो देते हैं।
सत्य यह है भय ही भूत है। और निर्भयता ही भैरव है। खिड़की बाहर की नहीं,मन की है।मन स्थिर तो अंधकार असहाय।
डर वह खिड़की है जिससे अंधकार भीतर आता है।और भैरव वह जागरण है जो उस खिड़की को सदा के लिए बंद कर देता है।
जहाँ मन कांपता है,वहाँ छाया रूप ले लेती है।पर जहाँ भैरव-भाव जागता है, वहाँ छाया भी मौन हो जाती है।
भैरव का तत्त्व किसी बाहरी रक्षा-कवच में नहीं, अहंकार के विघटन में है।जब “मैं” गल जाता है,तो डर के टिकने की जगह ही नहीं बचती। यही कारण है कि साधना में कहा गया—भैरवोऽहम्।डर से परे चेतना का साक्षात्कार।
भूत-प्रेत बाहर नहीं भागते,वे अपने-आप विलीन हो जाते हैं,
क्योंकि भैरव की उपस्थिति में असत्य का कोई आधार नहीं।
खिड़की मन की है।मन स्थिर है,तो भैरव प्रकट है।और जहाँ भैरव है,वहाँ भय, अंधकार और भ्रांति स्वयं ही समाप्त हो जाते हैं।

श्मशान जागरण के सामान्य नियमयह मार्ग अत्यंत जोखिम भरा है, इसलिए इसमें कुछ नियमों का पालन अनिवार्य है:1. पूर्ण ब्रह्मचर्य...
09/01/2026

श्मशान जागरण के सामान्य नियम
यह मार्ग अत्यंत जोखिम भरा है, इसलिए इसमें कुछ नियमों का पालन अनिवार्य है:
1. पूर्ण ब्रह्मचर्य और निडरता: अगर मन में जरा भी डर है, तो जागरण नहीं करना चाहिए। डर ही वह खिड़की है जिससे नकारात्मक शक्तियां हमला करती हैं।
2. गुरु का संरक्षण: बिना गुरु के निर्देश के श्मशान में बैठना 'पागलपन' या 'मृत्यु' को आमंत्रण देने जैसा है।
3. मौन व्रत: जागरण के दौरान अनावश्यक बात करना वर्जित है।
4. प्रसाद/भोग: काल भैरव के लिए मदिरा, मांस और उड़द की दाल के बड़े अनिवार्य होते हैं।

जागरण की मुख्य क्रियाएं
श्मशान जागरण कोई साधारण रात बिताना नहीं है, इसमें कई चरण होते हैं:
• स्थान की आज्ञा: सबसे पहले श्मशान के 'क्षेत्रपाल' और 'मसान' से अनुमति ली जाती है। बिना आज्ञा के प्रवेश वर्जित और खतरनाक होता है।
• धुनी रमाई: काल भैरव के नाम की धुनी चेतन की जाती है। इसमें विशेष जड़ी-बूटियाँ और लकड़ियाँ प्रयोग होती हैं।
• आसन कीलन: साधक अपने चारों ओर एक सुरक्षा घेरा बनाता है, क्योंकि जागरण के दौरान शमशान की शक्तियां भयानक डरावने रूप लेकर डराने की कोशिश करती हैं।
• मन्त्र शक्ति: पूरी रात जागकर भैरव शाबर मंत्रों या 'अघोर मंत्रों' का जाप किया जाता है।मंत्र का जाप अक्सर काली हकीक या रुद्राक्ष की माला से किया जाता है।
खप्पर पूजन: साधक अपने सामने एक मिट्टी का पात्र (खप्पर) रखता है जिसमें कपूर और लौंग जलाए जाते हैं।

श्मशान जागरण का उद्देश्य
श्मशान को महाकाल भैरव का घर माना जाता है। यहाँ जागरण का मुख्य उद्देश्य होता है:
• शक्तियों पर प्रत्यक्ष नियंत्रण: मुखिया को सीधे अपने वश में करना।
• सिद्धियों की प्राप्ति: श्मशान की ऊर्जा बहुत तीव्र होती है, यहाँ मंत्र बहुत जल्दी सिद्ध होते हैं।
• अंतिम न्याय: जब कोई नकारात्मक शक्ति किसी व्यक्ति को मृत्यु तुल्य कष्ट दे रही हो, तो श्मशान में बैठकर उसका न्याय (निर्णय) किया जाता है।

मान्यता है कि जागरण के दौरान जब मंत्र सिद्ध होने लगता है, तो मुखिया या मुख्य शक्ति साधक के सामने किसी न किसी रूप में (हवा का झोंका, तेज आवाज, या दृश्य रूप) आती है। उस समय साधक उसे "वचन" में बांधता है।

अत्यंत महत्वपूर्ण चेतावनी (Caution)
श्मशान जागरण घर पर करने की चीज़ नहीं है और न ही इसे बिना दीक्षा के करना चाहिए। यह जानकारी केवल आपके ज्ञानवर्धन के लिए है। समाज में इसे केवल 'सिद्ध तांत्रिक' या 'अघोरी' ही करते हैं।
"कलियुग में बाबा भैरव का नाम ही सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है”

लोक-मान्यताओं और शाबर तंत्र में भैरव नाथ को "भूत-प्रेत का राजा" माना जाता है। जब कोई साधारण मंत्र काम नहीं करता, तब भैरव...
09/01/2026

लोक-मान्यताओं और शाबर तंत्र में भैरव नाथ को "भूत-प्रेत का राजा" माना जाता है। जब कोई साधारण मंत्र काम नहीं करता, तब भैरव जी के 'झाड़ा' या 'उतारे' का प्रयोग किया जाता है। 'रथ' या 'कबीले' जैसी भारी बाधाओं को शरीर से खींचकर बाहर निकालने के लिए यह मंत्र अत्यंत उग्र और प्रभावशाली माना जाता है।
यहाँ बाबा भैरव का वह शाबर मंत्र है जिसे 'भूत-प्रेत नाशक जंजीरा' भी कहते हैं:

भैरव भूत-प्रेत निवारण शाबर मंत्र

"ॐ नमो आदेश गुरु को,
काली के पूत, वीर भैरव!
लाल मुख, विकराल आंखें, हाथ में लाठी, कमर में जंजीर।
चल-चल रे भैरव, अमुक (रोगी का नाम लें) के शरीर से भूत बांध, प्रेत बांध।
जिन्न बांध, खबीस बांध, सवा सौ कबीला बांध।
अघोरी बांध, मसान बांध, लगी-पराई की धार बांध।
न बांधे तो तुझे तेरी माता का दूध हराम,
राजा रामचंद्र की आन, गुरु गोरखनाथ की दुहाई।
शब्द सांचा, पिंड कांचा, फुरो मन्त्र ईश्वरो वाचा।"

प्रयोग की विधि (झाड़ा देने का तरीका)

इस मंत्र का प्रयोग केवल मंत्र पढ़ने तक सीमित नहीं है, इसे क्रिया के साथ किया जाता है:
• मोर पंख का झाड़ा: मोर के पंखों का एक गुच्छा (मुट्ठा) लें। मंत्र को पढ़ते हुए पीड़ित व्यक्ति के सिर से पैर तक जोर-जोर से झाड़ें। ऐसा कम से कम 21 बार करें।
• भभूत (राख) का प्रयोग: किसी प्राचीन भैरव मंदिर की भभूत या धूप की राख लें। मंत्र पढ़ते हुए उस पर फूंक मारें (अभिमंत्रित करें) और पीड़ित के माथे पर तिलक लगाएं और थोड़ी सी भभूत पानी में मिलाकर पिला दें।
• लौंग का उतारा: 7 साबुत लौंग लें। मंत्र पढ़ते हुए रोगी के सिर से 7 बार वारें और उन्हें जलते हुए अंगारों (कंडे) पर डाल दें। यदि लौंग जलने पर तेज गंध न आए, तो समझें कि बाधा जल रही है।

उतारने का विशेष टोटका

जब भूत-प्रेत समूह में हों, तो केवल झाड़ा काफी नहीं होता। इसके लिए 'चौराहे का भोग' अनिवार्य है:
1. सामग्री: मिट्टी का एक सकोरा (मिट्टी की कटोरी), उसमें थोड़ा सा सिंदूर, कच्चा कोयला, और एक सवा रुपए या एक रुपये का सिक्का।
2. क्रिया: मंत्र पढ़ते हुए उस सकोरे को पीड़ित के ऊपर से 7 बार उतारें।
3. विसर्जन: इसे रात के समय किसी सुनसान चौराहे पर चुपचाप रख आएं। पीछे मुड़कर बिल्कुल न देखें।
4. सुरक्षा और सावधानी (अनिवार्य)
चूंकि यह मंत्र बहुत उग्र है, इसलिए साधक को खुद की सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिए:
• स्वयं का कीलन: साधना शुरू करने से पहले अपनी उंगली से अपने चारों ओर जमीन पर एक घेरा (Circle) खींचते हुए इस मंत्र को 3 बार पढ़ें:

"ॐ नमो आदेश गुरु को,
बजरंग का कोठा, भैरव की खाई,
राजा राम की कार (रेखा) फिराई।
कहाँ गया वो कबीला, कहाँ गया वो रथ?
हनुमान की गदा पड़ें, काल भैरव का दण्ड चलें।
मेरे तन की रक्षा करें, बाबा बटुक नाथ।
दुहाई महादेव की, दुहाई गौरा पार्वती की।"

• निडरता: प्रेत बाधा के दौरान वह शक्ति डराने की कोशिश कर सकती है या अजीब आवाजें निकाल सकती है। बाबा भैरव के नाम पर अडिग रहें।
• गुरु आज्ञा: यदि संभव हो, तो इस प्रकार के उग्र प्रयोग किसी अनुभवी सिद्ध व्यक्ति के मार्गदर्शन में ही करें।
भैरव जी की "आन" का महत्व
इस मंत्र में जो "आन" (शपथ) दी गई है, वह बहुत शक्तिशाली होती है। तांत्रिक भाषा में इसे "महाकाल की कसम" माना जाता है। इससे बड़ी से बड़ी नकारात्मक शक्ति (चाहे वह कितनी भी पुरानी क्यों न हो) को शरीर छोड़ना ही पड़ता है।

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