Jai Shree Balaji Maharaj

Jai Shree Balaji Maharaj जय बालाजी महाराज हम सबके प्यारे बालाज?

01/02/2026

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12/09/2025

*श्राद्ध से सम्बन्धित महत्वपूर्ण जानकारी*

✍ *पितृपक्ष में पितरों को यह आशा रहती है कि हमारे पुत्र-पौत्रादि हमें अन्न-जल से संतुष्ट करेंगे; यही आशा लेकर वे पितृलोक से पृथ्वीलोक पर आते हैं लेकिन जो लोग–पितर हैं ही कहां? –यह मानकर उचित तिथि पर जल व शाक से भी श्राद्ध नहीं करते हैं, उनके पितर दु:खी व निराश होकर शाप देकर अपने लोक वापिस लौट जाते हैं और बाध्य होकर श्राद्ध न करने वाले अपने सगे-सम्बधियों का रक्त चूसने लगते हैं। फिर इस अभिशप्त परिवार को जीवन भर कष्ट-ही-कष्ट झेलना पड़ता है और मरने के बाद नरक में जाना पड़ता है।*

✍ धार्मिक शास्त्रीय मान्यता के अनुसार, पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनके तर्पण के निमित्त श्राद्ध किया जाता है। यहां श्राद्ध का अर्थ श्रद्धा पूर्वक अपने पितरों के प्रति सम्मान प्रकट करने से है। हिंदू धर्म में श्राद्ध का विशेष महत्व होता है। आइए जानते हैं श्राद्ध पक्ष से जुड़ी हर वो जरूरी बात जिसे आपको जानना चाहिए।

*श्राद्ध किसे कहते हैं?

✍ *श्राद्ध का अर्थ श्रद्धा पूर्वक अपने पितरों को प्रसन्न करने से है। सनातन मान्यता के अनुसार जो परिजन अपना देह त्यागकर चले गए हैं, उनकी आत्मा की तृप्ति के लिए सच्ची श्रद्धा के साथ जो तर्पण किया जाता है, उसे श्राद्ध कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि मृत्यु के देवता यमराज श्राद्ध पक्ष में जीव को मुक्त कर देते हैं, ताकि वे स्वजनों के यहां जाकर तर्पण ग्रहण कर सकें।

*कौन कहलाते हैं पितर?

✍ *जिस किसी के परिजन चाहे वह विवाहित हो या अविवाहित हों, बच्चा हो या बुजुर्ग, स्त्री हो या पुरुष उनकी मृत्यु हो चुकी है उन्हें पितर कहा जाता है। पितृपक्ष में मृत्युलोक से पितर पृथ्वी पर आते है और अपने परिवार के लोगों को आशीर्वाद देते हैं। पितृपक्ष में पितरों की आत्मा की शांति के लिए उनको तर्पण किया जाता है। पितरों के प्रसन्न होने पर घर पर सुख शान्ति आती है।

*कब बनता है पितृपक्ष का योग??

✍ *हिंदू धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व होता है। पितृपक्ष के 15 दिन पितरों को समर्पित होता है। शास्त्रों अनुसार श्राद्ध पक्ष भाद्रपक्ष की पूर्णिणा से आरम्भ होकर आश्विन मास की अमावस्या तक चलते हैं। भाद्रपद पूर्णिमा को उन्हीं का श्राद्ध किया जाता है जिनका निधन वर्ष की किसी भी पूर्णिमा को हुआ हो। शास्त्रों मे कहा गया है कि साल के किसी भी पक्ष में, जिस तिथि को परिजन का देहांत हुआ हो उनका श्राद्ध कर्म उसी तिथि को करना चाहिए।

*जब याद ना हो श्राद्ध की तिथि

✍ *पितृपक्ष में पूर्वजों का स्मरण और उनकी पूजा करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है। जिस तिथि पर हमारे परिजनों की मृत्यु होती है उसे श्राद्ध की तिथि कहते हैं। बहुत से लोगों को अपने परिजनों की मृत्यु की तिथि याद नहीं रहती ऐसी स्थिति में शास्त्रों में इसका भी निवारण बताया गया है।

✍ *शास्त्रों के अनुसार यदि किसी को अपने पितरों के देहावसान की तिथि मालूम नहीं है तो ऐसी स्थिति में आश्विन अमावस्या को तर्पण किया जा सकता है। इसलिये इस अमावस्या को सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है। इसके अलावा यदि किसी की अकाल मृत्यु हुई हो तो उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को किया जाता है। ऐसे ही पिता का श्राद्ध अष्टमी और माता का श्राद्ध नवमी तिथि को करने की मान्यता है।*

*क्या है पौराणिक कथा*

✍ *कहा जाता है कि जब महाभारत के युद्ध में दानवीर कर्ण का निधन हो गया और उनकी आत्मा स्वर्ग पहुंच गई, तो उन्हें नियमित भोजन की बजाय खाने के लिए सोना और गहने दिए गए। इस बात से निराश होकर कर्ण की आत्मा ने इंद्र देव से इसका कारण पूछा। तब इंद्र ने कर्ण को बताया कि आपने अपने पूरे जीवन में सोने के आभूषणों को दूसरों को दान किया लेकिन कभी भी अपने पूर्वजों को नहीं दिया।*

✍ *तब कर्ण ने उत्तर दिया कि वह अपने पूर्वजों के बारे में नहीं जानता है और उसे सुनने के बाद, भगवान इंद्र ने उसे 15 दिनों की अवधि के लिए पृथ्वी पर वापस जाने की अनुमति दी ताकि वह अपने पूर्वजों को भोजन दान कर सके। इसी 15 दिन की अवधि को पितृ पक्ष के रूप में जाना जाता है।*

*श्राद्ध की वस्तुएं पितरों को कैसे मिलती हैं?*

*श्राद्ध का अर्थ : - ‘श्रद्धया दीयते यत् तत् श्राद्धम्।’*

✍ *‘श्राद्ध’ का अर्थ है श्रद्धा से जो कुछ दिया जाए। पितरों के लिए श्रद्धापूर्वक किए गए पदार्थ-दान (हविष्यान्न, तिल, कुश, जल के दान) का नाम ही श्राद्ध है। श्राद्धकर्म पितृऋण चुकाने का सरल व सहज मार्ग है। पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पितरगण वर्षभर प्रसन्न रहते हैं।*

✍ *श्राद्ध-कर्म से व्यक्ति केवल अपने सगे-सम्बन्धियों को ही नहीं, बल्कि ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यन्त सभी प्राणियों व जगत को तृप्त करता है। पितरों की पूजा को साक्षात् विष्णुपूजा ही माना गया है।*

✍ *प्राय: कुछ लोग यह शंका करते हैं कि श्राद्ध में समर्पित की गईं वस्तुएं पितरों को कैसे मिलती है? कर्मों की भिन्नता के कारण मरने के बाद गतियां भी भिन्न-भिन्न होती हैं–कोई देवता, कोई पितर, कोई प्रेत, कोई हाथी, कोई चींटी, कोई वृक्ष और कोई तृण बन जाता है। तब मन में यह शंका होती है कि छोटे से पिण्ड से अलग-अलग योनियों में पितरों को तृप्ति कैसे मिलती है? इस शंका का स्कन्दपुराण में बहुत सुन्दर समाधान मिलता है।*

✍ *एक बार राजा करन्धम ने महायोगी महाकाल से पूछा–’मनुष्यों द्वारा पितरों के लिए जो तर्पण या पिण्डदान किया जाता है तो वह जल, पिण्ड आदि तो यहीं रह जाता है फिर पितरों के पास वे वस्तुएं कैसे पहुंचती हैं और कैसे पितरों को तृप्ति होती है?’*

✍ *भगवान महाकाल ने बताया कि–विश्वनियन्ता ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि श्राद्ध की सामग्री उनके अनुरुप होकर पितरों के पास पहुंचती है। इस व्यवस्था के अधिपति हैं अग्निष्वात आदि। पितरों और देवताओं की योनि ऐसी है कि वे दूर से कही हुई बातें सुन लेते हैं, दूर की पूजा ग्रहण कर लेते हैं और दूर से कही गयी स्तुतियों से ही प्रसन्न हो जाते हैं।*

*वे भूत, भविष्य व वर्तमान सब जानते हैं और सभी जगह पहुंच सकते हैं। पांच तन्मात्राएं, मन, बुद्धि, अहंकार और प्रकृति–इन नौ तत्वों से उनका शरीर बना होता है और इसके भीतर दसवें तत्व के रूप में साक्षात् भगवान पुरुषोत्तम उसमें निवास करते हैं। इसलिए देवता और पितर गन्ध व रसतत्व से तृप्त होते हैं। शब्दतत्व से रहते हैं और स्पर्शतत्व को ग्रहण करते हैं। पवित्रता से ही वे प्रसन्न होते हैं और वर देते हैं।*

*पितरों का आहार है अन्न-जल का सारतत्व!!!!*

✍ *जैसे मनुष्यों का आहार अन्न है, पशुओं का आहार तृण है, वैसे ही पितरों का आहार अन्न का सार-तत्व (गंध और रस) है। अत: वे अन्न व जल का सारतत्व ही ग्रहण करते हैं। शेष जो स्थूल वस्तु है, वह यहीं रह जाती है।*

*किस रूप में पहुंचता है पितरों को आहार ?*

✍ *नाम व गोत्र के उच्चारण के साथ जो अन्न-जल आदि पितरों को दिया जाता है, विश्वेदेव एवं अग्निष्वात (दिव्य पितर) हव्य-कव्य को पितरों तक पहुंचा देते हैं। यदि पितर देवयोनि को प्राप्त हुए हैं तो यहां दिया गया अन्न उन्हें ‘अमृत’ होकर प्राप्त होता है। यदि गन्धर्व बन गए हैं तो वह अन्न उन्हें भोगों के रूप में प्राप्त होता है।*

✍ *यदि पशुयोनि में हैं तो वह अन्न तृण के रूप में प्राप्त होता है। नागयोनि में वायुरूप से, यक्षयोनि में पानरूप से, राक्षसयोनि में आमिषरूप में, दानवयोनि में मांसरूप में, प्रेतयोनि में रुधिररूप में और मनुष्य बन जाने पर भोगने योग्य तृप्तिकारक पदार्थों के रूप में प्राप्त होता हैं।*

✍ *जिस प्रकार बछड़ा झुण्ड में अपनी मां को ढूंढ़ ही लेता है, उसी प्रकार नाम, गोत्र, हृदय की भक्ति एवं देश-काल आदि के सहारे दिए गए पदार्थों को मन्त्र पितरों के पास पहुंचा देते हैं। जीव चाहें सैकड़ों योनियों को भी पार क्यों न कर गया हो, तृप्ति तो उसके पास पहुंच ही जाती है।*

*श्रीराम द्वारा श्राद्ध में आमन्त्रित ब्राह्मणों में सीताजी ने किए राजा दशरथ व पितरों के दर्शन!*

✍ *श्राद्ध में आमन्त्रित ब्राह्मण पितरों के प्रतिनिधिरूप होते हैं। एक बार पुष्कर में श्रीरामजी अपने पिता दशरथजी का श्राद्ध कर रहे थे। रामजी जब ब्राह्मणों को भोजन कराने लगे तो सीताजी वृक्ष की ओट में खड़ी हो गयीं। ब्राह्मण-भोजन के बाद रामजी ने जब सीताजी से इसका कारण पूछा तो वे बोलीं–*

✍ *‘मैंने जो आश्चर्य देखा, उसे आपको बताती हूँ। आपने जब नाम-गोत्र का उच्चारणकर अपने पिता-दादा आदि का आवाहन किया तो वे यहां ब्राह्मणों के शरीर में छायारूप में सटकर उपस्थित थे। ब्राह्मणों के शरीर में मुझे अपने श्वसुर आदि पितृगण दिखाई दिए फिर भला मैं मर्यादा का उल्लंघनकर वहां कैसे खड़ी रहती; इसलिए मैं ओट में हो गई।’*

*श्राद्ध में तुलसी की महिमा१!!!!!!*

✍ *तुलसी से पिण्डार्चन किए जाने पर पितरगण प्रलयपर्यन्त तृप्त रहते हैं। तुलसी की गंध से प्रसन्न होकर गरुड़ पर आरुढ़ होकर विष्णुलोक चले जाते हैं।*

*पितर प्रसन्न तो सभी देवता प्रसन्न!!!!!*

✍ *श्राद्ध से बढ़कर और कोई कल्याणकारी कार्य नहीं है और वंशवृद्धि के लिए तो पितरों की आराधना ही एकमात्र उपाय है—*

आयु: पुत्रान् यश: स्वर्ग कीर्तिं पुष्टिं बलं श्रियम्।
पशुन् सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात्।। (यमस्मृति, श्राद्धप्रकाश)

*यमराजजी का कहना है कि–*

–श्राद्ध-कर्म से मनुष्य की आयु बढ़ती है।
–पितरगण मनुष्य को पुत्र प्रदान कर वंश का विस्तार करते हैं।

–परिवार में धन-धान्य का अंबार लगा देते हैं।
–श्राद्ध-कर्म मनुष्य के शरीर में बल-पौरुष की वृद्धि करता है और यश व पुष्टि प्रदान करता है।

–पितरगण स्वास्थ्य, बल, श्रेय, धन-धान्य आदि सभी सुख, स्वर्ग व मोक्ष प्रदान करते हैं।

–श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करने वाले के परिवार में कोई क्लेश नहीं रहता वरन् वह समस्त जगत को तृप्त कर देता है।

*श्राद्ध न करने से होने वाली हानि????*

✍ *शास्त्रों में श्राद्ध न करने से होने वाली हानियों का जो वर्णन किया गया है, उन्हें जानकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। शास्त्रों में मृत व्यक्ति के दाहकर्म के पहले ही पिण्ड-पानी के रूप में खाने-पीने की व्यवस्था कर दी गयी है। यह तो मृत व्यक्ति की इस महायात्रा में रास्ते के भोजन-पानी की बात हुई। परलोक पहुंचने पर भी उसके लिए वहां न अन्न होता है और न पानी। यदि सगे-सम्बन्धी भी अन्न-जल न दें तो भूख-प्यास से उसे वहां बहुत ही भयंकर दु:ख होता है।*

✍ *आश्विनमास के पितृपक्ष में पितरों को यह आशा रहती है कि हमारे पुत्र-पौत्रादि हमें अन्न-जल से संतुष्ट करेंगे; यही आशा लेकर वे पितृलोक से पृथ्वीलोक पर आते हैं लेकिन जो लोग–पितर हैं ही कहां?–यह मानकर उचित तिथि पर जल व शाक से भी श्राद्ध नहीं करते हैं, उनके पितर दु:खी व निराश होकर शाप देकर अपने लोक वापिस लौट जाते हैं और बाध्य होकर श्राद्ध न करने वाले अपने सगे-सम्बधियों का रक्त चूसने लगते हैं। फिर इस अभिशप्त परिवार को जीवन भर कष्ट-ही-कष्ट झेलना पड़ता है और मरने के बाद नरक में जाना पड़ता है।*

✍ *मार्कण्डेयपुराण में बताया गया है कि जिस कुल में श्राद्ध नहीं होता है, उसमें दीर्घायु, नीरोग व वीर संतान जन्म नहीं लेती है और परिवार में कभी मंगल नहीं होता है।*

*धन के अभाव में कैसे करें श्राद्ध?*

✍ *ब्रह्मपुराण में बताया गया है कि धन के अभाव में श्रद्धापूर्वक केवल शाक से भी श्राद्ध किया जा सकता है। यदि इतना भी न हो तो अपनी दोनों भुजाओं को उठाकर कह देना चाहिए कि मेरे पास श्राद्ध के लिए न धन है और न ही कोई वस्तु। अत: मैं अपने पितरों को प्रणाम करता हूँ; वे मेरी भक्ति से ही तृप्त हों।*

✍ *पितृपक्ष पितरों के लिए पर्व का समय है, अत: प्रत्येक गृहस्थ को अपनी शक्ति व सामर्थ्य के अनुसार पितरों के निमित्त श्राद्ध व तर्पण अवश्य करना चाहिए।*
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🚩 पितृ पक्ष
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प्रबुद्ध पाठको से अनुरोध हैं कि समय और साधन निकाल कर अपने पितरों का श्राद्ध, तर्पण अवश्य करिए.

आप अगर आचार्यों द्वारा ना भी करवा पाए तो भी चलेगा आप स्वयं अपने देश काल लोकमत के हिसाब से पितरों की कृपा पा सकते हैं

आगे मैं आपको पितृ दोष संबंधित सहज सरल उपाय भी बताऊंगा जिसको करके आप अपने पितृ ऋण से मुक्त हो सकते हैं

विशेष = किसी कारणवश तिथि विशेष पर श्राद्ध न कर पाने अथवा पिता की मृत्यु की तिथि की जानकारी न होने के कारण उन सभी पितरो का श्राद्ध पितृ पक्ष की अमावस्या को किया जाता है। इस दिन श्री विष्णु भगवान की प्रियता हेतु ब्राह्मण भोजन भी कराया जाता है।

🚩हिंदू शास्त्रों में #श्राद्ध के बारे में क्या कहा है- करना चाहिए या नहीं ?

🚩श्राद्धकर्म से देवता और पितर तृप्त होते हैं और श्राद्ध करनेवाले का अंतःकरण भी तृप्ति-संतुष्टि का अनुभव करता है। बूढ़े-बुजुर्गों ने हमारी उन्नति के लिए बहुत कुछ किया है तो उनकी सद्गति के लिए हम भी कुछ करेंगे तो हमारे हृदय में भी तृप्ति-संतुष्टि का अनुभव होगा।

🚩औरंगजेब ने अपने पिता शाहजहाँ को कैद कर दिया था तब शाहजहाँ ने अपने बेटे को लिख भेजाः "धन्य हैं हिन्दू जो अपने मृतक माता-पिता को भी खीर और हलुए-पूरी से तृप्त करते हैं और तू जिन्दे बाप को भी एक पानी की मटकी तक नहीं दे सकता? तुझसे तो वे हिन्दू अच्छे, जो मृतक माता-पिता की भी सेवा कर लेते हैं।"

🚩गरुड़ पुराण में महिमा:

कुर्वीत समये श्राद्धं कुले कश्चिन्न सीदति।
आयुः पुत्रान् यशः स्वर्गं कीर्तिं पुष्टिं बलं श्रियम्।।

पशून् सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात्।
देवकार्यादपि सदा पितृकार्यं विशिष्यते।।
देवताभ्यः पितृणां हि पूर्वमाप्यायनं शुभम्।

🚩"समयानुसार श्राद्ध करने से कुल में कोई दुःखी नहीं रहता। पितरों की पूजा करके मनुष्य आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुष्टि, बल, श्री, पशु, सुख और धन-धान्य प्राप्त करता है। देवकार्य से भी पितृकार्य का विशेष महत्त्व है। देवताओं से पहले पितरों को प्रसन्न करना अधिक कल्याणकारी है।"
(10.57-59)

🚩"अमावस्या के दिन पितृगण वायुरूप में घर के दरवाजे पर उपस्थित रहते हैं और अपने स्वजनों से श्राद्ध की अभिलाषा करते हैं। जब तक सूर्यास्त नहीं हो जाता, तब तक वे भूख-प्यास से व्याकुल होकर वहीं खड़े रहते हैं। सूर्यास्त हो जाने के पश्चात वे निराश होकर दुःखित मन से अपने-अपने लोकों को चले जाते हैं। अतः अमावस्या के दिन प्रयत्नपूर्वक श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। यदि पितृजनों के पुत्र तथा बन्धु-बान्धव उनका श्राद्ध करते हैं और गया-तीर्थ में जाकर इस कार्य में प्रवृत्त होते हैं तो वे उन्हीं पितरों के साथ ब्रह्मलोक में निवास करने का अधिकार प्राप्त करते हैं। उन्हें भूख-प्यास कभी नहीं लगती। इसीलिए विद्वान को प्रयत्नपूर्वक यथाविधि शाकपात से भी अपने पितरों के लिए श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।*

🚩भगवान विष्णु गरूड़ से कहते हैं- जो लोग अपने पितृगण, देवगण, ब्राह्मण तथा अग्नि की पूजा करते हैं, वे सभी प्राणियों की अन्तरात्मा में समाविष्ट मेरी ही पूजा करते हैं। शक्ति के अनुसार विधिपूर्वक श्राद्ध करके मनुष्य ब्रह्मपर्यंत समस्त चराचर जगत को प्रसन्न कर देता है।

🚩हे आकाशचारिन् गरूड़ ! पिशाच योनि में उत्पन्न हुए पितर मनुष्यों के द्वारा श्राद्ध में पृथ्वी पर जो अन्न बिखेरा जाता है उससे संतृप्त होते हैं। श्राद्ध में स्नान करने से भीगे हुए वस्त्रों द्वारा जो जल पृथ्वी पर गिरता है, उससे वृक्ष योनि को प्राप्त हुए पितरों की संतुष्टि होती है। उस समय जो गन्ध तथा जल भूमि पर गिरता है, उससे देव योनि को प्राप्त पितरों को सुख प्राप्त होता है। जो पितर अपने कुल से बहिष्कृत हैं, क्रिया के योग्य नहीं हैं, संस्कारहीन और विपन्न हैं, वे सभी श्राद्ध में विकिरान्न और मार्जन के जल का भक्षण करते हैं। श्राद्ध में भोजन करने के बाद आचमन एवं जलपान करने के लिए ब्राह्मणों द्वारा जो जल ग्रहण किया जाता है, उस जल से पितरों को संतृप्ति प्राप्त होती है। जिन्हें पिशाच, कृमि और कीट की योनि मिली है तथा जिन पितरों को मनुष्य योनि प्राप्त हुई है, वे सभी पृथ्वी पर श्राद्ध में दिये गये पिण्डों में प्रयुक्त अन्न की अभिलाषा करते हैं, उसी से उन्हें संतृप्ति प्राप्त होती है।

🚩इस प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्यों के द्वारा विधिपूर्वक श्राद्ध किये जाने पर जो शुद्ध या अशुद्ध अन्न, जल फेंका जाता है, उससे उन पितरों की तृप्ति होती है जिन्होंने अन्य जाति में जाकर जन्म लिया है। जो मनुष्य अन्यायपूर्वक अर्जित किये गये पदार्थों के श्राद्ध करते हैं, उस श्राद्ध से नीच योनियों में जन्म ग्रहण करने वाले चाण्डाल पितरों की तृप्ति होती है।

🚩हे पक्षिन् ! इस संसार में श्राद्ध के निमित्त जो कुछ भी अन्न, धन आदि का दान अपने बन्धु-बान्धवों के द्वारा किया जाता है, वह सब पितरों को प्राप्त होता है। अन्न, जल और शाकपात आदि के द्वारा यथासामर्थ्य जो श्राद्ध किया जाता है, वह सब पितरों की तृप्ति का हेतु है। -गरूड़ पुराण

🚩श्राद्घ नहीं कर सकते हैं तो...

अगर पंडित से श्राद्ध नहीं करा पाते तो सूर्य नारायण के आगे अपने बगल खुले करके (दोनों हाथ ऊपर करके) बोलें :*
हे सूर्य नारायण ! मेरे पिता (नाम), अमुक (नाम) का बेटा, अमुक जाति (नाम), अमुक गोत्र (अगर जाति, कुल, गोत्र नहीं याद तो ब्रह्म गोत्र बोल दें) को आप संतुष्ट/सुखी रखें। इस निमित्त मैं आपको अर्घ्य व भोजन कराता हूँ।” ऐसा करके आप सूर्य भगवान को अर्घ्य दें और भोग लगाएं।

🚩श्राद्ध पक्ष में रोज भगवद्गीता के सातवें अध्याय का पाठ और 1 माला द्वादश मंत्र ”ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” और 1 माला "ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधादेव्यै स्वाहा" की करनी चाहिए और उस पाठ एवं माला का फल नित्य अपने पितृ को अर्पण करना चाहिए।

🚩 पितृ दोष लगने के कारण 🚩


👉इन 16 कारणों से लगता है पितृ दोष...!

प्रत्येक मनुष्य की इच्छा रहती है कि वह एवं उसका परिवार सुखी एवं संपन्न रहे । मनुष्य को अपनी इस इच्छा को पूरा करने के लिए देवी - देवताओं के साथ - साथ अपने पितरों का भी पूजन करना चाहिए ।

👉आइए जानते हैं... पितृ दोष क्यों , कैसे तथा कब होता है...?

👉1. पितरों का विधिवत संस्कार श्राद्ध न होना ।

👉2. पितरों की विस्मृति या अपमान करना ।

👉3. धर्म विरुद्ध आचरण करना ।

👉4. वृक्ष फल लदे हुए,पीपल,बेल,वट वृक्ष इत्यादि कटवाना ।

👉5.नाग की हत्या करना,कराना या उसकी मृत्यु का कारण बनना ।

👉6.गौहत्या या गौ का अपमान करना ।

👉7. नदी,कूप,तड़ाग या पवित्र स्थान पर मल-मूत्र विसर्जन करना ।

👉8. कुल देवता,देवी,इत्यादि की विस्मृति या अपमान करना ।

👉9.पवित्र स्थल पर गलत कार्य करना ।

👉10.पूर्णिमा,अमावस्या या पवित्र तिथि को संभोग करना ।

👉11. पूज्य स्त्री के साथ संबंध बनाना ।

👉12. निचले कुल में विवाह संबंध करना ।

👉13.पराई स्त्रियों से संबंध बनाना ।

👉14. गर्भपात करना-कराना या किसी जीव की हत्या करना या कारण बनना ।

👉15. कुल की स्त्रियों का अमर्यादित होना ।

👉16. पूज्य व्यक्तियों का अपमान करना इत्यादि और भी कई कारण हैं ।

इन उपरोक्त दोषों से बचाव कर सुखी और सम्पन्न जीवन जिआ जा सकता है।

-।| ॐ पित्रेभ्यो नमः |।-

श्राद्ध न करनेसे हानिअपने शास्त्रने श्राद्ध न करनेसे होनेवाली जो हानि बतायी है, उसे जानकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। अतः श...
12/09/2025

श्राद्ध न करनेसे हानि

अपने शास्त्रने श्राद्ध न करनेसे होनेवाली जो हानि बतायी है, उसे जानकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। अतः श्राद्ध-तत्त्वसे परिचित होना तथा उसके अनुष्ठानके लिये तत्पर रहना अत्यन्त आवश्यक है। यह सर्वविदित है कि मृत व्यक्ति इस महायात्रामें अपना स्थूल शरीर भी नहीं ले जा सकता है तब पाथेय (अन्न-जल) कैसे ले जा सकता है? उस समय उसके सगे-सम्बन्धी श्राद्धविधिसे उसे जो कुछ देते हैं, वही उसे मिलता है। शास्त्रने मरणोपरान्त पिण्डदानकी व्यवस्था की है। सर्वप्रथम शवयात्राके अन्तर्गत छः पिण्ड दिये जाते हैं, जिनसे भूमिके अधिष्ठातृ देवताओंकी प्रसन्नता तथा भूत-पिशाचोंद्वारा होनेवाली बाधाओंका निराकरण आदि प्रयोजन सिद्ध होते हैं। इसके साथ ही दशगात्रमें दिये जानेवाले दस पिण्डोंके द्वारा जीवको आतिवाहिक सूक्ष्म शरीरकी प्राप्ति होती है। यह मृत व्यक्तिकी महायात्राके प्रारम्भकी बात हुई। अब आगे उसे पाथेय (रास्तेके भोजन- अन्न-जल आदि) की आवश्यकता पड़ती है, जो उत्तमषोडशीमें दिये जानेवाले पिण्डदानसे उसे प्राप्त होता है। यदि सगे-सम्बन्धी, पुत्र-पौत्रादि न दें तो भूख-प्याससे उसे वहाँ बहुत दारुण दुःख होता है।

श्राद्ध न करनेवालेको कष्ट

यह तो हुई श्राद्ध न करनेसे मृत प्राणीके कष्टोंकी कथा। श्राद्ध न करनेवालेको भी पग-पगपर कष्टका सामना करना पड़ता है। मृत प्राणी बाध्य होकर श्राद्ध न करनेवाले अपने सगे-सम्बन्धियोंका रक्त चूसने लगता है-

श्राद्धं न कुरुते मोहात् तस्य रक्तं पिबन्ति ते। (ब्रह्मपुराण)

साथ-ही-साथ वे शाप भी देते हैं-

पितरस्तस्य शापं दत्त्वा प्रयान्ति च। (नागरखण्ड)

फिर इस अभिशप्त परिवारको जीवनभर कष्ट-ही-कष्ट झेलना पड़ता है। उस परिवारमें पुत्र नहीं उत्पन्न होता, कोई नीरोग नहीं रहता, लम्बी आयु नहीं होती, किसी तरह कल्याण नहीं प्राप्त होता और मरनेके बाद में नरक भी जाना पड़ता है।

उपनिषद् में भी कहा गया है कि

'देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्' (तै०उप० १।११।१)।

अर्थात् देवता तथा पितरोंके कार्योंमें मनुष्यको कदापि प्रमाद नहीं करना चाहिये। प्रमादसे प्रत्यवाय होता है।

(इसीलिये श्राद्ध जरूर करने चाहिये)

12/09/2025

अपने वंशजों से क्या चाहते हैं पितर,पितृ गीत भावार्थ सहित!!!!!!

विष्णुपुराण में पितरों के द्वारा कहे गये वे श्लोक हैं जो ‘पितृ गीत’ के नाम से जाने जाते हैं।

इस गीत से पता लगता है कि पितरगण अपने वंशजों(संतानों)से पिण्ड-जल और नमस्कार आदि पाने के लिए
कितने लालायित रहते हैं।

पितृ यानी मरे हुए जीव अपने वंशजों द्वारा दिए गए पिण्डदान से ही अपना शरीर बना हुआ अनुभव करते हैं।

यह अनुभूति ही पितरों की अपने वंशजों से भावनात्मक लगाव की परिचायक है।

कूर्मपुराण के अनुसार पितर अपने पूर्व गृह यह जानने के लिए आते हैं कि उनके परिवार के लोग उन्हें विस्मृत तो नहीं कर चुके हैं।

इस पितृ गीत का सार यह है कि मनुष्य को अपनी शक्ति व सामर्थ्यानुसार पितरों के उद्देश्य से अन्न,फल,जल,फूल आदि
कुछ-न-कुछ अवश्य अर्पण करना चाहिए।

जिनको भगवान ने सम्पत्ति दी है,उनको तो दिल खोल कर पितरों की तृप्ति के लिए श्राद्ध व दान करना चाहिए।

जिनकी आय सीमित है उनको भी परलोक में पितरों को सुख पहुंचाने के लिए स्वयं कष्ट सहकर श्राद्ध-तर्पण आदि करना चाहिए।

जो लोग अपने मृत माता-पिता और प्रियजनों को भूल जाते हैं और श्राद्ध के माध्यम से पितृपक्ष में उन्हें याद नहीं करते हैं, उनके लिए कुछ भी नहीं करते हैं, उनके पितर दु:खी व निराश होकर शाप देकर अपने लोक वापिस लौट जाते हैं फिर इस अभिशप्त परिवार को जीवन भर कष्ट-ही-कष्ट झेलना पड़ता है और मरने के बाद नरक में जाना पड़ता है।

मार्कण्डेयपुराण में बताया गया है कि जिस कुल में श्राद्ध नहीं होता है, उसमें दीर्घायु, नीरोग व वीर संतान जन्म नहीं लेती है और परिवार में कभी मंगल नहीं होता है ।

यदि परिजन श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करते हैं तो पितर उन्हें आशीर्वाद देकर अपने लोक चले जाते हैं । श्राद्ध से बढ़कर और कोई कल्याणकारी कार्य नहीं है और वंशवृद्धि के लिए तो पितरों की आराधना ही एकमात्र उपाय है । परिवार में किसी संतान का जन्म होने वाला हो तो पितर अच्छी आत्माओं को संतान रूप में भेजने में सहयोग करते हैं, पितरगण हमारी मदद करते हैं, प्रेरणा देते है, प्रकाश देते हैं, तथा आनन्द और शान्ति देते हैं।

पितृ गीत (हिन्दी अर्थ सहित)!!!!!!!!

अपि धन्य: कुले जायादस्माकं मतिमान्नार: ।
अकुर्वन्वित्तशाठ्यं य: पिण्डान्नो निर्वपिष्यति ।।

अर्थात्—पितृगण कहते हैं—हमारे कुल में भी क्या कोई ऐसा बुद्धिमान, धन्य पुरुष पैदा होगा जो धन के लोभ को छोड़कर हमें पिण्डदान करेगा ।

रत्नं वस्त्रं महायानं सर्वभोगादिकं वसु ।
विभवे सति विप्रेभ्यो योऽस्मानुद्दिश्य दास्यति।।

अर्थात्—जो प्रचुर सम्पत्ति का स्वामी होने पर हमारे लिए ब्राह्मणों को बढ़िया-बढ़िया रत्न, वस्त्र, सवारियां और सब प्रकार की भोग-सामग्री देगा ।

अन्नं न वा यथाशक्त्या कालेऽस्मिन्भक्तिनम्रधो:।
भोजयिष्यति विप्राग्रयांस्तन्मात्रविभवो नर: ।।

अर्थात्—बड़ी सम्पत्ति न होगी, केवल खाने-पहनने लायक होगी तो जो श्राद्ध के समय भक्ति के साथ विनम्र बुद्धि से श्रेष्ठ ब्राह्मणों को शक्ति भर भोजन ही करा देगा ।

असमर्थोऽन्नदानस्य धान्यमामं स्वशक्तित: ।
प्रदास्यतिद्विजाग्येभ्य: स्वल्पाल्पां वापि दक्षिणाम् ।।

अर्थात्—भोजन कराने में भी असमर्थ होने पर जो श्रेष्ठ ब्राह्मणों को कच्चा धान और थोड़ी सी दक्षिणा ही दे देगा ।

तत्राप्यसामर्थ्ययुत: कराग्राग्रस्थितांस्तिलान् ।
प्रणम्य द्विजमुख्याय कस्मैचिद्भूप दास्यति ।।

अर्थात्—यदि इसमें भी असमर्थ होगा तो किन्हीं श्रेष्ठ ब्राह्मण को एक मुट्ठी तिल ही दे देगा ।

तिलैस्सप्ताष्टभिर्वापि समवेतं जलांजलिम् ।
भक्तिनम्रस्समुद्दिश्य भुव्यस्माकं प्रदास्यति ।।

अर्थात्—अथवा हमारे उद्देश्य से भक्तिपूर्वक विनम्र-चित्त से सात-आठ तिल से युक्त जल की अंजलि ही दे देगा ।

यत: कुतश्चित्सम्प्राप्य गोभ्यो वापि गवाह्निकम्।
अभावे प्रोणयन्नस्मांछ्रद्धायुक्त: प्रदास्यति ।।

अर्थात्—इसका भी अभाव होगा तो कहीं से एक दिन का चारा ही लाकर प्रेम और श्रद्धापूर्वक हमारे लिए गौ को खिला देगा ।

सर्वाभावे वनं गत्वा कक्षमूलप्रदर्शक: ।
सूर्यादिलोकपालानामिदमुच्चैर्वदिष्यति ।।

अर्थात्—इन सभी वस्तुओं का अभाव होने पर जो वन में जाकर दोनों हाथ ऊंचे उठाकर कांख दिखाता हुआ पुकार कर सूर्य आदि लोकपालों से कहेगा कि—

न मेऽस्ति वित्तं धनं च नान्यंच्छ्राद्धोपयोग्यं स्वपितृन्नतोऽस्मि ।
तृप्यन्तु भक्त्यापितरो मयैतौ कृतौ भुजौ वर्त्मनि मारुतस्य ।।

अर्थात्—मेरे पास श्राद्ध के योग्य न वित्त है, न धन है, न कोई अन्य सामग्री है, अत: मैं अपने पितरों को नमस्कार करता हूँ । वे मेरी भक्ति से ही तृप्त हों । मैंने अपनी दोनों भुजायें दीनता से आकाश में उठा रखी हैं ।

इस प्रकार पितरों के प्रति श्रद्धाभाव ही उन्हें सबसे बड़ी तृप्ति प्रदान करता है ।
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12/09/2025

पितृ पूजा या पितर कर्म क्यों करना चाहिए ?

शास्त्रों में देवताओं के कार्य की अपेक्षा पितरों के कार्य को विशिष्ट माना गया है; इसलिए देवताओं की पूजा से पहले पितरों का कार्य करना चाहिए ।

पितरों के कार्य को ही ‘श्राद्ध कर्म’, ‘पितृ कर्म’, ‘पितृ पूजा’ या ‘पितर पूजा’ कहते हैं । पितरों के निमित्त तर्पण और श्राद्ध आदि करना ‘पितृ यज्ञ’ कहलाता है ।

यह ध्रुव सत्य है कि जीवन की समाप्ति मृत्यु से ही होती है । जीवात्मा इतना सूक्ष्म होता है कि जब वह शरीर से निकलता है, उस समय कोई भी मनुष्य अपने खुले नेत्रों से उसे देख नहीं सकता है । मनुष्य की मृत्यु के बाद उस प्राणी के उद्धार की जिम्मेदारी उसके पुत्र और पौत्रों की होती है । इसीलिए कहा गया है—‘पुं नाम नरकात् त्रायते इति पुत्र: ’ अर्थात् ‘नरक से जो रक्षा करता है, वही पुत्र है ।’ यदि पिता नरक में पहुंच गया है तो नरकों से उसका उद्धार (श्राद्ध तर्पण आदि द्वारा) करके पिता को सद्गति प्राप्त करा देना, पुत्र का कर्तव्य है; इसीलिए उसे ‘पुत्र’ कहा जाता है ।

पितृ पूजा या पितृ कर्म क्यों करने चाहिए ?

भारतीय संस्कृति में पितृ ऋण से मुक्त होने के लिए अपने माता-पिता तथा परिवार के अन्य मृत प्राणियों के निमित्त श्राद्ध करना अनिवार्य माना गया है । इसका कारण यह माना गया है कि—

सामान्य प्राणी से जीवन में पाप और पुण्य दोनों होते हैं । पुण्य का फल स्वर्ग और पाप का फल नरक माना गया है । स्वर्ग-नरक भोगने के बाद जीव पुन: संसार की भवाटवी अर्थात् चौरासी लाख योनियों में भटकने लगता है । उस समय पुण्यात्मा लोगों को मनुष्य योनि या देवयोनि मिलती है और पापात्मा जीव पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े आदि तिर्यक योनि प्राप्त करते हैं । मनुष्य की मृत्यु के बाद उस प्राणी के उद्धार के लिए पुत्र-पौत्रों का कर्तव्य होता है कि वे शास्त्रों में बताए गए कुछ ऐसे कर्म करें जिससे प्राणी को परलोक में या अन्य योनियों में भी सुख की प्राप्ति हो सके ।

शास्त्रों में मनुष्य का मरणकाल निकट आने पर उसके कल्याण के लिए विभिन्न प्रकार के दान आदि किए जाने वाले कर्मों का वर्णन मिलता है । साथ ही मृत्यु के बाद और्ध्वदैहिक संस्कार, पिण्ड दान, एकादशाह, सपिण्डीकरण, तर्पण, श्राद्ध आदि करने का विधान है ।

प्रश्न यह है कि मरे हुए जीव तो अपने कर्मानुसार शुभ-अशुभ गति को प्राप्त होते हैं; फिर श्राद्धकाल में वे अपने पुत्र के घर कैसे पहुंच जाते हैं—

इसका उत्तर यह है कि जो लोग यहां मरते हैं, उनमें से कितने ही इस लोक में जन्म ग्रहण करते हैं, कितने ही पुण्यात्मा स्वर्गलोक में निवास करते हैं और पापात्मा जीव यमलोक के निवासी हो जाते हैं । यमलोक या स्वर्गलोक में रहने वाले पितरों को भी तब तक भूख-प्यास अधिक होती है, जब तक कि वे माता या पिता से तीन पीढ़ी के अंतर्गत रहते हैं—जब तक वे श्राद्धकर्ता पुरुष के मातामह, प्रमातामह या वृद्धप्रमातामह और पिता, पितामह या प्रपितामह पद पर रहते हैं । तब तक श्राद्धभाग ग्रहण करने के लिए उनमें भूख-प्यास की अधिकता होती है।

जो पितर स्वर्गलोक में निवास करते हैं, वे भी वहां भूख-प्यास का अत्यंत कष्ट उठाते हैं; क्योंकि स्वर्ग में देवताओं को भूख-प्यास का कष्ट नहीं होता है । वहां कोई खाता-पीता नहीं दिखाई देता है । देवता तो अनेक प्रकार के भोगों से संपन्न होकर प्रसन्नचित्त रहते हैं । जब स्वर्गलोकवासी पितरों को भूख-प्यास का कष्ट सताता है तो वे नंदनवन के वृक्षों से फलों को तोड़ते हैं; परंतु फल वृक्ष की डाली से अलग ही नहीं होते हैं । प्यास से पीड़ित होकर जब वे देवनदी का जल हाथ में उठाते हैं तो उस जल का हाथ से स्पर्श ही नहीं होता है । इस प्रकार जिनके वंशज उनके लिए तर्पण या श्राद्ध नहीं करते, वे पितर चाहें स्वर्ग में रहें या यमलोक में; वे भूख-प्यास से व्याकुल रहते हैं ।

अमावस्या के दिन वंशजों से श्राद्ध और पिण्ड पाकर पितरों को एक मास तक तृप्ति बनी रहती है । पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पितरों को एक वर्ष तक तृप्ति रहती है और जो मनुष्य गया में जाकर एक बार भी श्राद्ध कर दे तो उसके सभी पितर सदा के लिए तृप्त हो जाते हैं।

श्राद्ध से केवल मनुष्य की और पितरों की ही संतुष्टि नहीं होती है; वरन् श्राद्ध करने वाला ब्रह्मा से लेकर तृण (घास-फूंस) तक समस्त सृष्टि को संतुष्ट कर देता है । श्राद्ध द्वारा तृप्त हुए पितर मनुष्य को मनोवांछित भोग प्रदान करते हैं । पितरों की पूजा से मनुष्य को पुष्टि, आयु, वीर्य, और लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।

यही कारण है कि पितृ कर्म को अत्यंत कल्याणकारी मानते हुए देवताओं की पूजा से भी पहले करना चाहिए ।

ध्यान रखने वाली बात यह है कि पितृ कार्य करते समय शुद्धता बहुत आव्श्यक है । चाहे वह वाणी की हो या कर्म की अर्थात् श्राद्ध करते समय न तो किसी से बुरा बोलें और न ही अपवित्र रहे । श्राद्ध की क्रियाएं अत्यंत सूक्ष्म होती हैं; अत: इन्हें करते समय अत्यंत सावधानी रखनी चाहिए।
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12/09/2025

सबसे पहले किसने किया था श्राद्ध, कैसे शुरू हुई ये परंपरा?
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श्राद्ध के बारे में अनेक धर्म ग्रंथों में कई बातें बताई गई हैं। महाभारत के अनुशासन पर्व में भी भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को श्राद्ध के संबंध में कई ऐसी बातें बताई हैं, जो वर्तमान समय में बहुत कम लोग जानते हैं। महाभारत में ये भी बताया गया है कि श्राद्ध की परंपरा कैसे शुरू हुई और फिर कैसे ये धीरे-धीरे जनमानस तक पहुंची। आज हम आपको श्राद्ध से संबंधित कुछ ऐसी ही रोचक बातें बता रहे हैं-

निमि ने शुरू की श्राद्ध की परंपरा
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महाभारत के अनुसार, सबसे पहले श्राद्ध का उपदेश महर्षि निमि को महातपस्वी अत्रि मुनि ने दिया था। इस प्रकार पहले निमि ने श्राद्ध का आरंभ किया, उसके बाद अन्य महर्षि भी श्राद्ध करने लगे। धीरे-धीरे चारों वर्णों के लोग श्राद्ध में पितरों को अन्न देने लगे। लगातार श्राद्ध का भोजन करते-करते देवता और पितर पूर्ण तृप्त हो गए।

पितरों को हो गया था अजीर्ण रोग
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श्राद्ध का भोजन लगातार करने से पितरों को अजीर्ण (भोजन न पचना) रोग हो गया और इससे उन्हें कष्ट होने लगा। तब वे ब्रह्माजी के पास गए और उनसे कहा कि- श्राद्ध का अन्न खाते-खाते हमें अजीर्ण रोग हो गया है, इससे हमें कष्ट हो रहा है, आप हमारा कल्याण कीजिए।
देवताओं की बात सुनकर ब्रह्माजी बोले- मेरे निकट ये अग्निदेव बैठे हैं, ये ही आपका कल्याण करेंगे। अग्निदेव बोले- देवताओं और पितरों। अब से श्राद्ध में हम लोग साथ ही भोजन किया करेंगे। मेरे साथ रहने से आप लोगों का अजीर्ण दूर हो जाएगा। यह सुनकर देवता व पितर प्रसन्न हुए। इसलिए श्राद्ध में सबसे पहले अग्नि का भाग दिया जाता है।

पहले पिता को देना चाहिए पिंड
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महाभारत के अनुसार, अग्नि में हवन करने के बाद जो पितरों के निमित्त पिंडदान दिया जाता है, उसे ब्रह्मराक्षस भी दूषित नहीं करते। श्राद्ध में अग्निदेव को उपस्थित देखकर राक्षस वहां से भाग जाते हैं। सबसे पहले पिता को, उनके बाद दादा को उसके बाद परदादा को पिंड देना चाहिए। यही श्राद्ध की विधि है। प्रत्येक पिंड देते समय एकाग्रचित्त होकर गायत्री मंत्र का जाप तथा सोमाय पितृमते स्वाहा का उच्चारण करना चाहिए।

कुल के पितरों को करें तृप्त
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रजस्वला स्त्री को श्राद्ध का भोजन तैयार करने में नहीं लगाना चाहिए। तर्पण करते समय पिता-पितामह आदि के नाम का स्पष्ट उच्चारण करना चाहिए। किसी नदी के किनारे पहुंचने पर पितरों का पिंडदान और तर्पण अवश्य करना चाहिए। पहले अपने कुल के पितरों को जल से तृप्त करने के पश्चात मित्रों और संबंधियों को जलांजलि देनी चाहिए। चितकबरे बैलों से जुती हुई गाड़ी में बैठकर नदी पार करते समय बैलों की पूंछ से पितरों का तर्पण करना चाहिए क्योंकि पितर वैसे तर्पण की अभिलाषा रखते हैं।

अमावस्या पर जरूर करना चाहिए श्राद्ध
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नाव से नदी पार करने वालों को भी पितरों का तर्पण करना चाहिए। जो तर्पण के महत्व को जानते हैं, वे नाव में बैठने पर एकाग्रचित्त हो अवश्य ही पितरों का जलदान करते हैं। कृष्णपक्ष में जब महीने का आधा समय बीत जाए, उस दिन अर्थात अमावस्या तिथि को श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।

इसलिए रखना चाहिए पितरों को प्रसन्न
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पितरों की भक्ति से मनुष्य को पुष्टि, आयु, वीर्य और धन की प्राप्ति होती है। ब्रह्माजी, पुलस्त्य, वसिष्ठ, पुलह, अंगिरा, क्रतु और महर्षि कश्यप-ये सात ऋषि महान योगेश्वर और पितर माने गए हैं। मरे हुए मनुष्य अपने वंशजों द्वारा पिंडदान पाकर प्रेतत्व के कष्ट से छुटकारा पा जाते हैं।

ऐसे करना चाहिए पिंडदान
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महाभारत के अनुसार, श्राद्ध में जो तीन पिंडों का विधान है, उनमें से पहला जल में डाल देना चाहिए। दूसरा पिंड श्राद्धकर्ता की पत्नी को खिला देना चाहिए और तीसरे पिंड की अग्नि में छोड़ देना चाहिए, यही श्राद्ध का विधान है। जो इसका पालन करता है उसके पितर सदा प्रसन्नचित्त और संतुष्ट रहते हैं और उसका दिया हुआ दान अक्षय होता है।

1👉 पहला पिंड जो पानी के भीतर चला जाता है, वह चंद्रमा को तृप्त करता है और चंद्रमा स्वयं देवता तथा पितरों को संतुष्ट करते हैं।

2👉 इसी प्रकार पत्नी गुरुजनों की आज्ञा से जो दूसरा पिंड खाती है, उससे प्रसन्न होकर पितर पुत्र की कामना वाले पुरुष को पुत्र प्रदान करते हैं।

3👉 तीसरा पिंड अग्नि में डाला जाता है, उससे तृप्त होकर पितर मनुष्य की संपूर्ण कामनाएं पूर्ण करते हैं।
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🍃🙏💢 *बालाजी परिवार* 💢🙏🍃

12/09/2025

#पितृपक्ष_पर_विशेष_ज्ञातव्य_विषय!!

श्राद्ध के द्वारा प्रसन्न हुए पितृगण मनुष्य को पुत्र, धन ,विद्या,आयु, आरोग्य,लौकिक सुख ,मोक्ष तथा सुख स्वर्ग आदि प्रदान करते है!!

श्राद्ध के योग्य समय हो या न हो तीर्थ में पहुंचते ही मनुष्य को सर्वदा स्नान,तर्पण,ओर श्राद्ध करना चाहिये!!
शुक्ल पक्ष की अपेक्षा कृष्णपक्ष ओर पूर्वाह्न की अपेक्षा अपरान्ह काल श्राध्द के लिए श्रेष्ठ माना जाता है!!

सायंकाल श्राद्ध नही करना चाहिए ।सायंकाल का समय राक्षसी वेला नाम से प्रसिद्ध है,जो सभी कार्यो में निन्दित है!!
रात्रि में श्राध्द नही करना चाहिए ,उसे राक्षसी कहा गया है!दोनो संध्याओं में तथा पूर्वान्हकाल में भी श्राद्ध नही करना चाहिए!
चतुर्दशी को श्राध्द करने से कुप्रजा (निन्दित सन्तान)पैदा होती है।परन्तु जिसके पितर युद्ध मे शस्त्र से मारे गये हो, वे चतुर्दशी को श्राद्ध करने से प्रसन्न होते है!!

चतुर्दशी को श्राद्ध नही करना चाहिए ।जो चतुर्दशी को श्राध्द करता है , उसके घर मे नवयुवकों की मृत्यु होती है तथा श्राध्द करनेवाला स्वयं भी युद्ध का भागी होता है(जिनकी मृत्यु शस्त्र से न होकर स्वाभाविक ही चतुर्दशी को हुई हो ,उनका श्राद्ध दूसरे दिन अमावश्या को करना चाहिए)

दिन के आठवें भाग मुहूर्त में --जब सूर्य का ताप घटने लगता है ,उस समय का नाम' कुतप 'है।उसमें पितरो को दिया गया दान अक्षय होता है!!

कुतप ,खड्गपत्र ,कम्बल ,चांदी, कुंश, तिल गौ,ओर दौहित्र ---ये आठो कुतप नाम से प्रसिद्ध है!!

श्राध्द में तीन वस्तुओ बहुत पवित्र होती है---दौहित्र,कुतपकाल, ओर तिल ।
श्राध्द में तीन वस्तुएं प्रसंशनीय होती है --वाहर -भीतर की शुद्धि,क्रोध न करना और जल्दवाजी न करना!!

श्राध्द सदा एकांत में करना चाहिए ।पिंडदान पर साधारण ,नीच मनुष्यों की दृष्टि पड़ने पर वह पितरो को नही पहुंचता।

दुसरो की भूमि पर श्राद्ध नही करना चाहिये।
जंगल, देवमंदिर ,पुण्यतीर्थ,ओर पर्वत---ये दुसरो की भूमि में नही आते,क्योकि इन पर किसी का स्वामित्व नही होता ।।

मनुष्य देवकार्य में ब्राह्मण की परीक्षा न करे,पर पितृकार्य मे तो प्रयत्न पूर्वक ब्राह्मण की परीक्षा अवश्य करे!!

श्राध्द में पितरो की तृप्ति ब्राह्मणों द्वारा ही होती है।।

श्राध्द के समय ब्राह्मण को आमंत्रित करना अत्यावश्यक है।जो विना ब्राह्मण के श्राध्द करता है ,उसके पितर भोजन नही करतेतथा श्राप देकर लौट जाते है!ब्राह्मणहीन श्राध्द करने से मनुष्य महापापी होता है!!

श्राध्द का भोजन स्त्री(ब्राह्मण के स्थान पर ब्राह्मणी )-को नही कराना चाहिये!!
यदि श्राध्द भोजन करने वाले एक हजार ब्राह्मणों के सम्मुख एक भी योगी तो वह यजमान के सहित उन सबका उद्धार कर देता है!!

जिस श्राध्द में दस लाख विना पढ़े हुए ब्राह्मण भोजन करते है, वहां यदि वेदों का ज्ञाता एक ही ब्राह्मण भोजन करके सन्तुष्ट हो जाये तो उन दस लाख ब्राह्मणों के बराबर का फल देता है!!

देवकार्य में दो और पितृकार्य में तीन अथवा दोनो में एक-एक ब्राह्मण भोजन कराना चाहिये।अत्यंत धनवान होने पर भी श्राद्ध कर्म में विस्तार या दिखावा नही करना चाहिए!!

जो श्राद्धकाल आने पर भी काम,क्रोध ,अथवा भय से पांच कोष के भीतर रहने वाले दामाद,भांजे,तथा बहिन को नही बुलाता ओर सदा दुसरो को ही भोजन कराता है,उसके श्राद्ध में देवता तथा पितर अन्न ग्रहण नही करते!!

अपना भांजा ओर भाई-वन्धु यदि मूर्ख भी हो तो भी श्राध्द में उनका त्याग नही करना चाहिए!!

श्राद्ध में निमंत्रित बैठ जाने पर भजन के निमित्त उपस्थित हुए भिक्षुक या ब्रह्मचारी को भी उनके इच्छानुसार भोजन कराना चाहिये।जिसके श्राध्द में अतिथि भोजन नही करता उसका श्राध्द प्रशंसनीय नही होता!!

श्राध्दकाल में आये अतिथि का अवश्य सत्कार करे।उस समय अतिथि का सत्कार न करने से वह श्राध्दकर्म के सम्पूर्ण फल को नष्ट कर देता है!!

जिसके श्राध्द के भोजन में मित्रो की प्रधानता होती है,उस श्राध्द या हविष्य से पितर व देवता तृप्त नही होते!जो श्राद्ध में भोजन देकर उससे मित्रता का सम्बंध जोड़ता है अर्थात श्राध्द को मित्रता का साधन बनाता है,वह स्वर्गलोक से भ्रष्ट हो जाता है!इसलिए श्राध्द में मित्र को निमंत्रण नही देना चाहिए।मित्र को सन्तुष्ट करने के लिए धन आदि देना उचित है।श्राद्ध में भोजन तो उसे ही कराना चाहिये, जो शत्रु या मित्र न होकर मध्यस्थ हो!!

श्राद्ध में हीन अंगवाला ,पतित,कुष्ठरोगी,व्रणयुक्त, पुक्कस जाति वाला,नास्तिक,ओर मुर्गा सुवर,तथा कुत्ता--ये दूर से ही हटा देना चाहिए।वीभत्स, अपवित्र,नग्न,मत्त,मूर्ख,धूर्त,रजस्वला स्त्री,नीला तथा कशाय वस्त्र धारण करने वाले तथा पाखंडी को भी बहा से हटा देना चाहिये!!

पिंडदान के समय उस स्थान से चांडाल, श्वपच,गेरुआ वस्त्रधारी, सन्यासी,कोढ़ी, पतित,ब्रह्म हत्यारा,क्षेत्रज ब्राह्मण को हटा देना चाहिए!!

जहाँ रजस्वला स्त्री ,चांडाल, ओर सुवर श्राद्ध के अन्नपर दृष्टि डाल देते है ,वह श्राध्द व्यर्थ हो जाता है।वह अन्न प्रेत ही ग्रहण करते है!!

नपुंसक ,अपविद्ध(सत्पुरुषों द्वारा वहिष्कृत)चांडाल, पापी, पाखंडी,रोगी,मुर्गा, कुत्ता,नग्न,(वैदिक कर्म का त्याग करने वाला)वन्दर,सुवर,रजस्वला स्त्री, जन्म-मरण के शौच से युक्त व्यक्ति ओर शव ले जाने वाले पुरुष ---इनमे से किसी की भी दृष्टि पडजाने से देवता या पितर --कोई भी अपना भाग ग्रहण नही करते।इसलिये किसी घिरे हुए स्थान में श्रध्दापूर्वक श्राध्दकर्म करना चाहिए!!

चांडाल, सुवर,कुत्ता,मुर्गा,रजस्वला स्त्री, ओर नपुंसक--ये भोजन करते हुए ब्राह्मणो को नही देखे।होमः,दान ,भोज्य,दैव,ओर पितृ --इनको यदि ये देख ले तो वह सब निष्फल हो जाता है ।
एक खुरवाले का,ऊंटनी का,भेड़ का,मृगी तथा भैस का दूध श्राद्ध में काम मे नही लेना चाहिए।चँवरी गाय का तथा हाल की व्यायी हुई गौ के दस दिन के भीतर का दूध भी श्राद्ध में वर्जित है।श्राध्द के निमित्त मांगकर लाया हुया दूध भी वर्जित है!!

ब्रह्मा जी ने पशुओ की सृष्टि करते समय सबसे पहले गौ को रचा,अतः श्राद्ध में उन्ही का दूध ,दही,घी काम मे लेना चाहिये!!

जौ ,धान, तिल ,गेंहू,मूंग,सांवा, सरसो का तेल,तिन्नी का चावल,कंगनी आदि से पितरो को तृप्त करना चाहिये।आम, अमड़ा, वेल,अनार,विजोरा,पुराना आंवला,खीर,नारियल, फालसा,नारंगी,खजूर अंगूर, निलकैथ,परवल,चिरौजी, वेर,जंगली वेर,ओर इंद्र जौ-- इनको यत्नपूर्वक लेना चाहिये!!

जौ,कंगनी,मूंग,गेहूं, धान, तिल, मटर,कचनार, ओर सरसों--इनका श्राद्ध में होना अच्छा है!!

जिसमे बाल या कीड़े पड़ गए हों, जिसे कुत्ते ने देख लिया हों, जो वासी या दुर्गंधित हो---ऐसी वस्तु का श्राद्ध में उपयोग न करे।वैगन ओर शराब का भी त्याग करें।जिस अन्न पर पहने हुए वस्त्र की हवा लग जाये वह भी श्राद्ध में वर्जित है!!

राजमाष,मसूर,अरहर ,गाजर, कुम्हड़ा,गोल लौकी बैगन ,शलजम,हींग,प्याज,काला नमक,काला जीरा,सिंघाड़ा,जामुन,सुपारी,कुल्थी,कैथ,महुया ,अलसी,पिलिसरसो, चना---ये सब वस्तुओ श्राध्द में निषेध है!!
जहाँ घरघराहट की ध्वनि,ओखली के कूटने का शव्द ,अथवा सूप के फटकने की आवाज होती हो, वहां पर किया श्राद्ध व्यर्थ हो जाता है !!

अरुण श्राध्द कर्ता पुरुष दातुन करना,पान खाना, तैल ओर उबटन लगाना,मैथुन करना,ओषध सेवन करना,तथा दूसरे के अन्न का सेवन करना अवश्य त्याग दे।रास्ता चलना,दूसरेनगर या गांव जाना,कलह,क्रोध,ओर मैथुन करना, बोझ ढोना तथा दिन में सोना--इन सबका उस दिन परित्याग कर देना चाहिए!!

श्राद्ध भूमि में सर्वत्र तिल विखेर देना चाहिए।तिलों के द्वारा असुरों से आक्रांत भूमि शुध्द हो जाती है।।

जो श्राध्द तिलों से रहित होता है,अथवा जो क्रोध पूर्वक किया जाता है,उसके हविष्य को राक्षस अथवा पिशाच लुप्त कर देते है!!

जिस श्राध्द में तिल की मात्रा अधिक होती है वह श्राद्ध अक्षय होता है!!

जो सफेद तिलों से पितरो का तर्पण करता है उसका किया हुआ तर्पण व्यर्थ हो जाता है!!

तिल पिशाचों से श्राद्ध की रक्षा करते है,कुश राक्षषो से बचाते है,श्रोत्रिय ब्राह्मण पंक्ति की रक्षा करते है ओर यतिगण (यदि कषाय वस्त्र वाले न हो ,तो)श्राद्ध में भोजन कर ले तो वह अक्षय हो जाता है।

श्राद्ध में पहले अग्नि को ही भाग्य अर्पित किया जाता है,अग्नि में हवन करने के बाद जो पितरो के निमित्त पिंडदान किया जाता है,उसे ब्रह्मराक्षस दूषित नही करते!!

सोने, चांदी,ओर ताँबे के पात्र पितरो के पात्र कहे जाते है,श्राद्ध में चांदी की चर्चा और दर्शन भी पुण्यदायक है।चांदी का समीप होना ,दर्शन अथवा दान राक्षसो का विनाश करने वाला ,यशोदायक,तथा पितरो को तैरनेवाला होता है

पितरो के लिए चांदी के पात्र से श्रद्धा पूर्वक जलमात्र भी दिया जाए तो वह अक्षय तृप्तिकारक होता है ।पितरो के लिए अर्घ्य, पिंड,ओर भजन पात्र भी चांदी के ही श्रेष्ठ माने गये है।।

जो अपनी तर्जनी अंगुली में चांदी की मुद्रिका धारण कर पितरो को तर्पण करता है,उसका तर्पण फल अधिकाधिक प्राप्त होता है।यदि वह अनामिका अंगुली में स्वर्ण की मुद्रिका धारण कर तर्पण करे तो वह बहुत अधिक फल देने वाला होता है।।

जो मनुष्य मैथुन तथा क्षोरकर्म करके देवताओ ओर पितरो को तर्पण करता है ,वह जल रक्त्त के समान होता है तथा दाता नरको को जाता है(अतः क्षोरकर्म एक दिन पूर्व होना चाहिए)!!

जो ब्राह्मणो के हाथ मे नमक या व्यंजन परोसता है अथवा लोहे के पात्र से परोसता है ,वह भोजन को राक्षस ग्रहण करते है,पितर ग्रहण नही करते!!

एक हाथ से लाया गया जो अन्न पात्र ब्राह्मणो के आगे रखा जाता है ,उस अन्न को राक्षस छीन लेते है!!

गोमय आदि से लिपे-पुते पवित्र तथा एकांत स्थान में ,जिसमे दक्षिण दिशा की ओर भूमि कुछ नीची हो और जहाँ पापी मनुष्यो की दृष्टि न पड़े ,श्राद्ध करना चाहिए!!
जो मनुष्य श्राद्ध के समय ब्राह्मणो को मिट्टी के पात्र में भोजन कराता है ,वह मनुष्य एवम ब्राह्मण --दोनो पाप के भागी होते है!!

सिर ढककर (पगड़ी आदि बांधकर)दक्षिण की तरफ मुख करके ओर जूता पहनकर भोजन करने से वह अन्न राक्षसों को प्राप्त होता है,पितरो को नही!!

जो अज्ञानी मनुष्य अपने घर श्राद्ध करके फिर दूसरे घर भोजन करता है ,वह पाप का भागी होता है ओर कर्ता को श्राद्ध का फल नही मिलता!!

ब्राह्मणो को श्रद्धा पूर्वक गरम अन्न भोजन कराना चाहिये,परन्तु फल ,पेय पदार्थ ठंडा ही देना चाहिये!!
जब तक अन्न गरम रहता है,जब तक ब्राह्मण मौन होकर भोजन करते है और जब तक वे भोज्य पदार्थों के गुणों का वर्णन नही करते ,तब तक पितर लोग भोजन करते है!!

श्राद्ध में वैद्य को दिया हुया अन्न पीव व रक्त्त के समान पितरो को अग्राह्य हो जाता है।देव मंदिर में पूजा करके जीविका चलाने वाले को दिया हुआ श्राद्ध काअन्न दान निरर्थक हो जाता है।सूदखोर को दिया हुआ अन्न अस्थिर हो जाता है।वाणिज्यबृत्ति करनेवाले को श्राद्ध में दिया हुआ अन्न का दान न इस लोक में लाभदायक होता है न परलोक में!!

वस्त्र के विना कोई क्रिया ,यज्ञ,वेदाध्ययन ओर तपस्या नही होती ।अतः श्राद्धकाल में वस्त्रका दान विशेष रुप से करना चाहिए।जो रेशमी,सूती,ओर विना कटा हुआ वस्त्र श्राद्ध में देता है,वह उत्तम भीगो को प्राप्त करता है।श्राद्ध में रेशम, सन,अथवा कपास का नया सूत देना चाहिये।ऊन या पाटका सूत वर्जित है।विद्वान पुरुष जिसमे कोर न हो ऐसा वस्त्र फटा न होने पर भी श्राद्ध में न दे ,क्योकि उसमे दोष होता है और पितर तृप्त नही होते।।
स्त्री श्राद्ध के उच्छिष्ट पात्रो का न उठाएं।ज्ञानहीन ओर वृतरहित पुरुष भी उन्हें न हटाये ।स्वयं पुत्र ही आकर पिता के श्राद्ध में उच्छिष्ट पात्रो को उठाये!!

श्राद्ध के पिंडो को गौ,या बकरी को खिला दे अथवा पानी मे या अग्नि में छोड़ दे!!(ब्राह्मणों को भी खिला सकते है)!!

यदि श्राद्ध कर्ता की पत्नी को पुत्र की कामना हो तो मध्यम पिंड(पितामह को अर्पित पिंड)--को ग्रहण कर ले और पितरो से पुत्र--प्राप्ति की प्रार्थना करे-- #आधत्त_पितरो_गर्भं_कुमारं_पुष्कर_स्रजम्!!
【पितरो !आप लोग मेरे गर्भ में कमलों की माला से अलंकृत एक सुंदर पुत्र की स्थापना करें】
भोगों की इच्छा रखने वाला पुरुष पिंड को सदा अग्नि में डाले!!

सन्तान की प्राप्ति के लिए मध्यम पिंड मंत्रोच्चारण पूर्वक पत्नी को दे!!
उत्तम कांति चाहे तो सदा गौ को ही पिंड खिलाये!!
यदि प्रज्ञा, यश,ओर कीर्ति की इच्छा हो तो सदा पिंड को जल में ही डाले!!
दीर्घ आयु की कामना हो तो सब पिंडो को कौओं को खिला दे!!
कार्तिकेय के लोक में जानें कि इच्छा हो तो मुर्गे को खिलाएं अथवा दक्षिण दिशा की ओर मुख करके आकाश में ही उछाल दे,क्योकि आकाश और दक्षिण दिशा पितरो के ही स्थान है!

जो व्यक्ति अग्नि,विष आदि के द्वारा आत्महत्या करता है,उसके निमित्त अशौच तथा श्राद्ध -तर्पण करने का विधान नही है।यदि श्राद्ध तर्पण किया भी जाये तो उसे प्राप्त नही होता!!

अमावश्या को पितृ श्राद्ध के अवसर पर यदि मंथन -क्रिया (दही विलोय)किया जाए तो उससे प्राप्त मट्ठा मदिरा के समान तथा घी मांस के समान माना गया है!!

श्राद्ध ओर हवन के समय तो एक ही हाथ से पिंड एवं आहुति दे,पर तर्पण में दोनो हाथों से जल देना चाहिए!!

नाभि के वरावर जल में खड़ा होकर मन- ही -मन यह चिंतन करे कि मेरे पितर आये और यह जलांजलि ग्रहण करे।दोनो हाथों को संयुक्त करके जल से पूर्ण करें और अपने ह्रदय के ऊपर तक अंजली उठाकर उसे पुनः विधिपूर्वक जल में डाल दे।
जल में दक्षिण की ओर मुख करके खड़ा होकर आकाश में जल गिराना चाहिये;क्योकि पितरो का स्थान दक्षिण दिशा और आकाश ही मान्य है!!
पूर्णिमा ओर चतुर्दशी को श्राद्ध नही करना चाहिए;क्योकि पूर्णिमा कृष्णपक्ष में न होने से उसमे महालय की प्राप्ति नही होती और चतुर्दशी में केवल शस्त्र से नष्ट हुए का छोड़कर श्राद्ध करनेवाले के घर मे नवयुवकों की मृत्यु तथा श्राद्ध कर्ता स्वयं युद्ध का भागी होता है।
इन दोनों तिथियों का श्राद्ध द्वादशी या अमावश्या को करना चाहिए।।

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