08/07/2026
*औराही हिंगना: एक नई 'परती परिकथा' और रेणु परिवार का अक्षर-यज्ञ*
*विनोद आनंद*
कोसी के कछार में बसा औराही हिंगना। वह गांव, जिसकी उर्वर मिट्टी में आज भी उस महान कथा-शिल्पी फणीश्वर नाथ रेणु की पदचाप गूंजती है। जहां हर धूल का कण, हर हवा का झोंका, उनके उन अमर शब्दों को साकार करता है जिन्होंने इस पूरे मिथिला-कोसी प्रदेश की आत्मा को शब्दों की अमृत-माला में पिरोकर कालजयी बना दिया। 'मैला आंचल' की उस मिट्टी से उठती सुगंध आज भी गांव की गलियों, खेतों और बांस के झुरमुटों में बसी हुई है।
आज उसी पावन माटी पर एक नयी 'परिकथा' रची जा रही है—वह परिकथा जो साहित्य के पन्नों पर स्याही से नहीं, बल्कि ईंट-पत्थर, सीमेंट और त्याग की अटूट नींव पर गढ़ी जा रही है। रेणु परिवार ने अपनी चार एकड़ से अधिक पुश्तैनी आवासीय भूमि, वह भूमि जहां पीढ़ी दर पीढ़ी उनके सपने पले-बढ़े, जहां रेणु जी की स्मृतियां बसती हैं, शिक्षा विभाग को सौंपकर एक अनुपम मिसाल कायम की है।
यह मात्र भूमि-दान नहीं, बल्कि संस्कारों का जीवंत उद्घोष है। यह वह त्याग है जो व्यक्तिगत सुख को सामूहिक भविष्य के चरणों में समर्पित कर देता है। इस एक कदम से गांव के नौजवानों के लिए ज्ञान का नया द्वार खुलेगा, जहां आने वाली पीढ़ियां रेणु की विरासत को न सिर्फ याद करेंगी, बल्कि उसे आगे बढ़ाएंगी—शिक्षा की रोशनी में, प्रगति के पथ पर।
रेणु परिवार द्वारा किया गया यह महादान साहित्यिक गौरव को सामाजिक दायित्व में बदलने का प्रतीक बन गया है। यह त्याग का ऐसा महाकाव्य है, जो कोसी की लहरों की तरह सदियों तक गूंजता रहेगा, और आने वाली नस्लों को प्रेरित करता रहेगा कि सच्ची विरासत भूमि और संपत्ति में नहीं, बल्कि सेवा और समर्पण में निहित होती है।
औराही हिंगना अब सिर्फ रेणु का गांव नहीं रहा—यह अब एक जीवंत शिक्षा-तीर्थ भी बनने जा रहा है, जहां मिट्टी और मेधा का मिलन नई कहानियां रचेगा।
*परती परिकथा का जीवंत विस्तार: जहाँ 'अन्न' की जगह 'अक्षर' उपजे*
रेणु जी के साहित्य में 'परती परिकथा' का नायक जितेंद्र जब अपने गांव लौटता है, तो उसका संकल्प होता है—बंजर पड़ी परती जमीन को हरियाली और समृद्धि में बदलना। आज, औराही हिंगना में वही 'जितेंद्र' जैसे संकल्प का रूप दक्षिणेश्वर प्रसाद राय 'पप्पू' और उनके परिवार के रूप में साकार हो रहा है।
रेणु परिवार ने केवल जमीन दान नहीं की,