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20/10/2025

दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई

20/10/2025

पवनतनय संकट हरन मंगल मूरति रुप।
राम लषन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप।।
श्री हनुमान जन्मोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏🚩🕉️🔔

गुरू पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं
10/07/2025

गुरू पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं

अथ श्री इंद्रकृत श्री महालक्ष्मी अष्टक॥ श्री महालक्ष्म्यष्टकम् ॥नमस्तेस्तू महामाये श्रीपीठे सुरपुजिते ।शंख चक्र गदा हस्त...
04/07/2025

अथ श्री इंद्रकृत श्री महालक्ष्मी अष्टक

॥ श्री महालक्ष्म्यष्टकम् ॥

नमस्तेस्तू महामाये श्रीपीठे सुरपुजिते ।
शंख चक्र गदा हस्ते महालक्ष्मी नमोस्तूते ॥ १ ॥

नमस्ते गरूडारूढे कोलासूर भयंकरी ।
सर्व पाप हरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तूते ॥ २ ॥

सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्ट भयंकरी ।
सर्व दुःख हरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तूते ॥३ ॥

सिद्धिबुद्धिप्रदे देवी भुक्तिमुक्ति प्रदायिनी ।
मंत्रमूर्ते सदा देवी महालक्ष्मी नमोस्तूते ॥ ४ ॥

आद्यंतरहिते देवी आद्यशक्ती महेश्वरी ।
योगजे योगसंभूते महालक्ष्मी नमोस्तूते ॥ ५ ॥

स्थूल सूक्ष्म महारौद्रे महाशक्ती महोदरे ।
महापाप हरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तूते ॥ ६ ॥

पद्मासनस्थिते देवी परब्रम्हस्वरूपिणी ।
परमेशि जगन्मातर्र महालक्ष्मी नमोस्तूते ॥ ७ ॥

श्वेतांबरधरे देवी नानालंकार भूषिते ।
जगत्स्थिते जगन्मार्त महालक्ष्मी नमोस्तूते ॥ ८ ॥

महालक्ष्म्यष्टकस्तोत्रं यः पठेत् भक्तिमान्नरः ।
सर्वसिद्धीमवाप्नोति राज्यं प्राप्नोति सर्वदा ॥ ९ ॥

एककाले पठेन्नित्यं महापापविनाशनं ।
द्विकालं यः पठेन्नित्यं धनधान्य समन्वितः ॥१०॥

त्रिकालं यः पठेन्नित्यं महाशत्रूविनाशनं ।
महालक्ष्मीर्भवेन्नित्यं प्रसन्ना वरदा शुभा ॥११॥

॥इतिंद्रकृत श्रीमहालक्ष्म्यष्टकस्तवः संपूर्णः ॥

श्री संकटनाशन गणेश स्तोत्र एवं अर्थ:संकटनाशन गणेश स्तोत्श्री गणेशाय नमः॥अर्थ: श्री गणेश को मेरा प्रणाम है।नारद उवाच,प्रण...
25/06/2025

श्री संकटनाशन गणेश स्तोत्र एवं अर्थ:
संकटनाशन गणेश स्तोत्

श्री गणेशाय नमः॥

अर्थ: श्री गणेश को मेरा प्रणाम है।

नारद उवाच,
प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम्।
भक्तावासं स्मरेन्नित्यमायुःकामार्थसिद्धये॥

अर्थ:
नारद जी कहते हैं- पहले मस्तक झुकाकर गौरीपुत्र विनायका देव को प्रणाम करके प्रतिदिन आयु, अभीष्ट मनोरथ और धन आदि प्रयोजनों की सिद्धि के लिए भक्त के हृदय में वास करने वाले गणेश जी का स्मरण करें ।

प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम्।
तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम्॥

लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च।
सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम्॥

नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम्।
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम्॥

अर्थ:
जिनका पहला नाम ‘वक्रतुण्ड’ है, दूसरा ‘एकदन्त’ है, तीसरा ‘कृष्णपिङ्गाक्षं’ है, चौथा ‘गजवक्त्र’ है, पाँचवाँ ‘लम्बोदर’, छठा ‘विकट’, सातवाँ ‘विघ्नराजेन्द्रं’, आठवाँ ‘धूम्रवर्ण’, नौवां ‘भालचंद्र’, दसवाँ ‘विनायक’, ग्यारहवाँ ‘गणपति’, और बारहवाँ नाम ‘गजानन’ है।

द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो॥

अर्थ:
जो मनुष्य सुबह, दोपहर और शाम-तीनों समय प्रतिदिन इन बारह नामों का पाठ करता है, उसे संकट का भय नहीं होता। यह नाम-स्मरण उसके लिए सभी सिद्धियों का उत्तम साधक है।

विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम्।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम्॥

अर्थ:
इन नामों के जप से विद्यार्थी को विद्या, धन की कामना रखने वालों को धन, पुत्र की कामना रखने वालों को पुत्र और मोक्ष की कामना रखने वालो को मोक्ष में गति प्राप्त हो जाती है।

जपेद्गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासैः फलं लभेत्।
संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशयः॥

अर्थ:
इस गणपति स्तोत्र का नित्य जप करें। इसके नित्य पठन से जपकर्ता को छह महीने में अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। एक वर्ष तक जप करने से मनुष्य सिद्धि को प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है।

अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेत्।
तस्य विद्या भवेत् सर्वा गणेशस्य प्रसादतः॥

अर्थ:
जो इस स्तोत्र को भोजपत्र पर लिखकर आठ ब्राह्मणों को दान करता है, गणेश जी की कृपा से उसे सम्पूर्ण विद्या की प्राप्ति होती है।

॥ इति श्री नारदपुराणं संकटनाशनं महागणपति स्तोत्रम् संपूर्णम्॥

संकटनाशन स्तोत्र में गणेश जी के 12 नामों का उल्लेख मिलता है। इस स्तोत्र का जो भी विधिपूर्वक पाठ करता है, उसकी हर इच्छा पूरी होती है। यह संकट को हरने वाला स्तोत्र है। इस स्तोत्र को विघ्ननाशक गणेश स्तोत्र भी कहते हैं।

संकटनाशन स्तोत्र संसार में सर्वप्रथम पूजनीय भगवान श्री गणेश को समर्पित सबसे प्रभावशाली नारद जी द्वारा कथन किया हुआ स्तोत्र है। इसे सबसे पहले श्री नारद जी ने सुनाया है।

श्री हनुमान जी महाराज के जन्मोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏 जय श्री राम
12/04/2025

श्री हनुमान जी महाराज के जन्मोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏 जय श्री राम

30/03/2025

विक्रम संवत 2082 सनातनी नववर्ष की अनंत शुभकामनाएं। सभी सनातनी पर प्रभु राम कृपा करें। जय श्री राम 🙏

23/03/2025

श्री हनुमान जी महाराज, श्री हनुमान गढ़ी अयोध्या धाम के आज 23-03-25 के अद्भुत एवं अलौकिक दर्शन… श्री हनुमान जी की कृपा आप सभी पर बनी रहे… ऐसी मंगल कामना…!!!
#अयोध्या

सूर्य रथ खरों ने खींचा तब नाम हुआ खरमास। खरमास क्या है ? खरमास और मलमास में क्या अंतर है ? 14 मार्च से सूर्य के मीन राशि...
18/03/2025

सूर्य रथ खरों ने खींचा तब नाम हुआ खरमास।
खरमास क्या है ?
खरमास और मलमास में क्या अंतर है ?
14 मार्च से सूर्य के मीन राशि में आने पर खरमास आरंभ हो गया है जो 13 अप्रैल तक रहेगा। इस अवधि में शुभ कार्य करना वर्जित माना गया है।

मार्कंडेय पुराण के अनुसार सूर्य अपने सात घोड़े के रथ पर बैठकर पूरे ब्रह्मांड की परिक्रमा कर रहे थे इस परिक्रमा के दौरान सूर्य का रथ एक छन के लिए भी नहीं रूका लेकिन निरंतर चलने और सूर्य की गर्मी से घोड़े प्यास तथा थकान से व्याकुल होने लगे। घोड़े की दयनीय दशा देखकर सूर्य देव ने उन्हें विश्राम देने और उनकी प्यास बुझाने के उद्देश्य से रथ रुकवाने का विचार किया लेकिन उन्हें अपनी प्रतिज्ञा का स्मरण हो आया कि वह अपनी इस अनवरत चलने वाली यात्रा में कभी विश्राम नहीं लेंगे। यह विचार करते हुए सूर्य देव का रथ आगे बढ़ रहा था । कुछ दूर चलने पर सूर्य देव को एक तालाब के पास दो खर (गधहा) दिखाई दिए । उनके मन में विचार आया कि जब तक उनके रथ के घोड़े पानी पीकर विश्राम करते हैं तब तक इन दोनों खरों को रथ में जोत कर आगे की यात्रा जारी रखी जाए। ऐसा विचार कर सूर्य देव ने अपने सारथी अरुण को उन दोनों खरों को घोड़े के स्थान पर जोतने की आज्ञा दी। सूर्य देव के आदेश पर उनके सारथी ने खरों को रथ से जोत दिया। खर अपनी मंद गति से सूर्य के रथ को लेकर परिक्रमा पथ पर आगे बढ़ने लगे। मंद गति से चलने के कारण सूर्य देव का तेज भी मंद होने लगा। सूर्य देव के रथ को इन खरों द्वारा खींचने के कारण ही इसे खरमास कहा गया। खरमास साल में दो बार आता है एक बार जब सूर्य धनु राशि में होते हैं दूसरा जब सूर्य मीन राशि में आते हैं। इस दौरान सूर्य का पूरा प्रभाव यानी तेज पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध पर नहीं पड़ता। सूर्य की इस शक्तिहीन स्थिति के कारण ही पृथ्वी पर इस दौरान गृह प्रवेश, नया घर बनाना ,नया वाहन, मुंडन, विवाह आदि मांगलिक और शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं। किसी नए कार्य को शुरू नहीं किया जाता है लेकिन इस मास में सूर्य और बृहस्पति की आराधना विशेष फलदाई होती है।

गरुड़ पुराण के अनुसार खरमास में प्राण त्यागने पर सद्गति नहीं मिलती इसलिए महाभारत के युद्ध में भीष्म पितामह ने अपने प्राण खरमास में नहीं त्यागे थे । उन्होंने सूर्य के उत्तरायण होने का प्रतीक्षा किया।

खरमास और मलमास में अंतर होता है। सूर्य के धनु और मीन राशि में आने पर खरमास होता है यह साल में दो बार आता है जबकि मलमास 3 साल में एक बार आता है इसे अधिक मास और पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है।

असुर हिरण्यकश्यपु को वरदान था कि उसकी मृत्यु 12 मासों में से किसी भी मास में नहीं होगी। इसीलिए भगवान विष्णु ने उसका वध करने के लिए मलमास की रचना की एवं विश्व के कल्याण के लिए नरसिंह भगवान का अवतार लेकर दुष्ट असुर का वध किया।

18/03/2025

श्री हनुमान जी महाराज, श्री हनुमान गढ़ी अयोध्या धाम के आज 18-03-25 के अद्भुत एवं अलौकिक दर्शन… श्री हनुमान जी की कृपा आप सभी पर बनी रहे… ऐसी मंगल कामना…!!!
#अयोध्या

गया तीर्थ की कथाब्रह्माजी जब सृष्टि की रचना कर रहे थे उस दौरान उनसे असुर कुल में गया नामक असुर की रचना हो गई। गया असुरों...
16/03/2025

गया तीर्थ की कथा

ब्रह्माजी जब सृष्टि की रचना कर रहे थे उस दौरान उनसे असुर कुल में गया नामक असुर की रचना हो गई। गया असुरों के संतान रूप में पैदा नहीं हुआ था इसलिए उसमें आसुरी प्रवृति नहीं थी। वह देवताओं का सम्मान और आराधना करता था।
उसके मन में एक खटका था। वह सोचा करता था कि भले ही वह संत प्रवृति का है लेकिन असुर कुल में पैदा होने के कारण उसे कभी सम्मान नहीं मिलेगा इसलिए क्यों न अच्छे कर्म से इतना पुण्य अर्जित किया जाए ताकि उसे स्वर्ग मिले।
गयासुर ने कठोर तप से भगवान श्री विष्णुजी को प्रसन्न किया। भगवान ने वरदान मांगने को कहा तो गयासुर ने मांगा- आप मेरे शरीर में वास करें। जो मुझे देखे उसके सारे पाप नष्ट हो जाएं वह जीव पुण्यात्मा हो जाए और उसे स्वर्ग में स्थान मिले।
भगवान से वरदान पाकर गयासुर घूम-घूमकर लोगों के पाप दूर करने लगा जो भी उसे देख लेता उसके पाप नष्ट हो जाते और स्वर्ग का अधिकारी हो जाता था इससे यमराज की व्यवस्था गड़बड़ा गई कोई घोर पापी भी कभी गयासुर के दर्शन कर लेता तो उसके पाप नष्ट हो जाते यमराज उसे नर्क भेजने की तैयारी करते तो वह गयासुर के दर्शन के प्रभाव से स्वर्ग मांगने लगता। यमराज को हिसाब रखने में संकट हो गया था।
यमराज ने ब्रह्माजी से कहा कि अगर गयासुर को न रोका गया तो आपका वह विधान समाप्त हो जाएगा जिसमें आपने सभी को उसके कर्म के अनुसार फल भोगने की व्यवस्था दी है पापी भी गयासुर के प्रभाव से स्वर्ग भोंगेगे।
ब्रह्माजी​ ने उपाय निकाला उन्होंने गयासुर से कहा कि तुम्हारा शरीर सबसे ज्यादा पवित्र है इसलिए तुम्हारी पीठ पर बैठकर मैं सभी देवताओं के साथ यज्ञ करुंगा।
उसकी पीठ पर यज्ञ होगा यह सुनकर गया​ सहर्ष तैयार हो गया ब्रह्माजी सभी देवताओं के साथ पत्थर से गया को दबाकर बैठ गए। इतने भार के बावजूद भी वह अचल नहीं हुआ। वह घूमने-फिरने में फिर भी समर्थ था।
देवताओं को चिंता हुई उन्होंने आपस में सलाह की कि इसे श्री विष्णु ने वरदान दिया है इसलिए अगर स्वयं श्री हरि भी देवताओं के साथ बैठ जाएं तो गयासुर अचल हो जाएगा। श्री हरि भी उसके शरीर पर आ बैठे।
श्री विष्णु जी को भी सभी देवताओं के साथ अपने शरीर पर बैठा देखकर गयासुर ने कहा- आप सब और मेरे आराध्य श्री हरि की मर्यादा के लिए अब मैं अचल हो रहा हूं। घूम-घूमकर लोगों के पाप हरने का कार्य बंद कर दूंगा।
लेकिन मुझे चूंकि श्री हरि का आशीर्वाद है इसलिए वह व्यर्थ नहीं जा सकता इसलिए श्री हरि आप मुझे पत्थर की शिला बना दें और यहीं स्थापित कर दें।
श्री हरि उसकी इस भावना से बड़े प्रसन्न हुए उन्होंने कहा गया अगर तुम्हारी कोई और इच्छा हो तो मुझसे वरदान के रूप में मांग लो।
गया ने कहा " हे नारायण मेरी इच्छा है कि आप सभी देवताओं के साथ अप्रत्यक्ष रूप से इसी शिला पर विराजमान रहें और यह स्थान मृत्यु के बाद किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठानों के लिए तीर्थस्थल बन जाए "
श्री विष्णु ने कहा गया तुम धन्य हो तुमने लोगों के जीवित अवस्था में भी कल्याण का वरदान मांगा और मृत्यु के बाद भी मृत आत्माओं के कल्याण के लिए वरदान मांग रहे हो तुम्हारी इस कल्याणकारी भावना से हम सब बंध गए हैं।
भगवान ने आशीर्वाद दिया कि जहां गया स्थापित हुआ वहां पितरों के श्राद्ध-तर्पण आदि करने से मृत आत्माओं को पीड़ा से मुक्ति मिलेगी। क्षेत्र का नाम गयासुर के अर्धभाग गया नाम से तीर्थ रूप में विख्यात होगा। मैं स्वयं यहां विराजमान रहूंगा।
इस तीर्थ से समस्त मानव जाति का कल्याण होगा। साथ ही वहा भगवान श्री विष्णुजी​ ने अपने पैर का निशान स्थापित किया जो आज भी वहा के मंदिर मे दर्शनीय है |
गया विधि के अनुसार श्राद्ध फल्गू नदी के तट पर विष्णु पद मंदिर में व अक्षयवट के नीचे किया जाता है। गया में श्राद्ध आदि करने से पितरों का कल्याण होता हैl
पिंडदान की शुरुआत कब और किसने की, यह बताना उतना ही कठिन है जितना कि भारतीय धर्म-संस्कृति के उद्भव की कोई तिथि निश्चित करना। परंतु स्थानीय पंडों का कहना है कि सर्व प्रथम सतयुग में ब्रह्माजी ने पिंडदान किया था।
महाभारत के 'वन पर्व' में भीष्म पितामह और पांडवों की गया-यात्रा का उल्लेख मिलता है। श्रीराम ने महाराजा दशरथ का पिण्ड दान यहीं (गया) में किया था। गया के पंडों के पास साक्ष्यों से स्पष्ट है कि मौर्य और गुप्त राजाओं से लेकर कुमारिल भट्ट, चाणक्य, रामकृष्ण परमहंस व चैतन्य महाप्रभु जैसे महापुरुषों का भी गया में पिंडदान करने का प्रमाण मिलता है। गया में फल्गू नदी प्रायः सूखी रहती है। इस संदर्भ में एक कथा प्रचलित है।
भगवान श्री राम अपनी पत्नी सीताजी के साथ पिता दशरथ का श्राद्ध करने गयाधाम पहुंचे। श्राद्ध कर्म के लिए आवश्यक सामग्री लाने वे चले गये। तब तक राजा दशरथ की आत्मा ने पिंड की मांग कर दी। फल्गू नदी तट पर अकेली बैठी सीताजी अत्यंत असमंजस में पड़ गई। माता सीताजी​ ने फल्गु नदी, गाय, वटवृक्ष और केतकी के फूल को साक्षी मानकर पिंडदान कर दिया।जब भगवान श्री राम आए तो उन्हें पूरी कहानी सुनाई, परंतु भगवान को विश्वास नहीं हुआ।
तब जिन्हें साक्षी मानकर पिंडदान किया था, उन सबको सामने लाया गया। पंडा, फल्गु नदी, गाय और केतकी फूल ने झूठ बोल दिया परंतु अक्षयवट ने सत्यवादिता का परिचय देते हुए माता की लाज रख ली इससे क्रोधित होकर सीताजी ने फल्गू नदी को श्राप दे दिया कि तुम सदा सूखी रहोगी जबकि गाय को मैला खाने का श्राप दिया केतकी के फूल को पितृ पूजन मे निषेध का वटवृक्ष पर प्रसन्न होकर सीताजी ने उसे सदा दूसरों को छाया प्रदान करने व लंबी आयु का वरदान दिया। तब से ही फल्गू नदी हमेशा सूखी रहती हैं, जबकि वटवृक्ष अभी भी तीर्थयात्रियों को छाया प्रदान करता है। आज भी फल्गू तट पर स्थित सीता कुंड में बालू का पिंड दान करने की क्रिया (परंपरा) संपन्न होती है।
🙏

श्री घुश्मेश्वर महादेवाय नमः
26/02/2025

श्री घुश्मेश्वर महादेवाय नमः

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